Adhyaya 162
Udyoga ParvaAdhyaya 16258 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; दोनों पक्षों में युद्ध-तैयारी और मनोबल-प्रदर्शन तीव्र।

Adhyaya 162

भीष्मस्य सेनापत्यप्रतिज्ञा तथा रथसंख्यावर्णनम् | Bhishma Accepts Command and Enumerates Kaurava Strength

Upa-parva: Bhīṣma–Senāpatyābhiṣeka (Appointment and Assurance of Bhīṣma as Commander)

Dhṛtarāṣṭra opens with a diagnostic question to Saṃjaya: after Arjuna (Phalguna) has vowed Bhīṣma’s death, what did Duryodhana and the princes do, and how did Bhīṣma respond? Vaiśaṃpāyana frames Saṃjaya’s comprehensive report. Saṃjaya narrates that Bhīṣma, having obtained the Kaurava command, addresses Duryodhana with deferential formality and operational certainty: he will serve as senāpati, he is proficient in army-work and multiple vyūhas, and he will employ large-scale, even ‘daiva/gāndharva/mānuṣa’ style formations to disorient the Pāṇḍavas, thereby easing the king’s anxiety. Duryodhana replies that he fears no opponent when Bhīṣma and Droṇa stand in leadership, and he requests a detailed accounting of chariot numbers and atirathas on both sides. Bhīṣma begins enumerating the Kaurava order of battle: Duryodhana and his brothers as front-line chariot fighters trained in multiple combat modalities; then named elites—Kṛtavarmā as a decisive atiratha, Śalya as a major chariot champion rivaling Vāsudeva in confidence, Bhūriśravā as a powerful ally, and Jayadratha as a formidable fighter motivated by prior humiliation and empowered by austerity-derived boons. The chapter’s thematic center is institutional readiness: reassurance, quantification of strength, and the rhetoric of capability under looming ethical and strategic uncertainty.

Chapter Arc: दुर्योधन के दर्पपूर्ण वचनों को सुनते ही अर्जुन की आँखें क्रोध से लाल हो उठती हैं; सभा का वायु-सा ताप बढ़ जाता है और उलूक पर सबकी दृष्टि टिक जाती है। → गुडाकेश अर्जुन के साथ-साथ भीम, विराट, द्रुपद और शिखण्डी—एक-एक कर उलूक को प्रत्युत्तर देते हैं; वे दुर्योधन की ‘उधार की वीरता’ (शकुनि/कर्ण/भीष्म आदि के बल पर) पर प्रहार करते हुए उसे कापुरुषता, शठता और अधर्म-आचरण का दर्पण दिखाते हैं। → भीम का तीखा आदेश—‘उलूक, मेरे वचन सुयोधन तक पहुँचा’—और वरिष्ठ राजाओं (विराट-द्रुपद) तथा शिखण्डी की कठोर नसीहत मिलकर दूत-वार्ता को युद्ध-घोष के स्वर में बदल देती है; पाण्डव पक्ष स्पष्ट कर देता है कि भय नहीं, प्रतिशोध और धर्म-प्रतिज्ञा ही उत्तर है। → उलूक के संदेश का प्रत्युत्तर देकर पाण्डवों की मनःस्थिति स्थिर और युद्धोन्मुख हो जाती है; उधर कर्ण के आदेश से दूत रथों, ऊँटों और तीव्र अश्वों पर सेना में दौड़ते हैं—प्रातःकाल से पूर्व ‘योग’ (युद्ध-व्यवस्था/समवाय) का आदेश प्रसारित होता है। → रात्रि के भीतर दोनों पक्षों की सेनाएँ सजने लगती हैं—अगला प्रहर किसके लिए निर्णायक संकेत लाएगा?

Shlokas

Verse 1

संजय कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! दुर्योधनके पूर्वोक्त वचनको सुनकर महायशस्वी अर्जुनने क्रोधसे लाल आँखें करके शकुनिकुमार उलूककी ओर देखा। तत्पश्चात्‌ अपनी विशाल भुजाको ऊपर उठाकर श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए उन्होंने कहा--

সঞ্জয় বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! দুর্যোধনের পূর্বোক্ত বাক্য শুনে মহাযশস্বী অর্জুন ক্রোধে রক্তচক্ষু হয়ে শকুনিপুত্র উলূকের দিকে তাকালেন। তারপর তিনি নিজের বিশাল বাহু উঁচু করে, শ্রীকৃষ্ণের দিকে দৃষ্টি স্থির রেখে, মহাবাহু অর্জুন সেই সময় এই কথা বললেন।

Verse 2

स केशवमभिप्रेक्ष्य गुडाकेशो महायशा: । अभ्यभाषत कैततव्यं प्रगृह्य विपुलं भुजम्‌,संजय कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! दुर्योधनके पूर्वोक्त वचनको सुनकर महायशस्वी अर्जुनने क्रोधसे लाल आँखें करके शकुनिकुमार उलूककी ओर देखा। तत्पश्चात्‌ अपनी विशाल भुजाको ऊपर उठाकर श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए उन्होंने कहा--

কেশবের দিকে চেয়ে মহাযশস্বী গুড়াকেশ অর্জুন নিজের বিশাল বাহু তুলে, সময়োপযোগী এই বাক্য উচ্চারণ করলেন।

Verse 3

स्ववीर्य य: समाश्रित्य समाह्दयति वै परान्‌ | अभीतो युध्यते शत्रून्‌ स वै पुरुष उच्यते,“जो अपने ही बल-पराक्रमका भरोसा करके शत्रुओंको ललकारता है और उनके साथ निर्भय होकर युद्ध करता है, वही पुरुष कहलाता है

যে নিজেরই বল-পরাক্রমের উপর নির্ভর করে প্রতিপক্ষকে আহ্বান করে এবং নির্ভয়ে শত্রুর সঙ্গে যুদ্ধ করে—সেই-ই প্রকৃত পুরুষ বলে গণ্য হয়।

Verse 4

परवीर्य समाश्रित्य यः समाह्दयते परान्‌ | क्षत्रबन्धु रशक्तत्वाल्लोके स पुरुषाधम:,“जो दूसरेके बल-पराक्रमका आश्रय ले शत्रुओंको युद्धके लिये बुलाता है, वह क्षत्रबन्धु असमर्थ होनेके कारण लोकमें पुरुषाधम कहा गया है

