Adhyaya 10
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 1038 Verses

Adhyaya 10

Marutta’s Sacrifice: Indra’s Threat, Saṃvarta’s Mantric Restraint, and Divine Reconciliation (अध्याय १०)

Upa-parva: Marutta–Saṃvarta–Indra Episode (Yajña Authority and Divine Compliance)

Chapter 10 records a structured dispute over sacrificial authority. Indra asserts the superiority of brahmanical power yet threatens to strike Marutta with the vajra unless Bṛhaspati is appointed as priest. A messenger-figure (Dhṛtarāṣṭra, identified as a Gandharva in the exchange) conveys Indra’s ultimatum. Marutta responds by denying the acceptability of betrayal in friendship and rejects the demand, affirming Saṃvarta’s role. As Indra’s approach becomes audible and alarming, Marutta seeks protection from Saṃvarta, who promises to neutralize the danger through a ‘saṃstambhinī’ restraining vidyā, effectively suspending the threat and redirecting the situation from force to ritual order. Marutta then requests not punishment but Indra’s direct participation: acceptance of oblations, soma-drinking, and the gods’ enjoyment of their stations. Indra arrives with the gods, is welcomed according to śāstra, acknowledges Saṃvarta’s identity as Bṛhaspati’s younger brother, and his anger subsides. Indra then actively organizes the sacrificial infrastructure and specifies offerings, after which the rite prospers; the gods depart satisfied, and Marutta’s wealth-distribution and stable rule are highlighted. The chapter closes by transitioning to Vaiśaṃpāyana’s frame, where the Pāṇḍava king (Yudhiṣṭhira) is inspired to undertake sacrifice using the described resources and precedent.

Chapter Arc: इन्द्र, अपने सिंहासन की असुरक्षा से विचलित होकर गन्धर्वराज धृतराष्ट्र को दूत बनाकर मरुत्त के यज्ञ-वैभव को भय का कारण मानते हुए धमकी-संदेश भेजता है। → धृतराष्ट्र मरुत्त के पास पहुँचकर आकाश-गर्जना और वज्र-प्रहार की आशंका सुनाता है; मरुत्त के पुरोहित संवर्त (बृहस्पति के अनुज, तपोधन) इन्द्र-भय को तुच्छ बताकर मन्त्रबल से देवताओं को बुलाने और शक्र के तेज को स्तम्भित करने का संकल्प लेते हैं। → संवर्त की स्तम्भिनी विद्या/मन्त्र-प्रभाव से इन्द्र सहित देवगण विवश होकर यज्ञ में उपस्थित होते हैं; इन्द्र स्वयं संवर्त की महिमा पहचानकर क्रोध त्यागता है और मरुत्त के यज्ञ को स्वीकार करता है। → देवता इन्द्र-वचन से प्रसन्न होकर यज्ञ-कार्य में प्रवृत्त होते हैं; इन्द्र मरुत्त की पूजा से तृप्त होकर उसे यज्ञ-सम्पत्ति (अत्यधिक सुवर्ण) के सदुपयोग—देव-तर्पण और यजन—का उपदेश देता है। → वैशम्पायन के अनुसार पाण्डव-राजा (युधिष्ठिर) यह वृत्तान्त सुनकर उस धन/यज्ञ-सम्पदा के विषय में आगे की योजना हेतु अमात्यों से पुनः मन्त्रणा करने लगता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआक्ाता बछ। अर: दशमो< ध्याय: इन्द्रका गन्धर्वराजको भेजकर मरुत्तको भय दिखाना और संवर्तका मन्त्रबलसे इन्द्रसहित सब देवताओंको बुलाकर मरुत्तका यज्ञ पूर्ण करना इन्द्र वाच एवमेतद्‌ ब्रह्म॒बलं गरीयो न ब्राह्मणात्‌ किंचिदन्यद्‌ गरीय: । आविक्षितस्य तु बल॑ न मृष्ये वज्मस्मै प्रहरिष्यामि घोरम्‌,इन्द्रने कहा--यह ठीक है कि ब्रह्मबल सबसे बढ़कर है। ब्राह्मणसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है; किंतु मैं राजा मरुत्तके बलको नहीं सह सकता। उनके ऊपर अवश्य अपने घोर वज्रका प्रहार करूँगा

ইন্দ্র বললেন—এ কথা সত্য, ব্রহ্মবলই সর্বশ্রেষ্ঠ; ব্রাহ্মণের চেয়ে মহান আর কেউ নেই। কিন্তু আৱিক্ষিত-বংশীয় রাজা মরুত্তের শক্তি আমি সহ্য করতে পারি না; আমি তার উপর আমার ভয়ংকর বজ্র নিক্ষেপ করব।

