
Adhyāya 45 — Duryodhana’s Distress, Śakuni’s Counsel, and the Summons for Dyūta
Upa-parva: Dyūta-prastāva (Prelude to the Dice-Game) — Śakuni–Duryodhana Counsel
Vaiśaṃpāyana narrates the post-rājasūya aftermath in which Duryodhana’s visible deterioration is interpreted by Śakuni as the psychosocial effect of witnessing Yudhiṣṭhira’s prosperity. Dhṛtarāṣṭra questions the basis of his son’s grief, listing the privileges and comforts already granted to him. Duryodhana responds with an explicit theory of ambition: contentment and compassion impede attainment, and the sight of a rival’s flourishing produces continuous agitation. He details the scale of Yudhiṣṭhira’s resources—numbers of householders supported, quantities of daily provisions, luxury textiles, animals, and the influx of diverse tribute—culminating in a confession that this abundance prevents him from finding peace. Śakuni then proposes a method to ‘acquire’ that prosperity through a dice match, stressing Yudhiṣṭhira’s fondness for gaming and lack of expertise. Duryodhana requests Dhṛtarāṣṭra’s authorization; Dhṛtarāṣṭra initially invokes Vidura’s advisory role but yields under Duryodhana’s emotional pressure. Orders are issued to prepare a grand hall and gaming arrangements, and Vidura is dispatched to bring Yudhiṣṭhira from Khāṇḍavaprastha, while Vidura internally recognizes the approach of a destructive turning point.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की दिव्य सभा में, जहाँ युधिष्ठिर का यश शिखर पर है, वहीं शिशुपाल की कटु वाणी धर्म-सभा को रण-सभा बनाने को उद्यत होती है। → शिशुपाल श्रीकृष्ण को ललकारता है—‘जनार्दन! मेरे साथ युद्ध करो; आज मैं तुम्हें और पाण्डवों को मार दूँगा’—और यह भी कहता है कि पाण्डवों ने अन्य राजाओं को लाँघकर कृष्ण का पूजन कर अपमान किया है। सभा में राजाओं के मन में क्रोध, आश्चर्य और भय एक साथ उठते हैं; कृष्ण की मर्यादा-धारण और सहनशीलता की सीमा पर सबकी दृष्टि टिक जाती है। → शिशुपाल की निरन्तर निन्दा के बाद, क्रुद्ध होकर श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र से उसी क्षण उसका शिरच्छेद कर देते हैं; और सब देखते हैं कि शिशुपाल का तेज/प्राण-तत्त्व पुरुषोत्तम में विलीन हो जाता है—यह दृश्य राजाओं को विस्मित कर देता है। → सभा में ऋषि, ब्राह्मण और नरेश कृष्ण के पराक्रम और न्याय-स्थापन की प्रशंसा करते हैं; राजसूय-यज्ञ की समाप्ति होती है। तत्पश्चात् ब्राह्मणों, राजाओं का सत्कार-विदा होता है और श्रीकृष्ण द्वारका के लिए प्रस्थान करते हैं; पीछे दिव्य सभा में दुर्योधन और शकुनि ठहरते हैं। → कृष्ण के प्रस्थान के बाद दुर्योधन-शकुनि का सभा में ठहरना भविष्य के षड्यन्त्र का बीज बो देता है।
Verse 1
ऑपन--रा_ज छा लॉस: पजञज्चचत्वारिशो< ध्याय: श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालका वध, राजसूययज्ञकी समाप्ति तथा सभी ब्राह्मणों, राजाओं और श्रीकृष्णका स्वदेशगमन वैशम्पायन उवाच ततः श्रुत्वैव भीष्मस्य चेदिराडुरुविक्रम: । युयुत्सुर्वासुदेवेन वासुदेवमुवाच ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनते ही महापराक्रमी चेदिराज शिशुपाल भगवान् वासुदेवके साथ युद्धके लिये उत्सुक हो उनसे इस प्रकार बोला --
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! তখন ভীষ্মের বাক্য শুনামাত্রই মহাপরাক্রমী চেদিরাজ শিশুপাল, বাসুদেবের সঙ্গে যুদ্ধ করতে উদ্গ্রীব হয়ে, বাসুদেবকে এইভাবে বলল।
Verse 2
आह्वये त्वां रणं गच्छ मया सार्ध जनार्दन । यावदद्य निहन्मि त्वां सहितं सर्वपाण्डवै:,“'जनार्दन! मैं तुम्हें बुला रहा हूँ आओ, मेरे साथ युद्ध करो, जिससे आज मैं समस्त पाण्डवोंसहित तुम्हें मार डालूँ
জনার্দন! আমি তোমাকে আহ্বান করছি—এসো, আমার সঙ্গে যুদ্ধে অবতীর্ণ হও। আজকের দিন শেষ হওয়ার আগেই আমি তোমাকে সমস্ত পাণ্ডবসহ নিধন করব।
Verse 3
सह त्वया हि मे वध्या: सर्वथा कृष्ण पाण्डवा: | नृपतीन् समतिक्रम्य यैरराजा त्वमर्चित:,“कृष्ण! तुम्हारे साथ ये पाण्डव भी सर्वथा मेरे वध्य हैं; क्योंकि इन्होंने सब राजाओंकी अवहेलना करके राजा न होनेपर भी तुम्हारी पूजा की
হে কৃষ্ণ! তোমার সঙ্গে এই পাণ্ডবরাও সর্বতোভাবে আমার বধ্য; কারণ তারা সমবেত রাজাদের অতিক্রম করে, রাজা না হয়েও তোমাকে পূজা করে সম্মান দিয়েছে।
Verse 4
ये त्वां दासमराजानं बाल्यादर्चन्ति दुर्मतिम् अनर्हमर्हवत् कृष्ण वध्यास्त इति मे मति:,“तुम कंसके दास थे तथा राजा भी नहीं हो, इसीलिये राजोचित पूजाके अनधिकारी हो। तो भी कृष्ण! जो लोग मूर्खतावश तुम-जैसे दुर्बुद्धिकी पूजनीय पुरुषकी भाँति पूजा करते हैं, वे अवश्य ही मेरे वध्य हैं, मैं तो ऐसा ही मानता हूँ”
হে কৃষ্ণ! যারা তোমাকে—যে শৈশব থেকে দাস ছিলে এবং রাজাও নও—অযোগ্য হয়েও যোগ্য জেনে রাজোচিত সম্মান দেয়, তারা আমার মতে বধ্য; এটাই আমার দৃঢ় বিশ্বাস।
Verse 5
एवमुक्तस्तत: कृष्णो मृदुपूर्वमिदं वच: । उवाच पार्थिवान् सर्वान् स समक्ष च वीर्यवान्,शिशुपालके ऐसा कहनेपर अनन्तपराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने उसके सामने समस्त राजाओंसे मधुर वाणीमें कहा--
এভাবে বলা হলে পরাক্রমশালী শ্রীকৃষ্ণ প্রথমে কোমল ও মধুর বাক্যে কথা শুরু করে, শিশুপালের সামনেই সমবেত সকল রাজাকে সম্বোধন করলেন।
Verse 6
एष न: शत्रुसत्यन्तं पार्थिवा: सात्वतीसुत: । सात्वतानां नृशंसात्मा न हितोडनपकारिणाम्,'भूमिपालो! यह है तो यदुकुलकी कन्याका पुत्र, परंतु हमलोगोंसे अत्यन्त शत्रुता रखता है। यद्यपि यादवोंने इसका कभी कोई अपराध नहीं किया है, तो भी यह क्रूरात्मा उनके अहितमें ही लगा रहता है
হে রাজগণ! এই সাত্বতী-সুত আমাদের প্রতি চরম শত্রুতা পোষণ করে। সাত্বতেরা (যাদবেরা) তার কোনো অপকার করেনি, তবু নিষ্ঠুরচিত্ত এই ব্যক্তি তাদের অমঙ্গলের দিকেই সদা প্রবৃত্ত।
Verse 7
प्राग्ज्योतिषपुरं यातानस्मान् ज्ञात्वा नृशंसकृत् अदहद् द्वारकामेष स्वस्रीय: सन् नराधिपा:,“नरेश्वरो! हम प्राग्ज्योतिषपुरमें गये थे, यह बात जब इसे मालूम हुई, तब इस क्रूरकर्माने मेरे पिताजीका भानजा होकर भी द्वारकामें आग लगवा दी
