
अजिशीर्षे प्रातःसंध्यायां संग्रामवर्णनम् / Dawn-Transition Battle at Ajiśīrṣa (Chapter 161)
Upa-parva: Ajiśīrṣa-saṃgrāma (Engagement around the Ajiśīrṣa sector) — contextual unit for Adhyāya 161
Saṃjaya reports that with only a third of the night remaining, fighting continues with heightened arousal on both sides. Dawn approaches as Aruṇa reddens the sky, marking a shift in visibility and tempo. With the armies split, Droṇa—fronted by Duryodhana—presses the Somakas, Pāṇḍavas, and Pāñcālas. Observing the division, Kṛṣṇa instructs Arjuna to render the rival force “left-sided” (a tactical reorientation), and Arjuna pivots to flank Droṇa and Karṇa. Bhīma then urges Arjuna toward decisive action framed as kṣatriya obligation and repayment of honor, leading Arjuna to expand pressure by surrounding movement. Duryodhana, Karṇa, and Śakuni shower Arjuna with missiles; Arjuna counters by neutralizing weapons with weapons and striking multiple leaders with controlled volleys. The battlefield becomes obscured by dust, darkness, and sound; recognition collapses, and close-quarters grappling occurs among dismounted charioteers. Droṇa withdraws northward and stands like a smokeless fire; the Pāṇḍava host trembles at his radiance and perceived invincibility. Pāñcālas surge; Virāṭa and Drupada advance, joined by Drupada’s three grandsons and allied Cedis, but Droṇa kills the three grandsons and then brings down Virāṭa and Drupada with precise shots, defeating multiple contingents. Dhṛṣṭadyumna, enraged and publicly bound by oath, advances with his forces; Kaurava leaders protect Droṇa, preventing effective counter-engagement. Bhīma rebukes Dhṛṣṭadyumna for delay, likening Droṇa to a consuming fire, and then forcibly enters Droṇa’s formation; Dhṛṣṭadyumna also closes in, producing a tumult described as unprecedented at sunrise. The chapter ends as the sun quickly reaches evening twilight, underscoring the day’s compressed, relentless violence and disorientation.
Chapter Arc: द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध से धधकता हुआ कर्ण के वध के लिए उठ खड़ा होता है—और यह सब कुरुराज दुर्योधन की आँखों के सामने घटता है। → दुर्योधन और कृपाचार्य उसे रोकते हैं; कृप कर्ण को भी कटु वचन कहकर चेताते हैं कि उसका दर्प अंततः फाल्गुन (अर्जुन) द्वारा नष्ट होगा। इसी बीच पाण्डव-पाञ्चाल पक्ष कर्ण पर दबाव बढ़ाता है, और कौरव-सेना में भीतर-ही-भीतर नेतृत्व व अहं का संघर्ष उभर आता है। → रणभूमि में कर्ण असम्भ्रान्त होकर धनंजय के प्रतिमुख बढ़ता है; दोनों महावीर एक-दूसरे को तीक्ष्ण शर-वर्षा से ढँक देते हैं—अर्जुन कर्ण को, और कर्ण अर्जुन को—मानो दो गजराज आमने-सामने आ खड़े हों। → अश्वत्थामा का आवेग तत्काल टल जाता है, पर युद्ध का केंद्र कर्ण बनाम अर्जुन की ओर खिंच जाता है; कर्ण अपने अस्त्र-प्रहार से रथांगों और ध्वज-छत्र तक को लक्ष्य कर युद्ध को और उग्र बनाता है। → जब दोनों पक्षों के महारथी (अश्वत्थामा, कृप, शल्य आदि) अर्जुन को आते देख सक्रिय होते हैं, तब प्रश्न लटकता है—क्या यह दिन कर्ण-अर्जुन के निर्णायक परिणाम की ओर मुड़ेगा, या किसी नई रणनीति से युद्ध की धारा पलटेगी?
Verse 1
ऑपनआक्रा बछ। लि, एकोनषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय: अभश्रत्थामाका कर्णको मारनेके लिये उद्यत होना, दुर्योधनका उसे मनाना, पाण्डवों और पाज्चालोंका कर्णपर आक्रमण, कर्णका पराक्रम, अर्जुनके द्वारा कर्णकी पराजय तथा दुर्योधनका अश्वत्थामासे पांचालोंके वधके लिये अनुरोध संजय उवाच तथा परुषितं दृष्टवा सूतपुत्रेण मातुलम् | खड्गमुद्यम्य वेगेन द्रौणिरभ्यपतद् द्रुतम्,संजय कहते हैं--राजन्! इस प्रकार अपने मामाके प्रति सूतपुत्र कर्णको कटु वचन सुनाते देख अश्वत्थामा बड़े वेगसे तलवार उठाकर तुरंत कर्णपर टूट पड़ा
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! এভাবে সূতপুত্র কর্ণকে তার মাতুলের প্রতি কঠোর বাক্য বলতে দেখে-শুনে দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা তরবারি তুলে, ক্রোধে তাড়িত হয়ে, মহাবেগে তৎক্ষণাৎ কর্ণের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 2
ततः परमसंक्रुद्धः सिंहो मत्तमिव द्विपम् । प्रेक्षत: कुरुराजस्य द्रौणि: कर्ण समभ्ययात्
তখন পরম ক্রোধে দগ্ধ দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা—যেমন সিংহ উন্মত্ত হাতির উপর ঝাঁপিয়ে পড়ে—তেমনি কুরু-রাজের দৃষ্টির সামনেই কর্ণের দিকে অগ্রসর হল।
Verse 3
जैसे सिंह मतवाले हाथीपर झपटता है, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणकुमार अश्व॒ृत्थामाने कुरुराज दुर्योधनके देखते-देखते कर्णपर आक्रमण किया ।।
সঞ্জয় বললেন—যেমন সিংহ উন্মত্ত হাতির উপর ঝাঁপিয়ে পড়ে, তেমনই জ্বলন্ত ক্রোধে ভরা দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা কুরু-রাজ দুর্যোধনের চোখের সামনেই কর্ণের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল। অশ্বত্থামা বলল—“রে দুর্বুদ্ধি, নরাধম! আমার মামা—শ্রেষ্ঠ ধনুর্ধর ও সত্য শূর—অর্জুনের প্রকৃত গুণগান করছেন; তবু তুই বিদ্বেষবশত কেন তাঁকে তিরস্কার করছিস?”
Verse 4
विकत्थमान: शौर्येण सर्वलोकथनुर्थरम् । दर्पोत्सेधगृहीतो5द्य न कज्चिद् गणयन् मृथे
সে নিজের বীরত্বের বড়াই করতে করতে, আজ অহংকারের উচ্ছ্বাসে আচ্ছন্ন হয়ে, রণক্ষেত্রে কাউকেই গণ্য না করে, সর্বলোকখ্যাত সেই শ্রেষ্ঠ ধনুর্ধরকে তিরস্কার করছিল।
Verse 5
क्व ते वीर्य क््व चास्त्राणि यच्त्वां निर्जित्य संयुगे । गाण्डीवधन्वा हतवान् प्रेक्षतस्ते जयद्रथम्
যখন রণক্ষেত্রে গাণ্ডীবধারী অর্জুন তোকে পরাস্ত করে, তোর চোখের সামনেই জয়দ্রথকে বধ করেছিল—তখন তোর বীর্য কোথায় ছিল? তোর অস্ত্রশস্ত্রই বা কোথায় গেল?
Verse 6
येन साक्षान्महादेवो योधित: समरे पुरा । तमिच्छसि वृथा जेतुं सूताधम मनोरथै:
হে সূতাধম! যে পূর্বে সমরে স্বয়ং মহাদেবের সঙ্গে মুখোমুখি যুদ্ধ করেছে, তাকে তুই কেবল কল্পনা আর ফাঁপা কৌশলে জয় করতে চাইছিস—এ তো বৃথা বাসনা।
Verse 7
यं हि कृष्णेन सहित सर्वशस्त्रभूृतां वरम् । जेतुं न शक्ता: सहिता: सेन्द्रा अपि सुरसुरा:
সঞ্জয় বললেন—হে দুর্বুদ্ধি সূত! শ্রীকৃষ্ণের সহিত যে অর্জুন সর্বশস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, তাঁকে ইন্দ্রসহ দেবগণ ও অসুরগণ একত্র হয়েও জয় করতে পারে না। সেই লোকের একমাত্র অপরাজিত বীর অর্জুনকে এই রাজাদের সঙ্গে নিয়েও তুই কোন শক্তিতে পরাস্ত করবি?
Verse 8
लोकैकवीरमजितमर्जुनं सूत संयुगे । कि पुनस्त्व॑ सुद्दुर्बुद्धे सहैभिरवसुधाधिपै:
সঞ্জয় বললেন—হে সূত! যুদ্ধে অর্জুন লোকের একমাত্র অপরাজিত বীর। শ্রীকৃষ্ণের সহিত থাকলে ইন্দ্রসহ দেব ও অসুরসমূহও তাঁকে জয় করতে পারে না; তবে হে অতিদুর্বুদ্ধি, এই ভূ-অধিপতিদের সঙ্গে নিয়েও তুই কীভাবে তাঁকে পরাস্ত করবি?
