
धृतराष्ट्रस्य संजयप्रश्नः (Dhṛtarāṣṭra’s Inquiry to Saṃjaya on Strategic Comparisons)
Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra–Saṃjaya Praśna (Court Inquiry on the Pāṇḍavas and Strategic Assessment)
Vaiśaṃpāyana reports that when Duryodhana does not welcome the prior statement, the gathered rulers remain silent and then rise. After the kings depart, Dhṛtarāṣṭra turns to Saṃjaya to question him in detail, motivated by expectation of victory and by dependence on his sons’ preferences, seeking a comparative determination regarding himself, the opposing side, and specifically the Pāṇḍavas. Dhṛtarāṣṭra addresses Saṃjaya as a discerning evaluator of substance (sāra) and policy, asking which side’s fighters are present and how the Pāṇḍavas should be ranked (senior/junior; stronger/weaker). Saṃjaya refuses to speak privately, stating that speaking in Dhṛtarāṣṭra’s absence is improper and that criticism or resentment could arise; he requests the summoning of Vidura (identified as the father in this context of counsel) and Queen Gāndhārī to mitigate partiality and stabilize judgment. Saṃjaya adds that in their presence he will state the complete view associated with Vāsudeva and Arjuna. Vyāsa then approaches, instructing Saṃjaya to answer Dhṛtarāṣṭra fully and truthfully—precisely as he knows—about matters concerning Vāsudeva and Arjuna, as Dhṛtarāṣṭra continues his inquiry.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, कृष्ण के वचनों के बाद, संजय से आग्रह करते हैं—“अब बताओ, अर्जुन ने अंत में क्या संदेश दिया?” जिज्ञासा के भीतर भय छिपा है, क्योंकि यह संदेश शांति का नहीं, निर्णय का संकेत है। → संजय बताता है कि वासुदेव की बात सुनकर धनंजय ने समयोचित, कठोर और धर्मयुक्त वाणी में कौरव-सभा के स्तंभों—भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण, कृप, कर्ण, बाह्लीक, जयद्रथ, दुःशासन, भूरिश्रवा, भगदत्त, जलसंध आदि—को संबोधित कर चेतावनी दी; और उन समस्त राजाओं को भी, जो धृतराष्ट्र के बुलावे पर ‘पाण्डव-अग्नि’ में आहुति बनने को एकत्र हुए हैं। → अर्जुन का निर्णायक उद्घोष: यदि शत्रुघाती युधिष्ठिर को उसका ‘समभीप्सित स्वक’ (न्यायोचित अधिकार/भाग) नहीं दिया गया, तो वह घोड़ों, पैदल, हाथियों सहित कौरव-सेना को तीक्ष्ण बाणों से पितृलोक की अशिव दिशा में भेज देगा—यह शांति-प्रस्ताव के बाद युद्ध-प्रतिज्ञा का वज्राघात है। → संजय कहता है कि उसने धनंजय को प्रणाम कर, उस ‘महान वचन’ को शीघ्रता से धृतराष्ट्र तक पहुँचाने के लिए प्रस्थान किया और यहाँ आकर संदेश सुना दिया—दूत का कर्तव्य पूर्ण हुआ, पर संकट टला नहीं। → धृतराष्ट्र और दुर्योधन अब इस चेतावनी के सामने क्या चुनेंगे—अधिकार-दान या विनाश—यह निर्णय अगले प्रसंगों में फूटने को तैयार है।
Verse 1
अपन का छा है >> टल्टओं षट्षष्टितमो<5 ध्याय: संजयका धृतराष्ट्रको अर्जुनका संदेश सुनाना वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा महाप्राज्ञो धृतराष्ट्र: सुयोधनम् | पुनरेव महा भाग: संजयं पर्यपृच्छत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुर्योधनसे ऐसा कहकर परम बुद्धिमान महाभाग धृतराष्ट्रने संजयसे पुनः प्रश्न किया--
Vaiśampāyana said: “O King Janamejaya, having spoken thus to Suyodhana (Duryodhana), the great and wise Dhṛtarāṣṭra questioned Sañjaya once again.”
Verse 2
ब्रूहि संजय यच्छेषं वासुदेवादनन्तरम् । यदर्जुन उवाच त्वां परं कौतूहलं हि मे,“संजय! बताओ, भगवान् श्रीकृष्णके पश्चात् अर्जुनने जो अन्तिम संदेश दिया था, उसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है'
“Sañjaya, tell me what remained to be said—what Arjuna spoke after Vāsudeva (Kṛṣṇa). I am filled with the keenest curiosity to hear it.”
