
Chapter Arc: रात्रि के सन्नाटे में कृपाचार्य अश्वत्थामा को विनय और धर्मार्थ-विवेक का उपदेश देते हैं—कि केवल शौर्य या विद्या नहीं, संयम ही मनुष्य को धर्म-निर्णय तक ले जाता है। → अश्वत्थामा के भीतर अपमान, शोक और प्रतिशोध की आग भड़कती है। वह युद्ध के अन्यायपूर्ण वधों का स्मरण कराता है—भूरिश्रवा का युयुधान द्वारा गिराया जाना, और विशेषतः अपने पिता द्रोण का धृष्टद्युम्न द्वारा शस्त्र-त्याग की अवस्था में वध। कृप की नीति-भाषा और अश्वत्थामा की प्रतिहिंसा-प्रतिज्ञा टकराती रहती है। → अश्वत्थामा निर्णायक स्वर में कृप और कृतवर्मा को आदेश देता है कि वे शीघ्र कवच धारण कर, खड्ग-धनुष लेकर उसके साथ चलें—और तीनों एक साथ पाण्डव-पांचाल शिविर की ओर प्रस्थान करते हैं, यज्ञाग्नि की तरह प्रज्वलित। → तीनों महारथी शत्रु-शिविर के द्वार-प्रदेश तक पहुँचते हैं; भीतर जन-समुदाय निद्रा में डूबा है। अश्वत्थामा द्वार पर ठहरकर अवसर और प्रवेश का उपाय देखता है—अब वध का क्षण निकट है। → सुप्त शिविर के द्वार पर खड़ा द्रोणपुत्र—क्या वह धर्म-सीमा लाँघकर रात्रि-वध करेगा, और कौन उसे रोकेगा?
Verse 1
अपन क्ाता छा अर: पञठ्चमो<ध्याय: अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान कृप उवाच शुश्रूषुरपि दुर्मेधा: पुरुषो5नियतेन्द्रिय: । नालं॑ वेदयितुं कृत्स्नौ धर्मार्थाविति मे मति:,कृपाचार्य बोले--अश्व॒त्थामन्! मेरा विचार है कि जिस मनुष्यकी बुद्धि दुर्भावनासे युक्त है तथा जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें नहीं रखा है, वह धर्म और अर्थकी बातोंको सुननेकी इच्छा रखनेपर भी उन्हें पूर्णरूपसे समझ नहीं सकता
Kṛpa sprach: „Nach meinem Urteil kann ein Mensch, dessen Einsicht verdreht ist und dessen Sinne undiszipliniert sind, Dharma und Artha nicht vollständig begreifen – selbst wenn er vorgibt, hören und lernen zu wollen.“
Verse 2
तथैव तावन्मेधावी विनयं यो न शिक्षते । न च किंचन जानाति सो<पि धर्मार्थनिश्चयम्,इसी प्रकार मेधावी होनेपर भी जो मनुष्य विनय नहीं सीखता, वह भी धर्म और अर्थके निर्णयको थोड़ा भी नहीं समझ पाता है
„Ebenso gilt: Selbst wenn ein Mensch klug ist, versteht er nichts davon, wie man beurteilt, was dharma (das Rechte) und was artha (das Förderliche) ist, wenn er nicht Demut und Disziplin erlernt.“
Verse 3
चिरं हाापि जड: शूर: पण्डितं पर्युपास्य हि । न स धर्मान् विजानाति दर्वी सूपरसानिव,जिसकी बुद्धिपर जडता छा रही हो, वह शूरवीर योद्धा दीर्घकालतक विद्वानकी सेवामें रहनेपर भी धर्मोका रहस्य नहीं जान पाता। ठीक उसी तरह जैसे करछुल दालनमें डूबी रहनेपर भी उसके स्वादको नहीं जानती है
