Mahabharata Adhyaya 162
Drona ParvaAdhyaya 16284 Versesकौरव-पक्ष की ओर झुकाव; अश्वत्थामा के प्रहार से पांचाल/सूंजय पंक्तियाँ टूटती हैं और पलायन होता है

Adhyaya 162

द्रोणपर्व — अध्याय १६२: प्रातःसंध्यायां युद्धप्रवृत्तिः तथा रजोमेघे संमूढता

Upa-parva: Prātaḥkālīya Tumula-yuddha (Dawn Resumption of the Close-Quarter Battle)

Saṃjaya reports that at dawn the combatants, already engaged from before sunrise, resume fighting as the sun illuminates the worlds. Previously locked duels reattach; chariots, horses, elephants, and infantry collide in mixed formations. The chapter emphasizes sensory intensity: conches, kettledrums, elephant roars, bowstrings, and cries create a sky-reaching tumult; the ground is filled with the sounds of falling and wounded. In the melee, units interpenetrate and strike without reliable identification, producing a state where Kauravas, Pāñcālas, and Pāṇḍavas cannot be distinguished amid a dust-cloud likened to a second night. The imagery becomes technical and material: broken chariots, fallen standards, scattered weapons, and ornaments make the battlefield resemble a field of stars. As dust settles with wind and blood-spray, leading chariot-warriors re-emerge into clearer confrontation; the narration moves toward named pairings, including Nakula’s tactical circling (apasavya) engagement with Duryodhana and the verbal challenge that follows.

Chapter Arc: दुर्योधन के उपालम्भ और आश्वासन-भरे वचनों के बाद रणदुर्मद अश्वत्थामा प्रतिज्ञा-सा संकल्प लेकर शत्रुवध के लिए उठ खड़ा होता है—मानो इन्द्र दैत्य-वध को उद्यत हो। → अश्वत्थामा पाण्डवों के प्रति अपने स्नेह का स्मरण कराते हुए भी युद्ध-धर्म की कठोरता स्वीकार करता है और समस्त धनुर्धरों को त्रस्त करता हुआ पांचाल-सेना की ओर बढ़ता है; लक्ष्य स्पष्ट होता जाता है—धृष्टद्युम्न और पांचालों का संहार। → धृष्टद्युम्न (पार्षत) और द्रोणपुत्र आमने-सामने आकर अमर्ष में भरकर चारों ओर से शरवृष्टि करते हैं; अश्वत्थामा अपने जन्म-प्रयोजन और प्रतिज्ञा का उद्घोष करते हुए (द्रोण-वध का प्रतिशोध) भीषण पराक्रम दिखाता है और पांचाल-पंक्तियों को तोड़ देता है। → अश्वत्थामा के इन्द्र-सदृश कर्म को देखकर पाण्डव-पक्ष की सेना व्यथित होती है; द्रोणकुमार क्रमशः अनेक पांचाल योद्धाओं का वध करता है, रथ-ध्वजाएँ बिखरती हैं और शेष सैनिक भयभीत होकर तितर-बितर होने लगते हैं। → पांचाल और सूंजय सैनिक मारे जाते हुए अश्वत्थामा को छोड़कर भागते हैं—अब प्रश्न यह रह जाता है कि धृष्टद्युम्न का अंत किस प्रकार और कितनी शीघ्रता से होगा।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--मा_ज बक। जज: षष्टयाधेकशततमो< ध्याय: अश्वत्थामाका दुर्योधनको उपालम्भपूर्ण आश्वासन देकर पांचालोंके सा करते हुए धृष्टद्युम्नके रथसहित सारथिको नष्ट उसकी सेनाको भगाकर अद्भुत पराक्रम दिखाना संजय उवाच दुर्योधनेनैवमुक्तो द्रौणिराहवर्दुर्मद: । चकारारिवधे यत्नमिन्द्रो दैत्यवथे यथा

সঞ্জয় বললেন—দুর্যোধনের এমন কথায় দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা, যিনি রণে উন্মত্ত, শত্রুনিধনে তেমনই উদ্যোগী হলেন যেমন ইন্দ্র দৈত্যবধে উদ্যোগ করেন।

Verse 2

संजय कहते हैं--राजन! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर रणदुर्मद अश्व॒त्थामाने उसी प्रकार शत्रुवधके लिये प्रयत्न आरम्भ किया, जैसे इन्द्र दैत्यवधके लिये यत्न करते हैं ।।

সঞ্জয় বললেন—রাজন! দুর্যোধনের এমন কথায় রণোন্মত্ত অশ্বত্থামা শত্রুনিধনে তেমনই উদ্যোগী হলেন যেমন ইন্দ্র দৈত্যবধে উদ্যোগ করেন। তারপর মহাবাহু অশ্বত্থামা আপনার পুত্রকে বললেন—“মহাবাহু কৌরব, তুমি যেমন বলছ, তা-ই সত্য।”

Verse 3

प्रिया हि पाण्डवा नित्यं मम चापि पितुश्न मे । तथैवावां प्रियौ तेषां न तु युद्धे कुरूद्वह

“হে কুরুশ্রেষ্ঠ! পাণ্ডবরা সর্বদা আমার ও আমার পিতার প্রিয়; তেমনি আমরাও—পিতা ও পুত্র—তাদের প্রিয়। কিন্তু, হে কুরুবৃষভ, যুদ্ধক্ষেত্রে এই ভাব স্থির থাকে না।”

Verse 4

शक्तितस्तात युध्यामस्त्यक्त्वा प्राणानभीतवत्‌ | अहं कर्णश्न शल्यश्न कृपो हार्दिक्य एव च । निमेषात्‌ पाण्डवीं सेनां क्षपयेम नृपोत्तम

সঞ্জয় বললেন—বৎস! প্রাণের মোহ ত্যাগ করে আমরা যথাশক্তি নির্ভয়ে যুদ্ধ করি। নৃপশ্রেষ্ঠ! আমি, কর্ণ, শল্য, কৃপ ও হার্দিক্য (কৃতবর্মা) নিমেষমাত্রে পাণ্ডব-সেনাকে নিঃশেষ করতে পারি।

