
Chapter Arc: द्यूत-पराजय के बाद युधिष्ठिर सभा के गुरुजनों, धृतराष्ट्र और सभासदों के सम्मुख खड़े होकर वन-गमन की प्रतिज्ञा निभाने हेतु अंतिम अनुमति और आशीर्वाद माँगते हैं। → वे द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, विदुर, धृतराष्ट्र, समस्त धार्तराष्ट्रों, युयुत्सु, संजय तथा अन्य सभासदों को संबोधित कर कहते हैं कि सबको प्रणाम कर मैं वन को जा रहा हूँ—और लौटकर फिर दर्शन दूँगा; यह विदाई राजसभा को मौन, भारी और अनिश्चित बना देती है। → विदुर युधिष्ठिर को धर्म का कठोर सत्य सुनाते हैं—अधर्म से जीता हुआ कोई भी अंततः पराजय में व्यथित होता है; यह वचन पराजय के क्षण को नैतिक निर्णय में बदल देता है और युधिष्ठिर के वन-प्रस्थान को केवल दंड नहीं, धर्म-मार्ग की परीक्षा बना देता है। → विदुर सहदेव की संयमशीलता, धौम्य के ब्रह्मविद्या-बल और द्रौपदी की धर्मनिष्ठा का स्मरण कर पाण्डवों के साथ जाने वाली शक्ति-रेखा रेखांकित करते हैं; फिर मंगलाशीष देते हैं—रोग न हो, कल्याण हो, समय-समय पर यथावत आचरण करो, और कृतार्थ होकर लौटो। → युधिष्ठिर ‘तथेत्युक्त्वा’ कहकर भीष्म-द्रोण को नमस्कार कर प्रस्थान करते हैं—अब प्रश्न यह रह जाता है कि वनवास की अवधि में धर्म की यह परीक्षा किस रूप में पलटेगी और लौटने पर न्याय का पलड़ा किस ओर झुकेगा।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापववके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें पाण्डवोंकी प्रतिज्ञासे सम्बन् रखनेवाला सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।/ ७७ ॥ अपना छा | अ-क्राछ अष्टसप्ततितमो< ध्याय: युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिसे विदा लेना, 63205 कक न्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव और पाण्डवोंको रहनेका उपदेश देना युधिछिर उवाच आमन्त्रयामि भरतांस्तथा वृद्धं पितामहम् । राजानं सोमदत्तं च महाराजं च बाह्विकम्,युधिष्ठिर बोले--मैं भरतवंशके समस्त गुरुजनोंसे वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। बड़े-बूढ़े पितामह भीष्म, राजा सोमदत्त, महाराज बाह्लिक, गुरुवर द्रोण और कृपाचार्य, अश्वृत्थामा, अन्यान्य नृपतिगण, विदुर, राजा धृतराष्ट्र, उनके सभी पुत्र, युयुत्सु, संजय तथा दूसरे सब सदस्योंसे पूछकर सबकी आज्ञा लेकर वनमें जाता हूँ, फिर लौटकर आप लोगोंका दर्शन करूँगा
যুধিষ্ঠির বললেন—আমি ভরতবংশের সকল জ্যেষ্ঠ-গুরুজনের নিকট এবং বৃদ্ধ পিতামহের নিকটও, রাজা সোমদত্ত ও মহারাজ বাহ্লীক-এর নিকটও বনগমনের অনুমতি প্রার্থনা করি।
Verse 2
द्रोणं कृप॑ नृपांश्चान्यानश्वत्थामानमेव च । विदुरं धृतराष्ट्रं च धार्तराष्ट्रांक्ष सर्वश:,युधिष्ठिर बोले--मैं भरतवंशके समस्त गुरुजनोंसे वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। बड़े-बूढ़े पितामह भीष्म, राजा सोमदत्त, महाराज बाह्लिक, गुरुवर द्रोण और कृपाचार्य, अश्वृत्थामा, अन्यान्य नृपतिगण, विदुर, राजा धृतराष्ट्र, उनके सभी पुत्र, युयुत्सु, संजय तथा दूसरे सब सदस्योंसे पूछकर सबकी आज्ञा लेकर वनमें जाता हूँ, फिर लौटकर आप लोगोंका दर्शन करूँगा
