
Adhyāya 51: Kṛṣṇa’s Leave-Taking and Departure for Dvārakā (द्वारकागमनानुमति)
Upa-parva: Dvārikāgamanānumati (Permission for Kṛṣṇa’s departure to Dvārakā)
Vaiśaṃpāyana narrates that Kṛṣṇa instructs Dāruka to yoke the chariot; the Pāṇḍava side also orders the retinue to prepare for travel toward Hāstinapura (Gajasāhvaya / Vāraṇasāhvaya). Kṛṣṇa and Arjuna ride together, conversing; Arjuna then delivers an extended panegyric that frames Kṛṣṇa as cosmic ground and operative intelligence behind decisive wartime outcomes (including strategic guidance and the neutralization of key adversaries). Arriving at Dhṛtarāṣṭra’s residence, both offer formal respects to Dhṛtarāṣṭra, Gāndhārī, Kuntī, Yudhiṣṭhira, Bhīma, the twins, Vidura, and the assembled women of the house, then retire. At dawn they approach Yudhiṣṭhira; Arjuna requests permission for Kṛṣṇa to go to Dvārakā to see Vasudeva, Devakī, Balarāma, and the Vṛṣṇis. Yudhiṣṭhira consents, instructs Kṛṣṇa to convey honors and remembrance, and asks him to return for the horse sacrifice. Kṛṣṇa replies with deference, declining material gifts by affirming Yudhiṣṭhira’s lordship over wealth and land, then departs in a divine chariot, accompanied and ceremonially sent off by prominent allies and citizens.
Chapter Arc: ब्रह्म-वाणी में पंचमहाभूत, मन-बुद्धि और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का रहस्य खुलता है—जैसे भीतर का सारथि इन्द्रियों को साधता है। → सृष्टि-चक्र का आवर्तन (ऋषि-प्रजापति-तत्त्वों का बार-बार उद्भव और लय) और ‘दुराप’ सत्य तक पहुँचने की कठिनता सामने आती है—पर उपाय एक ही बताया जाता है: तप और संयम। → समस्त संस्कारों का शोधन कर आत्मा को आत्मा में संयमित करने वाला साधक उस ‘शुभ ब्रह्म’ को जान लेता है, जिसके आगे फिर कुछ शेष नहीं—अनुगीता का दार्शनिक शिखर यहीं है। → कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—यदि मुझमें प्रीति है तो इस अध्यात्म को सुनकर सम्यक आचरण करो; फिर वे अपने पिता (वसुदेव) के दर्शन की इच्छा प्रकट करते हैं। अर्जुन सहमत होकर नगर चलने को कहता है और युधिष्ठिर से अनुमति लेकर अपनी पुरी जाने की योजना बनती है। → कृष्ण का पिता-दर्शन और अर्जुन का प्रस्थान—आगे नगर-गमन में कौन-सा भावनात्मक/राजनीतिक प्रसंग उभरेगा?
Verse 1
/ अपन का छा है >> >> एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: तपस्याका प्रभाव, आत्माका स्वरूप और उसके ज्ञानकी महिमा तथा अनुगीताका उपसंहार ब्रह्मोवाच भूतानामथ पज्चानां यथैषामीश्वरं मनः । नियमे च विसर्गे च भूतात्मा मन एव च,ब्रह्माजीने कहा--महर्षियो! जिस प्रकार इन पाँचों महाभूतोंकी उत्पत्ति और नियमन करनेमें मन समर्थ है, उसी प्रकार स्थितिकालमें भी मन ही भूतोंका आत्मा है
ব্রহ্মা বললেন—হে মহর্ষিগণ! যেমন এই পঞ্চ মহাভূতের উৎপত্তি ও নিয়ন্ত্রণে মনই অধীশ্বর, তেমনই তাদের স্থিতিকালেও মনই ভূতসমূহের আত্মা বলে কথিত।
Verse 2
अधिष्ठाता मनो नित्यं भूतानां महतां तथा । बुद्धिरैश्वर्यमाचष्टे क्षेत्रज्ञक्ष स उच्यते,उन पज्चमहाभूतोंका नित्य आधार भी मन ही है। बुद्धि जिसके ऐश्वर्यको प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है
মহাভূতসহ সকল ভূতের নিত্য অধিষ্ঠাতা মনই। যে তত্ত্বে বুদ্ধি ঐশ্বর্য ও কর্তৃত্ব প্রকাশ করে, তাকেই ক্ষেত্রজ্ঞ বলা হয়।
Verse 3