Verse 9
कर्ण पश्य सुददुर्बुद्धे तिछेदानीं नराधम । एष तेड्द्य शिर: कायादुद्धरामि सुदुर्मते,दुर्बद्धि नराधम! कर्ण! तू देख और खड़ा रह। दुर्मते! मैं अभी तेरा सिर धड़से उतार लेता हूँ
সঞ্জয় বললেন—কর্ণ! হে অতিদুর্বুদ্ধি, নরাধম! দেখ এবং স্থির হয়ে দাঁড়া। হে কুমতি! আজই আমি তোর দেহ থেকে মস্তক ছিন্ন করব।
Verse 10
संजय उवाच तमुद्यतं तु वेगेन राजा दुर्योधन: स्वयम् । न्यवारयन्महातेजा: कृपश्च द्विपदां वर:
সঞ্জয় বললেন—রাজন! বেগ ও ক্রোধে উঠে পড়া অশ্বত্থামাকে মহাতেজস্বী রাজা দুর্যোধন নিজে এবং দ্বিপদদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কৃপাচার্যও নিবৃত্ত করলেন।
Verse 11
कर्ण उवाच शूरो5यं समरश्लाघी दुर्मतिश्न द्विजाधम: । आसादयतु मद्दीर्य मुज्चेमं कुरुसत्तम
কর্ণ বললেন—হে কুরুশ্রেষ্ঠ! এ ব্যক্তি যুদ্ধের বড়াই করে, দুর্মতি, ব্রাহ্মণদের মধ্যে অধম। একে ছেড়ে দাও; আজ সে আমার বীর্য্যের মুখোমুখি হোক।
Verse 12
अश्वत्थामोवाच तवैतत् क्षम्यतेडस्माभि: सूतात्मज सुदुर्मते । दर्पमुत्सिक्तमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति
অশ্বত্থামা বলল—হে দুর্বুদ্ধি সূতপুত্র! তোর এই অপরাধ আমরা ক্ষমা করলাম; কিন্তু তোর এই স্ফীত অহংকার ফাল্গুন (অর্জুন) চূর্ণ করবে।
Verse 13
दुर्योधन उवाच अश्वत्थामन् प्रसीदस्व क्षन्तुमहसि मानद । कोप: खलु न कर्तव्य: सूतपुत्रं कथंचन
দুর্যোধন বলল—হে মানদাতা অশ্বত্থামা, প্রসন্ন হও; তোমার ক্ষমা করাই উচিত। সূতপুত্র কর্ণের প্রতি কোনোভাবেই ক্রোধ করা সমীচীন নয়।
Verse 14
त्वयि कर्णे कृपे द्रोणे मद्रराजेडथ सौबले । महत् कार्य समासक्तं प्रसीद द्विजसत्तम
হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! তোমার উপর, কর্ণের উপর, কৃপের উপর, দ্রোণের উপর, মদ্ররাজ শল্যের উপর এবং সৌবল (শকুনি)-এর উপর এক মহান দায়িত্ব অর্পিত হয়েছে; প্রসন্ন হও।
Verse 15
एते हाभिमुखा: सर्वे राधेयेन युयुत्सव: । आयान्ति पाण्डवा ब्रद्वान्नाह्नयन्त: समन्तत:,ब्रह्मन! ये सामने राधापुत्र कर्णके साथ युद्धकी अभिलाषा रखकर समस्त पाण्डव- सैनिक सब ओरसे ललकारते आ रहे हैं
হে ব্রাহ্মণ! রাধেয় কর্ণের সঙ্গে যুদ্ধের আকাঙ্ক্ষায় এরা সকলেই আমাদের সম্মুখে অগ্রসর হচ্ছে—পাণ্ডবরা চারদিক থেকে আহ্বান ও ললকার করতে করতে আসছে।
Verse 16
संजय उवाच प्रसाद्यमानस्तु ततो राज्ञा द्रौणिमहामना: । प्रससाद महाराज क्रोधवेगसमन्वित:,संजय कहते हैं--महाराज! राजा दुर्योधनके मनानेपर क्रोधके वेगसे युक्त महामना अश्र॒त्थामा शान्त एवं प्रसन्न हो गया
সঞ্জয় বলল—হে মহারাজ! রাজার সান্ত্বনায় ক্রোধের বেগে পরিপূর্ণ মহামনা দ্রৌণি (অশ্বত্থামা) শান্ত হয়ে প্রসন্ন হল।
Verse 17
ततः: कृपो<प्युवाचेदमाचार्य: सुमहामना: । सौम्यस्वभावादू राजेन्द्र क्षिप्रमागतमार्दव:
তখন মহামনা আচার্য কৃপও তাঁর সৌম্য স্বভাবের বশে অতি শীঘ্রই কোমল হলেন। রাজেন্দ্র! মৃদুতা ফিরে এলে তিনি শান্ত হয়ে এইরূপ বললেন।
Verse 18
कृप उवाच तवैतत् क्षम्यतेडस्माभि: सूतात्मज सुदुर्मते । दर्पमुत्सिक्तमेतत् ते फाल्गुनो नाशयिष्यति
কৃপ বললেন—হে দুর্বুদ্ধি সূতপুত্র! আমরা তোমার এই অপরাধ ক্ষমা করি; কিন্তু তোমার এই স্ফীত দম্ভ ফাল্গুন (অর্জুন) নিশ্চয়ই চূর্ণ করবে।
Verse 19
संजय उवाच ततस्ते पाण्डवा राजन् पज्चालाश्व यशस्विन: । आजम्मु: सहिता: कर्ण तर्जयन्त: समन्ततः
সঞ্জয় বললেন—রাজন! তারপর যশস্বী পাণ্ডব ও পাঞ্চালরা একত্র হয়ে গর্জন ও তর্জন করতে করতে চারদিক থেকে কর্ণের উপর ধেয়ে এল।
Verse 20
कर्णोडपि रथियनां श्रेष्ठ श्नापमुद्यम्य वीर्यवान् । कौरवाग्रयै: परिवृत: शक्रो देवगणैरिव
কর্ণও—বীর্যবান ও রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—অস্ত্র তুলে ধরল। সে অগ্রগণ্য কৌরবদের দ্বারা পরিবৃত ছিল, যেন দেবগণের দ্বারা পরিবৃত শক্র (ইন্দ্র)।
Verse 21
ततः प्रववृते युद्ध कर्णस्य सह पाण्डवै:
তারপর কর্ণের সঙ্গে পাণ্ডবদের ঘোর যুদ্ধ শুরু হল।
Verse 22
भीषणं सुमहाराज सिंहनादविराजितम् | महाराज! तदनन्तर कर्णका पाण्डवोंके साथ भीषण युद्ध आरम्भ हुआ, जो सिंहनादसे सुशोभित हो रहा था ।। ततस्ते पाण्डवा राजन् पज्चालाश्न यशस्विन:
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! এরপর কর্ণ ও পাণ্ডবদের মধ্যে সিংহনাদে দীপ্ত এক ভয়ংকর মহাযুদ্ধ শুরু হল। তখন, রাজন, পাণ্ডবরা এবং যশস্বী পাঞ্চালরাও রণক্ষেত্রে অগ্রসর হয়ে সংঘর্ষে প্রবৃত্ত হল।
Verse 23
अयं कर्ण: कुत: कर्णस्तिष्ठ कर्ण महारणे
সঞ্জয় বললেন—“এই যে কর্ণ! কর্ণ এখন কোথায়? হে কর্ণ, এই মহারণে স্থির হয়ে দাঁড়াও!”