যে অন্যের বল-পরাক্রমের আশ্রয়ে শত্রুকে যুদ্ধে আহ্বান করে, সে কেবল নামমাত্র ক্ষত্রিয়; নিজের অক্ষমতার জন্য লোকের চোখে সে পুরুষাধম।

Verse 5

स त्वं परेषां वीर्येण मन्यसे वीर्यमात्मन: । स्वयं कापुरुषो मूढ परांश्व क्षेप्तुमिच्छसि,'मूढ़! तू दूसरोंके पराक्रमसे ही अपनेको बल-पराक्रमसे सम्पन्न मानता है और स्वयं कायर होकर दूसरोंपर आक्षेप करना चाहता है

মূঢ়! অন্যের পরাক্রম ধার করে তুই নিজের শক্তিকে সত্য বলে মনে করিস; নিজে কাপুরুষ হয়েও তুই অন্যদের প্রতি দোষারোপ করতে চাস।

Verse 6

यस्त्वं वृद्ध सर्वराज्ञां हितबुद्धि जितेन्द्रियम्‌ । मरणाय महाप्रज्ञं दीक्षयित्वा विकत्थसे,“जो समस्त राजाओंमें वृद्ध, सबके प्रति हितबुद्धि रखनेवाले, जितेन्द्रिय तथा महाज्ञानी हैं, उन्हीं पितामहको तू मरणके लिये रणकी दीक्षा दिलाकर अपनी बहादुरीकी बातें करता है

যিনি সকল রাজাদের মধ্যে বয়োজ্যেষ্ঠ, সকলের মঙ্গলচিন্তায় নিবদ্ধ, ইন্দ্রিয়জয়ী ও মহাপ্রজ্ঞ—সেই পিতামহকে মৃত্যুর জন্য রণ-দীক্ষা দিয়ে তুই বীরত্বের বড়াই করছিস!

Verse 7

भावस्ते विदितो<स्माभिरद्दुर्बुद्धे कुलपांसन । न हनिष्यन्ति गाड़ेयं पाण्डवा घृणयेति हि,“खोटी बुद्धिवाले कुलांगार! तेरा मनोभाव हमने समझ लिया है। तू जानता है कि पाण्डवलोग दयावश गंगानन्दन भीष्मका वध नहीं करेंगे

দুর্বুদ্ধি কুলকলঙ্ক! তোর মনোভাব আমাদের অজানা নয়; তুই এই ভরসাতেই আছিস যে দয়ার কারণে পাণ্ডবরা গঙ্গানন্দন ভীষ্মকে বধ করবে না।

Verse 8

यस्य वीर्य समाश्रित्य धार्तराष्ट्र विकत्थसे । हन्तास्मि प्रथमं भीष्म मिषतां सर्वधन्विनाम्‌,'धृतराष्ट्रपुत्र! तू जिनके पराक्रमका आश्रय लेकर बड़ी-बड़ी बातें बनाता है, उन पितामह भीष्मको ही मैं सबसे पहले तेरे समस्त थधरनुर्धरोंके देखते-देखते मार डालूँगा

ধৃতরাষ্ট্রপুত্র! যার বীর্যে ভর করে তুই এত দম্ভ করিস, আমি সেই পিতামহ ভীষ্মকেই সবার আগে—তোর সকল ধনুর্ধরের চোখের সামনেই—নিহত করব।

Verse 9

कैतव्य गत्वा भरतान्‌ समेत्य सुयोधन धार्तराष्ट्रं वदस्व । तथेत्युवाचार्जुन: सव्यसाची निशाव्यपाये भविता विमर्द:,“उलूक! तू भरतवंशियोंके यहाँ जाकर धुृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे कह दे कि सव्यसाची अर्जुनने “बहुत अच्छा” कहकर तेरी चुनौती स्वीकार कर ली है। आजकी रात बीतते ही युद्ध आरम्भ हो जायगा

উলূক! ভরতবংশীয়দের কাছে গিয়ে তাদের সঙ্গে সাক্ষাৎ কর; আর ধৃতরাষ্ট্রপুত্র সুয়োধনকে বল—“সব্যসাচী অর্জুন ‘তথাস্তু’ বলে তোর আহ্বান গ্রহণ করেছে। এই রাত্রি শেষ হলেই যুদ্ধ শুরু হবে।”

Verse 10

यद्‌ वाब्रवीद्‌ वाक्यमदीनसत्त्वो मध्ये कुरून्‌ हर्षयन्‌ सत्यसंध: । अहं हन्ता सृजजयानामनीकं शाल्वेयकांश्षेति ममैष भार:

কুরুদের মাঝে সত্যপ্রতিজ্ঞ, অদীনসত্ত্ব ভীষ্ম তাদের উল্লসিত করে বলেছিলেন—“আমি সৃঞ্জয়দের সেনা ও শাল্বদেশীয় যোদ্ধাদের নিধন করব; এ সকলের বধের ভার আমারই উপর।”

Verse 11

हन्यामहं द्रोणमृतेडपि लोक॑ नते भयं विद्यते पाण्डवेभ्य: | ततो हि ते लब्धतमं च राज्य- मापद्गताः: पाण्डवाश्नेति भाव:

রাজন! আমি যদি দ্রোণকেও বধ করি, তবু পাণ্ডবদের থেকে তোমার কোনো ভয় থাকবে না; কারণ তাদের সংকল্প এই—নিজেদের সর্বাধিক ন্যায্য রাজ্য পুনরুদ্ধার করলেই তারা বিপদ থেকে মুক্ত হবে।

Verse 12

'सत्यप्रतिज्ञ और महान्‌ शक्तिशाली भीष्मजीने कौरवसैनिकोंके बीचमें उनका हर्ष बढ़ाते हुए जो यह कहा था कि मैं सूंजय वीरोंकी सेनाका तथा शाल्वदेशके सैनिकोंका भी संहार कर डालूँगा। इन सबके मारनेका भार मेरे ही ऊपर है। दुर्योधन! मैं ट्रोणाचार्यके बिना भी सम्पूर्ण जगत्‌का संहार कर सकता हूँ; अतः तुम्हें पाण्डवोंसे कोई भय नहीं है। भीष्मके इस वचनसे ही तूने अपने मनमें यह धारणा बना ली है कि राज्य मुझे ही प्राप्त होगा और पाण्डव भारी विपत्तिमें पड़ जायँगे ।। स दर्पपूर्णो न समीक्षसे त्व- मनर्थमात्मन्यपि वर्तमानम्‌ | तस्मादहं ते प्रथमं समूहे हन्ता समक्ष कुरुवृद्धमेव,“इसीलिये तू घमंडमें भरकर अपने ऊपर आये हुए वर्तमान संकटको नहीं देख पाता है, अतः मैं सबसे पहले तेरे सेनासमूहमें प्रवेश करके कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भीष्मका ही तेरी आँखोंके सामने वध करूँगा