Kṛpa sprach: „Selbst wenn ein tapferer Mann lange in der Nähe der Gelehrten weilt und ihnen dient, erkennt er dharma nicht, wenn sein Verstand durch Trägheit abgestumpft ist. Er gleicht einer Kelle: im Sud versenkt, doch ohne dessen Geschmack zu kosten.“
Verse 4
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ,मुहूर्तमपि त॑ प्राज्ञ: पण्डितं पर्युपास्य हि । क्षिप्रं धर्मान् विजानाति जिह्नला सूपरसानिव जैसे जिह्ना दालके स्वादको जानती है, उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष यदि दो घड़ी भी विवेकशीलकी सेवामें रहे तो वह शीघ्र ही धर्मोका रहस्य जान लेता है
Kṛpa sprach: „Wie die Zunge sogleich den Geschmack einer Speise erkennt, so versteht ein kluger Mann die Grundsätze des dharma rasch, selbst wenn er nur kurze Zeit einem gelehrten und urteilsfähigen Menschen dient.“
Verse 5
शुश्रूषुस्त्वेव मेधावी पुरुषो नियतेन्द्रिय: । जानीयादागमानू् सर्वान् ग्राह्मूं च न विरोधयेत्,अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला मेधावी पुरुष यदि विद्वानोंकी सेवामें रहे और उनसे कुछ सुननेकी इच्छा रखे तो वह सम्पूर्ण शास्त्रोंकी समझ लेता है तथा ग्रहण करनेयोग्य वस्तुका विरोध नहीं करता इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिगमने पठचमो<5ध्याय:
Kṛpa sprach: „Ein weiser Mann, der lernen will und seine Sinne gezügelt hat, gelangt, wenn er in der Nähe der Gelehrten dient und von ihnen zu hören begehrt, zum Verständnis des ganzen Bestandes maßgeblicher Lehren; und er widersetzt sich nicht dem, was wahrhaft anzunehmen ist.“
Verse 6
अनेयस्त्ववमानी यो दुरात्मा पापपूरुष: | दिष्टमुत्सूज्य कल्याणं करोति बहुपापकम्,परंतु जिसे सन्मार्गपर नहीं ले जाया जा सकता, जो दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला है तथा जिसका अन्तःकरण दूषित है, यह पापात्मा पुरुष बताये हुए कल्याणकारी पथको छोड़कर बहुत-से पापकर्म करने लगता है
Der Böse, den man nicht auf den Pfad des Dharma führen kann, der andere verachtet und dessen Herz befleckt ist—dieser Sünder verlässt den ihm gewiesenen heilsamen Weg und beginnt, viele sündhafte Taten zu begehen.
Verse 7
नाथवन्तं तु सुहृद: प्रतिषेधन्ति पातकात् । निवर्तते तु लक्ष्मीवान् नालक्ष्मीवान् निवर्तते,जो सनाथ है, उसे उसके हितैषी सुहृद् पापकर्मोंसे रोकते हैं, जो भाग्यवान् है--जिसके भाग्यमें सुख भोगना बदा है, वह मना करनेपर उस पापकर्मसे रुक जाता है; परंतु जो भाग्यहीन है, वह उस दुष्कर्मसे नहीं निवृत्त होता है
Doch wer Schutz und wohlmeinende Freunde hat, wird von seinen Gefährten von sündhaftem Tun abgehalten. Der Glückliche—dem das Los noch Anteil am Genuss des Glücks gewährt—kehrt um, wenn man es ihm verbietet; der Unglückliche aber kehrt von jener Missetat nicht um.
