
Book 2 operationalizes the Vijigīṣu’s power by turning material administration into predictable state capacity. Chapter 2.11 functions as an assay-manual: it enumerates recognized gem-types (maṇayaḥ), their desirable properties (maṇiguṇāḥ), defects (doṣāḥ), intermediate/sub-varieties (antarajātayaḥ), and residual categories (kācamaṇayaḥ), then extends the same classificatory logic to vajra (diamond)—including its provenances (yonayaḥ), colors (varṇāḥ), and acceptance/rejection marks. The chapter closes with high-value forest commodities (notably candana varieties), again by sensory/quality markers (color, scent). This is not antiquarian mineralogy; it is fiscal technology. By fixing names, grades, and disqualifications, the state converts uncertain luxury trade into taxable, storable, and strategically deployable wealth—supporting payroll, diplomacy (gifts), and emergency finance. Thus, Kośa is strengthened through epistemic control: the ruler governs value by governing classification.
Sutra 1
कोशाध्यक्षः कोशप्रवेश्यं रत्नं सारं फल्गुं कुप्यं वा तज्जातकरणाधिष्ठितः प्रतिगृह्णीयात् ॥ कZ_०२.११.०१ ॥
कोषाध्यक्ष कोष में प्रविष्ट किए जाने वाले रत्न, सार (कीमती धातु/सामग्री), फल्गु (छोटे मूल्य की वस्तुएँ) या कुप्य (उपयोगी/साधारण वस्तुएँ)—इन सबको उसी वर्ग/विभाग के जिम्मेदार अधिकारी के साथ ही स्वीकार करे।
Sutra 2
ताम्रपर्णिकं पाण्ड्यकवाटकं पाशिक्यं कौलेयं चौर्णेयं माहेन्द्रं कार्दमिकं स्रौतसीयं ह्रादीयं हैमवतं च मौक्तिकम् ॥ कZ_०२.११.०२ ॥
मोती (मौक्तिक) अपने स्रोत/स्थान के आधार पर पहचाने जाते हैं: ताम्रपर्णिक, पाण्ड्यक-वाटक, पाशिक्य, कौलेय, चौर्णेय, माहेन्द्र, कार्दमिक, स्रौतसीय, ह्रादीय और हैमवत।
Sutra 3
शुक्तिः शङ्खः प्रकीर्णकं च योनयः ॥ कZ_०२.११.०३ ॥
सीप (शुक्ति), शंख और विविध/बिखरे हुए स्रोत—ये मोतियों की उत्पत्ति-स्थल (योनि) हैं।
Sutra 4
मसूरकं त्रिपुटकं कूर्मकमर्धचन्द्रकं कञ्चुकितं यमकं कर्तकं खरकं सिक्तकं कामण्डलुकं श्यावं नीलं दुर्विद्धं चाप्रशस्तम् ॥ कZ_०२.११.०४ ॥
मसूरक (मसूर-दाने जैसे), त्रिपुटक (तीन-खण्ड), कूर्मक (कछुए-जैसे), अर्धचन्द्रक, कञ्चुकित (आवरण/लेपित), यमक (जुड़वाँ), कर्तक (कटा हुआ), खरक (खुरदरा), सिक्तक (रेत/चूर्ण लगा), कामण्डलुक (लौकी-आकार); तथा श्याव (भूरा), नील (नीलापन लिए) और दुर्विद्ध (गलत/खराब छेद वाले) मोती—ये सब अप्रशस्त (अस्वीकार्य) हैं।
Sutra 5
स्थूलं वृत्तं निस्तलं भ्राजिष्णु श्वेतं गुरु स्निग्धं देशविद्धं च प्रशस्तम् ॥ कZ_०२.११.०५ ॥