সত্যপ্রতিজ্ঞ ও মহাশক্তিধর ভীষ্ম কৌরবসেনার মাঝে তাদের উল্লাস বাড়িয়ে বলেছিলেন—“আমি সৃঞ্জয়দের সেনা এবং শাল্বদেশের যোদ্ধাদেরও সংহার করব; এ সকলের বধের ভার আমারই উপর। দুর্যোধন! দ্রোণ না থাকলেও আমি সমগ্র জগতকে ধ্বংস করতে সক্ষম; অতএব পাণ্ডবদের থেকে তোর কোনো ভয় নেই।” ভীষ্মের এই বাক্যে তুই মনে স্থির করেছিস যে রাজ্য নিশ্চয়ই তোর হবে এবং পাণ্ডবরা মহাবিপদে পড়বে। এই দম্ভে তুই নিজের উপর বর্তমান অনর্থ দেখতে পাচ্ছিস না; তাই আমি সবার আগে তোর সেনাবিন্যাসে প্রবেশ করে, তোর চোখের সামনেই, কুরুবংশের বৃদ্ধ ভীষ্মকে বধ করব।

Verse 13

सूर्योदये युक्तसेन: प्रतीक्ष्य ध्वजी रथी रक्ष तं सत्यसंधम्‌ । अहं हि व: पश्यतां द्वीपमेनं भीष्म रथात्‌ पातयिष्यामि बाणै:,'तू सूर्योदयके समय सेनाको सुसज्जित करके ध्वज और रथसे सम्पन्न हो सब ओर दृष्टि रखते हुए सत्यप्रतिज्ञ भीष्मकी रक्षा कर। मैं तेरे सैनिकोंके देखते-देखते तेरे लिये आश्रय बने हुए इन भीष्मजीको बाणोंद्वारा मारकर रथसे नीचे गिरा दूँगा

সঞ্জয় বললেন—সূর্যোদয়ে সেনা সাজিয়ে প্রস্তুত থেকো; ধ্বজসহ রথারূঢ় হয়ে চারদিকে নজর রেখে সত্যসংকল্প ভীষ্মকে রক্ষা করো। তোমাদের সৈন্যদের চোখের সামনেই আমি তোমাদের আশ্রয়-দ্বীপস্বরূপ এই ভীষ্মকে বাণে বিদ্ধ করে রথ থেকে ফেলে দেব।

Verse 14

श्वोभूते कत्थनावाक्यं विज्ञास्यति सुयोधन: । आचितं शरजालेन मया दृष्टवा पितामहम्‌,“कल खबेरे पितामहको मेरे द्वारा चलाये हुए बाणोंके समूहसे व्याप्त देखकर दुर्योधनको अपनी बढ़-बढ़कर कही हुई बातोंका परिणाम ज्ञात होगा

সঞ্জয় বললেন—আগামীকাল সুয়োধন তার দম্ভোক্তির পরিণাম বুঝবে, যখন সে আমার নিক্ষিপ্ত বাণজালে আচ্ছন্ন পিতামহকে দেখবে।

Verse 15

यदुक्तश्च सभामध्ये पुरुषो हस्वदर्शन: । क्रुद्धेन भीमसेनेन भ्राता दःशासनस्तव,'सुयोधन! क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने उस क्षुद्र विचारवाले, अधर्मज्ञ, नित्य वैरी, पापबुद्धि और क्रूरकर्मा तेरे भाई दुःशासनके प्रति जो बात कही है, उस प्रतिज्ञाको तू शीघ्र ही सत्य हुई देखेगा

সুয়োধন! সভামধ্যে ক্রুদ্ধ ভীমসেন তোমার ভাই দুঃশাসন—সেই ক্ষুদ্রবুদ্ধির লোক—সম্বন্ধে যা বলেছিল, তা স্মরণ করো।

Verse 16

अधर्मज्ञो नित्यवैरी पापबुद्धिर्नुशंसकृत्‌ । सत्यां प्रतिज्ञामचिराद्‌ द्रक्ष्यसे तां सुयोधन,'सुयोधन! क्रोधमें भरे हुए भीमसेनने उस क्षुद्र विचारवाले, अधर्मज्ञ, नित्य वैरी, पापबुद्धि और क्रूरकर्मा तेरे भाई दुःशासनके प्रति जो बात कही है, उस प्रतिज्ञाको तू शीघ्र ही सत्य हुई देखेगा

সুয়োধন! অধর্মজ্ঞ, চিরশত্রু, পাপবুদ্ধি ও নিষ্ঠুরকর্মা—এমন তার সম্পর্কে ভীমসেন যে প্রতিজ্ঞা করেছে, তা তুমি অচিরেই সত্য হতে দেখবে।

Verse 17

अभिमानस्यथ दर्पस्य क्रोधपारुष्ययोस्तथा । नैप्ठुयस्यावलेपस्य आत्मसम्भावनस्य च

সঞ্জয় বললেন—তিনি আত্মাভিমান ও দম্ভ, ক্রোধ ও কঠোরতা, তদ্রূপ নিষ্ঠুরতা, উদ্ধত গর্ব এবং আত্ম-অহংকার—এই দোষগুলির কথাও বললেন।

Verse 18

नृशंसतायास्तैक्ष्ण्यस्य धर्मविद्वेषणस्य च | अधर्मस्यातिवादस्य वृद्धातिक्रमणस्य च

সঞ্জয় বললেন— (তার মধ্যে) নিষ্ঠুরতা, তীক্ষ্ণতা ও ধর্মবিদ্বেষ আছে; অধর্ম, অতিবাদী কলহপ্রিয় বাক্য এবং বৃদ্ধদের অবমাননাও আছে।

Verse 19

दर्शनस्य च वक्रस्य कृत्स्नस्यापनयस्य च । द्रक्ष्यसि त्वं फलं तीव्रमचिरेण सुयोधन

সঞ্জয় বললেন— হে সুয়োধন, তোমার বক্র দৃষ্টি এবং সমগ্র (সৎ) উপদেশ সম্পূর্ণ প্রত্যাখ্যানের তীব্র ফল তুমি অচিরেই দেখবে।

Verse 20

“दुर्योधन! तू अभिमान, दर्प, क्रोध, कटुभाषण, निष्ठरता, अहंकार, आत्मप्रशंसा, क्रूरता, तीक्ष्णता, धर्मविद्वेष, अधर्म, अतिवाद, वृद्ध पुरुषोंक अपमान तथा टेढ़ी आँखोंसे देखनेका और अपने समस्त अन्याय एवं अत्याचारोंका घोर फल शीघ्र ही देखेगा ।। १७-- १९ || वासुदेवद्धितीये हि मयि क्रुद्धे नराधम । आशा ते जीविते मूढ राज्ये वा केन हेतुना,“मूढ़ नराधम! भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ मेरे कुपित होनेपर तू किस कारणसे जीवन तथा राज्यकी आशा करता है?

