Adhyaya 136
Udyoga ParvaAdhyaya 13635 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; परन्तु नैतिक-रणनीतिक मोर्चे पर पाण्डव-पक्ष का संकल्प सुदृढ़ किया जा रहा है।

Adhyaya 136

भीष्मद्रोणयोर्दुर्योधनं प्रति शमोपदेशः | Bhīṣma and Droṇa’s Counsel of Conciliation to Duryodhana

Upa-parva: Bhīṣma–Droṇa Anunaya (Conciliatory Counsel to Duryodhana)

Vaiśaṃpāyana reports that, after hearing Kuntī’s pointed and dharmically framed message spoken in Kṛṣṇa’s presence, the senior warriors Bhīṣma and Droṇa address Duryodhana with admonitory counsel. They affirm the coherence and moral seriousness of Kuntī’s words and warn that the Pāṇḍavas, aligned with Vāsudeva’s intent, will not be pacified without a substantive political resolution. They recall prior humiliations inflicted upon the Pāṇḍavas and Draupadī, implying that accumulated grievance now has strategic consequences. The elders emphasize the Pāṇḍavas’ proven capability—Arjuna’s martial achievements and alliances, Bhīma’s force, and Kṛṣṇa’s support—arguing that expecting their capitulation is unrealistic. They outline a ritualized pathway for reconciliation: approach Yudhiṣṭhira, remove wrongdoing, exchange respectful greetings and embraces with each brother, and restore fraternity. The discourse then pivots to preventative statecraft: ‘enough of war,’ since warfare predicts widespread kṣatriya destruction. A catalogue of ominous signs (hostile celestial indications, alarming animal behavior, unsettling city and camp phenomena) is presented as corroborating evidence of impending calamity. The chapter closes with a direct governance imperative: Duryodhana’s choice determines either peace or exertion/war, and refusal will lead to suffering when confronting the Pāṇḍava forces and their distinctive battle-sounds (Bhīma’s roar and the resonance of Gāṇḍīva).

Chapter Arc: कुन्ती श्रीकृष्ण से कहती है—अर्जुन के पास मेरा संदेश ले जाओ; उसके जन्म-क्षण की दिव्य वाणी और भविष्यवाणी उसे फिर स्मरण कराओ, ताकि उसका संकल्प अडिग हो। → कुन्ती अर्जुन के भीतर उठ सकने वाले मोह, करुणा और संदेह के विरुद्ध ‘धर्म’ का आवाहन करती है; वह बताती है कि भीम का क्रोध शत्रुओं का अंत किये बिना शांत नहीं होगा, और क्षत्रिय-धर्म का निर्णायक काल आ पहुँचा है। → कुन्ती का कठोर-करुण आदेश: अर्जुन को दिव्य आकाशवाणी का वचन सुनाकर कहो—वह समस्त कौरवों को संग्राम में जीतेगा, भीम के साथ रहकर लोक-धर्म की रक्षा करेगा; और द्यूत-सभा में द्रौपदी के अपमान को पुनः स्मरण कराकर उसे प्रतिज्ञा-बल से जगा दो। → श्रीकृष्ण कुन्ती के वचन स्वीकार कर विदा लेते हैं; वे शीघ्रगामी पक्षियों-से वेग से उपप्लव्य नगर की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ पाण्डवों के साथ आगे की नीति-योजना और दूत-कार्य का क्रम बढ़ेगा। → कृष्ण उपप्लव्य पहुँचकर अर्जुन को कुन्ती का संदेश कैसे सुनाएँगे—क्या यह स्मरण उसे युद्ध के लिए पूर्णतः दृढ़ करेगा, या भीतर का द्वंद्व और तीव्र होगा?