जो मोती बड़े, गोल, सतह-दोषरहित, चमकीले, श्वेत, भारी, चिकने/स्निग्ध-दीप्ति वाले और उचित स्थान पर सही ढंग से छिद्रित हों—वे प्रशस्त (स्वीकार्य) हैं।
Sutra 6
शीर्षकमुपशीर्षकं प्रकाण्डकमवघाटकं तरलप्रतिबद्धं चेति यष्टिप्रभेदाः ॥ कZ_०२.११.०६ ॥
दंड/शाफ्ट (यष्टि) के भेद हैं—शीर्षक, उपशीर्षक, प्रकाण्डक, अवघाटक और तरल-प्रतिबद्ध।
Sutra 7
यष्टीनामष्टसहस्रमिन्द्रच्छन्दः ॥ कZ_०२.११.०७ ॥
यष्टियों के लिए ‘इन्द्रच्छन्द’ नामक समूह आठ हजार का होता है।
Sutra 8
ततोऽर्धं विजयच्छन्दः ॥ कZ_०२.११.०८ ॥
उसका (इन्द्रच्छन्द का) आधा ‘विजयच्छन्द’ कहलाता है।
Sutra 9
चतुष्षष्टिरर्धहारः ॥ कZ_०२.११.०९ ॥
चौंसठ ‘अर्धहार’ (कहलाते) हैं।
Sutra 10
चतुष्पञ्चाशद् रश्मिकलापः ॥ कZ_०२.११.१० ॥
चौवन ‘रश्मिकलाप’ (कहलाते) हैं।
Sutra 11
द्वात्रिंशद्गुच्छः ॥ कZ_०२.११.११ ॥
बत्तीस ‘गुच्छ’ (एक गट्ठर) होते हैं।
Sutra 12
सप्तविंशतिर्नक्षत्रमाला ॥ कZ_०२.११.१२ ॥
सत्ताईस (मिलकर) ‘नक्षत्रमाला’ होते हैं।
Sutra 13
चतुर्विंशतिरर्धगुच्छः ॥ कZ_०२.११.१३ ॥
चौबीस (मिलकर) ‘अर्धगुच्छ’ (आधा-गट्ठर) होते हैं।
Sutra 14
विंशतिर्माणवकः ॥ कZ_०२.११.१४ ॥
बीस (मिलकर) ‘माणवक’ होते हैं।
Sutra 15
ततोऽर्धमर्धमाणवकः ॥ कZ_०२.११.१५ ॥
उस (माणवक) का आधा ‘अर्धमाणवक’ होता है।
Sutra 16
एत एव मणिमध्यास्तन्माणवका भवन्ति ॥ कZ_०२.११.१६ ॥
ये ही (पूर्वोक्त हार), जिनके मध्य में मणि हो, राज्य-परिभाषा में ‘माणवक’ कहलाते हैं।
Sutra 17
एकशीर्षकः शुद्धो हारः ॥ कZ_०२.११.१७ ॥
एकशीर्षक (एक छोर/एक सिरा वाला) हार ‘शुद्ध हार’ कहलाता है।
Sutra 18
तद्वच्छेषाः ॥ कZ_०२.११.१८ ॥
शेष प्रकार भी उसी सिद्धान्त के अनुसार समझे जाएँ।
Sutra 19
मणिमध्योऽर्धमाणवकः ॥ कZ_०२.११.१९ ॥
जिस हार के मध्य में मणि हो, वह ‘अर्धमाणवक’ कहलाता है।
Sutra 20
त्रिफलकः फलकहारः पञ्चफलको वा ॥ कZ_०२.११.२० ॥
‘फलकहार’ तीन फलक वाला (त्रिफलक) या पाँच फलक वाला (पञ्चफलक) होता है।
Sutra 21
सूत्रमेकावली शुद्धा ॥ कZ_०२.११.२१ ॥
एक ही सूत्र/डोरी ‘शुद्ध एकावली’ है।
Sutra 22
सैव मणिमध्या यष्टिः ॥ कZ_०२.११.२२ ॥
वही एकावली, जब उसके बीच में मणि जड़ी हो, तो उसे ‘यष्टि’ कहा जाता है।
Sutra 23
हेममणिचित्रा रत्नावली ॥ कZ_०२.११.२३ ॥
सोने और मणियों से विचित्र/रंगी हुई हार-माला को ‘रत्नावली’ कहते हैं।
Sutra 24
हेममणिमुक्तान्तरोऽपवर्तकः ॥ कZ_०२.११.२४ ॥
सोना, मणि और मोतियों को बारी-बारी से अंतरालों में सजाकर बनी माला को ‘अपवर्तक’ कहते हैं।
Sutra 25
सुवर्णसूत्रान्तरं सोपानकम् ॥ कZ_०२.११.२५ ॥
जिस आभूषण में सुवर्ण-सूत्र (सोने के धागे) के खंड/अंतराल सीढ़ीनुमा क्रम में लगे हों, उसे ‘सोपानक’ कहते हैं।
Sutra 26
मणिमध्यं वा मणिसोपानकम् ॥ कZ_०२.११.२६ ॥
रत्न-जड़ाई या तो ‘मणिमध्य’—जिसमें रत्न बीच में हो—या ‘मणिसोपानक’—जो रत्नों की सीढ़ीनुमा/परतदार व्यवस्था हो—होती है।