Verse 8
यथा हाुच्चावचैववक्यै: क्षिप्तचित्तो नियम्यते । तथैव सुहृदा शक््यो न शक््यस्त्ववसीदति,जैसे मनुष्य विक्षिप्त चित्तवाले पागलको नाना प्रकारके ऊँच-नीच वचनोंद्वारा समझा- बुझाकर या डरा-धमकाकर काबूमें लाते हैं, उसी प्रकार सुहृदगण भी अपने स्वजनको समझा-बुझाकर और डाँट-डपटकर वशमें रखनेकी चेष्टा करते हैं। जो वशमें आ जाता है, वह तो सुखी होता है और जो किसी तरह काबूमें नहीं आ सकता, वह दुःख भोगता है
Kṛpa sprach: „Wie man einen Menschen, dessen Geist verwirrt und zerstreut ist, durch allerlei Worte—bald sanfte, bald harte—unter Kontrolle bringt, so versucht auch ein Wohlgesinnter, den eigenen Verwandten durch Rat und, wenn es nötig ist, durch strenge Zurechtweisung zu zügeln. Wer sich in Zucht nehmen lässt, dem ergeht es gut; wer sich nicht bändigen lässt, versinkt im Elend.“
Verse 9
तथैव सुद्ठदं प्राज्ञ कुर्वाणं कर्म पापकम् । प्राज्ञा: सम्प्रतिषेधन्ति यथाशक्ति पुन: पुन:,इसी तरह विद्वान् पुरुष पापकर्ममें प्रवृत्त होनेवाले अपने बुद्धिमान सुहृदको भी यथाशक्ति बारंबार मना करते हैं
Ebenso, wenn ein weiser Freund sich fest darauf versteift, eine sündhafte Tat zu begehen, halten ihn verständige Männer nach Kräften immer wieder zurück, um ihn vom Unrecht abzubringen.
Verse 10
स कल्याणे मन: कृत्वा नियम्यात्मानमात्मना | कुरु मे वचनं तात येन पश्चान्न तप्यसे,तात! तुम भी स्वयं ही अपने मनको काबूमें करके उसे कल्याणसाधनमें लगाकर मेरी बात मानो, जिससे तुम्हें पश्चात्ताप न करना पड़े
Kṛpa sprach: „Richte deinen Geist auf das, was zum wahren Heil führt, und zügle dich selbst durch dich selbst. Mein Kind, tu, was ich sage, damit dich später die Reue nicht quält.“
Verse 11
न वध: पूज्यते लोके सुप्तानामिह धर्मत: । तथैवापास्तशस्त्राणां विमुक्तरथवाजिनाम्,जो सोये हुए हों, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये हों, रथ और घोड़े खोल दिये हों, “जो मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहे हों, जो शरणमें आ गये हों, जिनके बाल खुले हुए हों तथा जिनके वाहन नष्ट हो गये हों, इस लोकमें ऐसे लोगोंका वध करना धर्मकी दृष्टिसे अच्छा नहीं समझा जाता
Kṛpa sprach: „In dieser Welt gilt es nicht als rechtschaffen, Schlafende zu töten. Ebenso wird es nicht als dharmisch angesehen, jene zu erschlagen, die die Waffen niedergelegt haben, und jene, deren Wagen und Pferde gelöst wurden (das heißt: die nicht mehr kampffähig sind).“
Verse 12
ये च ब्रूयुस्तवास्मीति ये च स्यु: शरणागता: । विमुक्तमूर्थजा ये च ये चापि हतवाहना:,जो सोये हुए हों, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये हों, रथ और घोड़े खोल दिये हों, “जो मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहे हों, जो शरणमें आ गये हों, जिनके बाल खुले हुए हों तथा जिनके वाहन नष्ट हो गये हों, इस लोकमें ऐसे लोगोंका वध करना धर्मकी दृष्टिसे अच्छा नहीं समझा जाता
Kṛpa sprach: „Wer sagt: ‚Ich bin dein‘, wer Schutz gesucht hat, wessen Haar gelöst ist (als Zeichen von Not oder Ergebung), und wessen Reittier oder Fahrzeug zerstört wurde – solche Menschen zu töten gilt in dieser Welt nicht als rechtschaffen.“
Verse 13
