
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, जुए के परिणामों से व्याकुल, विदुर से पूछता है—वनगमन के लिए निकले धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव, द्रौपदी और धौम्य कैसे जा रहे हैं; नगर और जन-मन की दशा क्या है। → विदुर का वर्णन यात्रा के दृश्य को शोक-चित्र बना देता है: पुरोहित धौम्य यम-सम्बन्धी साम-मन्त्रों के साथ आगे-आगे चलते हैं; पीछे-पीछे पाण्डव, द्रौपदी और जनसमूह। अर्जुन का संकेतात्मक आचरण (रेत बिखेरना/भूमि पर चिह्न बनाना) भविष्य के शरवर्षा-सम प्रतिशोध का पूर्वाभास देता है। नगर में अपशकुन उभरते हैं—राहु का सूर्य को ग्रसना, उल्का का विपरीत दिशा में घूमना, अशुभ संकेतों से राजधानी का मन टूटता है। → अपशकुनों और जन-शोक के बीच विदुर का निर्णायक कथन उभरता है: यह दुःख क्षणिक सुख की छाया-सा है; पाण्डवों का संयम और बाहुबल दोनों साथ चल रहे हैं—वे अपनी भुजाओं की ओर देखते हुए (भविष्यकर्म का संकल्प) वन की ओर बढ़ते हैं, और राज्य-सभा में हुए अन्याय का फल समय पर लौटाने का संकेत देते हैं। → यात्रा का क्रम स्थिर होता है—धौम्य के वैदिक अनुष्ठान, द्रौपदी का दुःख, पाण्डवों का धैर्य, और प्रजाजनों का विलाप एक साथ बहते हैं। धृतराष्ट्र को विदुर के शब्दों से यह बोध मिलता है कि जो हुआ वह केवल तत्कालीन विजय नहीं, दीर्घकालीन विनाश का बीज है। → अर्जुन के ‘असक्त शरवर्षा’ जैसे भविष्य-संकेत और राजधानी के अपशकुन यह प्रश्न छोड़ते हैं—यह अन्याय किस दिन किस रूप में लौटेगा, और किसके सिर पर उसका दण्ड गिरेगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २९ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं) अीद-आफीाद-- बछ। एफ काया अशीतितमोब<्ध्याय: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन वैशम्पायन उवाच तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम् । साशडूक इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दूरदर्शी विदुरजीके आनेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने शंकित-सा होकर पूछा
বৈশম্পায়ন বললেন— জনমেজয়! দূরদর্শী বিদুর উপস্থিত হলে অম্বিকার পুত্র রাজা ধৃতরাষ্ট্র সন্দেহে আচ্ছন্নের মতো হয়ে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন।
Verse 2
धृतराष्ट उवाच कथं गच्छति कौन्तेयो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । भीमसेन: सव्यसाची माद्रीपुत्रोी च पाण्डवौ,धृतराष्ट्र बोले--विदुर! कुन्तीनन्दन धर्मपुत्र युधिष्ठिर किस प्रकार जा रहे हैं? भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव--ये चारों पाण्डव भी किस प्रकार यात्रा करते हैं?
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— বিদুর! কুন্তীপুত্র ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির কীভাবে যাচ্ছেন? ভীমসেন, সব্যসাচী অর্জুন এবং মাদ্রীপুত্র নকুল-সহদেব—এই পাণ্ডবরা কীভাবে যাত্রা করছেন?
Verse 3
धौम्यश्नैव कथं क्षत्तद्रौपदी च यशस्विनी । श्रोतुमिच्छाम्यहं सर्व तेषां शंस विचेष्टितम्,पुरोहित धौम्य तथा यशस्विनी द्रौपदी भी कैसे जा रही है? मैं उन सबकी पृथक्-पृथक् चेष्टाओंको सुनना चाहता हूँ, तुम मुझसे कहो
হে ক্ষত্ত! পুরোহিত ধৌম্য এবং যশস্বিনী দ্রৌপদীও কীভাবে যাচ্ছেন? আমি তাদের সকলের সব আচরণ ও গতিবিধি শুনতে চাই—তুমি আমাকে বলো।
Verse 4
विदुर उवाच वस्त्रेण संवृत्य मुखं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । बाहू विशालौ सम्पश्यन् भीमो गच्छति पाण्डव:,विदुर बोले--कुन्तीनन्दन युधिष्छिर वस्त्रसे मुँह ढँककर जा रहे हैं। पाण्डुकुमार भीमसेन अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए जाते हैं
বিদুর বললেন— কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির বস্ত্র দিয়ে মুখ আচ্ছাদিত করে যাচ্ছেন। পাণ্ডব ভীমসেন নিজের বিশাল বাহুদ্বয়ের দিকে চেয়ে চেয়ে এগিয়ে চলেছেন।
Verse 5
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति । माद्रीपुत्र: सहदेवो मुखमालिप्य गच्छति,सव्यसाची अर्जुन बालू बिखेरते हुए राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जा रहे हैं। माद्रीकुमार सहदेव अपने मुँहपर मिट्टी पोतकर जाते हैं
বিদুর বললেন— সব্যসাচী অর্জুন বালু ছড়াতে ছড়াতে রাজা যুধিষ্ঠিরের পশ্চাতে চলেছেন। মাদ্রীপুত্র সহদেব মুখে ধুলো-মাটি মেখে এগিয়ে যাচ্ছেন।
Verse 6
पांसूपलिप्तसर्वाड्रो नकुलक्षित्तविद्दल: । दर्शनीयतमो लोके राजानमनुगच्छति,लोकमें अत्यन्त दर्शनीय मनोहर रूपवाले नकुल अपने सब अंगोंमें धूल लपेटकर व्याकुलचित हो राजा युधिष्ठिरका अनुसरण कर रहे हैं
জগতে সর্বাপেক্ষা দর্শনীয় নকুল ধূলিতে সর্বাঙ্গ লেপিত, চিত্তে ব্যাকুল হয়ে রাজা যুধিষ্ঠিরের অনুসরণ করছেন।
Verse 7
कृष्णा तु केशौ: प्रच्छाद्य मुखमायतलोचना । दर्शनीया प्ररुदती राजानमनुगच्छति,परम सुन्दरी विशाललोचना कृष्णा अपने केशोंसे ही मुँह ढँककर रोती हुई राजाके पीछे-पीछे जा रही है
পরম সুন্দরী, বিশালনয়না কৃষ্ণা কেশে মুখ আচ্ছাদিত করে কাঁদতে কাঁদতে রাজার পশ্চাতে পশ্চাতে চলেছেন।
Verse 8
धौम्यौ रौद्राणि सामानि याम्यानि च विशाम्पते । गायन् गच्छति मार्गेषु कुशानादाय पाणिना,महाराज! पुरोहित धौम्यजी हाथमें कुश लेकर रुद्र तथा यमदेवतासम्बन्धी साम- मन्त्रोंका गान करते हुए आगे-आगे मार्गपर चल रहे हैं
হে প্রজাপতি-সম রাজন! পুরোহিত ধৌম্য হাতে কুশ ধারণ করে, রুদ্র ও যম-সম্পর্কিত সামমন্ত্র গাইতে গাইতে পথে অগ্রে অগ্রে চলেছেন।
Verse 9
धृतराष्ट्र रवाच विविधानीह रूपाणि कृत्वा गच्छन्ति पाण्डवा: | तन्ममाचक्ष्व विदुर कस्मादेवं व्रजन्ति ते
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—বিদুর! এখানে পাণ্ডবেরা নানা রূপ ধারণ করে প্রস্থান করছে। বলো তো, তারা কেন এভাবে যাচ্ছে?