সঞ্জয় বললেন— দুর্যোধন! তোমার অভিমান, দম্ভ, ক্রোধ, কটু বাক্য, নিষ্ঠুরতা, অহংকার, আত্মপ্রশংসা, ক্রূরতা, তীক্ষ্ণতা, ধর্মবিদ্বেষ, অধর্মাচরণ, অতিবাদ, বৃদ্ধদের অবমাননা, বক্র ও বৈরী দৃষ্টি—এবং তোমার সকল অন্যায়-অত্যাচারের ভয়ংকর ফল তুমি অচিরেই দেখবে। আর যখন বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ) আমার দ্বিতীয় হয়ে আমি ক্রুদ্ধ হই, তখন হে মূঢ় অধম! কোন ভরসায় তুমি জীবন বা রাজ্যের আশা করছ?

Verse 21

शान्ते भीष्मे तथा द्रोणे सूतपुत्रे च पातिते । निराशो जीविते राज्ये पुत्रेषु च भविष्यसि,'भीष्म, द्रोणाचार्य तथा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर तू अपने जीवन, राज्य तथा पुत्रोंकी रक्षाकी ओरसे निराश हो जायगा

সঞ্জয় বললেন— ভীষ্ম নীরব (নিষ্ক্রিয়) হলে, দ্রোণও তেমনি, আর সূতপুত্র কর্ণ পতিত হলে—তুমি জীবন, রাজ্য এবং পুত্রদের বিষয়েও নিরাশ হবে।

Verse 22

भ्रातृणां निधन श्रुत्वा पुत्राणां च सुयोधन । भीमसेनेन निहतो दुष्कृतानि स्मरिष्यसि,'सुयोधन! तू अपने भाइयों और पुत्रोंका मरण सुनकर और भीमसेनके हाथसे स्वयं भी मारा जाकर अपने पापोंको याद करेगा

সঞ্জয় বললেন— হে সুয়োধন, তোমার ভাইদের ও পুত্রদের মৃত্যু সংবাদ শুনে, আর ভীমসেনের হাতে নিজে নিহত হয়ে, তুমি তোমার দুষ্কর্মগুলি স্মরণ করবে।

Verse 23

नद्वितीयां प्रतिज्ञां हि प्रतिजानामि कैतव । सत्यं॑ ब्रवीम्यहं होतत्‌ सर्व सत्यं भविष्यति,'शकुनिपुत्र! मैं दूसरी बार प्रतिज्ञा करना नहीं जानता। तुझसे सच्ची बात कहता हूँ। यह सब कुछ सत्य होकर रहेगा।' तत्पश्चात्‌ युधिष्ठिरने भी धूर्त जुआरीके पुत्र उलूकसे इस प्रकार कहा--'वत्स उलूक! तू दुर्योधनके पास जाकर मेरी यह बात कहना --

“হে কপট! আমি দ্বিতীয়বার প্রতিজ্ঞা করতে জানি না। আমি তোমাকে সত্যই বলছি—এ সবই সত্য হয়ে ঘটবে।” তারপর যুধিষ্ঠিরও ধূর্ত জুয়াড়ির পুত্র উলূককে বললেন—“বৎস উলূক! দুর্যোধনের কাছে গিয়ে আমার এই বার্তা জানিয়ে দাও …”

Verse 24

युधिष्ठिरो5पि कैतव्यमुलूकमिदमत्रवीत्‌ । उलूक मद्वचो ब्रूहि गत्वा तात सुयोधनम्‌,'शकुनिपुत्र! मैं दूसरी बार प्रतिज्ञा करना नहीं जानता। तुझसे सच्ची बात कहता हूँ। यह सब कुछ सत्य होकर रहेगा।' तत्पश्चात्‌ युधिष्ठिरने भी धूर्त जुआरीके पुत्र उलूकसे इस प्रकार कहा--'वत्स उलूक! तू दुर्योधनके पास जाकर मेरी यह बात कहना --

সঞ্জয় বললেন—যুধিষ্ঠিরও কপট জুয়াড়ির পুত্র উলূককে বললেন—“উলূক! বৎস, সুয়োধনের কাছে গিয়ে আমার এই কথা জানিয়ে দাও।”

Verse 25

स्वेन वृत्तेन मे वृत्तं नाधिगन्तुं त्वमहसि । उभयोरन्तरं वेद सूनूतानृतयोरपि,“सुयोधन! तुझे अपने आचरणके अनुसार ही मेरे आचरणको नहीं समझना चाहिये। मैं दोनोंके बर्तावका तथा सत्य और झूठका भी अन्तर समझता हूँ

“সুয়োধন! তোমার নিজের আচরণ দিয়ে আমার আচরণ বিচার কোরো না। আমি উভয় পক্ষের আচরণের তফাৎ জানি, আর সত্য ও অসত্যের ভেদও বুঝি।”

Verse 26

न चाहं कामये पापमपि कीटपिपीलयो: । कि पुनर्ज्ञातिषु वधं कामयेयं कथंचन,“मैं तो कीड़ों और चींटियोंको भी कष्ट पहुँचाना नहीं चाहता; फिर अपने भाई-बन्धुओं अथवा कुट॒म्बी-जनोंके वधकी कामना किसी प्रकार भी कैसे कर सकता हूँ?

“আমি তো কীট-পতঙ্গ আর পিঁপড়ের প্রতিও পাপ করতে চাই না; তবে নিজেরই জ্ঞাতি-স্বজনদের বধ কামনা করব কীভাবে?”