इन्द्रियाणि मनो युड्धक्ते सदश्चानिव सारथि: । इन्द्रियाणि मनो बुद्धि: क्षेत्रज्ञे युज्यते सदा,जैसे सारथि अच्छे घोड़ोंको अपने काबूमें रखता है, उसी प्रकार मन सम्पूर्ण इन्द्रियोंपर शासन करता है। इन्द्रिय, मन और बुद्धि--ये सदा क्षेत्रज्ञके साथ संयुक्त रहते हैं
যেমন দক্ষ সারথি উত্তম অশ্বদের বশে রাখে, তেমনই মন সমস্ত ইন্দ্রিয়কে নিয়ন্ত্রণ করে। ইন্দ্রিয়, মন ও বুদ্ধি—এরা সর্বদা ক্ষেত্রজ্ঞের সঙ্গে যুক্ত থাকে।
Verse 4
महदश्वसमायुक्तं बुद्धिसंयमनं रथम् | समारुह् स भूतात्मा समन्तात् परिधावति,जिसमें इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हुए हैं, जिसका बुद्धिरूपी सारथिके द्वारा नियन्त्रण हो रहा है, उस देहरूपी रथपर सवार होकर वह भूतात्मा (क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ लगाता रहता है
যে দেহরূপ রথে ইন্দ্রিয়রূপ অশ্ব যুক্ত, আর বুদ্ধিরূপ সংযম-রজ্জু দ্বারা যা নিয়ন্ত্রিত—তাতে আরূঢ় হয়ে সেই ভূতাত্মা (ক্ষেত্রজ্ঞ) চারিদিকে বিচরণ করে।
Verse 5
इन्द्रियग्रामसंयुक्तो मनःसारथिरेव च | बुद्धिसंयमनो नित्यं महान् ब्रह्ममयो रथ:,ब्रह्ममय रथ सदा रहनेवाला और महान है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथि और बुद्धि चाबुक है
এই মহান ব্রহ্মময় রথ নিত্য। ইন্দ্রিয়সমূহ তার অশ্ব, মন তার সারথি, আর বুদ্ধি—যে সদা সংযম করে—তার রজ্জু/চাবুক।
Verse 6
एवं यो वेत्ति विद्वान् वै सदा ब्रह्ममयं रथम् | स धीर: सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति,इस प्रकार जो विद्वान् इस ब्रह्ममय रथकी सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियोंमें धीर है और कभी मोहमें नहीं पड़ता
যে বিদ্বান এই ব্রহ্মময় রথকে সর্বদা এইরূপে জানে, সে সকল জীবের প্রতি ধীর থাকে এবং কখনও মোহে পতিত হয় না।
Verse 7
अव्यक्तादि विशेषान्तं सहस्थावरजड्रमम् । सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम्,यह जगत् एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन--इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है
বায়ু বললেন—এই জগৎ এক ব্রহ্মবন। অব্যক্ত প্রকৃতি এর আদিস্বরূপ, আর এর বিস্তার পৌঁছায় ষোলো বিশেষ পর্যন্ত—পঞ্চ মহাভূত, দশ ইন্দ্রিয় ও এক মন। এটি স্থাবর-জঙ্গম প্রাণীতে পরিপূর্ণ। সূর্য-চন্দ্রের জ্যোতিতে আলোকিত, গ্রহ-নক্ষত্রে মণ্ডিত, নদী ও পর্বতমালায় সর্বদিকে শোভিত। নানা প্রকার জলে এটি সদা অলংকৃত। এটাই সকল ভূতের জীবন এবং সকল প্রাণীর গতি। এই ব্রহ্মবনে ক্ষেত্রজ্ঞ বিচরণ করে।
Verse 8
नदीपर्वतजालै श्व सर्वतः परिभूषितम् । विविधाभिस्तथा चाद्धिः सततं समलंकृतम्,यह जगत् एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन--इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है
বায়ুদেব বললেন— “এই সমগ্র জগৎ একটিই ব্রহ্মবন। এর আদিসূত্র অব্যক্ত প্রকৃতি। পঞ্চ মহাভূত, দশ ইন্দ্রিয় এবং এক মন—এই ষোলো বিশেষ তত্ত্বে এর বিস্তার। এটি চরাচর প্রাণীতে পরিপূর্ণ; সূর্য-চন্দ্র প্রভৃতির আলোয় আলোকিত; গ্রহ ও নক্ষত্রে শোভিত; নদী ও পর্বতশ্রেণির জালে সর্বদিকে বিভূষিত; এবং নানাবিধ জলে সদা অলংকৃত। এটাই সকল ভূতের জীবন এবং সকল প্রাণীর গতি। এই ব্রহ্মবনে ক্ষেত্রজ্ঞ বিচরণ করেন।”
Verse 9
आजीवं सर्वभूतानां सर्वप्राणभूतां गति: । एतद् ब्रह्मवनं नित्यं तस्समिं श्वरति क्षेत्रवित्,यह जगत् एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन--इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है
বায়ুদেব বললেন— “এটাই সকল ভূতের জীবিকা এবং সকল প্রাণীর পরম গতি। এই নিত্য জগৎই ‘ব্রহ্মবন’; এর মধ্যে ক্ষেত্রবিদ্/ক্ষেত্রজ্ঞ (চেতন আত্মা) বিচরণ করেন।”
Verse 10
