
कण्वोपदेशः—नश्वरबलविवेकः तथा मातलिगुणकेश्याः आख्यानारम्भः (Kaṇva’s Counsel on Impermanent Power; Opening of the Mātali–Guṇakeśī Narrative)
Upa-parva: Kāṇva-vākya (Counsel of Ṛṣi Kaṇva) — Court Discourse to Duryodhana
Vaiśaṃpāyana reports that Ṛṣi Kaṇva, after hearing Jāmadagnya’s statement, addresses Duryodhana in the Kuru court. Kaṇva first establishes a metaphysical scale: the imperishable principle is identified with Viṣṇu as the eternal among the Ādityas, and with the revered Nara-Nārāyaṇa ṛṣis; by contrast, cosmic entities (sun, moon, elements, planets, stars) are described as subject to cyclical dissolution and recreation. Human and animal lives are depicted as even more momentary. Kings, despite enjoying prosperity, meet death at life’s end and face the results of merit and demerit. From this premise Kaṇva advances applied counsel: Duryodhana should not presume invincibility, should pursue śama (conciliation) with Dharmaputra, and allow Pāṇḍavas and Kurus to protect the earth jointly. He warns that “strength” is relative—stronger agents exist, and the Pāṇḍavas are portrayed as formidable. To reinforce the counsel, Kaṇva introduces an ancient illustrative narrative: Mātali, Indra’s charioteer, seeks a suitable groom for his exceptionally renowned daughter Guṇakeśī; he reflects on the complexities of lineage and alliance, surveys gods, humans, gandharvas, and ṛṣis without satisfaction, and resolves to go to the Nāga realm, descending into the earth after ritually circling and blessing his family.
Chapter Arc: कुरुसंसद में राजाओं की सभा—धर्म और करुणा के सूक्ष्म भेदों का उपदेश सुनकर सब भूपाल मन-ही-मन उत्तर खोजते हैं, पर वाणी जैसे रुक जाती है। → सभा के मौन में जामदग्न्य परशुराम वचन उठाते हैं और एक दृष्टान्त सुनाते हैं—दम्भोद्धव नामक राजा तपस्वियों/महात्माओं को युद्ध के लिए ललकारता है; ब्राह्मण-तपस्वी बार-बार क्षमा माँगते हैं, फिर भी राजा का दर्प और आग्रह बढ़ता जाता है। → नर-स्वरूप महात्मा (भगवान् नर) मायिक सींक/तृण-बाणों से लक्ष्यवेध कर दम्भोद्धव की सेना की इन्द्रियों (आँख-कान-नासिका) को पीड़ित कर देता है; आकाश श्वेत-सा भर जाता है और राजा भयभीत होकर चरणों में गिर पड़ता है। → नर राजा को शरण देते हैं और धर्मोपदेश करते हैं—‘ब्रह्मण्य’ बनो, धर्मात्मा बनो, फिर ऐसा मत करना; दर्प-जनित युद्धेच्छा का परित्याग कर ब्राह्मण-हित और शरणागत-रक्षा का व्रत ग्रहण कराया जाता है। → परशुराम अस्त्रों के वास्तविक ‘वधक’ स्वरूप का संकेत करते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान, मात्सर्य, अहंकार जैसे अंतःशत्रु ही मनुष्यों को मृत्यु की ओर ढकेलते हैं—अब सभा को अपने ही भीतर उत्तर ढूँढना है।
Verse 1
ऑपन-माज बछ। डे ३. दुसरोंको सुख पहुँचानेकी सहज भावनाका नाम “कृपा” है। २. दूसरोंका दुःख देखकर द्रवित होना एवं काँप उठना “अनुकम्पा” कहलाता है। 3. दूसरोंके दुःखको दूर करनेका भाव “करुणा” है। ४. क्रूरताका सर्वथा अभाव 'अनृशंसता” कहलाता है। षण्णवतितमोब< ध्याय: परशुरामजीका दम्भोद्धवकी कथाद्वारा नर-नारायणस्वरूप अर्जुन और श्रीकृष्णका महत्त्व वर्णन करना वैशम्पायन उवाच तस्मिन्नभिहिते वाक्ये केशवेन महात्मना । स्तिमिता हृष्टरोमाण आसन् सर्वे सभासद:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महात्मा श्रीकृष्णके ऐसी बात कहनेपर सम्पूर्ण सभासद् चकित हो गये। उनके अंगोंमें रोमांच हो आया
বৈশম্পায়ন বললেন—মহাত্মা কেশব (শ্রীকৃষ্ণ) সেই বাক্য উচ্চারণ করতেই সভার সকল সদস্য বিস্ময়ে স্তব্ধ হয়ে গেলেন; তাঁদের দেহে রোমাঞ্চ জেগে উঠল।
Verse 2
वक्रिदुत्तरमेतेषां वक्तुं नोत्सहते पुमान् इति सर्वे मनोभिस्ते चिन्तयन्ति सम पार्थिवा:,वे सब भूपाल मन-ही-मन यह सोचने लगे कि भगवान्के इन वचनोंका उत्तर कोई भी मनुष्य नहीं दे सकता है
সকল রাজাই মনে মনে ভাবতে লাগলেন—‘ভগবানের এই বাক্যের উপযুক্ত উত্তর দেওয়ার সাহস কোনো মানুষের নেই।’
Verse 3
तथा तेषु च सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु । जामदग्न्य इदं वाक्यमब्रवीत् कुरुसंसदि,इस प्रकार उन सब राजाओंके मौन ही रह जानेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने कौरवसभामें इस प्रकार कहा--
এইভাবে সকল রাজা নীরব হয়ে গেলে, কুরুসভায় জামদগ্ন্য পরশুরাম এই কথা বললেন।
Verse 4
इमां मे सोपमां वाचं शृणु सत्यामशड्कित: । तां श्र॒ुत्वा श्रेय आदत्स्व यदि साध्विति मनन््यसे,“राजन! तुम निःशंक होकर मेरी यह उदाहरणयुक्त बात सुनो। सुनकर यदि इसे कल्याणकारी और उत्तम समझो तो स्वीकार करो
“হে রাজন! নির্ভয়ে আমার এই উপমাসহ সত্য বাক্য শোনো। শুনে যদি মনে করো এটি মঙ্গলকর ও উত্তম, তবে গ্রহণ করো।”
Verse 5
2 परम्कतर राजा दम्भोद्धवो नाम सार्वभौम: पुराभवत् | अखिलां बुभुजे सर्वा पृथिवीमिति न: श्रुतम्,'पूर्वकालकी बात है, दम्भोद्धव नामसे प्रसिद्ध एक सार्वभौम सम्राट् इस सम्पूर्ण अखण्ड भूमण्डलका राज्य भोगते थे; यह हमारे सुननेमें आया है
বৈশম্পায়ন বললেন— প্রাচীনকালে দম্ভোদ্ধব নামে এক পরম প্রতাপশালী সর্বভৌম রাজা ছিলেন। আমরা শুনেছি, তিনি সমগ্র পৃথিবী সম্পূর্ণরূপে ভোগ ও শাসন করতেন।
Verse 6
स सम नित्यं निशापाये प्रातरुत्थाय वीर्यवान् | ब्राह्मणान् क्षत्रियांश्वैव पृच्छन्नास्ते महारथ:,“वे महारथी और पराक्रमी नरेश प्रतिदिन रात बीतनेपर प्रातःकाल उठकर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंसे इस प्रकार पूछा करते थे--
সেই বীর্যবান মহারথী রাজা প্রতিদিন রাত্রি অবসানে প্রাতে উঠে বসতেন এবং ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়দের জিজ্ঞাসা করতেন—
Verse 7
अस्ति कश्रिद् विशिष्टो वा मद्विधो वा भवेद् युधि । शूद्रो वैश्य: क्षत्रियो वा ब्राह्मणो वापि शस्त्रभृत्,“क्या इस जगत्में कोई ऐसा शस्त्रधारी शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण है, जो युद्धमें मुझसे बढ़कर अथवा मेरे समान भी हो सके?