Verse 27

एतदर्थ मया तात पज्च ग्रामा वृता: पुरा । कथं तव सुद्दुर्बुद्धे न प्रेक्षे व्यसनं महत्‌,“तात! इसीलिये पहले मैंने केवल पाँच ही गाँव माँगे थे। दुर्बुद्धे! मेरे ऐसा करनेका यही उद्देश्य था कि किसी तरह तेरे ऊपर महान्‌ संकट आया हुआ न देखूँ

“বৎস! এই কারণেই আমি আগে কেবল পাঁচটি গ্রাম চেয়েছিলাম। হে অতি দুর্বুদ্ধি! আমার উদ্দেশ্য ছিল—যেন তোমার ওপর কোনো মহাবিপদ নেমে আসতে আমি না দেখি।”

Verse 28

स त्वं कामपरीतात्मा मूढभावाच्च कत्थसे । तथैव वासुदेवस्य न गृह्नासि हितं वच:,'परंतु तेरा मन लोभ और तृष्णामें डूबा हुआ है। तू मूर्खताके कारण अपनी झूठी प्रशंसा करता है और भगवान्‌ श्रीकृष्णके हितकारक वचनको भी नहीं मान रहा है किं चेदानीं बहुक्तेन युध्यस्व सह बान्धवै: । “अब इस समय अधिक कहनेसे क्या लाभ? तू अपने भाई-बन्धुओंके साथ आकर युद्ध कर'

কিন্তু তোর মন কামনায় আচ্ছন্ন; মোহবশে তুই অহংকার করে বড়াই করিস। তেমনি বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)-এর হিতকর উপদেশও তুই গ্রহণ করিস না। এখন আর বেশি বলে কী লাভ? ভাই-বান্ধবসহ এসে যুদ্ধ কর।

Verse 29

मम विप्रियकर्तारं कैतव्य ब्रूहि कौरवम्‌,श्रुतं वाक्‍्यं गृहीतो<र्थों मतं यत्‌ ते तथास्तु तत्‌ । “उलूक! तू मेरा अप्रिय करनेवाले दुर्योधनसे कहना--'तेरा संदेश सुना और उसका अभिप्राय समझ लिया। तेरी जैसी इच्छा है, वैसा ही हो”

হে ছলনাকারী! যে কৌরব (দুর্যোধন) আমার অমঙ্গল করে, তাকে বলিস—“তোর বার্তা শোনা হয়েছে, তার অভিপ্রায়ও বোঝা হয়েছে। তোর ইচ্ছামতোই হোক।”

Verse 30

भीमसेनस्तता वाक्यं भूय आह नृपात्मजम्‌,तदनन्तर भीमसेनने पुनः राजकुमार उलूकसे यह बात कही--'उलूक! तू दुर्बुद्धि, पापात्मा, शठ, कपटी, पापी तथा दुराचारी दुर्योधनसे मेरी यह बात भी कह देना --

তখন ভীমসেন সেই রাজপুত্রকে আবার বললেন। এরপর ভীম পুনরায় রাজপুত্র উলূককে বললেন—“উলূক! তুই কুমতি, পাপহৃদয়, শঠ, কপট ও দুষ্কর্মে লিপ্ত; আর দুর্যোধনকে আমার এই কথাও জানিয়ে দিস।”

Verse 31

उलूक मद्वचो ब्रूहि दुर्मतिं पापपूरुषम्‌ । शठं नैकृतिकं पाप॑ दुराचारं सुयोधनम्‌,तदनन्तर भीमसेनने पुनः राजकुमार उलूकसे यह बात कही--'उलूक! तू दुर्बुद्धि, पापात्मा, शठ, कपटी, पापी तथा दुराचारी दुर्योधनसे मेरी यह बात भी कह देना --

উলূক! আমার কথা সেই কুমতি, পাপপুরুষ, শঠ, কপট, পাপী ও দুষ্কর্মে লিপ্ত সুয়োধন (দুর্যোধন)-কে বলে দিস।

Verse 32

गृध्रोदरे वा वस्तव्यं पुरे वा नागसाह्वये । प्रतिज्ञातं मया तच्च सभामध्ये नराधम,कर्ताह तद्‌ वचः सत्यं सत्येनैव शपामि ते । “नराधम! तुझे या तो मरकर गीधके पेटमें निवास करना चाहिये या हस्तिनापुरमें जाकर छिप जाना चाहिये। मैंने सभामें जो प्रतिज्ञा की है, उसे अवश्य सत्य कर दिखाऊँगा। यह बात मैं सत्यकी ही शपथ खाकर तुझसे कहता हूँ

হে নরাধম! তোর হয় গৃধ্রের পেটে বাস হবে (অর্থাৎ নিহত হবি), নয়তো নাগসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) নগরে গিয়ে লুকোতে হবে। সভামধ্যে আমি যে প্রতিজ্ঞা করেছিলাম, তা আমি অবশ্যই সত্য করে দেখাব। সত্যেরই শপথ করে তোকে বলছি—আমি সেই বাক্য পূর্ণ করব।

Verse 33

दुःशासनस्य रुधिरं हत्वा पास्याम्यहं मृथे,“मैं युद्धमें दःशासनको मारकर उसका रक्त पीऊँगा और तेरे सारे भाइयोंको मारकर तेरी जाँघें भी तोड़कर ही रहूँगा। सुयोधन! मैं धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंकी मृत्यु हूँ

Sanjaya said: “In the battle I shall slay Duhshasana and drink his blood. And after killing all your brothers, I will surely break your thighs as well. O Suyodhana, I am the death of all Dhritarashtra’s sons.” The utterance is a fierce vow of retribution, expressing how the moral outrage of humiliation and injustice hardens into a terrible resolve within the ethics of war, where personal vengeance and the demand for accountability collide.

Verse 34

सक्थिनी तव भड्क्त्वैव हत्वा हि तव सोदरान्‌ | सर्वेषां धार्तराष्ट्राणामहं मृत्यु: सुयोधन,“मैं युद्धमें दःशासनको मारकर उसका रक्त पीऊँगा और तेरे सारे भाइयोंको मारकर तेरी जाँघें भी तोड़कर ही रहूँगा। सुयोधन! मैं धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंकी मृत्यु हूँ

Sañjaya said: “After breaking your thighs, and indeed after killing your brothers, I shall become the death of all the sons of Dhṛtarāṣṭra, O Suyodhana.” The utterance conveys a vow of ruthless retribution, reflecting how the moral order collapses into personal vengeance as war becomes inevitable.

