Adhyaya 121
Adi ParvaAdhyaya 12138 Verses

Adhyaya 121

Droṇotpattiḥ and Dhanurveda-Prāpti (Origin of Droṇa and Acquisition of Martial Science)

Upa-parva: Sambhava Upa-Parva (Origin Narratives of Key Figures)

Vaiśaṃpāyana describes Bhīṣma’s intent to secure a superior instructor for the Kuru princes, noting that only a person of keen intellect, broad astra-knowledge, and disciplined temperament can train powerful Kurus in warfare. The narration then shifts to Droṇa’s origins: the sage Bharadvāja encounters the apsaras Ghṛtācī; due to a wind-displaced garment, his emitted seed is preserved in a vessel (droṇa), from which Droṇa is born. Droṇa masters the Vedas and Vedāṅgas, and the transmission of the Agneya weapon is traced through Bharadvāja and Agniveśya, situating martial knowledge within a sacral-ritual lineage. Bharadvāja’s friendship with King Pṛṣata establishes Droṇa’s association with Pāñcāla; Pṛṣata’s son Drupada studies and plays with Droṇa in the āśrama before later becoming king. After Bharadvāja’s ascent, Droṇa marries Kṛpī and fathers Aśvatthāmā, named for a cry likened to a celestial horse. Seeking wealth and complete weapon-lore, Droṇa approaches Paraśurāma, who has already gifted away land and riches but grants Droṇa the full dhanurveda with operational secrets, after which Droṇa proceeds toward Drupada—closing the chapter with the renewed contact that foreshadows later rupture.

Chapter Arc: पाण्डु के निषेध और शाप-जनित विवशता के सामने पृथा (कुन्ती) धर्मपत्नी-भाव से दृढ़ होकर कहती है—‘धर्मज्ञ! आप मुझसे ऐसी बात न कहें; मैं आपकी ही हूँ।’ → पाण्डु की संतान-चिन्ता और राजवंश की निरन्तरता का संकट बढ़ता है; पृथा अपने पतिव्रत और मर्यादा की सीमा रेखा खींचते हुए भी समाधान खोजने का आग्रह करती है—वह किसी अन्य पुरुष की ओर मन से भी न जाने का व्रत दोहराती है। → उपाख्यान के केन्द्र में ‘व्युषिताश्व’ का उदाहरण आता है—यज्ञ-प्रसंग, इन्द्र का सोमपान से उन्मत्त होना, और पुराणविदों द्वारा गायी जाने वाली गाथा; इसी के सहारे पृथा निर्णायक प्रस्ताव रखती है कि ‘मानसिक संकल्प/तप-योगबल’ से भी धर्मपूर्वक पुत्रोत्पत्ति सम्भव है—अर्थात् देह-समागम के बिना भी वंश-रक्षा का मार्ग। → पृथा व्युषिताश्व-उपाख्यान से यह स्थापित करती है कि असाधारण परिस्थिति में असाधारण, परन्तु धर्म-सम्मत उपाय अपनाया जा सकता है; वह पाण्डु को आश्वस्त करती है कि पुत्र-प्राप्ति का उपाय ‘धर्मतः’ होगा और पति की मर्यादा अक्षुण्ण रहेगी। → पाण्डु इस प्रस्ताव को कैसे स्वीकार करेगा और आगे किस विधि से पुत्र-प्राप्ति का विधान होगा—यह प्रश्न अगले प्रसंग के लिए खुला रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्माभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डु-पृथा-संवादाविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ११९ ॥। ऑपन-माज बक। डे $. बन्धु शब्दका अर्थ संस्कृत-शब्दार्थकौस्तुभमें आत्मबन्धु, पितृबन्धु, मातृबन्धु माना गया है, इसलिये बन्धुका अर्थ कुटुम्बी किया है। दायादका अर्थ उसी कोषमें “उत्तराधिकारी” है। इसीलिये बन्धुदायादका अर्थ “कुटुम्बी' होनेसे उत्तराधिकारी” किया है। इसके विपरीत, अबन्धुदायादका अर्थ अबन्धु यानी कुट॒म्बी न होनेपर उत्तराधिकारी किया है। २. 'पौनर्भव”का अर्थ पद्मचन्द्रकोषके अनुसार दूसरी बार ब्याही हुई स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र लिया गया है। 3. कानीन--यह अर्थ नीलकण्ठजीने अपनी टीकामें किया है। विशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: कुन्तीका पाण्डुको व्युषिताश्वके मृत शरीरसे उसकी पतिव्रता पत्नी भद्राके द्वारा पुत्र-प्राप्तिका कथन वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता महाराज कुन्ती पाण्डुमभाषत । कुरूणामृषभं वीरं तदा भूमिपतिं पतिम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज जनमेजय! इस प्रकार कहे जानेपर कुन्ती अपने पति कुरुश्रेष्ठ वीरवर राजा पाण्डुसे इस प्रकार बोली--