“এই জগতে কি কোনো অস্ত্রধারী—শূদ্র, বৈশ্য, ক্ষত্রিয় কিংবা ব্রাহ্মণ—আছে, যে যুদ্ধে আমার চেয়ে শ্রেষ্ঠ, অথবা অন্তত আমার সমান হতে পারে?”
Verse 8
इति ब्रुवन्नन्वचचरत् स राजा पृथिवीमिमाम् | दर्पेण महता मत्त: कंचिदन््यमचिन्तयन्,“इसी प्रकार पूछते हुए वे राजा दम्भोद्धव महान् गर्वसे उन्मत्त हो दूसरे किसीको कुछ भी न समझते हुए इस पृथ्वीपर विचरने लगे
এভাবে বলতে বলতে এবং তদ্রূপ জিজ্ঞাসা করতে করতে সেই রাজা এই পৃথিবীতে বিচরণ করলেন। মহাদর্পে মত্ত হয়ে তিনি অন্য কারও কথা ভাবতেন না।
Verse 9
तं च वैद्या अकृपणा ब्राह्मणा: सर्वतो5भया: । प्रत्यषेधन्त राजानं श्लाघमानं पुन: पुन:
আর সেই বিদ্বান, নির্লোভ, সর্বতোভয়হীন ব্রাহ্মণেরা বারংবার আত্মপ্রশংসায় রত রাজাকে বারবার নিবৃত্ত করলেন।
Verse 10
“उस समय सर्वथा निर्भय, उदार एवं विद्वान ब्राह्मणोंने बारंबार आत्मप्रशंसा करनेवाले उन नरेशको मना किया ।। निषिध्यमानो5प्यसकृत् पृच्छत्येव स वै द्विजान् । अतिमान श्रिया मत्तं तमूचुरब्राह्मिणास्तदा,“उनके मना करनेपर भी वे ब्राह्मणोंसे बार-बार प्रश्न करते ही रहे। उनका अहंकार बहुत बढ़ गया था। वे धन-वैभवके मदसे मतवाले हो गये थे। राजाको यही (बारंबार) प्रश्न दुहराते देख वेदके सिद्धान्तका साक्षात्कार करनेवाले महामना तपस्वी ब्राह्मण क्रोधसे तमतमा उठे और उनसे इस प्रकार बोले--
বারবার নিষেধ করা সত্ত্বেও সেই রাজা ব্রাহ্মণদের কাছে বারংবার প্রশ্ন করতেই থাকল। অতিরিক্ত অহংকারে স্ফীত এবং ঐশ্বর্যের মদে উন্মত্ত হয়ে সে থামল না। একই প্রশ্ন পুনরাবৃত্তি করতে দেখে বেদতত্ত্বদর্শী মহাত্মা তপস্বী ব্রাহ্মণরা ক্রোধে জ্বলে উঠলেন এবং তাকে এইভাবে বললেন—
Verse 11
तपस्विनो महात्मानो वेदप्रत्ययदर्शिन: । उदीर्यमाणं राजानं क्रोधदीप्ता द्विजातय:,“उनके मना करनेपर भी वे ब्राह्मणोंसे बार-बार प्रश्न करते ही रहे। उनका अहंकार बहुत बढ़ गया था। वे धन-वैभवके मदसे मतवाले हो गये थे। राजाको यही (बारंबार) प्रश्न दुहराते देख वेदके सिद्धान्तका साक्षात्कार करनेवाले महामना तपस्वी ब्राह्मण क्रोधसे तमतमा उठे और उनसे इस प्रकार बोले--
তপস্বী মহাত্মা, বেদ-প্রমাণের প্রত্যক্ষদর্শী সেই দ্বিজগণ রাজাকে এভাবে বারবার উসকে উঠতে দেখে ক্রোধে দীপ্ত হয়ে উঠলেন।
Verse 12
अनेकजयिनौ संख्ये यौ वै पुरुषसत्तमौ | तयोस्त्वं न समो राजन् भवितासि कदाचन,“राजन! दो ऐसे पुरुषरत्न हैं, जिन्होंने युद्धमें अनेक योद्धाओंपर विजय पायी है। तुम कभी उनके समान न हो सकोगे”
হে রাজন! যুদ্ধে বহুবার বিজয়ী সেই দুই পুরুষশ্রেষ্ঠ আছেন; তুমি কখনওই তাদের সমান হতে পারবে না।
Verse 13
एवमुक्त: स राजा तु पुन: पप्रच्छ तान् द्विजान् | क्व तौ वीरौ क्वजन्मानौ किंकर्माणीौ च कौ च तौ,“उनके ऐसा कहनेपर राजाने पुनः उन ब्राह्मणोंसे पूछा--*वे दोनों वीर कहाँ हैं? उनका जन्म किस स्थानमें हुआ है? उनके कर्म कौन-कौन-से हैं और उनके नाम क्या हैं?
এভাবে বলা হলে সেই রাজা আবার সেই ব্রাহ্মণদের জিজ্ঞেস করল—“সেই দুই বীর এখন কোথায়? তাদের জন্ম কোথায়? তাদের কর্ম কী, আর তারা কারা—নামই বা কী?”