Verse 24
अन््ये तु दृष्टवा राधेयं क्रोधरक्तेक्षणाउब्रुवन्
সঞ্জয় বললেন—কিন্তু অন্যেরা রাধেয়কে দেখে, ক্রোধে রক্তিম চোখে, বলে উঠল।
Verse 25
हन्यतामयमुत्सिक्त: सूतपुत्रो5ल्पचेतन: । सर्वे: पार्थिवशार्टूलैननिनार्थो5स्ति जीवता
সঞ্জয় বললেন—“এই উদ্ধত, অল্পবুদ্ধি সূতপুত্রকে বধ করো। তোমরা সকলেই বাঘসম রাজা—এর বেঁচে থাকায় কোনো লাভ নেই।”
Verse 26
अत्यन्तवैरी पार्थानां सततं पापपूरुष: । एष मूलमनर्थानां दुर्योधनमते स्थित:
সঞ্জয় বললেন—“এ পাণ্ডবদের চরম শত্রু, সর্বদা পাপাচারী। এ-ই অনর্থের মূল, দুর্যোধনের মতিতে স্থিত।”
Verse 27
घ्नतैनमिति जल्पन्त: क्षत्रिया: समुपाद्रवन् । महता शरवर्षेण च्छादयन्तो महारथा:
সঞ্জয় বললেন—“ওকে বধ করো!” বলে চিৎকার করতে করতে ক্ষত্রিয়েরা ধেয়ে এল। সেই মহারথীরা প্রবল শরবৃষ্টিতে তাকে আচ্ছন্ন করে দিল।
Verse 28
वधार्थ सूतपुत्रस्य पाण्डवेयेन चोदिता: । दूसरे लोगोंने राधापुत्र कर्णको देखकर क्रोधसे लाल आँखें करके कहा--“समस्त श्रेष्ठ राजा मिलकर इस घमंडी और मूर्ख सूतपुत्रको मार डालें। इसके जीनेसे कोई लाभ नहीं है। यह पापात्मा पुरुष सदा कुन्तीकुमारोंके साथ अत्यन्त वैर रखता आया है। दुर्योधनकी रायमें रहकर यही सारे अनर्थोकी जड़ बना हुआ है। अतः इसे मार डालो।” ऐसा कहते हुए समस्त क्षत्रिय महारथी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे सूतपुत्रके वधके लिये प्रेरित हो बाणोंकी बड़ी भारी वर्षद्वारा उसे आच्छादित करते हुए उसपर टूट पड़े || २४--२७ ह || तांस्तु सर्वास्तथा दृष्टवा धावमानान् महारथान्
সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডুপুত্রের প্রেরণায় তারা সূতপুত্র (কর্ণ)-বধের উদ্দেশ্যে অগ্রসর হল। রাধাপুত্র কর্ণকে দেখে ক্রোধে রক্তচক্ষু হয়ে ক্ষত্রিয়েরা বলল—“সব শ্রেষ্ঠ রাজা একত্র হয়ে এই উদ্ধত, মূঢ় সূতপুত্রকে বধ করো। এর বেঁচে থাকার কোনো লাভ নেই। এই পাপাত্মা সর্বদা কুন্তীপুত্রদের সঙ্গে প্রবল বৈরিতা পোষণ করেছে। দুর্যোধনের মতের আশ্রয়ে থেকেই এ-ই সর্ব অনর্থের মূল; অতএব একে নিধন করো।” এ কথা বলে সকল ক্ষত্রিয় মহারথী যুধিষ্ঠিরকে কর্ণ-বধে প্ররোচিত করে, ঘন শরবৃষ্টিতে তাকে আচ্ছন্ন করে ঝাঁপিয়ে পড়ল।
Verse 29
दृष्टवा संहारकल्पं तमुद्धूतं सैन्यसागरम्
সঞ্জয় বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! প্রলয়কালের ন্যায় উথলে ওঠা সেই সৈন্য-সমুদ্রকে দেখে কর্ণ চারদিক থেকে সেই বাহিনীকে রোধ করল। যুদ্ধে অপরাজেয়, দ্রুতকর্মা ও মহাবলী কর্ণ তোমার পুত্রদের সন্তুষ্ট করতে ইচ্ছুক হয়ে শরের প্রবল বর্ষণ করে শত্রুসেনার অগ্রগতি থামিয়ে দিল।
Verse 30
पिप्रीषुस्तव पुत्राणां संग्रामेष्वपराजित: । सायकौघेन बलवान क्षिप्रकारी महाबल:
তোমার পুত্রদের তুষ্ট করতে উদ্গ্রীব, যুদ্ধে অপরাজেয়, শরের স্রোতে বলবান, দ্রুতকর্মা ও মহাবলী।
Verse 31
ततस्तु शरवर्षेण पार्थिवास्तमवारयन्
সঞ্জয় বললেন—তখন রাজারা শরবৃষ্টিতে তাকে রোধ করল। তারপর শত শত, সহস্র সহস্র নৃপতি ধনুক কাঁপিয়ে শরের বর্ষণে কর্ণেরও গতি থামিয়ে দিল। যেমন একদা দৈত্যরা ইন্দ্রের সঙ্গে যুদ্ধ করেছিল, তেমনি সেই রাজারা রাধাপুত্র কর্ণের সঙ্গে যুদ্ধে লিপ্ত হল।
Verse 32
धनूंषि ते विधुन्चाना: शतशो5थ सहस्रश: । अयोधयन्त राधेयं शक्रं दैत्यगणा इव
সঞ্জয় বললেন—তারপর শত শত ও সহস্র সহস্র রাজা ধনুক কাঁপিয়ে তীরবৃষ্টিতে রাধেয় কর্ণের অগ্রগতি রোধ করল। যেমন দৈত্যগণ ইন্দ্রের সঙ্গে যুদ্ধে প্রবৃত্ত হয়, তেমনি সেই নৃপতিরা রাধাপুত্র কর্ণকে ঘিরে প্রবল সমরে লিপ্ত হল।
Verse 33
शरवर्ष तु तत् कर्ण: पार्थिव: समुदीरितम् । शरवर्षेण महता समन्ताद् व्यकिरत् प्रभो,प्रभो! राजाओंद्वारा की हुई उस बाण-वर्षाको कर्णने बाणोंकी बड़ी भारी वृष्टि करके सब ओर बिखेर दिया
সঞ্জয় বললেন—রাজাদের নিক্ষিপ্ত সেই তীরবৃষ্টি কর্ণ প্রতিহত করল; আর প্রভু কর্ণ আরও বৃহৎ তীরবৃষ্টি ছড়িয়ে চারিদিকে তা ছিন্নভিন্ন করে দিল।
Verse 34
तद् युद्धमभवत् तेषां कृतप्रतिकृतैषिणाम् । यथा देवासुरे युद्धे शक्रस्य सह दानवै:
সঞ্জয় বললেন—তখন প্রতিক্রিয়ার প্রতিক্রিয়া করতে উদ্যত তাদের মধ্যে যুদ্ধ জ্বলে উঠল; যেমন দেবাসুর-যুদ্ধে শক্রের সঙ্গে দানবদের সংঘর্ষ হয়েছিল।
Verse 35
जैसे देवासुर-संग्राममें दानवोंके साथ इन्द्रका युद्ध हुआ था, उसी प्रकार घात- प्रतिघातकी इच्छावाले राजाओं तथा कर्णका वह युद्ध बड़ा भयंकर हो रहा था ।।
যেমন দেবাসুর-সংগ্রামে দানবদের সঙ্গে ইন্দ্রের যুদ্ধ হয়েছিল, তেমনি আঘাত-প্রতিআঘাতের বাসনায় উন্মত্ত রাজাদের সঙ্গে কর্ণের সেই যুদ্ধ ভয়ংকর হয়ে উঠল। সেখানে আমরা সূতপুত্র কর্ণের আশ্চর্য ক্ষিপ্রতা দেখলাম—শত্রুরা চারদিক থেকে ঝাঁপিয়ে পড়লেও যুদ্ধে তাকে পরাভূত করতে পারল না।
Verse 36
वहाँ हमने सूतपुत्र कर्णकी अद्भुत फुर्ती देखी, जिससे सब ओरसे प्रयत्न करनेपर भी शत्रुपक्षीय योद्धा उस युद्धस्थलमें कर्णको काबूमें नहीं कर पा रहे थे ।।
সঞ্জয় বললেন—মহারথী সূতপুত্র কর্ণ রাজাদের ঘন তীরসমূহ প্রতিহত করে তাদের রথের জোয়াল, দণ্ড, ছত্র, পতাকা ও অশ্বদের উপর তীর নিক্ষেপ করল; তাই শত্রুপক্ষের যোদ্ধারা চারদিক থেকে সর্বশক্তি প্রয়োগ করেও রণক্ষেত্রে কর্ণকে বশ করতে পারল না।
Verse 37
ततस्ते व्याकुली भूता राजान: कर्णपीडिता:
তখন কর্ণের পীড়ায় সেই রাজারা ব্যাকুল হয়ে উঠলেন; যুদ্ধের ঘনঘটায় তাঁদের স্থৈর্য ভেঙে গেল, মন বিষণ্ণ ও বিচলিত হল।
Verse 38
हयानां वध्यमानानां गजानां रथिनां तथा
সঞ্জয় বললেন—“যখন ঘোড়াগুলি কাটা পড়ছিল, তেমনি হাতি ও রথী যোদ্ধারাও…,”—যুদ্ধক্ষেত্রে ধ্বংস ক্রমে বেড়ে উঠছিল।
Verse 39
तत्र तत्राभ्यवेक्षाम संघान् कर्णेन ताडितान् । कर्णके बाणोंकी चोट खाकर मरनेवाले घोड़ों, हाथियों और रथियोंके झुंड-के-झुंड हमने वहाँ देखे थे ।। शिरोभि: पतितै राजन् बाहुभिश्न समन्ततः
সেখানে-সেখানে আমরা কর্ণের আঘাতে বিধ্বস্ত যোদ্ধাদের দল-দল দেখেছিলাম। হে রাজন, চারদিকে পতিত মস্তক ও ছিন্ন বাহুতে ভূমি আচ্ছন্ন ছিল।