વૈશમ્પાયન બોલ્યા— “મહારાજ જનમેજય! આ રીતે કહેવામાં આવ્યા પછી કુંતીએ ત્યારે પોતાના પતિ—કુરુઓમાં શ્રેષ્ઠ, વીર, ભૂમિપતિ પાંડુને—આ રીતે કહ્યું.”

Verse 2

न मा्महसि धर्मज्ञ वक्तुमेवं कथंचन । धर्मपत्नीमभिरतां त्वयि राजीवलोचने,“धर्मज्ञ! आप मुझसे किसी तरह ऐसी बात न कहें; मैं आपकी धर्मपत्नी हूँ और कमलके समान विशाल नेत्रोंवाले आपमें ही अनुराग रखती हूँ

“ધર્મજ્ઞ! કોઈ રીતે પણ તમે મને આવી વાત ન કહો. કમળનયન! હું તમારી ધર્મપત્ની છું; મારો અનુરાગ માત્ર તમારામાં જ સ્થિર છે.”

Verse 3

त्वमेव तु महाबाहो मय्यपत्यानि भारत । वीर वीर्योपपन्नानि धर्मतो जनयिष्यसि,“महाबाहु वीर भारत! आप ही मेरे गर्भसे धर्मपूर्वक अनेक पराक्रमी पुत्र उत्पन्न करेंगे

“મહાબાહુ ભારત! ધર્મપૂર્વક મારા ગર્ભમાંથી અનેક સંતાન—વીર અને પરાક્રમથી સંપન્ન—તમે જ ઉત્પન્ન કરશો.”

Verse 4

स्वर्ग मनुजशार्दूल गच्छेयं सहिता त्वया । अपत्याय च मां गच्छ त्वमेव कुरुनन्दन,“नरश्रेष्ठ! मैं आपके साथ ही स्वर्गलोकमें चलूँगी। कुरुनन्दन! पुत्रकी उत्पत्तिके लिये आप ही मेरे साथ समागम कीजिये

વૈશંપાયન બોલ્યા—હે મનુજશાર્દૂલ! હું તારી સાથે જ સ્વર્ગલોકમાં જઈશ. અને હે કુરુનંદન! સંતાનોત્પત્તિ માટે તું જ મારી સાથે સંયોગ કર.

Verse 5

न हाहं मनसाप्यन्यं गच्छेयं त्वदृते नरम्‌ । त्वत्त: प्रतिविशिष्टश्ष॒ कोडन्यो5स्ति भुवि मानव:,“मैं आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषसे समागम करनेकी बात मनमें भी नहीं ला सकती। फिर इस पृथ्वीपर आपसे श्रेष्ठ दूसरा मनुष्य है भी कौन

વૈશંપાયન બોલ્યા—ના, ક્યારેય નહીં. તારા સિવાય બીજા કોઈ પુરુષ સાથે સંયોગ કરવાની વાત હું મનમાં પણ લાવી શકતી નથી. અને આ ધરતી પર તારા કરતાં શ્રેષ્ઠ બીજો માનવ કોણ છે?

Verse 6

इमां च तावद्‌ धर्मात्मन्‌ पौराणीं शूणु मे कथाम्‌ । परिश्रुतां विशालाक्ष कीर्तयिष्यामि यामहम्‌,“धर्मात्मन्‌! पहले आप मेरे मुँहसे यह पौराणिक कथा सुन लीजिये। विशालाक्ष! यह जो कथा मैं कहने जा रही हूँ, सर्वत्र विख्यात है

વૈશંપાયન બોલ્યા—હે ધર્માત્મન! પહેલાં મારી પાસેથી આ પૌરાણિક કથા સાંભળો. હે વિશાલાક્ષ! મેં સંપૂર્ણ રીતે સાંભળી છે એવી સર્વત્ર પ્રસિદ્ધ કથા હું વર્ણવીશ.

