
Adhyāya 12: Devas’ Petition to Nahūṣa; Bṛhaspati on Śaraṇāgata-Dharma; Indrāṇī’s Strategic Delay
Upa-parva: Nahūṣa–Indrāṇī Episode (Embedded Itihāsa within Udyoga Parva)
Śalya narrates a crisis episode: the devas and ṛṣis, recognizing Nahūṣa’s anger and coercive intent, urge him to abandon krodha and to refrain from violating another’s marital bond. Nahūṣa, driven by desire and entitlement, rejects counsel and responds by citing Indra’s prior misconduct (Ahalyā) as a rhetorical justification, demanding that Indrāṇī be brought to him. The devas approach Bṛhaspati, acknowledging that Indrāṇī has taken refuge in his house under promised safety. Pressured to surrender her, Bṛhaspati refuses on principled grounds: a protector must not deliver a frightened supplicant to an adversary, and he supports this with compact aphoristic verses describing the social and ritual ruin that follows betrayal of refuge. He then proposes a strategic alternative—requesting a short delay from Nahūṣa—arguing that time will generate obstacles and that Nahūṣa’s pride, intensified by boons, will likely precipitate his own downfall. The devas accept this counsel and persuade Indrāṇī, praising her steadfastness and urging her to approach Nahūṣa for the plan’s success. Indrāṇī proceeds with modest reluctance, and Nahūṣa reacts with elation, his judgment impaired by desire—setting the stage for subsequent reversal.
Chapter Arc: शल्य के वचन से देव-सभा का दृश्य खुलता है—नहुष के क्रोध और काम से त्रस्त इन्द्राणी की रक्षा का प्रश्न उठ खड़ा होता है, और देवता उसे शांत करने की याचना करते हैं: ‘देवराज! क्रोध छोड़ें।’ → देवता नहुष को समझाते हैं कि श्रेष्ठ जन परायी स्त्री पर कुपित/आसक्त नहीं होते; पर संकट टलता नहीं। इन्द्राणी आँसुओं में डूबी बृहस्पति के पास जाती है और उपाय माँगती है। बृहस्पति ब्राह्मण-धर्म, सत्य और नीति की मर्यादा का स्मरण कराते हुए भी देव-हित का मार्ग खोजते हैं—समय जीतना ही अब रक्षा है। → निर्णायक योजना बनती है: इन्द्राणी स्वयं नहुष के पास जाए और ‘पाँच-छह समय’ (अवधि) माँगकर उसे टाल दे—देवता उसे पतिव्रता-सत्यपरायणा कहकर धैर्य बँधाते हैं और नहुष के शीघ्र विनाश का संकेत देते हैं। → देवताओं की सहमति और बृहस्पति की नीति-युक्त सलाह से इन्द्राणी का कर्तव्य स्पष्ट होता है—वह भय के बावजूद समय-याचना के लिए प्रस्थान करती है, ताकि इन्द्र की रक्षा और नहुष के अधर्म का अंत निकट लाया जा सके। → इन्द्राणी को देखते ही नहुष काम से अंधा होकर हर्षित होता है—अब उसके सामने इन्द्राणी की वाणी-नीति की परीक्षा है कि वह कैसे समय माँगकर संकट को टाल पाएगी।
Verse 1