বৈশম্পায়ন বললেন—আমরা প্রাগ্জ্যোতিষপুরে গিয়েছি, এ কথা জানতে পেরে সেই নিষ্ঠুর রাজা, আমার পিতার ভগ্নীপুত্র হয়েও, দ্বারকায় অগ্নিসংযোগ করাল।
Verse 8
क्रीडतो भोजराजस्य एष रैवतके गिरौ | हत्वा बद्ध्वा च तान् सर्वानुपायात् स्वपुरं पुरा,“एक बार भोजराज (उग्रसेन) रैवतक पर्वतपर क्रीड़ा कर रहे थे। उस समय यह वहीं जा पहुँचा और उनके सेवकोंको मारकर तथा शेष व्यक्तियोंको कैद करके उन सबको अपने नगरमें ले गया
বৈশম্পায়ন বললেন—ভোজরাজ (উগ্রসেন) যখন রৈবতক পর্বতে ক্রীড়া করছিলেন, তখন এ ব্যক্তি সেখানে এসে তাঁর কয়েকজন পরিচারককে হত্যা করে, বাকিদের বেঁধে সকলকে নিজের নগরে নিয়ে গেল।
Verse 9
अश्रमेधे हयं मेध्यमुत्सूष्टं रक्षिभि्वृतम् । पितुर्मे यज्ञविघ्नार्थमहरत् पापनिश्चय:,“मेरे पिताजी अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा ले चुके थे। उसमें रक्षकोंसे घिरा हुआ पवित्र अश्व छोड़ा गया था। इस पापपूर्ण विचारवाले दुष्टात्माने पिताजीके यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये उस अश्वको भी चुरा लिया था
বৈশম্পায়ন বললেন—আমার পিতা অশ্বমেধ যজ্ঞে দীক্ষিত ছিলেন; প্রহরীদের বেষ্টনীতে পবিত্র অশ্বটি মুক্ত করা হয়েছিল। কিন্তু পাপ-সংকল্পে স্থির সেই দুষ্কৃতী যজ্ঞে বিঘ্ন ঘটাতে অশ্বটি অপহরণ করল।
Verse 10
सौवीरान् प्रति यातां च बभ्रोरेष तपस्विन: । भार्यामभ्यहरन्मोहादकामां तामितो गताम्,“इतना ही नहीं, इसने तपस्वी बभ्रुकी पत्नीका, जो यहाँसे द्वारका जाते समय सौवीरदेश पहुँची थी और इसके प्रति जिसके मनमें तनिक भी अनुराग नहीं था, मोहवश अपहरण कर लिया
বৈশম্পায়ন বললেন—এ ছাড়াও, তপস্বী বভ্রুর পত্নী যখন এখান থেকে দ্বারকার পথে সৌবীর দেশে পৌঁছেছিলেন—যাঁর মনে এ ব্যক্তির প্রতি বিন্দুমাত্র কামনা ছিল না—তাঁকে সে মোহবশত অপহরণ করল।
Verse 11
एष मायाप्रतिच्छन्न: करूषार्थ तपस्विनीम् । जहार भद्रां वैशालीं मातुलस्य नृशंसकृत्,“इस क्रूरकर्माने मायासे अपने असली रूपको छिपाकर करूषराजकी प्राप्तिके लिये तपस्या करनेवाली अपने मामा विशालानरेशकी कन्या भद्राका (करूषराजके ही वेषमें उपस्थित हो उसे धोखा देकर) अपहरण कर लिया
বৈশম্পায়ন বললেন—মায়ায় নিজের প্রকৃত রূপ আচ্ছাদিত করে, নৃশংসকর্মা সে ব্যক্তি করূষরাজের স্বার্থসিদ্ধির জন্য তপস্যারত মাতুল-কন্যা বৈশালীর ভদ্রাকে অপহরণ করে নিয়ে গেল।
Verse 12
पितृष्वसु: कृते दुःखं सुमहन्मर्षयाम्यहम् । दिष्ट्या हीदं सर्वराज्ञां संनिधावद्य वर्तते,“मैं अपनी बुआके संतोषके लिये ही इसके बड़े दुःखद अपराधोंको सहन कर रहा हूँ; सौभाग्यकी बात है कि आज यह समस्त राजाओंके समीप मौजूद है
বৈশম্পায়ন বললেন— “পিতৃ-ফুফুর (পিতৃস্বসার) সন্তোষের জন্য আমি এই অতি মহাদুঃখ ও গুরুতর অপরাধ সহ্য করছি। সৌভাগ্য যে আজ এই বিষয়টি সকল রাজার সম্মুখে উপস্থিত।”
Verse 13
पश्यन्ति हि भवन्तोउद्य मय्यतीव व्यतिक्रमम् । कृतानि तु परोक्ष मे यानि तानि निबोधत,“आप सब लोग देख ही रहे हैं कि इस समय यह मेरे प्रति कैसा अभद्र बर्ताव कर रहा है। इसने परोक्षमें मेरे प्रति जो अपराध किये हैं, उन्हें भी आप अच्छी तरह जान लें
বৈশম্পায়ন বললেন— “আপনারা তো দেখছেনই, আজ সে আমার প্রতি কত বড় সীমালঙ্ঘন করছে। এখন শুনুন—আমার অগোচরে সে আমার বিরুদ্ধে যে অপরাধগুলি করেছে, সেগুলিও স্পষ্ট করে জেনে নিন।”
Verse 14
इमं॑ त्वस्य न शक्ष्यामि क्षन्तुमद्य व्यतिक्रमम् । अवलेपाद् वधाहईस्य समग्रे राजमण्डले,“परंतु आज इसने अहंकारवश समस्त राजाओंके सामने मेरे साथ जो दुर्व्यवहार किया है, उसे मैं कभी क्षमा न कर सकूँगा
বৈশম্পায়ন বললেন— “আজ আমি তার এই সীমালঙ্ঘন ক্ষমা করতে পারব না। অহংকারবশে, সমগ্র রাজমণ্ডলীর সম্মুখে, সে আমার প্রতি যে উদ্ধত আচরণ করেছে—সে বধের যোগ্য।”
Verse 15
रुक्मिण्यामस्य मूढस्य प्रार्थना55सीन्मुमूर्षत: । नचतां प्राप्तवान् मूढ:ः शूद्रो वेदश्रुतीमिव,“अब यह मरना ही चाहता है। इस मूर्खने पहले रुक्मिणीके लिये उसके बन्धु- बान्धवोंसे याचना की थी, परंतु जैसे शूद्र वेदकी ऋचाओंको श्रवण नहीं कर सकता, उसी प्रकार इस अज्ञानीको वह प्राप्त न हो सकी'
বৈশম্পায়ন বললেন— “এই মূঢ় ব্যক্তি যেন মৃত্যুই কামনা করছিল। সে আগে রুক্মিণীর বিষয়ে তার স্বজনদের কাছে প্রার্থনা করেছিল; কিন্তু সেই অজ্ঞ তাকে পায়নি—যেমন (প্রচলিত প্রথা অনুসারে) শূদ্রের জন্য বৈদিক শ্রুতি-শ্রবণ নিষিদ্ধ।”
Verse 16
वैशम्पायन उवाच एवमादि तत: सर्वे सहितास्ते नराधिपा: । वासुदेववच: श्रुत्वा चेदिराज॑ व्यगर्हयन्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी ये सब बातें सुनकर उन समस्त राजाओंने एक स्वरसे चेदिराज शिशुपालको धिक्कारा और उसकी निन््दा की
বৈশম্পায়ন বললেন— “জনমেজয়! এরপর, বাসুদেবের বাক্য শুনে, সমবেত সেই সকল নরাধিপ একসঙ্গে চেদিরাজ (শিশুপাল)-কে ধিক্কার ও ভর্ত্সনা করল।”
Verse 17
तस्य तद् वचन श्रुत्वा शिशुपाल: प्रतापवान् | जहास स्वनवद्धासं वाक््यं चेदमुवाच ह,श्रीकृष्णका उपर्युक्त वचन सुनकर प्रतापी शिशुपाल खिलखिलाकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला--
শ্রীকৃষ্ণের উক্তি শুনে প্রতাপশালী শিশুপাল উচ্চস্বরে উপহাসের হাসি হেসে উঠল এবং এইভাবে বলল—
Verse 18
मत्पूर्वा रुक्मिणीं कृष्ण संसत्सु परिकीर्तयन् | विशेषत: पार्थिवेषु व्रीडां न कुरुषे कथम्,“कृष्ण! तुम इस भरी सभामें, विशेषतः सभी राजाओंके सामने रुक्मिणीको मेरी पहलेकी मनोनीत पत्नी बताते हुए लज्जाका अनुभव कैसे नहीं करते?
“হে কৃষ্ণ! এই পরিপূর্ণ সভায়—বিশেষত সমবেত রাজাদের সামনে—রুক্মিণীকে আমার পূর্বনির্বাচিত পত্নী বলে ঘোষণা করে তুমি লজ্জা বোধ করো না কীভাবে?”
Verse 19
मन्यमानो हि कः सत्सु पुरुष: परिकीर्तयेत् । अन्यपूर्वा स्त्रियं जातु त्ववन्यो मधुसूदन,“मधुसूदन! तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनी स्त्रीको पहले दूसरेकी वाग्दत्ता पत्नी स्वीकार करते हुए सत्पुरुषोंकी सभामें इसका वर्णन करेगा?
“হে মধুসূদন! সজ্জনদের মধ্যে কোন সম্মানিত পুরুষ কখনও এ কথা প্রকাশ্যে বলবে যে সে এমন এক নারীকে পত্নী হিসেবে গ্রহণ করেছে, যিনি আগে অন্যের কাছে বাগ্দত্তা ছিলেন? তোমাকে ছাড়া আর কে এমন করবে?”