Verse 5

ते चापि कौरवीं सेनां निमेषार्धात्‌ कुरूद्वह । क्षपयेयुर्महाबाहो न स्याम यदि संयुगे,“महाबाहु कुरुश्रेष्ठ) यदि युद्धस्थलमें हमलोग न रहें, तो पाण्डव भी आधे निमेषयमें ही कौरव-सेनाका संहार कर सकते हैं

হে কুরুশ্রেষ্ঠ, মহাবাহো! যদি আমরা যুদ্ধক্ষেত্রে উপস্থিত না থাকি, তবে পাণ্ডবরাও অর্ধনিমেষে কৌরব-সেনাকে নিঃশেষ করতে পারে।

Verse 6

युध्यतां पाण्डवान्‌ शक्‍्त्या तेषां चास्मान्‌ युयुत्सताम्‌ । तेजस्तेज: समासाद्य प्रशमं याति भारत

আমরা যথাশক্তি পাণ্ডবদের সঙ্গে যুদ্ধ করি, আর তারাও আমাদের সঙ্গে যুদ্ধ করতে উদ্‌গ্রীব। হে ভারত! এভাবে তেজের সঙ্গে তেজের সংঘাতে সেই তীব্রতা ক্ষয় হয়ে শান্ত হয়।

Verse 7

अशक्या तरसा जेतुं पाण्डवानामनीकिनी । जीवत्सु पाण्डुपुत्रेषु तद्धि सत्यं ब्रवीमि ते

পাণ্ডুপুত্রেরা জীবিত থাকলে কেবল তাড়নার জোরে পাণ্ডবদের সেনাকে জয় করা অসম্ভব—এ সত্যই আমি তোমাকে বলছি।

Verse 8

“राजन! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि पाण्डवोंके जीते-जी उनकी सेनाको बलपूर्वक जीतना असम्भव है ।।

রাজন! আমি তোমাকে সত্য বলছি—পাণ্ডবেরা জীবিত থাকলে তাদের সেনাকে বলপ্রয়োগে জয় করা অসম্ভব। হে ভরতবংশধর! পাণ্ডুনন্দনরা সক্ষম এবং নিজেদের উদ্দেশ্যেই যুদ্ধ করে; তবে তারা কেন তোমার সৈন্যদের নিধন করবে না?

Verse 9

त्वं तु लुब्धतमो राजन्‌ निकृतिज्ञश्व कौरव । सर्वाभिशड्की मानी च ततो5स्मानभिशड्कसे

সঞ্জয় বললেন— হে রাজন, হে কৌরব! তুমি অতিশয় লোভী, ছল-কপটে নিপুণ, সর্বদা সকলের প্রতি সন্দেহপ্রবণ ও অহংকারী; তাই আমাদের প্রতিও তুমি সন্দেহ কর।

Verse 10

“कौरवनरेश! तुम तो लोभी और छल-कपटकी विद्याको जाननेवाले हो। सबपर संदेह करनेवाले और अभिमानी हो; इसलिये हमलोगोंपर भी शंका करते हो ।।

সঞ্জয় বললেন— হে রাজন, আমি তোমাকে নীচ ও নিন্দিত মনে করি—হৃদয়ে পাপী, আচরণেও পাপী। ক্ষুদ্রচিত্ত ও দুষ্ট অভিপ্রায়ে চালিত হয়ে তুমি শুধু আমাদের নয়, অন্যদের প্রতিও সন্দেহ কর।

Verse 11

अहं तु यत्नमास्थाय त्वदर्थ त्यक्तजीवित: । एष गच्छामि संग्रामं त्वत्कृते कुरुनन्दन

সঞ্জয় বললেন— কিন্তু আমি, তোমার জন্য জীবন ত্যাগ করেছি বলে জেনে, সর্বপ্রকার চেষ্টা অবলম্বন করে, এখন তোমারই কারণে যুদ্ধে যাচ্ছি—হে কুরুদের আনন্দ।

Verse 12

“कुरुनन्दन! मैं अभी तुम्हारे लिये जीवनका मोह छोड़कर पूरा प्रयत्न करके संग्रामभूमिमें जा रहा हूँ ।। योत्स्ये5हं शत्रुभि: सार्थ जेष्यामि च वरान्‌ वरान्‌ | पज्चालै: सह योत्स्यामि सोमकै: केकयैस्तथा

হে কুরুদের আনন্দ! তোমার জন্য জীবন-মোহ ত্যাগ করে সর্বশক্তি প্রয়োগ করে আমি যুদ্ধক্ষেত্রে যাচ্ছি। শত্রুদের সঙ্গে আমি যুদ্ধ করব এবং শ্রেষ্ঠ শ্রেষ্ঠ বিজয় অর্জন করব। পাঞ্চালদের সঙ্গে, সোমকদের সঙ্গে এবং তদ্রূপ কেকয়দের সঙ্গে আমি যুদ্ধ করব।

Verse 13

अद्य मद्वाणनिर्दग्धा: पजचाला: सोमकास्तथा

সঞ্জয় বললেন— আজ পাঞ্চালরা এবং তদ্রূপ সোমকরা আমার বাণে দগ্ধ হয়েছে।

Verse 14

अद्य धर्मसुतो राजा दृष्टवा मम पराक्रमम्‌

সঞ্জয় বললেন—আজ আমার পরাক্রম প্রত্যক্ষ করে ধর্মসুত রাজা (যুধিষ্ঠির)…

Verse 15

आगमिष्यति निर्वेदं धर्मपुत्रो युधिष्ठिर:

সঞ্জয় বললেন—ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির গভীর অনুতাপ ও বৈরাগ্যে নিমগ্ন হবে।

Verse 16

ये मां युद्धेडभियोत्स्यन्ति तान्‌ हनिष्यामि भारत

সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! যারা যুদ্ধে আমার বিরুদ্ধে অগ্রসর হবে, তাদের আমি নিধন করব।

Verse 17

एवमुक्त्वा महाबाहु: पुत्र दुर्योधनं तव

সঞ্জয় বললেন—আপনার পুত্র দুর্যোধনকে এ কথা বলে মহাবাহু অশ্বত্থামা সকল ধনুর্ধরকে ত্রস্ত করে যুদ্ধের জন্য শত্রুদের সম্মুখে দৃঢ়ভাবে দাঁড়াল। প্রাণীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই অশ্বত্থামা আপনার পুত্রদের প্রিয় সাধন করতে চেয়েছিল।