2 ड-ण का द्वादशोड् ध्याय: देवता-नहुष-संवाद, बृहस्पतिके द्वारा इन्द्राणीकी रक्षा तथा इन्द्राणीका नहुषके 5 कक छ समयकी अवधि माँगनेके जाना शल्य उवाच क्रुद्धं तु नहुषं दृष्टवा देवा ऋषिपुरोगमा: । अब्लुवन् देवराजानं नहुषं घोरदर्शनम्,शल्य कहते हैं--युधिष्ठि!! देवराज नहुषको क्रोधमें भरे हुए देख देवतालोग ऋषियोंको आगे करके उनके पास गये। उस समय उनकी दृष्टि बड़ी भयंकर प्रतीत होती थी। देवताओं तथा ऋषियोंने कहा--
শল্য বললেন—যুধিষ্ঠির! ক্রোধে উন্মত্ত নহুষকে দেখে দেবতারা ঋষিদের অগ্রে রেখে তাঁর কাছে গেলেন এবং ভয়ংকর দর্শন দেবরাজ নহুষকে বললেন। তখন দেবতা ও ঋষিগণ বললেন—
Verse 2
देवराज जहि क्रोध॑ त्वयि क्रुद्धे जगद् विभो । त्रस्तं सासुरगन्धर्व सकिन्नरमहोरगम्,“देवराज! आप क्रोध छोड़ें। प्रभो! आपके कुपित होनेसे असुर, गन्धर्व, किन्नर और महानागगणोंसहित सम्पूर्ण जगत् भयभीत हो उठा है
দেবরাজ! ক্রোধ ত্যাগ করুন। বিভো! আপনি ক্রুদ্ধ হলে অসুর, গন্ধর্ব, কিন্নর ও মহাসর্পসহ সমগ্র জগৎ কাঁপতে থাকে। শাসকের ক্রোধই সর্বত্র ভয় ও বিশৃঙ্খলা ডেকে আনে; অতএব রোষ সংযত করুন।
Verse 3
जहि क्रोधमिमं साधो न कुप्यन्ति भवद्विधा: । परस्य पत्नी सा देवी प्रसीदस्व सुरेश्वर,'साधो! आप इस क्रोधको त्याग दीजिये। आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंपर कोप नहीं करते हैं। अतः प्रसन्न होइये। सुरेश्वर! शची देवी दूसरे इन्द्रकी पत्नी हैं
সাধু! এই ক্রোধ ত্যাগ করুন; আপনার মতো মহাপুরুষ অন্যের প্রতি রোষ পোষণ করেন না। অতএব প্রসন্ন হোন, সুরেশ্বর! সেই দেবী শচী অন্য ইন্দ্রের পত্নী—অর্থাৎ তিনি পরের।
Verse 4
निवर्तय मन: पापात् परदाराभिमर्शनात् | देवराजो5सि भद्ठं ते प्रजा धर्मेण पालय,“परायी स्त्रियोंका स्पर्श पापकर्म है। उससे मनको हटा लीजिये। आप देवताओंके राजा हैं। आपका कल्याण हो। आप धर्मपूर्वक प्रजाका पालन कीजिये'
পরস্ত্রীর স্পর্শ ও অনুসরণ পাপ; সেখান থেকে মন ফিরিয়ে নিন। আপনি দেবরাজ—আপনার মঙ্গল হোক। ধর্মের পথে প্রজাকে পালন ও রক্ষা করুন।
Verse 5
एवमुक्तो न जग्राह तद्गच: काममोहितः । अथ देवानुवाचेदमिन्द्रं प्रति सुराधिप:,उनके ऐसा कहनेपर भी काममोहित नहुषने उनकी बात नहीं मानी। उस समय देवेश्वर नहुषने इन्द्रके विषयमें देवताओंसे इस प्रकार कहा--
এভাবে বলা সত্ত্বেও কাম ও মোহে আচ্ছন্ন নহুষ তাদের কথা গ্রহণ করল না। তখন দেবাধিপ নহুষ ইন্দ্র সম্বন্ধে দেবতাদের উদ্দেশে এই কথা বলল।
Verse 6
अहल्या धर्षिता पूर्वमृषिपत्नी यशस्विनी । जीवतो भर्तुरिन्द्रेण स व: कि न निवारित:,'देवताओ! जब इन्द्रने पूर्वकालमें यशस्विनी ऋषि-पत्नी अहल्याका उसके पति गौतमके जीते-जी सतीत्व नष्ट किया था, उस समय आपलोगोंने उन्हें क्यों नहीं रोका?
হে দেবগণ! পূর্বকালে যশস্বিনী ঋষিপত্নী অহল্যা—স্বামীর জীবিত থাকতেই—ইন্দ্রের দ্বারা লাঞ্ছিত হয়েছিল; তখন আপনারা কেন তাকে নিবৃত্ত করেননি?
Verse 7
बहूनि च नृशंसानि कृतानीन्द्रेण वै पुरा । वैधर्म्याण्युपधाश्वैव स व: कि न निवारित:,'प्राचीनकालमें इन्द्रने बहुत-से क्रूरतापूर्ण कर्म किये हैं। अनेक अधार्मिक कृत्य तथा छल-कपट उनके द्वारा हुए हैं। उन्हें आपलोगोंने क्यों नहीं रोका था?