Verse 14
ब्राह्मणा ऊचु. नरो नारायणश्चैव तापसाविति न: श्रुतम् । आयातीौ मानुषे लोके ताभ्यां युध्यस्व पार्थिव,ब्राह्मण बोले--भूपाल! हमने सुना है कि वे नर-नारायण नामवाले तपस्वी हैं और इस समय मनुष्यलोकमें आये हैं। तुम उन्हीं दोनोंके साथ युद्ध करो
ব্রাহ্মণরা বললেন—“হে পার্থিব! আমরা শুনেছি, তারা তপস্বী নর ও নারায়ণ। তারা এখন মানবলোকে আগমন করেছেন; অতএব, হে রাজা, তাদের দুজনের সঙ্গেই যুদ্ধ করো।”
Verse 15
श्रूयेते ती महात्मानी नरनारायणावुभौ । तपो घोरमनिर्देश्यं तप्येते गन्धमादने,सुना है, वे दोनों महात्मा नर और नारायण गन्धमादन पर्वतपर ऐसी घोर तपस्या कर रहे हैं, जिसका वाणीद्वारा वर्णन नहीं हो सकता
শোনা যায়, সেই দুই মহাত্মা নর ও নারায়ণ গন্ধমাদন পর্বতে এমন ভয়ংকর ও অবর্ণনীয় তপস্যা করছেন, যা বাক্যে প্রকাশ করা যায় না।
Verse 16
स राजा महतीं सेनां योजयित्वा षडल्धिनीम् । अमृष्यमाण: सम्प्रायाद् यत्र तावपराजितौ,राजाको यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने (रथ, हाथी, घोड़े, पैदल, शकट और ऊँट--इन) छः अंगोंसे युक्त विशाल सेनाको सुसज्जित करके उस स्थानकी यात्रा की, जहाँ कभी पराजित न होनेवाले वे दोनों महात्मा विद्यमान थे
অপমান সহ্য করতে না পেরে রাজা ছয় অঙ্গবিশিষ্ট বিশাল সেনা সাজিয়ে তুললেন—রথ, হাতি, অশ্ব, পদাতিক, শকট ও উটসহ—এবং যেখানে সেই দুই অজেয় মহাত্মা অবস্থান করছিলেন, সেদিকে যাত্রা করলেন।
Verse 17
स गत्वा विषमं घोर पर्वतं गन्धमादनम् | मार्गमाणो<न्वगच्छत् तौ तापसौ वनमाश्रितौ,राजा उनकी खोज करते हुए दुर्गम एवं भयंकर गन्धमादन पर्वतपर गये और वनमें स्थित उन तपस्वी महात्माओंके पास जा पहुँचे
তাদের সন্ধান করতে করতে রাজা দুর্গম ও ভয়ংকর গন্ধমাদন পর্বতে গেলেন এবং অরণ্যে আশ্রিত সেই দুই তাপসের কাছে পৌঁছে গেলেন।
Verse 18
तौ दृष्टवा क्षुत्पिपासाभ्यां कृशी धमनिसंततौ । शीतवातातपैश्चैव कर्शितौ पुरुषोत्तमौ,वे दोनों पुरुषरत्न भूख-प्याससे दुर्बल हो गये थे। उनके सारे अंगोंमें फैली हुई नस- नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। वे सर्दी-गरमी और हवाका कष्ट सहते-सहते अत्यन्त कृशकाय हो रहे थे
সেই দুই পুরুষোত্তমকে দেখে (রাজা দেখলেন) ক্ষুধা ও তৃষ্ণায় তারা কৃশ হয়ে গেছে; দেহজুড়ে শিরা-উপশিরা স্পষ্ট, আর শীত, বাতাস ও প্রখর রৌদ্র সহ্য করতে করতে তারা আরও ক্ষয়প্রাপ্ত হয়েছে।
Verse 19
अभिगम्योपसंगृहा[ पर्यपृच्छटदनामयम् । तमर्चित्वा मूलफलैरासनेनोदकेन च,निकट जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार करके दम्भोद्धवने उन दोनोंका कुशल-समाचार पूछा। तब नर और नारायणने राजाका स्वागत-सत्कार करके आसन, जल और फल-मूल देकर उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया। तदनन्तर पूछा कि हम आपकी कया सेवा करें? यह सुनकर उन्होंने अपना सारा वृत्तान्त पुनः अक्षरश: सुना दिया
নিকটে গিয়ে তাদের চরণে প্রণাম করে তিনি কুশল জিজ্ঞাসা করলেন। তখন নর-নারায়ণ মূল-ফল, আসন ও জল দিয়ে রাজাকে যথোচিত আতিথ্য করলেন এবং আহারের জন্য আহ্বান জানালেন। পরে প্রসন্ন হয়ে বললেন—“রাজোত্তম, আপনার কী প্রয়োজন?” তা শুনে রাজেন্দ্র আবারও যথাযথভাবে নিজের সমস্ত বৃত্তান্ত বললেন।
Verse 20
न्यमन्त्रयेतां राजानं कि कार्य क्रियतामिति । ततस्तामानुपूर्वी स पुनरेवान्वकीर्तयत्,निकट जाकर उनके चरणोंमें नमस्कार करके दम्भोद्धवने उन दोनोंका कुशल-समाचार पूछा। तब नर और नारायणने राजाका स्वागत-सत्कार करके आसन, जल और फल-मूल देकर उन्हें भोजनके लिये निमन्त्रित किया। तदनन्तर पूछा कि हम आपकी कया सेवा करें? यह सुनकर उन्होंने अपना सारा वृत्तान्त पुनः अक्षरश: सुना दिया
বৈশম্পায়ন বললেন—নর ও নারায়ণ রাজাকে আহ্বান করে বললেন, “আপনার কী কাজ—আমরা কী সেবা করব?” তখন তিনি তাঁদের নিকটে গিয়ে তাঁদের চরণে প্রণাম করে কুশল-সংবাদ জিজ্ঞাসা করলেন। তাঁরা রাজাকে যথোচিত সম্মান করে আসন, জল ও ফল-মূল দিলেন এবং ভোজনের জন্য নিমন্ত্রণ করলেন। তারপর বললেন, “আমরা আপনার কী সেবা করব?” এ কথা শুনে তিনি নিজের দূতকার্যের সমগ্র বিবরণ যথাক্রমে, যথাযথভাবে, আবার অক্ষরে অক্ষরে বর্ণনা করলেন।
