
इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम् (Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning)
Upa-parva: Indra–Triśiras–Vṛtra Itihāsa (embedded exemplum)
Yudhiṣṭhira asks how Indra, despite being a great sovereign accompanied by his consort, encountered intense distress. Śalya replies with an ancient itihāsa: Tvaṣṭṛ creates his son Triśiras (Viśvarūpa), an ascetic of formidable tapas and unusual three-faced form. Triśiras combines Vedic study, sensory discipline, and extraordinary perception; observing this, Indra becomes anxious that Triśiras may eclipse him. Indra first orders apsarases to lure Triśiras into kāmabhoga, but they fail because Triśiras retains self-control. Indra then resolves on lethal action, hurling the vajra to strike Triśiras down, yet remains unsettled by the fallen ascetic’s radiance. Indra commands Takṣā to sever Triśiras’s heads; Takṣā hesitates on ethical grounds (fear of blame and brahmahatyā), but complies after Indra asserts authority and promises ritual privilege. From the severed heads emerge birds (kapiñjala, tittiri, kalaviṅka) corresponding to Triśiras’s distinct mouths and practices. Learning of his son’s death, Tvaṣṭṛ, enraged, performs a rite to produce Vṛtra for Indra’s destruction, instructing him as “indraśatru.” Vṛtra grows to cosmic scale and battles Indra, even swallowing him; the gods create jṛmbhikā, enabling Indra’s escape when Vṛtra yawns, establishing yawning as a creaturely condition. The struggle continues as the devas seek counsel, moving toward Viṣṇu for a solution to Vṛtra’s defeat.
Chapter Arc: युधिष्ठिर शल्य से पूछते हैं—इन्द्र जैसे देवश्रेष्ठ ने किस प्रकार त्रिशिरा (विश्वरूप) का वध किया, वृत्रासुर कैसे उत्पन्न हुआ, और उस संग्राम में देवता कैसे पराजित हुए। → शल्य पुरातन आख्यान सुनाते हैं: प्रजापति त्वष्टा के तेजस्वी पुत्र विश्वरूप/त्रिशिरा का उदय, उसकी त्रिमुखी भयानक दीप्ति, इन्द्र का बढ़ता संदेह और भय, तथा ‘दुर्बल दिखने वाला भी शत्रु बढ़ जाए तो उपेक्षणीय नहीं’—इस नीति से प्रेरित होकर इन्द्र का वध-निश्चय। अप्सराओं को त्रिशिरा के समीप भेजकर उसे विचलित करने और अवसर साधने की योजना बनती है। → इन्द्र निर्णायक होकर वज्र-प्रहार का संकल्प करता है और त्रिशिरा-वध की ओर बढ़ता है; त्रिशिरा के मुखों/तेज से दिशाएँ मानो पीती हुई देखी जाती हैं—और उसी भयावह क्षण में देव-दानव संघर्ष का भाग्य पलटने लगता है। → त्रिशिरा-वध के परिणामस्वरूप त्वष्टा का क्रोध भड़कता है और उसी प्रतिशोध से वृत्रासुर की उत्पत्ति तथा इन्द्र-वृत्र युद्ध की भूमिका बनती है; संग्राम की उग्रता के बाद इन्द्र पीछे हटता है और देवताओं में गहरा विषाद छा जाता है—देवपक्ष की पराजय का संकेत स्पष्ट हो उठता है। → वृत्रासुर के उदय के साथ प्रश्न लटकता है—क्या इन्द्र अपने ही कर्म-फल (ब्रह्महत्या/अधर्म-आश्रित उपाय) के भार से मुक्त होकर विजय पा सकेगा, या देवता और अधिक पतन की ओर जाएंगे?