लोके5स्मिन् यानि सत्त्वानि त्रसानि स्थावराणि च । तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद् भूतकृता गुणा: । गुणेभ्य: पञचभूतानि एष भूतसमुच्छूय:,इस लोकमें जो स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे ही पहले प्रकृतिमें विलीन होते हैं, उसके बाद पाँच भूतोंके कार्य लीन होते हैं और कार्यरूप गुणोंके बाद पाँच भूत लीन होते हैं। इस प्रकार यह भूतसमुदाय प्रकृतिमें लीन होता है
বায়ুদেব বললেন— “এই লোকের যত সত্ত্ব—জঙ্গম ও স্থাবর—তারা প্রথমে প্রকৃতিতেই লীন হয়। তারপর পঞ্চভূতজাত কার্যরূপ গুণসমূহ লীন হয়; আর সেই গুণগুলির লয়ের পরে পঞ্চ মহাভূতও লীন হয়ে যায়। এইভাবে সমগ্র ভূতসমষ্টি প্রকৃতিতে বিলীন হয়।”
Verse 11
देवा मनुष्या गन्धर्वा: पिशाचासुरराक्षसा: । सर्वे स्वभावत: सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात्,देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर, राक्षस सभी स्वभावसे रचे गये हैं; किसी क्रियासे या कारणसे इनकी रचना नहीं हुई है
বায়ু বললেন— “দেবতা, মানুষ, গন্ধর্ব, পিশাচ, অসুর ও রাক্ষস—সকলেই নিজ নিজ স্বভাব অনুসারে সৃষ্ট। কোনো বিশেষ ক্রিয়া থেকে নয়, কোনো বাহ্য কারণ থেকেও নয়—তাদের উৎপত্তি।”
Verse 12
एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुन: पुनः । तेभ्य: प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पडचसु । प्रलीयन्ते यथाकालमूर्मय: सागरे यथा,विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये मरीचि आदि ब्राह्मण समुद्रकी लहरोंके समान बारंबार पञ्चमहाभूतोंसे उत्पन्न होते हैं। और उत्पन्न हुए वे फिर समयानुसार उन्हींमें लीन हो जाते हैं
বায়ু বললেন— “বিশ্বসৃষ্টিকারী এই বিপ্র ঋষিগণ—মরীচি প্রভৃতি—এখানে বারবার জন্ম নেন। পঞ্চ মহাভূত থেকে উৎপন্ন হয়ে, সময় এলে তাঁরা সেই পঞ্চ মহাভূতেই লীন হন—যেমন সাগরে তরঙ্গ ওঠে এবং কালে কালে সাগরেই মিলিয়ে যায়।”
Verse 13
विश्वसृग्भ्यस्तु भूते भ्यो महा भूतास्तु सर्वश: । भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत् परां गतिम्,इस विश्वकी रचना करनेवाले प्राणियोंसे पडच महाभूत सब प्रकार पर है। जो इन पठ्च महाभूतोंसे छूट जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है
বিশ্বসৃষ্টিকারী প্রাণীদের থেকেই সর্বপ্রকারে মহাভূতসমূহ উদ্ভূত হয়। আর যে সেই পাঁচ মহাভূতের বন্ধন থেকেও মুক্ত হয়, সে পরম গতি লাভ করে।
Verse 14
प्रजापतिरिदं सर्व मनसैवासृजत् प्रभु: । तथैव देवानूषयस्तपसा प्रतिपेदिरे,शक्तिसम्पन्न प्रजापतिने अपने मनके ही द्वारा सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है तथा ऋषि भी तपस्यासे ही देवत्वको प्राप्त हुए हैं
সমর্থ প্রভু প্রজাপতি কেবল মন দিয়েই এই সমগ্র জগত সৃষ্টি করেছিলেন। তদ্রূপ ঋষিরাও তপস্যার দ্বারা দেবত্ব লাভ করেছিলেন।
Verse 15
तपसश्चानुपूव्येंण फलमूलाशिनस्तथा । त्रैलोक्यं तपसा सिद्धा: पश्यन्तीह समाहिता:,फल-मूलका भोजन करनेवाले सिद्ध महात्मा यहाँ तपस्याके प्रभावसे ही चित्तको एकाग्र करके तीनों लोकोंकी बातोंको क्रमश: प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं
তপস্যার ক্রমবর্ধমান সাধনায় এবং ফল-মূল আহার করে, তপস্যায় সিদ্ধ মহাত্মারা এখানে মন একাগ্র করে ত্রিলোককে ক্রমান্বয়ে প্রত্যক্ষ দর্শন করেন।
Verse 16
ओऔषधान्यगदादीनि नानाविद्याशक्ष सर्वश: । तपसैव प्रसिद्धयन्ति तपोमूलं हि साधनम्,आरोग्यकी साधनभूत ओषधियाँ और नाना प्रकारकी विद्याएँ तपसे ही सिद्ध होती हैं। सारे साधनोंकी जड़ तपस्या ही है
আরোগ্যের উপায়রূপ ঔষধ, অগদ প্রভৃতি এবং নানাবিধ বিদ্যা—সবই তপস্যার দ্বারাই প্রসিদ্ধি ও সিদ্ধি লাভ করে; কারণ সকল সাধনের মূল তপই।