Sutra 27
तेन शिरोहस्तपादकटीकलापजालकविकल्पा व्याख्याताः ॥ कZ_०२.११.२७ ॥
उसी (वर्गीकरण के सिद्धान्त) से सिर, हाथ, पैर, कमर के आभूषणों तथा ‘कलाप’ और ‘जालक’ प्रकार के विन्यासों के भेद समझाए गए हैं।
Sutra 28
मणिः कौटोमालेयकः पारसमुद्रकश्च ॥ कZ_०२.११.२८ ॥
रत्नों में ‘कौटोमालेयक’ और ‘पारसमुद्रक’ (नामक प्रकार) भी होते हैं।
Sutra 29
सौगन्धिकः पद्मरागोऽनवद्यरागः पारिजातपुष्पको बालसूर्यकः ॥ कZ_०२.११.२९ ॥
(प्रकार हैं) ‘सौगन्धिक’, ‘पद्मराग’, ‘अनवद्यराग’, ‘पारिजातपुष्पक’ और ‘बालसूर्यक’।
Sutra 30
वैडूर्यमुत्पलवर्णः शिरीषपुष्पक उदकवर्णो वंशरागः शुकपत्त्रवर्णः पुष्यरागो गोमूत्रको गोमेदकः ॥ कZ_०२.११.३० ॥
वैडूर्य (की श्रेणियाँ) ‘उत्पल-वर्ण’, ‘शिरीषपुष्पक’, ‘उदक-वर्ण’, ‘वंशराग’, ‘शुकपत्त्र-वर्ण’, ‘पुष्यराग’, ‘गोमूत्रक’ और ‘गोमेदक’ हैं।
Sutra 31
इन्द्रनीलो नीलावलीयः कलायपुष्पको महानीलो जम्ब्वाभो जीमूतप्रभो नन्दकः स्रवन्मध्यः ॥ कZ_०२.११.३१ ॥
(प्रकार हैं) ‘इन्द्रनील’, ‘नीलावलीय’, ‘कलायपुष्पक’, ‘महानील’, ‘जम्ब्वाभ’, ‘जीमूतप्रभ’, ‘नन्दक’ और ‘स्रवन्मध्य’।
Sutra 32
शुद्धस्फटिको मूलाटवर्णः शीतवृष्टिः सूर्यकान्तश्च । इति मणयः ॥ कZ_०२.११.३२ ॥
(इसके अतिरिक्त) शुद्ध स्फटिक, ‘मूलाट’ रंग का, ‘शीतवृष्टि’ और ‘सूर्यकान्त’—ये (प्रकार के) मणि हैं।
Sutra 33
षडश्रश्चतुरश्रो वृत्तो वा तीव्ररागः संस्थानवानछः स्निग्धो गुरुरर्चिष्मानन्तर्गतप्रभः प्रभानुलेपी चेति मणिगुणाः ॥ कZ_०२.११.३३ ॥
मणि के गुण हैं: षट्कोणीय, चतुर्कोणीय या गोल; तीव्र रंग वाला; सुगठित; स्वच्छ; चमकीला; भारी; दीप्तिमान; भीतर की प्रभा वाला; और अपनी प्रभा को बाहर तक फैलाने वाला।
Sutra 34
मन्दरागप्रभः सशर्करः पुष्पच्छिद्रः खण्डो दुर्विद्धो लेखाकीर्ण इति दोषाः ॥ कZ_०२.११.३४ ॥
दोष हैं: मंद रंग/कांति; कण-कण (शर्करा-जैसे दानों) वाला; फूल-जैसे गड्ढों/छिद्रों वाला; टूटा हुआ; छेदने (पिरोने/जड़ने) में खराब; और रेखाओं से भरा हुआ।
Sutra 35
विमलकः सस्यकोऽञ्जनमूलकः पित्तकः सुलभको लोहिताक्षो मृगाश्मको ज्योतीरसको मालेयकोऽहिच्छत्रकः कूर्पः प्रतिकूर्पः सुगन्धिकूर्पः क्षीरवकः श्शुक्तिचूर्णकः शिलाप्रवालकः पुलकः शुक्लपुलक इत्यन्तरजातयः ॥ कZ_०२.११.३५ ॥
द्वितीयक उप-प्रकार हैं: विमलक, सस्यक, अञ्जनमूलक, पित्तक, सुलभक, लोहिताक्ष, मृगाश्मक, ज्योतीरसक, मालेयक, अहिच्छत्रक, कूर्प, प्रतिकूर्प, सुगन्धिकूर्प, क्षीरवक, शुक्तिचूर्णक, शिलाप्रवालक, पुलक और शुक्लपुलक।
Sutra 36
शेषाः काचमणयः ॥ कZ_०२.११.३६ ॥
शेष (अन्य) सब पत्थर काच-मणि (नकली/पेस्ट रत्न) माने जाएँ।
Sutra 37
सभाराष्ट्रकं तज्जमाराष्ट्रकं कास्तीरराष्ट्रकं श्रीकटनकं मणिमन्तकमिन्द्रवानकं च वज्रम् ॥ कZ_०२.११.३७ ॥
हीरों को उनके उद्गम/प्रकार के अनुसार—सभाराष्ट्रक, तज्जमाराष्ट्रक, कास्तीरराष्ट्रक, श्रीकटनक, मणिमन्तक और इन्द्रवानक—कहा जाता है।