Verse 1
अपन हू< बछ। है २ >> नवमो<्ध्याय: इन्द्रके द्वारा त्रिेशिराका वध
যুধিষ্ঠির বললেন—রাজেন্দ্র! মহামনা ইন্দ্র কীভাবে পত্নীসহ পরম ভয়ংকর দুঃখ লাভ করেছিলেন? আমি তা জানতে চাই।
Verse 2
शल्य उवाच शृणु राजन् पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम् । सभार्येण यथा प्राप्तं दु:खमिन्द्रेण भारत
শল্য বললেন—রাজন, শোনো; এটি প্রাচীন কালের এক পুরাতন ইতিহাস। হে ভারতবংশীয়, ইন্দ্র কীভাবে পত্নীসহ দুঃখ লাভ করেছিলেন, আমি তা বর্ণনা করছি—শোনো।
Verse 3
त्वष्टा प्रजापतिहासीद् देवश्रेष्ठोी महातपा: । स पुत्र वै त्रिशिरसमिन्द्रद्रोहात् किलासृजत्
ত্বষ্টা নামে এক প্রজাপতি ছিলেন—দেবতাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং মহাতপস্বী। কথিত আছে, ইন্দ্রের প্রতি বৈরভাব জন্মানোয় তিনি ত্রিশিরা নামে ত্রিমস্তক এক পুত্র সৃষ্টি করেছিলেন।
Verse 4
ऐन्द्रं स प्रार्थयत् स्थान विश्वरूपो महाद्युति: । तैस्त्रिभिवदनैघोरि: सूर्येन्दुज्वलनोपमै:
শল্য বললেন—বিশ্বরূপ নামে সেই মহাতেজস্বী বালক ইন্দ্রের ঐশ্বর্য-আসন লাভের প্রার্থনা করত। সূর্য, চন্দ্র ও অগ্নির ন্যায় দীপ্ত ও ভয়ংকর তার তিন মুখ দিয়ে সে সেই পরম পদ কামনা করত।
Verse 5
वेदानेकेन सो5धीते सुरामेकेन चापिबत् । एकेन च दिश: सर्वा: पिबन्निव निरीक्षते
এক মুখে সে বেদ অধ্যয়ন করত, অন্য মুখে সুরা পান করত; আর তৃতীয় মুখে সে সর্বদিকের দিকে এমনভাবে তাকাত, যেন দিকগুলোকেই গিলে-পান করবে।
Verse 6
स तपस्वी मृदुर्दान्तो धर्मे तपसि चोद्यत: । तपस्तस्य महत् तीव्र सुदुश्चवरमरिंदम
শত্রুদমন! ত্বষ্টার সেই পুত্র কোমলস্বভাব, তপস্বী, ইন্দ্রিয়জয়ী এবং ধর্ম ও তপস্যায় সদা উদ্যত ছিল। তার মহান ও তীব্র তপ অন্যদের পক্ষে অত্যন্ত দুরূহ ছিল।
Verse 7
तस्य दृष्टवा तपोवीर्य सत्यं चामिततेजस: । विषादमगमच्छक्र इन्द्रोडयं मा भवेदिति,उस अमिततेजस्वी बालकका तपोबल तथा सत्य देखकर इन्द्रको बड़ा दुःख हुआ। वे सोचने लगे, “कहीं यह इन्द्र न हो जाय
সেই অমিততেজস্বী বালকের তপোবল ও সত্য দেখে শক্র ইন্দ্র গভীর বিষাদে নিমগ্ন হলেন। তিনি ভাবতে লাগলেন—“এ যেন ইন্দ্র না হয়ে ওঠে।”
Verse 8
इस प्रकार श्रीमह्या भारत उद्योगपवकि अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें शल्यवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ
“কোন উপায়ে তাকে ভোগে আসক্ত করা যায়, যাতে সে মহাতপ না করে? কারণ শক্তিতে বৃদ্ধি পেলে ত্রিশিরা তো সমগ্র ভুবনকেই গ্রাস করবে।”
Verse 9
इति संचिन्त्य बहुधा बुद्धिमान् भरतर्षभ । आज्ञापयत् सो5प्सरसस्त्वष्टपुत्रप्रलो भने
এইভাবে নানা দিক থেকে চিন্তা করে, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, জ্ঞানী ইন্দ্র ত্বষ্টার পুত্রকে প্রলোভিত করার জন্য অপ্সরাদের আদেশ দিলেন।
Verse 10
यथा स सज्जेत् त्रिशिरा: कामभोगेषु वै भृशम् । क्षिप्रं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत मा चिरम्
যেন ত্রিশিরা কামভোগে অত্যন্ত আসক্ত হয়ে পড়ে—তোমরা দ্রুত সেই চেষ্টা করো। যাও, তাকে প্রলোভিত করো; বিলম্ব কোরো না।
Verse 11
शुज्भारवेषा: सुश्रोण्यो हारैर्युक्ता मनोहरै: । हावभावसमायुक्ता: सर्वा: सौन्दर्यशोभिता:
শুভ অলংকার ও শৃঙ্গারোচিত বেশে সজ্জিত, মনোহর হার পরিহিতা, হাবভাব-সমন্বিতা, সৌন্দর্যে দীপ্ত সকল সুস্রোণী নারীগণ—(যাও)।