Verse 40
हतैश्न हन्यमानैश्व निष्टनद्धिश्ष सर्वश:
নিহত ও নিহত হতে থাকা লোকদের আর্তনাদ চারদিকে ধ্বনিত হচ্ছিল।
Verse 41
बभूवायोधन रौद्रं वैवस्वतपुरोपमम् । कुछ लोग मारे गये थे, कुछ मारे जा रहे थे और कुछ लोग सब ओर पीड़ासे कराह रहे थे। इससे वह युद्धस्थल यमपुरीके समान भयंकर प्रतीत होता था ।।
যুদ্ধক্ষেত্র ভয়ংকর হয়ে উঠল, যেন বৈবস্বত (যম)-পুরী। তখন রাজা দুর্যোধন কর্ণের বিক্রম দেখে…
Verse 42
युध्यतेड्सौ रणे कर्णो दंशित: सर्वपार्थिवै:
সঞ্জয় বললেন—রণক্ষেত্রে সকল রাজাদের আক্রমণে দংশিত হয়েও কবচধারী কর্ণ একাই যুদ্ধ করে চলেছে। দেখো, কর্ণের শরে পীড়িত পাণ্ডবসেনা কার্ত্তিকেয়ের দ্বারা বিধ্বস্ত অসুরবাহিনীর মতো ভেঙে পড়ে পলায়ন করছে।
Verse 43
पश्यैतां द्रवर्ती सेनां कर्णसायकपीडिताम् । कार्तिकेयेन विध्यस्तामासुरीं पृततामिव
দেখো, কর্ণের শরে পীড়িত এই সেনা পলায়ন করছে; কার্ত্তিকেয়ের দ্বারা বিধ্বস্ত অসুরসেনার মতোই তা ছত্রভঙ্গ হচ্ছে।
Verse 44
दृष्टवैतां निर्जितां सेनां रणे कर्णेन धीमता । अभियात्येष बीभत्सु: सूतपुत्रजिधघांसया
বুদ্ধিমান কর্ণের দ্বারা রণে পরাজিত এই সেনাকে দেখে বীভৎসু অর্জুন এখন সূতপুত্রকে বধ করার সংকল্পে অগ্রসর হচ্ছে।
Verse 45
तद् यथा प्रेक्षमाणानां सूतपुत्रं महारथम् | न हन्यात् पाण्डव: संख्ये तथा नीतिर्विधीयताम्
এমন কৌশল স্থির করো, যাতে আমাদের চোখের সামনেই যুদ্ধক্ষেত্রে পাণ্ডব অর্জুন সেই মহারথী সূতপুত্রকে বধ করতে না পারে।
Verse 46
ततो दौणि: कृप: शल्यो हार्दिक्यश्व महारथ: । प्रत्युद्ययुस्तदा पार्थ सुतपुत्रपरीप्सया
তখন দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা, কৃপ, শল্য এবং মহারথী হার্দিক্য—হে পার্থ—সূতপুত্রকে রক্ষা করতে প্রতিআক্রমণে অগ্রসর হলেন।
Verse 47
बीभत्सुरपि राजेन्द्र पड्चालैरभिसंवृत:
সঞ্জয় বললেন—রাজেন্দ্র! ভীভৎসু (অর্জুন) যদিও ভয়ংকর বীর, তবু পাঞ্চালদের দ্বারা চারিদিক থেকে পরিবৃত হলেন।
Verse 48
धृतराष्ट्र रवाच संरब्धं फाल्गुनं दृष्टया कालान्तकयमोपमम्
ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! কাল, অন্তক ও যমের ন্যায় ক্রোধে দগ্ধ ফাল্গুন (অর্জুন)কে দেখে আমি আতঙ্কিত হয়ে উঠেছি।
Verse 49
कर्णो वैकर्तन: सूत प्रत्यपद्यत् किमुत्तरम् । धृतराष्ट्रने पूछा--सूत! काल, अन्तक और यमके समान क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको देखकर वैकर्तन कर्णने उन्हें किस प्रकार उत्तर दिया? (कैसे उनका सामना किया) ।।
ধৃতরাষ্ট্র জিজ্ঞাসা করলেন—সূত! কাল, অন্তক ও যমের ন্যায় ক্রোধে উন্মত্ত অর্জুনকে দেখে বৈকর্তন কর্ণ কী উত্তর দিল? সে তো মহারথী, সর্বদাই পার্থের সঙ্গে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করে।
Verse 50
स तु तं सहसा प्राप्तं नित्यमत्यन्तवैरिणम्
তখন সে হঠাৎ সম্মুখে উপস্থিত, চিরশত্রু সেই পরম বৈরীকে দেখল।
Verse 51
कर्णो वैकर्तन: सूत किमुत्तरमपद्यत । संजय! उस समय अपने सदाके अत्यन्त वैरी अर्जुनको सहसा सामने पाकर सूर्यपुत्र कर्णने उन्हें किस प्रकार उत्तर देनेका निश्चय किया? || ५० ई ।।
সঞ্জয় বললেন—অগ্রসরমান পাণ্ডবকে দেখে তখন বৈকর্তন কর্ণ তার দিকে এগিয়ে গেল, যেমন এক হাতি আরেক হাতির মোকাবিলা করে।
Verse 52
तमापततन्तं वेगेन वैकर्तनमजिह्ागै:
সঞ্জয় বললেন—বৈকর্তন কর্ণ যখন মহাবেগে ধেয়ে এল, তখন যুদ্ধক্রোধে নিক্ষিপ্ত সাপের মতো বাণ তাকে প্রতিহত করে থামিয়ে দিল; রণক্ষেত্রে মহাবীরেরও সামনে প্রতিপক্ষের প্রতিবল ও কৌশল বাধা হয়ে দাঁড়ায়।
Verse 53
स कर्ण शरजालेन च्छादयामास पाण्डव:
সঞ্জয় বললেন—তখন পাণ্ডব কর্ণকে চারদিক থেকে জালের মতো বাণবৃষ্টিতে আচ্ছন্ন করল, রণচাপের মধ্যে তাকে বিপর্যস্ত করে দিল। এ দৃশ্য ধর্মযুদ্ধের তীব্রতা জানায়—যেখানে দৃঢ়তা ও কৌশলের সঙ্গে সংযম ও উদ্দেশ্যও চাই।
Verse 54
तस्य तल्लाघवं पार्थो नामृष्पत महाबल:,शत्रुओंको संताप देनेवाले महाबली अर्जुन कर्णकी इस फुर्तीको न सह सके। उन्होंने सूतपुत्र कर्णजो शिलापर तेज किये हुए स्वच्छ अग्रभागवाले तीन सौ बाण मारे
সঞ্জয় বললেন—তার সেই ক্ষিপ্রতা মহাবলী পার্থ সহ্য করতে পারলেন না। শত্রুতাপী অর্জুন শিলায় ধার দেওয়া নির্মল তীক্ষ্ণাগ্র তিনশো বাণ সূতপুত্র কর্ণের উপর বর্ষণ করলেন—যেন গতির জবাবে শৃঙ্খলিত শক্তি প্রয়োগ।
Verse 55
तस्मै बाणान् शिलाधौतान प्रसन्नाग्रानजिद्दागान् । प्राहिणोत् सूतपुत्राय त्रिशतं शत्रुतापन:
সঞ্জয় বললেন—তার সেই ক্ষিপ্রতা সহ্য না করে শত্রুতাপী অর্জুন সূতপুত্রের দিকে শিলায় ঘষা, উজ্জ্বল তীক্ষ্ণাগ্র, সোজা উড়ে যাওয়া তিনশো বাণ প্রেরণ করলেন; রণকৌশলের ক্রমবর্ধমান তীব্রতায় বলের জবাব আরও বলেই দেওয়া হলো।
Verse 56
विव्याध चैनं संरब्धो बाणेनैकेन वीर्यवान् । सव्ये भुजाग्रे बलवान् नाराचेन हसन्निव
সঞ্জয় বললেন—তখন ক্রুদ্ধ হয়ে বীর্যবান যোদ্ধা একটিমাত্র বাণে তাকে বিদ্ধ করল; পরে শক্তিমান হয়ে হাসিমুখের মতো নারাচ বাণে তার বাঁ হাতের অগ্রভাগে আঘাত করল। রণধর্মে এটি সংযত পরাক্রম—আঘাত করেও মনোস্থিতি অটুট রাখা।
Verse 57
तस्य विद्धस्य बाणेन कराच्चापं पपात ह । पुनरादाय तच्चापं निमेषार्धान्महाबल:
বাণবিদ্ধ হতেই তার হাত থেকে ধনুকটি খসে পড়ল। কিন্তু সেই মহাবলী যোদ্ধা চোখের পলকে আবার সেই ধনুকটি তুলে নিল।
Verse 58
शरवष्टिं तु तां मुक्तां सूतपुत्रेण भारत
হে ভারত! সেই শরের বৃষ্টি সূতপুত্র (কর্ণ)ই নিক্ষেপ করেছিল।
Verse 59
व्यधमच्छरवर्षेण स्मयन्निव धनंजय: । भारत! सूतपुत्रद्वारा की हुई उस बाण-वर्षाको अर्जुनने मुसकराते हुए-से बाणोंकी वृष्टि करके नष्ट कर दिया ।। तौ परस्परमासाद्य शरवर्षेण पार्थिव
হে ভারত! ধনঞ্জয় অর্জুন যেন হাসিমুখে, সূতপুত্রের নিক্ষিপ্ত সেই শরের বৃষ্টিকে নিজের শরের বৃষ্টিতে চূর্ণ করে দিল। তারপর দু’জন মুখোমুখি হয়ে পরস্পরের উপর তীরের ধারাবৃষ্টি বর্ষণ করতে লাগল।
Verse 60
तदद्भुतं महद् युद्ध कर्णपाण्डवयोर्मुधे
