
Book 2, Chapter 1 operationalizes the Vijigīṣu’s power by manufacturing a governable countryside: Kautilya treats the janapada not as a natural given but as a designed asset. Settlement is achieved by importing population from other lands and relieving demographic/agrarian pressure at home, then fixing village size, spacing, and mutual-protection obligations. Administrative geometry follows: clusters of villages are aggregated into graded nodes (saṃgraha, kārvaṭika, droṇamukha, sthānīya) to make revenue, justice, and logistics legible. Border gates and frontier forts under antapālas harden the perimeter, while forest and marginal groups are assigned interstitial security roles. Finally, the chapter binds artha to dharma through targeted grants: brahmadeya and immunities to ritual-educational elites and exemptions to key state-service professions, while cultivators receive prepared fields but lose rights if they do not cultivate. The result is a territory that yields surplus, recruits manpower, and resists penetration—core prerequisites for conquest.
Sutra 1
भूतपूर्वमभूतपूर्वं वा जनपदं परदेशापवाहनेन स्वदेशाभिष्यन्दवमनेन वा निवेशयेत् ॥ कZ_०२.०१.०१ ॥
वह पहले से विद्यमान या नव-निर्मित जनपद को परदेशों से लोगों को आकर्षित करके या अपने देश की जनसंख्या-भीड़ को कम करके (लोगों को अन्यत्र बसाकर) स्थापित करे।
Sutra 2
शूद्रकर्षकप्रायं कुलशतावरं पञ्चकुलशतपरं ग्रामं क्रोशद्विक्रोशसीमानमन्योन्यारक्षं निवेशयेत् ॥ कZ_०२.०१.०२ ॥
वह ऐसे ग्राम बसाए जो मुख्यतः शूद्र कृषकों के हों, जिनमें कम-से-कम सौ कुल (घर) और अधिक-से-अधिक पाँच सौ कुल हों; जिनकी सीमाएँ एक या दो क्रोश पर हों; और जो इस प्रकार व्यवस्थित हों कि वे एक-दूसरे की रक्षा कर सकें।
Sutra 3
नलीशैलवनभृष्टिदरीसेतुबन्धशमीशाल्मलीक्षीरवृक्षानन्तेषु सीम्नां स्थापयेत् ॥ कZ_०२.०१.०३ ॥
सीमाओं के छोरों पर वह नल (सरकंडे), शैल (चट्टान), वन, भूस्खलन-चिह्न, दरी (खाई), सेतु-बन्ध (पुल-बंध), तथा शमी, शाल्मली और क्षीरवृक्ष (दूध देने वाले वृक्ष) आदि को सीमा-चिह्न के रूप में स्थापित करे।
Sutra 4
अष्टशतग्राम्या मध्ये स्थानीयं चतुह्शतग्राम्या द्रोणमुखम् द्विशतग्राम्याः कार्वटिकम् दशग्रामीसंग्रहेण संग्रहं स्थापयेत् ॥ कZ_०२.०१.०४ ॥
आठ सौ ग्रामों के समूह के बीच वह स्थानीय (क्षेत्रीय मुख्यालय) स्थापित करे; चार सौ ग्रामों के बीच द्रोणमुख; दो सौ ग्रामों के बीच कार्वटिक (बाज़ार-केन्द्र); और दस ग्रामों के संग्रह के लिए संग्रह (स्थानीय इकाई) स्थापित करे।
Sutra 5
अन्तेष्वन्तपालदुर्गाणि जनपदद्वाराण्यन्तपालाधिष्ठितानि स्थापयेत् ॥ कZ_०२.०१.०५ ॥
सीमाओं पर वह अन्तपाल-दुर्ग (सीमा-रक्षक किले)—जनपद के द्वार—अन्तपालों के अधीन स्थापित करे।
Sutra 6
तेषामन्तराणि वागुरिकशबरपुलिन्दचण्डालारण्यचरा रक्षेयुः ॥ कZ_०२.०१.०६ ॥
उन (सीमा-चौकियों/दुर्गों) के बीच के अंतरालों की रक्षा वागुरिक (फंदा लगाने वाले), शबर, पुलिंद, चांडाल तथा अन्य वनचारी समूह करें।
Sutra 7
अध्यक्षसंख्यायकादिभ्यो गोपस्थानिकानीकस्थचिकित्सकाश्वदमकजङ्घाकारिकेभ्यश्च विक्रयाधानवर्जानि ॥ कZ_०२.०१.०७ब् ॥