Verse 21
2242 क्र ० 4 कलर १ ७ रे 2 2 १7 बाहुभ्यां मे जिता भूमिर्निहता: सर्वशत्रव: । भवद्धयां युद्धमाकाड्क्षन्नुपपयातो5स्मि पर्वतम्
আমার বাহুবলের দ্বারা পৃথিবী জয় করা হয়েছে এবং আমার সকল শত্রু নিহত হয়েছে। তবু তোমাদের সঙ্গে যুদ্ধ করতে ইচ্ছা করে আমি এই পর্বতে এসেছি।
Verse 22
नरनारायणावूचतु: अपेतक्रोधलोभो5यमाश्रमो राजसत्तम,नर-नारायण बोले--नृपश्रेष्ठ] हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभसे रहित है। इस आश्रममें कभी युद्ध नहीं होता, फिर अस्त्र-शस्त्र और कुटिल मनोवृत्तिका मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वीपर बहुत-से क्षत्रिय हैं, अतः आप कहीं और जाकर युद्धकी अभिलाषा पूर्ण कीजिये
নর-নারায়ণ বললেন—হে রাজশ্রেষ্ঠ, এই আশ্রম ক্রোধ ও লোভশূন্য। এখানে কখনও যুদ্ধ হয় না। তবে যে অস্ত্রধারী এবং যার অন্তরে যুদ্ধের কুটিল বাসনা, সে এখানে কীভাবে থাকতে পারে? পৃথিবীতে বহু ক্ষত্রিয় আছে; অতএব অন্যত্র গিয়ে তোমার যুদ্ধ-ইচ্ছা পূর্ণ করো।
Verse 23
नहास्मिन्नाश्रमे युद्ध कुत: शस्त्र कुतो5नृजुः । अन्यत्र युद्धमाकाड्क्ष बहव: क्षत्रिया: क्षितौ,नर-नारायण बोले--नृपश्रेष्ठ] हमारा यह आश्रम क्रोध और लोभसे रहित है। इस आश्रममें कभी युद्ध नहीं होता, फिर अस्त्र-शस्त्र और कुटिल मनोवृत्तिका मनुष्य यहाँ कैसे रह सकता है? इस पृथ्वीपर बहुत-से क्षत्रिय हैं, अतः आप कहीं और जाकर युद्धकी अभिलाषा पूर्ण कीजिये
এই আশ্রমে যুদ্ধ নেই—তবে এখানে অস্ত্র কোথায়, আর কুটিলতা কোথায়? যদি যুদ্ধের আকাঙ্ক্ষা থাকে, তবে অন্যত্র যাও; এই পৃথিবীতে বহু ক্ষত্রিয় আছে, যারা তোমার যুদ্ধ-ইচ্ছা পূর্ণ করতে পারে।
Verse 24
राम उवाच उच्यमानस्तथापि सम भूय एवाभ्यभाषत | पुन: पुन: क्षम्यमाण: सान्त्व्यमानश्व॒ भारत
রাম বললেন—এভাবে বলা হলেও সে তবু আবারও সেই একই রীতিতে কথা বলল। হে ভারত, বারবার ক্ষমা করা ও বারবার সান্ত্বনা দেওয়া সত্ত্বেও সে থামল না।
Verse 25
ततो नरस्त्विषीकाणां मुष्टिमादाय भारत,(संनहास्व च वर्माणि यानि चान्यानि सन्ति ते ।) अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामित: परम् । (यदाद्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाउ्जनान् ।। ) भरतनन्दन! तब महात्मा नरने हाथमें एक मुट्ठी सींक लेकर कहा--'युद्ध चाहनेवाले क्षत्रिय! आ, युद्ध कर। अपने सारे अस्त्र-शस्त्र ले ले। सारी सेनाको तैयार कर ले, कवच बाँध ले, तेरे पास और भी जितने साधन हों, उन सबसे सम्पन्न हो जा। तू बड़े घमंडमें आकर ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगोंको ललकारता फिरता है; इसलिये मैं आजसे तेरे युद्धविषयक निश्चयको दूर किये देता हूँ
তখন রাম এক মুঠো কঞ্চি হাতে নিয়ে ভারতবংশধরকে বললেন— “সজ্জ হও; তোমার যত বর্ম আছে সব পর, আর যে-কোনো অন্য উপায়-উপকরণ আছে সব সংগ্রহ কর। সকল অস্ত্রশস্ত্র ধারণ কর, সেনাবাহিনী সাজাও। কারণ আজ থেকেই আমি তোমার যুদ্ধের দৃঢ় বিশ্বাস ভেঙে দেব। অহংকারে ফুলে উঠে তুমি ব্রাহ্মণদের অগ্রে রেখে সকলকে চ্যালেঞ্জ করে বেড়াচ্ছ; তাই আজ থেকে তোমার যুদ্ধস্পৃহা আমি অপসারিত করব।”
Verse 26
अब्रवीदेहि युद्धयस्व युद्धकामुक क्षत्रिय | सर्वशस्त्राणि चादत्स्व योजयस्व च वाहिनीम्,(संनहास्व च वर्माणि यानि चान्यानि सन्ति ते ।) अहं हि ते विनेष्यामि युद्धश्रद्धामित: परम् । (यदाद्वयसि दर्पेण ब्राह्मणप्रमुखाउ्जनान् ।। ) भरतनन्दन! तब महात्मा नरने हाथमें एक मुट्ठी सींक लेकर कहा--'युद्ध चाहनेवाले क्षत्रिय! आ, युद्ध कर। अपने सारे अस्त्र-शस्त्र ले ले। सारी सेनाको तैयार कर ले, कवच बाँध ले, तेरे पास और भी जितने साधन हों, उन सबसे सम्पन्न हो जा। तू बड़े घमंडमें आकर ब्राह्मण आदि सभी वर्णके लोगोंको ललकारता फिरता है; इसलिये मैं आजसे तेरे युद्धविषयक निश्चयको दूर किये देता हूँ