Verse 12
प्रलोभयत भद्ठे व: शमयध्वं भयं मम । अस्वस्थं हात्मना55त्मानं लक्षयामि वराड़ना: । भयं तन्मे महाघोरें क्षिप्रं नाशयताबला:
হে ভদ্রা নারীগণ, তাকে প্রলোভিত করো এবং আমার ভয় প্রশমিত করো। হে বরাঙ্গনা, আমি অন্তরে নিজের মনকে অস্থির দেখছি; অতএব, হে কোমলাঙ্গীরা, আমার এই মহাঘোর ভয় দ্রুত নাশ করো।
Verse 13
अप्सरस ऊचु: तथा यत्नं करिष्याम: शक्र तस्य प्रलोभने । यथा नावाप्स्यसि भयं तस्माद् बलनिषूदन
অপ্সরারা বলল—হে শক্র, হে বলনিষূদন! আমরা তাকে প্রলোভিত করতে এমনই চেষ্টা করব, যাতে তার পক্ষ থেকে আপনার কোনো ভয় না থাকে।
Verse 14
निर्दहन्निव चक्षु्भ्या योडसावास्ते तपोनिधि: । त॑ प्रलोभयितुं देव गच्छाम: सहिता वयम्
শল্য বললেন—ওই তপোনিধি সেখানে বসে আছেন, যেন চোখের দৃষ্টিতেই দহন করছেন। হে দেব! তাঁর সংকল্প ভাঙাতে আমরা সকলে একসঙ্গে যাই।
Verse 15
यतिष्यामो वशे कर्तु व्यपनेतुं च ते भयम् । देव! जो तपोनिधि विश्वरूप अपने दोनों नेत्रोंसे सबको दग्ध करते हुए-से विराज रहे हैं, उन्हें प्रलोभनमें डालनेके लिये हम सब अप्सराएँ एक साथ जा रही हैं। वहाँ उन्हें वशमें करने तथा आपके भयको दूर हटानेके लिये हम पूर्ण प्रयत्न करेंगी ।।
শল্য বললেন—হে রাজন! ইন্দ্রের অনুমতি পেয়ে সেই অপ্সরাগণ ত্রিশিরার নিকটে গেল। সেখানে তারা নানা ভঙ্গি-ভাৱ ও চাহনিতে তাকে প্রলুব্ধ করতে চাইল। তবু সেই মহাতপস্বী ইন্দ্রিয়সংযম করে পূর্বসাগরের ন্যায় শান্ত ও অচঞ্চল রইলেন।
Verse 16
नित्यं संदर्शयामासुस्तथैवाड्रेषु सौष्ठवम् । नाभ्यगच्छत् प्रहर्ष ता: स पश्यन् सुमहातपा:
তারা প্রতিদিনই নিজেদের অঙ্গসৌষ্ঠব প্রদর্শন করত; কিন্তু তাদের দেখেও সেই মহাতপস্বী এক বিন্দুও হর্ষে আন্দোলিত হলেন না।
Verse 17
तास्तु यत्नं परं कृत्वा पुन: शक्रमुपस्थिता:
কিন্তু তারা সর্বোচ্চ চেষ্টা করে পুনরায় শক্র (ইন্দ্র)-এর কাছে উপস্থিত হল।
Verse 18
कृताञ्जलिपुटा: सर्वा देवराजमथाब्रुवन् न स शक्य: सुदुर्थर्षो चैर्याच्चालयितुं प्रभो
তারা সকলেই করজোড়ে দেবরাজকে বলল—হে প্রভু! তিনি বিচলিত হন না। তিনি অতি দুর্ধর্ষ; কেবল কৌশল বা সাধারণ প্রচেষ্টায় তাঁকে পথচ্যুত করা যায় না।
Verse 19
यत् ते कार्य महाभाग क्रियतां तदनन्तरम् । वे सब अप्सराएँ (त्रेशिराको विचलित करनेका) पूरा प्रयत्न करके पुनः देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं--'प्रभो! वे त्रिशिरा बड़े दुर्धर्ष तपस्वी हैं
মহাভাগ! আপনার মনে যে কার্য আছে, তা অবিলম্বে সম্পন্ন করুন। অপ্সরাদের যথোচিত সম্মান করে বিদায় দিয়ে মহামতি শক্র (ইন্দ্র) নিজ কর্মে প্রবৃত্ত হলেন।
Verse 20
स तूष्णीं चिन्तयन् वीरो देवराज: प्रतापवान्
তখন প্রতাপশালী দেবরাজ বীর ইন্দ্র নীরবে চিন্তায় নিমগ্ন হলেন।
Verse 21
विनिश्चितमतिर्धीमान् वधे त्रेशिरसो5भवत् | प्रतापी वीर बुद्धिमान् देवराज इन्द्र चुपचाप सोचते हुए त्रिशिराके वधके विषयमें एक निश्चयपर पहुँच गये ।। वज्रमस्य क्षिपाम्यद्य स क्षिप्रं न भविष्यति
বুদ্ধিমান দেবরাজ ইন্দ্র ত্রিশিরার বধ বিষয়ে স্থির সিদ্ধান্তে উপনীত হলেন। বললেন—“আজই আমি তার উপর বজ্র নিক্ষেপ করব; সে আর বেশিক্ষণ টিকবে না।”
Verse 22
शास्त्रबुद्ध्या विनिश्ित्य कृत्वा बुद्धि वधे दृढाम्ू