যুধিষ্ঠির বললেন—দ্রোণ, কৃপ ও অন্যান্য রাজাদের নিকট, এবং অশ্বত্থামার নিকটও; বিদুর ও রাজা ধৃতরাষ্ট্রের নিকট; এবং ধৃতরাষ্ট্রের সকল পুত্রের নিকটও (আমি অনুমতি প্রার্থনা করি)।
Verse 3
युयुत्सुं संजयं चैव तथैवान्यान् सभासद: । सर्वनामन्त्र्य गच्छामि द्रष्टास्मि पुनरेत्य व:,युधिष्ठिर बोले--मैं भरतवंशके समस्त गुरुजनोंसे वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। बड़े-बूढ़े पितामह भीष्म, राजा सोमदत्त, महाराज बाह्लिक, गुरुवर द्रोण और कृपाचार्य, अश्वृत्थामा, अन्यान्य नृपतिगण, विदुर, राजा धृतराष्ट्र, उनके सभी पुत्र, युयुत्सु, संजय तथा दूसरे सब सदस्योंसे पूछकर सबकी आज्ञा लेकर वनमें जाता हूँ, फिर लौटकर आप लोगोंका दर्शन करूँगा
যুধিষ্ঠির বললেন—যুয়ুযুৎসু, সঞ্জয় এবং অন্যান্য সকল সভাসদকে বিদায় জানিয়ে আমি প্রস্থান করছি; পুনরায় ফিরে এসে তোমাদের সকলকে দর্শন করব।
Verse 4
वैशम्पायन उवाच न च किंचिदथोचुस्तं द्विया सन्ना युधिष्ठिरम् । मनोभिरेव कल्याण दध्युस्ते तस्थ धीमत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर सब कौरव लाजके मारे सन्न रह गये, कुछ भी उत्तर न दे सके। उन्होंने मन-ही-मन उन बुद्धिमान् युधिष्ठिरके कल्याणका चिन्तन किया
বৈশম্পায়ন বললেন—যুধিষ্ঠির এভাবে বললে দ্বিজ-শ্রেষ্ঠগণ লজ্জায় স্তব্ধ হয়ে গেলেন; তাঁকে কিছুই বলতে পারলেন না। সেখানে দাঁড়িয়েই তাঁরা মনে মনে সেই প্রজ্ঞাবান যুধিষ্ঠিরের মঙ্গল কামনা করলেন।
Verse 5
विदुर उवाच आर्या पृथा राजपुत्री नारण्यं गन्तुमर्हति । सुकुमारी च वृद्धा च नित्यं चैव सुखोचिता,विदुर बोले--कुन्तीकुमारो! राजपुत्री आर्या कुन्ती वनमें जाने लायक नहीं हैं। वे कोमल अंगोंवाली और वृद्धा हैं, सदा सुख और आरामके ही योग्य हैं; अतः वे मेरे ही घरमें सत्कारपूर्वक रहेंगी। यह बात तुम सब लोग जान लो। मेरी शुभ कामना है कि तुम वहाँ सर्वथा नीरोग एवं सुखसे रहो
বিদুর বললেন—আর্যা রাজকন্যা পৃথা (কুন্তী) অরণ্যে যাওয়ার যোগ্য নন। তিনি কোমলাঙ্গী এবং বয়সে বৃদ্ধা; সর্বদাই সুখ-স্বাচ্ছন্দ্যে অভ্যস্ত।
Verse 6
इह वत्स्यति कल्याणी सत्कृता मम वेश्मनि । इति पार्था विजानीध्वमगदं वो<स्तु सर्वश:,विदुर बोले--कुन्तीकुमारो! राजपुत्री आर्या कुन्ती वनमें जाने लायक नहीं हैं। वे कोमल अंगोंवाली और वृद्धा हैं, सदा सुख और आरामके ही योग्य हैं; अतः वे मेरे ही घरमें सत्कारपूर्वक रहेंगी। यह बात तुम सब लोग जान लो। मेरी शुभ कामना है कि तुम वहाँ सर्वथा नीरोग एवं सुखसे रहो
বিদুর বললেন—“এই কল্যাণী মহীয়সী নারী আমারই গৃহে সম্মানসহকারে থাকবেন। হে পৃথাপুত্রগণ, তোমরা এ কথা জেনে রাখো। তোমরা সকলে সর্বতোভাবে নিরাময় ও সুখী হও।”
Verse 7