अद्य स्वप्स्यन्ति पञ्चाला विमुक्तकवचा विभो । विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतस:,प्रभो! आज रातमें समस्त पांचाल कवच उतारकर निश्रिन्त हो मुर्दोके समान अचेत सो रहे होंगे। उस अवस्थामें जो क्रूर मनुष्य उनके साथ द्रोह करेगा, वह निश्चय ही नौकारहित अगाध एवं विशाल नरकके समुद्रमें डूब जायगा
Kṛpa sprach: „Heute Nacht werden die Pāñcālas schlafen, o Mächtiger, nachdem sie ihre Rüstungen abgelegt haben. Vertrauend und die ganze Nacht unbewacht werden sie bewusstlos daliegen wie Tote. Wer in einem solchen Zustand—aus Grausamkeit—Verrat an ihnen übt, wird gewiss in einem weiten, unergründlich tiefen Höllenmeer versinken, ohne ein Boot, das ihn rettet.“
Verse 14
यस्तेषां तदवस्थानां द्रह्ेत पुरुषोडनृजु: । व्यक्ते स नरके मज्जेदगाधे विपुले5प्लवे,प्रभो! आज रातमें समस्त पांचाल कवच उतारकर निश्रिन्त हो मुर्दोके समान अचेत सो रहे होंगे। उस अवस्थामें जो क्रूर मनुष्य उनके साथ द्रोह करेगा, वह निश्चय ही नौकारहित अगाध एवं विशाल नरकके समुद्रमें डूब जायगा
O Herr, wenn in jenem Zustand—da sie arglos daliegen—ein grausamer und verschlagener Mann sie mit der Absicht betrachtet, sie zu verraten und zu schädigen, wird er gewiss in die Hölle versinken: ein weites, tiefes Meer ohne rettendes Boot.
Verse 15
सर्वस्त्रिविदुषां लोके श्रेष्ठस्त्वमसि विश्रुत: । नच ते जातु लोके5स्मिन् सुसूक्ष्ममपि किल्बिषम्
Kṛpa sprach: „In dieser Welt bist du weithin berühmt als der Vornehmste unter allen, die die Wissenschaft der Waffen kennen. Und in dieser Welt hat man zu keiner Zeit in dir auch nur die geringste Spur von Verfehlung gefunden.“
Verse 16
संसारके सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें तुम श्रेष्ठ हो। तुम्हारी सर्वत्र ख्याति है। इस जगतमें अबतक कभी तुम्हारा छोटे-से-छोटा दोष भी देखनेमें नहीं आया है ।। त्वं पुनः सूर्यसंकाश: श्वोभूत उदिते रवौ । प्रकाशे सर्वभूतानां विजेता युधि शात्रवान्,कल खबेरे सूर्योदय होनेपर तुम सूर्यके समान प्रकाशित हो उजालेमें युद्ध छेड़कर समस्त प्राणियोंके सामने पुन: शत्रुओंपर विजय प्राप्त करना
Kripa sprach: „Unter allen, die in dieser Welt die Wissenschaft der Waffen kennen, bist du der Vortrefflichste. Dein Ruhm ist überall, und bis heute hat man an dir nicht einmal den kleinsten Makel gesehen. Darum, wenn morgen die Sonne aufgeht, strahle wie die Sonne selbst; im klaren Licht des Tages nimm den Kampf vor allen Wesen auf und erringe den Sieg über deine Feinde.“
Verse 17
असम्भावितरूपं हि त्वयि कर्म विगर्हितम् । शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम,जैसे सफेद वस्त्रमें लाल रंगका धब्बा लग जाय, उस प्रकार तुममें निन्दित कर्मका होना सम्भावनासे परेकी बात है, ऐसा मेरा विश्वास है
„Wahrlich, dass du eine tadelnswerte Tat begehst, liegt jenseits aller Erwartung. Es wäre wie ein roter Fleck auf weißem Tuch — so fest ist meine Überzeugung.“
Verse 18
अश्वत्थामोवाच एवमेव यथा<5त्थ त्वं मातुलेह न संशय: । तैस्तु पूर्वमयं सेतु: शतधा विदलीकृत:,अश्वत्थामा बोला--मामाजी! आप जैसा कहते हैं, निःसंदेह वही ठीक है; परंतु पाण्डवोंने ही पहले इस धर्म-मर्यादाके सैकड़ों टुकड़े कर डाले हैं
Aśvatthāmā sagte: „Ganz so ist es — wie du sagst, Onkel; daran besteht kein Zweifel. Doch sie waren es, die zuerst diese ‘Brücke’ der sittlichen Selbstzucht, diese Grenze des Dharma, in hundert Stücke zerschlugen.“