শাস্ত্রসম্মত বুদ্ধিতে বিচার করে ত্রিশিরার বধের দৃঢ় সংকল্প করে, ক্রোধে দগ্ধ ইন্দ্র অগ্নিসদৃশ দীপ্ত, ভয়ংকর ও ঘোর বজ্র ত্রিশিরার দিকে নিক্ষেপ করলেন। সেই বজ্রের গভীর আঘাতে ত্রিশিরা নিহত হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল—যেন বজ্রাঘাতে ভেঙে পড়া পর্বতশৃঙ্গ মাটিতে পতিত হয়েছে।
Verse 23
अथ वैश्वानरनिभं घोररूपं भयावहम् । मुमोच वज् संक्रुद्ध: शक्रस्त्रिशिरसं प्रति
তখন ক্রোধে উন্মত্ত শক্র (ইন্দ্র) বৈশ্বানরের ন্যায় দীপ্ত, ঘোররূপ ও ভয়ংকর বজ্র ত্রিশিরার দিকে নিক্ষেপ করলেন।
Verse 24
स पपात हतस्तेन वज्नेण दृढ्माहत:ः । पर्वतस्येव शिखर प्रणुन्नं मेदिनीतले
সেই বজ্রের কঠোর আঘাতে ভীষণভাবে আহত হয়ে সে নিহত হয়ে মাটিতে লুটিয়ে পড়ল—যেন বজ্রাঘাতে ভেঙে পড়া পর্বতশিখর ভূমিতে আছড়ে পড়েছে।
Verse 25
त॑ तु वजहतं दृष्टया शयानमचलोपमम् । न शर्म लेभे देवेन्द्रो दीपितस्तस्य तेजसा
বজ্রাহত হয়ে পর্বতের মতো নিশ্চল হয়ে পড়ে থাকা তাকে দেখে দেবেন্দ্র ইন্দ্রেরও শান্তি হল না; পতিত সেই বীরের তেজে তিনি যেন দগ্ধ হচ্ছিলেন।
Verse 26
हतो<पि दीप्ततेजा: स जीवन्निव हि दृश्यते । घातितस्य शिरांस्थाजौ जीवन्तीवाद्भुतानि वै
নিহত হয়েও সেই দীপ্ততেজা ব্যক্তি যেন জীবিতই দেখা যাচ্ছিল; নিহতের মস্তকগুলিও যেন প্রাণবান—এ সত্যিই বিস্ময়কর।
Verse 27
क्योंकि वे मारे जानेपर भी अपने तेजसे उद्दीप्त होकर जीवित-से दिखायी देते थे। युद्धमें मारे हुए त्रिशिराके तीनों सिर जीते-जागते-से अद्भुत प्रतीत हो रहे थे ।।
মারা গিয়েও তারা নিজ তেজে উদ্দীপ্ত হয়ে যেন জীবিতই দেখা দিচ্ছে, আর রণক্ষেত্রে ত্রিশিরার তিনটি মস্তকও জীবন্তের মতো বিস্ময়কর—এ দেখে শক্র ইন্দ্র ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে গভীর চিন্তায় বসে রইলেন। ঠিক তখনই কাঁধে কুঠার নিয়ে এক ছুতোর সেখানে এসে উপস্থিত হল।
Verse 28
तदरण्यं महाराज यत्रास्तेडसौ निपातितः । स भीततस्तत्र तक्षाणं घटमानं शचीपति:
হে মহারাজ! যে অরণ্যে সে নিহত হয়ে পড়ে ছিল, সেই অরণ্যেই সেই ছুতোর এল। সেখানে ভীত শচীপতি ইন্দ্র তাকে কাজ করতে দেখলেন।
Verse 29
अपश्यदब्रवीच्चैनं सत्वरं पाकशासन: । क्षिप्रं छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम
তাকে সেখানে দেখে পাকশাসন ইন্দ্র তৎক্ষণাৎ তাড়াহুড়ো করে বললেন— “শীঘ্রই এর মস্তকগুলি ছিন্ন কর; এক মুহূর্তও বিলম্ব কোরো না। মহারাজ! আমার আদেশ পালন কর।”
Verse 30
तक्षोवाच महास्कन्धो भृशं होष परशुर्न भविष्यति । कर्तु चाहं न शक्ष्यामि कर्म सद्धिर्विगर्हितम्
বড়ই বলল— “এর কাঁধ অতি বৃহৎ ও ভারী; আমার কুঠার এতে কাজ দেবে না। আর এভাবে কোনো প্রাণীকে হত্যা করা সজ্জনদের নিন্দিত পাপকর্ম; অতএব আমি তা করতে পারব না।”
Verse 31
इन्द्र वाच मा भैस्त्वं शीघ्रमेतद् वै कुरुष्व वचनं मम । मत्प्रसादाद्धि ते शस्त्र वजकल्पं भविष्यति
ইন্দ্র বললেন— “ভয় কোরো না, হে বড়ই। শীঘ্রই আমার আদেশ পালন কর। আমার প্রসাদে তোমার এই অস্ত্র—কুঠার—বজ্রসম হবে।”
Verse 32
तक्षोवाच क॑ भवन्तमहं विद्यां घोरकर्माणमद्य वै । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्वेन कथयस्व मे
তক্ষ বলল— “আজ এই ভয়ংকর কর্ম করাতে যিনি উদ্যত, তিনি কে—আমি কীভাবে জানব? আমি সত্যরূপে শুনতে চাই; যথাযথভাবে আমাকে বলুন।”