Verse 7

व्युषिताश्व इति ख्यातो बभूव किल पार्थिव: । पुरा परमधर्मिष्ठ: पूरोर्वशविवर्धन:,“कहते हैं, पूर्वकालमें एक परम धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उनका नाम था व्युषिताश्व। वे पूरुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे

વૈશંપાયન બોલ્યા—કહે છે કે પ્રાચીન કાળમાં વ્યુષિતાશ્વ નામે પ્રસિદ્ધ એક રાજા થયો; તે પરમ ધર્મનિષ્ઠ હતો અને પૂરુવંશની વૃદ્ધિ કરનાર હતો.

Verse 8

तस्मिंश्न॒ यजमाने वै धर्मात्मनि महाभुजे । उपागमंस्ततो देवा: सेन्द्रा देवर्षिभि: सह,“एक समय वे महाबाहु धर्मात्मा नरेश जब यज्ञ करने लगे, उस समय इन्द्र आदि देवता देवर्षियोंके साथ उस यज्ञमें पधारे थे

વૈશંપાયન બોલ્યા—જ્યારે તે મહાબાહુ ધર્માત્મા રાજા યજ્ઞ કરી રહ્યા હતા, ત્યારે ઇન્દ્ર સહિત દેવતાઓ દેવર્ષિઓ સાથે ત્યાં આવ્યા.

Verse 9

अमाद्यदिन्द्र: सोमेन दक्षिणाभिद्धिजातय: । व्युषिताश्वस्य राजर्षेस्ततो यज्ञे महात्मन:,“उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे। महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजन! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे

વૈશંપાયન બોલ્યા—તે યજ્ઞમાં દેવરાજ ઇન્દ્ર સોમપાન કરીને ઉલ્લાસિત થયો અને દ્વિજ બ્રાહ્મણો પ્રચુર દક્ષિણા મેળવી આનંદથી પ્રફુલ્લિત થયા. મહાત્મા રાજર્ષિ વ્યુષિતાશ્વના તે યજ્ઞમાં દેવો અને બ્રહ્મર્ષિઓ જાણે સ્વયં જ સર્વ વિધિ-કર્મો સંપન્ન કરતા હતા. તેથી વ્યુષિતાશ્વ મનુષ્યોમાં સર્વોચ્ચ પ્રતિષ્ઠા પામી અદભુત તેજથી દીપ્ત થયો.

Verse 10

देवा ब्रह्मर्षयश्चैव चक्रुः कर्म स्वयं तदा । व्युषिताश्व॒स्ततो राजन्नति मर्त्यान्‌ व्यरोचत,“उसमें देवराज इन्द्र सोमपान करके उन्मत्त हो उठे थे तथा ब्राह्मणलोग पर्याप्त दक्षिणा पाकर हर्षसे फूल उठे थे। महामना राजर्षि व्युषिताश्वके यज्ञमें उस समय देवता और ब्रह्मर्षि स्वयं सब कार्य कर रहे थे। राजन! इससे व्युषिताश्व सब मनुष्योंसे ऊँची स्थितिमें पहुँचकर बड़ी शोभा पा रहे थे

વૈશંપાયન બોલ્યા—તે સમયે દેવો અને બ્રહ્મર્ષિઓ સ્વયં જ કર્મો કરતા હતા. અને હે રાજન, ત્યારે રાજા વ્યુષિતાશ્વ નશ્વર મનુષ્યો કરતાં વધુ તેજસ્વી બની પ્રગટ થયો.

Verse 11

सर्वभूतान्‌ प्रति यथा तपन: शिशिरात्यये । स विजित्य गृहीत्वा च नृपतीन्‌ राजसत्तम:,'राजा व्युषिताश्व॒ समस्त भूतोंके प्रीतिपात्र थे। राजाओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्वने अश्वमेध नामक महान्‌ यजञ्ञमें पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण--चारों दिशाओंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया--ठीक जिस प्रकार शिशिरकालके अन्तमें भगवान्‌ सूर्य- देव सभी प्राणियोंपर विजय कर लेते हैं--सबको तपाने लगते हैं

વૈશંપાયન બોલ્યા—જેમ શિશિરના અંતે સૂર્ય પોતાના તાપથી સર્વ પ્રાણીઓ પર વિજય મેળવે છે, તેમ રાજાઓમાં શ્રેષ્ઠ તે પ્રતિાપી નૃપતિએ અન્ય રાજાઓને જીત્યા અને પોતાના અધિકારમાં લીધા.