Verse 35

सर्वेषां राजपुत्राणामभिमन्युरसंशयम्‌ । कर्मणा तोषयिष्यामि भूयश्चैव वच: शृणु,“इसी प्रकार सारे राजकुमारोंकी मृत्युका कारण अभिमन्यु होगा, इसमें संशय नहीं है। मैं अपने पराक्रमद्वारा तुझे अवश्य संतुष्ट करूँगा। तू मेरी एक बात और सुन ले

Sañjaya said: “Of all the princes, Abhimanyu will surely be the cause of their death—there is no doubt. By my own prowess I will satisfy you; and now, listen to one more word of mine.”

Verse 36

हत्वा सुयोधन त्वां वै सहित॑ सर्वसोदरै: । आक्रमिष्ये पदा मूर्थ्नि धर्मराजस्य पश्यत:,'सुयोधन! तुझे समस्त भाइयोंसहित मारकर धर्मराज युधिष्ठिरके देखते-देखते तेरे मस्तकको पैरसे कुचल दूँगा”

Sañjaya said: “O Suyodhana, after slaying you together with all your brothers, I will trample your head beneath my foot—while Dharmarāja (Yudhiṣṭhira) looks on.” The utterance conveys a vow of ruthless retribution, framing the coming conflict not merely as battle but as a public moral reckoning in which the Kaurava leader’s humiliation is imagined as proof of the Pāṇḍavas’ vindication.

Verse 37

नकुलस्तु ततो वाक्यमिदमाह महीपते । उलूक ब्रूहि कौरव्य॑ धार्तराष्ट्र सुयोधनम्‌,जनमेजय! तत्पश्चात्‌ नकुलने भी इस प्रकार कहा--'उलूक! तू कुरुकुलकलंक धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन-से कहना, तेरी कही हुई सारी बातें मैंने यथार्थरूपसे सुन लीं। कौरव! तू मुझे जैसा उपदेश दे रहा है, उसके अनुसार ही मैं सब कुछ करूँगा”

Sañjaya said: Then Nakula spoke these words, O king: “Ulūka, go and tell Suyodhana, the son of Dhṛtarāṣṭra—disgrace of the Kuru line—this: I have heard in full and understood the message you delivered. And, O Kaurava, I shall act accordingly.”

Verse 38

श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेव यथातथम्‌ | तथा कर्तास्मि कौरव्य यथा त्वमनुशास्सि माम्‌,जनमेजय! तत्पश्चात्‌ नकुलने भी इस प्रकार कहा--'उलूक! तू कुरुकुलकलंक धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन-से कहना, तेरी कही हुई सारी बातें मैंने यथार्थरूपसे सुन लीं। कौरव! तू मुझे जैसा उपदेश दे रहा है, उसके अनुसार ही मैं सब कुछ करूँगा”

জনমেজয়! তুমি যা বলেছ, তা যেমন ছিল তেমনই সম্পূর্ণ শুনেছি। হে কুরুবংশীয়! তুমি আমাকে যেমন নির্দেশ দাও, আমি ঠিক তেমনই করব।

Verse 39

सहदेवो<पि नृपते इदमाह वचोड<र्थवत्‌ | सुयोधन मतिर्या ते वृथैषा ते भविष्यति,राजन! तदनन्तर सहदेवने भी यह सार्थक वचन कहा--“महाराज दुर्योधन! आज जो तेरी बुद्धि है, वह व्यर्थ हो जायगी। इस समय हमारे इस महान्‌ क्लेशका जो तू हर्षोत्फुल्ल होकर वर्णन कर रहा है, इसका फल यह होगा कि तू अपने पुत्र, कुटुम्बी तथा बन्धुजनोंसहित शोकमें डूब जायगा'

নৃপতি! সহদেবও অর্থবহ বাক্য বলল—“হে রাজা সুয়োধন! এই মুহূর্তে তোমার যে সংকল্প, তা বৃথাই হবে।”

Verse 40

शोचिष्यसे महाराज सपुत्रज्ञातिबान्धव: । इमं च क्लेशमस्माकं ह्ृष्टो यत्‌ त्वं विकत्थसे,राजन! तदनन्तर सहदेवने भी यह सार्थक वचन कहा--“महाराज दुर्योधन! आज जो तेरी बुद्धि है, वह व्यर्थ हो जायगी। इस समय हमारे इस महान्‌ क्लेशका जो तू हर्षोत्फुल्ल होकर वर्णन कर रहा है, इसका फल यह होगा कि तू अपने पुत्र, कुटुम्बी तथा बन्धुजनोंसहित शोकमें डूब जायगा'

হে মহারাজ! তুমি তোমার পুত্র, জ্ঞাতি ও বান্ধবসহ শোকে নিমজ্জিত হবে। হে রাজন! আমাদের এই ক্লেশ নিয়ে তুমি যে উল্লসিত হয়ে দম্ভ করছ, সেটাই তোমার দুঃখের কারণ হয়ে ফিরবে।

Verse 41

विराटद्रुपदौ वृद्धावुलूकमिदमूचतु: । दासभावं नियच्छेव साधोरिति मति: सदा । तौ च दासावदासौ वा पौरुषं यस्य यादृशम्‌,तदनन्तर बूढ़े राजा विराट और द्रुपदने उलूकसे इस प्रकार कहा--'उलूक! तू दुर्योधनसे कहना, राजन्‌! हम दोनोंका विचार सदा यही रहता है कि हम साधु पुरुषोंके दास हो जायूँ। वे दोनों हम विराट और द्रुपद दास हैं या अदास; इसका निर्णय युद्धमें जिसका जैसा पुरुषार्थ होगा, उसे देखकर किया जायगा”

সঞ্জয় বললেন—বৃদ্ধ রাজা বিরাট ও দ্রুপদ উলূককে বললেন—“উলূক! আমাদের স্থির মত সর্বদাই এই—সাধুজনের দাসত্ব গ্রহণ করা। আমরা দাস না অদাস, তা পরে যুদ্ধক্ষেত্রে যার যেমন পৌরুষ, তা দেখে স্থির হবে।”

Verse 42

शिखण्डी तु ततो वाक्यमुलूकमिदमत्रवीत्‌ । वक्तव्यो भवता राजा पापेष्वभिरत: सदा,तत्पश्चात्‌ शिखण्डीने उलूकसे इस प्रकार कहा--'उलूक! सदा पापमें ही तत्पर रहनेवाले अपने राजाके पास जाकर तू इस प्रकार कहना--

সঞ্জয় বললেন—তারপর শিখণ্ডী উলূককে বলল—“তুমি গিয়ে তোমার রাজাকে এ কথা বলবে—যে সর্বদা পাপে আসক্ত।”