তখন রণক্ষেত্রে কর্ণ ও পাণ্ডব (অর্জুন)-এর মধ্যে সেই আশ্চর্য ও মহৎ যুদ্ধ সংঘটিত হল।
Verse 61
क्रुद्धयोर्वासिताहेतोर्वन्ययोर्गजयोरिव । जैसे दो जंगली हाथी किसी हथिनीके लिये क्रोधपूर्वक लड़ रहे हों, उसी प्रकार उस युद्धस्थलमें कर्ण और अर्जुनका वह संग्राम महान् एवं अद्भुत था ।।
যেমন কোনো হাতিনীর কারণে ক্রুদ্ধ হয়ে দুই বন্য হাতি যুদ্ধ করে, তেমনই সেই রণক্ষেত্রে কর্ণ ও অর্জুনের সংঘর্ষ ছিল অতিশয় মহান ও বিস্ময়কর। তখন মহাধনুর্ধর পার্থ কর্ণের পরাক্রম দেখে…
Verse 62
अश्वांश्व चतुरो भल्लैरनयदू यमसादनम्
সঞ্জয় বললেন—তীক্ষ্ণ ভল্লবাণে সে চারটি ঘোড়াকেই যমসদনে পাঠিয়ে দিল।
Verse 63
अथीनं छिन्नधन्वानं हताश्वचं हतसारथिम्
সঞ্জয় বললেন—সে অসহায় হয়ে পড়ল; তার ধনুক কেটে ফেলা হয়েছে, ঘোড়া নিহত, আর সারথিও নিহত।
Verse 64
विव्याध सायकै: पार्थश्चतुर्भि: पाण्डुनन्दन: । धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथिके मारे जानेपर कर्णको पाण्डुनन्दन अर्जुनने चार बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।।
সঞ্জয় বললেন—তখন পাণ্ডুনন্দন পৃথাপুত্র অর্জুন চারটি বাণে কর্ণকে বিদ্ধ করল। তারপর সেই নরশ্রেষ্ঠ দ্রুত রথ থেকে লাফিয়ে নামল।
Verse 65
स नुन्नो$र्जुनबाणौधचैराचित: शल्यको यथा
সঞ্জয় বললেন—অর্জুনের বাণবৃষ্টিতে বিদ্ধ হয়ে সে শজারুর মতো শরভরা হয়ে উঠল।
Verse 66
राधेयं निर्जितं दृष्टवा तावका भरतर्षभ
সঞ্জয় বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! রাধেয় (কর্ণ) পরাজিত হয়েছে দেখে তোমার সৈন্যরা বিচলিত হয়ে পড়ল।
Verse 67
द्रवतस्तान् समालोक्य राजा दुर्योधनो नूप
সঞ্জয় বললেন—সেই যোদ্ধাদের বিশৃঙ্খলভাবে পলায়ন করতে দেখে রাজা দুর্যোধন, হে নৃপ, (সতর্ক হলেন)।
Verse 68
निवर्तयामास तदा वाक्यमेतदुवाच ह । नरेश्वर! उन्हें भागते देख राजा दुर्योधनने लौटाया और उस समय उनसे यह बात कही -- ६७३ || अलं द्रुतेन व: शूरास्तिष्ठ ध्वं क्षत्रियर्षभा:
সঞ্জয় বললেন—তখন রাজা দুর্যোধন পলায়নরতদের থামিয়ে এই বাক্য বললেন: “হে বীরগণ, আর দৌড় নয়; হে ক্ষত্রিয়শ্রেষ্ঠগণ, স্থির হও। পলায়নের প্রয়োজন নেই। আমি নিজেই এখনই রণভূমিতে গিয়ে অর্জুনকে বধ করব। পাঞ্চাল ও সোমকসহ কুন্তীপুত্রদের সংহার করব।”
Verse 69
एष पार्थवधायाहं स्वयं गच्छामि संयुगे | अहं पार्थान हनिष्यामि सपञठ्चालान ससोमकान
“পার্থকে বধ করতে আমি নিজেই সমরে যাচ্ছি। পাঞ্চাল ও সোমকসহ আমি পৃথাপুত্রদের বধ করব।”
Verse 70
अद्य मे युध्यमानस्य सह गाण्डीवधन्चना । द्रक्ष्यन्ति विक्रमं पार्था: कालस्येव युगक्षये,“आज गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ युद्ध करते समय कुन्तीके सभी पुत्र प्रलयकालमें कालके समान मेरा पराक्रम देखेंगे
“আজ গাণ্ডীবধারী অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ করতে করতে কুন্তীপুত্ররা আমার পরাক্রম দেখবে—যুগান্তে কালের মতো।”
Verse 71
अद्य मद्घाणजालानि विमुक्तानि सहस्रश: । द्रक्ष्यन्ति समरे योधा: शलभानामिवायती:
“আজ সমরে যোদ্ধারা আমার বিনাশ-জাল সহস্র সহস্র মুক্ত হতে দেখবে—পঙ্গপালের ঝাঁকের মতো ছড়িয়ে পড়বে।”
Verse 72
“आज समरांगणमें सहस्रों योद्धा मेरे छोड़े हुए हजारों बाणसमूहोंको शलभोंकी पंक्तियोंके समान देखेंगे ।।
সঞ্জয় বললেন—আজ সমরাঙ্গণে সহস্র সহস্র যোদ্ধা আমার নিক্ষিপ্ত সহস্র বাণসমূহকে শলভের সারির ন্যায় দেখবে। আজ যুদ্ধে সৈন্যেরা আমার ধনুর্ধরের বাণময় বর্ষণ প্রত্যক্ষ করবে—যেন গ্রীষ্মান্তে মেঘ বৃষ্টি ঝরায়।
Verse 73
जेष्याम्यद्य रणे पार्थ सायकैर्नतपर्वभि: । तिष्ठ ध्वं समरे शूरा भयं त्यजत फाल्गुनात्
আজ রণক্ষেত্রে আমি বাঁকা গাঁটযুক্ত বাণ দ্বারা পার্থকে জয় করব। হে বীরগণ, সমরে স্থির থাক; ফাল্গুনকে ভয় ত্যাগ কর।
Verse 74
न हि मद्वीर्यमासाद्य फाल्गुन: प्रसहिष्यति | यथा वेलां समासाद्य सागरो मकरालय:,'जैसे समुद्र तटभूमितक पहुँचकर शान्त हो जाता है, उसी प्रकार अर्जुन मेरे समीप आकर मेरा पराक्रम नहीं सह सकेंगे”
আমার বীর্য্যের সম্মুখীন হয়ে ফাল্গুন তা সহ্য করতে পারবে না; যেমন মকরালয় সাগর তটভূমিতে এসে শান্ত হয়।
Verse 75
इत्युक्त्वा प्रययौ राजा सैन्येन महता वृत: । फाल्गुनं प्रति दुर्धर्ष: क्रोधात् संरक्तलोचन:
এ কথা বলে রাজা মহাসেনায় পরিবৃত হয়ে অগ্রসর হলেন। দুর্ধর্ষ তিনি ফাল্গুনের দিকে ধাবিত হলেন; ক্রোধে তাঁর নয়ন রক্তিম।
Verse 76
ऐसा कहकर दुर्धर्ष राजा दुर्योधनने क्रोधसे लाल आँखें करके विशाल सेनाके साथ अर्जुनपर आक्रमण किया ।।
তখন মহাবাহু দুর্যোধনকে অগ্রসর হতে দেখে শারদ্বত (কৃপাচার্য) অশ্বত্থামার কাছে গিয়ে এই কথা বললেন।
Verse 77
एष राजा महाबाहुरमर्षी क्रोधमूर्च्छित: । पतज्जवृत्तिमास्थाय फाल्गुनं योद्धुमिच्छति
সঞ্জয় বললেন—এই মহাবাহু, অপমান-অসহিষ্ণু রাজা ক্রোধে আচ্ছন্ন হয়ে বিবেক হারিয়েছে। প্রদীপের শিখায় ঝাঁপ দেওয়া পতঙ্গের মতো উন্মত্ত পথে গিয়ে এখন সে ফাল্গুন (অর্জুন)-এর সঙ্গে যুদ্ধ করতে চায়।
Verse 78
यावन्न: पश्यमानानां प्राणान् पार्थेन संगतः । न जह्दात् पुरुषव्याप्रस्तावदू वारय कौरवम्
সঞ্জয় বললেন—আমাদের চোখের সামনেই সেই নরশার্দূল পার্থ (অর্জুন)-এর সঙ্গে লড়ে প্রাণ ত্যাগ করার আগেই তুমি গিয়ে ওই কৌরব রাজাকে থামাও। তাকে মৃত্যুমুখী সংঘর্ষে ঝাঁপ দিতে দিও না।
Verse 79
यावत् फाल्गुनबाणानां गोचरं नाद्य गच्छति । कौरव: पार्थिवो वीरस्तावद् वारय संयुगे,“यह कौरववंशका वीर भूपाल आज जबतक अर्जुनके बाणोंकी पहुँचके भीतर नहीं जाता है, तभीतक इसे रोक दो
সঞ্জয় বললেন—আজ যতক্ষণ না এই বীর কৌরব নৃপতি ফাল্গুন (অর্জুন)-এর বাণের নাগালের মধ্যে আসে, ততক্ষণ যুদ্ধক্ষেত্রে তাকে আটকে রাখো।
Verse 80
यावत् पार्थशरैघेरिरनिर्मुक्तोरगसंनिभै: । न भस्मीक्रियते राजा तावद् युद्धान्निवार्यताम्
সঞ্জয় বললেন—খোলস ছেড়ে বেরোনো সাপের মতো পার্থ (অর্জুন)-এর ভয়ংকর বাণে যতক্ষণ না রাজা ভস্মীভূত হয়, ততক্ষণ তাকে যুদ্ধে প্রবেশ করতে বাধা দাও।