Verse 17
यददुरापं दुराम्नायं दुराधर्ष दुरन्वयम् | तत् सर्व तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्,जिसको पाना, जिसका अभ्यास करना, जिसे दबाना और जिसकी संगति लगाना नितान्त कठिन है, वह तपस्याके द्वारा साध्य हो जाता है; क्योंकि तपका प्रभाव दुर्लड्घ्य है
যা অত্যন্ত দুর্লভ, যা শিক্ষায় ও অভ্যাসে দুরূহ, যা দমন করা কঠিন এবং যার সঙ্গে সঙ্গতি স্থাপনও কঠিন—সে সবই তপস্যায় সাধ্য হয়; কারণ তপের শক্তি অতিক্রম করা দুরূহ।
Verse 18
सुरापो ब्रह्महा स्तेयी भ्रूणहा गुरुतल्पग: । तपसैव सुतप्तेन मुच्यते किल्बिषात् ततः,शराबी, ब्रह्महत्यारा, चोर, गर्भ नष्ट करनेवाला और गुरुपत्नीकी शय्यापर सोनेवाला महापापी भी भलीभाँति तपस्या करके ही उस महान् पापसे छुटकारा पा सकता है
বায়ু বললেন—মদ্যপ, ব্রাহ্মণহন্তা, চোর, ভ্রূণনাশক এবং গুরুর শয্যা লঙ্ঘনকারী—এমন মহাপাপীও যদি সত্য ও তীব্র তপস্যা করে, তবে কেবল তপস্যার দ্বারাই সেই পাপভার থেকে মুক্ত হয়।
Verse 19
मनुष्या: पितरो देवा: पशवो मृगपक्षिण: । यानि चान्यानि भूतानि त्रसानि स्थावराणि च
বায়ু বললেন—মানুষ, পিতৃগণ, দেবগণ, গৃহপশু, বন্যপশু ও পক্ষী—এবং অন্যান্য যত জীব আছে, চলমান ও অচল।
Verse 20
तपः:परायणा नित्यं सिद्धयन्ते तपसा सदा । तथैव तपसा देवा महामाया दिवं गता:
বায়ু বললেন—যারা সদা তপস্যায় নিবিষ্ট, তারা সর্বদা তপস্যার দ্বারাই সিদ্ধি লাভ করে। তেমনি তপস্যার বলেই মহামায়াবান দেবগণ স্বর্গে গমন করেছেন।
Verse 21
मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने चराचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्यामें संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं। तपस्याके बलसे ही महामायावी देवता स्वर्गमें निवास करते हैं ।। आशीर्युक्तानि कर्माणि कुर्वते ये त्वतन्द्रिता: । अहंकारसमायुक्तास्ते सकाशे प्रजापते:,जो लोग आलस्य त्यागकर अहंकारसे युक्त हो सकाम कर्मका अनुष्ठान करते हैं, वे प्रजापतिके लोकमें जाते हैं
বায়ু বললেন—মানুষ, পিতৃগণ, দেবগণ, পশু, মৃগ, পক্ষী এবং অন্যান্য যত চলমান-অচল প্রাণী আছে—তারা সকলেই নিত্য তপস্যায় রত হয়ে তপস্যার দ্বারাই সর্বদা সিদ্ধি লাভ করে। তপস্যার বলেই মহামায়াবান দেবগণ স্বর্গে বাস করেন। কিন্তু যারা অলসতা ত্যাগ করে, আশীর্বাদযুক্ত কাম্যকর্ম সম্পাদন করেও অহংকারে আবদ্ধ থাকে, তারা প্রজাপতির লোক প্রাপ্ত হয়।
Verse 22
ध्यानयोगेन शुद्धेन निर्ममा निरहंकृता: । आप्नुवन्ति महात्मानो महान्तं लोकमुत्तमम्,जो अहंता-ममतासे रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यानयोगके द्वारा महान् उत्तम लोकको प्राप्त करते हैं
বায়ুদেব বললেন—যে মহাত্মারা বিশুদ্ধ ধ্যানযোগে পরিশুদ্ধ হয়ে, মমতা-রহিত ও অহংকারশূন্য হন, তারা মহান ও সর্বোত্তম লোক প্রাপ্ত হন।
Verse 23
ध्यानयोगमुपागम्य प्रसन्नमतय: सदा । सुखोपचयमव्यक्तं प्रविशन्त्यात्मवित्तमा:,जो ध्यानयोगका आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुष सुखकी राशिभूत अव्यक्त परमात्मामें प्रवेश करते हैं
যাঁরা ধ্যানযোগের আশ্রয় নিয়ে সর্বদা প্রসন্নচিত্ত থাকেন, আত্মজ্ঞদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই মহাপুরুষেরা আনন্দের ভাণ্ডারস্বরূপ অব্যক্ত পরমাত্মায় প্রবেশ করেন।
Verse 24
ध्यानयोगमादुपागम्य निर्ममा निरहंकृता: । अव्यक्तं प्रविशन््तीह महतां लोकमुत्तमम्,किंतु जो ध्यानयोगसे पीछे लौटकर अर्थात् ध्यानमें असफल होकर ममता और अहंकारसे रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषोंके उत्तम अव्यक्त लोकमें लीन होता है