Verse 20
क्षम वा यदि ते श्रद्धा मा वा कृष्ण मम क्षम | क्रुद्धाद् वापि प्रसन्नाद् वा किं मे त्वत्तो भविष्यति,“कृष्ण! यदि अपनी बुआकी बातोंपर तुम्हें श्रद्धा हो तो मेरे अपराध क्षमा करो या न भी करो, तुम्हारे कुपित होने या प्रसन्न होनेसे मेरा क्या बनने-बिगड़ने-वाला है?”
“হে কৃষ্ণ! যদি তোমার পিতৃবোনের কথায় বিশ্বাস থাকে, তবে আমার অপরাধ ক্ষমা করো বা না-ই করো; তুমি ক্রুদ্ধ হও বা প্রসন্ন হও—তাতে আমার কীই বা হবে?”
Verse 21
तथा ब्रुवत एवास्य भगवान् मधुसूदन: । मनसाचिन्तयच्चक्रं दैत्यवर्गनिष्दनम्,शिशुपाल इस तरहकी बातें कर ही रहा था कि भगवान् मधुसूदनने मन-ही-मन दैत्यवर्गविनाशक सुदर्शन चक्रका स्मरण किया
শিশুপাল এভাবে বলতেই থাকল; তখন ভগবান মধুসূদন মনে মনে দানবদল-নাশক সুদর্শন চক্রকে স্মরণ করলেন।
Verse 22
एतस्मिन्नेव काले तु चक्रे हस्तगते सति । उवाच भगवानुच्चैर्वाक्यं वाक्यविशारद:,चिन्तन करते ही तत्काल चक्र हाथमें आ गया। तब बोलनेमें कुशल भगवान् श्रीकृष्णने उच्च स्वरसे यह वचन कहा--
ঠিক সেই মুহূর্তে, যখন চক্রটি তাঁর হাতে এসে পড়ল, বাক্য-নিপুণ ভগবান শ্রীকৃষ্ণ উচ্চস্বরে এই কথা বললেন।
Verse 23
शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत् क्षमितं मया । अपराधशकतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने,“यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते-देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ”
এখানে উপবিষ্ট সকল মহীপাল শুনুন—আমি কেন এতদিন একে ক্ষমা করেছি। এরই মাতার প্রার্থনায় আমি বর দিয়েছিলাম যে শিশুপালের একশো অপরাধ ক্ষমা করব।
Verse 24
दत्तं मया याचितं च तानि पूर्णानि पार्थिवा: । अधुना वधयिष्यामि पश्यतां वो महीक्षिताम्,“यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते-देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ”
হে পার্থিবগণ, যেই বর আমি প্রার্থনার ফলে দিয়েছিলাম, তা এখন পূর্ণ হয়েছে। এখন তোমরা পৃথিবীর অধিপতিরা দেখতেই থাকো—আমি একে বধ করব।
Verse 25
एवमुक्त्वा यदुश्रेष्ठेक्षेदिराजस्य तत्क्षणात् । व्यपाहरच्छिर: क्रुद्धश्षक्रेणामित्रकर्षण:,ऐसा कहकर कुपित हुए शत्रुहन्ता यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्णने चक्रसे उसी क्षण चेदिराज शिशुपालका सिर उड़ा दिया
এ কথা বলে, শত্রুদমনকারী যদুশ্রেষ্ঠ ভগবান শ্রীকৃষ্ণ ক্রুদ্ধ হয়ে সেই মুহূর্তেই চক্র দ্বারা চেদিরাজের মস্তক ছিন্ন করলেন।
Verse 26
स पपात महाबाहुर्वजाहत इवाचल: । ततश्वेदिपते्देहात् तेजो5ग्रयं ददृशुर्न॒पा:,महाबाहु शिशुपाल वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति धराशायी हो गया। महाराज! तदनन्तर सभी नरेशोंने देखा; चेदिराजके शरीरसे एक उत्कृष्ट तेज निकलकर ऊपर उठ रहा है; मानो आकाशसे सूर्य उदित हुआ हो। नरेश्वर! उस तेजने विश्ववन्दित कमलदललोचन श्रीकृष्णको नमस्कार किया और उसी समय उनके भीतर प्रविष्ट हो गया
মহাবাহু শিশুপাল ইন্দ্রের বজ্রে আঘাতপ্রাপ্ত পর্বতশৃঙ্গের মতো ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল। তারপর রাজারা দেখলেন—চেদিপতির দেহ থেকে এক পরম জ্যোতি উঠে আকাশমুখী হলো।
Verse 27
उत्पतन्तं महाराज गगनादिव भास्करम् | ततः कमलपत्राक्ष॑ं कृष्ण लोकनमस्कृतम् । ववन्दे तत् तदा तेजो विवेश च नराधिप,महाबाहु शिशुपाल वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति धराशायी हो गया। महाराज! तदनन्तर सभी नरेशोंने देखा; चेदिराजके शरीरसे एक उत्कृष्ट तेज निकलकर ऊपर उठ रहा है; मानो आकाशसे सूर्य उदित हुआ हो। नरेश्वर! उस तेजने विश्ववन्दित कमलदललोचन श्रीकृष्णको नमस्कार किया और उसी समय उनके भीतर प्रविष्ट हो गया
বৈশম্পায়ন বললেন—মহারাজ, তখন চেদিরাজার দেহ থেকে এক পরম তেজ ঊর্ধ্বে উঠল, যেন আকাশে সূর্য উদিত হল। সেই তেজ বিশ্ববন্দিত পদ্মনয়ন শ্রীকৃষ্ণকে প্রণাম করে তৎক্ষণাৎ তাঁর মধ্যেই প্রবেশ করল।
Verse 28
तदद्धुतममन्यन्त दृष्ट्वा सर्वे महीक्षित: । यद् विवेश महाबाहुं तत् तेज: पुरुषोत्तमम्,यह देखकर सभी राजाओंको बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसका तेज महाबाहु पुरुषोत्तममें प्रविष्ट हो गया
এ দৃশ্য দেখে সকল রাজাই বিস্ময়ে অভিভূত হলেন, কারণ সেই তেজ মহাবাহু পুরুষোত্তমের মধ্যে প্রবেশ করল।
Verse 29
अनश्रे प्रववर्ष द्यौ: पपात ज्वलिताशनि: । कृष्णेन निहते चैद्ये चचाल च वसुंधरा,श्रीकृष्णके द्वारा शिशुपालके मारे जानेपर सारी पृथ्वी हिलने लगी, बिना बादलोंके ही आकाशसे वर्षा होने लगी और प्रज्वलित बिजली टूट-टूटकर गिरने लगी
শ্রীকৃষ্ণের হাতে চেদিরাজ শিশুপাল নিহত হতেই অমেঘ আকাশ থেকে বৃষ্টি ঝরল, জ্বলন্ত বজ্রপাত ঘটতে লাগল, আর পৃথিবী কেঁপে উঠল।
Verse 30
ततः केचिन्महीपाला नाब्रुवंस्तत्र किंचन । अतीतवाक्पथे काले प्रेक्षमाणा जनार्दनम्,वह समय वाणीकी पहुँचके परे था। उसका वर्णन करना कठिन था। उस समय कोई भूपाल वहाँ इस विषयमें कुछ भी न बोल सके--मौन रह गये। वे बार-बार केवल श्रीकृष्णके मुखकी ओर देखते रहे
তখন কয়েকজন রাজা সেখানে কিছুই বললেন না। সে মুহূর্ত বাক্যের অতীত ছিল। নীরব হয়ে তাঁরা বারবার জনার্দন শ্রীকৃষ্ণের দিকেই তাকিয়ে রইলেন।
Verse 31
हस्तैर्हस्ताग्रमपरे प्रत्यपिंषन्नमर्षिता: । अपरे दशनैरोष्ठानदशन् क्रोधमूर्च्छिता:,कुछ अन्य नरेश अत्यन्त अमर्षमें भरकर हाथोंसे हाथ मसलने लगे तथा दूसरे लोग क्रोधसे मूर्च्छित होकर दाँतोंसे ओठ चबाने लगे
আরও কিছু রাজা অসহিষ্ণু ক্রোধে হাতের উপর হাত ঘষতে লাগলেন; অন্যেরা রাগে বিহ্বল হয়ে দাঁতে ঠোঁট কামড়াতে লাগলেন।
Verse 32
रहश्न केचिद् वार्ष्णेयं प्रशशंसुर्नराधिपा: । केचिदेव सुसंरब्धा मध्यस्थास्त्वपरेडभवन्,कुछ राजा एकान्तमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रशंसा करने लगे। कुछ ही भूपाल अत्यन्त क्रोधके वशीभूत हो रहे थे तथा कुछ लोग तटस्थ थे
কিছু রাজা গোপনে বার্ষ্ণেয় শ্রীকৃষ্ণের প্রশংসা করতে লাগলেন। কেউ কেউ প্রবল ক্রোধে উত্তেজিত হয়ে উঠল, আর কতিপয় নির্লিপ্ত ও নিরপেক্ষ হয়ে রইল।
Verse 33
शिशुपालके वधके लिये भगवान्का हाथमें चक्र ग्रहण करना दुर्योधनका स्थलके भ्रमसे जलमें गिरना प्रह्श: केशवं जग्मु: संस्तुवन्तो महर्षय: । ब्राह्मणाश्न महात्मान: पार्थिवाश्न महाबला:
আনন্দিত হয়ে মহর্ষিগণ কেশবের কাছে গেলেন এবং তাঁকে স্তব করতে লাগলেন; তেমনি মহাত্মা ব্রাহ্মণগণ ও মহাবলী রাজাগণও (তাঁর নিকট গিয়ে) প্রশংসা করলেন।