Verse 81
अयुक्तमिव पश्यामि तिष्ठस्त्वस्मासु मानद | स्वयं युद्धाय यद् राजा पार्थ यात्यसहायवान्
সঞ্জয় বললেন—হে মানদ! আমাদের উপস্থিতিতে রাজা দুর্যোধন একা, কোনো সহায় ছাড়া, পার্থ (অর্জুন)-এর সঙ্গে যুদ্ধ করতে যাবে—এটি আমার কাছে অনুচিত বলেই মনে হয়।
Verse 82
दुर्लभ जीवितं मन्ये कौरव्यस्य किरीटिना । युध्यमानस्य पार्थेन शार्दूलेनेव हस्तिन:
আমি কৌরবপুত্র দুর্যোধনের জীবনকে দুর্লভই মনে করি; কারণ মুকুটধারী পার্থ অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধে প্রবৃত্ত হলে তার বাঁচা তেমনি অসম্ভব, যেমন ব্যাঘ্রের সঙ্গে লড়াই করা হাতির।
Verse 83
मातुलेनैवमुक्तस्तु द्रौणि: शस्त्रभूतां वर: । दुर्योधनमिदं वाक््यं त्वरित: समभाषत,मामाके ऐसा कहनेपर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणकुमार अश्वत्थामाने तुरतं ही दुर्योधनके पास जाकर इस प्रकार कहा--
মাতুলের এমন কথা শুনে অস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা তৎক্ষণাৎ দুর্যোধনের কাছে গিয়ে এই বাক্য বলল।
Verse 84
मयि जीवति गान्धारे न युद्ध गन्तुमरहसि । मामनादृत्य कौरव्य तव नित्यं हितैषिणम्,“गान्धारीनन्दन! कुरुकुलरत्न! मैं सदा तुम्हारा हित चाहनेवाला हूँ। तुम मेरे जीते-जी मेरा अनादर करके स्वयं युद्धमें न जाओ
গান্ধারীপুত্র! যতক্ষণ আমি জীবিত, ততক্ষণ তোমার যুদ্ধে যাওয়া উচিত নয়। হে কৌরব, যে সদা তোমার মঙ্গল কামনা করি, আমাকে অগ্রাহ্য করে তুমি নিজে যুদ্ধে যেয়ো না।
Verse 85
नहि ते सम्भ्रम: कार्य: पार्थस्य विजयं प्रति । अहमावारयिष्यामि पार्थ तिष्ठ सुयोधन
পার্থের উপর বিজয় বিষয়ে তোমার কোনো বিচলন বা সন্দেহ করা উচিত নয়। হে সুয়োধন, তুমি স্থির থাকো; আমি পার্থ অর্জুনকে রোধ করব।
Verse 86
दुर्योधन उवाच आचार्य: पाण्डुपुत्रान् वै पुत्रवत् परिरक्षति । त्वमप्युपेक्षां कुरुषे तेषु नित्यं द्विजोत्तम
দুর্যোধন বলল—হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! আমাদের আচার্য পাণ্ডুপুত্রদের পুত্রসম রক্ষা করেন, আর তুমিও তাদের প্রতি সর্বদা উপেক্ষাই প্রদর্শন কর।
Verse 87
मम वा मन्दभाग्यत्वान्मन्दस्ते विक्रमो युधि । धर्मराजप्रियार्थ वा द्रौपद्या वा न विद्य तत्
হয় আমার দুর্ভাগ্যের কারণেই যুদ্ধে তোমার পরাক্রম ম্লান হয়েছে; নয়তো ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির—অথবা দ্রৌপদী—কে সন্তুষ্ট করতে তুমি ইচ্ছাকৃতভাবে সংযম করছ। কোনটি সত্য, আমি বুঝতে পারছি না।
Verse 88
धिगस्तु मम लुब्धस्य यत्कृते सर्वबान्धवा: । सुखार्हा: परम॑ दु:खं प्राप्रुवन्त्यपराजिता:
ধিক্ আমার লোভকে—আমারই কারণে সুখের যোগ্য, অজেয় বলে গণ্য আমার সকল স্বজন আজ পরম দুঃখ ভোগ করছে।
Verse 89
को हि शस्त्रविदां मुख्यो महेश्वरसमो युधि । शत्रुं न क्षपयेच्छक्तो यो न स्थाद् गौतमीसुत:
অস্ত্রবিদ্যায় প্রধান, যুদ্ধে মহেশ্বরসম পরাক্রমী ও সক্ষম হয়েও যে শত্রুকে বিনাশ না করে—এমন কে হতে পারে? সে তো কৃপীপুত্র, গৌতমীর সন্তান অশ্বত্থামাই।
Verse 90
अश्वत्थामन् प्रसीदस्व नाशयैतान् ममाहितान् | तवास्त्रगोचरे शक्ता: स्थातुं देवा न दानवा:
অশ্বত্থামা, প্রসন্ন হও; আমার এই শত্রুদের বিনাশ করো। তোমার অস্ত্রের পরিসরে দেবতাও দানবও স্থির থাকতে পারে না।
Verse 91
पज्चालान् सोमकांश्चैव जहि द्रौणे सहानुगान् । वयं शेषान् हनिष्यामस्त्वयैव परिरक्षिता:
হে দ্রোণপুত্র, অনুচরসহ পাঁচাল ও সোমকদের বধ করো। তোমারই রক্ষায় আমরা অবশিষ্ট শত্রুদের সংহার করব।
Verse 92
एते हि सोमका विप्र पञ्चालाश्न यशस्विन: । मम सैन्येषु संक्रुद्धा विचरन्ति दवाग्निवत्
দুর্যোধন বলল—হে ব্রাহ্মণ! এই যশস্বী সোমক ও পাঞ্চালরা ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে দাবানলের মতো আমার সৈন্যদলে বিচরণ করছে। তাদের আক্রমণ অবিরামভাবে আমার বাহিনীকে গ্রাস করছে; অতএব এখনই তাদের রোধ করতে হবে।
Verse 93
तान् वारय महाबाहो केकयांश्व नरोत्तम । पुरा कुर्वन्ति नि:शेषं रक्ष्यमाणा: किरीटिना
দুর্যোধন বলল—হে মহাবাহু, হে নরশ্রেষ্ঠ! তাদের এবং কেকয়দেরও রোধ করো। যদি এখনই না থামানো যায়, তবে কিরীটধারী অর্জুনের আশ্রয়ে তারা আমার বাহিনীকে সম্পূর্ণ নিঃশেষ করে দেবে।
Verse 94
अभश्रृत्थामंस्त्वरायुक्तो याहि शीघ्रमरिंदम । आदी वा यदि वा पश्चात् तवेदं कर्म मारिष,शत्रुओंका दमन करनेवाले माननीय भाई अअश्वत्थामा! तुम शीघ्र ही जाओ। पहले करो या पीछे; यह कार्य तुम्हारे ही वशका है
দুর্যোধন বলল—হে শত্রুদমন অশ্বত্থামা! ত্বরিত হয়ে এখনই যাও। আগে করো বা পরে—হে মান্যবর, এই কাজ তোমারই হাতে।
Verse 95
त्वमुत्पन्नो महाबाहो पञ्चालानां वध प्रति । करिष्यसि जगत् सर्वमपाज्चालं किलोद्यत:
দুর্যোধন বলল—হে মহাবাহু! তুমি পাঞ্চালদের বধের উদ্দেশ্যেই জন্মেছ। তুমি যদি উদ্যত হও, তবে নিশ্চয়ই সমগ্র জগতকে পাঞ্চালশূন্য করে দেবে।
Verse 96
एवं सिद्धा<ब्रुवन् वाचो भविष्यति च तत् तथा । तस्मात्त्वं पुरुषव्याप्र पज्चालाञउ्जहि सानुगान्
দুর্যোধন বলল—হে পুরুষসিংহ! সিদ্ধপুরুষেরা তোমার বিষয়ে এমনই বাণী উচ্চারণ করেছেন, এবং তা ঠিক তেমনই সত্য হবে। অতএব, হে পুরুষব্যাঘ্র! অনুচরসহ পাঞ্চালদের বধ করো।
Verse 97
न ते<स्त्रगोचरे शक्ता: स्थातुं देवा: सवासवा: । किमु पार्था: सपाज्चाला: सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
তোমার অস্ত্রের পরিসরে ইন্দ্রসহ দেবতাগণও স্থির থাকতে সক্ষম নন; তবে পৃথাপুত্র পাণ্ডবেরা পাঞ্চালদের সঙ্গে কতই বা? আমি তোমাকে এ কথাই সত্য বলে বলছি।
Verse 98
मैं तुमसे यह सच कहता हूँ कि तुम्हारे बाणोंके मार्गमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी नहीं ठहर सकते; फिर कुन्तीके पुत्रों और पांचालोंकी तो बिसात ही कया है? ।।
আমি তোমাকে সত্য বলছি—তোমার বাণের পথে ইন্দ্রসহ দেবতাগণও দাঁড়াতে পারেন না; তবে কুন্তীপুত্র পাণ্ডব ও পাঞ্চালদের কী সামর্থ্য? হে বীর, সোমকসহ পাণ্ডবরাও যুদ্ধে বলপূর্বক তোমার সঙ্গে লড়াই বাধাতে সক্ষম নয়—এ কথাও আমি সত্য বলে বলছি।