Verse 12

प्राच्यानुदीच्यान्‌ पाश्चात्त्यान्‌ दाक्षिणात्यानकालयत्‌ । अश्वमेधे महायज्ञे व्युषिताश्वः प्रतापवान्‌,'राजा व्युषिताश्व॒ समस्त भूतोंके प्रीतिपात्र थे। राजाओंमें श्रेष्ठ प्रतापी व्युषिताश्वने अश्वमेध नामक महान्‌ यजञ्ञमें पूर्व, उत्तर, पश्चिम और दक्षिण--चारों दिशाओंके राजाओंको जीतकर अपने वशमें कर लिया--ठीक जिस प्रकार शिशिरकालके अन्तमें भगवान्‌ सूर्य- देव सभी प्राणियोंपर विजय कर लेते हैं--सबको तपाने लगते हैं

વૈશંપાયન બોલ્યા—પ્રતાપવાન વ્યુષિતાશ્વે અશ્વમેધ મહાયજ્ઞમાં પૂર્વ, ઉત્તર, પશ્ચિમ અને દક્ષિણ—ચારેય દિશાના રાજાઓને જીત્યા અને પોતાના અધિકારમાં લીધા.

Verse 13

बभूव स हि राजेन्द्रो दशनागबलान्वित: । अप्यत्र गाथां गायन्ति ये पुराणविदो जना:,“उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान्‌ यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं--“राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया

વૈશંપાયન બોલ્યા—તે રાજેન્દ્ર દસ હાથીઓના બળથી યુક્ત હતો. હે કુરુશ્રેષ્ઠ, પુરાણવિદ લોકો અહીં રાજા વ્યુષિતાશ્વ વિષે આ યશોગાથા ગાય છે.

Verse 14

व्युषिताश्वे यशोवृद्धे मनुष्येन्द्रे कुरूत्तम । व्युषिताश्व: समुद्रान्तां विजित्येमां वसुंधराम्‌,“उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान्‌ यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं--“राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया

વૈશંપાયન બોલ્યા—હે કુરુશ્રેષ્ઠ! યશમાં અત્યંત વધેલા તે મનુષ્યેન્દ્ર રાજા વ્યુષિતાશ્વ વિષે પુરાણવેત્તા વિદ્વાનો આ યશોગાથા ગાય છે—“સમુદ્રપર્યંત આ ધરતી જીત્યા પછી રાજા વ્યુષિતાશ્વે, જેમ પિતા પોતાના ઔરસ પુત્રોનું પાલન કરે તેમ, સર્વ વર્ણની પ્રજાનું સમભાવથી રક્ષણ અને પાલન કર્યું.”

Verse 15

अपालयत्‌ सर्ववर्णान्‌ पिता पुत्रानिवौरसान्‌ । यजमानो महायज्जैत्रद्वाणेभ्यो धनं ददौ,“उन महाराजमें दस हाथियोंका बल था। कुरुश्रेष्ठ! पुराणवेत्ता विद्वान्‌ यशमें बढ़े-चढ़े हुए नरेन्द्र व्युषिताश्वके विषयमें यह यशोगाथा गाते हैं--“राजा व्युषिताश्व समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीको जीतकर जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंका पालन करता है, उसी प्रकार सभी वर्णके लोगोंका पालन करते थे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको बहुत धन दिया

તેણે પિતા પોતાના ઔરસ પુત્રોનું પાલન કરે તેમ સર્વ વર્ણની પ્રજાનું પાલન કર્યું. યજમાન બની મહાક્રતુઓ કર્યા અને દ્વિજોને (વિશેષ કરીને બ્રાહ્મણોને) ધનદાન આપ્યું.

Verse 16

अनन्तरत्नान्यादाय स जहार महाक्रतून्‌ । सुषाव च बहून्‌ सोमान्‌ सोमसंस्थास्ततान च,“अनन्त रत्नोंकी भेंट लेकर उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये। अनेक सोमयागोंका आयोजन करके उनमें बहुत-सा सोमरस संग्रह करके अग्निष्टोम-अत्यग्निष्टोम आदि सात प्रकारकी सोमयाग-संस्थाओंका भी अनुष्ठान किया

અનંત રત્નો સ્વીકારી તેણે મહાક્રતુઓનું અનુષ્ઠાન કર્યું. તેણે બહુ પ્રમાણમાં સોમ પિડીને સોમયાગની નિર્ધારિત વિવિધ સંસ્થાઓ પણ વિધિપૂર્વક પૂર્ણ કરી.