Sutra 38
खनिः स्रोतः प्रकीर्णकं च योनयः ॥ कZ_०२.११.३८ ॥
रत्नों के स्रोत—खानें, नदी-धाराएँ और बिखरे हुए निक्षेप—हैं।
Sutra 39
मार्जाराक्षकं शिरीषपुष्पकं गोमूत्रकं गोमेदकं शुद्धस्फटिकं मूलाटीवर्णं मणिवर्णानामन्यतमवर्णमिति वज्रवर्णाः ॥ कZ_०२.११.३९ ॥
हीरे के मान्य रंग—बिल्ली की आँख जैसे, शिरीष-पुष्प जैसे, गोमूत्र-रंग, गोमेदक जैसे, शुद्ध स्फटिक जैसे, मूलाटी-रंग, अथवा रत्नों के रंगों में से कोई एक—हैं।
Sutra 40
स्थूलं गुरु प्रहारसहं समकोटिकं भाजनलेखि तर्कुभ्रामि भ्राजिष्णु च प्रशस्तम् ॥ कZ_०२.११.४० ॥
प्रशंसनीय (हीरे) वे हैं जो बड़े, भारी, प्रहार-सह, समान कोनों/धारों वाले, पात्र को खरोंचने वाले, तकुआ/भँवर को घुमाने वाले, और दीप्तिमान हों।
Sutra 41
नष्टकोणं निराश्रि पार्श्वापवृत्तं चाप्रशस्तम् ॥ कZ_०२.११.४१ ॥
अप्रशंसनीय वे हैं जिनके कोने टूटे हों, उचित आधार/आश्रय न हो, या जिनका कोई पार्श्व मुड़ा/विकृत हो।
Sutra 42
प्रवालकमालकन्दकं वैवर्णिकं च रक्तं पद्मरागं च करटगर्भिणिकावर्जमिति ॥ कZ_०२.११.४२ ॥
प्रवाल-जैसे, आँवले के कन्द-जैसे, चितकबरे और लाल (पत्थर), तथा पद्मराग (माणिक्य) गिने जाते हैं—करटगर्भिणिका प्रकार को छोड़कर।
Sutra 43
चन्दनं सातनं रक्तं भूमिगन्धि ॥ कZ_०२.११.४३ ॥
चन्दन (सातन), लाल और मिट्टी-सी गंध वाला (कहा गया है)।
Sutra 44
गोशीर्षकं कालताम्रं मत्स्यगन्धि ॥ कZ_०२.११.४४ ॥
(चन्दन के प्रकार:) गोशीर्षक, काला-ताम्रवर्ण और मछली-सी गंध वाला।
Sutra 45
हरिचन्दनं शुकपत्त्रवर्णमाम्रगन्धि तार्णसं च ॥ कZ_०२.११.४५ ॥
(चन्दन के प्रकार:) हरिचन्दन, तोते के पत्ते-सा रंग, आम की गंध वाला, और तार्णस।
Sutra 46
ग्रामेरुकं रक्तं रक्तकालं वा बस्तमूत्रगन्धि ॥ कZ_०२.११.४६ ॥
‘ग्रामेरुक’ लाल होता है, या लाल-काला; और उसमें बकरे के मूत्र जैसी गंध होती है।
Sutra 47
दैवसभेयं रक्तं पद्मगन्धि जापकं च ॥ कZ_०२.११.४७ ॥
‘दैवसभेय’ लाल रंग का, कमल-गंध वाला, और (साथ ही) ‘जापक’ (एक मान्य उप-प्रकार/चिह्न) होता है।
Sutra 48
जोङ्गकं रक्तं रक्तकालं वा स्निग्धम् तौरूपं च ॥ कZ_०२.११.४८ ॥
‘जोंगक’ लाल या लाल-काला होता है; यह चिकना/स्निग्ध होता है, और ‘तौरूप’ रूप-लक्षण वाला होता है।
Sutra 49
मालेयकं पाण्डुरक्तम् ॥ कZ_०२.११.४९ ॥
‘मालेयक’ का रंग फीका-लाल होता है।
Sutra 50
कुचन्दनं रूक्षमगुरुकालं रक्तं रक्तकालं वा ॥ कZ_०२.११.५० ॥
‘कुचन्दन’ रूखा होता है; (यह) अगुरु के समान गहरा होता है, और लाल या लाल-काला होता है।
Sutra 51
कालपर्वतकं रक्तकालमनवद्यवर्णं वा ॥ कZ_०२.११.५१ ॥
‘कालपर्वतक’ लाल-काला होता है; या फिर उसका रंग निर्दोष/निर्मल होता है।
Sutra 52
कोशागारपर्वतकं कालं कालचित्रं वा ॥ कZ_०२.११.५२ ॥