Verse 34
पाण्डव्स्त्वब्रवीद् भ्रातून् सत्कारेण महीपतिम्,पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने भाइयोंसे कहा--“दमघोष-पुत्र वीर राजा शिशुपालका अन्त्येष्टि संस्कार बड़े सत्कारके साथ करो, इसमें देर न लगाओ।” पाण्डवोंने भाईकी उस आज्ञाका यथार्थरूपसे पालन किया
তখন পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠির ভ্রাতৃগণকে সম্মানসহ বললেন—“দমঘোষ-পুত্র বীর শিশুপালের অন্ত্যেষ্টিক্রিয়া যথোচিত রাজসম্মানে, বিলম্ব না করে সম্পন্ন কর।” পাণ্ডবরা ভ্রাতার আদেশ যথাযথভাবে পালন করল।
Verse 35
दमघोषात्मजं वीरं संस्कारयत मा चिरम् | तथा च कृतवन्तस्ते भ्रातुर्व शासनं तदा,पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अपने भाइयोंसे कहा--“दमघोष-पुत्र वीर राजा शिशुपालका अन्त्येष्टि संस्कार बड़े सत्कारके साथ करो, इसमें देर न लगाओ।” पाण्डवोंने भाईकी उस आज्ञाका यथार्थरूपसे पालन किया
যুধিষ্ঠির বললেন—“দমঘোষ-পুত্র বীর শিশুপালের অন্ত্যেষ্টিক্রিয়া বিলম্ব না করে, যথোচিত সম্মানে সম্পন্ন কর।” তখন পাণ্ডবরা ভ্রাতার বাক্য আদরসহ ঠিক তেমনই পালন করল।
Verse 36
चेदीनामाधिपत्ये च पुत्रमस्य महीपते: । अभ्यषिज्चत् तदा पार्थ: सह तैर्वसुधाधिपै:,उस समय कुन्तीनन्दन राजा युधिष्छिरने वहाँ आये हुए सभी भूमिपालोंके साथ चेदिदेशके राजसिंहासनपर शिशुपालके पुत्रको अभिषिक्त कर दिया
তখন পার্থ যুধিষ্ঠির সেখানে উপস্থিত সকল ভূ-পালদের সঙ্গে সেই রাজা (শিশুপাল)-এর পুত্রকে চেদি-রাজ্যের অধিপতি হিসেবে অভিষিক্ত করলেন।
Verse 37
ततः स कुरुराजस्य क्रतुः सर्वसमृद्धिमान् । यूनां प्रीतिकरो राजन् स बभौ विपुलौजस:,तदनन्तर महातेजस्वी कुरुराज युधिष्ठिरका वह सम्पूर्ण समृद्धियोंसे भरा-पूरा राजसूययज्ञ तरुण राजाओंकी प्रसन्नताको बढ़ाता हुआ अनुपम शोभा पाने लगा
তারপর কুরু-রাজ যুধিষ্ঠিরের সেই রাজসূয় যজ্ঞ—সর্বপ্রকার সমৃদ্ধিতে পরিপূর্ণ—মহাতেজে দীপ্ত হয়ে উঠল। হে রাজন, তা তরুণ রাজাদের আনন্দ বাড়িয়ে অতুল মহিমায় উজ্জ্বল হয়ে উঠল।
Verse 38
शान्तविध्न: सुखारम्भ: प्रभूतधनधान्यवान् । अन्नवान् बहुभक्ष्यश्व केशवेन सुरक्षित:,उस यज्ञका विघ्न शान्त हो गया था; अतः उसका सुखपूर्वक आरम्भ हुआ। उसमें अपरिमित धन-धान्यका संग्रह एवं सदुपयोग किया गया था। भगवान् श्रीकृष्णसे सुरक्षित होनेके कारण उस यज्ञमें कभी अन्नकी कमी नहीं होने पायी। उसमें सदा पर्याप्तमात्रामें भक्ष्य-भोज्य आदिकी सामग्री प्रस्तुत रहती थी
সেই যজ্ঞের সব বিঘ্ন প্রশমিত হল; তাই তা সুখে আরম্ভ হল। তা অঢেল ধন-ধান্যে সমৃদ্ধ ছিল; আর কেশবের রক্ষায় সেখানে অন্নের কখনও অভাব ঘটেনি। সর্বদা নানা ভক্ষ্য-ভোজ্য প্রস্তুত থাকত।
Verse 39
(ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम् । उपेन्द्रबुद्धया विहितं सहदेवेन भारत ।। भरतनन्दन! राजाओंने सहदेवके द्वारा विष्णु-बुद्धिसे भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले उस यज्ञका उत्तम विधि-विधान देखा। ददृशुस्तोरणान्यत्र हेमतालमयानि च । दीप्तभास्करतुल्यानि प्रदीप्तानीव तेजसा । स यज्ञस्तोरणैस्तैश्ष ग्रहैद्यौरिव सम्बभौ ।। उस यज्ञमण्डपमें सुवर्णमय तालके बने हुए फाटक दिखायी देते थे, जो अपनी प्रभासे तेजस्वी सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे। उन तेजस्वी द्वारोंसे वह विशाल यज्ञमण्डप ग्रहोंसे आकाशकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। शय्यासनविहारां श्व सुबहून् वित्तसम्भूतान् । घटान् पात्री: कटाहानि कलशानि समन्ततः: । न ते किज्चिदसौवर्णमपश्यंस्तत्र पार्थिवा: ।। वहाँ शय्या, आसन और क्रीडाभवनोंकी संख्या बहुत थी। उनके निर्माणमें प्रचुर धन लगा था। चारों ओर घड़े, भाँति भाँतिके पात्र, कड़ाहे और कलश आदि सुवर्णनिर्मित सामान दृष्टिगोचर हो रहे थे। वहाँ राजाओंने कोई ऐसी वस्तु नहीं देखी, जो सोनेकी बनी हुई नहो। ओदनानां विकाराणि स्वादूनि विविधानि च । सुबहूनि च भक्ष्याणि पेयानि मधुराणि च । ददुर्द्धिजानां सततं राजप्रेष्या महाध्वरे ।। उस महान् यज्ञमें राजसेवकगण ब्राह्मणोंके आगे सदा नाना प्रकारके स्वादिष्ट भात तथा चावलकी बनी हुई बहुत-सी दूसरी भोज्य वस्तुएँ परोसते रहते थे। वे उनके लिये मधुर पेय पदार्थ भी अर्पण करते थे। पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां भुड्जतां तदा । स्थापिता तत्र संज्ञाभूच्छड्खो 5 ध्मायत नित्यश: ।। भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंकी संख्या जब एक लाख पूरी हो जाती थी, तब वहाँ प्रतिदिन शंख बजाया जाता था। मुहुर्मुहु: प्रणादस्तु तस्य शड्खस्य भारत । उत्तमं शड्खशब्दं तं श्रुव्वा विस्मपमागता: ।। जनमेजय! दिनमें कई बार इस तरहकी शंख-ध्वनि होती थी। वह उत्तम शंखनाद सुनकर लोगोंको बड़ा विस्मय होता था। एवं प्रवृत्ते यज्ञे तु तुष्टपुष्टजनायुते । अन्नस्य बहवो राजन्नुत्सेधा: पर्वतोपमा: । दधिकुल्याश्न ददृशु: सर्पिषां च हृदाउ्जना: ।। इस प्रकार सहसों हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञका कार्य चलने लगा। राजन! उसमें अन्नके बहुत-से ऊँचे ढेर लगाये गये थे, जो पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। लोगोंने देखा, वहाँ दहीकी नहरें बह रही थीं तथा घीके कितने ही कुण्ड भरे हुए थे। जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायुत: । राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्मिन् महाक्रतौ ।। राजन! महाराज युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें नाना जनपदोंसे युक्त सारा जम्बूद्वीप ही एकत्र हुआ-सा दिखायी देता था। राजानः स्रग्विणस्तत्र सुमृष्टमणिकुण्डला: । विविधान्यन्नपानानि लेह्यानि विविधानि च । तेषां नृपोपभोग्यानि ब्राह्माणे भ्यो ददुः सम ते ।। वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल तथा हार धारण किये नरेश ब्राह्मणोंको राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य नाना प्रकारके अन्न-पान और भाँति-भाँतिकी चटनी परोसते थे। एतानि सततं भुक््त्वा तस्मिन् यज्ञे द्विजातय: । परां प्रीतिं ययु: सर्वे मोदमानास्तदा भृशम् ।। उस यज्ञमें निरन्तर उपर्युक्त पदार्थ भोजन करके सब ब्राह्मण आनन्दमग्न हो बड़ी तृप्ति और प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एवं समुदितं सर्व