Verse 17

आसीत्‌ काक्षीवती चास्य भार्या परमसम्मता | भद्रा नाम मनुष्येन्द्र रूपेणासदृशी भुवि,“नरेन्द्र! राजा कक्षीवान्‌की पुत्री भद्रा उनकी अत्यन्त प्यारी पत्नी थी। उन दिनों इस पृथ्वीपर उसके रूपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री न थी

હે મનુષ્યેન્દ્ર! કક્ષીવાનની પુત્રી ભદ્રા તેની પરમસંમતા અને અત્યંત પ્રિય પત્ની હતી. રૂપમાં પૃથ્વી પર તેની સમકક્ષ બીજી કોઈ સ્ત્રી ન હતી.

Verse 18

कामयामासतुस्तौ च परस्परमिति श्रुतम्‌ । स तस्यां कामसम्पन्नो यक्ष्मणा समपद्यत,“मैंने सुना है, वे दोनों पति-पत्नी एक-दूसरेको बहुत चाहते थे। पत्नीके प्रति अत्यन्त कामासक्त होनेके कारण राजा व्युषिताश्व राजयक्ष्माके शिकार हो गये

એવું સાંભળવામાં આવે છે કે તેઓ બંને પરસ્પર એકબીજાની તીવ્ર ઇચ્છા કરતા. પરંતુ તેણી પ્રત્યે અતિશય કામાસક્ત બનતાં રાજા યક્ષ્મા (રાજયક્ષ્મા) રોગથી પીડિત થયો.

Verse 19

तेनाचिरेण कालेन जगामास्तमिवांशुमान्‌ | तस्मिन्‌ प्रेते मनुष्येन्द्रे भार्यास्थ भृशदु:खिता,“इस कारण वे थोड़े ही समयमें सूर्यकी भाँति अस्त हो गये। उन महाराजके परलोकवासी हो जानेपर उनकी पत्नीको बड़ा दुःख हुआ

આ રીતે થોડા જ સમયમાં તે સૂર્યની જેમ અસ્ત થયો. તે મનુષ્યેન્દ્ર પરલોકવાસી થતાં તેની પત્ની અત્યંત શોકથી વ્યાકુળ થઈ ગઈ.

Verse 20

अपुत्रा पुरुषव्याप्र विललापेति न: श्रुतम्‌ । भद्रा परमदु:खार्ता तन्निबोध जनाधिप,“नरव्याप्र जनेश्वर! हमने सुना है कि भद्राके तबतक कोई पुत्र नहीं हुआ था। इस कारण वह अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर विलाप करने लगी; वह विलाप सुनिये”

હે પુરુષવ્યાઘ્ર, જનાધિપ! અમે સાંભળ્યું છે કે ભદ્રા નિઃસંતાન હતી; તેથી તે પરમ દુઃખથી વ્યાકુળ થઈ વિલાપ કરવા લાગી. હે રાજન, તે વિલાપ સાંભળો.

Verse 21

भद्रोवाच नारी परमधर्मज्ञ सर्वा भर्तृविनाकृता । पतिं विना जीवति या न सा जीवति दुःखिता,भद्रा बोली--परमधर्मज्ञ महाराज! जो कोई भी विधवा स्त्री पतिके बिना जीवन धारण करती है, वह निरन्तर दु:खमें डूबी रहनेके कारण वास्तवमें जीती नहीं, अपितु मृततुल्या है

ભદ્રા બોલી—હે પરમધર્મજ્ઞ રાજન! પતિથી વંચિત સ્ત્રી સર્વથા નિરાધાર બની જાય છે. જે પતિ વિના જીવે છે, તે દુઃખમાં ડૂબેલી હોવાથી ખરેખર જીવતી નથી; તે તો મૃતતુલ્ય છે.