‘कोशागारपर्वतक’ काला होता है, या काला-चितकबरा/विचित्र होता है।
Sutra 53
शीतोदकीयं पद्माभं कालस्निग्धं वा ॥ कZ_०२.११.५३ ॥
‘शीतोदकीया’ कमल-सी दिखती है, या फिर काली और चिकनी/चमकीली होती है।
Sutra 54
नागपर्वतकं रूक्षं शैवलवर्णं वा ॥ कZ_०२.११.५४ ॥
‘नागपर्वतक’ रूखा/खुरदरा होता है, या फिर शैवाल-हरे रंग का होता है।
Sutra 55
शाकलं कपिलम् । इति ॥ कZ_०२.११.५५ ॥
‘शाकल’ कपिला/भूरा होता है। इस प्रकार (सूची समाप्त)।
Sutra 56
लघु स्निग्धमश्यानं सर्पिःस्नेहलेपि गन्धसुखं त्वगनुसार्यनुल्बणमविराग्युष्णसहं दाहग्राहि सुखस्पर्शनमिति चन्दनगुणाः ॥ कZ_०२.११.५६ ॥
चंदन के गुण हैं—हल्का; चिकना; अधिक कठोर नहीं; घी/तेल की परत ले लेता है; सुगंध सुखद; त्वचा पर टिकने वाली परंतु तीव्र नहीं; रंग नहीं छोड़ता; गर्मी सहता है; घिसने पर सार/रस जल्दी देता है; और स्पर्श में सुखद।
Sutra 57
अगुरु जोङ्गकं कालं कालचित्रं मण्डलचित्रं वा ॥ कZ_०२.११.५७ ॥
अगरु (अलोवुड) के प्रकार हैं—जोङ्गक, काला, काल-चित्र (काले धब्बों वाला) और मण्डल-चित्र (वलयाकार/छल्लेदार आकृति वाला)।
Sutra 58
श्यामं दोङ्गकम् ॥ कZ_०२.११.५८ ॥
दोङ्गक किस्म श्याम (गहरी/काली) होती है।
Sutra 59
पारसमुद्रकं चित्ररूपमुशीरगन्धि नवमालिकागन्धि वा । इति ॥ कZ_०२.११.५९ ॥
पारसमुद्रक किस्म रूप में चित्र-विचित्र होती है और उसमें उशीर (खस) या नवमालिका (ताज़ी चमेली की माला) जैसी सुगंध होती है।
Sutra 60
गुरु स्निग्धं पेशलगन्धि निर्हार्यग्निसहमसम्प्लुतधूमं विमर्दसहमित्यगुरुगुणाः ॥ कZ_०२.११.६० ॥
अगरु के गुण हैं—भारी, स्निग्ध, कोमल सुगंध वाला, सार/रस देने वाला, अग्नि/ताप सहने वाला, धुआँ अधिक या घुटन पैदा न करने वाला, और रगड़/हाथ लगाने को सहने वाला—ये अगरु के गुण हैं।
Sutra 61
तैलपर्णिकमशोकग्रामिकं मांसवर्णं पद्मगन्धि ॥ कZ_०२.११.६१ ॥
तैलपर्णिक (जिसे अशोकग्रामिक भी कहते हैं) किस्म मांस-वर्ण की और पद्म (कमल) जैसी सुगंध वाली होती है।
Sutra 62
जोङ्गकं रक्तपीतकमुत्पलगन्धि गोमूत्रगन्धि वा ॥ कZ_०२.११.६२ ॥
जोङ्गक किस्म लाल-पीली होती है और उसमें या तो उत्पल (नीलकमल) जैसी सुगंध होती है या गोमूत्र जैसी गंध।
Sutra 63
ग्रामेरुकं स्निग्धं गोमूत्रगन्धि ॥ कZ_०२.११.६३ ॥
ग्रामेरुक किस्म चिकनी/स्निग्ध होती है और उसमें गोमूत्र जैसी गंध होती है।
Sutra 64
सौवर्णकुड्यकं रक्तपीतं मातुलुङ्गगन्धि ॥ कZ_०२.११.६४ ॥
सौवर्णकुड्यक किस्म लाल-पीली होती है और उसमें मातुलुङ्ग (बिजौरा/सिट्रॉन) की सुगंध होती है।
Sutra 65
पूर्णकद्वीपकं पद्मगन्धि नवनीतगन्धि वा ॥ कZ_०२.११.६५ ॥
पूर्णकद्वीपक किस्म में या तो पद्म (कमल) जैसी सुगंध होती है या ताज़े नवनीत (मक्खन) जैसी खुशबू।
Sutra 66
भद्रश्रियं पारलौहित्यकं जातीवर्णम् ॥ कZ_०२.११.६६ ॥