রাম বললেন— “এসো—যুদ্ধ কর, হে যুদ্ধকামনায় উন্মত্ত ক্ষত্রিয়! সকল অস্ত্রশস্ত্র ধারণ কর; বাহিনী সাজাও; বর্ম পর, আর তোমার যা-কিছু অন্য উপায় আছে সব নিয়ে প্রস্তুত হও। কারণ এখনই আমি তোমার যুদ্ধের আত্মবিশ্বাস ধ্বংস করব। অহংকারে ফুলে উঠে তুমি ব্রাহ্মণদের অগ্রে রেখে সকলকে চ্যালেঞ্জ করছ; তাই আজ থেকেই তোমার যুদ্ধস্পৃহা আমি নিঃশেষ করব।”
Verse 27
दग्भोद्भव उवाच यद्येतदस्त्रमस्मासु युक्त तापस मन्यसे
দগ্ভোদ্ভব বলল— “হে তপস্বী! যদি তুমি মনে কর যে এই অস্ত্র আমাদের বিরুদ্ধে প্রয়োগ করা ন্যায়সঙ্গত…”
Verse 28
राम उवाच इत्युक्त्वा शरवर्षेण सर्वतः समवाकिरत्
রাম বললেন— এ কথা বলে তিনি চারদিকে বাণবৃষ্টি করে সর্বত্র আচ্ছন্ন করে দিলেন।
Verse 29
तस्य तानस्यतो घोरानिषून् परतनुच्छिद:
তার নিক্ষিপ্ত সেই ভয়ংকর বাণগুলি শত্রুর দেহ ছিন্নভিন্ন করে দেওয়ার ক্ষমতাসম্পন্ন ছিল।
Verse 30
ततोअस्मै प्रासूजद्ू घोरमैषीकमपराजित:
তখন অপরাজিত বীর তার উদ্দেশে ভয়ংকর ঐষীক অস্ত্র নিক্ষেপ করলেন।
Verse 31
अस्त्रमप्रतिसंधेयं तदद्भुतमिवा भवत् । तब किसीसे पराजित न होनेवाले महर्षि नरने उनके ऊपर भयंकर ऐषीकास्त्रका प्रयोग किया; जिसका निवारण करना असम्भव था। यह एक अद्भुत-सी घटना हुई ।। ३० ह ।। तेषामक्षीणि कर्णाक्ष नासिकाश्ैव मायया
সে অস্ত্র প্রতিহত করা অসম্ভব ছিল; তা যেন এক আশ্চর্য ঘটনা হয়ে উঠল। মায়ার প্রভাবে তাদের কান, চোখ ও নাসিকাও লোপ পেল।
Verse 32
स दृष्टवा श्वेतमाकाशमिषीकाभि: समाचितम्
তিনি দেখলেন আকাশ শ্বেত হয়ে উঠেছে এবং ঐষীকা-শরে ঘনভাবে পূর্ণ।
Verse 33
तमब्रवीज्नरो राजन् शरण्य: शरणैषिणाम्
তখন, হে রাজন, আশ্রয়প্রার্থীদের আশ্রয় সেই মহৎ পুরুষ তাকে বললেন।
Verse 34
नैतादूक् पुरुषो राजन क्षत्रधर्ममनुस्मरन्
রাম বললেন: “হে রাজন, যে পুরুষ ক্ষত্রধর্ম স্মরণে রাখে, সে এভাবে কথা বলে না।”
Verse 35
मनसा नृपशार्दूल भवेत् परपुरंजय: । “नरेश्वर! नृपश्रेष्ठ! शत्रुनगरविजयी वीर पुरुष क्षत्रियधर्मको स्मरण रखते हुए कभी मनसे भी ऐसा व्यवहार नहीं कर सकता, जैसा कि तुमने किया है ।। मा च दर्पसमाविष्ट: क्षेप्सी: कांश्वचित् कथंचन
রাম বললেন—“হে নৃপশার্দূল! শত্রুনগর-বিজয়ী সত্য বিজেতা ক্ষত্রিয়ধর্ম স্মরণ করে মনে-মনেও তোমার মতো আচরণ করতে পারে না। আর দম্ভে আচ্ছন্ন হয়ে কখনও কোনোভাবেই কাউকে অপমান বা তিরস্কার কোরো না।”
Verse 36
अल्पीयांसं विशिष्ट वा तत् ते राजन् समाहितम् | “राजन! आजसे फिर कभी घमंडमें आकर अपनेसे बड़े या छोटे किन्हीं राजाओंपर किसी प्रकार भी आक्षेप न करना। इस बातके लिये मैंने तुम्हें सावधान कर दिया ।। कृतप्रज्ञो वीतलोभो निरहंकार आत्मवान्,'भूपाल! तुम विनीतबुद्धि, लोभशूनन््य, अहंकाररहित, मनस्वी, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, कोमलस्वभाव और सौम्य होकर प्रजाका पालन करो। फिर कभी दूसरोंके बलाबलको जाने बिना किसीपर आक्षेप न करना
রাম বললেন—“হে রাজন! এ কথা হৃদয়ে স্থির করো—আজ থেকে আর কখনও অহংকারে মত্ত হয়ে তোমার চেয়ে বড় বা ছোট কোনো রাজাকেই কোনোভাবে দোষারোপ কোরো না। তোমার মঙ্গলের জন্যই আমি তোমাকে সতর্ক করলাম। স্থিতপ্রজ্ঞ, লোভশূন্য, অহংকারহীন ও আত্মসংযমী হয়ে বিনয় ও সংযমে প্রজাপালন করো; আর অন্যের বল-অবল না জেনে কারও প্রতি নিন্দা বা আক্রমণ কোরো না।”
Verse 37
दान्तः क्षान्तो मृदुः सौम्य: प्रजा: पालय पार्थिव । मा सम भूय: क्षिपे: कंचिदविदित्वा बलाबलम्,'भूपाल! तुम विनीतबुद्धि, लोभशूनन््य, अहंकाररहित, मनस्वी, जितेन्द्रिय, क्षमाशील, कोमलस्वभाव और सौम्य होकर प्रजाका पालन करो। फिर कभी दूसरोंके बलाबलको जाने बिना किसीपर आक्षेप न करना
রাম বললেন—“হে পার্থিব! সংযমী, ক্ষমাশীল, কোমল ও সৌম্য হয়ে প্রজাদের পালন করো। আর কারও বল-অবল না জেনে কখনও কাউকে নিন্দা বা আক্রমণ কোরো না।”
Verse 38
अनुज्ञात: स्वस्ति गच्छ मैवं भूय: समाचरे: । कुशल ब्राह्मणान् पृच्छेरावयोर्वचनाद् भूशम्,“मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी, तुम्हारा कल्याण हो, जाओ। फिर ऐसा बर्ताव न करना। विशेषत: हम दोनोंके कहनेसे तुम ब्राह्मणोंसे उनका कुशल-समाचार पूछते रहना”