কিন্তু যে ধ্যানযোগ থেকে ফিরে আসে—অর্থাৎ ধ্যানে সিদ্ধি না পেলেও—মমতা ও অহংকারহীন জীবন যাপন করে, সেই নিষ্কাম পুরুষও মহাপুরুষদের উত্তম অব্যক্ত লোকেই লীন হয়।
Verse 25
अव्यक्तादेव सम्भूत: समसंज्ञां गत: पुन: । तमोरजो भ्यां निर्मुक्त: सत्त्वमास्थाय केवलम्,फिर स्वयं भी उसकी समताको प्राप्त होकर अव्यक्तसे ही प्रकट होता है और केवल सत्त्वका आश्रय लेकर तमोगुण एवं रजोगुणके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है
সে অব্যক্ত থেকেই উদ্ভূত হয়ে পুনরায় সমতার অবস্থায় উপনীত হয়; তমস ও রজস—এই দুই বন্ধন থেকে মুক্ত হয়ে কেবল সত্ত্বের আশ্রয় গ্রহণ করে।
Verse 26
निर्मुक्त: सर्वपापेभ्य: सर्व सृजति निष्कलम् | क्षेत्रज्ञ इति तं विद्याद् यस्तं वेद स वेदवित्
যিনি সকল পাপ থেকে মুক্ত হয়ে, নিজে নিষ্কলঙ্ক থেকে সকল সৃষ্টিকে প্রকাশ করেন—তাঁকেই ‘ক্ষেত্রজ্ঞ’ বলে জানবে; যিনি তাঁকে সত্যরূপে জানেন, তিনিই বেদজ্ঞ।
Verse 27
जो सब पापोंसे मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्माको क्षेत्रज्ञ समझना चाहिये। जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवेत्ता है ।। चित्तं चित्तादुपागम्य मुनिरासीत संयत: । यच्चित्तं तन््मयो वश्यं गुह्ममेतत् सनातनम्,मुनिको उचित है कि चिन्तनके द्वारा चेतना (सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियोंको एकाग्र करके परमात्माके ध्यानमें स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है--यह सनातन गोपनीय रहस्य है
চিত্তকে চিত্তেরই উৎসে ফিরিয়ে এনে মুনি সংযত হয়ে স্থিত থাকুন; কারণ চিত্ত যাহাতে নিবিষ্ট হয়, সে নিশ্চিতই তদ্রূপ হয়ে যায়—এ এক সনাতন গূঢ় রহস্য।
Verse 28
अव्यक्तादिविशेषान्तमविद्यालक्षणं स्मृतम् । निबोधत तथा हीदं गुणैर्लक्षणमित्युत,अव्यक्तसे लेकर सोलह विशेषोंतक सभी अविद्याके लक्षण बताये गये हैं। ऐसा समझना चाहिये कि यह गुणोंका ही विस्तार है
অব্যক্ত থেকে ষোলো ‘বিশেষ’ পর্যন্ত—এটাই অবিদ্যার লক্ষণ বলে স্মৃতিতে বলা হয়েছে। আর বুঝে নাও, এখানে যা বলা হচ্ছে তা আসলে গুণসমূহের লক্ষণেই চিহ্নিত—তাদেরই বিস্তার ও প্রকাশ।
Verse 29
द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्रयक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्,दो अक्षरका पद “मम” (यह मेरा है--ऐसा भाव) मृत्युरूप है और तीन अक्षरका पद “न मम' (यह मेरा नहीं है--ऐसा भाव) सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है
দুই অক্ষরের ‘মম’ (এটা আমার) মৃত্যু-স্বরূপ; আর তিন অক্ষরের ‘ন মম’ (এটা আমার নয়) শাশ্বত ব্রহ্ম। ‘আমার’ বললে মৃত্যু; ‘আমার নয়’ বললে চিরন্তন।
Verse 30
कर्म केचित् प्रशंसन्ति मन्दबुद्धिरता नरा: । ये तु वृद्धा महात्मानो न प्रशंसन्ति कर्म ते,कुछ मन्द-बुद्धियुक्त पुरुष (स्वर्गादि फल प्रदान करनेवाले) काम्य-कर्मोंकी प्रशंसा करते हैं, किंतु वृद्ध महात्माजन उन कर्मोंको उत्तम नहीं बतलाते
কিছু মানুষ মন্দবুদ্ধিতে আসক্ত হয়ে কর্মের প্রশংসা করে; কিন্তু যাঁরা বৃদ্ধ মহাত্মা, তাঁরা সেই কর্মকে শ্রেষ্ঠ বলে মানেন না।
Verse 31
कर्मणा जायते जन्तुर्मूर्तिमान्ू षोडशात्मक: । पुरुषं ग्रसते5विद्या तद् ग्राह्मममृताशिनाम्,क्योंकि सकाम कर्मके अनुष्ठानसे जीवको सोलह विकारोंसे निर्मित स्थूल शरीर धारण करके जन्म लेना पड़ता है और वह सदा अविद्याका ग्रास बना रहता है। इतना ही नहीं, कर्मठ पुरुष देवताओंके भी उपभोगका विषय होता है
কর্মের দ্বারা জীব জন্ম গ্রহণ করে এবং ষোলো তত্ত্বে গঠিত স্থূল দেহ ধারণ করে। অবিদ্যা পুরুষকে গ্রাস করে; আর সে অমৃতভোজী দেবতাদের কাছেও ‘গ্রাহ্য’—অর্থাৎ অধীন—হয়ে পড়ে।
Verse 32