Shlokas

Verse 1

अत-#--#क्रत सप्तत्रिशर्दाधिकशततमोब< ध्याय: कुन्तीका पाण्डवोंके लिये संदेश देना और श्रीकृष्णका उनसे विदा लेकर उपप्लव्य नगरमें जाना कुन्त्युवाच अर्जुन केशव ब्रूयास्त्वयि जाते सम सूतके । उपोपविष्टा नारीभिराश्रमे परिवारिता

এরপর শুরু হল ছত্রিশ অধিক একশো ছত্রিশতম অধ্যায়। এখানে পাণ্ডবদের উদ্দেশে কুন্তীর বার্তা এবং শ্রীকৃষ্ণের তাঁদের কাছ থেকে বিদায় নিয়ে উপপ্লব্য নগরে গমন বর্ণিত। কুন্তী বললেন—“কেশব, তুমি গেলে অর্জুনকে বলো: তোমার জন্মকালে আমি আশ্রমের প্রসূতিগৃহে নারীদের বেষ্টনে বসেছিলাম; তখনই আকাশে এক দিব্য, মনোরম বাণী শুনেছিলাম—‘কুন্তী, তোর এই পুত্র ইন্দ্রসম পরাক্রমী হবে।’”

Verse 2

अथान्तरिक्षे वागासीद्‌ दिव्यरूपा मनोरमा । सहस्राक्षसम: कुन्ति भविष्यत्येष ते सुत:

তখন অন্তরীক্ষে এক দিব্যরূপা, মনোরম বাণী হল—“কুন্তী, তোর এই পুত্র সহস্রাক্ষ (ইন্দ্র)-সম হবে।”

Verse 3

एष जेष्यति संग्रामे कुरून्‌ सर्वान्‌ समागतान्‌ । भीमसेनद्धितीयश्नव लोकमुद्धर्तयिष्पति,“यह भीमसेनके साथ रहकर युद्धमें आये हुए समस्त कौरवोंको जीत लेगा और शत्रु समुदायको व्याकुल कर देगा

এ জন যুদ্ধক্ষেত্রে সমবেত সকল কুরুকে জয় করবে। ভীমসেনকে দ্বিতীয় করে নিয়ে সে শত্রুসেনাকে বিচলিত করবে এবং নিজের পক্ষকে বিপদ থেকে উদ্ধার করবে।

Verse 4

पुत्रस्ते पृथिवीं जेता यशश्नास्य दिवं स्पृशेत्‌ । हत्वा कुरूंश्व॒ संग्रामे वासुदेवसहायवान्‌

তোর এই পুত্র পৃথিবী জয় করবে, আর তার যশ স্বর্গ পর্যন্ত পৌঁছবে। বাসুদেবকে (শ্রীকৃষ্ণকে) সহায় করে সে যুদ্ধক্ষেত্রে কুরুবংশীয় শত্রুদের নিধন করবে।

Verse 5

पित्र्यमंशं प्रणष्टं च पुनरप्युद्धरिष्यति । भ्रातृभि: सहित: श्रीमांस्त्रीन्‌ मेधानाहरिष्यति

সে পিতৃ-অংশের যে ভাগ নষ্ট হয়েছে, তা পুনরায় উদ্ধার করবে। ভ্রাতৃগণের সহিত সেই শ্রীমান তিনটি অশ্বমেধ যজ্ঞ সম্পন্ন করবে।

Verse 6

स सत्यसंधो बीभत्सु: सव्यसाची यथाच्युत । तथा त्वमेव जानासि बलवन्तं दुरासदम्‌,अच्युत! सव्यसाची अर्जुन जैसा सत्यप्रतिज्ञ है तथा उसमें जितना बल एवं दुर्जय शक्ति है, उसे तुम्हीं जानते हो

হে অচ্যুত! সত্যসন্ধ সব্যসাচী বীভৎসু অর্জুন যেমন, তুমি যেমন জানো তেমনই। তার বল ও দুর্জেয়তা কতখানি—তা তুমি একাই জানো।

Verse 7

तथा तदस्तु दाशा्ह यथा वागभ्यभाषत । धर्मश्नेदस्ति वाष्णेय तथा सत्यं भविष्यति

হে দাশার্হ! যেমন বাক্য উচ্চারিত হয়েছে, তেমনই হোক। হে বৃষ্ণেয়! যদি ধর্ম থাকে, তবে তা সত্যরূপে অবশ্যম্ভাবী হবে।