শল্য বললেন—প্রাচীন কালে ইন্দ্র বহু নিষ্ঠুর কর্ম করেছিলেন। ধর্মবিরুদ্ধ বহু আচরণ ও ছল-কৌশলও তিনি করেছিলেন; তবে তোমরা তখন তাঁকে কেন নিবৃত্ত করনি?
Verse 8
उपतिष्ठतु देवी मामेतदस्या हितं परम् । युष्माकं च सदा देवा: शिवमेवं भविष्यति,“शची देवी मेरी सेवामें उपस्थित हों। इसीमें इनका परम हित है तथा देवताओ! ऐसा होनेपर ही सदा तुम्हारा कल्याण होगा”
শল্য বললেন—শচী দেবী আমার সেবায় উপস্থিত হোন; এতে তাঁর পরম মঙ্গল। আর হে দেবগণ, এভাবেই হলে তোমাদের কল্যাণ ও শুভতা সদা স্থির থাকবে।
Verse 9
देवा ऊचु इन्द्राणीमानयिष्यामो यथेच्छसि दिवस्पते । जहि क्रोधमिमं वीर प्रीतो भव सुरेश्वर,देवता बोले--स्वर्गलोकके स्वामी वीर देवेश्वर! आपकी जैसी इच्छा है, उसके अनुसार हमलोग इन्द्राणीको आपकी सेवामें ले आयेंगे। आप यह क्रोध छोड़िये और प्रसन्न होइये
দেবতারা বললেন—হে দিবস্পতী, আপনি যেমন চান তেমনই আমরা ইন্দ্রাণীকে আপনার সেবায় নিয়ে আসব। হে বীর সুরেশ্বর, এই ক্রোধ ত্যাগ করুন এবং প্রসন্ন হন।
Verse 10
शल्य उवाच इत्युक्त्वा तं तदा देवा ऋषिभि: सह भारत । जम्मुर्ब॑हस्पतिं वक्तुमिन्द्राणीं चाशुभं वच:
শল্য বললেন—হে ভারত, এ কথা বলে তখন দেবতারা ঋষিদের সঙ্গে বৃহস্পতির কাছে গেলেন, এবং ইন্দ্রাণীকেও তৎক্ষণাৎ কঠোর অর্থবহ বাক্য বলার জন্য অগ্রসর হলেন।
Verse 11
शल्यने कहा--युधिष्ठिर! नहुषसे ऐसा कहकर उस समय सब देवता ऋषियोंके साथ इन्द्राणीसे यह अशुभ वचन कहनेके लिये बृहस्पतिजीके पास गये ।। जानीम: शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि । दत्ताभयां च विप्रेन्द्र त्वया देवर्षिसत्तम,उन्होंने कहा--'देवर्षिप्रवर! विप्रेन्द्र! हमें पता लगा है कि इन्द्राणी आपकी शरणमें आयी हैं और आपके ही भवनमें रह रही हैं। आपने उन्हें अभय-दान दे रखा है
তাঁরা বললেন—হে দেবর্ষিশ্রেষ্ঠ, হে বিপ্রেন্দ্র! আমরা জেনেছি যে ইন্দ্রাণী আপনার শরণে এসে আপনার গৃহেই অবস্থান করছেন; আর হে শ্রেষ্ঠ ঋষি, আপনি তাঁকে অভয়দান (রক্ষা) দিয়েছেন।
Verse 12
ते त्वां देवा: सगन्धर्वा ऋषयश्न महाद्युते । प्रसादयन्ति चेन्द्राणी नहुषाय प्रदीयताम्,“महद्युते! अब ये देवता, गन्धर्व तथा ऋषि आपको इस बातके लिये प्रसन्न करा रहे हैं कि आप इन्द्राणीको राजा नहुषकी सेवामें अर्पण कर दीजिये इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीकालावधियाचने द्वादशोड्ध्याय:
মহাদ্যুতে! দেবগণ, গন্ধর্বগণ ও ঋষিগণ তোমাকে প্রসন্ন করে এই অনুরোধই করছে—ইন্দ্রাণীকে রাজা নহুষের হাতে সমর্পণ করা হোক।
Verse 13
इन्द्राद् विशिष्टो नहुषो देवराजो महाद्युति: । वृणोत्त्मं वरारोहा भर्तृत्वे वरवर्णिनी,“इस समय महातेजस्वी नहुष देवताओंके राजा हैं। अतः इन्द्रसे बढ़कर हैं। सुन्दर रूप- रंगवाली शची इन्हें अपना पति स्वीकार कर लें”
মহাতেজস্বী নহুষ এখন দেবরাজ; তিনি ইন্দ্রেরও ঊর্ধ্বে। অতএব, সুন্দরাঙ্গী, মনোহরবর্ণা শচী—তাঁকেই স্বামী রূপে গ্রহণ করো।
Verse 14