Verse 18

अभ्यवर्तत युद्धाय त्रासयन्‌ सर्वधन्विन: । चिकीर्षुस्तव पुत्राणां प्रियं प्राणभूतां वर:

সঞ্জয় বললেন—মহাবাহু অশ্বত্থামা যুদ্ধে অগ্রসর হল, সকল ধনুর্ধরকে ত্রস্ত করে। প্রাণীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই বীর, যে আপনার পুত্রদের কাছে প্রাণসম প্রিয়, তাদের প্রিয় সাধন করতে চাইল।

Verse 19

ततो<ब्रवीत्‌ सकैकेयान्‌ पज्चालान्‌ गौतमीसुतः । प्रहरध्वमित: सर्वे मम गात्रे महारथा:

তখন গৌতমীপুত্র কৈকেয় ও পাঞ্চালদের বললেন— “হে মহারথিগণ, এসো—আমারই দেহে আঘাত করো।”

Verse 20

एवमुक्तास्तु ते सर्वे शस्त्रवृष्टीरपातयन्‌

এভাবে বলা হলে তারা সকলেই একযোগে অস্ত্রবৃষ্টি বর্ষণ করল।

Verse 21

तान्‌ निहत्य शरान्द्रौणिदेश वीरानपोथयत्‌

তাদের শরবিদ্ধ করে বধ করে দ্রোণপুত্র সেই অঞ্চলের বীরদেরও চূর্ণ করল।

Verse 22

ते हन्यमाना: समरे पठ्चाला: सोमकास्तथा

সমরে পাঞ্চাল ও সোমকরা নিহত হতে লাগল।

Verse 23

परित्यज्य रणे दौ्णिं व्यद्रवन्त दिशो दश | समरांगणमें मारे जाते हुए पांचाल और सोमक द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको छोड़कर दसों दिशाओंमें भाग गये ।। तान्‌ दृष्टवा द्रवतः शूरान्‌ पज्चालान्‌ सहसोमकान्‌

রণক্ষেত্রে দ্রৌণিকে ত্যাগ করে পাঞ্চাল ও সোমকরা দশ দিকেই ছুটে পালাল। পাঞ্চালের সেই বীরদের—সোমকদেরসহ—পলায়ন করতে দেখে…

Verse 24

धृष्टद्युम्नो महाराज द्रौणिमभ्यद्रवद्‌ रणे । महाराज! शूरवीर पांचालों और सोमकोंको भागते देख धूष्टद्युम्नने रणक्षेत्रमें अश्व॒त्थामापर धावा किया ।। ततः काञ्चनचित्राणां सजलाम्बुदनादिनाम्‌

সঞ্জয় বললেন— মহারাজ, যুদ্ধক্ষেত্রে ধৃষ্টদ্যুম্ন দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামার দিকে সোজা ধেয়ে গেল। বীর পাঞ্চাল ও সোমকগণকে পলায়মান দেখে সে রণাঙ্গনে প্রবল বেগে অশ্বত্থামার উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল। তখন স্বর্ণবিচিত্র রথসমূহ ও জলভরা মেঘগর্জনাসদৃশ কলরবের মধ্যে…

Verse 25

वृतः शतेन शूराणां रथानामनिवर्तिनाम्‌ | पुत्र: पाउ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महारथ:

পাঞ্চালরাজের পুত্র মহারথী ধৃষ্টদ্যুম্ন শত জন অদম্য বীর রথীর রথে পরিবেষ্টিত হল।

Verse 26

द्रोणिमित्यब्रवीद्‌ वाक्‍्य॑ दृष्टवा योधान्‌ निपातितान्‌ । तदनन्तर सुवर्णचित्रित, सजल जलधरके समान गम्भीर घोष करनेवाले तथा युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले सौ रथों एवं शूरवीर रथियोंसे घिरे हुए पांचाल-राजकुमार महारथी धृष्टद्यम्नने अपने योद्धाओंको मारा गया देख द्रोणकुमार अश्वत्थामासे इस प्रकार कहा-- ।।

নিহত যোদ্ধাদের দেখে ধৃষ্টদ্যুম্ন দ্রোণপুত্রকে বলল— “আচার্যপুত্র, দুর্বুদ্ধি! অন্যদের হত্যা করে তোমার লাভ কী?”

Verse 27

समागच्छ मया सार्ध यदि शूरो5सि संयुगे | अहं त्वां निहनिष्यामि तिष्ठेदानीं ममाग्रत:

“যদি তুমি যুদ্ধে বীর হও, তবে আমার সঙ্গে এসে মোকাবিলা কর। এখনই আমার সামনে দাঁড়াও; এই মুহূর্তে আমি তোমাকে বধ করব।”

Verse 28

ततस्तमाचार्यसुतं धृष्टद्युम्न: प्रतापवान्‌ । मर्मभिद्धि: शरैस्ती3क्ष्णर्णघान भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ ऐसा कहकर प्रतापी धृष्टद्युम्नने मर्मभेदी एवं पैने बाणोंद्वारा आचार्यपुत्रको घायल कर दिया

তখন প্রতাপশালী ধৃষ্টদ্যুম্ন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, আচার্যপুত্রকে তীক্ষ্ণ মর্মভেদী শরবৃষ্টিতে আঘাত করে আহত করল।

Verse 29

ते तु पद्धक्तीकृता द्रौणिं शरा विविशुराशुगा: । रुक्मपुड्खा: प्रसन्नाग्रा: सर्वकायावदारणा:

সুশৃঙ্খল বিন্যাসে নিক্ষিপ্ত সেই দ্রুতগামী শরগুলি অচিরেই দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামার দেহে প্রবেশ করল। স্বর্ণপক্ষযুক্ত, তীক্ষ্ণ ও সুদৃঢ় অগ্রবিশিষ্ট সেই শরগুলি তার সর্বাঙ্গ বিদীর্ণ করতে লাগল।

Verse 30

सोडतिविद्धो भृशं क्रुद्ध: पदाक्रान्त इवोरग:

বল্লমে গভীরভাবে বিদ্ধ হয়ে সে প্রবল ক্রোধে জ্বলে উঠল—যেন পদতলে পিষ্ট এক সাপ।

Verse 31

मानी द्रौणिरसम्भ्रानन्‍्तो बाणपाणिरभाषत । उन बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर मानी द्रोणकुमार पैरोंसे कुचले गये सर्पके समान अत्यन्त कुपित हो उठा और हाथमें बाण लेकर संभ्रमरहित हो इस प्रकार बोला-- ।।

অত্যন্ত আহত হয়েও গর্বিত দ্রোণপুত্র, বিচলিত না হয়ে, হাতে বাণ ধারণ করে বলল—“ধৃষ্টদ্যুম্ন! স্থির হয়ে এক মুহূর্ত দাঁড়াও।”

Verse 32

द्रौणिरेवमथाभाष्य पार्षतं परवीरहा

এ কথা বলে দ্রোণপুত্র—শত্রুবীর-সংহারক—পাৰ্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন)-কে পুনরায় সম্বোধন করল।

Verse 33

स बाध्यमान: समरे द्रौणिना युद्धदुर्मद:

যুদ্ধের উন্মাদনায় উচ্ছৃঙ্খল হয়ে ওঠা সে, সমরে দ্রৌণির দ্বারা প্রবলভাবে চাপে পড়ছিল।

Verse 34

न जानीषे प्रतिज्ञां मे विप्रोत्पत्ति तथैव च

সঞ্জয় বললেন—তুমি আমার প্রতিজ্ঞা জানো না, আর আমার ব্রাহ্মণ-জন্মের পরিস্থিতিও তেমনি জানো না।

Verse 35

ततस्त्वाहं न हन्म्यद्य द्रोणे जीवति संयुगे

সঞ্জয় বললেন—অতএব, দ্রোণ যুদ্ধে জীবিত থাকাকালীন আজ আমি তোমাকে বধ করব না। কিন্তু তোমাকে প্রেতলোকে পাঠাব—এই সংকল্প আমার মনে দৃঢ়ভাবে স্থির।

Verse 36

इमां तु रजनी प्राप्तामप्रभातां सुदुर्मते । निहत्य पितरं तेडद्य ततस्त्वामपि संयुगे

সঞ্জয় বললেন—কিন্তু এখন এই রাত্রি এসে গেছে; প্রভাতের আগে, হে সুমন্দবুদ্ধি! আজ তোমার পিতাকে বধ করে, তারপর যুদ্ধে তোমাকেও আঘাত করবে।

Verse 37

यस्ते पार्थेषु विद्वेषो या भक्ति: कौरवेषु च

সঞ্জয় বললেন—পৃথাপুত্রদের প্রতি তোমার যে বিদ্বেষ, আর কৌরবদের প্রতি যে ভক্তি তুমি দেখাও…

Verse 38

यो हि ब्राह्नमण्यमुस्तृज्य क्षत्रधर्मरतो द्विज:

সঞ্জয় বললেন—যে দ্বিজ ব্রাহ্মণোচিত আচরণ ও বৃত্তি ত্যাগ করে ক্ষত্রিয়ধর্মে আসক্ত হয়…

Verse 39

इत्युक्त: परुषं वाक्यं पार्षतेन द्विजोत्तम:

সঞ্জয় বললেন—পৃষতীপুত্রের (ধৃষ্টদ্যুম্নের) কঠোর বাক্যে এভাবে সম্বোধিত হয়ে সেই শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ তীক্ষ্ণ ভর্ৎসনায় বিদ্ধ হলেন।

Verse 40

निर्दहन्निव चक्षुर्भ्या पार्षत॑ सो5भ्यवैक्षत

সঞ্জয় বললেন—চোখ দু’টি যেন জ্বলে উঠেছে, এমন দৃষ্টিতে পৃষতীপুত্র (ধৃষ্টদ্যুম্ন) তাকে স্থিরভাবে চেয়ে দেখল।

Verse 41

स च्छाद्यमान: समरे द्रौणिना राजसत्तम

সঞ্জয় বললেন—সমরে সেই রাজশ্রেষ্ঠ দ্রোণপুত্র (অশ্বত্থামা) দ্বারা আচ্ছন্ন ও চাপে পড়ছিল।

Verse 42

सर्वपाञ्चालसेनाभि: संवृतो रथसत्तम: | नाकम्पत महाबाहु: स्ववीर्य समुपाश्रित:

সঞ্জয় বললেন—সমগ্র পাঞ্চালসেনায় চারদিক থেকে পরিবেষ্টিত হয়েও সেই রথশ্রেষ্ঠ মহাবাহু নিজের বীর্যে ভরসা করে একটুও বিচলিত হল না।

Verse 43

सायकांश्चैव विविधाननश्वत्थाम्नि मुमोच ह । नृपश्रेष्ठ! समरांगणमें अश्व॒त्थामाके द्वारा आच्छादित होनेपर भी समस्त पांचाल- सेनाओंसे घिरे हुए महारथी महाबाहु धृष्टद्युम्म कम्पित नहीं हुए। उन्होंने अपने बलपराक्रमका आश्रय लेकर अभश्वत्थामापर नाना प्रकारके बाणोंका प्रहार किया ।।

সঞ্জয় বললেন—তখন ধৃষ্টদ্যুম্ন অশ্বত্থামার প্রতি নানাবিধ শর নিক্ষেপ করল। পরে সেই দুই মহাধনুর্ধর প্রাণপণ যুদ্ধে পরস্পরের সম্মুখে স্থির হয়ে দাঁড়াল।

Verse 44

निपीडयन्तौ बाणौचै: परस्परममर्षिणौ । उत्सृजन्तौ महेष्वासौ शरवृष्टी: समनन्‍्तत:ः

সঞ্জয় বললেন—উভয় মহাধনুর্ধর ক্রোধে দগ্ধ, পরস্পরের প্রতি অসহিষ্ণু হয়ে চারদিক থেকে একে অপরের উপর তীরবৃষ্টি বর্ষণ করতে লাগল। ঘন শরসমূহে পরস্পরকে পীড়িত করে, প্রাণকে পণ করে তারা রণক্ষেত্রে অচল হয়ে দাঁড়িয়ে রইল।

Verse 45

द्रौणिपार्षतयोर्युद्धें घोररूपं भयानकम्‌ | दृष्टवा सम्पूजयामासु: सिद्धचारणवातिका:

সঞ্জয় বললেন—দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা ও পৃষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্নের সেই ঘোর, ভয়ংকর যুদ্ধ দেখে সিদ্ধ, চারণ এবং বায়ুচারী খেচরগণ সেই সমর-পরাক্রমকে বারংবার প্রশংসা করে শ্রদ্ধা নিবেদন করল।

Verse 46

शरौघै: पूरयन्तौ तावाकाशं च दिशस्तथा । अलक्ष्यौ समयुध्येतां महत्‌ कृत्वा शरैस्तम:

সঞ্জয় বললেন—তারা দু’জন তীরসমূহে আকাশ ও দিকসমূহ পূর্ণ করে, সেই শরে মহা অন্ধকার সৃষ্টি করে দৃষ্টির আড়ালে চলে গেল; আর অদৃশ্য হয়েই যুদ্ধ চালিয়ে গেল।

Verse 47

नृत्यमानाविव रणे मण्डलीकृतकार्मुकौ । परस्परवधे यत्तौ सर्वभूतभयड्करौ

সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে ধনুককে বৃত্তাকারে ঘুরিয়ে তারা দু’জন যেন নৃত্য করছিল। একে অপরকে বধ করতে উদ্যত হয়ে তারা সকল প্রাণীর জন্য ভয়ের কারণ হয়ে উঠল।

Verse 48

अयुध्येतां महाबाहू चित्र लघु च सुष्ठु च । सम्पूज्यमानौ समरे योधमुख्यै: सहस्रश:

সঞ্জয় বললেন—সেই দুই মহাবাহু বীর সমরাঙ্গণে বিচিত্র কৌশলে, দ্রুত ও সুন্দরভাবে যুদ্ধ করছিল। যুদ্ধে শ্রেষ্ঠ যোদ্ধাদের দ্বারা তারা সহস্রবার বারংবার প্রশংসিত ও সম্মানিত হচ্ছিল।

Verse 49

तौ प्रबुद्धौ रणे दृष्टवा वने वन्यौ गजाविव । उभयो: सेनयोर्हर्षस्तुमुल: समपद्यत,वनमें लड़नेवाले दो जंगली हाथियोंके समान उन दोनोंको युद्धमें जागरूक देखकर दोनों सेनाओमें तुमुल हर्षनाद छा गया

রণক্ষেত্রে সেই দুই বীরকে সম্পূর্ণ সজাগ দেখে—অরণ্যে দুই বন্য গজের ন্যায়—উভয় সেনায় প্রবল হর্ষধ্বনি ও জয়ধ্বনি উঠল।

Verse 50

सिंहनादरवाश्नलासन्‌ दध्मु: शड्खांश्व सैनिका: । वादित्राण्य भ्यवाद्यन्त शतशो5थ सहस्रश:,सब ओर सिंहनाद होने लगा। सैनिक शंखध्वनि करने लगे तथा सैकड़ों एवं सहस्तरों प्रकारके रणवाद्य बजने लगे

চারদিকে সিংহনাদের গর্জন উঠল। সৈন্যরা শঙ্খধ্বনি করল, আর শত শত, সহস্র সহস্র রণবাদ্য বেজে উঠল।

Verse 51

तस्मिंस्तु तुमुले युद्धे भीरूणां भयवर्धने । मुहूर्तमपि तद्‌ युद्धं समरूपं तदाभवत्‌

সেই তুমুল যুদ্ধে—যা ভীরুদের ভয় বাড়ায়—এক মুহূর্তের জন্যও যুদ্ধ সমরূপ, সমবল হয়ে উঠল।

Verse 52

कायरोंका भय बढ़ानेवाले उस तुमुल संग्राममें दो घड़ीतक उन दोनोंका समान रूपसे युद्ध चलता रहा ।। ततो द्रौणि्महाराज पार्षतस्य महात्मन: । ध्वजं धनुस्तथा छत्रमुभौ च पार्ष्णिसारथी

তখন, হে মহারাজ, দ্রোণপুত্র মহাত্মা পার্ষতের ধ্বজ, ধনু ও ছত্র ছিন্ন করে ফেলল; আর তার রথের উভয় চক্র ও সারথিকেও নিপাত করল।

Verse 53

सूतमश्चांश्व चतुरो निहत्याभ्यद्रवद्‌ रणे । महाराज! तदनन्तर द्रोणकुमारने महामना धृष्टद्युम्नके ध्वज, धनुष, छत्र, दोनों पाश्वरक्षक, सारथि तथा चारों घोड़ोंको नष्ट करके उस युद्धमें बड़े वेगसे धावा किया ।।

সারথি ও চারটি ঘোড়া নিপাত করে সে রণে প্রবল বেগে ধেয়ে গেল; তারপর সুদৃঢ়-সংযুক্ত পর্বযুক্ত বাণে সেই সকল পাঞ্চালকে আঘাত করতে লাগল।

Verse 54

व्यद्राववदमेयात्मा शतशो5थ सहस्रशः । अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न अश्वत्थामाने झुकी हुई गाँठवाले सैकड़ों और सहस्रों बाणोंद्वारा उन समस्त पांचालोंको दूर भगा दिया ।। ५३ $ ।। ततस्तु विव्यथे सेना पाण्डवी भरतर्षभ

সঞ্জয় বললেন—অপরিমেয় আত্মবল ও অক্ষয় শক্তিতে সমৃদ্ধ অশ্বত্থামা শত শত, সহস্র সহস্র বাণবর্ষণে সমস্ত পাঞ্চালদের ছত্রভঙ্গ করে দূরে তাড়িয়ে দিল। তখন, হে ভারতশ্রেষ্ঠ, পাণ্ডবসেনা কেঁপে উঠল এবং গভীর উদ্বেগে নিমজ্জিত হল।

Verse 55

शतेन च शतं हत्वा पठ्चालानां महारथ:

সঞ্জয় বললেন—সেই মহারথী শত বাণে শত পাঞ্চাল যোদ্ধাকে বধ করে, যারা সেখানে সর্বাধিক সংখ্যায় দৃঢ়ভাবে দাঁড়িয়েছিল, সেই পাঞ্চালদেরও ধ্বংস করল।