Verse 43

पश्य त्वं मां रणे राजन्‌ कुर्वाणं कर्म दारुणम्‌ । यस्य वीर्य समासाद्य मन्यसे विजयं युधि,तमहं पातयिष्यामि रथात्‌ तव पितामहम्‌ । “राजन! तुम संग्राममें मुझे भयानक कर्म करते हुए देखना। जिसके पराक्रमका भरोसा करके तुम युद्धमें अपनी विजय हुई मानते हो, तुम्हारे उस पितामहको मैं रथसे मार गिराऊँगा

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, যুদ্ধে আমাকে ভয়ংকর কর্ম করতে দেখো। যার বীর্যে ভরসা করে তুমি যুদ্ধে বিজয় নিশ্চিত মনে কর, সেই তোমার পিতামহকেই আমি রথ থেকে ফেলে দেব।

Verse 44

अहं भीष्मवधात्‌ सृष्टो नूनं धात्रा महात्मना,सो5हं भीष्म हनिष्यामि मिषतां सर्वधन्विनाम्‌ । “निश्चय ही महामना विधाताने भीष्मके वधके लिये ही मेरी सृष्टि की है। अतः मैं समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते भीष्मको मार डालूँगा”

সঞ্জয় বললেন—নিশ্চয়ই মহামতি বিধাতা আমাকে ভীষ্মবধের উদ্দেশ্যেই সৃষ্টি করেছেন। অতএব সকল ধনুর্ধরের চোখের সামনেই আমি ভীষ্মকে বধ করব।

Verse 45

धृष्टद्युम्नो5पि कैतव्यमुलूकमिदमब्रवीत्‌,इसके बाद धृष्टद्युम्नने भी कितवकुमार उलूकसे यह बात कही--'उलूक! तू राजपुत्र दुर्योधनसे मेरी यह बात कह देना, मैं द्रोणाचार्यको उनके गणों और बन्धु-बान्धवोंसहित मार डालूँगा

সঞ্জয় বললেন—ধৃষ্টদ্যুম্নও কিতবপুত্র উলূককে বলল—“উলূক, রাজপুত্র দুর্যোধনকে আমার এই বাণী জানিয়ে দিও: আমি দ্রোণাচার্যকে তাঁর গণসহ এবং আত্মীয়-স্বজন ও মিত্রসহ বধ করব।”

Verse 46

सुयोधनो मम वचो वक्तव्यो नृपते: सुतः । अहं द्रोणं हनिष्पयामि सगणं सहबान्धवम्‌,इसके बाद धृष्टद्युम्नने भी कितवकुमार उलूकसे यह बात कही--'उलूक! तू राजपुत्र दुर्योधनसे मेरी यह बात कह देना, मैं द्रोणाचार्यको उनके गणों और बन्धु-बान्धवोंसहित मार डालूँगा

সঞ্জয় বললেন—“রাজপুত্র সুয়োধনকে আমার এই বাণী বলো: আমি দ্রোণকে তাঁর গণসহ এবং আত্মীয়-স্বজনসহ বধ করব।”

Verse 47

अवश्यं च मया कार्य पूर्वेषां चरितं महत्‌ । कर्ता चाहं तथा कर्म यथा नान्य: करिष्यति,“मुझे अपने पूर्वजोंके महान्‌ चरित्रका अनुकरण अवश्य करना चाहिये। अतः मैं युद्धमें वह पराक्रम कर दिखाऊँगा, जैसा दूसरा कोई नहीं करेगा”

সঞ্জয় বললেন—আমাকে অবশ্যই আমার পূর্বপুরুষদের মহান আচরণ অনুসরণ করতে হবে। তাই যুদ্ধে আমি এমন বীরত্বপূর্ণ কর্ম করব, যা আর কেউ করতে পারবে না।

Verse 48

तमब्रवीद्‌ धर्मराज: कारुण्यार्थ वचो महत्‌ | नाहं ज्ञातिवधं राजन्‌ कामयेयं कथंचन,तदनन्तर धर्मराज युधिष्ठिरने करुणावश फिर यह महत्त्वपूर्ण बात कही--'राजन! मैं किसी प्रकार भी अपने कुटुम्बियोंका वध नहीं कराना चाहता

তখন করুণায় আন্দোলিত ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির গম্ভীর বাণী উচ্চারণ করলেন— “রাজন! কোনোভাবেই আমি নিজের স্বজনদের বধ কামনা করি না।”

Verse 49

तवैव दोषाद्‌ दुर्बुद्धे सर्वमेतत्‌ त्वनावृतम्‌ । स गच्छ मा चिरं तात उलूक यदि मन्यसे,इह वा तिष्ठ भद्रं ते वयं हि तव बान्धवा: । 'किंतु दुर्बुद्धे! यह सब कुछ तेरे ही दोषसे प्राप्त हुआ है। तात उलूक! तेरी इच्छा हो, तो शीघ्र चला जा। अथवा तेरा कल्याण हो, तू यहीं रह; क्योंकि हम भी तेरे भाई-बन्धु ही हैं!

হে দুর্বুদ্ধি! এ সবই তোমারই দোষে ঘটেছে, আর এখন তা আর গোপন নেই। প্রিয় উলূক, যদি তুমি ঠিক মনে করো তবে বিলম্ব না করে চলে যাও; নতুবা এখানে থাক—তোমার মঙ্গল হোক, কারণ আমরাও তোমার স্বজন।

Verse 50

उलूकस्तु तो राजन्‌ धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌,आमन्त्र्य प्रययौ तत्र यत्र राजा सुयोधन: । जनमेजय! तदनन्तर उलूक धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरसे विदा ले जहाँ राजा दुर्योधन था, वहीं चला गया

হে রাজন! তারপর উলূক ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরের নিকট থেকে বিদায় নিয়ে সেখানে গেল, যেখানে রাজা সুয়োধন (দুর্যোধন) ছিলেন।

Verse 51

उलूकस्तत आगम्य दुर्योधनममर्षणम्‌,वहाँ आकर उलूकने अमर्षशील दुर्योधनको अर्जुनका सारा संदेश ज्यों-का-त्यों सुना दिया। इसी प्रकार उसने भगवान्‌ श्रीकृष्ण, भीमसेन और धर्मराज युधिष्ठिरकी पुरुषार्थभरी बातोंका भी वर्णन किया