एवमुक्ता तु सा देवी बाष्पमुत्सूज्य सस्वनम् । उवाच रुदती दीना बृहस्पतिमिदं वच:,देवताओंके यह बात कहनेपर शची देवी आँसू बहाती हुई फूट-फ़ूटकर रोने लगीं और दीन-भावसे बृहस्पतिजीको सम्बोधित करके इस प्रकार बोलीं--
দেবগণের এমন কথা শুনে দেবী শচী সশব্দে অশ্রু ঝরাতে লাগলেন। দীনভাবে কাঁদতে কাঁদতে তিনি বৃহস্পতিকে এই বাক্য বললেন।
Verse 15
नाहमिच्छामि नहुषं पतिं देवर्षिसत्तम । शरणागतासि्मि ते ब्रह्मंंस्त्रायस्व महतो भयात्,'देवर्षियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! मैं नहुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती; इसीलिये आपकी शरणमें आयी हूँ। आप इस महान् भयसे मेरी रक्षा कीजिये”
দেবর্ষিদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদেব! আমি নহুষকে স্বামী রূপে চাই না। তাই তোমার শরণ নিয়েছি—এই মহাভয় থেকে আমাকে রক্ষা করো।
Verse 16
ब॒हस्पतिरुवाच शरणागतं न त्यजेयमिन्द्राणि मम निश्चय: । धर्मज्ञां सत्यशीलां च न त्यजेयमनिन्दिते,बृहस्पतिने कहा--इन्द्राणी! मैं शरणागतका त्याग नहीं कर सकता, यह मेरा दृढ़ निश्चय है। अनिन्दिते! तुम धर्मज्ञ और सत्यशील हो; अतः मैं तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा
বৃহস্পতি বললেন—ইন্দ্রাণী! শরণাগতকে আমি ত্যাগ করব না—এটাই আমার দৃঢ় সংকল্প। হে অনিন্দিতা! তুমি ধর্মজ্ঞা ও সত্যনিষ্ঠা; তাই তোমাকেও আমি ত্যাগ করব না।
Verse 17
नाकार्य कर्तुमिच्छामि ब्राह्मण: सन् विशेषत: । श्रुतर्थर्मा सत्यशीलो जानन् धर्मानुशासनम्,विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता। मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है। शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठटण! आपलोग लौट जायँ। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये
শল্য বললেন—যা করা উচিত নয়, তা আমি করতে চাই না; বিশেষত আমি ব্রাহ্মণ। আমি ধর্মের উপদেশ শুনেছি, সত্যকে স্বভাব করেছি, এবং শাস্ত্রবিধানে যে ধর্মশাসন আছে তা জানি। অতএব আমি এই পাপকর্ম করব না। হে দেবশ্রেষ্ঠগণ, তোমরা প্রত্যাবর্তন করো। এ বিষয়ে প্রাচীনকালে ব্রহ্মা যে গীত গেয়েছিলেন, তা শোনো।
Verse 18
नाहमेतत् करिष्यामि गच्छथ्वं वै सुरोत्तमा: । असिमिंश्षार्थे पुरा गीत॑ ब्रह्मणा श्रूयतामिदम्,विशेषतः ब्राह्मण होकर मैं यह न करने योग्य कार्य नहीं कर सकता। मैंने धर्मकी बातें सुनी हैं और सत्यको अपने स्वभावमें उतार लिया है। शास्त्रोंमें जो धर्मका उपदेश किया गया है, उसे भी जानता हूँ; अतः मैं यह पापकर्म नहीं करूँगा! सुरश्रेष्ठटण! आपलोग लौट जायँ। इस विषयमें ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जो गीत गाया था, वह इस प्रकार है, सुनिये
শল্য বললেন—আমি এটা করব না। হে দেবশ্রেষ্ঠগণ, তোমরা চলে যাও। এই বিষয়েই প্রাচীনকালে ব্রহ্মা যে উপদেশ-গীত গেয়েছিলেন, তা শোনো।
Verse 19