Verse 8

दशाहईकुलनन्दन श्रीकृष्ण! आकाशवाणीने जैसा कहा है, वैसा ही हो, यही मेरी भी इच्छा है। वृष्णिनन्दन! यदि धर्मकी सत्ता है तो वह सब उसी रूपमें सत्य होगा ।।

হে কৃষ্ণ! তুমিও সেই সবই ঠিক সেইরূপে সম্পন্ন করবে। আকাশবাণী যেমন বলেছে, তাতে আমি কোনো দোষ দেখি না; যদি জগতে ধর্মের প্রভাব সত্যই থাকে, তবে সেই বাক্য সেই রূপেই সত্য হবে।

Verse 9

नमो धर्माय महते धर्मो धारयति प्रजा: । एतद्‌ धनंजयो वाच्यो नित्योद्युक्तो वृकोदर:

আমি সেই মহান ধর্মকে নমস্কার করি, কারণ ধর্মই সকল প্রজাকে ধারণ করে। এই বার্তা ধনঞ্জয় অর্জুনকে এবং সদা কর্মোৎসুক বৃকোদর ভীমকেও জানিও—যে উদ্দেশ্যে ক্ষত্রাণী পুত্র প্রসব করে, সেই উপযুক্ত সময় এসে গেছে; শ্রেষ্ঠ পুরুষ বৈর স্থির হলে উৎসাহ হারায় না।

Verse 10

यदर्थ क्षत्रिया सूते तस्य कालोडयमागत: । न हि वैरं समासाद्य सीदन्ति पुरुषर्षभा:

যে উদ্দেশ্যে ক্ষত্রিয়াণী পুত্র প্রসব করে, সেই উদ্দেশ্যেরই সময় এসে গেছে। শ্রেষ্ঠ পুরুষেরা বৈর গ্রহণ করলে মনোবল হারায় না; ধর্মসম্মত শত্রুতায় প্রবৃত্ত হয়ে তারা কখনও হতাশায় নিমজ্জিত হয় না।

Verse 11

विदिता ते सदा बुद्धिर्भीमस्य न स शाम्यति । यावदन्तं न कुरुते शत्रूणां शत्रुकर्शन

ভীমের সংকল্প ও বুদ্ধি তোমার চিরপরিচিত; তা শান্ত হয় না। যতক্ষণ না সে শত্রুদের অন্ত করে, হে শত্রুনাশক, ততক্ষণ তার শান্তি নেই।

Verse 12

सर्वधर्मविशेषज्ञां स्नुषां पाण्डोर्महात्मन: । ब्रूया माधव कल्याणीं कृष्ण कृष्णां यशस्विनीम्‌

হে মাধব! মহাত্মা পাণ্ডুর পুত্রবধূ, ধর্মের সূক্ষ্ম ভেদ জানেন যিনি, সেই কল্যাণময়ী ও যশস্বিনী কৃষ্ণা—দ্রৌপদীকে আমার কথা জানিও।

Verse 13

युक्तमेतन्महा भागे कुले जाते यशस्विनि । यन्मे पुत्रेषु सर्वेषु यथावत्‌ त्वमवर्तिथा:

হে মহাভাগ্যে, যশস্বিনী, খ্যাতিমান কুলে জন্মগ্রহণকারী! আমার সকল পুত্রের প্রতি তুমি যথাযথভাবে, ধর্মানুযায়ী যে আচরণ করেছ, তা সম্পূর্ণই উপযুক্ত।

Verse 14

माद्रीपुत्रौ च वक्तव्यौ क्षत्रधर्मरतावुभौ । विक्रमेणार्जितान्‌ भोगान्‌ वृणीतं जीवितादपि

আর মাদ্রীর দুই পুত্রকেও বলো—তারা উভয়েই ক্ষত্রধর্মে নিবিষ্ট—‘হে বীরগণ! তোমাদের নিজ পরাক্রমে অর্জিত ভোগ ও অধিকারকে, প্রাণ গেলেও, গ্রহণ করো ও ভোগ করো।’

Verse 15

विक्रमाधिगता हार्था: क्षत्रधर्मेण जीवत: । मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम

হে পুরুষোত্তম! ক্ষাত্রধর্মে জীবনধারণকারী মানুষের হৃদয়কে সর্বদা আনন্দিত করে কেবল নিজের বীর্য-বিক্রমে অর্জিত সম্পদই। অতএব এরপর মাদ্রীর দুই পুত্রকে—যারা সদা ক্ষাত্রধর্মে নিবিষ্ট—আমার এই বার্তা জানিও: “হে বীরগণ! প্রাণ পণ করেও তোমরা কেবল নিজের পরাক্রমে অর্জিত ভোগই ভোগ করো। ক্ষাত্রধর্মে জীবিকা নির্বাহকারী পুরুষের মন সত্যই তৃপ্ত হয় শুধু পরাক্রমার্জিত বস্তুতেই।”

Verse 16

यच्च व: प्रेक्षमाणानां सर्वधर्मोपचायिनाम्‌ । पाज्चाली परुषाप्युक्ता को नु तत्‌ क्षन्तुमहति

আরও, তোমরা—যারা সর্বপ্রকার ধর্মের বৃদ্ধি সাধন কর—তোমাদের চোখের সামনেই পাঞ্চালীকে কঠোর বাক্যে অপমান করা হয়েছে; তা কে-ই বা ক্ষমা করতে পারে?

Verse 17

न राज्यहरणं दु:खं द्यूते चापि पराजय: । प्रत्राजनं सुतानां वा न मे तद्‌ दुःखकारणम्‌

শ্রীকৃষ্ণ! রাজ্য হরণই আমার সর্বাপেক্ষা বড় দুঃখ নয়; পাশায় পরাজয়ও নয়; পুত্রদের নির্বাসনও আমার শোকের মূল কারণ নয়। আমার মহাদুঃখ এই যে, ভরা সভায় কাঁদতে কাঁদতে আমার তরুণী, সুন্দরী পুত্রবধূ দ্রৌপদীকে দুর্যোধনের তিক্ত ও অপমানজনক বাক্য শুনতে হয়েছিল।

Verse 18

यत्र सा बृहती श्यामा सभायां रुदती तदा । अश्रौषीत्‌ परुषा वाचस्तन्मे दुःखतरं महत्‌

যখন সেই দীর্ঘাঙ্গী শ্যামবর্ণা নারী সভায় কাঁদছিল, তখনই তাকে কঠোর বাক্য শুনতে হয়েছিল—শ্রীকৃষ্ণ, সেটাই আমার কাছে সর্বাধিক ও অসহনীয় দুঃখ।

Verse 19

स्त्रीधर्मिणी वरारोहा क्षत्रधर्मरता सदा । नाध्यगच्छत्‌ तदा नाथं कृष्णा नाथवती सती

স্ত্রীধর্মে স্থিত, উচ্চকুলসম্ভূতা এবং সদা ক্ষাত্রধর্মে নিবিষ্ট সেই সতী কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) তখন কোনো রক্ষক পেল না। রক্ষক থাকা সত্ত্বেও, সেদিন কৌরবসভায় তার জন্য কেউ আশ্রয় হয়ে দাঁড়াল না; সে যেন অনাথের মতো অপমান সহ্য করল।

Verse 20

त॑ वै ब्रूहि महाबाहो सर्वशस्त्रभृतां वरम्‌ । अर्जुन पुरुषव्याप्रं द्रौपद्या: पदवीं चर,महाबाहो! समस्त शणस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह अर्जुनसे कहना कि “तुम द्रौपदीके इच्छित पथपर चलो”

হে মহাবাহো! তুমি গিয়ে সর্বশস্ত্রধারীদের শ্রেষ্ঠ, পুরুষব্যাঘ্র অর্জুনকে বলো—দ্রৌপদীর অভিপ্রেত পথে সে অগ্রসর হোক।

Verse 21

विदितं हि तवात्यन्तं क्रुद्धाविव यमान्तकौ । भीमार्जुनी नयेतां हि देवानपि परां गतिम्‌