রাম বললেন—“তোমাকে প্রস্থান করার অনুমতি দেওয়া হলো; মঙ্গলসহকারে যাও। আর কখনও এমন আচরণ কোরো না। আর বিশেষ করে আমাদের কথামতো ব্রাহ্মণদের কুশল-সংবাদ যত্ন করে জিজ্ঞাসা করবে।”
Verse 39
ततो राजा तयो: पादावभिवाद्य महात्मनो: । प्रत्याजगाम स्वपुरं धर्म चैवाचरद् भूशम्,तदनन्तर राजा दम्भोद्भधव उन दोनों महात्माओंके चरणोंमें प्रणाम करके अपनी राजधानीमें लौट आये और विशेषरूपसे धर्मका आचरण करने लगे
তখন রাজা সেই দুই মহাত্মার চরণে প্রণাম করে নিজের রাজধানীতে ফিরে গেল, এবং তারপর থেকে সে বিশেষভাবে ধর্মাচরণে প্রবৃত্ত হলো।
Verse 40
सुमहच्चापि तत् कर्म तन्नरेण कृत॑ पुरा । ततो गुणै: सुबहुभि: श्रेष्ठ नारायणो5भवत्,इस प्रकार पूर्वकालमें महात्मा नरने वह महान् कर्म किया था। उनसे भी बहुत गुणोंके कारण भगवान् नारायण श्रेष्ठ हैं
সে কর্ম অতি মহান হলেও, তা প্রাচীনকালে মহাত্মা নর সম্পাদন করেছিলেন; কিন্তু বহু উৎকৃষ্ট গুণের কারণে ভগবান নারায়ণই তাঁর থেকেও শ্রেষ্ঠ প্রমাণিত হলেন।
Verse 41
तस्माद् यावद् धनुःश्रेष्ठे गाण्डीवे<स्त्रं न युज्यते । तावत् त्वं मानमुत्सूज्य गच्छ राजन् धनंजयम्,अतः राजन! जबतक श्रेष्ठ धनुष गाण्डीवपर (दिव्य) अस्त्रोंका संधान नहीं किया जाता, तबतक ही तुम अभिमान छोड़कर अर्जुनसे मिल जाओ
অতএব, হে রাজন! যতক্ষণ শ্রেষ্ঠ ধনু গাণ্ডীবের উপর দিব্য অস্ত্র সংযোজিত হয়নি, ততক্ষণ অহংকার ত্যাগ করে ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর কাছে গমন করো।
Verse 42
काकुदीकं शुक॑ नाकमक्षिसंतर्जनं तथा । संतान॑ नर्तक॑ घोरमास्यमोदकमष्टमम्,काकुदीक (प्रस्वापन), शुक (मोहन), नाक (उन्मादन), अक्षिसंतर्जन (त्रासन), संतान (दैवत), नर्तक (पैशाच), घोर (राक्षस) और आस्यमोदक (याम्य)- --ये आठ प्रकारके अस्त्र हैं
কাকুদীক, শুক, নাক, অক্ষিসন্তর্জন, সন্তান, নর্তক, ঘোর এবং অষ্টম আস্যমোদক—এগুলি আট প্রকার অস্ত্র।
Verse 43
एतैरविंद्धा: सर्व एव मरणं यान्ति मानवा: । कामक्रोधौ लोभमोहौ मदमानौ तथैव च
এগুলির দ্বারা বিদ্ধ হলে সকল মানুষই মৃত্যুর দিকে ধাবিত হয়—কাম ও ক্রোধ, লোভ ও মোহ, এবং তদ্রূপ মদ ও মান।
Verse 44
उन्मत्ताश्न विचेष्टन्ते नष्टसंज्ञा विचेतस:,इन अस्त्रोंके प्रयोगसे कुछ लोग उन्मत्त हो जाते हैं और वैसी ही चेष्टाएँ करने लगते हैं। कितनोंको सुध-बुध नहीं रह जाती, वे अचेत हो जाते हैं। कई मनुष्य सोने लगते हैं। कुछ उछलते-कूदते और छींकते हैं। कितने ही मल-मूत्र करने लग जाते हैं और कुछ लोग निरंतर रोते-हँसते रहते हैं
এই অস্ত্রগুলির প্রভাবে কেউ উন্মত্ত হয়ে উন্মাদের মতো আচরণ করে; অনেকের চেতনা ও বোধ লুপ্ত হয়ে তারা অচেতন হয়ে পড়ে।
Verse 45
स्वपन्ति च प्लवन्ते च छर्दयन्ति च मानवा: । मूत्रयन्ते च सततं रुदन्ति च हसन्ति च,इन अस्त्रोंके प्रयोगसे कुछ लोग उन्मत्त हो जाते हैं और वैसी ही चेष्टाएँ करने लगते हैं। कितनोंको सुध-बुध नहीं रह जाती, वे अचेत हो जाते हैं। कई मनुष्य सोने लगते हैं। कुछ उछलते-कूदते और छींकते हैं। कितने ही मल-मूत्र करने लग जाते हैं और कुछ लोग निरंतर रोते-हँसते रहते हैं
এই অস্ত্রপ্রয়োগের অভিঘাতে কতক লোক উন্মত্ত হয়ে বিকৃত আচরণ করতে থাকে। অনেকের জ্ঞান-বুদ্ধি লোপ পায়, তারা অচেতন হয়ে পড়ে। কেউ ঘুমিয়ে পড়ে, কেউ লাফালাফি করে, কেউ বমি করে। কেউ অবিরত মূত্রত্যাগ করে, আর কেউ নিয়ন্ত্রণহীনভাবে কাঁদতে ও হাসতে থাকে।
Verse 46
निर्माता सर्वलोकानामीश्रवर: सर्वकर्मवित् | यस्य नारायणो बन्धुरजुनो दुःसहो युधि,राजन! सम्पूर्ण लोकोंका निर्माण करनेवाले ईश्वर एवं सब कर्मोके ज्ञाता नारायण जिनके बन्धु (सहायक) हैं, वे नरस्वरूप अर्जुन युद्धमें दुःसह हैं (क्योंकि उन्हें उपर्युक्त सभी अस्त्रोंका अच्छा ज्ञान है)
হে রাজন! যাঁর বन्धু ও সহায় নাৰায়ণ—সকল লোকের স্রষ্টা, সর্বকর্মজ্ঞ ঈশ্বর—সেই মানবদেহধারী অর্জুন যুদ্ধে অপ্রতিরোধ্য।
Verse 47
कस्तमुत्सहते जेतु त्रिषु लोकेषु भारत । वीरं कपिध्वजं जिष्णुं यस्य नास्ति समो युधि
হে ভারত! তিন লোকের মধ্যে কে সাহস করবে জয় করতে সেই বীর, কপিধ্বজ, সদা বিজয়ী যোদ্ধাকে—যার সমান যুদ্ধে কেউ নেই?