Verse 10
धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! पाण्डवलोग यहाँ जो भिन्न-भिन्न प्रकारकी चेष्टाएँ करते हुए यात्रा कर रहे हैं, उसका क्या रहस्य है, यह बताओ। वे क्यों इस प्रकार जा रहे हैं? ।। विदुर उवाच निकृतस्यापि ते पुनत्रैहते राज्ये धनेषु च । न धर्माच्चलते बुद्धिर्धर्मराजस्य धीमत:,विदुर बोले--महाराज! यद्यपि आपके पुत्रोंने छलपूर्ण बर्ताव किया है। पाण्डवोंका राज्य और धन सब कुछ चला गया है तो भी परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्लिरकी बुद्धि धर्मसे विचलित नहीं हो रही है
বিদুর বললেন—মহারাজ! আপনার পুত্রেরা ছল করে পাণ্ডবদের রাজ্য ও ধন হরণ করেছে; তবু প্রজ্ঞাবান ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের বুদ্ধি ধর্ম থেকে বিচলিত হয় না।
Verse 11
योडसौ राजा घृणी नित्य धार्तराष्ट्रबु भारत । निकृत्या भ्रंशित: क्रोधान्नोन्मीलयति लोचने
বিদুর বললেন—হে ধৃতরাষ্ট্র, হে ভারত! সেই রাজা সর্বদা করুণাশীল; কিন্তু ছলনার দ্বারা তাকে ন্যায়পথ থেকে বিচ্যুত করা হয়েছে। ক্রোধে সে চোখ পর্যন্ত মেলে না।
Verse 12
भारत! राजा युधिष्ठिर आपके पुत्रोंपर सदा दयाभाव बनाये रखते थे, किंतु इन्होंने छलपूर्ण जूएका आश्रय लेकर उन्हें राज्यसे वंचित किया है, इससे उनके मनमें बड़ा क्रोध है और इसीलिये वे अपनी आँखोंको नहीं खोलते हैं ।। नाहं जन निर्दहेयं दृष्टवा घोरेण चक्षुषा | स पिधाय मुखं राजा तस्माद् गच्छति पाण्डव:,“मैं भयानक दृष्टिसे देखकर किसी (निरपराधी) मनुष्यको भस्म न कर डालूँ' इसी भयसे पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपना मुँह ढँककर जा रहे हैं
বিদুর বললেন—হে ভারত (ধৃতরাষ্ট্র)! রাজা যুধিষ্ঠির তোমার পুত্রদের প্রতি সর্বদা দয়াভাব রেখেছিলেন; কিন্তু তারা ছলপূর্ণ পাশাখেলার আশ্রয় নিয়ে তাঁকে রাজ্য থেকে বঞ্চিত করেছে। এতে তাঁর অন্তরে প্রবল ক্রোধ জেগেছে, তাই তিনি চোখ পর্যন্ত মেলেন না। ‘ভয়ংকর দৃষ্টিতে দেখে যেন কোনো নির্দোষকে ভস্ম না করে ফেলি’—এই আশঙ্কায় পাণ্ডব রাজা মুখ ঢেকে এগিয়ে চলেছেন।
Verse 13
यथा च भीमो व्रजति तन्मे निगदत: शृणु । बाह्वोर्बले नास्ति समो ममेति भरतर्षभ,अब भीमसेन जिस प्रकार चल रहे हैं, उसका रहस्य बताता हूँ, सुनिये! भरतश्रेष्ठ! उन्हें इस बातका अभिमान है कि बाहुबलमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है
বিদুর বললেন—ভীম যেভাবে অগ্রসর হচ্ছে, তা আমার কাছ থেকে শোনো। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তার গর্ব—ভুজবলে আমার সমান কেউ নেই।
Verse 14
बाहू विशालौ कृत्वासौ तेन भीमो5पि गच्छति । बाहू विदर्शयन् राजन् बाहुद्रविणदर्पित:
বিদুর বললেন—হে রাজন! সে বাহু দু’টি বিশাল করে এগোয়; তেমনই ভীমও চলে—বাহু প্রদর্শন করতে করতে, বাহুবল ও ঐশ্বর্যের দম্ভে মত্ত।
Verse 15
प्रदिशज्छरसम्पातान् कुन्तीपुत्रो&र्जुनस्तदा,कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे
বিদুর বললেন—সেই সময় কুন্তীপুত্র সব্যসাচী অর্জুন যেন শরের বর্ষারই ইঙ্গিত দিচ্ছিলেন। যেমন রাজার পেছনে ছিটকে পড়া বালুকণাগুলি পরস্পর না লেগে অবিচ্ছিন্ন ধারায় পড়তে থাকে, তেমনই তিনি শত্রুদের উপর অসংখ্য তীরের বর্ষা নামাবেন—প্রতিটি পৃথক, তবু ধারা অখণ্ড।
Verse 16
सिकता वपन् सव्यसाची राजानमनुगच्छति । असक्ता: सिकतास्तस्य यथा सम्प्रति भारत । असक्तं शरवर्षाणि तथा मोक्ष्यति शत्रुषु,कुन्तीपुत्र सव्यसाची अर्जुन उस समय राजाके पीछे-पीछे जो बालू बिखेरते हुए यात्रा कर रहे थे, उसके द्वारा वे शत्रुओंपर बाण बरसानेकी अभिलाषा व्यक्त करते थे। भारत! इस समय उनके गिराये हुए बालूके कण जैसे आपसमें संसक्त न होते हुए लगातार गिरते हैं, उसी प्रकार वे शत्रुओंपर परस्पर संसक्त न होनेवाले असंख्य बाणोंकी वर्षा करेंगे
বিদুর বললেন— হে ভারত, কুন্তীপুত্র সব্যসাচী অর্জুন রাজাকে অনুসরণ করে পথে বালু ছড়াতে ছড়াতে চলেছে। যেমন তার ছড়ানো বালুকণাগুলি পরস্পর জড়িয়ে না গিয়ে অবিচ্ছিন্ন ধারায় পড়ে, তেমনি সে শত্রুদের উপর অসংখ্য, দ্রুতগামী, পরস্পর-অসংলগ্ন তীরবর্ষণ করবে—ধর্মযুদ্ধের জন্য সংযত অথচ দৃঢ় প্রস্তুতিরই এ লক্ষণ।