न तस्य बीजं रोहति रोहकाले न तस्य वर्ष वर्षति वर्षकाले । भीतं प्रपन्न॑ प्रददाति शत्रवे न सत्रातारं लभते त्राणमिच्छन्,“जो भयभीत होकर शरणमें आये हुए प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसका बोया हुआ बीज समयपर नहीं जमता है। उसके यहाँ ठीक समयपर वर्षा नहीं होती और वह जब कभी अपनी रक्षा चाहता है, तो उसे कोई रक्षक नहीं मिलता है
যে ব্যক্তি ভয়ে শরণাগত প্রাণীকে তার শত্রুর হাতে তুলে দেয়, তার বোনা বীজ সময়ে অঙ্কুরিত হয় না; তার জন্য সময়মতো বৃষ্টি হয় না; আর যখন সে নিজে রক্ষা চায়, তখন কোনো রক্ষক পায় না।
Verse 20
मोघमन्नं विन्दति चाप्यचेता: स्वर्गाल्लोकाद् भ्रश्यति नष्टचेष्ट: । भीतं प्रपन्न॑ प्रददाति यो वै न तस्य हव्यं॑ प्रतिगृह्नन्ति देवा:,“जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें सौंप देता है, वह दुर्बलचित्त मानव जो अन्न ग्रहण करता है, वह व्यर्थ हो जाता है। उसके सारे उद्यम नष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्गलोकसे नीचे गिर जाता है। इतना ही नहीं, देवतालोग उसके दिये हुए हविष्यको स्वीकार नहीं करते हैं
যে দুর্বুদ্ধি ব্যক্তি ভীত শরণাগতকে শত্রুর হাতে তুলে দেয়, তার আহারও নিষ্ফল হয়; তার সব উদ্যোগ নষ্ট হয়; সে স্বর্গলোক থেকে পতিত হয়; আর দেবতারা তার অর্পিত হব্য গ্রহণ করেন না।
Verse 21
प्रमीयते चास्य प्रजा हकाले सदा विवासं पितरो<सस््य कुर्वते । भीतं प्रपन्न॑ प्रददाति शत्रवे सेन्द्रा देवा: प्रहरन्त्यस्य वज्ञम्,“उसकी संतान अकालमें ही मर जाती है। उसके पितर सदा नरकमें निवास करते हैं। जो भयभीत शरणागतको शत्रुके हाथमें दे देता है, उसपर इन्द्र आदि देवता वज्रका प्रहार करते हैं!
যে ব্যক্তি ভীত শরণাগতকে শত্রুর হাতে তুলে দেয়, তার সন্তান অকালেই মারা যায়; তার পিতৃগণ সদা নরকে বাস করেন; আর ইন্দ্রসহ দেবতারা তার ওপর বজ্রাঘাত করেন।
Verse 22
एतदेवं विजानन् वै न दास्यामि शचीमिमाम् | इन्द्राणीं विश्रुतां लोके शक्रस्य महिषीं प्रियाम्,इस प्रकार ब्रह्माजीके उपदेशके अनुसार शरणागतके त्यागसे होनेवाले अधर्मको मैं निश्चितरूपसे जानता हूँ; अतः जो सम्पूर्ण विश्वमें इन्द्रकी पत्नी तथा देवराजकी प्यारी पटरानीके रूपमें विख्यात हैं, उन्हीं इन शची देवीको मैं नहुषके हाथमें नहीं दूँगा
শরণাগতকে ত্যাগ করলে অধর্ম হয়—এ কথা আমি নিশ্চিতভাবে জানি। অতএব যিনি সমগ্র জগতে ইন্দ্রাণী, শক্রের প্রিয় প্রধান মহিষী রূপে প্রসিদ্ধ, সেই শচী দেবীকে আমি নহুষের হাতে দেব না।
Verse 23
अस्या हित॑ भवेद् यच्च मम चापि हित॑ भवेत् | क्रियतां तत् सुरश्रेष्ठा न हि दास्याम्यहं शचीम्,श्रेष्ठ देवताओ! जो इनके लिये हितकर हो, जिससे मेरा भी हित हो, वह कार्य आपलोग करें। मैं शचीको कदापि नहीं दूँगा
হে দেবশ্রেষ্ঠগণ! যা তাঁর মঙ্গলকর এবং আমারও মঙ্গল সাধন করে, সেই ব্যবস্থাই আপনারা করুন। আমি শচীকে কখনোই দেব না।
Verse 24
शल्य उवाच अथ देवा: सगन्धर्वा गुरुमाहुरिदं वच: । कथं सुनीतं नु भवेन्मन्त्रयस्व बृहस्पते,शल्य कहते हैं--राजन! तब देवताओं तथा गन्धवोने गुरुसे इस प्रकार कहा --“बृहस्पते! आप ही सलाह दीजिये कि किस उपायका अवलम्बन करनेसे शुभ परिणाम होगा?”