শ্রীকৃষ্ণ! তুমি তো ভালোই জানো—ভীমসেন ও অর্জুন ক্রুদ্ধ হলে তারা যম ও অন্তকের ন্যায় ভয়ংকর হয়; তারা দেবতাদেরও পরম গতি, অর্থাৎ মৃত্যুর দিকে পাঠাতে সক্ষম।

Verse 22

तयोश्वैतदवज्ञानं यत्‌ सा कृष्णा सभागता । दुःशासनश्व यद्‌ भीम॑ कटुकान्यभ्यभाषत

ওই দু’জনের প্রতি এই অবজ্ঞাই করা হয়েছিল—কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)কে সভায় টেনে আনা হয়েছিল; আর দুঃশাসন ভীমকে তীক্ষ্ণ, কটু বাক্যে আঘাত করেছিল।

Verse 23

पाण्डवान्‌ कुशल पृच्छे: सपुत्रान्‌ कृष्णया सह,जनार्दन! तुम मेरी ओरसे द्रौपदी और पुत्रोंसहित पाण्डवोंसे कुशल पूछना और फिर मुझे भी सकुशल बताना। जाओ, तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो, मेरे पुत्रोंकी रक्षा करना

হে জনার্দন! আমার পক্ষ থেকে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) ও পুত্রসমেত পাণ্ডবদের কুশল জিজ্ঞাসা কোরো; আর পরে আমাকে জানিয়ো যে তারাও নিরাপদে আছে।

Verse 24

मां च कुशलिनी ब्रूयास्तेषु भूयो जनार्दन । अरिए्टं गच्छ पन्थान पुत्रान्‌ मे प्रतिपालय

হে জনার্দন! তাদের আবার বলো যে আমিও কুশলে আছি। তুমি নির্বিঘ্ন পথে যেও, আর আমার পুত্রদের রক্ষা কোরো।

Verse 25

वैशम्पायन उवाच अभिवाद्याथ तां कृष्ण: कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्‌ । निश्चक्राम महाबाहु: सिंहखेलगतिस्ततः

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! তারপর মহাবাহু শ্রীকৃষ্ণ কুন্তীদেবীকে প্রণাম করে তাঁর প্রদক্ষিণা করলেন, এবং সিংহের ন্যায় গর্বিত গতিতে সেখান থেকে প্রস্থান করলেন।

Verse 26

ततो विसर्जयामास भीष्मादीन्‌ कुरुपुड्रवान्‌ । आरोप्याथ रथे कर्ण प्रायात्‌ सात्यकिना सह,फिर भीष्म आदि प्रधान कुरुवंशियोंको उन्होंने विदा कर दिया और कर्णको रथपर बिठाकर सात्यकिके साथ वहाँसे प्रस्थान किया

তারপর তিনি ভীষ্ম প্রমুখ প্রধান কুরুবংশীয়দের বিদায় দিলেন। এরপর কর্ণকে রথে বসিয়ে সাত্যকির সঙ্গে সেখান থেকে প্রস্থান করলেন।

Verse 27

ततः प्रयाते दाशाहें कुरव: संगता मिथ: । जजल्पुर्महदाश्चर्य केशवे परमाद्भुतम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—দাশার্হকুলভূষণ কেশব চলে গেলে কৌরবরা পরস্পরে একত্র হল এবং শ্রীকৃষ্ণের পরম আশ্চর্য, মহাবিস্ময়কর শক্তি ও ঐশ্বর্যের কথা আলোচনা করতে লাগল।

Verse 28

प्रमूढा पृथिवी सर्वा मृत्युपाशवशीकृता । दुर्योधनस्य बालिश्यान्नैतदस्तीति चाब्रुवन्‌

তারা বলল—“সমস্ত পৃথিবী যেন মোহে আচ্ছন্ন হয়ে মৃত্যুর পাষে বশীভূত হয়েছে। দুর্যোধনের বালিশতা থেকেই এর বিনাশ ঘটবে”—তবু তারা আবার বলত—“এমন হতে পারে না।”

Verse 29

ततो निर्याय नगरात्‌ प्रययौ पुरुषोत्तम: । मन्त्रयामास च तदा कर्णेन सुचिरं सह,उधर पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्ण जब नगरसे निकलकर उपप्लव्यकी ओर चले, तब उन्होंने दीर्घकालतक कर्णके साथ मन्त्रणा की