Verse 33
बढ़ईने पूछा--आज इस प्रकार भयानक कर्म करनेवाले आप कौन हैं, यह मैं कैसे समझूँ? मैं आपका परिचय सुनना चाहता हूँ। यह यथार्थरूपसे बताइये ।।
ইন্দ্র বললেন— “হে তক্ষ, জেনে রাখো—আমি দেবরাজ ইন্দ্র। আমি যেমন বলেছি তেমনই অবিলম্বে কর; আর বিলম্ব করে ভাবনা-চিন্তা কোরো না।”
Verse 34
तक्षोवाच क्रूरेण नापत्रपसे कथं शक्रेह कर्मणा । ऋष्िपुत्रमिमं हत्वा ब्रह्म॒हत्याभयं न ते
Takṣa said: “O Śakra (Indra), how do you feel no shame here for this cruel deed? Having slain this son of a ṛṣi, do you not fear the dread of brahmahatyā—the sin incurred by killing a brahmin?”
Verse 35
शक्र उवाच पश्चाद् धर्म चरिष्यामि पावनार्थ सुदुश्चरम् । शत्रुरेष महावीरयों वज्ेण निहतो मया
Śakra (Indra) said: “After this, for the sake of purification, I shall undertake a dharma-observance that is exceedingly difficult. This was my mighty and powerful enemy, whom I have slain with the thunderbolt.”
Verse 36
अद्यापि चाहमुद्विग्नस्तक्षन्नस्माद् बिभेमि वै । क्षिप्रं छिन्धि शिरांसि त्वं करिष्येडनुग्रहं तव
Even now I remain deeply agitated; I truly fear this Takṣaka. Quickly cut off his heads—then I shall grant you my favor (as a boon).
Verse 37
बढ़ई! यद्यपि यह मारा गया है, तो भी अभीतक मुझे इसका भय बना हुआ है। तू शीघ्र इसके मस्तकोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे। मैं तेरे ऊपर अनुग्रह करूँगा ।।
Śakra said: “Carpenter, although this one has been slain, I still feel fear of him even now. Quickly cut his heads into pieces; I will show you favor. In the dark, violence-centered sacrifices performed by men, they will give you the head of the sacrificial animal as your share. This is my boon to you, carpenter—now swiftly do what pleases me.”
Verse 38
शल्य उवाच एतच्छुत्वा तु तक्षा स महेन्द्रवचनात् तदा । शिरांस्यथ त्रिशिरस: कुठारेणाच्छिनत् तदा
Śalya said: “O King, having heard this, the carpenter then, in accordance with Mahendra’s command, struck with an axe and cut off the heads of Triśiras—splitting them apart.”
Verse 39
निकृत्तेषु ततस्तेषु निष्क्रामन्नण्डजास्त्वथ । कपिज्जलास्तित्तिराश्न कलविड्काश्न सर्वश:,कट जानेपर उनके अंदरसे तीन प्रकारके पक्षी बाहर निकले, कपिंजल, तीतर और गौरैये
তারপর যখন সেগুলি (ডিম) ভেঙে দেওয়া হল, তখন সর্বত্র অণ্ডজ পাখিরা বেরিয়ে এল—কপিঞ্জল, তিতির ও চড়ুই।
Verse 40
येन वेदानधीते सम पिबते सोममेव च । तस्माद् वक्त्राद् विनिश्वेरु: क्षिप्रं तस्प कपिञज्जला:,जिस मुखसे वे वेदोंका पाठ करते तथा केवल सोमरस पीते थे, उससे शीघ्रतापूर्वक कपिंजल पक्षी बाहर निकले थे
যে মুখ দিয়ে সে বেদ পাঠ করত এবং কেবল সোমরস পান করত, সেই মুখ থেকেই দ্রুত কপিঞ্জল পাখিরা বেরিয়ে এল।
Verse 41
येन सर्वा दिशो राजन् पिबन्निव निरीक्षते | तस्माद् वकक्त्राद विनिश्रेरुस्तित्तिरास्तस्य पाण्डव
হে রাজন! যে দৃষ্টিতে সে যেন সমস্ত দিক পান করে নিচ্ছে এমনভাবে তাকাত, সেই মুখ থেকেই—হে পাণ্ডব—তার তিতির পাখিরা বেরিয়ে এল।
Verse 42