Verse 22

पतिं विना मृतं श्रेयो नार्या: क्षत्रियपुड्भव | त्वद्गतिं गन्तुमिच्छामि प्रसीदस्व नयस्व माम्‌,क्षत्रियशिरोमणे! पतिके न रहनेपर नारीकी मृत्यु हो जाय, इसीमें उसका कल्याण है। अतः मैं भी आपके ही मार्गपर चलना चाहती हूँ, प्रसन्न होइये और मुझे अपने साथ ले चलिये। आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहनेका मुझमें उत्साह नहीं है। राजन्‌! कृपा कीजिये और यहाँसे शीघ्र मुझे ले चलिये

હે ક્ષત્રિયપુંગવ! પતિ વિના નારી માટે મૃત્યુ જ શ્રેયસ્કર માનવામાં આવે છે. હું પણ તમારી જ ગતિને અનુસરવા ઇચ્છું છું; પ્રસન્ન થાઓ અને મને સાથે લઈ જાઓ.

Verse 23

त्वया हीना क्षणमपि नाहं जीवितुमुत्सहे । प्रसादं कुरु मे राजन्नितस्तूर्ण नयस्व माम्‌,क्षत्रियशिरोमणे! पतिके न रहनेपर नारीकी मृत्यु हो जाय, इसीमें उसका कल्याण है। अतः मैं भी आपके ही मार्गपर चलना चाहती हूँ, प्रसन्न होइये और मुझे अपने साथ ले चलिये। आपके बिना एक क्षण भी जीवित रहनेका मुझमें उत्साह नहीं है। राजन्‌! कृपा कीजिये और यहाँसे शीघ्र मुझे ले चलिये

તમારા વિના હું ક્ષણમાત્ર પણ જીવવાનો ઉત્સાહ રાખી શકતી નથી. હે રાજન, કૃપા કરીને પ્રસન્ન થાઓ; મને અહીંથી તુરંત લઈ જાઓ.

Verse 24

पृष्ठतो$नुगमिष्यामि समेषु विषमेषु च । त्वामहं नरशार्दूल गच्छन्तमनिवर्तितुम्‌,नरश्रेष्ठ आप जहाँ कभी न लौटनेके लिये गये हैं, वहाँका मार्ग समतल हो या विषम, मैं आपके पीछे-पीछे अवश्य चली चलूँगी

માર્ગ સમ હોય કે વિષમ—હે નરશાર્દૂલ! તમે જ્યાં કદી પાછા ન ફરવા માટે જઈ રહ્યા છો, હું તમારા પાછળ-પાછળ અવશ્ય જઈશ.

Verse 25

छायेवानुगता राजन्‌ सततं वशवर्तिनी | भविष्यामि नरव्याप्र नित्यं प्रियहिते रता,राजन! मैं छायाकी भाँति आपके पीछे लगी रहूँगी एवं सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहूँगी। नरव्याप्र! मैं सदा आपके प्रिय और हितमें लगी रहूँगी

રાજન! હું છાયાની જેમ સદા તમારા પાછળ રહીશ અને સતત તમારી આજ્ઞાધીન રહીશ. હે નરવ્યાઘ્ર! જે તમને પ્રિય અને હિતકારક છે, તેમાં હું હંમેશાં રત રહીશ.

Verse 26

अद्यप्रभृति मां राजन्‌ कष्टा हृदयशोषणा: । आधयो<5भिभविष्यन्ति त्वामृते पुष्करेक्षण,कमलके समान नेत्रोंवाले महाराज! आपके बिना आजसे हृदयको सुखा देनेवाले कष्ट और मानसिक चिन्ताएँ मुझे सताती रहेंगी

કમલનેત્ર મહારાજ! આજથી તમારા વિયોગમાં હૃદયને સુકવી નાખે એવા કષ્ટો અને આંતરિક ચિંતાઓ મને ઘેરી લેશે.

Verse 27

अभाग्यया मया नून॑ वियुक्ता: सहचारिण: । तेन मे विप्रयोगो5यमुपपन्नस्त्वया सह,मुझ अभागिनीने निश्चय ही कितने ही जीवनसंगियों (स्त्री-पुरुषों)-में विछोह कराया होगा। इसीलिये आज आपके साथ मेरा वियोग घटित हुआ है

નિશ્ચયે મારી દુર્ભાગ્યતા કારણે અનેક જીવનસાથીઓ પોતાના સાથીથી વિયોગ પામ્યા હશે; તેથી આજે તમારા સાથે મારું આ વિયોગ થવું પણ યોગ્ય જ છે.