Verse 3
संजय उवाच वासुदेववच: श्रुत्वा कुन्तीपुत्रो धनंजय: । उवाच काले दुर्धर्षो वासुदेवस्य शृण्वत:,संजयने कहा--महाराज! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी बात सुनकर दुर्धर्ष वीर कुन्तीकुमार अर्जुनने उनके सुनते-सुनते यह समयोचित बात कही--
Sañjaya said: Hearing the words of Vāsudeva (Kṛṣṇa), Dhanañjaya—Arjuna, Kuntī’s son, the hard-to-overcome hero—spoke in a timely manner while Vāsudeva listened.
Verse 4
पितामहं शान्तनवं धृतराष्ट्रं च संजय । द्रोणं कृपं च कर्ण च महाराजं च बाह्विकम्,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
Sañjaya said: “O Sañjaya, convey my respectful salutations and enquire after the welfare of Grandfather Bhīṣma, the son of Śāntanu; of King Dhṛtarāṣṭra; of Droṇa; of Kṛpa; of Karṇa; and of the great king Bāhlīka.”
Verse 5
द्रौणिंच सोमदत्तं च शकुनिं चापि सौबलम् | दुःशासनं शलं चैव पुरुमित्रं विविंशतिम्,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
Sañjaya said: “(Convey my message to) Aśvatthāman, Somadatta, and Śakuni the son of Subala; to Duḥśāsana, to Śala, and also to Purumitra and Viviṃśati.”
Verse 6
विकर्ण चित्रसेनं च जयत्सेनं च पार्थिवम् | विन्दानुविन्दावावन्त्यौ दुर्मुखं चापि कौरवम्,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
Sañjaya said: “(Greet also) Vikarṇa, Citrasena, and King Jayatsena; and the Avanti princes Vinda and Anuvinda; and Durmukha as well, the Kaurava warrior.”
Verse 7
सैन्धवं दुःसहं चैव भूरिश्रवसमेव च । भगदत्तं च राजानं जलसन्ध॑ च पार्थिवम्,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
Sañjaya said: “(There were also) the Sindhu king Jayadratha, Duḥsaha, Bhūriśravas, King Bhagadatta, and the ruler Jalasandha.”
Verse 8
ये चाप्यन्ये पार्थिवास्तत्र योद्धू समागता: कौरवाणां प्रियार्थम् । मुमूर्षव: पाण्डवाग्नौ प्रदीप्ते समानीता धार्तराष्ट्रेण होतुम्,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
Sañjaya said: “And those other kings too, who have assembled there to fight for the sake of pleasing the Kauravas—men already close to death—have been brought by Dhṛtarāṣṭra’s son as if to be offered into the blazing fire that is the Pāṇḍavas.” The line frames the coming war not as heroic sport but as a grim, ethically charged sacrifice: ambition and factional loyalty drive rulers toward self-destruction.
Verse 9
यथान्यायं कौशलं वन्दनं च समागता मद्वचनेन वाच्या: । इदं ब्रूया: संजय राजमध्ये सुयोधनं पापकृतां प्रधानम्,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
Sañjaya said: “In accordance with propriety, convey my greetings, respectful salutations, and inquiries after the welfare of all those who have assembled, as my message directs. Then, in the midst of the kings, speak this to Suyodhana—foremost among evildoers.”
Verse 10
अमर्षणं दुर्मतिं राजपुत्र पापात्मान धार्तराष्ट्रं सुलुब्धम् । सर्व ममैतद् वचनं समग्रं सहामात्यं संजय श्रावयेथा:,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
Sañjaya said: “O prince, convey in full my entire message to Dhṛtarāṣṭra’s son Duryodhana—intolerant, misguided in counsel, sinful in intent, and exceedingly greedy—and also to his ministers. Let them hear everything exactly as I have spoken.”
Verse 11
इस प्रकार मुझे हस्तिनापुर जानेकी अनुमति देकर, जिनके विशाल नेत्रोंका कोना कुछ लाल रंगका है, उन परम बुद्धिमान् कुन्तीकुमार अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखकर यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन कहा--
Thus, having granted me leave to go to Hastināpura, Arjuna, Kuntī’s son—supremely wise, with large eyes whose corners were faintly red—looked toward Bhagavān Śrī Kṛṣṇa and spoke words aligned with both dharma and artha—
Verse 12
यथा श्रुतं ते वदतो महात्मनो मधुप्रवीरस्य वच: समाहितम् | तथैव वाच्यं भवता हि मद्वच: समागतेषु क्षितिपेषु सर्वश:,“संजय! मधुवंशके प्रमुख वीर महात्मा श्रीकृष्णने एकाग्रचित्त होकर जो बात कही है और तुमने इसे जैसा सुना है, वह सब ज्यों-का-त्यों सुना देना। फिर समस्त समागत भूपालोंकी मण्डलीमें मेरी यह बात कहना--
Sañjaya said: “Just as you heard it—those words spoken with collected mind by the great-souled hero of the Madhu line—so must you repeat them exactly. And then, in the full assembly of the kings who have gathered, you must also proclaim my message everywhere.”