Verse 56

त्रिभिश्व निशितैर्बाणत्वा त्रीन्‌ वै महारथान्‌ । द्रौणिर्द्रपदपुत्रस्य फाल्गुनस्यथ च पश्यत:

তিনটি তীক্ষ্ণ বাণে তিন মহারথীকে বধ করে দ্রোণপুত্র দ্রৌণি তা করল দ্রুপদপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন ও ফাল্গুন অর্জুনের চোখের সামনেই।

Verse 57

ते वध्यमाना: पञ्चाला: समरे सह सृञ्जयै:

সঞ্জয় বললেন—সমরে সৃঞ্জয়দের সঙ্গে সেই পাঞ্চালরা ক্রমাগত নিহত হতে লাগল।

Verse 58

स जित्वा समरे शत्रून्‌ द्रोणपुत्रो महारथ:

সঞ্জয় বললেন—এভাবে সমরে শত্রুদের জয় করে দ্রোণপুত্র সেই মহারথী অগ্রভাগে স্থির হয়ে রইল।

Verse 59

स निहत्य बहुन्‌ शूरानश्वत्थामा व्यरोचत । युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावक:

অসংখ্য বীরকে নিধন করে অশ্বত্থামা রণক্ষেত্রে তেমনি দীপ্তিমান হল, যেমন যুগান্তে অগ্নি সর্বভূতকে ভস্ম করে জ্বলে ওঠে।

Verse 60

सम्पूज्यमानो युधि कौरवेयै- निर्जित्य संख्येडरिगणाम्‌ सहस्रश: । व्यरोचत द्रोणसुत: प्रतापवान्‌ यथा सुरेन्‍्द्रो<रिगणान्‌ निहत्य वै

যুদ্ধে কৌরবদের দ্বারা পূজিত ও প্রশংসিত হয়ে, সহস্র সহস্র শত্রুদলকে পরাজিত করে প্রতাপশালী দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা তেমনি দীপ্ত হল, যেমন শত্রুগণকে নিধন করে দেবরাজ ইন্দ্র দীপ্ত হন।

Verse 126

पाण्डवेयैश्न संग्रामे त्वत्प्रियार्थमरिंदम । शत्रुदमन! मैं शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा और उनके प्रधान-प्रधान वीरोंपर विजय पाऊँगा। संग्रामभूमिमें तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं पांचालों

হে অরিন্দম! তোমার প্রিয় সাধনের জন্য আমি এই সংগ্রামে যুদ্ধ করব। হে শত্রুদমন! শত্রুদের সঙ্গে লড়ে তাদের শ্রেষ্ঠ শ্রেষ্ঠ বীরদেরও পরাজিত করব; আর রণভূমিতে তোমাকে তুষ্ট করতে পাঞ্চাল, সোমক, কেকয় ও পাণ্ডবদের সঙ্গেও যুদ্ধ করব।

Verse 136

सिंहेनेवार्दिता गावो विद्रविष्यन्ति सर्वश: । “आज पांचाल और सोमक योद्धा मेरे बाणोंसे दग्ध होकर सिंहसे पीड़ित हुई गौओंके समान सब ओर भाग जायँगे

আজ পাঞ্চাল ও সোমক যোদ্ধারা আমার বাণে দগ্ধ হয়ে, সিংহে তাড়িত গাভীর মতো, সর্বদিকে ছুটে পালাবে।

Verse 146

अश्वत्थाममयं लोकं॑ मंस्यते सह सोमकै: । “आज सोमकोंसहित धर्मपुत्र राजा युधिष्छिर मेरा पराक्रम देखकर सम्पूर्ण जगत्‌को अश्वत्थामासे भरा हुआ मानेंगे

আজ সোমকদের সঙ্গে ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির আমার পরাক্রম দেখে, সমগ্র জগতকে অশ্বত্থামায় পরিপূর্ণ বলে মনে করবেন।

Verse 153

दृष्टवा विनिहतान्‌ संख्ये पज्चालान्‌ सोमकै: सह । “सोमकोंसहित पांचालोंको युद्धमें मारा गया देख आज धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें बड़ा निर्वेद (खेद एवं वैराग्य) होगा

সঞ্জয় বললেন—সমরক্ষেত্রে সোমকসহ পাঞ্চালদের নিহত দেখে আজ ধর্মপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির গভীর নিরাশা ও বৈরাগ্যে আচ্ছন্ন হবেন।

Verse 159

इस प्रकार श्रीमह्माभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें दुर्योधनका वचनविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধ প্রসঙ্গে দুর্যোধনের বাক্যবিষয়ক একশো ঊনষাটতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 160

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे5श्वत्थामपराक्रमे षष्टयधिकशततमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত ঘটোৎকচবধপর্বে রাত্রিযুদ্ধের উপলক্ষে অশ্বত্থামার পরাক্রমবিষয়ক একশো ষাটতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 163

नहि ते वीर मोक्ष्यन्ते मदबाह्वन्तरमागता: । “भारत! जो लोग रणभूमिमें मेरे साथ युद्ध करेंगे, उन्हें मैं मार डालूँगा। वीर! मेरी भुजाओंके भीतर आकर शत्रुसैनिक जीवित नहीं छूट सकेंगे”

সঞ্জয় বললেন—হে বীর! যারা আমার বাহুর নাগালে এসেছে, তারা রেহাই পাবে না। রণক্ষেত্রে যে আমার সঙ্গে যুদ্ধ করবে, তাকে আমি নিধন করব; আমার শক্তিবৃত্তে প্রবেশ করলে শত্রুসৈন্য জীবিত বেরোবে না।

Verse 193

स्थिरीभूताश्न युद्ध्यध्वं दर्शयन्तो5स्त्रलाघवम्‌ । तदनन्तर गौतमीनन्दन अभश्वत्थामाने केकयोंसहित पांचालोंसे कहा--“महारथियो! अब सब लोग मिलकर मेरे शरीरपर प्रहार करो और अपनी अस्त्र-संचालनकी फुर्ती दिखाते हुए सुस्थिर होकर युद्ध करो”