बहुगोधनधान्यवत् | यज्ञवार्ट नृपा दृष्टवा विस्मयं परमं ययु: ।। इस प्रकार बहुत-सी गायों तथा धन-धान्यसे सम्पन्न उस समृद्धिशाली यज्ञमण्डपको देखकर सब राजाओंको बड़ा आश्चर्य होता था। ऋत्विजश्न यथाशास्त्रं राजसूयं महाक्रतुम् । पाण्डवस्य यथाकालं जुहुवु: सर्ववाजका: ।। ऋत्विजूलोग शास्त्रीय विधिके अनुसार राजा युधिष्ठिरके उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते थे और समस्त याजक ठीक समयपर अग्निमें आहुतियाँ देते थे। व्यासधौम्यादय: सर्वे विधिवत् षोडशर्त्विज: । स्वस्वकर्माणि चक्कुस्ते पाण्डवस्य महाक्रतौ ।। व्यास और धौम्य आदि जो सोलह ऋत्विज् थे, वे युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें विधिपूर्वक अपने-अपने निश्चित कार्योंका सम्पादन करते थे। नाषडड्डविदत्रासीत् सदस्यो नाबहुश्रुतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो नपापो नाक्षमो द्विज: ।। उस यज्ञमण्डपमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो वेदके छहों अंगोंका ज्ञाता, बहुश्रुत, व्रतशील, अध्यापक, पापरहित, क्षमाशील एवं सामर्थ्यशील न हो। न तत्र कृपण: कश्िद् दरिद्रो न बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानुष: ।। उस यज्ञमें कोई भी मनुष्य दीन, दरिद्र, दुःखी, भूखा-प्यासा अथवा मूढ़ नहीं था। भोजन भोजनार्थिभ्यो दापयामास सर्वदा | सहदेवो महातेजा: सततं राजशासनात् ।। महातेजस्वी सहदेव महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको सदा भोजन दिलाया करते थे। सस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकर्माणि याजका: । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रार्थचक्षुष: ।। शास्त्रोक्त अर्थपर दृष्टि रखनेवाले यज्ञकुशल याजक प्रतिदिन सब कार्योंको विधिवत् सम्पन्न करते थे। ब्राह्मणा वेदशास्त्रज्ञा: कथाश्षक्रुश्न सर्वदा । रेमिरे च कथान्ते तु सर्वे तस्मिन् महाक्रतौ ।। वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण वहाँ सदा कथा-प्रवचन किया करते थे। उस महायज्ञमें सब लोग कथाके अन्तमें बड़े सुखका अनुभव करते थे। देवैरन्यैश्न यक्षेश्ष उरगैर्दिव्यमानुषै: । विद्याधरगणै: कीर्ण: पाण्डवस्य महात्मन: ।। स राजसूय: शुशुभे धर्मराजस्य धीमत: । देवता, असुर, यक्ष, नाग, दिव्य मानव तथा विद्याधरगणोंसे भरा हुआ बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन महात्मा धर्मराजका वह राजसूययज्ञ बड़ी शोभा पाता था। गन्धर्वगणसंकीर्ण: शोभितो<प्सरसां गणै: ।। देवैर्मुनिगणैर्यक्षै्देवलोक इवापर: । स किम्पुरुषगीतैश्न किन्नरैरुपशोभित: ।। वह यज्ञमण्डप गन्धर्वों, अप्सरा-समूहों, देवताओं, मुनिगणों तथा यक्षोंसे सुशोभित हो दूसरे देवलोकके समान जान पड़ता था। किम्पुरुषोंके गीत तथा किन्नरगण उस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे थे। नारदश्न जगौ तत्र तुम्बुरुश्न महाद्युति: । विश्वावसुश्रित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदा: । रमयन्ति सम तान् सर्वान् यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ।। नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा दूसरे गीतकुशल गन्धर्व वहाँ गीत गाकर यज्ञकार्योंके बीच-बीचमें अवकाश मिलनेपर सब लोगोंका मनोरंजन करते थे। इतिहासपुराणानि आख्यानानि च सर्वश: । ऊचुर्व शब्दशास्त्रज्ञा नित्यं कर्मान्तरेष्वथ ।। यज्ञसम्बन्धी कर्मोंके बीचमें अवसर मिलनेपर व्याकरणशास्त्रके ज्ञाता विद्वान् पुरुष इतिहास, पुराण तथा सब प्रकारके उपाख्यान सुनाया करते थे। भेयश्व मुरजाश्वैव मड्डुका गोमुखाश्न ये । शृज्भवंशाम्बुजाश्वैव श्रूयन्ते सम सहस्रश: ।। वहाँ सहस्रों भेरी, मृदंग, मड्डुक, गोमुख, शृंग, वंशी और शंखोंके शब्द सुनायी पड़ते थे। लोके<स्मिन् सर्वविप्राश्च वैश्या: शूद्राश्न॒ सर्वश: । सर्वे म्लेच्छा: सर्ववर्णा: सादिमध्यान्तजास्तथा ।। नानादेशसमुद्धूतीननाजातिभिरागतै: । पर्याप्त इव लोको<यं युधिष्ठिरनिवेशने ।। इस जगत्में रहनेवाले समस्त ब्राह्मण, (क्षत्रिय,) वैश्य, शूद्र, सब प्रकारके म्लेच्छ तथा अग्रज, मध्यज और अन्त्यज आदि सभी वर्णोंके लोग उस यज्ञमें उपस्थित हुए थे। अनेक देशोंमें उत्पन्न विभिन्न जातिके लोगोंके शुभागमनसे युधिष्ठिरके उस राजभवनमें ऐसा जान पड़ता था कि यह समस्त लोक वहाँ उपस्थित हो गया है। भीष्मद्रोणादय: सर्वे कुरव: ससुयोधना: । वृष्णयश्व समग्राश्न पज्चालाश्चापि सर्वशः । यथाहँं सर्वकर्माणि चक्रुर्दासा इव क्रतौ ।। उस राजसूययज्ञमें भीष्म, ट्रोण और दुर्योधन आदि समस्त कौरव, सारे वृष्णिवंशी तथा सम्पूर्ण पांचाल भी सेवकोंकी भाँति यथायोग्य सभी कार्य अपने हाथों करते थे। एवं प्रवृत्तो यज्ञ: स धर्मराजस्य धीमत: । शुशुभे च महाबाहो सोमस्येव क्रतुर्यथा ।। महाबाहु जनमेजय! इस प्रकार बुद्धिमान् युधिष्ठिरका वह यज्ञ चन्द्रमाके राजसूययज्ञकी भाँति शोभा पाता था। वस्त्राणि कम्बलांश्रैव प्रावारांश्नैव सर्वदा | निष्कहेमजभाण्डानि भूषणानि च सर्वश: । प्रददौ तत्र सततं धर्मराजो युधिष्िर: ।। धर्मराज युधिष्ठिर उस यज्ञमें हर समय वस्त्र, कम्बल, चादर, स्वर्णपदक, सोनेके बर्तन और सब प्रकारके आभूषणोंका दान करते रहते थे। यानि तत्र महीपेभ्यो लब्धं वा धनमुत्तमम् । तानि रत्नानि सर्वाणि विप्राणां प्रददौ तदा ।। वहाँ राजाओंसे जो-जो रत्न अथवा उत्तम धन भेंटके रूपमें प्राप्त हुए, उन सबको युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंकी सेवामें समर्पित कर दिया। कोटीसहसरं प्रददौ ब्राह्मणानां महात्मनाम् | उन्होंने महात्मा ब्राह्मणोंको दक्षिणाके रूपमें सहस्नर कोटि स्वर्णमुद्राएँ प्रदान कीं। न करिष्यति त॑ लोके कक्षिदन्यो महीपति: ।। याजका: सर्वकामैश्न सततं ततृपुर्धने: । उन्होंने संसारमें वह कार्य किया जिसे दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुएँ और प्रचुर धन पाकर सदाके लिये तृप्त हो गये। व्यासं धौम्यं च प्रयतो नारदं च महामतिम् ।। सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च । याज्ञवल्क्यं कठं चैव कलापं च महौजसम् । सर्वाश्च विप्रप्रवरान् पूजयामास सत्कृतान् ।। फिर राजा युधिष्ठिरने व्यास, धौम्य, महामति नारद, सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, याज्ञवल्क्य, कठ तथा महातेजस्वी कलाप--इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूर्ण मनोयोगके साथ सत्कार एवं पूजन किया। युधिछिर उवाच युष्मत्प्रभावात् प्राप्तोड्यं राजसूयो महाक्रतुः । जनार्दनप्रभावाच्च सम्पूर्णो मे मनोरथ: ।। युधिष्ठिर उनसे बोले--महर्षियो! आपलोगोंके प्रभावसे यह राजसूय महायज्ञ सांगोपांग सम्पन्न हुआ। भगवान् श्रीकृष्णके प्रतापसे मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया। वैशम्पायन उवाच अथ यज्ञ समाप्यान्ते पूजयामास माधवम् | बलदेवं च देवेशं भीष्माद्यांश्व॒ कुरूत्तमान् ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार यज्ञसमाप्तिके समय राजा युधिष्छिरने अन्तमें लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण, देवेश्वर बलदेव तथा कुरुश्रेष्ठ भीष्म आदिका पूजन किया। समापयामास च त॑ राजसूयं महाक्रतुम् | तं तु यज्ञ महाबाहुरासमाप्तेर्जनार्दन: । ररक्ष भगवाउ्छौरि: शारज्नचक्रगदाधर:,तदनन्तर उस राजसूय महायज्ञको विधिपूर्वक समाप्त किया। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने आरम्भसे लेकर अन्ततक उस यज्ञकी रक्षा की
হে ভারত! রাজারা সেই যজ্ঞের উৎকৃষ্ট বিধি-বিধান প্রত্যক্ষ করলেন—যা সহদেব উপেন্দ্রবুদ্ধিতে, অর্থাৎ বিষ্ণু-স্বরূপ শ্রীকৃষ্ণকে প্রীত করার উদ্দেশ্যে সুবিন্যস্ত করেছিলেন।
Verse 40
ततस्त्ववभृथस्नातं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । समस्त॑ पार्थिवं क्षत्रमुपगम्येदमब्रवीत्,तदनन्तर धर्मात्मा युधिष्टरिर जब अवभृथस्नान कर चुके, उस समय समस्त क्षत्रिययजाओंका समुदाय उनके पास जाकर बोला--
তারপর ধর্মাত্মা যুধিষ্ঠির অবভৃথ-স্নান সম্পন্ন করলে, সমবেত রাজা ও ক্ষত্রিয়সমাজ তাঁর নিকট গিয়ে এই কথা বলল।
Verse 41
दिष्ट्या वर्धसि धर्मज्ञ साम्राज्यं प्राप्तवानसि । आजमीढाजमीढानां यश: संवर्धितं त्वया,“धर्मज्ञ! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने सम्राट्का पद प्राप्त कर लिया। अजमीढकुलनन्दन राजाधिराज! आपने इस कर्मद्वारा अजमीढवंशी क्षत्रियोंक यशका विस्तार तो किया ही है, महान् धर्मका भी सम्पादन किया है। नरव्याप्र! आपने हमारे लिये सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थ सुलभ करके हमारा बड़ा सम्मान किया है। अब हम आपसे जानेकी अनुमति लेना चाहते हैं
“ধর্মজ্ঞ! সৌভাগ্য যে আপনি উন্নতি লাভ করছেন; আপনি সাম্রাজ্য লাভ করেছেন। আপনার দ্বারা আজমীঢ়-বংশধরদের যশ বৃদ্ধি পেয়েছে।”
Verse 42
कर्मणैतेन राजेन्द्र धर्मश्न सुमहान् कृत: । आपूृच्छामो नरव्यात्र सर्वकामै: सुपूजिता:,“धर्मज्ञ! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने सम्राट्का पद प्राप्त कर लिया। अजमीढकुलनन्दन राजाधिराज! आपने इस कर्मद्वारा अजमीढवंशी क्षत्रियोंक यशका विस्तार तो किया ही है, महान् धर्मका भी सम्पादन किया है। नरव्याप्र! आपने हमारे लिये सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थ सुलभ करके हमारा बड़ा सम्मान किया है। अब हम आपसे जानेकी अनुमति लेना चाहते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজেন্দ্র, হে ধর্মজ্ঞ! এই কর্মের দ্বারা তুমি অতি মহান কীর্তি সাধন করেছ। হে নরব্যাঘ্র! সর্বপ্রকার কাম্য উপকরণে আমাদের পূজিত করে বিশেষ সম্মান দিয়েছ; অতএব আমরা এখন বিদায় নিয়ে প্রস্থান করার অনুমতি প্রার্থনা করছি।
Verse 43
इत्युक्त्वा राजशार्टूलस्तस्थौ गर्जन्ञमर्षण: । ऐसा कहकर क्रोधमें भरा हुआ राजसिंह शिशुपाल दहाड़ता हुआ युद्धके लिये डट गया,स्वराष्ट्राणि गमिष्यामस्तदनुज्ञातुमरहसि । श्रुत्वा तु वचन राज्ञां धर्मराजो युधिछिर: “हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।। राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा--*ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ'
এ কথা বলে রাজশার্দূল শিশুপাল ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে গর্জন করতে করতে যুদ্ধের জন্য অটল দাঁড়িয়ে রইল। তখন সকল রাজা বললেন—“আমরা নিজ নিজ রাজ্যে প্রস্থান করব; আপনি আমাদের অনুমতি দিন।” তাঁদের কথা শুনে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির যথাযোগ্যভাবে সেই পূজনীয় নৃপতিদের সম্মান করলেন এবং ভাইদের বললেন—“এরা সকলেই স্নেহবশত আমাদের কাছে এসেছিলেন। এখন এই পরন্তপ রাজারা আমার অনুমতি নিয়ে নিজ নিজ দেশে ফিরতে উদ্যত। তোমাদের মঙ্গল হোক—তোমরা এ শ্রেষ্ঠ নৃপতিদের সম্মানের সঙ্গে রাজ্যসীমা পর্যন্ত পৌঁছে দাও।”
Verse 44
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापववके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वरमें भीष्मवाक्यविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,यथाहईं पूज्य नृपतीन् भ्रातृन् सर्वानुवाच ह । राजान: सर्व एवैते प्रीत्यास्मानू समुपागता: “हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।। राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा--*ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ'
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন যুধিষ্ঠির সকল ভাইকে সেই পূজনীয় রাজাদের বিষয়ে বললেন। সকল রাজাই স্নেহবশত এসে বললেন—“আমরা নিজ নিজ রাজ্যে ফিরব; আজ আমাদের অনুমতি দিন।” তাঁদের অনুরোধ শুনে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির যথাযোগ্য সম্মান জানিয়ে ভাইদের আবার বললেন—“এরা সকলেই ভালোবাসা থেকে এসেছে; এখন আমার অনুমতি নিয়ে নিজ নিজ দেশে যেতে প্রস্তুত। তোমরা এ শ্রেষ্ঠ নৃপতিদের সম্মানের সঙ্গে রাজ্যসীমা পর্যন্ত পৌঁছে দাও।”
Verse 45
प्रस्थिता: स्वानि राष्ट्राणि मामापृच्छय परंतपा: । अनुव्रजत भद्ठरें वो विषयान्तं नृपोत्तमान्,“हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।। राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा--*ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ' इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवधे पज्चचत्वारिंशो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापरवके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवधविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
সেই পরন্তপ রাজারা আমার নিকট বিদায় নিয়ে নিজ নিজ রাজ্যে প্রস্থান করলেন। তোমাদের মঙ্গল হোক—তোমরা শ্রেষ্ঠ নৃপতিদের সম্মানের সঙ্গে রাজ্যসীমা পর্যন্ত পৌঁছে দাও।
Verse 46