Verse 13
एवं प्रतिष्ठाप्प धनंजयो मां ततोडर्थवद् धर्मवच्चापि वाक्यम् | प्रोवाचेदं वासुदेवं समीक्ष्य पार्थों धीमॉल्लोहितान्तायताक्ष:,शराग्निधूमे रथनेमिनादिते धनु:खुवेणास्त्रबलप्रसारिणा । यथा न होम: क्रियते महामृथे समेत्य सर्वे प्रयतध्वमादृता: “राजाओ! महान् युद्धरूपी यज्ञमें जहाँ बाणोंके टकरानेसे पैदा होनेवाली आगका धुआँ फैलता रहता है, रथोंकी घर्घराहट ही वेदमन्त्रोंकी ध्वनिका काम देती है, (शास्त्रबलसे सम्पादित होनेवाले यज्ञकी भाँति) अस्त्रबलसे ही फैलनेवाले धनुषरूपी खुवाके द्वारा मुझे जिस प्रकार कौरवसैन्यरूपी हविष्यकी आहुति न देनी पड़े, उसके लिये तुम सब लोग सादर प्रयत्न करो
Having thus reassured me, Dhanañjaya (Arjuna) then spoke words that were both purposeful and in accord with dharma. Looking intently at Vāsudeva (Kṛṣṇa), that wise Pārtha—his eyes red at the corners and wide—said: “O kings, in this great battle, which is like a sacrifice—where the smoke of the fire is the haze raised by clashing arrows, where the rumbling of chariot-wheels serves as the sound of Vedic chants, and where the bow is the ladle by which offerings are cast through the force of weapons—strive together, all of you, with earnest care, so that I may not be compelled to perform the ‘oblation’ of the Kaurava host.”
Verse 14
न चेत् प्रयच्छध्वममित्रघातिनो युधिष्ठटिरस्थ समभीप्सितं स्वकम् । नयामि व: साश्वपदातिकुञ्जरान् दिशं पितृणामशिवां शितैः शरै:,“यदि तुमलोग शत्रुघाती महाराज युधिष्ठिरका अपना अभीष्ट राज्यभाग नहीं लौटाओगे तो मैं तुम्हें अपने तीखे बाणोंद्वारा घोड़े, पैदल तथा हाथीसवारोंसहित यमलोककी अमंगलमयी दिशामें भेज दूँगा'
Sañjaya said: “If you do not restore to the foe-slaying Yudhiṣṭhira what is rightfully his and what he seeks—his own share of the kingdom—then with my sharp arrows I will drive you, together with your cavalry, infantry, and elephant corps, toward the inauspicious quarter of the Fathers, the realm of death.”
Verse 15
ततो5हमामन्त्रय तदा धनंजयं चतुर्भुजं चैव नमस्य सत्वर: । जवेन सम्प्राप्त इहामरघय़ूुते तवान्तिकं प्रापयितुं वचो महत्,देवताओंके समान तेजस्वी महाराज! इसके बाद मैं अर्जुनसे विदा ले चतुर्भुज भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार करके उनका वह महत्त्वपूर्ण संदेश आपके पास पहुँचानेके लिये बड़े वेगसे तुरंत यहाँ चला आया हूँ
Sañjaya said: “Then, having taken leave of Dhanañjaya (Arjuna) and swiftly bowing to the four-armed Lord, I hastened here with speed, O king whose splendour is honoured even among the immortals, in order to deliver to you that weighty message. The moment underscores the gravity of counsel before war: words meant to restrain harm and uphold dharma must be carried without delay, with reverence to the divine and responsibility to the ruler.”
Verse 66
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि संजयवाक्ये षट्षष्टितमो5ध्याय: ।। ६६ || इस प्रकार श्रीमह्ा भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें संजयवाक्यविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ
Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Udyoga Parva, in the section on the mission and negotiations (Yāna–Saṃdhi Parva), the sixty-sixth chapter—Sañjaya’s narration—comes to an end. (Gītā Press colophon indicating the close of the chapter.)
The dilemma concerns how to deliver politically consequential truth: Saṃjaya must balance loyalty to the king with impartial disclosure, insisting on an ethically appropriate setting (presence of senior arbiters) to prevent bias, resentment, or misinterpretation.
Counsel is not only content but also method: truthful strategic assessment should be accountable, context-aware, and safeguarded against partiality; governance requires structures that allow uncomfortable facts to be spoken without distortion.
No explicit phalaśruti appears in these verses; the meta-level emphasis is instead on epistemic discipline—Vyāsa’s instruction to report “yathāvat” (as-it-is) frames truthful narration as a foundational requirement for responsible decision-making.