पाण्डवा ऊचु. तथेत्युक्त्वाब्रुवन् सर्वे यथा नो वदसेडनघ । त्वं पितृव्य: पितृसमो वयं च त्वत्परायणा:,पाण्डवोंने कहा--बहुत अच्छा, ऐसा ही हो। इतना कहकर वे सब फिर बोले --“अनघ! आप हमें जैसा कहें--जैसी आज्ञा दें, वही शिरोधार्य है। आप हमारे पितृव्य (पिताके भाई) हैं, अतः पिताके ही तुल्य हैं। हम सब भाई आपकी शरणमें हैं
পাণ্ডবরা বলল—“তথাস্তु।” এ কথা বলে তারা আবার বলল—“হে অনঘ, আপনি যা বলেন—যে আদেশ দেন—তাই আমাদের শিরোধার্য। আপনি আমাদের পিতৃব্য, পিতার সমান; আমরা সকল ভাই আপনার আশ্রয়ে নির্ভর করি।”
Verse 8
यथाअज्ञापयसे दिद्वंस्त्वं हि नः परमो गुरु: । यच्चान्यदपि कर्तव्यं तद् विधत्स्व महामते,“विद्वन! आप जैसी आज्ञा दें, वही हमें मान्य है; क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। महामते! इसके सिवा और भी जो कुछ हमारा कर्तव्य हो, वह हमें बताइये”
“হে বিদ্বান, আপনি যেমন আদেশ করবেন তেমনই আমরা করব; কারণ আপনি আমাদের পরম গুরু। হে মহামতি, আমাদের আর যা কর্তব্য আছে, তাও নির্ধারণ করে আমাদের নির্দেশ দিন।”
Verse 9
विदुर उवाच युधिष्ठिर विजानीहि ममेदं भरतर्षभ । नाधर्मेण जित: कश्चिद् व्यथते वै पराजये,विदुर बोले--भरतकुलभूषण युधिष्ठिर! तुम मुझसे यह जान लो कि अधर्मसे पराजित होनेवाला कोई भी पुरुष अपनी उस पराजयके लिये दुःखी नहीं होता
বিদুর বললেন—“হে ভরতশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির, আমার কথা বুঝে নাও—অধর্মের দ্বারা পরাজিত হলে কেউই সেই পরাজয়ে সত্যতই ব্যথিত হয় না।”
Verse 10
त्वं वै धर्म विजानीषे युद्धे जेता धनंजय: । हन्तारीणां भीमसेनो नकुलस्त्वर्थसंग्रही,तुम धर्मके ज्ञाता हो। अर्जुन युद्धमें विजय पानेवाले हैं। भीमसेन शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ हैं। नकुल आवश्यक वस्तुओंको जुटानेमें कुशल हैं
“তুমি ধর্ম ভালোই জানো। যুদ্ধে ধনঞ্জয় (অর্জুন) বিজয়ী। শত্রুনাশে ভীমসেন সক্ষম। আর প্রয়োজনীয় সম্পদ-সামগ্রী সংগ্রহ ও ব্যবস্থাপনায় নকুল দক্ষ।”
Verse 11
संयन्ता सहदेवस्तु धौम्यो ब्रह्म॒विदुत्तम: । धर्मार्थकुशला चैव द्रौपदी धर्मचारिणी,सहदेव संयमी हैं तथा ब्रह्मर्षि धौम्यजी ब्रह्म॒वेत्ताओंके शिरोमणि हैं। एवं धर्मपरायणा द्रौपदी भी धर्म और अर्थके सम्पादनमें कुशल है
সহদেব সংযমী এবং শাসন-পরিচালনায় যোগ্য পথপ্রদর্শক; ধৌম্য ব্রহ্মর্ষি ব্রহ্মবিদ্যাবিদদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ। আর ধর্মনিষ্ঠ দ্রৌপদীও ধর্ম ও অর্থ—উভয়ের সাধনে দক্ষ।
Verse 12
अन्योन्यस्य प्रिया: सर्वे तथैव प्रियदर्शना: । परैरभेद्या: संतुष्टा: को वो न स्पृहयेदिह,तुम सब लोग आपसमें एक-दूसरेके प्रिय हो, तुम्हें देखकर सबको प्रसन्नता होती है। शत्रु तुममें भेद या फूट नहीं डाल सकते, इस जगत्में कौन है जो तुमलोगोंको न चाहता हो
তোমরা সকলেই পরস্পরের প্রিয়, আর তোমাদের দর্শনেই সবার আনন্দ জাগে। সন্তুষ্ট ও ঐক্যবদ্ধ বলে বহিরাগত কেউ তোমাদের মধ্যে ভেদ ঘটাতে পারে না। এ জগতে কে আছে যে তোমাদের মতো লোককে না চায়?
