Adhyāya 45 — Duryodhana’s Distress, Śakuni’s Counsel, and the Summons for Dyūta
शृण्वन्तु मे महीपाला येनैतत् क्षमितं मया । अपराधशकतं क्षाम्यं मातुरस्यैव याचने,“यहाँ बैठे हुए सब महीपाल यह सुन लें कि मैंने क्यों अबतक इसके अपराध क्षमा किये हैं? इसीकी माताके याचना करनेपर मैंने उसे यह प्रार्थित वर दिया था कि शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा। राजाओ! वे सब अपराध अब पूरे हो गये हैं; अतः आप सभी भूमिपतियोंके देखते-देखते मैं अभी इसका वध किये देता हूँ”
śṛṇvantu me mahīpālā yenaitat kṣamitaṃ mayā | aparādhaśataṃ kṣāmyaṃ mātur asyaiva yācane |
এখানে উপবিষ্ট সকল মহীপাল শুনুন—আমি কেন এতদিন একে ক্ষমা করেছি। এরই মাতার প্রার্থনায় আমি বর দিয়েছিলাম যে শিশুপালের একশো অপরাধ ক্ষমা করব।
वैशम्पायन उवाच