यत् सुरापं तु तस्यासीद् वक्त्र॑ त्रेशिरसस्तदा । कलविड्का: समुत्पेतु: श्येनाश्न भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! त्रेशिराका जो मुख सुरापान करनेवाला था, उससे गौरैये तथा बाज नामक पक्षी प्रकट हुए
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই সময় ত্রিশিরার যে মুখ সুরাপানে আসক্ত ছিল, সেই মুখ থেকেই চড়ুই ও শ্যেন (বাজ) প্রভৃতি পাখি উদ্ভূত হল।
Verse 43
ततस्तेषु निकृत्तेषु विज्वरो मघवानथ । जगाम त्रिदिवं हृष्टस्तक्षापि स्वगृहान् ययौ
সেই (তিন) মস্তক কেটে ফেলা হলে মঘবান ইন্দ্রের মানসিক দুশ্চিন্তা দূর হল। তিনি আনন্দিত হয়ে ত্রিদিবে (স্বর্গে) ফিরে গেলেন, আর কাঠমিস্ত্রিও নিজের গৃহে চলে গেল।
Verse 44
(तक्षापि स्वगृहं गत्वा नैव शंसति कस्यचित् | अथैनं नाभिजानन्ति वर्षमेक॑ तथागतम् ।।
শল্য বললেন—সেই কারিগরও নিজের ঘরে ফিরে গেল এবং কাউকে কিছুই বলল না। পূর্ণ এক বছর পর্যন্ত কেউ জানতে পারল না যে ইন্দ্র এই কর্ম করেছেন। বছর পূর্ণ হলে ভগবান পশুপতির ভূতগণ চিৎকার করে উঠল—‘মঘবান, আমাদের প্রভু, ব্রাহ্মণহত্যার দোষী!’ তখন পাকশাসন ইন্দ্র ব্রহ্মহত্যার পাপ থেকে মুক্ত হতে কঠোর ব্রত গ্রহণ করলেন। দেবগণ ও মরুদ্গণের সঙ্গে তিনি তপস্যায় যুক্ত হলেন। তিনি সেই ব্রহ্মহত্যাকে সমুদ্র, পৃথিবী, বৃক্ষরাজি ও নারীগোষ্ঠীর মধ্যে ভাগ করে দিলেন এবং তাদের মনঃপূত বর দান করে সন্তুষ্ট করলেন। এভাবে বরদাতা ইন্দ্র পৃথিবী, সাগর, বনস্পতি ও নারীদের বর দিয়ে সেই ব্রহ্মহত্যা নিজের থেকে দূর করলেন। তারপর শুদ্ধ হয়ে, দেবগণের দ্বারা সম্মানিত ও মহর্ষিদের দ্বারা পূজিত হয়ে, ভগবান ইন্দ্র পুনরায় ইন্দ্রপদে অধিষ্ঠিত হলেন।
Verse 45
क्रोधसंरक्तनयन इदं वचनमत्रवीत् | दैत्योंका संहार करनेवाले इन्द्रने शत्रुको मारकर अपने आपको कृतार्थ माना। इधर त्वष्टा प्रजापतिने जब यह सुना कि इन्द्रने मेरे पुत्रको मार डाला है
ত্বষ্টা বললেন—আমার পুত্র সর্বদা তপস্যায় রত ছিল; সে সহিষ্ণু, ক্ষমাশীল, সংযমী এবং ইন্দ্রিয়জয়ী। তবু কোনো অপরাধ না থাকা সত্ত্বেও ইন্দ্র আমার পুত্রকে বধ করেছে।
Verse 46
तस्माच्छक्रविनाशाय वृत्रमुत्पादयाम्यहम् । लोकाः पश्यन्तु मे वीर्य तपसश्न॒ बल॑ महत्
অতএব শক্র (ইন্দ্র)-বিনাশের জন্য আমি বৃত্রকে উৎপন্ন করব। লোকসমূহ আমার বীর্য এবং তপস্যার মহাশক্তি প্রত্যক্ষ করুক।
Verse 47
सच पश्यतु देवेन्द्रो दुरात्मा पापचेतन: । उपस्पृश्य ततः क्रुद्धस्तपस्वी सुमहायशा:
আর সেই দুরাত্মা, পাপচেতনা দেবেন্দ্রও আমার মহৎ তপোবল দেখুক। এ কথা বলে ক্রোধে দগ্ধ, তপস্বী ও মহাযশস্বী ত্বষ্টা আচমন করলেন।
Verse 48
अग्नौ हुत्वा समुत्पाद्य घोर वृत्रमुवाच ह । इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रभावात् तपसो मम
অগ্নিতে আহুতি দিয়ে তিনি ভয়ংকর বৃত্রকে উৎপন্ন করলেন এবং তাকে বললেন—“ইন্দ্রশত্রু! আমার তপস্যার প্রভাবে তুমি প্রবল হয়ে বৃদ্ধি পাও।”
Verse 49
सो<वर्धत दिवं स्तब्ध्वा सूर्यवैश्वानरोपम: । कि करोमीति चोवाच कालसूर्य इवोदित:
ওই কথা উচ্চারিত হতেই সূর্য ও বৈশ্বানর অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান বৃত্রাসুর আকাশকে স্তম্ভিত করে সমগ্র গগন আচ্ছাদিত করে মহাকায় হয়ে উঠল। সে যেন প্রলয়কালের উদিত সূর্য। তারপর সে জিজ্ঞাসা করল— “পিতা, আমি কী করব?”