Verse 17
न मे कश्चिद् विजानीयान्मुखमद्येति भारत । मुखमालिप्य तेनासौ सहदेवो5पि गच्छति,भारत! “आज इस दुर्दिनमें कोई मेरे मुँहको पहचान न ले” यही सोचकर सहदेव अपने मुँहमें मिट्टी पोतकर जा रहे हैं
বিদুর বললেন— হে ভারত, “আজ যেন কেউ আমার মুখ চিনতে না পারে”—এই ভাবনা নিয়ে সহদেবও মুখে মাটি মেখে এগিয়ে যায়, এই দুর্দিনে অচেনা থেকে আত্মরক্ষা করতে চেয়ে।
Verse 18
नाहं मनांस्याददेयं मार्गे सत्रीणामिति प्रभो । पांसूलिप्तसर्वाड्रो नकुलस्तेन गच्छति,प्रभो! “मार्ममें मैं स्त्रियोंका चित्त न चुरा लूँ" इस भयसे नकुल अपने सारे अंगोंमें धूल लगाकर यात्रा करते हैं
বিদুর বললেন— হে প্রভু, “পথে চলতে চলতে যেন নারীদের মন হরণ না করি”—এই আশঙ্কায় নকুল সর্বাঙ্গে ধুলো মেখে যাত্রা করে, নিজের সৌন্দর্য সংযত রেখে শীল রক্ষা করতে।
Verse 19
एकव्स्त्रा प्ररुदती मुक्तकेशी रजस्वला । शोणितेनाक्तवसना द्रौपदी वाक्यमब्रवीत्,द्रौपदीके शरीरपर एक ही वस्त्र था, उसके बाल खुले हुए थे, वह रजस्वला थी और उसके कपड़ोंमें रक्त (रज)-का दाग लगा हुआ था, उसने रोते हुए यह बात कही थी
বিদুর বললেন— দ্রৌপদী একখানি মাত্র বস্ত্র পরিহিতা, কাঁদতে কাঁদতে, খোলা কেশে, ঋতুমতী অবস্থায়, রক্তদাগযুক্ত বস্ত্রসহ সভামধ্যে এই কথা বলেছিল। এ ছিল ধর্মের ভয়ংকর বিদ্রূপ—রাজসভায় নারীর মর্যাদা লাঞ্ছিত, আর সভা হয়ে উঠল অধর্মের সাক্ষী।
Verse 20
यत्कृते5हमिदं प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे । हतपत्यो हतसुता हतबन्धुजनप्रिया:,“जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी”
দ্রৌপদী বলল— যাদের অন্যায়ে আমি আজ এই দশায় পতিত, চতুর্দশ বর্ষে তাদের নারীরাও স্বামী, পুত্র ও স্বজন নিহত হয়ে শবদেহের কাছে গড়াগড়ি দিয়ে বিলাপ করবে; রক্ত ও ধূলিতে লেপা অঙ্গে, খোলা কেশে, আপনজনকে তিলাঞ্জলি দিয়ে, এইভাবেই হস্তিনাপুরে প্রবেশ করবে।
Verse 21
बहुशोणितदिग्धाड़यो मुक्तकेशयो रजस्वला: । एवं कृतोदका भार्या: प्रवेक्ष्यन्ति गजाह्नयम्,“जिनके अन्यायसे आज मैं इस दशाको पहुँची हूँ, आजके चौदहवें वर्षमें उनकी स्त्रियाँ भी अपने पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेसे उनकी लाशोंके पास लोट-लोटकर रोयेंगी और अपने अंगोंमें रक्त तथा धूल लपेटे, बाल खोले हुए, अपने सगे-सम्बन्धियोंको तिलांजलि दे इसी प्रकार हस्तिनापुरमें प्रवेश करेंगी”
Vidura foretells a grim reversal: the very women of those who have committed injustice will, in the fourteenth year, enter Hastināpura in the same condition—rolling beside the corpses of their slain husbands, sons, and kinsmen, weeping uncontrollably, their bodies smeared with blood and dust, hair dishevelled, and performing the final water-offering rites for their own relatives. The warning frames adharma as self-returning violence: cruelty inflicted on the innocent ripens into identical suffering for one’s own household.
Verse 22
कृत्वा तु नैतान् दर्भान् धीरो धौम्य: पुरोहित: । सामानि गायन् याम्यानि पुरतो याति भारत
Having arranged these darbha grasses, the steadfast priest Dhaumya proceeds in front, chanting the Sāman hymns associated with the southern (Yama’s) direction—O Bhārata—thus leading the rite forward with solemn, dharma-governed order.
Verse 23
भारत! धीरस्वभाववाले पुरोहित धौम्यजी कुशोंका अग्रभाग नै#ऋत्यकोणकी ओर करके यमदेवतासम्बन्धी साम-मन्त्रोंका गान करते हुए पाण्डवोंके आगे-आगे जा रहे हैं ।। हतेषु भारतेष्वाजौी कुरूणां गुरवस्तदा । एवं सामानि गास्यन्तीत्युक्त्वा धौम्योडपि गच्छति
Vidura said: “O Bhārata, the steadfast priest Dhaumya, taking the tips of the kuśa grass and turning them toward the south‑western quarter, proceeds ahead of the Pāṇḍavas while chanting Sāman hymns connected with Yama. Saying, ‘When the Kurus’ elders have been slain in battle, I too shall chant such Sāman hymns,’ Dhaumya goes on.”