Verse 2

धृतराष्ट्र प्रहितो गच्छ मरुत्तं संवर्तेन संगतं त॑ं वदस्व । बृहस्पतिं त्वमुपशिक्षस्व राजन्‌ वजन वा ते प्रहरिष्यामि घोरम्‌,गन्धर्वराज धृतराष्ट्र! अब तुम मेरे भेजनेसे वहाँ जाओ और संवर्तके साथ मिले हुए राजा मरुत्तसे कहो--“राजन्‌! आप बृहस्पतिको आचार्य बनाकर उनसे यज्ञकर्मकी शिक्षा- दीक्षा ग्रहण कीजिये। अन्यथा मैं इन्द्र आपपर घोर वच्रका प्रहार करूँगा”

ইন্দ্র আদেশ দিলেন—“গন্ধর্বরাজ ধৃতরাষ্ট্র! আমার দূত হয়ে সেখানে যাও, সংবর্তের সঙ্গে যুক্ত রাজা মরুত্তকে বলো—‘হে রাজন, বৃহস্পতিকে আচার্য করে যজ্ঞকর্মের শিক্ষা গ্রহণ করো; নচেৎ আমি ইন্দ্র তোমার উপর ভয়ংকর বজ্র নিক্ষেপ করব।’”

Verse 3

व्यास उवाच ततो गत्वा धृतराष्ट्रो नरेन्द्र प्रोवाचेदं वचनं वासवस्य,व्यासजी कहते हैं--तब गन्धर्वराज धृतराष्ट्र राजा मरुत्तके पास गये और उनसे इन्द्रका संदेश इस प्रकार कहने लगे--“महाराज! आपको विदित हो कि मैं धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व हूँ और आपको देवराज इन्द्रका संदेश सुनाने आया हूँ। राजसिंह! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी महामना इन्द्रने जो कुछ कहा है, उनका वह वाक्य सुनिये

ব্যাস বললেন—তখন গন্ধর্বরাজ ধৃতরাষ্ট্র রাজা মরুত্তের কাছে গিয়ে বাসব (ইন্দ্র)-এর এই বাণী জানালেন।

Verse 4

गन्धर्व मां धृतराष्ट्रं निबोध त्वामागतं वक्तुकामं नरेन्द्र । ऐन्द्रं वाक्यं शृणु मे राजसिंह यत्‌ प्राह लोकाधिपतिर्महात्मा,व्यासजी कहते हैं--तब गन्धर्वराज धृतराष्ट्र राजा मरुत्तके पास गये और उनसे इन्द्रका संदेश इस प्रकार कहने लगे--“महाराज! आपको विदित हो कि मैं धृतराष्ट्र नामक गन्धर्व हूँ और आपको देवराज इन्द्रका संदेश सुनाने आया हूँ। राजसिंह! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी महामना इन्द्रने जो कुछ कहा है, उनका वह वाक्य सुनिये

“হে নরেন্দ্র, আমাকে ধৃতরাষ্ট্র নামক গন্ধর্ব বলে জানো; তোমার কাছে কথা বলবার ইচ্ছায় আমি এসেছি। হে রাজসিংহ, আমার মুখে ইন্দ্রের বাণী শোনো—যে বাক্য লোকাধিপতি মহাত্মা উচ্চারণ করেছেন।”

Verse 5

बृहस्पति याजकं त्वं वृणीष्व वजन वा ते प्रहरिष्यामि घोरम्‌ । वचदश्षेदेतन्न करिष्यसे मे प्राहैतदेतावदचिन्त्यकर्मा,अचिन्त्यकर्मा इन्द्र कहते हैं--'राजन्‌! आप बृहस्पतिको अपने यज्ञका पुरोहित बनाइये। यदि आप मेरी यह बात नहीं मानेंगे तो मैं आपपर भयंकर वज्रका प्रहार करूँगा”

ব্যাস বললেন—অচিন্ত্যকর্মা ইন্দ্র ঘোষণা করলেন—“হে রাজন, তোমার যজ্ঞের ঋত্বিক হিসেবে বৃহস্পতিকে বরণ করো। যদি আমার আদেশ না মানো, তবে আমি তোমার উপর ভয়ংকর বজ্রাঘাত করব।”

Verse 6

मरुत्त उवाच त्वं चैवैतद्‌ वेत्थ पुरंदरश्न विश्वेदेवा वसवश्चाश्विनौ च । मित्रद्रोहे निष्कृतिर्नास्ति लोके महत पापं ब्रह्म॒हत्यासमं तत्‌,मरुत्तने कहा--गन्धर्वराज! आप, इन्द्र, विश्वेदव, वसुगण तथा अश्विनीकुमार भी इस बातको जानते हैं कि मित्रके साथ द्रोह करनेपर ब्रह्महत्याके समान महान्‌ पाप लगता है। उससे छुटकारा पानेका संसारमें कोई उपाय नहीं है