‘भद्रश्री’ और ‘पारलौहित्यक’ का जाति/प्रकार के अनुरूप स्वाभाविक रंग होता है (अर्थात् अपने प्रकार की अपेक्षित मानक आभा से मेल खाते हैं)।
Sutra 67
आन्तरवत्यमुशीरवर्णम् ॥ कZ_०२.११.६७ ॥
‘आन्तरवत्यम्’ का रंग उशीर (खस-जैसा) होता है।
Sutra 68
उभयं कुष्ठगन्धि च । इति ॥ कZ_०२.११.६८ ॥
दोनों (पूर्वोक्त प्रकार) में कुष्ठ (कुस्त/कोस्टस) जैसी गंध भी होती है—ऐसा।
Sutra 69
कालेयकः स्वर्णभूमिजः स्निग्धपीतकः ॥ कZ_०२.११.६९ ॥
‘कालेयक’ स्वर्णभूमि में उत्पन्न होता है; वह चिकना और पीताभ होता है।
Sutra 70
औत्तरपर्वतको रक्तपीतकः । इति साराः ॥ कZ_०२.११.७० ॥
‘औत्तरपर्वतक’ रक्त-पीत (लालिमा लिए पीला) होता है; ये श्रेष्ठ (सार) प्रकार हैं।
Sutra 71
तेन काशिकं पौण्ड्रकं च क्षौमं व्याख्यातम् ॥ कZ_०२.११.१०६ ॥
उसी (पूर्वोक्त) मानदण्ड से काशी और पौण्ड्र के क्षौम (अलसी/लिनन) वस्त्र भी व्याख्यायित/निर्धारित होते हैं।
Sutra 72
मागधिका पौण्ड्रिका सौवर्णकुड्यका च पत्त्रोर्णा ॥ कZ_०२.११.१०७ ॥
पत्तों के रेशे से बने वस्त्र (पत्त्रोर्णा) ये हैं—मागधिका, पौण्ड्रिका और सौवर्णकुड्यका।
Sutra 73
नागवृक्षो लिकुचो बकुलो वटश्च योनयः ॥ कZ_०२.११.१०८ ॥
स्रोत (योनयः) हैं—नागवृक्ष, लिकुच, बकुल और वट (वृक्ष)।
Sutra 74
पीतिका नागवृक्षिका ॥ कZ_०२.११.१०९ ॥
नागवृक्ष से बनी किस्म ‘पीतिका’ (पीली-सी) कहलाती है।
Sutra 75
गोधूमवर्णा लैकुची ॥ कZ_०२.११.११० ॥
लिकुच से बनी किस्म (लैकुची) गेहूँ के रंग की (गोधूमवर्णा) होती है।
Sutra 76
श्वेता बाकुली ॥ कZ_०२.११.१११ ॥
बकुल से बनी किस्म (बाकुली) श्वेत (सफेद) होती है।
Sutra 77
शेषा नवनीतवर्णा ॥ कZ_०२.११.११२ ॥
शेष किस्में मक्खन-रंग (नवनीत-वर्ण) की होती हैं।
Sutra 78
तासां सौवर्णकुड्यका श्रेष्ठा ॥ कZ_०२.११.११३ ॥
उनमें सौवर्णकुड्यका सर्वोत्तम (उच्चतम श्रेणी) है।
Sutra 79
तया कौशेयं चीनपट्टाश्च चीनभूमिजा व्याख्याताः ॥ कZ_०२.११.११४ ॥
उसी (मानक) के अनुसार कौशेय (रेशम) और चीनभूमि में उत्पन्न चीनी रेशमी वस्त्र (चीनपट्ट) भी समझाए गए हैं (अर्थात उसी नियम से परखे जाएँ)।
Sutra 80
माधुरमापरान्तकं कालिङ्गं काशिकं वाङ्गकं वात्सकं माहिषकं च कार्पासिकं श्रेष्ठम् । इति ॥ कZ_०२.११.११५ ॥
कपास के वस्त्रों (कार्पासिक) में माधुर, अपरान्तक, कालिङ्ग, काशिक, वाङ्गक, वात्सक और माहिषक के (वस्त्र) श्रेष्ठ हैं—ऐसा।
Sutra 81
श्यामिका कालिका कदली चन्द्रोत्तरा शाकुला चारोहजाः ॥ कZ_०२.११.८१ ॥
(मान्य किस्में:) श्यामिका, कालिका, कदली, चन्द्रोत्तरा, शाकुला और आरोहजा।
Sutra 82
कपिला बिन्दुचित्रा वा श्यामिका ॥ कZ_०२.११.८२ ॥
श्यामिका कपिली (भूरी) या बिंदुओं से चित्रित/चितकबरी होती है।
Sutra 83
कालिका कपिला कपोतवर्णा वा ॥ कZ_०२.११.८३ ॥
कालिका कपिली (भूरी) या कबूतर-रंग (धूसर) होती है।
Sutra 84
तदुभयमष्टाङ्गुलायामम् ॥ कZ_०२.११.८४ ॥