Verse 19
प्रत्यक्ष भूमिपालानां भवतां चापि संनिधौ । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातित:,धष्टद्युम्नने समस्त राजाओंके सामने और आपलोगोंके निकट ही मेरे उस पिताको मार गिराया, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये थे
„Vor den Augen der versammelten Könige — und sogar während ihr alle in der Nähe standet — wurde mein Vater, der die Waffen niedergelegt hatte, von Dhṛṣṭadyumna zu Boden geschlagen.“
Verse 20
कर्णक्ष पतिते चक्रे रथस्य रथिनां वर: । उत्तमे व्यसने मग्नो हतो गाण्डीवधन्चना,रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णको भी गाण्डीवधारी अर्जुनने उस अवस्थामें मारा था, जब कि उनके रथका पहिया गड्ढेमें गिरकर फँस गया था और इसीलिये वे भारी संकटमें पड़े हुए थे
Kripa sprach: „Als das Rad von Karnas Wagen einsank und feststeckte, wurde Karna, der Beste unter den Wagenkämpfern, in höchster Not, vom Träger der Gāṇḍīva (Arjuna) erschlagen.“
Verse 21
इसी प्रकार शान्तनुनन्दन भीष्म जब हथियार डालकर अस्त्रहीन हो गये, उस अवस्थामें शिखण्डीको आगे करके गाण्डीवधारी धनंजयने उनका वध किया था
Ebenso war es, als Bhīṣma, der Sohn Śāntanus, die Waffen niederlegte und unbewaffnet wurde: Dhanañjaya (Arjuna), der Träger des Gāṇḍīva, stellte Śikhaṇḍī voran und bewirkte so seine Tötung.
Verse 22
भूरिश्रवा महेष्वासस्तथा प्रायगतो रणे । क्रोशतां भूमिपालानां युयुधानेन पातितः,महाधनुर्थधर भूरिश्रवा तो रणभूमिमें अनशन व्रत लेकर बैठ गये थे। उस अवस्थामें समस्त भूमिपाल चिल्ला-चिल्लाकर रोकते ही रह गये; परंतु सात्यकिने उन्हें मार गिराया
Kṛpa sprach: „Bhūriśravā, jener große Bogenschütze, hatte mitten in der Schlacht das Gelübde des Anāśana—Fasten bis zum Tod—auf sich genommen. Obwohl die Könige laut schrien, um es zu verhindern, wurde er von Yuyudhāna (Sātyaki) niedergestreckt.“
Verse 23
दुर्योधनश्व भीमेन समेत्य गदया रणे । पश्यतां भूमिपालानामधर्मेण निपातित:,भीमसेनने भी सम्पूर्ण राजाओंके देखते-देखते रणभूमिमें गदायुद्ध करते समय दुर्योधनको अधर्मपूर्वक गिराया था
Kṛpa sprach: „Duryodhana, der Bhīma im Keulenkampf auf dem Schlachtfeld begegnete, wurde auf unrechte Weise niedergestreckt—vor den Augen der versammelten Könige.“
Verse 24
एकाकी बहुभिस्तत्र परिवार्य महारथै: । अधर्मेण नरव्याप्रो भीमसेनेन पातित:,नरश्रेष्ठ राजा दुर्योधन अकेला था और बहुत-से महारथियोंने उसे वहाँ घेर रखा था, उस दशामें भीमसेनने उसको धराशायी किया है
Kṛpa sprach: „Dort stand der Tiger unter den Menschen—König Duryodhana—allein, und doch war er von vielen großen Wagenkriegern umringt. Dennoch streckte Bhīmasena ihn mit unrechten Mitteln nieder.“
Verse 25
विलापो भग्नसक्थस्य यो मे राज्ञ: परिश्रुत: । वार्तिकाणां कथयतां स मे मर्माणि कृन्तति,टूटी जाँघोंवाले राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने सुना है और संदेशवाहक दूतोंके मुखसे जो समाचार मुझे ज्ञात हुआ है, वह सब मेरे मर्मस्थानोंको विदीर्ण किये देता है
Die Klage des Königs mit zerschmetterten Schenkeln, die ich vernommen habe, und die Berichte, welche die Boten überbrachten, während sie die Kunde erzählten—das alles schneidet mir bis ins Innerste.