तस्मात् कर्मसु निःस्नेहा ये केचित् पारदर्शिन: । विद्यामयो<यं पुरुषो न तु कर्ममय: स्मृत:,इसलिये जो कोई पारदर्शी विद्वान होते हैं, वे कर्मोमें आसक्त नहीं होते; क्योंकि यह पुरुष (आत्मा) ज्ञानमय है, कर्ममय नहीं
অতএব যাঁরা পারদর্শী জ্ঞানী, তাঁরা কর্মে আসক্ত হন না; কারণ এই পুরুষ (আত্মা) বিদ্যাময়—কর্মময় নয়—বলে স্মৃত।
Verse 33
य एवममृतं नित्यमग्राहां शश्वदक्षरम् । वश्यात्मानमसंश्लटिष्टं यो वेद न मृतो भवेत्,जो इस प्रकार चेतन आत्माको अमृतस्वरूप, नित्य, इन्द्रियातीत, सनातन, अक्षर, जितात्मा एवं असंग समझता है, वह कभी मृत्युके बन्धनमें नहीं पड़ता
বায়ু বললেন—যে এইভাবে চেতন আত্মাকে অমৃত, নিত্য, ইন্দ্রিয়াতীত, শাশ্বত ও অক্ষয়; সংযতাত্মা এবং অসঙ্গ বলে জানে, সে মৃত্যুর বন্ধনে পতিত হয় না।
Verse 34
अपूर्वमकृतं नित्यं य एनमविचारिणम् | य एवं विन्देदात्मानमग्राह्मममृताशनम् । अग्राह्मोड्मृतो भवति स एशभि: कारणैर्ध्ुव:,जिसकी दृष्टिमें आत्मा अपूर्व (अनादि), अकृत (अजन्मा), नित्य, अचल, अग्राह्म और अमृताशी है, वह इन गुणोंका चिन्तन करनेसे स्वयं भी अग्राह्म (इन्द्रियातीत), निश्चल एवं अमृतस्वरूप हो जाता है
বায়ু বললেন—যার দৃষ্টিতে আত্মা অপূর্ব (অনাদি), অকৃত (অজন্মা), নিত্য, অচল, অগ্রাহ্য এবং অমৃতাশী—সে এই গুণগুলির ধ্যান দ্বারা নিজেও ইন্দ্রিয়াতীত, স্থির ও অমৃতস্বভাবে প্রতিষ্ঠিত হয়।
Verse 35
आयोज्य सर्वसंस्कारान् संयम्यात्मानमात्मनि | स तद् ब्रह्म शुभं वेत्ति यस्माद् भूयो न विद्यते,जो चित्तको शुद्ध करनेवाले सम्पूर्ण संस्कारोंका सम्पादन करके मनको आत्माके ध्यानमें लगा देता है, वही उस कल्याणमय ब्रह्मको प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है
যে চিত্তশুদ্ধিকারী সকল সংস্কার সম্পন্ন করে মনকে আত্মার মধ্যে সংযত করে, সেই-ই সেই কল্যাণময় ব্রহ্মকে জানে—যার ঊর্ধ্বে আর কিছু নেই।
Verse 36
प्रसादे चैव सत्त्वस्य प्रसादं समवाप्नुयात् लक्षणं हि प्रसादस्य यथा स्यात् स्वप्नदर्शनम्,सम्पूर्ण अन्त:करणके स्वच्छ हो जानेपर साधकको शुद्ध प्रसन्नता प्राप्त होती है। जैसे स्वप्नसे जगे हुए मनुष्यके लिये स्वप्न शान्त हो जाता है, उसी प्रकार चित्तशुद्धिका लक्षण है
বায়ু বললেন—অন্তঃকরণ নির্মল হলে সাধক নির্মল প্রসন্নতা লাভ করে। প্রসাদের লক্ষণ এই যে, জাগ্রত মানুষের কাছে যেমন স্বপ্নদর্শন শান্ত হয়ে যায়, তেমনই চিত্তশুদ্ধির চিহ্ন হলো স্বচ্ছ, অবিচল আনন্দ।
Verse 37
गतिरेषा तु मुक्तानां ये ज्ञानपरिनिषछिता: । प्रवृत्तयश्न या: सर्वा: पश्यन्ति परिणामजा:,ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त महात्माओंकी यही परम गति है; क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियोंको शुभाशुभ फल देनेवाली समझते हैं
বায়ু বললেন—যাঁরা জ্ঞানে সুপ্রতিষ্ঠিত মুক্ত মহাত্মা, তাঁদের এটাই পরম গতি; কারণ তাঁরা সকল প্রবৃত্তিকে পরিণামজাত বলে দেখেন এবং শুভ-অশুভ ফলদায়িনী জেনে অন্তরে মুক্ত থাকেন।
Verse 38
एषा गतिर्विरक्तानामेष धर्म: सनातन: । एषा ज्ञानवतां प्राप्तिरेतद् वृत्तमनिन्दितम्,यही विरक्त पुरुषोंकी गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियोंका प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है
এটাই বৈরাগ্যবানদের গতি; এটাই সনাতন ধর্ম। এটাই জ্ঞানীদের কাম্য প্রাপ্তি, এবং এটাই নির্দোষ সদাচার।
Verse 39
समेन सर्वभूतेषु निःस्प्हेण निराशिषा | शक््या गतिरियं गन्तुं सर्वत्र समदर्शिना,जो सम्पूर्ण भूतोंमें समानभाव रखता है, लोभ और कामनासे रहित है तथा जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि रहती है, वह ज्ञानी पुरुष ही इस परम गतिको प्राप्त कर सकता है