भ्रातुर्वचनमाज्ञाय पाण्डवा धर्मचारिण: । यथाहँ नृपतीन् स्वनिकैकं॑ समनुव्रजन्,भाईकी बात मानकर वे धर्मात्मा पाण्डव एक-एक करके यथायोग्य सभी राजाओंके साथ गये
ভ্রাতার আদেশ বুঝে ধর্মাচারী পাণ্ডবরা যথাযথ ক্রমে, নিজ নিজ অনুচরসহ, একে একে সকল রাজাদের সঙ্গে যাত্রা করলেন।
Verse 47
विराटमन्वयात् तूर्ण धृष्टद्युम्न: प्रतापवान् । धनंजयो यज्ञसेनं महात्मानं महारथम्,प्रतापी धृष्टद्युम्न तुरंत ही राजा विराटके साथ गया। धनंजयने महारथी महात्मा द्रपदका अनुसरण किया
বৈশম্পায়ন বললেন— প্রতাপশালী ধৃষ্টদ্যুম্ন দ্রুত রাজা বিরাটের অনুসরণ করল। আর প্রতাপী ধনঞ্জয় (অর্জুন) মহাত্মা মহারথী যজ্ঞসেন (দ্রুপদ)-কে অনুসরণ করল।
Verse 48
भीष्म च धृतराष्ट्रंच भीमसेनो महाबल: । द्रोणं च ससुतं वीर॑ सहदेवो युधाम्पति:,महाबली भीमसेन भीष्म और धुृतराष्ट्रके साथ गये। योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने द्रोणाचार्य तथा उनके वीर पुत्र अश्वत्थामाको पहुँचाया
বৈশম্পায়ন বললেন— মহাবলী ভীমসেন ভীষ্ম ও ধৃতরাষ্ট্রের সঙ্গে গেল। আর যুদ্ধে অধিপতি সহদেব দ্রোণকে, তাঁর বীর পুত্রসহ, সঙ্গে নিয়ে পৌঁছে দিল।
Verse 49
नकुल: सुबलं राजन् सहपुत्रं समन्वयात् | द्रौपदेया: ससौभद्रा: पर्वतीयान् महारथान्,राजन! सुबल और उनके पुत्रके साथ नकुल गये। द्रौपदीके पाँच पुत्रों तथा अभिमन्युने पर्वतीय महारथियोंको अपने राज्यकी सीमातक पहुँचाया
বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজন, নকুল সুবলকে তাঁর পুত্রসহ সঙ্গে নিয়ে গেল। আর দ্রৌপদীর পাঁচ পুত্র ও সৌভদ্র (অভিমন্যু) পর্বতদেশীয় মহারথীদের রাজ্যসীমা পর্যন্ত পৌঁছে দিল।
Verse 50
अन्वगच्छंस्तथैवान्यान क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभा: । एवं सुपूजिता: सर्वे जम्मुर्विप्रा: सहस्रश:,इसी प्रकार अन्य क्षत्रियशिरोमणियोंने दूसरे-दूसरे क्षत्रिय राजाओंका अनुगमन किया। इसी तरह सभी ब्राह्मण भी अत्यन्त पूजित हो सहस्रोंकी संख्यामें वहाँसे विदा हुए। राजाओं तथा ब्राह्मणोंके चले जानेपर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने युधिषप्ठिससे कहा--
বৈশম্পায়ন বললেন— সেইভাবেই ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠেরা অন্যান্য ক্ষত্রিয় রাজাদের অনুসরণ করল। আর তদ্রূপ সর্বোচ্চ সম্মানে পূজিত ব্রাহ্মণরাও সহস্র সহস্র করে সেখান থেকে প্রস্থান করলেন।
Verse 51
गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु सर्वेषु ब्राह्मणेषु च । युधिष्ठटिरमुवाचेदं॑ वासुदेव: प्रतापवान्,इसी प्रकार अन्य क्षत्रियशिरोमणियोंने दूसरे-दूसरे क्षत्रिय राजाओंका अनुगमन किया। इसी तरह सभी ब्राह्मण भी अत्यन्त पूजित हो सहस्रोंकी संख्यामें वहाँसे विदा हुए। राजाओं तथा ब्राह्मणोंके चले जानेपर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने युधिषप्ठिससे कहा--
বৈশম্পায়ন বললেন— যখন সকল পার্থিবেন্দ্র (রাজা) এবং সকল ব্রাহ্মণ প্রস্থান করলেন, তখন প্রতাপশালী বাসুদেব যুধিষ্ঠিরকে এই কথা বললেন।
Verse 52
आपूृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तानसि,“कुरुनन्दन! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ, अब मैं द्वारकापुरीको जाऊँगा। सौभाग्यसे आपने सब यज्ञोंमें उत्तम राजसूयका सम्पादन कर लिया”
বৈশম্পায়ন বললেন— “কুরুনন্দন! আমি তোমার নিকট বিদায় নিচ্ছি; এখন আমি দ্বারকায় গমন করব। সৌভাগ্যবশত তুমি যজ্ঞসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ রাজসূয় যজ্ঞ লাভ করে তা সম্পূর্ণ করেছ।”
Verse 53
तमुवाचैवमुक्तस्तु धर्मराजो जनार्दनम् तव प्रसादाद् गोविन्द प्राप्त: क्रतुवरो मया,उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्छिर जनार्दनसे बोले--“गोविन्द! आपकी ही कृपासे मैंने यह श्रेष्ठ यज्ञ सम्पन्न किया है
এ কথা শুনে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির জনার্দনকে বললেন— “গোবিন্দ! তোমার কৃপা দ্বারাই আমি এই শ্রেষ্ঠ যজ্ঞ লাভ করে সম্পূর্ণ করেছি।”
Verse 54
क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद् वशे स्थितम् | उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम्,“तथा सारा क्षत्रियमण्डल भी आपके ही प्रसादसे मेरे अधीन हुआ और उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट ले मेरे पास आया
“তোমার অনুগ্রহে সমগ্র ক্ষত্রিয়শক্তি আমার বশে এসেছে; এবং শ্রেষ্ঠ কর-উপহার বহন করে তা নিজেই আমার সম্মুখে উপস্থিত হয়েছে।”
Verse 55
कथं त्वद्गमनार्थ मे वाणी वितरतेडनघ । न हाहं त्वामृते वीर रतिं प्राप्नोमि कर्हिचित्,“अनघ! आपको जानेके लिये मेरी वाणी कैसे कह सकती है? वीर! मैं आपके बिना कभी प्रसन्न नहीं रह सकूँगा
“অনঘ! তোমার প্রস্থানের কথা উচ্চারণ করতে আমার বাক্য কীভাবে প্রবৃত্ত হবে? বীর! তোমাকে ছাড়া আমি কখনোই আনন্দ লাভ করতে পারব না।”
Verse 56
अवश्यं चैव गन्तव्या भवता द्वारकापुरी । एवमुक्त: स धर्मात्मा युधिष्ठिससहायवान्,'परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक बोले--“बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ!
বৈশম্পায়ন বললেন— “আপনাকে অবশ্যই দ্বারকানগরীতে গমন করতে হবে।” এ কথা শুনে ধর্মাত্মা শ্রীহরি, যুধিষ্ঠিরকে সঙ্গে নিয়ে আনন্দচিত্তে কুন্তীর কাছে গেলেন এবং বললেন— “পিসিমা! তোমার পুত্রেরা এখন রাজ্য লাভ করেছে; তাদের অভীষ্ট সিদ্ধ হয়েছে। তারা সকলেই ধন ও রত্নে সমৃদ্ধ। এখন তুমি তাদের সঙ্গে সুখে বাস করো। যদি তুমি অনুমতি দাও, তবে আমি দ্বারকায় যেতে চাই।”
Verse 57
अभिगम्याब्रवीत् प्रीतः पृथां पृथुयशा हरि: । साम्राज्यं समनुप्राप्ता: पुत्रास्तेडद्य पितृष्वस:,'परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक बोले--“बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ!
বৈশম্পায়ন বললেন— তখন প্রসন্নচিত্ত মহাযশস্বী হরি (কৃষ্ণ) পৃথা (কুন্তী)-র কাছে গিয়ে বললেন— “পিসিমা! আজ তোমার পুত্রেরা রাজ্যলাভ করেছে; তাদের বহুদিনের অভিলাষ পূর্ণ হয়েছে। তারা সকলেই ধন-রত্নে সমৃদ্ধ। এখন তুমি তাদের সঙ্গে আনন্দে বাস করো। যদি তোমার অনুমতি হয়, আমি দ্বারকায় যেতে চাই।”
Verse 58
सिद्धार्था वसुमन्तश्न सा त्वं प्रीतिमवाप्रुहि । अनुज्ञातस्त्वया चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे,'परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक बोले--“बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ!