अध्यक्षों, संख्यायकों आदि को तथा गोप-स्थानिक, अनीकस्थ, चिकित्सक, अश्वदमक, जंघाकारिक (पैदल दूत) और कारीगरों को भी वह ऐसी जोत/होल्डिंग दे जो न बेची जा सके न गिरवी रखी जा सके।
Sutra 8
करदेभ्यः कृतक्षेत्राण्यैकपुरुषिकाणि प्रयच्छेत् ॥ कZ_०२.०१.०८ ॥
कर देने वाले प्रजाजनों को वह जोते हुए खेत दे—ऐसे भूखंड जो एक व्यक्ति/एक गृह-इकाई के लिए संभालने योग्य हों।
Sutra 9
निवेशसमकालं यथागतकं वा परिहारं दद्यात् ॥ कZ_०२.०१.१७ ॥
वह बसावट/स्थापना की अवधि तक, या परिस्थिति के अनुसार, कर-छूट दे।
Sutra 10
निवृत्तपरिहारान्पितेवानुगृह्णीयात् ॥ कZ_०२.०१.१८ ॥
जब उनकी कर-छूट समाप्त हो जाए, तब भी वह पिता की तरह उनका अनुग्रह करता रहे।
Sutra 19
आकरकर्मान्तद्रव्यहस्तिवनव्रजवणिक्पथप्रचारान्वारिस्थलपथपण्यपत्तनानि च निवेशयेत् ॥ कZ_०२.०१.१९ ॥
उसे खानों, कर्मान्तों (उत्पादन/कारखानों), द्रव्य‑भण्डारों, हस्तिवनों, व्रजों (गो‑पालन‑स्थानों), वणिक्पथ‑प्रचारों (व्यापार‑मार्ग व यात्रापथ), जल‑मार्गों और स्थल‑मार्गों, बाजारों तथा वाणिज्यिक पत्तनों/नगरों की स्थापना (और व्यवस्था) करनी चाहिए।
Sutra 20
सहोदकमाहार्योदकं वा सेतुं बन्धयेत् ॥ कZ_०२.०१.२० ॥
वह प्राकृतिक जल-स्रोत पर या जल को लाकर (नहर/विचलन द्वारा) सेतु (बाँध/तटबंध/जलाशय) बनवाए।
Sutra 21
अन्येषां वा बध्नतां भूमिमार्गवृक्षोपकरणानुग्रहं कुर्यात्पुण्यस्थानारामाणां च ॥ कZ_०२.०१.२१ ॥
या जब अन्य लोग (ऐसे कार्य) बनाएं, तो वह उन्हें भूमि, आने-जाने के मार्ग, लकड़ी/वृक्ष और उपकरणों में सहायता दे; तथा पुण्यस्थानों और सार्वजनिक उद्यानों के लिए भी।
Sutra 22
सम्भूयसेतुबन्धादपक्रामतः कर्मकरबलीवर्दाः कर्म कुर्युः ॥ कZ_०२.०१.२२ ॥
जो व्यक्ति सामूहिक सेतु-निर्माण में शामिल होकर फिर हट जाए, उसके मजदूर और बैल फिर भी काम करें (अर्थात उसका योगदान बाध्य होगा)।
Sutra 23
व्ययकर्मणि च भागी स्यात् न चांशं लभेत ॥ कZ_०२.०१.२३ ॥
वह खर्च और श्रम में भागी होगा, पर लाभांश (उत्पन्न से हिस्सा) नहीं पाएगा।
Sutra 24
मत्स्यप्लवहरितपण्यानां सेतुषु राजा स्वाम्यं गच्छेत् ॥ कZ_०२.०१.२४ ॥
सेतु-कार्यों से संबंधित मछली, नौका/प्लव (फेरी आदि) और हरित उपज/सब्जियों पर राजा का स्वामित्व-अधिकार होगा (अर्थात नियमन व राजस्व-ग्रहण)।
Sutra 25
दासाहितकबन्धूनशृण्वतो राजा विनयं ग्राहयेत् ॥ कZ_०२.०१.२५ ॥
जो व्यक्ति दासों, मजदूर/आश्रितों या कुटुम्बियों की शिकायतें नहीं सुनता, उसे राजा अनुशासनात्मक दंड देकर विनय में लाए।
Sutra 26
बालवृद्धव्यसन्यनाथांश्च राजा बिभृयात्स्त्रियमप्रजातां प्रजातायश्च पुत्रान् ॥ कZ_०२.०१.२६ ॥
राजा बच्चों, वृद्धों, संकटग्रस्तों और निराश्रितों का पालन-पोषण करे; तथा संतानहीन स्त्री का और संतानवती स्त्री के पुत्रों का भी निर्वाह करे।
Sutra 27
बालद्रव्यं ग्रामवृद्धा वर्धयेयुरा व्यवहारप्रापणात्देवद्रव्यं च ॥ कZ_०२.०१.२७ ॥
ग्राम के वृद्धजन उचित व्यवहार/लेन-देन द्वारा बालकों की संपत्ति बढ़ाएँ (सुरक्षित रखकर उपयुक्त रूप से चलाएँ); और देवद्रव्य का भी वैसा ही प्रबंध करें।
Sutra 28
अपत्यदारं मातापितरौ भ्रातृऋनप्राप्तव्यवहारान्भगिनीः कन्या विधवाश्चाबिभ्रतः शक्तिमतो द्वादशपणो दण्डः अन्यत्र पतितेभ्यः अन्यत्र मातुः ॥ कZ_०२.०१.२८ ॥