শল্য বললেন—রাজন! তখন দেবতারা গন্ধর্বদের সঙ্গে তাদের গুরুজনকে বললেন—“হে বৃহস্পতি, পরামর্শ দিন—কোন পথ অবলম্বন করলে ফল সুপরিচালিত ও মঙ্গলময় হবে?”
Verse 25
ब॒हस्पतिरुवाच नहुषं याचतां देवी किंचित् कालान्तरं शुभा । इन्द्राणी हितमेतद्धि तथास्माकं भविष्यति,बृहस्पतिजीने कहा--देवगण! शुभलक्षणा शची देवी नहुषसे कुछ समयकी अवधि माँगें। इसीसे इनका और हमारा भी हित होगा
বৃহস্পতি বললেন—দেবগণ! শুভলক্ষণাযুক্ত ইন্দ্রাণী শচী যেন নহুষের কাছে সামান্য সময়ের অবকাশ প্রার্থনা করে। এতে তাঁরও মঙ্গল হবে, আমাদেরও কল্যাণ হবে।
Verse 26
बहुविघ्न: सुरा: काल: काल: कालं॑ नयिष्यति । गर्वितो बलवांश्षापि नहुषो वरसंश्रयात्,देवताओ! समय अनेक प्रकारके विघ्नोंसे भरा होता है। इस समय नहुष आपलोगोंके वरदानके प्रभावसे बलवान् और गर्वीला हो गया है। काल ही उसे कालके गालमें पहुँचा देगा
হে দেবগণ! সময় বহু বিঘ্নে পরিপূর্ণ। কালই কালকে তার নির্ধারিত পরিণতির দিকে নিয়ে যায়। তোমাদের বরদানের আশ্রয়ে নহুষ শক্তিমান ও গর্বিত হয়েছে; কিন্তু কালই তাকে মৃত্যুর গহ্বরে ঠেলে দেবে।
Verse 27
शल्य उवाच ततस्तेन तथोक्ते तु प्रीता देवास्तथाब्रुवन् । ब्रह्मन् साथ्विवमुक्त ते हितं सर्वदिवौकसाम्,शल्य कहते हैं--राजन्! उनके इस प्रकार सलाह देनेपर देवता बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले--'ब्रह्मनन्! आपने बहुत अच्छी बात कही है। इसीमें सम्पूर्ण देवताओंका हित है
শল্য বললেন—তাঁর এভাবে বলার পর দেবতারা অত্যন্ত প্রসন্ন হয়ে বললেন—‘হে ব্রাহ্মণ! তুমি যে কথা বলেছ তা সত্যিই উৎকৃষ্ট; এতে স্বর্গবাসী সকলেরই মঙ্গল নিহিত।’
Verse 28
एवमेतद् द्विजश्रेष्ठ देवी चेयं प्रसाद्यताम् ततः: समस्ता इन्द्राणीं देवाश्चाग्निपुरोगमा: । ऊचुर्वचनमव्यग्रा लोकानां हितकाम्यया,'द्विजश्रेष्ठ] इसी बातके लिये शची देवीको राजी कीजिये।” तदनन्तर अग्नि आदि सब देवता इन्द्राणीके पास जा समस्त लोकोंके हितके लिये शान्तभावसे इस प्रकार बोले
‘এমনই হোক, হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এই দেবীকে প্রসন্ন করো।’ তারপর অগ্নিকে অগ্রে রেখে সকল দেবতা ইন্দ্রাণীর কাছে গিয়ে, সকল লোকের মঙ্গল কামনায়, অব্যগ্রচিত্তে শান্তভাবে তাকে বললেন।
Verse 29
देवा ऊचु त्वया जगदिदं सर्व धृतं स्थावरजड्रमम् | एकपत्न्यसि सत्या च गच्छस्व नहुषं प्रति
দেবতারা বললেন—‘দেবি! তোমার দ্বারাই এই সমগ্র জগৎ—স্থাবর ও জঙ্গম—ধৃত আছে। তুমি একপত্নীব্রতা এবং সত্যনিষ্ঠা; অতএব নহুষের কাছে যাও।’