সেখানে পৌঁছে উলূক ক্রোধপ্রবণ দুর্যোধনকে অর্জুনের বার্তা যেমন ছিল তেমনই শুনিয়ে দিল। তদ্রূপ সে বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণ, ভীমসেন ও ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের পৌরুষপূর্ণ দৃঢ় বাক্যও বর্ণনা করল।

Verse 52

अर्जुनस्य समादेशं यथोक्तं सर्वमब्रवीत्‌ | वासुदेवस्य भीमस्य धर्मराजस्य पौरुषम्‌,वहाँ आकर उलूकने अमर्षशील दुर्योधनको अर्जुनका सारा संदेश ज्यों-का-त्यों सुना दिया। इसी प्रकार उसने भगवान्‌ श्रीकृष्ण, भीमसेन और धर्मराज युधिष्ठिरकी पुरुषार्थभरी बातोंका भी वर्णन किया

সে অর্জুনের আদেশ-বার্তা যেভাবে বলা হয়েছিল সেভাবেই সম্পূর্ণ জানাল; আর বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণ, ভীম ও ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের পৌরুষ ও দৃঢ় সংকল্পপূর্ণ বাক্যও বর্ণনা করল।

Verse 53

नकुलस्य विराटस्य द्रुपदस्य च भारत । सहदेवस्य च वचो धृष्टद्युम्मशिखण्डिनो: । केशवार्जुनयोर्वाक्यं यथोक्तं सर्वमब्रवीत्‌,भारत! फिर उसने नकुल, सहदेव, विराट, ट्रुपद, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके भी सारे वचनोंको ज्यों-का-त्यों कह दिया

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! তিনি নকুল ও সহদেব, বিরাট ও দ্রুপদ, ধৃষ্টদ্যুম্ন ও শিখণ্ডী, এবং কেশব (শ্রীকৃষ্ণ) ও অর্জুনের কথাও যেমন বলা হয়েছিল তেমনই—একটুও বাদ না দিয়ে, একটুও বদলে না দিয়ে—সব পুনরুক্তি করলেন।

Verse 54

कैतव्यस्य तु तद्‌ वाक्यं निशम्य भरतर्षभ: । दुःशासनं च कर्ण च शकुनिं चापि भारत,भारत! उलूकका वह कथन सुनकर भरतश्रेष्ठ दुर्योधनने दुःशासन, कर्ण तथा शकुनिसे कहा--

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! কৈতব্য (উলূক)-এর সেই বক্তব্য শুনে ভরতশ্রেষ্ঠ দুর্যোধন দুঃশাসন, কর্ণ এবং শকুনিকেও সম্বোধন করলেন।

Verse 55

आज्ञापयत राज्ञश्न बल॑ मित्रबलं तथा । यथा प्रागुदयात्‌ सर्वे युक्तास्तिष्ठन्त्वनीकिन:,“बन्धुओ! राजाओं तथा मित्रोंकी सेनाओंको आज्ञा दे दो, जिससे समस्त सैनिक कल सूर्योदयसे पूर्व ही तैयार होकर युद्धके मैदानमें डट जाये

সঞ্জয় বললেন—“হে স্বজনেরা! রাজাদের বাহিনী ও মিত্রবাহিনীকে আদেশ দাও, যাতে সকল সৈন্য সজ্জিত ও বিন্যস্ত হয়ে আগামীকাল সূর্যোদয়ের আগেই অবস্থান গ্রহণ করে।”

Verse 56

ततः कर्णसमादिष्टा दूता: संत्वरिता रथै: । उष्ट्वामीभिरप्यन्ये सदश्वैक्ष महाजवै:,तत्पश्चात्‌ कर्णके भेजे हुए दूत बड़ी उतावलीके साथ रथों, ऊँट-ऊँटनियों तथा अत्यन्त वेगशाली अच्छे-अच्छे घोड़ोंपर सवार हो तीव्र गतिसे सम्पूर्ण सेनाओंमें गये और कर्णके आदेशके अनुसार सबको राजाकी यह आज्ञा सुनाने लगे कि कल सूर्योदयसे पहले ही युद्धके लिये तैयार हो जाना चाहिये

সঞ্জয় বললেন—তারপর কর্ণের আদেশে দূতেরা তৎক্ষণাৎ ছুটে গেল—কেউ রথে, কেউ উট-উটনিতে, আর কেউ মহাবেগবান উৎকৃষ্ট অশ্বে আরূঢ় হয়ে। তারা সমগ্র সেনাবিভাগে দ্রুত পরিভ্রমণ করে কর্ণের নির্দেশমতো রাজাদেশ ঘোষণা করতে লাগল—“আগামীকাল সূর্যোদয়ের পূর্বেই যুদ্ধে প্রস্তুত হও।”

Verse 57

तूर्ण परिययु: सेनां कृत्स्नां कर्णस्य शासनात्‌ | आज्ञापयन्तो राज्ञश्न योग: प्रागुदयादिति,तत्पश्चात्‌ कर्णके भेजे हुए दूत बड़ी उतावलीके साथ रथों, ऊँट-ऊँटनियों तथा अत्यन्त वेगशाली अच्छे-अच्छे घोड़ोंपर सवार हो तीव्र गतिसे सम्पूर्ण सेनाओंमें गये और कर्णके आदेशके अनुसार सबको राजाकी यह आज्ञा सुनाने लगे कि कल सूर्योदयसे पहले ही युद्धके लिये तैयार हो जाना चाहिये

সঞ্জয় বললেন—কর্ণের আদেশে তারা তৎক্ষণাৎ সমগ্র সেনার মধ্যে ছুটে বেড়াল, এবং সকলকে রাজাদেশ জানাতে লাগল—“সূর্যোদয়ের পূর্বেই সমবেত হয়ে সম্পূর্ণ সজ্জিত থাকো।”

Verse 163

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि उलूकदूतागमनपर्वणि उलूकापयाने त्रिषष्टयधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूतागमनपर्वमें उल्‌कके लौट जानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত উলূকদূতাগমনপর্বে উলূকের প্রত্যাবর্তন-সম্পর্কিত একশো তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Dhṛtarāṣṭra’s question reflects the tension between personal attachment and political responsibility: he anticipates the death of an elder (Bhīṣma) due to an opponent’s vow, while his side proceeds with militarization despite foreseen loss.

Effective leadership under crisis combines legitimacy (formal appointment), competence (knowledge of operations and formations), and psychological governance (reducing fear through structured plans and credible commitments).

No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-function is archival and strategic—recording how command authority, rhetoric, and force assessment are established immediately before formal hostilities.