মরুত্ত বললেন—“হে গন্ধর্বরাজ, তুমি এ কথাও জানো; পুরন্দর ইন্দ্র, বিশ্বেদেবগণ, বসুগণ এবং দুই অশ্বিনীকুমারও জানেন—বন্ধুর প্রতি বিশ্বাসঘাতকতার জন্য এই জগতে কোনো প্রায়শ্চিত্ত নেই। তা ব্রাহ্মণহত্যার সমান মহাপাপ।”

Verse 7

बृहस्पतिर्याजयतां महेन्द्र देवश्रेष्ठ वज़भृतां वरिष्ठम्‌ । संवर्तो मां याजयिताद्य राजन्‌ न ते वाक्‍्यं तस्य वा रोचयामि,गन्धर्वराज! बृहस्पतिजी वज्रधारियोंमें श्रेष्ठ देवेश्वर महेन्द्रका यज्ञ करायें। मेरा यज्ञ तो अब संवर्तजी ही करायेंगे। इसके विरुद्ध न तो मैं आपकी बात मानूँगा और न इन्द्रकी ही

মরুত্ত বললেন—“দেবশ্রেষ্ঠ, বজ্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ মহেন্দ্রের যজ্ঞ বৃহস্পতি সম্পাদন করুন। কিন্তু হে রাজন, আমার যজ্ঞ আজ সংবর্তই করাবেন। তোমার পরামর্শও আমার পছন্দ নয়, তার (ইন্দ্রের) কথাও নয়।”

Verse 8

गन्धर्व उवाच घोरो नाद: श्रूयतां वासवस्य नभसस्‍्तले गर्जतो राजसिंह । व्यक्त वज्ञ मोक्ष्यते ते महेन्द्र: क्षेमं राज॑श्षिन्त्यतामेष काल:,गन्धर्वराजने कहा--राजसिंह! आकाशमें गर्जना करते हुए इन्द्रका वह घोर सिंहनाद सुनिये। जान पड़ता है, महेन्द्र आपके ऊपर वज्र छोड़ना ही चाहते हैं; अतः राजन्‌! अपनी रक्षा एवं भलाईका उपाय सोचिये। इसके लिये यही अवसर है

গন্ধর্ব বলল—“হে রাজসিংহ, আকাশমণ্ডলে গর্জনরত বাসব ইন্দ্রের সেই ভয়ংকর নাদ শোনো। স্পষ্টই মহেন্দ্র তোমার উপর বজ্র নিক্ষেপ করতে উদ্যত। অতএব হে রাজন, নিজের রক্ষা ও মঙ্গলচিন্তা করো—এটাই সেই ক্ষণ।”

Verse 9

व्यास उवाच इत्येवमुक्तो धृतराष्ट्रेण राजन्‌ श्रुत्वा नादं नदतो वासवस्य | तपोनित्यं धर्मविदां वरिष्ठं संवर्त तं ज्ञापयामास कार्यम्‌,व्यासजी कहते हैं--राजन! धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने आकाशमें गरजते हुए इन्द्रका शब्द सुनकर सदा तपस्यामें तत्पर रहनेवाले धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ संवर्तको इन्द्रके इस कार्यकी सूचना दी

ব্যাস বললেন—হে রাজন, ধৃতরাষ্ট্র এ কথা বলার পর রাজা মরুত্ত আকাশে গর্জনরত বাসব ইন্দ্রের নাদ শুনলেন। তখন তিনি তপস্যায় নিত্যনিষ্ঠ, ধর্মজ্ঞদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সংবর্তকে ইন্দ্রের এই উদ্দেশ্যের কথা জানালেন।

Verse 10

मरुत्त उवाच इममात्मानं प्लवमानमारा- दध्वा दूरं तेन न दृश्यतेड्द्य । प्रपद्ये5हं शर्म विप्रेन्द्र त्वत्तः प्रयच्छ तस्मादभयं विप्रमुख्य,मरुत्तने कहा--विप्रवर! देवराज इन्द्र दूरसे ही प्रहार करनेकी चेष्टा कर रहे हैं, वे दूरकी राहपर खड़े हैं, इसलिये उनका शरीर दृष्टिगोचर नहीं होता। ब्राह्मणशिरोमणे! मैं आपकी शरणमें हूँ और आपके द्वारा अपनी रक्षा चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे अभय-दान दें। देखिये, ये वज्रधारी इन्द्र दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए चले आ रहे हैं। इनके भयंकर एवं अलौकिक सिंहनादसे हमारी यज्ञशालाके सभी सदस्य थर्रा उठे हैं इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये दशमो<ध्याय:

মরুত্ত বলল—হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! ইন্দ্র দূর থেকে আঘাত হানছে; দূরপথে অবস্থান করায় আজ তার দেহ দৃষ্টিগোচর নয়। হে দ্বিজশিরোমণি! আমি আপনার শরণাগত; আপনারই আশ্রয়ে রক্ষা চাই—অতএব আমাকে অভয় দান করুন। দেখুন, বজ্রধারী ইন্দ্র দশ দিক আলোকিত করতে করতে এগিয়ে আসছে; তার ভীষণ, অলৌকিক সিংহনাদে আমাদের যজ্ঞশালার সকল সদস্য কেঁপে উঠেছে।

Verse 11

अयमायाति वै वज्री दिशो विद्योतयन्‌ दश । अमानुषेण घोरेण सदस्यास्त्रासिता हि नः,मरुत्तने कहा--विप्रवर! देवराज इन्द्र दूरसे ही प्रहार करनेकी चेष्टा कर रहे हैं, वे दूरकी राहपर खड़े हैं, इसलिये उनका शरीर दृष्टिगोचर नहीं होता। ब्राह्मणशिरोमणे! मैं आपकी शरणमें हूँ और आपके द्वारा अपनी रक्षा चाहता हूँ, अतः आप कृपा करके मुझे अभय-दान दें। देखिये, ये वज्रधारी इन्द्र दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए चले आ रहे हैं। इनके भयंकर एवं अलौकिक सिंहनादसे हमारी यज्ञशालाके सभी सदस्य थर्रा उठे हैं

দেখো, বজ্রধারী ইন্দ্র দশ দিক আলোকিত করতে করতে আসছে। তার ভীষণ, মানবাতীত গর্জনে আমাদের যজ্ঞসভাসদস্যরা সত্যিই আতঙ্কিত হয়ে উঠেছে।

Verse 12

संवर्त उवाच भयं शक्राद्‌ व्येतु ते राजसिंह प्रणोत्स्येडहं भयमेतत्‌ सुघोरम्‌ । संस्तम्भिन्या विद्यया क्षिप्रमेव मा भैस्त्वमस्याभिभवात्‌ प्रतीत:,संवर्तने कहा--राजसिंह! इन्द्रसे तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये। मैं स्तम्भिनी विद्याका प्रयोग करके बहुत जल्द तुम्हारे ऊपर आनेवाले इस अत्यन्त भयंकर संकटको दूर किये देता हूँ। मुझपर विश्वास करो और इन्द्रसे पराजित होनेका भय छोड़ दो

সংবর্ত বললেন—হে রাজসিংহ! শক্র (ইন্দ্র)-ভীতি তোমার থেকে দূর হোক। এই অতিভীষণ ভয় আমি দূর করে দেব। স্তম্ভিনী বিদ্যার দ্বারা আমি অতি শীঘ্রই তোমার দিকে ধেয়ে আসা এই ভয়ংকর বিপদ নিষ্ক্রিয় করে দেব। আমার ওপর বিশ্বাস রাখো; ইন্দ্রের দ্বারা পরাভূত হওয়ার ভয় কোরো না।

Verse 13

अहं संस्तम्भयिष्यामि मा भैस्त्वं शक्रतो नूप । सर्वेषामेव देवानां क्षयितान्यायुधानि मे

সংবর্ত বললেন—হে নৃপ! আমি তাকে স্তম্ভিত করে দেব; শক্রকে ভয় কোরো না। আমি তো সকল দেবতার, এমনকি শক্রেরও, অস্ত্র নষ্ট করে দিয়েছি।

Verse 14

दिशो वच्ं व्रजतां वायुरेतु वर्ष भूत्वा वर्षतां काननेषु । आप: प्लवन्त्वन्तरिक्षे वृथा च सौदामनी दृश्यते मापि भैस्त्वम्‌

সংবর্ত বললেন—বায়ু আমার বাক্য সকল দিশায় বহন করুক। সে বৃষ্টি হয়ে অরণ্যে বর্ষিত হোক। জল আকাশে উথলে ছড়িয়ে পড়ুক, আর বিদ্যুৎও দেখা দিক—কিন্তু তা নিষ্ফল থাকুক, কারও অনিষ্ট না করুক। তুমি ভয় কোরো না।

Verse 15

अग्निदेव तुम्हारी सब ओरसे रक्षा करें। देवराज इन्द्र तुम्हारे लिये जलकी नहीं, सम्पूर्ण कामनाओंकी वर्षा करें और तुम्हारे वधके लिये उठे हुए और जलराशिके साथ चंचल गतिसे चले हुए महाघोर वज्रको वे देवेन्द्र अपने हाथमें ही रखे रहें