তারপর পুরুষোত্তম শ্রীকৃষ্ণ নগর থেকে বেরিয়ে উপপ্লব্যের দিকে যাত্রা করলেন। সেই সময় তিনি কর্ণের সঙ্গে দীর্ঘক্ষণ গভীর পরামর্শ করলেন।

Verse 30

विसर्जयित्वा राधेयं सर्वयादवनन्दन: । ततो जवेन महता तूर्णमश्वानचोदयत्‌,फिर राधानन्दन कर्णको विदा करके सम्पूर्ण यदुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीकृष्णने तुरंत ही बड़े वेगसे अपने रथके घोड़े हँकवाये

বৈশম্পায়ন বললেন— রাধেয় (কর্ণ)-কে বিদায় দিয়ে, সমগ্র যাদবদের আনন্দ শ্রীকৃষ্ণ তখনই মহাবেগে রথের অশ্বদের তাড়িত করলেন।

Verse 31

ते पिबन्त इवाकाशं दारुकेण प्रचोदिता: । हया जम्मुर्महावेगा मनोमारुतरंहस:,दारुकके हाँकनेपर वे महान्‌ वेगशाली अश्व मन और वायुके समान तीव्र गतिसे आकाशको पीते हुए-से चले

বৈশম্পায়ন বললেন— দারুকের প্রেরণায় সেই মহাবেগী অশ্বেরা মন ও বায়ুর ন্যায় তীব্র গতিতে ধাবিত হল; যেন তারা আকাশকেই পান করে চলেছে।

Verse 32

ते व्यतीत्य महाध्वान क्षिप्रं श्येना इवाशुगा: । उच्चैर्जग्मुरुपप्लव्यं शार्डधन्वानमावहन्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— তারা দ্রুতগামী বাজপাখির ন্যায় সেই দীর্ঘ পথ অতিক্রম করে, শার্ঙ্গধনু-ধারী ভগবান শ্রীকৃষ্ণকে উপপ্লব্য নগরে পৌঁছে দিল।

Verse 136

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें विदुलाके द्वारा पुत्रको दिये जानेवाले उपदेशका समाप्तिविषयक एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে বিদুলা কর্তৃক পুত্রকে প্রদত্ত উপদেশ-প্রসঙ্গে একশো ছত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 137

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कुन्तीवाक्ये सप्तत्रिंशदधिकशततमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে কুন্তীবাক্য-প্রসঙ্গে একশো সাঁইত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত।

Verse 226

पश्यतां कुरुवीराणां तच्च संस्मारये: पुनः । जुएके समय द्रौपदीको जो सभामें जाना पड़ा और कौरव वीरोंके सामने ही दुर्योधन और दु:शासनने जो उसे गालियाँ दीं

কুরুবীরদের চোখের সামনেই আমি তোমাদের সেই ঘটনাটি আবার স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি। এক সময় দ্রৌপদীকে বাধ্য হয়ে রাজসভায় যেতে হয়েছিল, আর সেই কৌরব যোদ্ধাদের সামনেই দুর্যোধন ও দুঃশাসন তাকে অপমানজনক বাক্যে গালিগালাজ করেছিল। সেই অত্যাচার আসলে ভীমসেন ও অর্জুনেরও অবমাননা। তাই আমি সেই স্মৃতি পুনরায় জাগিয়ে তুলছি।

Frequently Asked Questions

Whether Duryodhana will accept corrective settlement and reconciliation—acknowledging wrongdoing and restoring political balance—or persist in pride-driven escalation that predictably harms kin, polity, and the wider kṣatriya order.

Treat peace as a duty of governance: heed well-wisher counsel, recognize the limits of coercion against wronged parties, and choose reconciliation procedures (respectful approach, greetings, embraces, and restitution) to prevent avoidable systemic loss.

No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the chapter’s meta-function is pragmatic-ethical—positioning conciliation as rājadharma and framing omens as cautionary prompts rather than offering a direct mokṣa-oriented commendation.