Verse 50
] ॥। फि ॥// ।॑ !!/ | / |
তখন ত্বষ্টা তাকে বললেন— “শক্র (ইন্দ্র)কে বধ কর।” সেই আদেশে বৃত্র স্বর্গলোকে উঠল। অতঃপর বৃত্র ও বাসব (ইন্দ্র)-এর মধ্যে মহাভয়ংকর যুদ্ধ শুরু হল।
Verse 51
संक़रुद्धयोर्महाघोरं प्रसक्ते कुरुसत्तम । ततो जग्राह देवेन्द्र वत्रो वीर: शतक्रतुम्
হে কুরুশ্রেষ্ঠ, উভয়ে ক্রোধে দগ্ধ হয়ে যখন ভয়ংকর যুদ্ধে প্রবৃত্ত হল, তখন বীর বৃত্র দেবেন্দ্র শতক্রতু ইন্দ্রকে ধরে ফেলল।
Verse 52
अपावृत्याक्षिपद् वकत्रे शक्रं कोपसमन्वित: । ग्रस्ते वृत्रेण शक्रे तु सम्भ्रान्तास्त्रिदिवेश्वरा:
ক্রোধে উন্মত্ত বৃত্র মুখ বিস্তার করে শক্র (ইন্দ্র)কে ধরে তার চোয়ালে নিক্ষেপ করল। বৃত্র যখন ইন্দ্রকে গিলে ফেলল, তখন স্বর্গের অধিপতি দেবগণ আতঙ্কিত হয়ে পড়ল।
Verse 53
असृजंस्ते महासत्त्वा जृम्भिकां वृत्रनाशिनीम् । विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्थादपावृतात्
তখন সেই মহাসত্ত্বশালী দেবগণ বৃত্রনাশিনী ‘জৃম্ভিকা’ শক্তির সৃষ্টি করলেন। পরে বৃত্র যখন হাই তুলে মুখ প্রসারিত করল, তখন বলনাশক দেবেন্দ্র ইন্দ্র অঙ্গ সঙ্কুচিত করে সেই উন্মুক্ত মুখ থেকে বেরিয়ে এলেন। সেই ঘটনার পর থেকেই সকল জীবের শ্বাস-প্রশ্বাসে হাই তোলার শক্তি বাস করতে লাগল।
Verse 54
स्वान्यड्रान्यभिसंक्षिप्य निष्क्रान्तो बलनाशन: । ततः प्रभूृति लोकस्य जृम्भिका प्राणसंश्रिता
শল্য বললেন—শত্রুবল-নাশক ইন্দ্র নিজের অঙ্গসমূহ সঙ্কুচিত করে, নিজেকে গুটিয়ে নিয়ে তার মুখ থেকে বেরিয়ে এলেন। সেই সময় থেকেই সকল জীবের প্রাণবায়ুতে জৃম্ভিকা—হাই তোলার শক্তি—আশ্রয় নিল।
Verse 55
जद्वषुश्न सुरा: सर्वे शक्रं दृष्टवा विनि:सृतम् । ततः प्रववृते युद्ध वृत्रवासवयो: पुन:,इन्द्रको उसके मुखसे निकला हुआ देख सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। तदनन्तर वृत्रासुर तथा इन्द्रमें पुनः युद्ध होने लगा
শুষ্ণসহ সকল দেবতা যখন শক্র (ইন্দ্র)-কে তার মুখ থেকে বেরিয়ে আসতে দেখল, তখন তারা পরম আনন্দিত হল। তারপর বৃত্র ও বাসব (ইন্দ্র)-এর মধ্যে পুনরায় যুদ্ধ শুরু হল।
Verse 56
संरब्धयोस्तदा घोर सुचिरं भरतर्षभ । यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो बलसमन्वित:
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! ক্রোধে উন্মত্ত সেই দুই বীরের ভয়ংকর সংগ্রাম বহুক্ষণ চলল। যখন বলসমন্বিত বৃত্র রণে আরও প্রবল হয়ে উঠল, তখন ইন্দ্র যুদ্ধ থেকে বিমুখ হলেন; ইন্দ্র সরে যেতেই সকল দেবতা শোকে আচ্ছন্ন হল।
Verse 57
त्वष्टस्तेजोबलाविद्धस्तदा शक्रो न्यवर्तत । निवृत्ते च तदा देवा विषादमगमन् परम्
শল্য বললেন—তখন ত্বষ্টৃ-প্রদত্ত তেজ ও বলের আঘাতে পরাভূত হয়ে শক্র (ইন্দ্র) যুদ্ধ থেকে ফিরে গেলেন। আর তিনি সরে যেতেই, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, দেবতারা গভীর বিষাদে নিমজ্জিত হল।
Verse 58
समेत्य सह शक्रेण त्वष्टस्तेजोविमोहिता: । आमन्त्रयन्त ते सर्वे मुनिभि: सह भारत
শল্য বললেন—হে ভারত! ত্বষ্টৃর তেজে বিমোহিত সেই সকল দেবতা শক্র (ইন্দ্র)-এর সঙ্গে একত্র হল এবং মুনিদের সহিত পরামর্শ করতে লাগল—“এখন আমাদের কী করা উচিত?”