সংবর্ত বললেন—অগ্নিদেব সর্বদিক থেকে তোমাকে রক্ষা করুন। দেবরাজ ইন্দ্র তোমার জন্য কেবল জল নয়, তোমার সকল কামনার পূর্ণ সমৃদ্ধি বর্ষণ করুন। আর তোমাকে বধ করতে উদ্যত, জলরাশির বেগের মতো চঞ্চল গতিতে ধাবমান সেই মহাভয়ংকর বজ্র দেবেন্দ্র যেন নিজের হাতেই সংযত করে রাখেন।

Verse 16

मरुत्त उवाच घोर: शब्द: श्रूयते वै महास्वनो वज्रस्यैष सहितो मारुतेन । आत्मा हि मे प्रव्यथते मुहुर्मुहु- न॑ मे स्वास्थ्यं जायते चाद्य विप्र,मरुत्तने कहा--विप्रवर! आँधीके साथ ही जोर-जोरसे होनेवाली वज़्की भयंकर गड़गड़ाहट सुनायी दे रही है। इससे रह-रहकर मेरा हृदय काँप उठता है। आज मनमें तनिक भी शान्ति नहीं है

মরুত্ত বললেন—হে বিপ্রবর! ঝড়ের সঙ্গে বজ্রের ভয়ংকর গর্জন—সে মহাধ্বনি শোনা যাচ্ছে। বারবার আমার অন্তরাত্মা কেঁপে ওঠে; আজ, হে ব্রাহ্মণ, আমার মধ্যে কোনো স্থৈর্য বা শান্তি জন্মায় না।

Verse 17

संवर्त उवाच वज्ञादुग्राद्‌ व्येतु भयं तवाद्य वातो भूत्वा हन्मि नरेन्द्र बज़म्‌ । भयं त्यक्त्वा वरमन्यं वृणीष्व कं ते काम॑ं मनसा साधयामि,संवर्तने कहा--नरेन्द्र! तुम्हें इन्द्रके भयंकर वज़से आज भयभीत नहीं होना चाहिये। मैं वायुका रूप धारण करके अभी इस वज्रको निष्फल किये देता हूँ। तुम भय छोड़कर मुझसे कोई दूसरा वर माँगो। बताओ, मैं तुम्हारी कौन-सी मानसिक इच्छा पूर्ण करूँ?

সংবর্ত বললেন—নরেন্দ্র! ইন্দ্রের সেই উগ্র বজ্রকে আজ ভয় করো না। আমি বায়ুরূপ ধারণ করে এই মুহূর্তেই সেই বজ্রকে নিষ্ফল করে দেব। ভয় ত্যাগ করে আমার কাছে অন্য বর চাও। বলো, তোমার মনের কোন কামনা আমি সিদ্ধ করব?

Verse 18

मरुत्त उवाच इन्द्र: साक्षात्‌ सहसाभ्येतु विप्र हविर्यज्ञे प्रतिगृह्नातु चैव । स्वं स्वं धिष्णयं चैव जुषन्तु देवा हुतं सोम॑ प्रतिगृह्नन्तु चैव,मरुत्तने कहा--ब्रह्मर्ष! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे साक्षात्‌ इन्द्र मेरे यज्ञमें शीघ्रतापूर्वक पधारें और अपना हविष्य-भाग ग्रहण करें। साथ ही अन्य देवता भी अपने- अपने स्थानपर आकर बैठ जायाँ और सब लोग एक साथ आहुतिरूपमें प्राप्त हुए सोमरसका पान करें

মরুত্ত বললেন—হে ব্রহ্মর্ষি! এমন ব্যবস্থা করুন যাতে স্বয়ং ইন্দ্র দ্রুত আমার যজ্ঞে এসে হব্যভাগ গ্রহণ করেন। অন্যান্য দেবতাও নিজ নিজ আসনে অধিষ্ঠিত হয়ে প্রসন্ন হন; এবং সকলে একত্রে অর্পিত সোম গ্রহণ করে পান করুন।

Verse 19

संवर्त उवाच अयमिन्द्रो हरिभिरायाति राजन्‌ देवै: सर्वैस्त्वरितै: स्तूयमान: । मन्त्राहूतो यज्ञमिमं मयाद्य पश्यस्वैनं मन्त्रविस्रस्तकायम्‌,(तदनन्तर संवर्तने अपने मन्त्रबलसे सम्पूर्ण देवताओंका आवाहन किया और) मरुत्तसे कहा--राजन! ये इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते शीघ्रगामी अश्वोंसे युक्त रथकी सवारीसे आ रहे हैं। मैंने मनत्रबलसे आज इस यज्ञमें इनका आवाहन किया है। देखो, मन्त्रशक्तिसे इनका शरीर इधर खिंचता चला आ रहा है