যে সকল প্রাণীর প্রতি সমভাব রাখে, যে নিঃস্পৃহ ও নিরাশী, এবং সর্বত্র সমদৃষ্টি—সেই জ্ঞানী পুরুষই এই পরম গতি লাভ করতে পারে।
Verse 40
एतद् व: सर्वमाख्यातं मया विप्रर्षिसत्तमा: । एवमाचरत क्षिप्रं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ,ब्रह्मर्षिपो! यह सब विषय मैंने विस्तारके साथ तुम लोगोंको बता दिया। इसीके अनुसार आचरण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी
হে ব্রাহ্মণ ঋষিদের শ্রেষ্ঠগণ! আমি তোমাদের কাছে এ সবই সম্পূর্ণভাবে বলেছি। এখন এইরূপেই শীঘ্র আচরণ কর; তবেই তোমরা সিদ্ধি লাভ করবে।
Verse 41
गुरुउ्वाच इत्युक्तास्ते तु मुनयो गुरुणा ब्रह्मणा तथा । कृतवन्तो महात्मानस्ततो लोकमवाप्नुवन्,गुरुने कहा--बेटा! ब्रह्माजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर उन महात्मा मुनियोंने इसीके अनुसार आचरण किया। इससे उन्हें उत्तम लोककी प्राप्ति हुई
গুরু ব্রহ্মা এইভাবে বললে, সেই মহাত্মা মুনিগণ ঠিক তদনুসারে আচরণ করলেন; এবং তাতে তাঁরা উত্তম লোক লাভ করলেন।
Verse 42
त्वमप्येतनन््महा भाग मयोक्तं ब्रह्मणो वच: । सम्यगाचर शुद्धात्मंस्तत: सिद्धिमवाप्स्यसि,महाभाग! तुम्हारा चित्त शुद्ध है, इसलिये तुम भी मेरे बताये हुए ब्रह्माजीके उत्तम उपदेशका भलीभाँति पालन करो। इससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त होगी
হে মহাভাগ! তোমার অন্তঃকরণ শুদ্ধ; অতএব আমার দ্বারা বর্ণিত ব্রহ্মার এই উপদেশ যথাযথভাবে পালন কর। তবেই তুমিও সিদ্ধি লাভ করবে।
Verse 43
वायुदेव उवाच इत्युक्त: स तदा शिष्यो गुरुणा धर्ममुत्तमम् । चकार सर्व कौन्तेय ततो मोक्षमवाप्तवान्,श्रीकृष्णने कहा--अर्जुन! गुरुदेवके ऐसा कहनेपर उस शिष्यने समस्त उत्तम धर्मोंका पालन किया। इससे वह संसार-बन्धनसे मुक्त हो गया
বায়ুদেব বললেন—গুরুর উপদেশ পেয়ে সেই শিষ্য তখন সর্বোচ্চ ধর্ম সম্পূর্ণভাবে আচরণ করল। অতএব, হে কুন্তীপুত্র, সে সংসারবন্ধন থেকে মুক্ত হয়ে মোক্ষ লাভ করল।
Verse 44
कृतकृत्यश्न स तदा शिष्य: कुरुकुलोदवह । तत् पद समनुप्राप्तो यत्र गत्वा न शोचति,कुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्यने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता
বায়ুদেব বললেন—হে কুরুবংশের শ্রেষ্ঠ, সেই শিষ্য তখন কৃতকৃত্য হয়ে পরম পদ, ব্রহ্মপদ লাভ করল; যেখানে গিয়ে আর শোক থাকে না।
Verse 45
अर्जुन उवाच को न्वसौ ब्राह्मण: कृष्ण कश्च शिष्यो जनार्दन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तत्त्वमाचक्ष्व मे विभो,अर्जुनने पूछा--जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन थे? प्रभो! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये
অর্জুন বললেন—হে কৃষ্ণ, হে জনার্দন, সেই ব্রাহ্মণ গুরু কে ছিলেন, আর শিষ্যই বা কে? প্রভু, যদি এই তত্ত্ব আমার শোনার যোগ্য হয়, তবে দয়া করে স্পষ্ট করে বলুন।
Verse 46
वायुदेव उवाच अहं गुरुर्महाबाहो मन: शिष्यं च विद्धि मे । त्वत्प्रीत्या गुह्ममेतच्च कथितं ते धनंजय,श्रीकृष्णने कहा--महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मनको ही शिष्य समझो। धनंजय! तुम्हारे स्नेहवश मैंने इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है
বায়ুদেব বললেন—হে মহাবাহু, আমিই গুরু; আর আমার মনকেই শিষ্য বলে জেনো। হে ধনঞ্জয়, তোমার প্রতি স্নেহবশতই এই গোপন রহস্য তোমাকে বললাম।
Verse 47
मयि चेदस्ति ते प्रीतिर्नित्यं कुरुकुलोद्वह । अध्यात्ममेतच्छुत्वा त्वं सम्यगाचर सुव्रत,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुकुलनन्दन! यदि मुझपर तुम्हारा प्रेम हो तो इस अध्यात्मज्ञानको सुनकर तुम नित्य इसका यथावत् पालन करो