Verse 24
धौम्यजी यह कहकर गये थे कि युद्धमें कौरवोंके मारे जानेपर उनके गुरु भी इसी प्रकार कभी सामगान करेंगे ।। हा हा गच्छन्ति नो नाथा: समवेक्षध्वमीदृशम् । अहो धिक् कुरुवृद्धानां बालानामिव चेष्टितम्,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक््कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?
Vidura reports the citizens’ anguished outcry as the Pāṇḍavas depart: “Alas, alas—our lords are leaving! Look at this shameful spectacle! Fie upon the elders of the Kurus, behaving like children, O King.” The lament underscores a moral inversion: those expected to uphold restraint and dharma instead act from greed and impulsiveness, driving the rightful heirs into exile and leaving the people feeling orphaned and betrayed.
Verse 25
राष्ट्रेभ्य: पाण्डुदायादॉल्लो भान्निर्वासयन्ति ये । अनाथा: सम वयं सर्वे वियुक्ता: पाण्डुनन्दनै:,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक््कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?
Vidura said: “Those who, out of greed, drive the heirs of Pāṇḍu out of the kingdom—once we are separated from the sons of Pāṇḍu, all of us become truly helpless and without a protector.”
Verse 26
दुर्विनीतेषु लुब्धेषु का प्रीति: कौरवेषु न: । इति पौरा: सुदु:खार्ता: क्रोशन्ति सम पुन: पुन:,महाराज! उस समय नगरके लोग अत्यन्त दुःखसे आतुर हो बार-बार चिल्लाकर कह रहे थे कि “हाय! हाय! हमारे स्वामी पाण्डव चले जा रहे हैं। अहो! कौरवोंमें जो बड़े-बूढ़े लोग हैं, उनकी यह बालकोंकी-सी चेष्टा तो देखो। धिक््कार है उनके इस बर्तावको! ये कौरव लोभवश महाराज पाण्डुके पुत्रोंको राज्यसे निकाल रहे हैं। इन पाण्डुपुत्रोंसे वियुक्त होकर हम सब लोग आज अनाथ हो गये। इन लोभी और उद्दण्ड कौरवोंके प्रति हमारा प्रेम कैसे हो सकता है?
“লোভী ও দুর্বিনীত কৌরবদের প্রতি আমাদের স্নেহই বা কীভাবে হবে?”—এই বলে নগরবাসীরা গভীর শোকে আচ্ছন্ন হয়ে বারবার আর্তনাদ করতে লাগল। তারা কৌরবদের বৃদ্ধদের শিশুসুলভ আচরণকে ধিক্কার দিল, লোভবশ পাণ্ডুর পুত্রদের রাজ্যচ্যুত করার নিন্দা করল, এবং পাণ্ডবদের বিচ্ছেদে নিজেদের অনাথ মনে করে অধর্মময় শাসনের বিরুদ্ধে ক্ষোভ প্রকাশ করল।
Verse 27
एवमाकारलिड्रैस्ते व्यवसायं मनोगतम् । कथयन्तश्न कौन्तेया वन॑ जम्मुर्मनस्विन:,महाराज! इस प्रकार मनस्वी कुन्तीपुत्र अपनी आकृति एवं चिह्लोंके द्वारा अपने आन्तरिक निश्चयको प्रकट करते हुए वनको गये हैं
এইভাবে সেই মনস্বী কুন্তীপুত্রেরা নিজেদের চেহারা ও বাহ্য লক্ষণেই অন্তরের সংকল্প প্রকাশ করে, তা যেন ঘোষণা করেই, বনে প্রস্থান করল।
Verse 28
एवं तेषु नराग्र्येषु निर्यत्सु गजसाह्वयात् । अनभ्रे विद्युतश्नासन् भूमिश्व समकम्पत
যখন সেই নরশ্রেষ্ঠেরা গজসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) থেকে বেরিয়ে যাচ্ছিলেন, তখন মেঘহীন আকাশে বিদ্যুৎ ঝলকে উঠল এবং পৃথিবীও কেঁপে উঠল।
Verse 29
राहुरग्रसदादित्यमपर्वणि विशाम्पते । उल्का चाप्यपसव्येन पुरं कृत्वा व्यशीर्यत
হে প্রজাপতি! অপর্বকালে রাহু সূর্যকে গ্রাস করল; আর বামগতি (অপসব্য) পথে চলা উল্কা নগরকে প্রদক্ষিণ করে ভেঙে পড়ল।
Verse 30
हस्तिनापुरसे उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके निकलते ही बिना बादलके बिजली गिरने लगी, पृथ्वी काँप उठी। राजन्! बिना पर्व (अमावस्या)-के ही राहुने सूर्यको ग्रस लिया था और नगरको दायें रखकर उल्का गिरी थी ।। प्रत्याहरन्ति क्रव्यादा गृध्रगोमायुवायसा: । देवायतनचैत्येषु प्राकाराट्टालकेषु च,गीध, गीदड़ और कौवे आदि मांसाहारी जन्तु नगरके मन्दिरों, देववृक्षों, चहारदीवारी तथा अट्टालिकाओंपर मांस और हड्डी आदि लाकर गिराने लगे थे
শকুন, শেয়াল ও কাক প্রভৃতি মাংসাশী প্রাণীরা মাংস ও হাড়ের টুকরো তুলে এনে নগরের দেবালয়, চৈত্যস্থান, প্রাচীর ও অট্টালিকার উপর ফেলতে লাগল।
Verse 31
एवमेते महोत्पाता: प्रादुरासन् दुरासदा: । भरतानामभावाय राजन दुर्मन्त्रिते तव,राजन्! इस प्रकार आपकी दुर्मनत्रणाके कारण ऐसे-ऐसे अपशकुनरूप दुर्दम्य एवं महान् उत्पात प्रकट हुए हैं, जो भरतवंशियोंके विनाशकी सूचना दे रहे हैं
বিদুর বললেন—রাজন! এইরূপ দুর্নিবার ও মহাভয়ংকর অমঙ্গলসূচক লক্ষণ প্রকাশ পেয়েছে; এগুলি নিবৃত্ত করা কঠিন। তোমার কুমন্ত্রণা হেতু এগুলি ভরতবংশের বিনাশেরই পূর্বলক্ষণ।