Verse 59
कि कार्यमिति वै राजन् विचिन्त्य भयमोहिता: । जग्मु: सर्वे महात्मानं मनोभिर्विष्णुमव्ययम् । उपविष्टा मन्दराग्रये सर्वे वृत्रवधेप्सव:
‘হে রাজন, এখন কী করা উচিত?’—ভয়ে বিমূঢ় হয়ে তারা পরামর্শ করতে লাগল। তারপর সকলেই অন্তরে মহাত্মা, অব্যয় বিষ্ণুর শরণ নিল। বৃত্রবধের অভিলাষে তারা মন্দর পর্বতের শিখরে একাগ্রচিত্তে উপবিষ্ট হল।
Verse 166
इन्द्रियाणि वशे कृत्वा पूर्वसागरसंनिभ: । शल्य बोले--राजन्! इन्द्रकी आज्ञा पाकर वे सब अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं। वहाँ उन सुन्दरियोंने भाँति-भाँतिके हाव-भावोंद्वारा उन्हें लुभानेका प्रयत्न किया तथा प्रतिदिन विश्वरूपको अपने अंगोंके सौन्दर्यका दर्शन कराया। तथापि वे महातपस्वी महर्षि उन सबको देखते हुए हर्ष आदि विकारोंको नहीं प्राप्त हुए; अपितु वे इन्द्रियोंको वशमें करके पूर्वसागरके समान शान्तभावसे बैठे रहे
শল্য বললেন—ইন্দ্রিয়কে বশে এনে তিনি পূর্বসাগরের মতো শান্ত রইলেন। ইন্দ্রের আদেশে অপ্সরারা ত্রিশিরার কাছে গেল; নানা ভঙ্গি-ভাৱভঙ্গিতে তাকে প্রলোভিত করতে চাইল এবং প্রতিদিন বিশ্বরূপকে তাদের অঙ্গসৌন্দর্য দেখাল। তবু সেই মহাতপস্বী মহর্ষি, তাদের দেখেও, হর্ষ প্রভৃতি বিকারে পতিত হলেন না; ইন্দ্রিয়জয়ে তিনি পূর্বসাগরের ন্যায় অচঞ্চল প্রশান্তিতে উপবিষ্ট রইলেন।
Verse 196
चिन्तयामास तस्यैव वधोपायं युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! तब परम बुद्धिमान् इन्द्रने अप्सराओंका आदर-सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया और वे त्रिशिराके वधका उपाय सोचने लगे
শল্য বললেন—হে যুধিষ্ঠির, পরম বুদ্ধিমান ইন্দ্র অপ্সরাদের সম্মান করে বিদায় দিলেন এবং সেই ব্যক্তির বধের উপায়ই চিন্তা করতে লাগলেন।
Verse 216
शत्रुः प्रवृद्धो नोपेक्ष्यो दुर्बलोडपि बलीयसा। (उन्होंने सोचा--) “आज मैं त्रिशिरापर वज्रका प्रहार करूँगा
শল্য বললেন—“শত্রু বৃদ্ধি পেলে, সে দুর্বল হলেও, শক্তিমান ব্যক্তির উচিত তাকে অবহেলা না করা।” এই ভেবে সে স্থির করল—“আজ আমি ত্রিশিরার উপর বজ্রাঘাত করব, যাতে সে তৎক্ষণাৎ বিনষ্ট হয়।”
The central dilemma is whether perceived future risk justifies preemptive harm against a disciplined ascetic who is not shown committing an immediate offense; the narrative juxtaposes security logic with the moral and ritual liabilities of unjust violence.
Fear-driven governance that substitutes coercion for ethical deliberation can amplify instability: attempts to control power through seduction and then force create moral debt and retaliation, turning private anxiety into systemic crisis.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the chapter’s meta-function is exemplum-based—using etiological and moral causality to frame later political counsel within Udyoga-parva’s broader discourse on decision-making and consequence.