Verse 13
एष वै सर्वकल्याण: समाधिस्तव भारत | नैनं शत्रुर्विषहते शक्रेणापि समोडप्युत,भारत! तुम्हारा यह क्षमाशीलताका नियम सब प्रकारसे कल्याणकारी है। इन्द्रके समान पराक्रमी शत्रु भी इसका सामना नहीं कर सकता
হে ভারত! ক্ষমাশীলতায় প্রতিষ্ঠিত তোমার এই দৃঢ় সংযম সর্বতোভাবে কল্যাণকর। ইন্দ্রসম পরাক্রমী শত্রুও এর মোকাবিলা করতে পারে না।
Verse 14
हिमवत्यनुशिष्टोडसि मेरुसावर्णिना पुरा । द्वैपायनेन कृष्णेन नगरे वारणावते,पूर्वकालमें मेरुसावर्णिने हिमालयपर तुम्हें धर्म और ज्ञानका उपदेश दिया है, वारणावत नगरमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने, भृगुतुंग पर्वतपर परशुरामजीने तथा दृषद्वतीके तटपर साक्षात् भगवान् शंकरने तुम्हें अपने सदुपदेशसे कृतार्थ किया है। अंजन पर्वतपर तुमने महर्षि असितका भी उपदेश सुना है
পূর্বকালে হিমালয়ে মেরুসাবর্ণি তোমাকে উপদেশ দিয়েছিলেন; আর বারাণাবত নগরে কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাসও তোমাকে শিক্ষা দিয়েছিলেন।
Verse 15
भगुतुज़े च रामेण दृषद्धत्यां च शम्भुना । अश्रौषीरसितस्यापि महर्षेरञ्जनं प्रति,पूर्वकालमें मेरुसावर्णिने हिमालयपर तुम्हें धर्म और ज्ञानका उपदेश दिया है, वारणावत नगरमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीने, भृगुतुंग पर्वतपर परशुरामजीने तथा दृषद्वतीके तटपर साक्षात् भगवान् शंकरने तुम्हें अपने सदुपदेशसे कृतार्थ किया है। अंजन पर्वतपर तुमने महर्षि असितका भी उपदेश सुना है
ভৃগুতুঙ্গ পর্বতে রাম (পরশুরাম) তোমাকে উপদেশ দিয়েছিলেন; দৃষদ্বতী নদীর তীরে শম্ভু (শিব)ও তোমাকে শিক্ষা দিয়েছিলেন; আর অঞ্জন পর্বতে তুমি মহর্ষি অসিতের উপদেশও শুনেছিলে।
Verse 16
कल्माषीतीरसंस्थस्य गतत्त्वं शिष्यतां भूगो: । द्रष्टा सदा नारदस्ते धौम्यस्तेडयं पुरोहित:,कल्माषी नदीके किनारे निवास करनेवाले महर्षि भृगुने भी तुम्हें उपदेश देकर अनुगृहीत किया है। देवर्षि नारदजी सदा तुम्हारी देखभाल करते हैं और तुम्हारे ये पुरोहित धौम्यजी तो सदा साथ ही रहते हैं
বিদুর বললেন—রাজন, তুমি উপদেশহীন নও। কল্মাষী নদীর তীরে নিবাসী মহর্ষি ভৃগু তোমাকে শিক্ষা দিয়ে অনুগ্রহ করেছেন; দেবর্ষি নারদ সর্বদা তোমার তত্ত্বাবধান করেন; আর তোমার কুলপুরোহিত ধৌম্য সদাই তোমার সঙ্গেই থাকেন। এমন গুরু ও রক্ষকদের মধ্যে থেকেও সংযম ও ধর্মাচরণই তোমার কর্তব্য।
Verse 17