Verse 26
एवं चाधार्मिका: पापा: पठ्चाला भिन्नसेतव: । तानेवं भिन्नमर्यादान् कि भवान् न निगहति,इस प्रकार वे सब-के-सब पापी और अधार्मिक हैं। पांचालोंने भी धर्मकी मर्यादा तोड़ डाली है। इस तरह मर्यादा भंग करनेवाले उन पाण्डवों और पांचालोंकी आप निन्दा क्यों नहीं करते हैं?
So sind auch die Pāñcālas sündig und unrecht—Menschen, die selbst die Dämme der sittlichen Ordnung zerbrochen haben. Wenn jene Männer alle Grenzen so verletzt haben, warum hältst du sie nicht zurück?
Verse 27
पितृहन्तृनहं हत्वा पज्चालान् निशि सौप्तिके । काम॑ कीट: पतड़ो वा जन्म प्राप्प भवामि वै,पिताकी हत्या करनेवाले पांचालोंका रातको सोते समय वध करके मैं भले ही दूसरे जन्ममें कीट या पतंग हो जाऊँ, सब कुछ स्वीकार है
Kṛpa sprach: „Nachdem ich die Pāñcālas—die meinen Vater erschlugen—nachts, während sie schlafen, getötet habe, nehme ich jede Folge auf mich. Selbst wenn ich in einer anderen Geburt ein Wurm oder eine Motte werden muss, so sei es.“
Verse 28
त्वरे चाहमनेनाद्य यदिदं मे चिकीर्षितम् । तस्य मे त्वरमाणस्य कुतो निद्रा कुत: सुखम्
Heute eile ich, das auszuführen, was ich zu tun beabsichtige. Für mich, der ich diesem Ziel entgegenstürme, wie könnte es Schlaf geben—wie könnte es Behagen geben?
Verse 29
इस समय मैं जो कुछ करना चाहता हूँ, उसीको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे उतावला हो रहा हूँ। इतनी उतावलीमें रहते हुए मुझे नींद कहाँ और सुख कहाँ? ।। न स जात: पुमॉल्लोके कश्चिन्न स भविष्यति । यो मे व्यावर्तयेदेतां वधे तेषां कृतां मतिम्,इस संसारमें ऐसा कोई पुरुष न तो पैदा हुआ है और न होगा ही, जो उन पांचालोंके वधके लिये किये गये मेरे इस दृढ़ निश्चयको पलट दे
Kṛpa sprach: „In diesem Augenblick treibt mich die Dringlichkeit, zu vollenden, was ich zu tun beabsichtige. In solcher ruhelosen Hast—wo gäbe es für mich Schlaf, wo gäbe es Trost? In dieser Welt ist kein Mann geboren worden, und keiner wird je geboren werden, der mich von diesem festen Entschluss abbringen könnte, den ich gefasst habe: sie zu töten.“
Verse 30
संजय उवाच एवमुक्त्वा महाराज द्रोणपुत्र: प्रतापवान् । एकान्ते योजयित्वाश्वान् प्रायादभिमुख: परान्,संजय कहते हैं--महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा एकान्तमें घोड़ोंको जोतकर शत्रुओंकी ओर चल दिया
Sañjaya sprach: „O König, nachdem der tapfere Sohn Droṇas, Aśvatthāmā, so gesprochen hatte, spannte er an einem abgelegenen Ort seine Pferde an und brach auf, dem Feind entgegen.“
Verse 31
तमब्रूतां महात्मानौ भोजशारद्वतावुभौ । किमर्थ स्यन्दनो युक्त: किज्च कार्य चिकीर्षितम्,उस समय भोजवंशी कृतवर्मा और शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य दोनों महामनस्वी वीरोंने उससे कहा--'अश्व॒त्थामन्! तुमने किसलिये रथको जोता है? तुम इस समय कौन-सा कार्य करना चाहते हो?