সংবর্ত বললেন—হে রাজন! দেখো, ইন্দ্র হরিবর্ণ অশ্বযুক্ত রথে আরূঢ় হয়ে আসছেন; আর সকল দেবতা ত্বরিত হয়ে তাঁর স্তব করছে। আজ আমি মন্ত্রবলে তাঁকে এই যজ্ঞে আহ্বান করেছি। দেখো—মন্ত্রশক্তিতে তাঁর দেহ যেন টেনে আনা হচ্ছে, এই ক্রিয়ার দিকে ধাবিত হচ্ছে।

Verse 20

ततो देवै: सहितो देवराजो रथे युड्क्‍्त्वा तान्‌ हरीन्‌ वाजिमुख्यान्‌ । आयाद्‌ यज्ञमथ राज्ञ: पिपासु- राविक्षितस्याप्रमेयस्थ सोमम्‌,तत्पश्चात्‌ देवराज इन्द्र अपने रथमें उन सफेद रंगके अच्छे घोड़ोंको जोतकर देवताओंको साथ ले सोमपानकी इच्छासे अनुपम पराक्रमी राजा मरुत्तकी यज्ञशालामें आ पहुँचे

তখন দেবগণের সহিত দেবরাজ ইন্দ্র রথে সেই শ্রেষ্ঠ হরিত-শ্বেত অশ্বযুগল যোজনা করলেন। সোমপানের তৃষ্ণায় ব্যাকুল হয়ে তিনি অবিক্ষিত-পুত্র, অপরিমেয় পরাক্রমশালী রাজা মরুত্তের যজ্ঞে উপস্থিত হলেন।

Verse 21

तमायान्तं सहित देवसंघै: प्रत्युध्ययां सपुरोधा मरुत्त: । चक्रे पूजां देवराजाय चाग्रयां यथाशास्त्रं विधिवत्‌ प्रीयमाण:,देववृन्दके साथ इन्द्रको आते देख राजा मरुत्तने अपने पुरोहित संवर्त मुनिके साथ आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और बड़ी प्रसन्नताके साथ शास्त्रीय विधिसे उनका अग्रपूजन किया

দেবসমূহের সঙ্গে ইন্দ্রকে আসতে দেখে রাজা মরুত্ত পুরোহিতসহ এগিয়ে গিয়ে তাঁকে অভ্যর্থনা করলেন। আনন্দচিত্তে শাস্ত্রবিধি অনুসারে তিনি দেবরাজকে অগ্রপূজা ও সর্বোচ্চ সম্মান নিবেদন করলেন।

Verse 22

संवर्त उवाच स्वागतं ते पुरुहृतेह विद्वन्‌ यज्ञोड्प्ययं संनिहिते त्वयीन्द्र शोशुभ्यते बलवृत्रघ्न भूय: पिबस्व सोम॑ सुतमुद्यतं मया,संवर्तने कहा--पुरुह्दत इन्द्र! आपका स्वागत है। विद्वन्‌! आपके यहाँ पधारनेसे इस यज्ञकी शोभा बहुत बढ़ गयी है। बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले देवराज! मेरेद्वारा तैयार किया हुआ यह सोमरस प्रस्तुत है, आप इसका पान कीजिये

সংবর্ত বললেন—হে পুরুহূত ইন্দ্র, এখানে আপনার স্বাগতম, হে বিদ্বান। আপনার উপস্থিতিতে এই যজ্ঞ আরও অধিক দীপ্তিমান হয়েছে। হে বলবান, বৃত্রবধকারী, আমার দ্বারা নিষ্পেষিত ও প্রস্তুত এই সোমরস গ্রহণ করুন।

Verse 23

मरुत्त उवाच शिवेन मां पश्य नमश्न ते<स्तु प्राप्तो यज्ञ: सफल जीवित मे । अयं यज्ञ कुरुते मे सुरेन्द्र बृहस्पतेरवरजो विप्रमुख्य:,मरुत्तने कहा--सुरेन्द्र! आपको नमस्कार है। आप मुझे कल्याणमयी दृष्टिसे देखिये। आपके पदार्पणसे मेरा यज्ञ और जीवन सफल हो गया। बृहस्पतिजीके छोटे भाई ये विप्रवर संवर्तजी मेरा यज्ञ करा रहे हैं

মরুত্ত বললেন—হে সুরেন্দ্র, আপনাকে প্রণাম; মঙ্গলদৃষ্টিতে আমাকে দেখুন। আপনার আগমনে আমার যজ্ঞ ও আমার জীবন সার্থক হয়েছে। হে ইন্দ্র, বৃহস্পতির অনুজ এই শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ সংবর্তই আমার যজ্ঞ সম্পাদন করাচ্ছেন।