Verse 32
वैशम्पायन उवाच एवं प्रवदतोरेव तयोस्तत्र विशाम्पते । धृतराष्ट्रस्य राज्ञश्न विदुरस्यथ च धीमतः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले--
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! সেই সময় রাজা ধৃতরাষ্ট্র ও প্রজ্ঞাবান বিদুর এভাবে কথোপকথন করছিলেন; ঠিক তখনই মহর্ষিদের পরিবেষ্টিত দেবর্ষি নারদ সভায় এসে কৌরবদের সম্মুখে দাঁড়ালেন এবং গুরুগম্ভীর, অমঙ্গলসূচক বাক্য উচ্চারণ করলেন।
Verse 33
नारदश्न सभामध्ये कुरूणामग्रत: स्थित: । महर्षिभि: परिवृतो रौद्रं वाक्यमुवाच ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्र और बुद्धिमान विदुर जब दोनों वहाँ बातचीत कर रहे थे, उसी समय सभामें महर्षियोंसे घिरे हुए देवर्षि नारद कौरवोंके सामने आकर खड़े हो गये और यह भयंकर वचन बोले--
সভামধ্যেই কুরুদের সম্মুখে নারদ দাঁড়ালেন। মহর্ষিদের পরিবেষ্টিত হয়ে তিনি রৌদ্র ও ভয়ংকর বাক্য উচ্চারণ করলেন।
Verse 34
इतश्नतुर्दशे वर्षे विनक्ष्यन्तीह कौरवा: । दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च
আজ থেকে চতুর্দশ বছরে, দুর্যোধনের অপরাধ এবং ভীম-অর্জুনের বলের দ্বারা, এখানেই কৌরবরা বিনষ্ট হবে।
Verse 35
“आजसे चौदहवें वर्षमें दुर्योधनके अपराधसे भीम और अर्जुनके पराक्रमद्वारा कौरवकुलका नाश हो जायगा” ।। इत्युक्त्वा दिवमाक्रम्य क्षिप्रमन््तरधीयत । ब्राह्मीं श्रियं सुविपुलां बिश्रद् देवर्षिसत्तम:
“আজ থেকে চতুর্দশ বছরে দুর্যোধনের অপরাধে ভীম ও অর্জুনের পরাক্রমে কৌরবকুল বিনষ্ট হবে।” এ কথা বলে দেবর্ষিদের শ্রেষ্ঠ নারদ আকাশপথে স্বর্গে আরোহণ করলেন এবং অচিরেই অন্তর্ধান করলেন; তিনি ব্রাহ্মী, অতিবিশাল দীপ্তিময় শ্রী ধারণ করছিলেন।
Verse 36
ऐसा कहकर विशाल ब्रह्मतेज धारण करनेवाले देवर्षि-प्रवर नारद आकाशमें जाकर सहसा अन्तर्धान हो गये ।। (धृतराष्ट उवाच किमनब्रुवन् नागरिका: कि वै जानपदा जना: । महां तत्त्वेन चाचक्ष्व क्षत्त: सर्वमशेषत: ।। धृतराष्ट्रने पूछा--विदुर! जब पाण्डव वनको जाने लगे, उस समय नगर और देशके लोग क्या कह रहे थे, ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे ठीक-ठीक बताओ। विदुर उवाच ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा येडन्ये वदन्त्यथ । तच्छृणुष्व महाराज वक्ष्यते च मया तव ।। विदुर बोले--महाराज! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्यलोग इस घटनाके सम्बन्धमें जो कुछ कहते हैं, वह सुनिये, मैं आपसे सब बातें बता रहा हूँ। हा हा गच्छन्ति नो नाथा: समवेक्षध्वमीदृशम् । इति पौरा: सुदुःखार्ता: शोचन्ति सम समन्तत: ।। पाण्डवोंके जाते समय समस्त पुरवासी दुःखसे आतुर हो सब ओर शोकमें डूबे हुए थे और इस प्रकार कह रहे थे--'हाय! हाय! हमारे स्वामी, हमारे रक्षक वनमें चले जा रहे हैं। भाइयो! देखो, धृतराष्ट्रके पुत्रोंका यह कैसा अन्याय है?! तदहृष्टमिवाकूजं गतोत्सवमिवाभवत् | नगर हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ।। स्त्री, बालक और वृद्धोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्षरहित, शब्दशून्य तथा उत्सवहीन-सा हो गया। सर्वे चासन् निरुत्साहा व्याधिना बाधिता यथा ।। पार्थात् प्रति नरा नित्यं चिनन््ताशोकपरायणा: । तत्र तत्र कथां चक्कर: समासाद्य परस्परम् ।। सब लोग दुन्तीपुत्रोंके लिये निरन्तर चिन्ता एवं शोकमें निमग्न हो उत्साह खो बैठे थे। सबकी दशा रोगियोंके समान हो गयी थी। सब एक-दूसरेसे मिलकर जहाँ-तहाँ पाण्डवोंके विषयमें ही वार्तालाप करते थे। वन॑ गते धर्मराजे दुः:खशोकपरायणा: । बभूवु: कौरवा वृद्धा भृशं॑ शोकेन पीडिता: ।। धर्मराजके वनमें चले जानेपर समस्त वृद्ध कौरव भी अत्यन्त शोकसे व्यथित हो दुःख और चिन्तामें निमग्न हो गये। ततः पौरजन: सर्व: शोचन्नास्ते जनाधिपम् | कुर्वाणाश्व कथास्तत्र ब्राह्मणा: पार्थिवं प्रति ।। तदनन्तर समस्त पुरवासी राजा युधिष्ठटिरके लिये शोकाकुल हो गये। उस समय वहाँ ब्राह्मणलोग राजा युधिष्ठिरके विषयमें निम्नांकित बातें करने लगे। ब्राह्मणा ऊचु कथं नु राजा धर्मात्मा वने वसति निर्जने । तस्यानुजाश्च ते नित्यं कृष्णा च द्रुपदात्मजा ।। सुखाहापि च दु:ःखारता कथं वसति सा वने ।। ब्राह्मणोंने कहा--हाय! धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर और उनके भाई निर्जन वनमें कैसे रहेंगे? तथा ट्रुपदकुमारी