जो समर्थ व्यक्ति अपने बच्चों और पत्नी का, माता-पिता का, (अधिकार होने पर) भाई का, विधिसम्मत देय वाले ऋणदाताओं का, तथा बहन, अविवाहित पुत्री और विधवाओं का पालन नहीं करता—उस पर बारह पण का दंड हो; परन्तु पतित/बहिष्कृत हो गए लोगों के मामले में छूट है, माता के मामले में नहीं।
Sutra 29
पुत्रदारमप्रतिविधाय प्रव्रजतः पूर्वः साहसदण्डः स्त्रियं च प्रव्राजयतः ॥ कZ_०२.०१.२९ ॥
जो व्यक्ति पुत्र और पत्नी के लिए पहले से व्यवस्था किए बिना संन्यास/प्रव्रज्या ले लेता है, उस पर साहस (बलपूर्वक अपराध) का प्रथम दण्ड लगता है; और जो किसी स्त्री को प्रव्रज्या/गृहत्याग के लिए बाध्य करता है, उस पर भी।
Sutra 30
लुप्तव्यायामः प्रव्रजेदापृच्छ्य धर्मस्थान् ॥ कZ_०२.०१.३० ॥
जिसका नियत कार्य-कर्तव्य लुप्त हो गया हो (या जिससे वह मुक्त हो), वह धर्मस्थों (न्यायाधिकारियों) से पूछकर/अनुमति लेकर ही संन्यास के लिए प्रस्थान करे।
Sutra 31
अन्यथा नियम्येत ॥ कZ_०२.०१.३१ ॥
अन्यथा उसे नियंत्रित/निरोध में रखा जाए।
Sutra 32
वानप्रस्थादन्यः प्रव्रजितभावः सजातादन्यः संघः सामुत्थायिकादन्यः समयानुबन्धो वा नास्य जनपदमुपनिविशेत ॥ कZ_०२.०१.३२ ॥
वानप्रस्थों के अतिरिक्त कोई अन्य संन्यासी-समूह, स्थानीय जाति/कुल से भिन्न लोगों का कोई संघ, और वैध सहकारी (सामुत्थायिक) के अतिरिक्त कोई अनुबंध-बंधित दल—इनमें से किसी को भी राजा के जनपद में बसने न दिया जाए।
Sutra 33
न च तत्रारामा विहारार्था वा शालाः स्युः ॥ कZ_०२.०१.३३ ॥
और वहाँ उद्यान (आराम) या विहार/विनोद के लिए शालाएँ नहीं हों।
Sutra 34
नटनर्तकगायनवादकवाग्जीवनकुशीलवा न कर्मविघ्नं कुर्युः ॥ कZ_०२.०१.३४ ॥
नट, नर्तक, गायक, वादक, पेशेवर वक्ता और कुशीलव (कलाकार) काम में विघ्न न डालें।
Sutra 35
निराश्रयत्वाद्ग्रामाणां क्षेत्राभिरतत्वाच्च पुरुषाणां कोशविष्टिद्रव्यधान्यरसवृद्धिर्भवति ॥ कZ_०२.०१.३५ ॥
गाँवों में (परजीवी) आश्रयों/अड्डों के न रहने और पुरुषों के खेतों में लगे रहने से कोष, बेगार/सेवा-उपज, वस्तुओं, धान्य और करयोग्य रस/उत्पाद में वृद्धि होती है।
Sutra 36
देशं परिहरेद् राजा व्ययक्रीडाश्च वारयेत् ॥ कZ_०२.०१.३६च्द् ॥
ऐसे देश/प्रदेश से राजा को बचना चाहिए, और अपव्यय तथा क्रीड़ा-विलास को रोकना चाहिए।
Sutra 37
स्तेनव्यालविषग्राहैर्व्याधिभिश्च पशुव्रजान् ॥ कZ_०२.०१.३७च्द् ॥
राजा को पशु-झुंडों की रक्षा चोरों, हिंसक पशुओं, विषैले दंश, मगरमच्छों और रोगों से करनी चाहिए।
Sutra 38
शोधयेत्पशुसंघैश्च क्षीयमाणं वणिक्पथम् ॥ कZ_०२.०१.३८च्द् ॥
जो व्यापार-मार्ग क्षीण हो रहा हो, उसे वह पशु-कारवाँ (पशु-संघ) आदि की व्यवस्था करके पुनः सुधारकर सुरक्षित करे।
Sutra 39
रक्षेत्पूर्वकृतान् राजा नवांश्चाभिप्रवर्तयेत् ॥ कZ_०२.०१.३९च्द् ॥
राजा पहले से बने कार्यों की रक्षा करे और नए कार्यों को भी सक्रिय रूप से आरम्भ कराए।
A stable, populated, and productive countryside: villages are sized for viability, spaced for mutual aid, bounded to reduce disputes, protected by frontier gates/forts, and incentivized through grants and material support—yielding food security, predictable revenue, and internal peace.
Non-cultivators lose entitlements: lands are made ‘āchidyānya’ (liable to be taken back/forfeited) for those who do not cultivate; additionally, the frontier architecture (antapāla durgas and janapada gates) implies coercive enforcement against threats and disorder.