Verse 24

इन्द्र उवाच जानामि ते गुरुमेनं तपोधनं बृहस्पतेरनुजं तिग्मतेजसम्‌ । यस्याद्धानादागतोऊहं नरेन्द्र प्रीतिमेंडद्य त्वयि मन्यु: प्रणष्ट:,इन्द्रने कहा--नरेन्द्र! आपके इन गुरुदेवको मैं जानता हूँ। ये बृहस्पतिजीके छोटे भाई और तपस्याके धनी हैं। इनका तेज दुःसह है। इन्हींके आवाहनसे मुझे आना पड़ा है। अब मैं आपपर प्रसन्न हूँ और मेरा सारा क्रोध दूर हो गया है

ইন্দ্র বললেন—হে নরেন্দ্র, আমি তোমার এই গুরুকে জানি। তিনি তপস্যাধন, বৃহস্পতির অনুজ এবং তীক্ষ্ণ তেজস্বী। তাঁর আহ্বানেই আমি এখানে এসেছি। এখন আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন; আমার সমস্ত ক্রোধ লুপ্ত হয়েছে।

Verse 25

संवर्त उवाच यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज तस्मात्स्वयं शाधि यज्ञे विधानम्‌ । स्वयं सर्वान्‌ कुरु भागान्‌ सुरेन्द्र जानात्वयं सर्वलोकश्ष देव,संवर्तने कहा--देवराज! यदि आप प्रसन्न हैं तो यज्ञमें जो-जो कार्य आवश्यक है, उसका स्वयं ही उपदेश दीजिये तथा सुरेन्द्र! स्वयं ही सब देवताओंके भाग निश्चित कीजिये। देव! यहाँ आये हुए सब लोग आपकी प्रसन्नताका प्रत्यक्ष अनुभव करें

সংবর্ত বললেন—হে দেবরাজ! আপনি যদি সত্যই প্রসন্ন হন, তবে এই যজ্ঞের বিধান আপনি নিজেই নির্দেশ করুন। হে সুরেন্দ্র ইন্দ্র! দেবতাদের অংশও আপনি নিজেই নির্ধারণ করুন, যাতে, হে দেব, এখানে উপস্থিত সকলেই আপনার অনুগ্রহ প্রত্যক্ষভাবে উপলব্ধি করতে পারে।

Verse 26

व्याय उवाच एवमुक्तस्त्वाज्धिरसेन शक्र: समादिदेश स्वयमेव देवान्‌ । सभा: क्रियन्तामावसथाश्न मुख्या: सहस्रशश्रित्रभूता: समृद्धा:,व्यासजी कहते हैं--राजन! संवर्तके यों कहनेपर इन्द्रने स्वयं ही सब देवताओंको आज्ञा दी कि “तुम सब लोग अत्यन्त समृद्ध एवं चित्र-विचित्र ढंगके हजारों अच्छे सभा- भवन बनाओ

ব্যাস বললেন—রাজন! আজধিরসেন (সংবর্ত)-এর এমন কথায় শক্র (ইন্দ্র) নিজেই দেবতাদের আদেশ দিলেন—“হাজারে হাজারে সমৃদ্ধ ও বিচিত্র নকশার সভাগৃহ এবং প্রধান আবাস নির্মিত হোক।”

Verse 27

क्लृप्ता: स्थूणा: कुरुतारोहणानि गन्धर्वाणामप्सरसां च शीघ्रम्‌ । यत्र नृत्येरन्नप्सरस: समस्ता: स्वर्गोपम: क्रियतां यज्ञवाट:,“गन्धर्वों और अप्सराओंके लिये ऐसे रंगमण्डपका निर्माण करो, जिसमें बहुत-से सुन्दर स्तम्भ लगे हों। उनके रंगमंचपर चढ़नेके लिये बहुत-सी सीढ़ियाँ बना दो। यह सब कार्य शीघ्र हो जाना चाहिये। यह यज्ञशाला स्वर्गके समान सुन्दर एवं मनोहर बना दो। जिसमें सारी अप्सराएँ नृत्य कर सकें”

ব্যাস বললেন—“গন্ধর্ব ও অপ্সরাদের জন্য সুসজ্জিত স্তম্ভ স্থাপন করে দ্রুত মঞ্চ ও আরোহণের সিঁড়ি নির্মাণ করো। যজ্ঞপ্রাঙ্গণকে স্বর্গসম সুন্দর ও মনোহর করো, যেখানে সকল অপ্সরা নৃত্য করতে পারে।”

Verse 28

इत्युक्तास्ते चक्करुराशु प्रतीता दिवौकस: शक्रवाक्यान्नरेन्द्र । ततो वाक्‍यं प्राह राजानमिन्द्र: प्रीतो राजन्‌ पूज्यमानो मरुत्तम्‌,नरेन्द्र! देवराजके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवताओंने संतुष्ट होकर उनकी आज्ञाके अनुसार शीघ्र ही सबका निर्माण किया। राजन! तत्पश्चात्‌ पूजित एवं संतुष्ट हुए इन्द्रने राजा मरुत्तसे इस प्रकार कहा--