कृष्णा तो सुख भोगनेके ही योग्य है, वह दुःखसे आतुर हो वनमें कैसे रहेगी। विदुर उवाच एवं पौराश्न विप्राश्न॒ सदारा: सहपुत्रका: | स्मरन्त: पाण्डवान् सर्वे बभूवुर्भशदु:खिता: ।। विदुरजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार पुरवासी ब्राह्मण अपनी स्त्रियों और पुत्रोंके साथ पाण्डवोंका स्मरण करते हुए बहुत दुःखी हो गये। आविद्धा इव शस्त्रेण नाभ्यनन्दन् कथंचन । सम्भाष्यमाणा अपि ते न कंचित् प्रत्यपूजयन् ।। शस्त्रोंक आघातसे घायल हुए मनुष्योंकी भाँति वे किसी प्रकार सुखी न हो सके। बात कहनेपर भी वे किसीको आदरपूर्वक उत्तर नहीं देते थे। न भुक््त्वा न शयित्वा ते दिवा वा यदि वा निशि | शोकोपहततविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन् ।। उन्होंने दिन अथवा रातमें न तो भोजन किया और न नींद ही ली; शोकके कारण उनका सारा विज्ञान आच्छादित हो गया था। वे सब-के-सब अचेत-से हो रहे थे। यदवस्था बभूवार्ता हायोध्या नगरी पुरा । रामे वन॑ गते दुःखादूधृतराज्ये सलक्ष्मणे ।। तदवस्थं बभूवार्तमद्येदं गजसाह्वयम् । गते पार्थे वनं दुःखादूधृतराज्ये सहानुजै: ।। जैसे त्रेतायुगमें राज्यका अपहरण हो जानेपर लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीके वनमें चले जानेके बाद अयोध्या नगरी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो बड़ी दुरवस्थाको पहुँच गयी थी, वही दशा राज्यके अपहरण हो जानेपर भाइयोंसहित युधिष्ठिरके वनमें चले जानेसे आज हमारे इस हस्तिनापुरकी हो गयी है। वैशम्पायन उवाच विदुरस्य वच: श्रुत्वा नागरस्य गिरं च वै । भूयो मुमोह शोकाच्च धृतराष्ट्र: सबान्धव: ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! विदुरका कथन और पुरवासियोंकी कही हुई बातें सुनकर बन्धु-बान्धवोंसहित राजा धृतराष्ट्र पुन: शोकसे मूर्च्छित हो गये। ततो दुर्योधन: कर्ण: शकुनिश्चापि सौबल: । द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्न्यवेदयन्,तब दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिने द्रोणको अपना द्वीप (आश्रय) माना और सम्पूर्ण राज्य उनके चरणोंमें समर्पित कर दिया
বৈশম্পায়ন বললেন—বিদুরের বাক্য এবং নগরবাসীদের বিলাপ শুনে ধৃতরাষ্ট্র আত্মীয়স্বজনসহ শোকে মোহগ্রস্ত হয়ে আবারও অচেতনপ্রায় হয়ে পড়লেন। তারপর দুর্যোধন, কর্ণ ও সুবলপুত্র শকুনি দ্রোণকে নিজেদের ‘দ্বীপ’—অর্থাৎ নিরাপদ আশ্রয়—বলে মনে করে রাজ্য তাঁর চরণে সমর্পণ করল এবং তাঁর হাতেই ভার দিল।
Verse 37
अथाब्रवीत् ततो द्रोणो दुर्योधनममर्षणम् । दुःशासनं च कर्ण च सवनिव च भारतान्,उस समय द्रोणाचार्यने अमर्षशील दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण तथा अन्य सब भरतवंशियोंसे कहा--
তখন দ্রোণাচার্য ক্রোধপ্রবণ দুর্যোধনকে, এবং দুঃশাসন, কর্ণ ও অন্যান্য সকল ভরতবংশীয় রাজপুত্রদের উদ্দেশ করে বললেন।
Verse 38
अवध्यान् पाण्डवान प्राहुर्देवपुत्रान् द्विजातय: । अहं वै शरण प्राप्तान् वर्तमानो यथाबलम्,'पाण्डव देवताओंके पुत्र हैं, अतः ब्राह्मणलोग उन्हें अवध्य बतलाते हैं। मैं यथाशक्ति सम्पूर्ण हृदयसे तुम्हारे अनुकूल प्रयत्न करता हुआ तुम्हारा साथ दूँगा। भक्तिपूर्वक अपनी शरणमें आये हुए इन राजाओंसहित धुृतराष्ट्रपुत्रोंका परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता। दैव ही सबसे प्रबल है
‘পাণ্ডবরা দেবপুত্র—এই কারণে দ্বিজগণ তাঁদের অবধ্য বলেন। আর আমি, যারা শরণ নিয়েছে, তাদের রক্ষায় যথাশক্তি প্রবৃত্ত থাকব।’
Verse 39
गन्ता सर्वात्मना भव्त्या धारत्तराष्ट्रानू सराजकान् । नोत्सहेयं परित्यक्तुं दैवं हि बलवत्तरम्,'पाण्डव देवताओंके पुत्र हैं, अतः ब्राह्मणलोग उन्हें अवध्य बतलाते हैं। मैं यथाशक्ति सम्पूर्ण हृदयसे तुम्हारे अनुकूल प्रयत्न करता हुआ तुम्हारा साथ दूँगा। भक्तिपूर्वक अपनी शरणमें आये हुए इन राजाओंसहित धुृतराष्ट्रपुत्रोंका परित्याग करनेका साहस नहीं कर सकता। दैव ही सबसे प्रबल है
‘আমি সর্বান্তঃকরণে তোমাদের সঙ্গে যাব—রাজাদেরসহ ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের সঙ্গে। ভক্তিভরে শরণ নেওয়াদের ত্যাগ করার সাহস আমার নেই; কারণ দैবই অধিক বলবান।’
Verse 40
धर्मत: पाण्डुपुत्रा वै वनं गच्छन्ति निर्जिता: । ते च द्वादश वर्षाणि वने वत्स्यन्ति पाण्डवा:,'पाण्डव जूएमें पराजित होकर धर्मके अनुसार वनमें गये हैं। वे वहाँ बारह वर्षोतक रहेंगे