वे दोनों आठ अंगुल लंबाई के होने चाहिए।
Sutra 85
परुषा कदली हस्तायता ॥ कZ_०२.११.८५ ॥
कदली खुरदरी होती है और हाथ (हस्त) जितनी लंबी होती है।
Sutra 86
सैव चन्द्रचित्रा चन्द्रोत्तरा ॥ कZ_०२.११.८६ ॥
(चर्म के प्रकार:) ‘सैव’, ‘चन्द्रचित्रा’ (चाँद-नक़्शेदार), और ‘चन्द्रोत्तरा’ (चन्द्र-श्रेष्ठ)।
Sutra 87
कदलीत्रिभागा शाकुला कोठमण्डलचित्रा कृतकर्णिकाजिनचित्रा वा । इति ॥ कZ_०२.११.८७ ॥
(चर्म के भेद:) ‘कदली-त्रिभागा’, ‘शाकुला’, ‘कोठ-मण्डल-चित्रा’ (कोठ/भंडार-गोलों से चित्तीदार), तथा ‘कृत-कर्णिका-अजिन-चित्रा’ (बनाई हुई कर्णिका/कान-जैसी आकृतियों से फॉन-चर्म जैसा नमूना)—इति।
Sutra 88
सामूरं चीनसी सामूली च बाह्लवेयाः ॥ कZ_०२.११.८८ ॥
बाह्लवेय (बैक्ट्रियन/विदेशी) प्रकार: सामूर, चीनसी और सामूली।
Sutra 89
षट्त्रिंशदङ्गुलमञ्जनवर्णं सामूरम् ॥ कZ_०२.११.८९ ॥
सामूर (की माप) छत्तीस अङ्गुल है और उसका रंग मंजन/सुरमा जैसा (गहरा काला) है।
Sutra 90
चीनसी रक्तकाली पाण्डुकाली वा ॥ कZ_०२.११.९० ॥
चीनसी या तो रक्त-काली (लालिमा लिए काली) होती है या पाण्डु-काली (फीकी काली)।
Sutra 91
सामूली गोधूमवर्णा । इति ॥ कZ_०२.११.९१ ॥
सामूली गेहूँ के रंग की होती है—इति।
Sutra 92
सांतिना नलतूला वृत्तपृच्छा चौद्राः ॥ कZ_०२.११.९२ ॥
चौद्र (चर्म) की किस्में हैं—सांतिना, नलतूला और वृत्तपृच्छा।
Sutra 93
सातिना कृष्णा ॥ कZ_०२.११.९३ ॥
सातिना काली (कृष्णा) होती है।
Sutra 94
नलतूला नलतूलवर्णा ॥ कZ_०२.११.९४ ॥
नलतूला, नलतूला-वर्ण (उसकी विशिष्ट रंगत) की होती है।
Sutra 95
कपिला वृत्तपुच्छा च । इति चर्मजातयः ॥ कZ_०२.११.९५ ॥
कपिला और वृत्तपुच्छा—ये चर्म (चमड़े) की जातियाँ/किस्में हैं।
Sutra 96
चर्मणां मृदु स्निग्धं बहुलरोम च श्रेष्ठम् ॥ कZ_०२.११.९६ ॥
चर्म-वस्तुओं में जो मृदु, स्निग्ध (चिकना/चमकीला) और बहुल-रोम (घने रोएँ वाला) हो, वही श्रेष्ठ माना जाता है।
Sutra 97
शुद्धं शुद्धरक्तं पक्षरक्तं चाविकं खचितं वानचित्रं खण्डसंघात्यं तन्तुविच्छिन्नं च ॥ कZ_०२.११.९७ ॥
ऊन का कपड़ा इस प्रकार वर्गीकृत है: शुद्ध (मिश्रणरहित), समान रूप से लाल रंगा हुआ, आंशिक/धारीदार लाल; तथा कढ़ाई/जड़ाई किया हुआ, वन-नक़्श/चित्तेदार, टुकड़ों को जोड़कर बनाया हुआ, और टूटे/कमज़ोर तानों वाला।
Sutra 98
कम्बलः कौचपकः कुलमितिका सौमितिका तुरगास्तरणं वर्णकं तलिच्छकं वारवाणः परिस्तोमः समन्तभद्रकं चाविकम् ॥ कZ_०२.११.९८ ॥
ऊन के सामानों में शामिल हैं: कम्बल, कौचपक, कुलमितिका, सौमितिका, घोड़े का आवरण (तुरगास्तरण), वर्णक, तलिच्छक, वारवाण, परिस्तोम और समन्तभद्रक—ये ऊनी प्रकार हैं।
Sutra 99
पिच्छिलमार्द्रमिव च सूक्ष्मं मृदु च श्रेष्ठम् ॥ कZ_०२.११.९९ ॥
जो (कपड़ा/रेशा) थोड़ा चिकना और मानो नम-सा लगे, बनावट में सूक्ष्म हो और मुलायम हो—वही श्रेष्ठ माना जाता है।