Verse 28

विप्रयुक्ता तु या पत्या मुहूर्तमपि जीवति । दुःखं जीवति सा पापा नरकस्थेव पार्थिव,महाराज! जो स्त्री पतिसे बिछुड़ जानेपर दो घड़ी भी जीवन धारण करती है, वह पापिनी नरकमें पड़ी हुई-सी दुःखमय जीवन बिताती है

મહારાજ! જે સ્ત્રી પતિથી વિયોગ પામી એક મુહૂર્ત પણ જીવતી રહે છે, તે પાપિણી નરકમાં પડેલી હોય તેમ દુઃખમય જીવન જીવે છે.

Verse 29

संयुक्ता विप्रयुक्ता श्च पूर्वदेहे कृता मया । तदिदं कर्मभि: पापै: पूर्वदेहेषु संचितम्‌,राजन! पूर्वजन्मके शरीरमें स्थित रहकर मैंने एक साथ रहनेवाले कुछ स्त्री-पुरुषोंमें अवश्य वियोग कराया है। उन्हीं पापकर्माद्वारा मेरे पूर्वशरीरोंमें जो बीजरूपसे संचित हो रहा था, वही यह आपके वियोगका दुःख आज मुझे प्राप्त हुआ है। महाराज! मैं दुःखमें डूबी हुई हूँ, अत: आजसे आपके दर्शनकी इच्छा रखकर मैं कुशके बिछौनेपर सोऊँगी

વૈશંપાયન બોલ્યા—હે રાજન! પૂર્વદેહમાં મેં સાથે રહેતા સ્ત્રી-પુરુષોમાં વિયોગ કરાવ્યો હતો. તે પાપકર્મોનું બીજ પૂર્વજન્મોમાં સંચિત થઈ આજે આ વિયોગજન્ય દુઃખરૂપે મને પ્રાપ્ત થયું છે, રાજન.

Verse 30

दुःखं मामनुसम्प्राप्तं राजंस्त्वद्विप्रयोगजम्‌ । अद्यप्रभृत्यहं राजन्‌ कुशसंस्तरशायिनी । भविष्याम्यसुखाविष्टा त्वद्दर्शनपरायणा,राजन! पूर्वजन्मके शरीरमें स्थित रहकर मैंने एक साथ रहनेवाले कुछ स्त्री-पुरुषोंमें अवश्य वियोग कराया है। उन्हीं पापकर्माद्वारा मेरे पूर्वशरीरोंमें जो बीजरूपसे संचित हो रहा था, वही यह आपके वियोगका दुःख आज मुझे प्राप्त हुआ है। महाराज! मैं दुःखमें डूबी हुई हूँ, अत: आजसे आपके दर्शनकी इच्छा रखकर मैं कुशके बिछौनेपर सोऊँगी

વૈશંપાયન બોલ્યા—હે રાજન! તમારા વિયોગથી જન્મેલું દુઃખ મને પ્રાપ્ત થયું છે. આજથી, મહારાજ, હું કુશના પાથરણા પર શયન કરીશ—શોકથી વ્યાકુળ—અને માત્ર તમારા દર્શનની આશામાં જીવતી રહીશ.

Verse 31

दर्शयस्व नरव्यापत्र शाधि मामसुखान्विताम्‌ | कृपणां चाथ करुणं विलपन्‍न्तीं नरेश्वर,नरश्रेष्ठ नरेश्वरर करुण विलाप करती हुई मुझ दीन-दु:ःखिया अबलाको आज अपना दर्शन और कर्तव्यका आदेश दीजिये

વૈશંપાયન બોલ્યા—હે નરવ્યાઘ્ર! મને દર્શન આપો અને દુઃખથી પીડિત મને મારા કર્તવ્યનો ઉપદેશ આપો. હે નરેશ્વર! હું દીન અને અસહાય બની કરુણ વિલાપ કરી રહી છું—મારા પર કૃપા કરો.

Verse 32

कुन्त्युवाच एवं बहुविध॑ तस्यां विलपन्त्यां पुन: पुनः । तं॑ शवं सम्परिष्वज्य वाक्‌ किलान्तर्तहिताब्रवीत्‌,कुन्तीने कहा--महाराज! इस प्रकार जब राजाके शवका आलिंगन करके वह बार- बार अनेक प्रकारसे विलाप करने लगी, तब आकाशवाणी बोली---

વૈશંપાયન બોલ્યા—કુંતીએ કહ્યું: તે જ્યારે તે શવને આલિંગન કરીને વારંવાર અનેક રીતે વિલાપ કરવા લાગી, ત્યારે એક અદૃશ્ય આકાશવાણી સંભળાઈ.