পাণ্ডুপুত্ররা পাশাখেলায় পরাজিত হয়ে ধর্মানুসারে বনে যাচ্ছে; আর পাণ্ডবরা সেখানে বারো বছর বাস করবে।
Verse 41
चरितब्रह्याचर्याश्च क्रोधामर्षवशानुगा: । वैरं निर्यातयिष्यन्ति महद् दुःखाय पाण्डवा:,“वनमें पूर्णरूपसे ब्रह्मचर्यका पालन करके जब वे क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो यहाँ लौटेंगे, उस समय वैरका बदला अवश्य लेंगे। उनका वह प्रतीकार हमारे लिये महान् दुःखका कारण होगा
বনে সম্পূর্ণ ব্রহ্মচর্য পালন করে, ক্রোধ ও অসন্তোষের বশে যখন তারা এখানে ফিরে আসবে, তখন পাণ্ডবেরা অবশ্যই বৈরের প্রতিশোধ নেবে। সেই প্রতিকার আমাদের জন্য মহাদুঃখের কারণ হবে।
Verse 42
मया च भ्रंशितो राजन् द्रुपद: सखिवितग्रहे । पुत्रार्थभयजद् राजा वधाय मम भारत,“राजन! मैंने मैत्रीके विषयको लेकर कलह प्रारम्भ होनेपर राजा ट्रुपदको उनके राज्यसे भ्रष्ट किया था; भारत! इससे दुःखी होकर उन्होंने मेरे वधके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे एक यज्ञका आयोजन किया
রাজন! বন্ধুত্বের বিষয় নিয়ে কলহ উঠলে আমিও রাজা দ্রুপদকে তাঁর রাজ্য থেকে উৎখাত করেছিলাম। ভারত! সেই অপমানে দুঃখিত ও ভীত হয়ে তিনি আমার বধের জন্য পুত্রলাভের কামনায় এক যজ্ঞের আয়োজন করেছিলেন।
Verse 43
याजोपयाजतपसा पुत्र लेभे स पावकात् । धृष्टद्रुम्न॑ द्रौोपदीं च वेदीमध्यात् सुमध्यमाम्
যাজ ও উপযাজের তপস্যার ফলে তিনি পবিত্র অগ্নি থেকে পুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নকে লাভ করলেন, আর বেদীর মধ্যভাগ থেকে সুমধ্যমা দ্রৌপদীকেও।
Verse 44
“याज और उपयाजकी तपस्यासे उन्होंने अग्निसे धृष्टद्युम्म और वेदीके मध्यभागसे सुन्दरी द्रौपदीको प्राप्त किया ।। धृष्टद्युम्नस्तु पार्थानां श्याल: सम्बन्धतो मतः । पाण्डवानां प्रियरतस्तस्मान्मां भयमाविशत्,'धृष्टद्युम्न तो सम्बन्धकी दृष्टिसे कुन्तीपुत्रोंका साला ही है, अतः सदा उनका प्रिय करनेमें लगा रहता है, उसीसे मुझे भय है”
যাজ ও উপযাজের তপস্যায় তিনি অগ্নি থেকে ধৃষ্টদ্যুম্নকে এবং বেদীর মধ্যভাগ থেকে সুন্দরী দ্রৌপদীকে লাভ করলেন। ধৃষ্টদ্যুম্ন সম্পর্কসূত্রে পার্থদের শ্যালক বলে গণ্য; সে সর্বদা পাণ্ডবদের প্রিয়সাধনে রত—এই কারণেই আমার অন্তরে ভয় প্রবেশ করল।
Verse 45
ज्वालावर्णो देवदत्तो धनुष्मान् कवची शरी । मर्त्यधर्मतया तस्मादद्य मे साध्वसो महान्,“उसके शरीरकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान उद्धासित होती है। वह देवताका दिया हुआ पुत्र है और धनुष, बाण तथा कवचके साथ प्रकट हुआ है। मरणधर्मा मनुष्य होनेके कारण मुझे अब उससे महान् भय लगता है
তার দেহকান্তি অগ্নিশিখার মতো জ্বলে ওঠে। সে দেবদত্ত, ধনুক-বাণ ও কবচসহ প্রকাশিত হয়েছে। তবু মর্ত্যধর্মে আবদ্ধ মানুষ বলেই আজ তার কারণেই আমার অন্তরে মহাভয় জাগে।
Verse 46
गतो हि पक्षतां तेषां पार्षत: परवीरहा । रथातिरथसंख्यायां यो5ग्रणीरजुनो युवा,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान् दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है?
বৈশম্পায়ন বললেন— শত্রুবীর-সংহারী পৃষতপুত্র (দ্রুপদপুত্র) ধৃষ্টদ্যুম্ন সত্যই তাদের দলে গিয়ে পাণ্ডবদের প্রধান আশ্রয় হয়ে উঠেছে। আর অর্জুন—রথী ও অতিরথীদের গণনায় যার নাম সর্বাগ্রে উচ্চারিত, সেই তরুণ বীর—ধৃষ্টদ্যুম্নের কারণে যদি তাকে আমার সঙ্গে যুদ্ধ করতে হয়, তবে প্রাণ পর্যন্ত পণ করে যুদ্ধ করতে প্রস্তুত হবে। হে কৌরবগণ! এই পৃথিবীতে অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ করতে বাধ্য হওয়ার চেয়ে আমার জন্য আর বড় দুঃখ কী হতে পারে?
Verse 47
सृष्टप्राणो भृशतरं तेन चेत् संगमो मम । किमन्यद् दुःखमधिकं परमं भुवि कौरवा:,शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न पाण्डवोंके पक्षका पोषक हो गया है। रथियों और अतिरथियोंकी गणनामें जिसका नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह तरुण वीर अर्जुन धृष्टद्युम्नके लिये, यदि मेरे साथ उसका युद्ध हुआ तो, लड़कर प्राणतक देनेके लिये उद्यत हो जायगा। कौरवो! (अर्जुनके साथ मुझे लड़ना पड़े) इस पृथ्वीपर इससे बढ़कर महान् दुःख मेरे लिये और क्या हो सकता है?
বৈশম্পায়ন বললেন— যদি তার সঙ্গে আমার সংঘর্ষ হয়, তবে সে প্রবল উগ্রতায় যুদ্ধ করবে, প্রাণ পর্যন্ত বাজি রাখবে। হে কৌরবগণ! এই পৃথিবীতে এর চেয়ে বড়, এর চেয়ে অসহনীয় দুঃখ আমার আর কী হতে পারে যে আমাকে এমন যুদ্ধে নামতে বাধ্য হতে হয়?