“তোমার অভীষ্ট সিদ্ধ হয়েছে, তুমি ধনসম্পদে সমৃদ্ধ; অতএব শান্তি ও আনন্দ লাভ করো। আর তুমি যদি আমাকে অনুমতি দাও, তবে আমিও দ্বারকায় যেতে প্রস্তুত।” এ কথা বলে ধর্মপরায়ণ মহাযশস্বী শ্রীহরি যুধিষ্ঠিরকে সঙ্গে নিয়ে কুন্তীর কাছে গেলেন এবং স্নেহমিশ্রিত সন্তোষে আবার বললেন— “পিসিমা! তোমার পুত্রেরা সাম্রাজ্য লাভ করেছে… তোমার অনুমতি হলে আমি দ্বারকায় যেতে চাই।”
Verse 59
सुभद्रां द्रोपदीं चैव सभाजयत केशव: । निष्क्रम्यान्त:पुरात् तस्माद् युधिष्ठिरसहायवान्,कुन्तीकी आज्ञा ले श्रीकृष्ण सुभद्रा और द्रौपदीसे भी मिले और मीठे वचनोंसे उन दोनोंको प्रसन्न किया। तत्पश्चात् वे युधिष्ठिरके साथ अन्तःपुरसे बाहर निकले
বৈশম্পায়ন বললেন— কেশব (কৃষ্ণ) সুভদ্রা ও দ্রৌপদীকেও যথোচিত সম্ভাষণ ও সম্মান জানালেন এবং মধুর বাক্যে তাঁদের উভয়কে প্রসন্ন করলেন। তারপর যুধিষ্ঠিরকে সঙ্গে নিয়ে তিনি অন্তঃপুর থেকে বাইরে এলেন।
Verse 60
स््नातश्न कृतजप्यश्ष ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । ततो मेघवपु: प्रख्यं स्यन्दनं च सुकल्पितम् । योजयित्वा महाबाहुर्दारुक: समुपस्थित:,फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आखरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े
স্নান করে জপ সম্পন্ন করে তিনি ব্রাহ্মণদের দিয়ে স্বস্তিবাচন করালেন। তারপর মেঘের মতো শ্যামবর্ণ, সুসজ্জিত সুন্দর রথ জুড়ে মহাবাহু দারুক সেবায় উপস্থিত হলেন।
Verse 61
उपस्थितं रथं दृष्टवा ताक्ष्यप्रवरकेतनम् । प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्मू महामना:,फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आखरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े
গরুড়ধ্বজে ভূষিত প্রস্তুত রথটি দেখে মহামনা শ্রীকৃষ্ণ প্রথমে দক্ষিণাবর্তে প্রদক্ষিণ করলেন, তারপর তাতে আরোহণ করলেন।
Verse 62
प्रययौ पुण्डरीकाक्षस्ततो द्वारवतीं पुरीम्,फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आखरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন পদ্মনয়ন ভগবান দ্বারবতী নগরের দিকে যাত্রা করলেন। স্নান ও জপ সম্পন্ন করে তিনি ব্রাহ্মণদের দ্বারা স্বস্তিবাচন করালেন। অতঃপর মহাবাহু দারুক মেঘশ্যাম, গরুড়ধ্বজ-শোভিত সেই মনোহর রথ জুড়ে সেবায় উপস্থিত হলেন। সেই দীপ্তিমান রথ দেখে মহামনা শ্রীকৃষ্ণ দক্ষিণাবর্তে প্রদক্ষিণ করে তাতে আরোহণ করলেন এবং দ্বারকা-পুরীর দিকে অগ্রসর হলেন।
Verse 63
(सात्यकि: कृतवर्मा च रथमारुह[ सत्वरौ । वीजयामासतुस्तत्र चामराभ्यां हरिं तथा ।। बलदेवश्न देवेशो यादवाश्ष॒ सहस्रश: । प्रययू राजवत् सर्वे धर्मपुत्रेण पूजिता: । ततः स सम्मतं राजा हित्वा सौवर्णमासनम् ।।) त॑ पद्धयामनुवव्राज धर्मराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृभि: सहित: श्रीमान् वासुदेवं महाबलम्,सात्यकि और कृतवर्मा शीघ्रतापूर्वक उस रथपर आरूढ़ हो श्रीहरिकी सेवाके लिये चँवर डुलाने लगे। देवेश्वर बलदेवजी तथा सहस्रों यदुवंशी धर्मपुत्र युधिष्ठिससे पूजित हो राजाकी भाँति वहाँसे विदा हुए। तदनन्तर सोनेके श्रेष्ठ सिंहासनको छोड़कर भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर पैदल ही महाबली भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे चलने लगे
সাত্যকি ও কৃতবর্মা তৎক্ষণাৎ রথে আরোহণ করে সেখানে শ্রীহরির সেবায় চামর দোলাতে লাগল। দেবেশ্বর বলদেব এবং সহস্র সহস্র যাদব, ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরের পূজায় সম্মানিত হয়ে, রাজসম্ভ্রমে সেখান থেকে বিদায় নিল। তারপর সম্মানিত রাজা যুধিষ্ঠির স্বর্ণাসন ত্যাগ করে, ভ্রাতৃগণের সঙ্গে পদব্রজে মহাবলী বাসুদেবের পশ্চাতে পশ্চাতে চললেন।
Verse 64
ततो मुहूर्त संगृहा स्यन्दनप्रवरं हरि: । अब्रवीत् पुण्डरीकाक्ष: कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्,तब कमललोचन भगवान् श्रीहरिने दो घड़ीतक अपने श्रेष्ठ रथको रोककर कुन्तीकुमार युधिष्ठिससे कहा--
তখন পদ্মনয়ন হরি অল্পক্ষণ তাঁর শ্রেষ্ঠ রথ থামিয়ে কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরকে বললেন—
Verse 65
अप्रमत्त: स्थितो नित्यं प्रजा: पाहि विशाम्पते । पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजा:,अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान् प्रति । “राजन! आप सदा सावधान रहकर प्रजाजनोंके पालनमें लगे रहें। जैसे सब प्राणी मेघको, पक्षी महान् वृक्षको और सम्पूर्ण देवता इन्द्रको अपने जीवनका आधार मानकर उनका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार सभी बन्धु-बान्धव जीवन-निर्वाहके लिये आपका आश्रय लें।” श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर आपसमें इस प्रकार बातें करके एक दूसरेकी आज्ञा ले अपने- अपने स्थानको चल दिये
“হে প্রজাপতি! তুমি সর্বদা সতর্ক ও স্থির থেকে প্রজাদের পালন করো। যেমন জীবসমূহ বৃষ্টিমেঘের উপর, পাখিরা মহাবৃক্ষের উপর, আর দেবতারা ইন্দ্রের উপর নির্ভর করে—তেমনি সকল আত্মীয়স্বজন তোমার আশ্রয়ে জীবিকা ও নিরাপত্তা লাভ করুক।” এভাবে পরস্পর কথাবার্তা বলে কৃষ্ণ ও যুধিষ্ঠির একে অপরের অনুমতি নিয়ে নিজ নিজ গৃহের দিকে গেলেন।
Verse 66
बान्धवास्त्वोपजीवन्तु सहस्राक्षमिवामरा: | कृत्वा परस्परेणैवं संविदं कृष्णपाण्डवी
“তোমার বান্ধবেরা যেন তোমার আশ্রয়ে জীবিকা পায়, যেমন দেবতারা সহস্রাক্ষ (ইন্দ্র)-এর আশ্রয়ে বাঁচে।” এভাবে পরস্পর সমঝোতা স্থির করে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী) ও পাণ্ডবগণ সেই সিদ্ধান্ত অনুযায়ী অগ্রসর হলেন।
Verse 67
गते द्वारवतीं कृष्णे सात्वतप्रवरे नूप,राजन! यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर भी राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि--ये दोनों नरश्रेष्ठ उस दिव्य सभाभवनमें ही रहे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! সাত্বতশ্রেষ্ঠ, যদুবংশ-শিরোমণি শ্রীকৃষ্ণ দ্বারাবতী (দ্বারকা)-র দিকে প্রস্থান করলে, তবু রাজা দুর্যোধন ও সুবলপুত্র শকুনি—এই দুই নরশ্রেষ্ঠ সেই দিব্য সভাগৃহেই অবস্থান করল।
Verse 68
एको दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबल: । तस्यां सभायां दिव्यायामूषतुस्तो नरर्षभौ,राजन! यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर भी राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि--ये दोनों नरश्रेष्ठ उस दिव्य सभाभवनमें ही रहे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! রাজা দুর্যোধন একাই এবং সুবলপুত্র শকুনিও—এই দুই নরশ্রেষ্ঠ সেই দিব্য সভায় অবস্থান করল, যখন যদুবংশ-শিরোমণি শ্রীকৃষ্ণ দ্বারকা অভিমুখে প্রস্থান করেছিলেন।
Verse 336
शशंसुर्निर्वता: सर्वे दृष्टवा कृष्णस्य विक्रमम् । बड़े-बड़े ऋषि, महात्मा ब्राह्मणों तथा महाबली भूमिपालोंने भगवान् श्रीकृष्णका वह पराक्रम देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो उनकी स्तुति करते हुए उन्हींकी शरण ली
বৈশম্পায়ন বললেন—কৃষ্ণের বিক্রম দেখে সকলেই পরম আনন্দে আপ্লুত হল। মহর্ষিগণ, মহাত্মা ব্রাহ্মণগণ এবং মহাবলী ভূ-পালগণ হৃষ্টচিত্তে তাঁকে স্তব করল এবং তাঁরই শরণ গ্রহণ করল।
Verse 666
अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान् प्रति । “राजन! आप सदा सावधान रहकर प्रजाजनोंके पालनमें लगे रहें। जैसे सब प्राणी मेघको, पक्षी महान् वृक्षको और सम्पूर्ण देवता इन्द्रको अपने जीवनका आधार मानकर उनका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार सभी बन्धु-बान्धव जीवन-निर्वाहके लिये आपका आश्रय लें।” श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर आपसमें इस प्रकार बातें करके एक दूसरेकी आज्ञा ले अपने- अपने स्थानको चल दिये
বৈশম্পায়ন বললেন—পরস্পরকে বিদায় জানিয়ে তাঁরা নিজ নিজ গৃহের দিকে রওনা হলেন। (শ্রীকৃষ্ণ বললেন) “হে রাজন! সদা সতর্ক থেকে প্রজাপালনে নিবিষ্ট থাকো। যেমন সকল প্রাণী মেঘের উপর নির্ভর করে, পাখিরা মহাবৃক্ষের আশ্রয় নেয়, এবং দেবগণ ইন্দ্রকে জীবনাধার জেনে অবলম্বন করে—তেমনি তোমার সকল আত্মীয়স্বজন ও সুহৃদগণ জীবিকার ও নিরাপত্তার জন্য তোমারই আশ্রয় নিক।” এভাবে পরস্পর অনুমতি নিয়ে শ্রীকৃষ্ণ ও যুধিষ্ঠির নিজ নিজ স্থানে গমন করলেন।
Dhṛtarāṣṭra faces a governance dilemma: whether to restrain a harmful initiative despite filial pressure and foreknowledge of gambling’s risks, or to authorize it under the guise of formal propriety and fatalistic reasoning—thereby converting private resentment into state policy.
The chapter illustrates how unchecked envy and the rejection of contentment distort judgment; it also models the institutional danger when rulers substitute ‘destiny’ for accountability and sideline prudent counsel in favor of emotionally charged demands.
No explicit phalaśruti is stated here; instead, the narrative functions as meta-commentary by marking the dice-game as a recognizable ‘gateway to ruin,’ underscoring the interpretive lesson that early policy choices can irreversibly shape later outcomes.