সঞ্জয় বললেন—“দৃঢ় হয়ে যুদ্ধ করো, অস্ত্রচালনায় ক্ষিপ্রতা প্রদর্শন করো।” তারপর গৌতমীনন্দন অশ্বত্থামা কেকয়দেরসহ পাঞ্চালদের বলল—“হে মহারথীরা! তোমরা সকলে একত্র হয়ে আমার দেহে আঘাত হানো; অস্ত্রপ্রয়োগের দ্রুততা দেখিয়ে স্থিরচিত্তে যুদ্ধ করো।”

Verse 203

दौणिं प्रति महाराज जलं जलधरा इव । महाराज! अभ्र॒त्थामाके ऐसा कहनेपर वे सभी वीर उसके ऊपर उसी प्रकार अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे, जैसे मेघ पर्वतपर पानी बरसाते हैं

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা এ কথা বলামাত্রই সেই সকল বীর তার দিকে ফিরে গিয়ে তার উপর অস্ত্রশস্ত্রের এমন বর্ষণ করতে লাগল, যেমন জলধর মেঘ পর্বতের উপর জল ঢালে।

Verse 213

प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां धृष्टद्युम्नस्य च प्रभो । प्रभो! द्रोणकुमारने उनके उन बाणोंको नष्ट करके उनमेंसे दस वीरोंको पाण्डवों और धृष्टद्युम्नके सामने ही मार गिराया

সঞ্জয় বললেন—প্রভু! পাণ্ডুপুত্রদের অগ্রগণ্যদের এবং ধৃষ্টদ্যুম্নের সম্মুখেই দ্রোণপুত্র সেই বাণসমূহ বিনষ্ট করে তাদের মধ্য থেকে দশজন বীরকে আঘাতে নিপাত করল।

Verse 296

मध्वर्थिन इवोद्दामा भ्रमरा: पुष्पितं ट्रुमम्‌ । सुवर्णमय पंख और स्वच्छ धारवाले

সঞ্জয় বললেন—যেমন মধুলোভী উন্মত্ত ভ্রমররা পুষ্পিত বৃক্ষে এসে বসে, তেমনই সোনালি পালকযুক্ত, নির্মল ধারবিশিষ্ট, দ্রুতগামী ও দেহ বিদীর্ণ করতে সক্ষম বাণগুলি সারিবদ্ধ হয়ে অশ্বত্থামার দেহে প্রবেশ করল।

Verse 313

यावत्‌ त्वां निशितैर्बाणै: प्रेषयामि यमक्षयम्‌ । 'धृष्टद्युम्न! स्थिर होकर दो घड़ी और प्रतीक्षा कर लो” तबतक मैं तुम्हें अपने पैने बाणोंद्वारा यमलोक भेज देता हूँ!

সঞ্জয় বললেন—“ধৃষ্টদ্যুম্ন! স্থির থাকো, আরও দুই ঘড়ি অপেক্ষা করো; ততক্ষণে আমি আমার তীক্ষ্ণ বাণে তোমাকে যমের অক্ষয় লোকের পথে পাঠিয়ে দেব।”

Verse 323

छादयामास बाणौघचै: समन्ताल्लघुहस्तवत्‌ । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अश्वात्थामाने ऐसा कहकर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले कुशल योद्धाकी भाँति अपने बलसमूहोंद्वारा धृष्टद्यममको सब ओरसे आच्छादित कर दिया

সঞ্জয় বললেন—এ কথা বলে শত্রুবীরসংহারী অশ্বত্থামা, ক্ষিপ্রহস্ত দক্ষ যোদ্ধার ন্যায়, বাণের ঘন স্রোতে ধৃষ্টদ্যুম্নকে চারদিক থেকে আচ্ছন্ন করে দিল।

Verse 333

द्रौ्णि पाउ्चालतनयो वाग्भिरातर्जयत्‌ तदा । समरांगणमें अश्व॒त्थामाद्वारा पीड़ित होनेपर रणदुर्मद पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने उसे वाणीद्वारा डाँट बतायी और इस प्रकार कहा--

সঞ্জয় বললেন—তখন পাঞ্চালবংশীয় পুত্র দ্রোণপুত্রকে তীক্ষ্ণ বাক্যে তিরস্কার করল। রণাঙ্গনে অশ্বত্থামার প্রবল চাপে পীড়িত হয়ে যুদ্ধোন্মত্ত পাঞ্চালরাজপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন তাকে বাক্যদ্বারা ধিক্কার দিয়ে এইরূপ বলল—

Verse 346

द्रोणं हत्वा किल मया हन्तव्यस्त्वं सुदुर्मते । “दुर्बृद्धि ब्राह्मण! क्‍या तू मेरी प्रतिज्ञा और उत्पत्तिका वृत्तान्त नहीं जानता? निश्चय ही, मुझे पहले द्रोणाचार्यका वध करके फिर तेरा विनाश करना है

সঞ্জয় বললেন—“দ্রোণকে বধ করে তবেই, হে অতিদুর্মতি, আমাকে তোকে বধ করতে হবে। ‘দুর্বুদ্ধি ব্রাহ্মণ! তুই কি আমার প্রতিজ্ঞা ও আমার উৎপত্তির বৃত্তান্ত জানিস না? নিশ্চয়ই, আগে আমাকে দ্রোণাচার্যকে বধ করতে হবে, তারপর তোর বিনাশ।’”

Verse 363

नेष्यामि प्रेतलोकाय होतन्मे मनसि स्थितम्‌ । “इसीलिये द्रोणके जीते-जी अभी युद्धस्थलमें तेरा वध नहीं कर रहा हूँ। दुर्मते! इसी रातमें प्रभात होनेसे पहले आज तेरे पिताका वध करके फिर तुझे भी युद्धस्थलमें प्रेतलोकको भेज दूँगा। यही मेरे मनका निश्चित विचार है

“আমি তোকে প্রেতলোকে পাঠাব—এটাই আমার মনে স্থির। তাই দ্রোণ জীবিত থাকতে আজ যুদ্ধক্ষেত্রে তোকে বধ করছি না, হে দুর্মতি। এই রাতেই, প্রভাতের আগে, তোর পিতাকে বধ করে তারপর তোকে-ও রণাঙ্গনে প্রেতলোকে পাঠাব—এটাই আমার অটল সংকল্প।”