Verse 48
भारत! युद्धभूमिमें जिनकी समानता कोई भी नहीं कर सकता, उन विजयशील वीर कपिध्वज अर्जुनको जीतनेका साहस तीनों लोकोंमें कौन कर सकता है? ।। असंख्येया गुणा: पार्थे तद्विशिष्टो जनार्दन: । त्वमेव भूयो जानासि कुन्तीपुत्र॑ धनंजयम्,महाराज! अर्जुनमें असंख्य गुण हैं एवं भगवान् जनार्दन तो उनसे भी बढ़कर हैं। तुम भी कुन्तीपुत्र अर्जुनको अच्छी तरह जानते हो। जो दोनों महात्मा नर और नारायणके नामसे प्रसिद्ध हैं, वे ही अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि वे दोनों पुरुषरत्न सर्वश्रेष्ठ वीर हैं
হে ভারত! যুদ্ধক্ষেত্রে যার সমতা কেউ করতে পারে না, সেই বিজয়ী বীর কপিধ্বজ অর্জুনকে জয় করার সাহস তিন লোকের মধ্যে কার আছে? পার্থের মধ্যে অগণিত গুণ, আর জনার্দন তো তাঁর থেকেও শ্রেষ্ঠ। মহারাজ, তুমি কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয়কে ভালোই জানো।
Verse 49
नरनारायणौ यौ तौ तावेवार्जुनकेशवौ । विजानीहि महाराज प्रवीरौ पुरुषोत्तमौ,महाराज! अर्जुनमें असंख्य गुण हैं एवं भगवान् जनार्दन तो उनसे भी बढ़कर हैं। तुम भी कुन्तीपुत्र अर्जुनको अच्छी तरह जानते हो। जो दोनों महात्मा नर और नारायणके नामसे प्रसिद्ध हैं, वे ही अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि वे दोनों पुरुषरत्न सर्वश्रेष्ठ वीर हैं
মহারাজ! যাঁরা নর ও নারায়ণ নামে প্রসিদ্ধ, তাঁরাই অর্জুন ও কেশব। জেনে রাখো—তাঁরা উভয়েই শ্রেষ্ঠ বীর, পুরুষদের মধ্যে উত্তম।
Verse 50
यद्येतदेवं जानासि न च मामभिशड्कसे । आर्या मतिं समास्थाय शाम्य भारत पाण्डवै:,भारत! यदि तुम इस बातको इस रूपमें जानते हो और मुझपर तुम्हें तनिक भी संदेह नहीं है तो मेरे कहनेसे श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर पाण्डवोंके साथ संधि कर लो
হে ভারত! যদি তুমি এ কথা যথার্থই জানো এবং আমার প্রতি তোমার বিন্দুমাত্র সন্দেহ না থাকে, তবে আর্যোচিত শুভবুদ্ধি অবলম্বন করে পাণ্ডবদের সঙ্গে সন্ধি করো।
Verse 51
अथ चेन्मन्यसे श्रेयो न मे भेदो भवेदिति । प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा च युद्धे मन: कृथा:
আর যদি তুমি এটাকেই শ্রেয় মনে করো যে আমার সঙ্গে বিচ্ছেদ না ঘটে, তবে হে ভরতশ্রেষ্ঠ! শান্ত হও এবং যুদ্ধে মন দিও না।
Verse 52
भरतश्रेष्ठ! यदि तुम्हारी यह इच्छा हो कि हमलोगोंमे फ़ूट न हो और इसीमें तुम अपना कल्याण समझो, तब तो संधि करके शान्त हो जाओ और युद्धमें मन न लगाओ ।। भवतां च कुरुश्रेष्ठ कुलं बहुमतं भुवि । तत् तथैवास्तु भद्रें ते स्वार्थमेवोपचिन्तय,कुरुश्रेष्ठ! तुम्हारा कुल इस पृथ्वीपर बहुत प्रतिष्ठित है। वह उसी प्रकार सम्मानित बना रहे और तुम्हारा कल्याण हो, इसके लिये अपने वास्तविक स्वार्थका ही चिन्तन करो
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যদি তোমার ইচ্ছা হয় যে আমাদের মধ্যে ফাটল না পড়ুক এবং তাতেই তুমি নিজের মঙ্গল দেখো, তবে সন্ধি করে শান্ত হও এবং যুদ্ধে মন দিও না। আর হে কুরুশ্রেষ্ঠ! তোমাদের কুল পৃথিবীতে বহুল সম্মানিত; তা যেমন আছে তেমনই সম্মানিত থাকুক—তোমার মঙ্গল হোক। তাই নিজের প্রকৃত স্বার্থ, যা সত্যিই কল্যাণকর, সেটাই বিবেচনা করো।
Verse 95
इस प्रकार श्रीमह्माभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कौरवसभामें श्रीकृष्णवाक्यविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে কৌরবসভায় শ্রীকৃষ্ণের বাক্যবিষয়ক পঁচানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 96
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि दम्भोद्धवोपाख्याने षण्णवतितमो<ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বে ভগবদ্যানপর্বের অন্তর্গত দম্ভোদ্ধবোপাখ্যানে ছিয়ানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত।
Verse 216
आतिथ्यं दीयतामेतत् काडक्षितं मे चिरं प्रति । और कहा--'मैंने अपने बाहुबलसे सारी पृथ्वीको जीत लिया है तथा सम्पूर्ण शत्रुओंका संहार कर डाला है। अब आप दोनोंसे युद्ध करनेकी इच्छा लेकर इस पर्वतपर आया हूँ। यही मेरा चिरकालसे अभिलषित मनोरथ है। आप अतिथि-सत्कारके रूपमें इसे ही पूर्ण कर दीजिये
বৈশম্পায়ন বললেন—“আমাকে এই আতিথ্য দাও—যা আমি বহুদিন ধরে কামনা করে এসেছি। বাহুবলে আমি সমগ্র পৃথিবী জয় করেছি এবং সকল শত্রুকে বিনাশ করেছি। এখন তোমাদের দু’জনের সঙ্গে যুদ্ধ করার ইচ্ছা নিয়ে এই পর্বতে এসেছি। এটাই আমার দীর্ঘকাল লালিত বাসনা; অতিথি-সৎকাররূপে এটিই পূর্ণ করে দাও।”
Verse 246