Verse 99
गच्छ गच्छ महाबाहो न न: कालात्ययो भवेत् । इयं हि द्रवते सेना पार्थसायकपीडिता,महाबाहो! जाओ, जाओ। हमारे इस कार्यमें विलम्ब नहीं होना चाहिये। देखो, अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित होकर यह सेना भागी जा रही है
যাও, যাও, হে মহাবাহু—আমাদের যেন বিলম্ব না হয়। দেখো, পার্থের (অর্জুনের) শরবিদ্ধ হয়ে এই সেনা ভেঙে পালিয়ে যাচ্ছে।
Verse 100
शक्तो हासि महाबाहो दिव्येन स्वेन तेजसा । निग्रहे पाण्डुपुत्राणां पज्चालानां च मानद,दूसरोंको मान देनेवाले महाबाहु वीर! तुम अपने दिव्य तेजसे पांचालों और पाण्डवोंका निग्रह करनेमें समर्थ हो
হে মহাবাহু, মানদ বীর! তুমি তোমার নিজস্ব দিব্য তেজে পাণ্ডুপুত্রদের ও পাঞ্চালদের দমন করতে সক্ষম।
Verse 159
इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे दुर्योधनवाक्ये एकोनषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে, ঘটোৎকচবধপর্বের অন্তর্গত রাত্রিযুদ্ধ প্রসঙ্গে দুর্যোধনের বাক্যসহ একশ একষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত।
Verse 203
पर्यतिष्ठत तेजस्वी स्वबाहुबलमाश्रित: । रथियोंमें श्रेष्ठ
নিজ বাহুবলের আশ্রয়ে সেই দীপ্তিমান বীর দৃঢ় হয়ে দাঁড়াল। রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, পরাক্রমী ও তেজস্বী কর্ণও দেবগণে পরিবৃত ইন্দ্রের ন্যায় প্রধান কৌরব বীরদের দ্বারা বেষ্টিত হয়ে, নিজের বাহুবলে ভরসা করে ধনুক হাতে যুদ্ধের জন্য উঠে দাঁড়াল।
Verse 226
दृष्टवा कर्ण महाबाहुमुच्चै: शब्दमथानदन् । राजन्! यशस्वी पाण्डव और पांचालोंने महाबाहु कर्णको देखकर उच्चस्वरसे इस प्रकार कहना आस्मभ किया
মহাবাহু কর্ণকে দেখে তারা উচ্চস্বরে ধ্বনি তুলল। রাজন, যশস্বী পাণ্ডব ও পাঞ্চালরা মহাবাহু কর্ণকে দেখে উচ্চকণ্ঠে এইভাবে বলতে আরম্ভ করল।
Verse 236
युध्यस्व सहितोस्माभिवर्दुरात्मन् पुरुषाधम । “कहाँ कर्ण है? यह कर्ण है। दुरात्मन् नराधम कर्ण! इस महायुद्धमें खड़ा रह और हमारे साथ युद्ध कर”
“আমাদের সঙ্গে মিলিত হয়ে যুদ্ধ কর, দুষ্টচিত্ত, মানুষের অধম! ‘কর্ণ কোথায়?’—‘এই তো কর্ণ।’ হে দুষ্ট, নরাধম কর্ণ! এই মহাযুদ্ধে স্থির হয়ে দাঁড়া এবং আমাদের সঙ্গে যুদ্ধ কর।”
Verse 286
न विव्यथे सूतपुत्रो न च त्रासमगच्छत । उन समस्त महारथियोंको इस प्रकार धावा करते देख सूतपुत्रके मनमें न तो व्यथा हुई और न त्रास ही हुआ
সূতপুত্র না বিচলিত হল, না ভয়ে আক্রান্ত হল। সেই সকল মহারথীকে এভাবে ধেয়ে আসতে দেখে সূতপুত্রের মনে না ব্যথা জাগল, না আতঙ্ক।
Verse 303
वारयामास तत् सैन्यं समन्ताद् भरतर्षभ | भरतश्रेष्ठ! प्रलयकालके समान उस सैन्यसागरको उमड़ा हुआ देख संग्राममें पराजित न होनेवाले बलवान
হে ভরতশ্রেষ্ঠ, কর্ণ চারদিক থেকে সেই সেনাকে রোধ করল। প্রলয়কালের ন্যায় উথলে ওঠা সেই সৈন্য-সমুদ্রকে দেখে, যুদ্ধে অপরাজেয়, বলবান, দ্রুতকর্মা ও মহাশক্তিধর কর্ণ আপনার পুত্রদের আনন্দিত করতে ইচ্ছা করে বাণবৃষ্টির দ্বারা সর্বদিক থেকে শত্রুসেনাকে থামিয়ে দিল।
Verse 373
बश्रमुस्तत्र तत्रैव गाव: शीतार्दिता इव | तत्पश्चात् कर्णके बाणोंसे पीड़ित और व्याकुल हुए राजालोग सर्दीसे कष्ट पानेवाली गायोंके समान इधर-उधर चक्कर काटने लगे
সঞ্জয় বললেন—সেখানেই তারা শীতকাতর গোরুর মতো এদিক-ওদিক ঘুরে বেড়াতে লাগল। তারপর কর্ণের বাণে বিদ্ধ ও ব্যাকুল রাজারা, শীতে কষ্ট পাওয়া গাভীর ন্যায়, যুদ্ধে ভিড়ের মধ্যে যন্ত্রণা ও আতঙ্কে দিশাহারা হয়ে ঘুরপাক খেতে লাগল।
Verse 393
आस्तीर्णा वसुधा सर्वा शूराणामनिवर्तिनाम् । राजन! युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीरोंके कट-कटकर गिरे हुए मस्तकों और भुजाओंसे वहाँकी सारी भूमि सब ओरसे पट गयी थी
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, যুদ্ধে পিঠ না দেখানো অটল বীরদের কাটা মাথা ও বাহুতে সেখানে সমগ্র ভূমি চারদিকে ছেয়ে গিয়েছিল। সেই দৃশ্য স্থির বীরত্বের মূল্য এবং যুদ্ধের নির্মম সর্বগ্রাসী রূপকে প্রকাশ করছিল।
Verse 413
अश्वत्थामानमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह । उस समय राजा दुर्योधनने कर्णका पराक्रम देख अश्वत्थामाके पास पहुँचकर यह बात कही--
সঞ্জয় বললেন—অশ্বত্থামার কাছে গিয়ে সে এই কথা বলল। রণক্ষেত্রে কর্ণের পরাক্রম দেখে রাজা দুর্যোধন অশ্বত্থামার নিকট উপস্থিত হয়ে পরামর্শ ও নির্দেশের অভিপ্রায়ে তাকে সম্বোধন করল।
Verse 473
प्रत्युध्ययौ तदा कर्ण यथा वृत्रं शतक्रतुः । राजेन्द्र! उस समय वृत्रासुरपर चढ़ाई करनेवाले इन्द्रके समान पांचालोंसे घिरे हुए अर्जुनने भी कर्णपर धावा किया
সঞ্জয় বললেন—তখন কর্ণ অগ্রসর হল, যেমন শতক্রতু ইন্দ্র একদা বৃত্রের বিরুদ্ধে অগ্রসর হয়েছিলেন। হে রাজেন্দ্র, সেই সময় পাঞ্চালদের দ্বারা পরিবেষ্টিত অর্জুনও কর্ণের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল, যেন বৃত্রাসুরের প্রতি ইন্দ্রের আক্রমণ।
Verse 493
आशंसते च बीभत्सु युद्धे जेतुं सुदारुणम् । महारथी कर्ण सदा ही अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता था और युद्धमें अत्यन्त भयंकर अर्जुनको पराजित करनेका विश्वास प्रकट करता था
সঞ্জয় বললেন—সে অতিশয় ভয়ংকর যুদ্ধে ভীভৎসু (অর্জুন)কেও জয় করা সম্ভব—এমন কথাই চলতে লাগল। মহারথী কর্ণ, যিনি সর্বদা অর্জুনের সঙ্গে প্রতিদ্বন্দ্বিতা পোষণ করতেন, বারবার নিজের দৃঢ় বিশ্বাস প্রকাশ করতেন যে যুদ্ধে তিনি ভয়ংকর অর্জুনকে পরাজিত করবেন।
Verse 513
असम्भ्रान्तो रणे कर्ण: प्रत्युदीयाद् धनंजयम् । संजयने कहा--राजन्! जैसे एक हाथीको आते देख दूसरा हाथी उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! রণক্ষেত্রে কর্ণ অচঞ্চল থেকে ধনঞ্জয়ের সম্মুখে অগ্রসর হলেন। যেমন এক হাতি অন্য হাতিকে আসতে দেখে তার মোকাবিলায় এগিয়ে যায়, তেমনি পাণ্ডুপুত্র ধনঞ্জয়কে আসতে দেখে কর্ণও ভয় বা বিভ্রান্তি ছাড়াই যুদ্ধে তার সম্মুখীন হতে এগোলেন।
