Adhyaya 31
AdhyakshapracharaAdhyaya 31

Adhyaya 31

Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by converting sovereignty into repeatable administrative procedure. Chapter 31 treats the elephant corps not as prestige but as a regulated state instrument: infrastructure (the śālā and stalls), daily time-discipline (bathing, exercise, drinking, sleep), acquisition criteria (age and disqualifications), capability grading (uttama/madhyama/avara by measurements and years), and quantified provisioning (grain, fats, salt, meat, gruel, curd, alkali, liquor/milk, oil for anointing, fodder). This is classic Kautilyan statecraft: military strength is produced through bureaucratic measurability. The chapter’s placement is strategic—after fort/urban and supply-oriented superintendencies—because elephants are high-cost, high-impact assets whose failure cascades into defeat. By binding veterinarians, trainers, and attendants into a monitored regimen, the state protects its coercive limb (daṇḍa in practice) while maintaining yogakṣema through predictable logistics and reduced wastage.

Sutras

Sutra 1

सांग्रामिकमलंकारं चिकित्सकानीकस्थाउपस्थायिकवर्गं चानुतिष्ठेत् ॥ कZ_०२.३१.०१ ॥

उसे युद्ध-सामग्री और साज-सज्जा का रख-रखाव करना चाहिए, तथा चिकित्सकों का दल, टुकड़ी-स्थापित कर्मचारी और परिचारकों का वर्ग भी तैयार/स्थापित रखना चाहिए।

Sutra 2

हस्त्यायामद्विगुणोत्सेधविष्कम्भायामां हस्तिनीस्थानाधिकां सप्रग्रीवां कुमारीसंग्रहां प्रान्मुखीमुदन्मुखीं वा शालां निवेशयेत् ॥ कZ_०२.३१.०२ ॥

उसे हाथी के माप के अनुसार ऊँचाई और चौड़ाई में दुगुनी (और लंबाई भी उसी के अनुरूप) हाथी-शाला बनवानी चाहिए, जिसमें वयस्क हथिनी के लिए आवश्यक स्थान से कुछ अधिक जगह हो; आगे के भाग/गर्दन के लिए व्यवस्था हो, कम उम्र की हथिनियों के लिए अलग घेरा हो, और वह पूर्व या उत्तरमुखी हो।

Sutra 3

हस्त्यायामचतुरश्रश्लक्ष्णालानस्तम्भफलकास्तरकं समूत्रपुरीषोत्सर्गं स्थानं निवेशयेत् ॥ कZ_०२.३१.०३ ॥

उसे हाथी के माप के अनुसार चौकोर, चिकना (फर्श) वाला स्थान बनवाना चाहिए, जिसमें बाँधने के खम्भे और तख्ते/पटरे लगे हों, तथा मूत्र और मल के त्याग के लिए अलग निकास/स्थान हो।

Sutra 4

स्थानसमां शय्यामर्धापाश्रयां दुर्गे साम्नाह्याउपवाह्यानां बहिर्दम्यव्यालानाम् ॥ कZ_०२.३१.०४ ॥

उसे स्थान के बराबर शय्या (बिछावन) और आंशिक आश्रय देना चाहिए; दुर्ग के भीतर उन हाथियों के लिए जो जुए/साज में जोते जाने और सवारी/सेवा के योग्य हों, और बाहर उन के लिए जो अभी वश में किए जा रहे हों तथा उग्र/खतरनाक पशुओं के लिए।

Sutra 5

प्रथमसप्तम अष्टमभागावह्नः स्नानकालौ तदनन्तरं विधायाः ॥ कZ_०२.३१.०५ ॥

दिन के प्रथम, सप्तम और अष्टम भाग में स्नान का समय होता है; उसके बाद आगे का नियम/दिनचर्या करनी चाहिए।

Sutra 6

पूर्वाह्ने व्यायामकालः पश्चाह्नः प्रतिपानकालः ॥ कZ_०२.३१.०६ ॥

पूर्वाह्न व्यायाम का समय है; अपराह्न पानी पिलाने/पेय-सेवन (पुनर्स्थापन) का समय है।

Sutra 7

रात्रिभागौ द्वौ स्वप्नकाला त्रिभागः संवेशनोत्थानिकः ॥ कZ_०२.३१.०७ ॥

रात्रि के दो भाग सोने के लिए हैं; तीसरा भाग विश्राम-व्यवस्था और जागरण/उठने (रात्रिकालीन प्रबंधन) के लिए है।

Sutra 8

ग्रीष्मे ग्रहणकालः ॥ कZ_०२.३१.०८ ॥

ग्रीष्म ऋतु में ग्रहण (पकड़/हैंडलिंग) का समय होता है।

Sutra 9

विंशतिवर्षो ग्राह्यः ॥ कZ_०२.३१.०९ ॥

बीस वर्ष का हाथी ग्रहण करने योग्य है (राज्य-सेवा हेतु स्वीकार्य)।

Sutra 10

विक्को मोढो मक्कणो व्याथितो गर्भिणी धेनुका हस्तिनी चाग्राह्याः ॥ कZ_०२.३१.१० ॥

विक्क, मोढ, मक्कण, रोगी/घायल, तथा गर्भवती, दूध पिलाने वाली और हथिनी—ये राज्य-सेवा के लिए स्वीकार्य नहीं हैं।