मा हासी: साम्पराये त्वं बुद्धि तामृषिपूजिताम् । पुरूरवसमैलं त्वं बुद्धया जयसि पाण्डव,ऋषियोंद्वारा सम्मानित उस परलोकविषयक विज्ञानका तुम कभी त्याग न करना। पाण्डुनन्दन! तुम अपनी बुद्धिसे इलानन्दन पुरूरवाको भी पराजित करते हो
বিদুর বললেন—ঋষিদের দ্বারা পূজিত পরলোক-সম্বন্ধীয় সেই বোধ তুমি কখনও ত্যাগ কোরো না। হে পাণ্ডব, নিজের বুদ্ধিবলে তুমি ইলার পুত্র পুরূরবাসকেও অতিক্রম করতে পারো।
Verse 18
शक््त्या जयसि राज्ञो<न्यानृषीन् धर्मोपसेवया । ऐन्द्रे जये धृतमना याम्ये कोपविधारणे
বিদুর বললেন—শক্তিবলে তুমি অন্য রাজাদের জয় করতে পার; আর ধর্মসেবায় ঋষিদেরও অতিক্রম করতে পার। ইন্দ্রের ক্ষেত্রে বিজয়ে মন স্থির রাখো; আর যমের ক্ষেত্রে ক্রোধ সংযত করো।
Verse 19
शक्तिसे समस्त राजाओंको तथा धर्मसेवनद्वारा ऋषियोंको भी जीत लेते हो। तुम इन्द्रसे मनमें विजयका उत्साह प्राप्त करो। क्रोधको काबूमें रखनेका पाठ यमराजसे सीखो। तथा विसर्गे कौबेरे वारुणे चैव संयमे । आत्मप्रदानं सौम्यत्वमद्धयश्नैवोपजीवनम्,उदारता एवं दानमें कुबेरका और संयममें वरुणका आदर्श ग्रहण करो। दूसरोंके हितके लिये अपने-आपको निछावर करना, सौम्यभाव (शीतलता) तथा दूसरोंको जीवन-दान देना --इन सब बातोंकी शिक्षा तुम्हें जलसे लेनी चाहिये
বিদুর বললেন—শক্তিবলে তুমি সকল রাজাকে বশ করতে পার, আর ধর্মসেবায় ঋষিদেরও জয় করতে পার। ইন্দ্রের কাছ থেকে বিজয়ের উদ্যম গ্রহণ করো; যমরাজের কাছ থেকে ক্রোধ-নিগ্রহ শিখো। দান ও উদারতায় কুবেরকে, আর সংযমে বরুণকে আদর্শ করো। আর জল থেকে শেখো—অন্যের কল্যাণে নিজেকে উৎসর্গ করা, স্বভাবে কোমল ও শীতল থাকা, এবং জীবন ধারণ করে অন্যকে জীবনদান ও প্রতিপালন করা।
Verse 20
भूमे: क्षमा च तेजश्न समग्र॑ सूर्यमण्डलात् । वायोर्बल प्राप्रुहि त्वं भूते भ्यक्षात्मसम्पदम्,तुम भूमिसे क्षमा, सूर्यमण्डलसे तेज, वायुसे बल तथा सम्पूर्ण भूतोंसे अपनी सम्पत्ति प्राप्त करो
বিদুর বললেন—পৃথিবী থেকে ক্ষমা ও সহিষ্ণুতা গ্রহণ করো; পূর্ণ সূর্যমণ্ডল থেকে তেজ ও দীপ্তি; বায়ু থেকে বল ও উদ্যম; আর সকল প্রাণী থেকে আত্মসম্পদ—অন্তরের সত্য ধন—সংগ্রহ করো।
Verse 21
अगदं वो<चस्तु भद्रं वो द्रष्टास्मि पुनरागतान् । आपरद्धर्मार्थकृच्छेषु सर्वकार्येषु वा पुन:,तुम्हें कभी कोई रोग न हो, सदा मंगल-ही-मंगल दिखायी दे। कुशलपूर्वक वनसे लौटनेपर मैं फिर तुम्हें देखूँगा। युधिष्ठिर! आपत्तिकालमें, धर्म तथा अर्थका संकट उपस्थित होनेपर अथवा सभी कार्योंमें समय-समयपर अपने उचित कर्तव्यका पालन करना। कुन्तीनन्दन! भारत! तुमसे आवश्यक बातें कर लीं। तुम्हें कल्याण प्राप्त हो