Sañjaya sprach: Da wandten sich jene beiden hochgesinnten Krieger—Kṛtavarmā aus dem Bhoja-Geschlecht und Kṛpa, der Sohn Śaradvat’s—an ihn: „Aśvatthāman, zu welchem Zweck hast du den Wagen angespannt? Welche Tat beabsichtigst du jetzt zu vollbringen?“
Verse 32
एकसर्थप्रयातौ स्वस्त्वया सह नरर्षभ । समदुःखसुखौ चापि नावां शड्कितुमरहसि
Sañjaya sprach: „O Stier unter den Menschen, du und ich sind gemeinsam zu einem einzigen Zweck aufgebrochen. Wir haben Leid und Freude gleichermaßen geteilt; darum sollst du mich nicht verdächtigen.“
Verse 33
“नरश्रेष्ठट हम दोनों एक साथ तुम्हारी सहायताके लिये चले हैं। तुम्हारे दुःख-सुखमें हमारा समान भाग होगा, तुम्हें हम दोनोंपर संदेह नहीं करना चाहिये” ।। अश्वत्थामा तु संक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् । ताभ्यां तथ्यं तथा55चख्यौ यदस्यात्मचिकीर्षितम्,उस समय अश्वत्थामा पिताके वधका स्मरण करके रोषसे आगबबूला हो रहा था। उसके मनमें जो कुछ करनेकी इच्छा थी, वह सब उसने उन दोनोंसे ठीक-ठीक कह सुनाया
Sañjaya sprach: „O Bester der Menschen, wir beide sind gemeinsam aufgebrochen, um dir beizustehen. An deinem Leid wie an deiner Freude werden wir gleichen Anteil haben; du sollst an keinem von uns zweifeln.“ Doch Aśvatthāmā, von Zorn entflammt, als er an den Tod seines Vaters dachte, offenbarte den beiden wahrheitsgemäß, was er selbst zu tun beabsichtigte.
Verse 34
हत्वा शतसहस््राणि योधानां निशितै: शरै: । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातित:,वह बोला--"मेरे पिता अपने तीखे बाणोंसे लाखों योद्धाओंका वध करके जब अस्त्र- शस्त्र नीचे डाल चुके थे, उस अवस्थामें धृष्टद्युम्नने उन्हें मारा है
Sañjaya sprach: „Nachdem mein Vater mit seinen scharfgeschliffenen Pfeilen Hunderttausende von Kriegern erschlagen hatte, wurde er, als er die Waffen niedergelegt hatte, von Dhṛṣṭadyumna niedergestreckt.“
Verse 35
त॑ तथैव हनिष्यामि न्यस्तथर्माणमद्य वै | पुत्र पाउ्चालराजस्य पाप॑ पापेन कर्मणा,“अतः धर्मका परित्याग करनेवाले उस पापी पांचालराजकुमारको भी मैं उसी प्रकार पापकर्मद्वारा ही मार डालूँगा
„Darum werde ich auch jenen Mann, der das Dharma verworfen hat, noch heute auf dieselbe Weise töten: den Sünder, den Sohn des Königs der Pāñcālas — mit einer sündhaften Tat als Vergeltung.“
Verse 36
कथं च निहत: पाप: पाउ्चाल्य: पशुवन्मया । शस्त्रेण विजिताललोकान् नाप्नुयादिति मे मति:,“मेरा ऐसा निश्चय है कि मेरे हाथसे पशुकी भाँति मारे गये पापी पांचालराजकुमार धष्टद्यम्मको किसी तरह भी अस्त्र-शस्त्रोंद्रार मिलनेवाले पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो!!