বায়ুদেব বললেন—হে কুরুবংশের শ্রেষ্ঠ, যদি আমার প্রতি তোমার নিত্য প্রেম ও শ্রদ্ধা থাকে, তবে এই অধ্যাত্মতত্ত্ব শুনে তুমি সুদৃঢ় ব্রতধারীর মতো যথাযথ ও নিরন্তর আচরণ করো।
Verse 48
ततस्त्वं सम्यगाचीर्णे धर्मेडस्मिन्नरिकर्षण । सर्वपापविनिर्मुक्तो मोक्ष प्राप्स्पसि केवलम्,शत्रुदमन! इस धर्मका पूर्णतया आचरण करनेपर तुम समस्त पापोंसे छूटकर विशुद्ध मोक्षको प्राप्त कर लोगे
তখন, হে শত্রুদমন! এই ধর্ম যথাযথ ও সম্পূর্ণভাবে আচরণ করলে তুমি সকল পাপ থেকে মুক্ত হয়ে কেবল নির্মল মোক্ষ লাভ করবে।
Verse 49
पूर्वमप्येतदेवोक्त युद्धकाल उपस्थिते । मया तव महाबाहो तस्मादत्र मन: कुरु,महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होनेपर यही उपदेश तुमको सुनाया था। इसलिये तुम इसमें मन लगाओ
হে মহাবাহু! যুদ্ধের সময় উপস্থিত হলে আমি পূর্বেও এই একই উপদেশ তোমাকে বলেছিলাম; অতএব এখন এই শিক্ষায় মন স্থির করো।
Verse 50
मया तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्ट: पिता प्रभु: । तमहं द्रष्टमेच्छामि सम्मते तव फाल्गुन,भरतश्रेष्ठ अर्जुन! अब मैं पिताजीका दर्शन करना चाहता हूँ। उन्हें देखे बहुत दिन हो गये। यदि तुम्हारी राय हो तो मैं उनके दर्शनके लिये द्वारका जाऊँ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ ফাল্গুন (অর্জুন)! বহুদিন আমার প্রভু পিতার দর্শন পাইনি; আমি তাঁকে দেখতে চাই। যদি তোমার সম্মতি থাকে, তবে আমি দ্বারকায় গিয়ে তাঁর দর্শন করব।
Verse 51
वैशम्पायन उवाच इत्युक्तवचन कृष्णं प्रत्युवाच धनंजय: । गच्छावो नगरं कृष्ण गजसाह्दयमद्य वै,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने कहा --'श्रीकृष्ण! अब हमलोग यहाँसे हस्तिनापुरको चलें। वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरसे मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरीको पधारें" इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे एकपज्चाशत्तमो5ध्याय:
বৈশম্পায়ন বললেন—কৃষ্ণের এই কথা শুনে ধনঞ্জয় (অর্জুন) উত্তর দিলেন—“হে কৃষ্ণ! আজই আমরা গজসাহ্বয় (হস্তিনাপুর) নগরে যাই। সেখানে ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠিরের সঙ্গে সাক্ষাৎ করে তাঁর অনুমতি নিয়ে আপনি আপনার নগরীতে গমন করুন।”
Verse 52
समेत्य तत्र राजानं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् । समनुज्ञाप्य राजान स्वां पुरी यातुमहसि,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी बात सुनकर अर्जुनने कहा --'श्रीकृष्ण! अब हमलोग यहाँसे हस्तिनापुरको चलें। वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरसे मिलकर और उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरीको पधारें"
সেখানে গিয়ে ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠিরের সঙ্গে সাক্ষাৎ করে, তাঁর অনুমতি নিয়ে তারপর তোমার নিজ নগরীতে গমন করাই তোমার পক্ষে যথোচিত।
The chapter balances personal devotion and gratitude toward Kṛṣṇa with institutional dharma: departures, honors, and resources are regulated through the king’s consent and court protocol, not private impulse.
Arjuna frames Kṛṣṇa as both transcendent ground and practical guide—suggesting that effective action and moral restoration require aligning human agency with a larger cosmological order and disciplined counsel.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s function is narrative and doctrinal—integrating post-war legitimacy, devotional theology, and courtly procedure within the broader Āśvamedhika arc.