Verse 33

उत्तिष्ठ भद्रे गच्छ त्वं ददानीह वरं तव । जनयिष्याम्यपत्यानि त्वय्यहं चारुहासिनि,“भद्रे! उठो और जाओ, इस समय मैं तुम्हें वर देता हूँ। चारुहासिनि! मैं तुम्हारे गर्भसे कई पुत्रोंकोी जन्म दूँगा

વૈશંપાયન બોલ્યા—“ભદ્રે! ઊઠો અને જાઓ; અહિં અને અત્યારે હું તમને વર આપું છું. ચારુહાસિની! તમારા દ્વારા હું સંતાન ઉત્પન્ન કરીશ.”

Verse 34

आत्मकीये वरारोहे शयनीये चतुर्दशीम्‌ । अष्टमी वा ऋतुस्नाता संविशेथा मया सह,“वरारोहे! तुम ऋतुस्नाता होनेपर चतुर्दशी या अष्टमीकी रातमें अपनी शय्यापर मेरे इस शवके साथ सो जाना”

વૈશમ્પાયન બોલ્યા—હે વરારોહે! ઋતુસ્નાન કર્યા પછી ચતુર્દશીની રાત્રિએ—અથવા અષ્ટમીની રાત્રિએ—પોતાની શય્યા પર મારી સાથે શયન કર.

Verse 35

एवमुक्ता तु सा देवी तथा चक्रे पतिव्रता । यथोक्तमेव तद्वाक्यं भद्रा पुत्रार्थिनी तदा,आकाशवाणीके यों कहनेपर पुत्रकी इच्छा रखनेवाली पतिव्रता भद्रादेवीने पतिकी पूर्वोक्त आज्ञाका अक्षरश: पालन किया

આ રીતે કહ્યા પછી તે પતિવ્રતા દેવી એ જ પ્રમાણે કરી. તે સમયે પુત્રની ઇચ્છાવાળી ભદ્રાએ પતિએ કહેલું વચન જેમનું તેમ પાલન કર્યું.

Verse 36

सा तेन सुषुवे देवी शवेन भरतर्षभ । त्रीन्‌ शाल्वांश्षतुरो मद्रान्‌ सुतान्‌ भरतसत्तम,भरतमश्रेष्ठ! रानी भद्गराने उस शवके द्वारा सात पुत्र उत्पन्न किये, जिनमें तीन शाल्वदेशके और चार मद्रदेशके शासक हुए

હે ભરતશ્રેષ્ઠ! તે દેવીએ શવ દ્વારા સાત પુત્રોને જન્મ આપ્યો—ત્રણ શાલ્વદેશના અને ચાર મદ્રદેશના અધિપતિ થયા.

Verse 37

तथा त्वमपि मय्येवं मनसा भरतर्षभ । शक्तो जनयितु पुत्रांस्तपोयोगबलान्वित:,भरतवंशशिरोमणे! इसी प्रकार आप भी मेरे गर्भसे मानसिक संकल्पद्वारा अनेक पुत्र उत्पन्न कर सकते हैं; क्योंकि आप तपस्या और योगबलसे सम्पन्न हैं

હે ભરતર્ષભ! એ જ રીતે તમે પણ મનના સંકલ્પમાત્રથી મારા ગર્ભમાં અનેક પુત્રો ઉત્પન્ન કરવા સમર્થ છો; કારણ કે તમે તપ અને યોગબળથી યુક્ત છો.

Verse 120

इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि व्युषिताश्वोपाख्याने विंशत्यधिकशततमो<ध्याय:

આ રીતે શ્રીમહાભારતના આદિપર્વના સંભવપર્વમાં વ્યુષિતાશ્વોપાખ્યાન અંતર્ગત એકસો વીસમો અધ્યાય પૂર્ણ થયો.

Frequently Asked Questions

The chapter frames a governance dilemma: how to select an instructor for elite warriors when training amplifies state power—requiring not only technical mastery but also disciplined character, because knowledge transmission can later shape political outcomes.

Competence is ethically consequential: education, especially in high-impact skills, must be anchored in restraint and responsibility; personal relationships (friendship, obligation, patronage) can become causal forces in public history.

No explicit phalaśruti appears in this passage; the meta-function is etiological—explaining origins and knowledge lineages to clarify later narrative causality and the dharma-implications of instruction.