Sañjaya sprach: „Wie sollte jener Sünder, der Sohn der Pāñcālas—von mir wie ein Tier erschlagen—je die verdienstvollen Welten erlangen, die man durch Waffen gewinnt? Das ist meine feste Überzeugung.“
Verse 37
क्षिप्रं संनद्धकवचौ सखडूगावात्तकार्मुकौ | मामास्थाय प्रतीक्षेतां रथवर्यो परंतपौ,“आप दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर हैं। शीघ्र ही कवच बाँधकर खड्ग और धनुष लेकर रथपर बैठ जाइये तथा मेरी प्रतीक्षा कीजिये”
Sañjaya sagte: „Ihr zwei—die Vornehmsten unter den Wagenkämpfern und furchtbare Peiniger der Feinde—beeilt euch: legt die Rüstung an, ergreift Schwert und Bogen, besteigt den Wagen und wartet auf mich.“
Verse 38
इत्युक्त्वा रथमास्थाय प्रायादभिमुख: परान् | तमन्वगात् कृपो राजन् कृतवर्मा च सात्वत:,राजन! ऐसा कहकर अअभश्वत्थामा रथपर आरूढ़ हो शत्रुओंकी ओर चल दिया। कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा भी उसीके मार्गका अनुसरण करने लगे
Sañjaya sprach: „So redend bestieg er seinen Wagen und zog aus, den Feinden entgegen. O König, Kṛpa folgte ihm, und ebenso Kṛtavarmā aus dem Geschlecht der Sātvatas.“
Verse 39
ते प्रयाता व्यरोचन्त परानभिमुखास्त्रय: । हूयमाना यथा यज्ञे समिद्धा हव्यवाहना:,शत्रुओंकी ओर जाते समय वे तीनों तेजस्वी वीर यज्ञमें आहुति पाकर प्रज्वलित हुए तीन अग्नियोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे
Sañjaya sprach: „Als jene drei auszogen, den Feinden entgegen, leuchteten sie in hellem Glanz — wie drei Feuer im Opfer, entfacht und lodernd, wenn die Gaben hineingegossen werden.“
Verse 40
ययुश्न शिबिरं तेषां सम्प्रसुप्तजनं विभो । द्वारदेशं तु सम्प्राप्य द्रौणिस्तस्थौ महारथ:,प्रभो! वे तीनों पाण्डवों और पांचालोंके उस शिविरके पास गये, जहाँ सब लोग सो गये थे। शिविरके द्वारपर पहुँचकर महारथी अश्वत्थामा खड़ा हो गया
Sañjaya sprach: „O Mächtiger, sie gelangten zum Lager jener (der Pāṇḍavas und der Pāñcālas), wo alle Menschen fest schliefen. Als sie das Lagertor erreichten, blieb Aśvatthāmā, Droṇas Sohn, der große Wagenkämpfer, dort stehen.“
Verse 231
तथा शान्तनवो भीष्मो न्यस्तशस्त्रो निरायुध: । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य हतो गाण्डीवधन्चना
Ebenso wurde Bhīṣma, der Sohn Śāntanus—nachdem er die Waffen niedergelegt hatte und unbewaffnet dastand—vom Träger des Gāṇḍīva erschlagen, während Śikhaṇḍin vorangestellt war.