Verse 30
क्षिप्रं वामभिकामश्न विनशिष्यति पापकृत् | नहुषो देवि शक्रश्न सुरैश्चवर्यमवाप्स्यति
‘অচিরেই কামান্ধ পাপী বিনষ্ট হবে। হে দেবি! না নহুষ, না শক্র—কেউই দেবতাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠত্ব লাভ করতে পারবে না।’
Verse 31
देवता बोले--देवि! यह समस्त चराचर जगत् तुमने ही धारण कर रखा है, क्योंकि तुम पतिव्रता और सत्यपरायणा हो। अतः तुम नहुषके पास चलो। देवेश्वरि! तुम्हारी कामना करनेके कारण पापी नहुष शीघ्र नष्ट हो जायगा और इन्द्र पुनः अपने देवसाम्राज्यको प्राप्त कर लेंगे ।। एवं विनिश्चयं कृत्वा इन्द्राणी कार्यसिद्धये । अभ्यगच्छत सव्रीडा नहुषं घोरदर्शनम्,अपनी कार्य-सिद्धिके लिये ऐसा निश्चय करके इन्द्राणी भयंकर दृष्टिवाले नहुषके पास बड़े संकोचके साथ गयी
দেবতারা বললেন—‘দেবি! তুমি পতিব্রতা ও সত্যনিষ্ঠা বলেই এই সমগ্র চরাচর জগৎ তোমার দ্বারাই ধারণ করা আছে। অতএব নহুষের কাছে যাও। হে দেবেশ্বরি! তোমাকে কামনা করার ফলে পাপী নহুষ অচিরেই বিনষ্ট হবে এবং ইন্দ্র পুনরায় দেবসাম্রাজ্য লাভ করবেন।’ এই সিদ্ধান্ত করে কার্যসিদ্ধির জন্য লজ্জাসংকোচে ইন্দ্রাণী ভয়ংকর দৃষ্টিসম্পন্ন নহুষের কাছে গেলেন।
Verse 32
दृष्टवा तां नहुषश्चापि वयोरूपसमन्विताम् | समदह्ृष्यत दुष्टात्मा कामोपहतचेतन:,नयी अवस्था और सुन्दर रूपसे सुशोभित इन्द्राणीको देखकर दुष्टात्मा नहुष बहुत प्रसन्न हुआ। कामभावनासे उसकी बुद्धि मारी गयी थी
যৌবন ও রূপে বিভূষিতা ইন্দ্রাণীকে দেখে দুষ্টচিত্ত নহুষ আনন্দে উন্মত্ত হয়ে উঠল। কামনায় আঘাতপ্রাপ্ত তার চিত্ত-বুদ্ধি সংযম ও নীতিবোধ হারাল।
Whether Bṛhaspati and the devas should comply with an illegitimate demand by surrendering Indrāṇī, despite her having sought refuge under explicit protection—pitting expedient appeasement against the binding duty to safeguard a supplicant.
That betrayal of a frightened person who has taken refuge is a foundational breach that undermines prosperity, ritual legitimacy, and social trust; ethical governance begins with honoring protection pledges even under political pressure.
No explicit phalaśruti appears in this chapter; instead, the text uses normative consequences (social, ritual, and political ruin) as meta-commentary to reinforce why the doctrine of refuge-protection is indispensable to dharma.