Verse 533
ततः कर्ण: सुसंरब्ध: शरैस्त्रिभिरविध्यत । पाए्डुपुत्र अर्जुनने पुन: अपने बाणोंके जालसे कर्णको आच्छादित कर दिया। तब क्रोधमें भरे हुए कर्णने तीन बाणोंसे अर्जुनको बींध डाला
তারপর প্রবল ক্রোধে উন্মত্ত কর্ণ তিনটি শর দিয়ে অর্জুনকে বিদ্ধ করলেন। পাণ্ডুপুত্র অর্জুন আবার নিজের শরজালে কর্ণকে আচ্ছাদিত করলেন। তখন ক্রোধে দগ্ধ কর্ণও তিনটি শর দিয়ে পুনরায় অর্জুনকে বিদ্ধ করলেন।
Verse 576
छादयामास बाणौघचै: फाल्गुनं कृतहस्तवत् । उस बाणसे घायल हुए कर्णके हाथसे धनुष छूटकर गिर पड़ा। फिर आधे निमेषमें ही उस महाबली वीरने पुनः वह धनुष लेकर सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति बाणसमूहोंकी वर्षा करके अर्जुनको ढक दिया
তখন সেই মহাবলী বীর কৃতহস্ত ধনুর্ধরের ন্যায় বাণবৃষ্টিতে ফাল্গুন (অর্জুন)-কে আচ্ছাদিত করলেন। ঐ শরাঘাতে বিদ্ধ হয়ে কর্ণের হাত থেকে ধনুক খসে পড়ল; কিন্তু অর্ধ নিমেষের মধ্যেই তিনি তা আবার তুলে নিয়ে সিদ্ধহস্তের মতো বাণসমূহ বর্ষণ করে অর্জুনকে দৃষ্টির আড়ালে ঢেকে দিলেন।
Verse 593
छादयेतां महेष्वासौ कृतप्रतिकृतैषिणौ । राजन! वे दोनों महाधनुर्धर वीर आघातका प्रतिघात करनेकी इच्छासे परस्पर बाणोंकी वर्षा करके एक-दूसरेको आच्छादित करने लगे
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! প্রতিঘাতের প্রতিঘাত দিতে উদ্যত সেই দুই মহাধনুর্ধর পরস্পরের উপর শরবৃষ্টি করে একে অপরকে আচ্ছাদিত করতে লাগলেন।
Verse 613
मुष्टिदेशे धनुस्तस्य चिच्छेद त्वरयान्वित: । तदनन्तर महाधनुर्धर अर्जुनने कर्णका पराक्रम देखकर उसके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे शीघ्रतापूर्वक काट दिया
সঞ্জয় বললেন—কর্ণের পরাক্রম দেখে মহাধনুর্ধর অর্জুন তৎক্ষণাৎ তার ধনুকটি মুষ্টিস্থানে—যেখানে হাতের মুঠো ধরে—সেখানেই কেটে দিলেন।
Verse 623
सारथेश्व शिर: कायादहरच्छत्रुतापन: । साथ ही उसके चारों घोड़ोंको चार भल्ल्लोंद्वारा यमलोक पहुँचा दिया। फिर शत्रुसंतापी अर्जुनने उसके सारथिका सिर धड़से अलग कर दिया
সঞ্জয় বললেন—শত্রুদাহক সেই বীর সারথির মস্তক দেহ থেকে ছিন্ন করল। একই সঙ্গে চারটি তীক্ষ্ণ ভল্লে চার ঘোড়াকেও যমলোকে পাঠিয়ে দিল। তারপর শত্রুসন্তাপক অর্জুন সারথির মাথা ধড় থেকে সম্পূর্ণ বিচ্ছিন্ন করে ফেলল।
Verse 643
आरुरोह रथं तूर्ण कृपस्थ शरपीडित: । जिसके घोड़े मारे गये थे, उस रथसे तुरंत उतरकर बाणपीड़ित कर्ण शीघ्रतापूर्वक कृपाचार्यके रथपर चढ़ गया
সঞ্জয় বললেন—বাণে বিদ্ধ কর্ণ, যার রথের ঘোড়াগুলি নিহত হয়েছিল, সেই রথ থেকে তৎক্ষণাৎ নেমে দ্রুত কৃপাচার্যের রথে উঠে পড়ল।
Verse 653
जीवितार्थमभिप्रेप्सु: कृपस्य रथमारुहत् । अर्जुनके बाणसमूहोंसे पीड़ित और व्याप्त होकर वह काँटोंसे भरे हुए साहीके समान जान पड़ता था। अपने प्राण बचानेके लिये कर्ण कृपाचार्यके रथपर जा बैठा था
সঞ্জয় বললেন—জীবন রক্ষার বাসনায় কর্ণ কৃপের রথে উঠল। অর্জুনের ঘন বাণবৃষ্টিতে বিদ্ধ ও আচ্ছন্ন হয়ে সে কাঁটায় ভরা সজারুর মতো দেখাচ্ছিল। প্রাণ বাঁচাতেই কর্ণ কৃপাচার্যের রথে আশ্রয় নিল।
Verse 666
धनंजयशरैनुन्ना: प्राद्रवन्त दिशो दश । भरतश्रेष्ठ! राधापुत्र कर्णको पराजित हुआ देख आपके सैनिक अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो दसों दिशाओंमें भाग चले
সঞ্জয় বললেন—ধনঞ্জয়ের বাণে আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে তারা দশ দিকেই পালিয়ে গেল। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! রাধাপুত্র কর্ণকে পরাজিত দেখে আপনার সৈন্যরা অর্জুনের শরবিদ্ধ হয়ে সর্বত্র ছত্রভঙ্গ হয়ে দৌড়ে পালাল।
Verse 3636
आत्मनामाड्कितान् घोरान् राधेय: प्राहिणोच्छरान् | राजाओंके उन बाणसमूहोंका निवारण करके महारथी राधापुत्र कर्णने उनके रथके जुओं
সঞ্জয় বললেন—তখন রাধেয় কর্ণ নিজের নামাঙ্কিত ভয়ংকর বাণ নিক্ষেপ করল। রাজাদের বাণসমূহ প্রতিহত করে সেই মহারথী তাদের রথের জোয়াল, দণ্ড, ছত্র, ধ্বজা এবং ঘোড়াগুলির উপর নিজের নাম খোদিত ভীষণ শর বর্ষণ করল।
Verse 4636
आयान्तं वीक्ष्य कौन्तेयं शक्रं दैत्यचमूमिव । तब दैत्य-सेनापर आक्रमण करनेवाले इन्द्रके समान अर्जुनको कौरव-सेनाकी ओर आते देख अभश्वत्थामा
কৌন্তেয় অর্জুনকে দানবসেনার উপর ইন্দ্রের ন্যায় ধাবমান হয়ে কৌরবসেনার দিকে আসতে দেখে কৌরবযোদ্ধারা তাঁকে ইন্দ্রসম আক্রমণকারী বলে চিনল। সূতপুত্র কর্ণকে রক্ষা করার অভিপ্রায়ে অশ্বত্থামা, কৃপ, শল্য ও মহারথী কৃতবর্মা অর্জুনের প্রতিমুখে অগ্রসর হল।
Verse 5236
छादयामास पार्थोडथ कर्णस्तु विजयं शरै: । वेगसे आते हुए वैकर्तन कर्णको अर्जुनने अपने सीधे जानेवाले बाणोंसे आच्छादित कर दिया और कर्णने भी अर्जुनको अपने बाणोंसे ढक दिया
বেগে ধেয়ে আসা বৈকর্তন কর্ণকে পার্থ অর্জুন সোজা উড়ন্ত বাণের বর্ষায় আচ্ছাদিত করলেন; আর কর্ণও পাল্টা আঘাতে অর্জুনকে নিজের বাণে ঢেকে দিলেন।
The tension lies between decisive violence as kṣatriya obligation and the ethical weight of targeting leaders and kin-linked allies; exhortations frame action as honor-debt, while the narrative simultaneously records the human costs and destabilization that follow.
The chapter illustrates that agency operates within constraints—time, visibility, collective panic, and oath-bound duty—so “right action” in crisis requires adaptability and clarity about responsibility, not merely personal valor.
No explicit phalaśruti appears; the meta-commentary is implicit in Saṃjaya’s descriptive framing, emphasizing impermanence of control in conflict and the interpretive importance of recognizing how conditions (dust, noise, fatigue, timing) govern outcomes.
Read Mahabharata in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.