दम्भोद्धवो युद्धमिच्छन्नाह्वयत्येव तापसौ । परशुरामजी कहते हैं--भारत! उन दोनों महात्माओंने बारंबार ऐसा कहकर राजासे क्षमा माँगी और उन्हें विविध प्रकारसे सान्त्वना दी। तथापि दम्भोद्धव युद्धकी इच्छासे उन दोनों तापसोंको कहते और ललकारते ही रहे
পরশুরাম বললেন—ভারত! যুদ্ধলালসায় উন্মত্ত দম্ভোদ্ধব সেই দুই তপস্বীকে বারবার আহ্বান করে ললকার করতে লাগল। অথচ সেই দুই মহাত্মা বারংবার তেমন বলে রাজার কাছে ক্ষমা চাইছিলেন এবং নানা উপায়ে তাকে সান্ত্বনা দিচ্ছিলেন; তবু দম্ভোদ্ধবের যুদ্ধ-আকাঙ্ক্ষা নিবৃত্ত হল না।
Verse 276
एतेनापि त्वया योत्स्ये युद्धार्थी हहमागत: । दम्भोद्भधवने कहा--तापस! यदि आप यही अस्त्र हमारे लिये उपयुक्त मानते हैं तो मैं इसके होनेपर भी आपके साथ युद्ध अवश्य करूँगा; क्योंकि मैं युद्धके लिये ही यहाँ आया हूँ
দম্ভোদ্ভব বলল—“তপস্বী! তবু আমি তোমার সঙ্গে যুদ্ধ করব; আমি যুদ্ধের জন্যই এখানে এসেছি। তুমি যদি এই অস্ত্রকে আমাদের জন্য উপযুক্ত মনে কর, তবে তা তোমার হাতে থাকলেও আমি নিশ্চয়ই তোমার সঙ্গে সংগ্রাম করব; কারণ যুদ্ধের উদ্দেশ্যেই আমি এসেছি।”
Verse 286
दम्भोद्धवस्तापसं तं जिघांसु: सहसैनिक: । परशुरामजी कहते हैं--ऐसा कहकर सैनिकोंसहित दम्भोद्धवने तपस्वी नरको मार डालनेकी इच्छासे सब ओरसे उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी
পরশুরাম বললেন—এ কথা বলে সৈন্যসহ দম্ভোদ্ধব, সেই তপস্বী নরকে হত্যা করার অভিপ্রায়ে, চারদিক থেকে তার ওপর তীরের বৃষ্টি নামিয়ে দিল।
Verse 296
कदर्थीकृत्य स मुनिरिषीकाभि: समार्पयत् | उनके भयंकर बाण शत्रुके शरीरको छिल्न-भिन्न कर देनेवाले थे; परंतु मुनिने उन बाणोंका प्रहार करनेवाले दम्भोद्भधवकी कोई परवा न करके सींकोंसे ही उनको बींध डाला
পরশুরাম বললেন—তাকে সম্পূর্ণরূপে অপমানিত করে সেই মুনি তাকে ঋষিকাদের হাতে সঁপে দিলেন। শত্রুর ভয়ংকর তীর দেহ ছিন্নভিন্ন করতে সক্ষম ছিল; কিন্তু মুনি আক্রমণকারী দম্ভোদ্ভবের দম্ভকে তুচ্ছ জেনে, কেবল নলখাগড়ার শলাকাতেই তাকে বিদ্ধ করলেন।
Verse 316
निमित्तवेधी स मुनिरिषीकाभि: समार्पयत् | इस प्रकार लक्ष्यवेध करनेवाले नर मुनिने मायाद्वारा सींकके बाणोंसे ही दम्भोद्धवके सैनिकोंकी आँखों, कानों और नासिकाओंको बींध डाला
লক্ষ্যভেদে অচ্যুত সেই মুনি তীর সংযোজিত করে, মায়াশক্তির দ্বারা কেবল নলখাগড়ার তীরেই দম্ভোদ্ভবের সৈন্যদের চোখ, কান ও নাসিকা বিদ্ধ করলেন।
Verse 326
पादयोर्न्यपतद् राजा स्वस्ति मे$स्त्विति चाब्रवीत् । राजा दम्भोद्धव सींकोंसे भरे हुए समूचे आकाशको श्वेतवर्ण हुआ देखकर मुनिके चरणोंमें गिर पड़े और बोले--“भगवन्! मेरा कल्याण हो'
নলখাগড়ার তীরে ভরা সমগ্র আকাশ শ্বেতবর্ণ হয়ে উঠেছে দেখে রাজা দম্ভোদ্ভব মুনির চরণে লুটিয়ে পড়ল এবং বলল—“ভগবন্! আমার মঙ্গল হোক; আমার কল্যাণ হোক।”
Verse 336
ब्रह्मण्यो भव धर्मात्मा मा च स्मैवं पुनः कृथा: । “राजन्! शरण चाहनेवालोंको शरण देनेवाले भगवान् नरने उनसे कहा--“आजसे तुम ब्राह्मणहितैषी और धर्मात्मा बनो। फिर कभी ऐसा साहस न करना
শরণাগতদের আশ্রয়দাতা ভগবান্ নর বললেন—“আজ থেকে তুমি ব্রাহ্মণহিতৈষী ও ধর্মাত্মা হও; আর কখনও এমন দুঃসাহস কোরো না।”
Verse 433
मात्सर्याहंकृती चैव क्रमादेव उदाह्वता: । इन अस्त्रोंसे विद्ध होनेपर सभी मनुष्य मृत्युको प्राप्त होते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मान, मात्सर्य और अहंकार--ये क्रमश: आठ दोष बताये गये हैं, जिनके प्रतीकस्वरूप उपयुक्त आठ अस्त्र हैं
মাত্সর্য ও অহংকারও ক্রমানুসারে উল্লিখিত। এই ‘অস্ত্র’-সমূহে বিদ্ধ হলে প্রত্যেক মানুষ মৃত্যুকে প্রাপ্ত হয়। কাম, ক্রোধ, লোভ, মোহ, মদ, মান, মাত্সর্য ও অহংকার—এগুলি ক্রমে আটটি দোষ; আর উক্ত আট অস্ত্র তাদেরই প্রতীক।
Whether Duryodhana should continue a policy of refusal grounded in pride and perceived strength, or adopt conciliation grounded in rājadharma, acknowledging mortality, karmic consequence, and the comparative strength of opponents.
All embodied power is transient within cyclical time; therefore governance should be guided by restraint, accountability, and negotiated order rather than overconfidence in force or status.
No formal phalaśruti is stated here; the meta-function is didactic—embedding policy counsel within cosmological impermanence and an illustrative itihāsa to shape the listener’s judgment about prudent rulership.