Sutra 100
अष्टप्रोतिसंघात्या कृष्णा भिङ्गिसी वर्षवारणमपसारक इति नैपालकम् ॥ कZ_०२.११.१०० ॥
‘नैपालक’ (नेपाल-प्रकार का ऊनी कपड़ा) आठ-तार/आठ-परत बुनाई वाला होता है; इसके प्रकार हैं: कृष्ण (काला), भिङ्गिसी, वर्षवारण (बारिश रोकने वाला) और अपसारक (पानी झाड़ने वाला)।
Sutra 101
सम्पुटिका चतुरश्रिका लम्बरा कटवानकं प्रावरकः सत्तलिकेति मृगरोम ॥ कZ_०२.११.१०१ ॥
मृग-रोम (हिरन के बाल) के सामानों के नाम हैं: सम्पुटिका, चतुरश्रिका, लम्बरा, कटवानक, प्रावरक और सत्तलिका—ये मानक प्रकार हैं।
Sutra 102
वाङ्गकं श्वेतं स्निग्धं दुकूलम् ॥ कZ_०२.११.१०२ ॥
वाङ्गक (वंग देश का) दुकूल सफेद होता है और चिकना, चमकदार होता है।
Sutra 103
पौण्ड्रकं श्यामं मणिस्निग्धम् ॥ कZ_०२.११.१०३ ॥
पौण्ड्रक (पुण्ड्र देश का) वस्त्र गहरे रंग का होता है और मणि-सा चिकना/चमकीला होता है।
Sutra 104
सौवर्णकुड्यकं सूर्यवर्णं मणिस्निग्धोदकवानं चतुरश्रवानं व्यामिश्रवानं च ॥ कZ_०२.११.१०४ ॥
सौवर्णकुड्यक वस्त्र सूर्य-स्वर्ण रंग का होता है, मणि-सा चिकना-चमकीला और ‘उदकवान’ (अच्छी तरह परिष्कृत/उपचारित) होता है; तथा बुनावट में चतुरश्र-नक़्शेदार और मिश्रित-नक़्शेदार भी होता है।
Sutra 105
एतेषामेकांशुकमध्यर्धद्वित्रिचतुरंशुकमिति ॥ कZ_०२.११.१०५ ॥
इनके मान (माप) हैं—एक आंशुक, डेढ़, दो, तीन और चार आंशुक।
Sutra 116
अतः परेषां रत्नानां प्रमाणं मूल्यलक्षणम् ॥ कZ_०२.११.११६ ॥
अतः शेष रत्नादि वस्तुओं के लिए मानक माप और मूल्य-निर्धारण के लक्षण निर्धारित किए जाएँ।
Sutra 117
जातिं रूपं च जानीयान्निधानं नवकर्म च ॥ कZ_०२.११.११७ ॥
उसे जाति (श्रेणी), रूप, स्रोत/मूल-भंडार, और यह नया बना है (हाल में गढ़ा/किया गया) या नहीं—यह जान लेना चाहिए।
Sutra 118
पुराणप्रतिसंस्कारं कर्म गुह्यमुपस्करान् ॥ कZ_०२.११.११८ ॥
(उसे) पुराने सामान की मरम्मत/पुनर्संस्कार, छिपा हुआ कारीगरी/काम, और (धोखे से परिवर्तन हेतु प्रयुक्त) छिपे औज़ार/उपकरण—इनका पता लगाना चाहिए।
Sutra 119
देशकालपरीभोगं हिंस्राणां च प्रतिक्रियाम् ॥ कZ_०२.११.११९ ॥
उसे देश-काल के अनुसार उपयुक्तता (स्थानीय/मौसमी स्थिति और उपयोग) तथा हिंसक/हानिकारक जोखिमों के प्रतिकार भी परखने चाहिए।
Stable markets and protected savings: standardized gem/diamond grading reduces fraud, improves trust in exchange, increases lawful trade throughput, and strengthens the treasury that funds security and public works.
This excerpt does not state a specific daṇḍa schedule; in Book 2’s administrative frame, misrepresentation/adulteration would trigger confiscation, fines, and prosecution under the relevant superintendent (assay/customs/treasury) using established inspection standards.