বিদুর বললেন— তোমাদের কখনও রোগ না হোক; তোমাদের সর্বদা মঙ্গল হোক। তোমরা আবার ফিরে এলে আমি তোমাদের পুনরায় দেখব। বিপদের সময়ে, যখন ধর্ম ও অর্থের দাবি কঠিন ও সংঘর্ষপূর্ণ হয়ে ওঠে, এবং তেমনি সকল কাজে বারংবার—নিজের যথার্থ কর্তব্য অনুসারেই আচরণ করবে।
Verse 22
यथावत् प्रतिपद्येथा: काले काले युधिष्ठिर । आपूृष्टोडसीह कौन्तेय स्वस्ति प्राप्रुहि भारत,तुम्हें कभी कोई रोग न हो, सदा मंगल-ही-मंगल दिखायी दे। कुशलपूर्वक वनसे लौटनेपर मैं फिर तुम्हें देखूँगा। युधिष्ठिर! आपत्तिकालमें, धर्म तथा अर्थका संकट उपस्थित होनेपर अथवा सभी कार्योंमें समय-समयपर अपने उचित कर्तव्यका पालन करना। कुन्तीनन्दन! भारत! तुमसे आवश्यक बातें कर लीं। तुम्हें कल्याण प्राप्त हो
বিদুর বললেন— যুধিষ্ঠির, সময়ে সময়ে যথাযথ যা করণীয় তাই করবে। হে কুন্তীপুত্র, ভারতবংশীয়, যা বলা প্রয়োজন ছিল তা বলেছি; এখন বিদায় নিচ্ছি। তোমার কল্যাণ ও স্বস্তি হোক।
Verse 23
कृतार्थ स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्याम: पुनरागतम् । नहि वो वृजिनं किंचिद् वेद कश्चित् पुरा कृतम्,जब वनसे कुशलपूर्वक कृतार्थ होकर लौटोगे, तब यहाँ आनेपर फिर तुमसे मिलूँगा। तुम्हारे पहलेके किसी दोषको दूसरा कोई न जाने, इसकी चेष्टा रखना
তোমরা কৃতকার্য হয়ে নিরাপদে ফিরে এলে আমরা তোমাদের এখানে আবার দেখব। চেষ্টা করবে—তোমাদের পূর্বে করা কোনো দোষ যেন কেউ জানতে না পারে।
Verse 24
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा पाण्डव: सत्यविक्रम: । भीष्मद्रोणौ नमस्कृत्य प्रातिष्ठत युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! विदुरके ऐसा कहनेपर सत्यपराक्रमी पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भीष्म और द्रोणको नमस्कार करके वहाँसे प्रस्थित हुए
বৈশম্পায়ন বললেন— এভাবে বলা হলে সত্যবলে পরাক্রান্ত পাণ্ডব যুধিষ্ঠির ‘তথাস্তु’ বলে সম্মতি দিলেন। তারপর ভীষ্ম ও দ্রোণকে প্রণাম করে সেখান থেকে প্রস্থান করলেন।
Verse 78
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि अनुद्यूतपर्वणि युधिष्ठटिरवनप्रस्थाने5ष्टसप्ततितमो5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অনুদ্যূতপর্বে যুধিষ্ঠিরের বনপ্রস্থানের বিষয়ে অষ্টসপ্ততিতম অধ্যায় সমাপ্ত।