Sutra 11

सप्तारत्नि उत्सेधो नवायामो दश परिणाहः प्रमाणतश्चत्वारिंशद्वर्षो भवत्युत्तमः त्रिंशद्वर्षो मध्यमः पञ्चविंशतिवर्षोऽवरः ॥ कZ_०२.३१.११ ॥

मानक माप के अनुसार—ऊँचाई 7 रत्नि, लंबाई 9, और घेर 10—40 वर्ष का हाथी ‘उत्तम’, 30 वर्ष का ‘मध्यम’, और 25 वर्ष का ‘अवर’ माना जाता है।

Sutra 12

तयोः पादावरो विधाविधिः ॥ कZ_०२.३१.१२ ॥

उन दोनों (अर्थात उत्तम और मध्यम) के लिए नियम यह है कि निर्धारित मानकों में वे एक चौथाई भी कम न हों।

Sutra 13

अरत्नौ तणुलद्रोणः अर्धाढकं तैलस्य सर्पिषस्त्रयः प्रस्थाः दशपलं लवणस्य मांसं पञ्चाशत्पलिकम् रसस्याढकं द्विगुणं वा दध्नः पिण्डक्लेदनार्थं क्षारदशपलिकं मद्यस्याढकं द्विगुणं वा पयसः प्रतिपानं गात्रावसेकस्तैलप्रस्थः शिरसोऽष्टभागः प्रादीपिकश्च यवसस्य द्वौ भारौ सपादौ शष्पस्य शुष्कस्यार्धतृतीयो भारः कडङ्करस्यानियमः ॥ कZ_०२.३१.१३ ॥

(निर्दिष्ट वर्ग/माप के हाथी के लिए:) चावल: 1 द्रोण; तेल: आधा आढक; घी: 3 प्रस्थ; नमक: 10 पल; मांस: 50 पल; रस/शोरबा: 1 आढक; या दही दुगुनी मात्रा में। पिंड (चारे की गोलियाँ) नरम करने हेतु क्षार: 10 पल। मद्य: 1 आढक; या दूध दुगुनी मात्रा में। शरीर स्नान हेतु तेल: 1 प्रस्थ; सिर के लिए उसका आठवाँ भाग; तथा दीपक-भत्ता भी। यवस (हरा चारा): 2¼ भार; सूखी घास (शष्प): 2½ भार। कडङ्कर के लिए कोई निश्चित नियम नहीं है।

Sutra 14

सप्तारत्निना तुल्यभोजनोऽष्टारत्निरत्यरालः ॥ कZ_०२.३१.१४ ॥

आठ रत्नि का हाथी सात रत्नि वाले के समान ही आहार खाता है, पर वह अत्यधिक टेढ़ा/असहज होता है (इसलिए अवांछनीय)।

Sutra 15

यथाहस्तमवशेषः षडरत्निः पञ्चारत्निश्च ॥ कZ_०२.३१.१५ ॥

शेष (अर्थात् बाकी वर्गीकरण) हाथ-नाप के अनुसार है—छह-रत्नी और पाँच-रत्नी (श्रेणियाँ)।

Sutra 16

क्षीरयावसिको विक्कः क्रीडार्थं ग्राह्यः ॥ कZ_०२.३१.१६ ॥

दूध और चारे पर पाला गया ‘विक्क’ क्रीड़ा/प्रदर्शन के लिए स्वीकार्य है।

Sutra 17

संजातलोहिता प्रतिच्छन्ना सम्लिप्तपक्षा समकक्ष्या व्यतिकीर्णमांसा समतल्पतला जातद्रोणिकेति शोभाः ॥ कZ_०२.३१.१७ ॥

सुंदरता के लक्षण हैं—अच्छी तरह बना लालिमा-युक्त वर्ण, ठीक से ढका हुआ शरीर, अच्छी तरह लेपे/स्वस्थ कान, समान कंधे, समान रूप से फैला मांस, समतल पीठ, और सुविकसित ‘द्रोणिका’ (शरीर की उचित गहराइयाँ/आकृतियाँ)।

Sutra 18

शोभावशेन व्यायामं भद्र्म मन्दं च कारयेत् ॥ कZ_०२.३१.१८अब् ॥

पशु की दशा/शोभा के अनुसार उससे व्यायाम कराए—या तो तीव्र (भद्र) या मंद (मन्द)।

Frequently Asked Questions

Predictable readiness of the elephant corps: fewer diseases and injuries, reduced loss from mishandling, stable logistics, and higher battlefield reliability—thereby securing the realm through deterrence and victory.

This unit does not state explicit fines in the supplied sūtras; in Kauṭilya’s administrative logic, breaches (ration fraud, negligent care, unauthorized procurement, or failure to follow regimen) fall under the superintendent’s disciplinary jurisdiction—typically fines, restitution for loss, and removal/punishment of responsible staff as per general adhyakṣa enforcement norms.