Verse 48
धृष्टद्युम्नो द्रोणमृत्युरिति विप्रथितं वच: । मद्वधाय श्रुतो5प्येष लोके चाप्यतिविश्रुत:,'धृष्टद्युम्न द्रोणकी मौत है, यह बात सर्वत्र फैल चुकी है। मेरे वधके लिये ही उसका जन्म हुआ है। यह भी सब लोगोंने सुन रखा है। धृष्टद्युम्न स्वयं भी संसारमें अपनी वीरताके लिये विख्यात है
বৈশম্পায়ন বললেন— ‘ধৃষ্টদ্যুম্নই দ্রোণের মৃত্যু’—এই কথা সর্বত্র ছড়িয়ে পড়েছে। লোকেরা এটাও শুনে রেখেছে, এবং তা জনসমাজে অত্যন্ত প্রসিদ্ধ, যে সে জন্মেছে কেবল আমার বধের উদ্দেশ্যেই; আর ধৃষ্টদ্যুম্ন নিজেও তার পরাক্রমের জন্য জগতে খ্যাত।
Verse 49
सो<यं नूनमनुप्राप्तस्त्वत्कृते काल उत्तम: । त्वरितं कुरुत श्रेयो नैतदेतावता कृतम्,“तुम्हारे लिये यह निश्चय ही बहुत उत्तम अवसर प्राप्त हुआ है। शीघ्र ही अपने कल्याण-साधनमें लग जाओ। पाण्डवोंको वनवास दे देनेमात्रसे तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध नहीं हो सकता
বৈশম্পায়ন বললেন— তোমাদের জন্য নিঃসন্দেহে এই উৎকৃষ্ট সময় এসে পড়েছে। যা সত্যিই কল্যাণকর, তা দ্রুত করো। কেবল পাণ্ডবদের বনবাসে পাঠালেই তোমাদের অভীষ্ট সিদ্ধ হবে না।
Verse 50
मुहूर्त सुखमेवैतत् तालच्छायेव हैमनी । यजध्वं च महायज्ञजैभोंगानश्रीत दत्त च
বৈশম্পায়ন বললেন— এই সুখ তো ক্ষণস্থায়ী—শীতকালে তালগাছের ছায়ার মতোই অল্পক্ষণ। অতএব মহাযজ্ঞ করো, নিজের প্রাপ্য ভোগ উপভোগ করো, আর দানও করো।
Verse 51
इतश्नतुर्दशे वर्षे महत् प्राप्पस्पथ वैशसम् | “यह राज्य तुमलोगोंके लिये शीतकालमें होनेवाली ताड़के पेड़की छायाके समान दो ही घड़ीतक सुख देनेवाला है। अब तुम बड़े-बड़े यज्ञ करो, मनमाने भोग भोगो और इच्छानुसार दान कर लो। आजसे चौदहवें वर्षमें तुम्हें बहुत बड़ी मार-काटका सामना करना पड़ेगा" || ५० ई || द्रोणस्य वचन श्रुत्वा धृतराष्ट्रोडब्रवीदिदम्,द्रोणाचार्यकी यह बात सुनकर धुृतराष्ट्रने कहा--
“আজ থেকে চতুর্দশ বছরে তোমাদের উপর মহা বৈষম্য—ভয়ংকর হত্যাযজ্ঞ—নেমে আসবে। এই রাজ্য তোমাদের জন্য শীতকালে তালগাছের ছায়ার মতো—মাত্র দু’দণ্ড সুখ দেয়। অতএব যতক্ষণ সুযোগ আছে, মহাযজ্ঞ করো, ইচ্ছামতো ভোগ করো এবং মনমতো দান করো; কারণ আজ থেকে চতুর্দশ বছরে তোমাদের সামনে এক ভয়াবহ ও ব্যাপক সংঘর্ষ উপস্থিত হবে।” দ্রোণের এই বাক্য শুনে ধৃতরাষ্ট্র বললেন—
Verse 52
सम्यगाह गुरु: क्षत्तरुपावर्तय पाण्डवान् | यदि ते न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवा: | सशस्त्ररथपादाता भोगवन्तश्न पुत्रका:,“विदुर! गुरु द्रोणाचार्यने ठीक कहा है। तुम पाण्डवोंको लौटा लाओ। यदि वे न लौटें तो वे अस्त्र-शस्त्रोंसे युक्त रथियों और पैदल सेनाओंसे सुरक्षित और भोग-सामग्रीसे सम्पन्न हो सत्कारपूर्वक वनमें भ्रमणके लिये जाया; क्योंकि वे भी मेरे पुत्र ही हैं'
“গুরু যথার্থই বলেছেন। হে ক্ষত্ত (বিদুর), পাণ্ডবদের ফিরিয়ে আনো। যদি তারা না ফেরে, তবে পাণ্ডবরা যেন যথোচিত সম্মানে প্রস্থান করে—অস্ত্রশস্ত্রে সজ্জিত রথী ও পদাতিক দ্বারা সুরক্ষিত, এবং ভোগ-সামগ্রীতে সমৃদ্ধ; কারণ তারাও আমারই পুত্র।”
Verse 79
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें द्रौपदीकुन्तीसंवादविषयक उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত অনুদ্যূতপর্বে দ্রৌপদী-কুন্তী সংলাপবিষয়ক ঊনআশিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 80
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि विदुरधृतराष्ट्रद्रोणवाक्ये अशीतितमोड<ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত অনুদ্যূতপর্বে বিদুর-ধৃতরাষ্ট্র-দ্রোণবাক্যবিষয়ক আশীতিতম অধ্যায় সমাপ্ত।
Verse 146
चिकीर्षन् कर्म शत्रुभ्यो बाहुद्रव्यानुरूपत: । इसीलिये वे अपनी विशाल भुजाओंकी ओर देखते हुए यात्रा करते हैं। राजन्! अपने बाहुबलरूपी वैभवपर उन्हें गर्व है। अतः वे अपनी दोनों भुजाएँ दिखाते हुए शत्रुओंसे बदला लेनेके लिये अपने बाहुबलके अनुरूप ही पराक्रम करना चाहते हैं
“শত্রুদের বিরুদ্ধে কর্ম সাধনের অভিপ্রায়ে তারা নিজেদের বাহুবল-সম্পদের অনুপাতে অগ্রসর হয়। তাই তারা মহাবাহুর দিকে চেয়ে পথ চলে। রাজন! বাহুবলরূপ বৈভবে তাদের গর্ব; অতএব উভয় বাহু প্রদর্শন করে শত্রুদের কাছে প্রতিশোধ নিতে, নিজেদের শক্তির মাপে বীর্যপ্রয়োগ করতে তারা ইচ্ছুক।”