अन्योन्यस्य प्रिया: सर्वे तथैव प्रियदर्शना: । परैरभेद्या: संतुष्टा: को वो न स्पृहयेदिह,तुम सब लोग आपसमें एक-दूसरेके प्रिय हो, तुम्हें देखकर सबको प्रसन्नता होती है। शत्रु तुममें भेद या फूट नहीं डाल सकते, इस जगत्में कौन है जो तुमलोगोंको न चाहता हो
anyonyasya priyāḥ sarve tathaiva priyadarśanāḥ | parair abhedyāḥ santuṣṭāḥ ko vo na spṛhayed iha ||
তোমরা সকলেই পরস্পরের প্রিয়, আর তোমাদের দর্শনেই সবার আনন্দ জাগে। সন্তুষ্ট ও ঐক্যবদ্ধ বলে বহিরাগত কেউ তোমাদের মধ্যে ভেদ ঘটাতে পারে না। এ জগতে কে আছে যে তোমাদের মতো লোককে না চায়?
विदुर उवाच