Verse 373

तां दर्शय स्थिरो भूत्वा न मे जीवन विमोक्ष्यसे । “दुन्तीके पुत्रोंके प्रति जो तेरा द्वेषभाव और कौरवोंके प्रति जो भक्तिभाव है, उसे स्थिर होकर दिखा। तू जीते-जी मेरे हाथसे छुटकारा नहीं पा सकेगा

“স্থির হয়ে তা দেখিয়ে দে—জীবিত অবস্থায় তুই আমার হাত থেকে রেহাই পাবি না। পাণ্ডুপুত্রদের প্রতি তোর যে বিদ্বেষ এবং কৌরবদের প্রতি যে অনুরাগ, তা অটল হয়ে প্রকাশ কর; বেঁচে থাকতে তুই আমার হাত ছাড়াতে পারবি না।”

Verse 383

स वध्य: सर्वलोकस्य यथा त्वं पुरुषाधम: । 'जो ब्राह्मण ब्राह्मणत्वका परित्याग करके क्षत्रियधर्ममें तत्पर हो, जैसा कि मनुष्योंमें अधम तू है, वह सब लोगोंके लिये वध्य है”

“সে সকল লোকের দ্বারাই বধ্য—যেমন তুই, পুরুষাধম। যে ব্রাহ্মণ ব্রাহ্মণ্য ত্যাগ করে ক্ষাত্রধর্মে প্রবৃত্ত হয়, সে সমগ্র লোকের দৃষ্টিতে বধযোগ্য—যেমন তুই, নরাধম।”

Verse 393

क्रोधमाहारयत्‌ तीव्र तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्‌ । द्रपदकुमारके इस प्रकार कठोर वचन कहनेपर द्विजश्रेष्ठ अश्वत्थामाको बड़ा क्रोध हुआ और उसने कहा--'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह”

দ্রুপদপুত্রের কঠোর বাক্য শুনে দ্বিজশ্রেষ্ঠ দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা তীব্র ক্রোধে উন্মত্ত হল। সে গর্জে উঠল— “থাম, থাম!”

Verse 403

छादयामास च शरैर्नि:श्वसन्‌ पन्नगो यथा । उसने धृष्टद्युम्मकी ओर इस प्रकार देखा मानो अपने नेत्रोंके तेजसे उन्हें दग्ध कर डालेगा। साथ ही सर्पकी भाँति फुफकारते हुए अभश्वत्थामाने उन्हें अपने बाणोंद्वारा ढक दिया

সে সাপের মতো ফোঁসফোঁস করতে করতে, হাঁপাতে হাঁপাতে, শরবৃষ্টিতে শত্রুকে ঢেকে দিল। ধৃষ্টদ্যুম্নের দিকে এমন দৃষ্টি নিক্ষেপ করল যেন চোখের আগুনেই তাকে দগ্ধ করবে; তারপর বাণে বাণে তাকে আচ্ছন্ন করল।

Verse 483

ननाद सुमहानादं तपान्ते जलदो यथा । इस प्रकार रणभूमिमें शत्रुओंको जीतकर महारथी द्रोणपुत्र वर्षाकालके मेघके समान जोर-जोरसे गर्जना करने लगा

এভাবে রণক্ষেত্রে শত্রুদের পরাজিত করে মহারথী দ্রোণপুত্র গ্রীষ্মের শেষে বর্ষার মেঘের মতো ভয়ংকর গর্জন করল।

Verse 543

दृष्टवा द्रौणेमहत्‌ कर्म वासवस्येव संयुगे । भरतमश्रेष्ठ! युद्धस्थलमें इन्द्रके समान अश्वत्थामाके उस महान्‌ कर्मको देखकर पाण्डव- सेना व्यथित हो उठी

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যুদ্ধে বাসব (ইন্দ্র)-সম দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামার সেই মহাকর্ম দেখে পাণ্ডবসেনা বিচলিত হয়ে উঠল।

Verse 563

नाशयामास पज्चालान भूयिष्ठं ये व्यवस्थिता: । महारथी द्रोणकुमारने पहले सौ बाणोंसे सौ पांचाल योद्धाओंका वध करके फिर तीन पैने बाणोंद्वारा उनके तीन महारथियोंकों भी मार गिराया और धूृष्टद्युम्न तथा अर्जुनके देखते-देखते वहाँ जो बहुसंख्यक पांचाल योद्धा खड़े थे

মহারথী দ্রোণপুত্র ঘনবদ্ধ হয়ে দাঁড়ানো পাঞ্চালদের নিধন করল। প্রথমে শত বাণে শত পাঞ্চাল যোদ্ধাকে বধ করল; তারপর তিনটি তীক্ষ্ণ শর দিয়ে তাদের তিন মহারথীকেও ভূমিসাৎ করল। ধৃষ্টদ্যুম্ন ও অর্জুনের চোখের সামনেই সেখানে দাঁড়ানো অসংখ্য পাঞ্চালকে সে বিনাশ করল।

Verse 573

अगच्छन्‌ द्रौणिमुस्तृज्य विप्रकीर्णरथध्वजा: । समरभूमिमें मारे जाते हुए पांचाल और सूंजय सैनिक अअश्वत्थामाको छोड़कर चल दिये, उनके रथ और ध्वजा नष्ट-भ्रष्ट होकर बिखर गये थे

সঞ্জয় বললেন—দ্রোণের পুত্রকে পিছনে ফেলে, রণক্ষেত্রে নিহত হতে হতে পাঞ্চাল ও সৃঞ্জয় সৈন্যরা পশ্চাদপসরণ করে সরে গেল। তাদের রথ ও ধ্বজা ভেঙে চুরমার হয়ে ছড়িয়ে পড়েছিল; ব্যূহ শিথিল, মনোবল ভগ্ন।

Frequently Asked Questions

The dilemma is practical-ethical: when the field is obscured and identities are unknowable, continuing violent engagement risks harming one’s own side, raising questions about responsibility and discernment under kṣātra-dharma.

The chapter underscores how perception conditions judgment: in dust, noise, and fear, certainty collapses, so disciplined awareness and restraint become as important as valor for preserving order and minimizing indiscriminate harm.

No explicit phalaśruti appears here; its meta-function is archival and diagnostic—documenting the limits of control and recognition in mass conflict, which contextualizes later decisions and outcomes in the war narrative.

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