ব্যাস বললেন—হে নরেন্দ্র! দেবরাজের এমন আদেশে দিবৌকস দেবতারা আনন্দিত হয়ে শীঘ্রই সব নির্মাণ সম্পন্ন করল। তারপর পূজিত ও প্রসন্ন ইন্দ্র রাজা মরুত্তকে বললেন—

Verse 29

एष त्वयाहमिह राजन्‌ समेत्य ये चाप्यन्ये तव पूर्वे नरेन्द्र । सर्वाश्षान्या देवता: प्रीयमाणा हविस्तुभ्यं प्रतिगृह्नन्तु राजन्‌,“राजन! यह मैं यहाँ आकर तुमसे मिला हूँ। नरेन्द्र! तुम्हारे जो अन्यान्य पूर्वज हैं, वे तथा अन्य सब देवता भी यहाँ प्रसन्नतापूर्वक पधारे हैं। राजन्‌! ये सब लोग तुम्हारा दिया हुआ हविष्य ग्रहण करेंगे

ইন্দ্র বললেন—“হে রাজন! আমি এখানে এসে তোমার সঙ্গে মিলিত হয়েছি; হে নরেন্দ্র! তোমার অন্যান্য পূর্বপুরুষেরাও এখানে উপস্থিত। অন্যান্য সকল দেবতাও প্রসন্নচিত্তে আগমন করেছেন। হে রাজন! তারা সকলেই তোমার অর্পিত হবিশ্য গ্রহণ করুন।”

Verse 30

आग्नेयं वै लोहितमालभन्तां वैश्वदेवं बहुरूपं हि राजन्‌ नीलं चोक्षाणं मेध्यमप्पालभन्तां चलच्छिश्र॑ं सम्प्रदिष्टं द्विजाग्रया:,'राजेन्द्र! अग्निके लिये लाल रंगकी वस्तुएँ प्रस्तुत की जाये, विश्वेदेवोंके लिये अनेक रूप-रंगवाले पदार्थ दिये जाय, श्रेष्ठ ब्राह्मण यहाँ छूकर दिये गये चंचल शिश्चवाले नील रंगके वृषभका दान ग्रहण करें”

ব্যাস বললেন—হে রাজন, অগ্নির জন্য লাল বর্ণের নিবেদন প্রস্তুত করা হোক; বিশ্বেদেবদের জন্য নানা রূপ ও নানা বর্ণের দ্রব্য দান করা হোক। আর বিধি অনুসারে স্পর্শ করে, মেধ্য—নীলবর্ণ, চঞ্চল ও প্রাণবন্ত বৃষভ—অগ্রগণ্য ব্রাহ্মণগণ দানরূপে গ্রহণ করুন।

Verse 31

ततो यज्ञो ववृधे तस्य राजन्‌ यत्र देवा: स्वयमन्नानि जह्लु: । यस्मिन्‌ शक्रो ब्राह्मणै: पूज्यमान: सदस्यो<भूद्धरिमान्‌ देवराज:,नरेश्वर! तदनन्तर राजा मरुत्तके यज्ञका कार्य आगे बढ़ा, जिसमें देवतालोग स्वयं ही अन्न परोसने लगे। ब्राह्मणोंद्वारा पूजित, उत्तम अभश्रोंसे युक्त देवराज इन्द्र उस यज्ञमण्डपमें सदस्य बनकर बैठे थे

তারপর, হে নরেশ্বর, সেই রাজার যজ্ঞ ক্রমে এমন মহিমান্বিত হল যে দেবতাগণ নিজেরাই সেখানে অন্ন পরিবেশন করতে লাগলেন। সেই যজ্ঞসভায় ব্রাহ্মণদের দ্বারা পূজিত, হরিযুক্ত দেবরাজ শক্র (ইন্দ্র) সদস্যরূপে আসীন ছিলেন।

Verse 32

ततः: संवर्तश्रैत्यगतो महात्मा यथा वल्लिः प्रज्वलितो द्वितीय: । हवींष्युच्चैराह्नययन्‌ देवसंघान्‌ जुहावाग्नौ मन्त्रवत्‌ सुप्रतीत:,इसके बाद द्वितीय अग्निके समान तेजस्वी एवं यज्ञमण्डपमें बैठे हुए महात्मा संवर्तने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देववृन्दका उच्चस्वरसे आह्वान करते हुए मन्त्रपाठपूर्वक अग्निमें हविष्यका हवन किया

তারপর মহাত্মা সংবর্ত যজ্ঞমণ্ডপে আসন গ্রহণ করে দ্বিতীয় প্রজ্বলিত অগ্নির মতো দীপ্তিমান হলেন। তিনি উচ্চস্বরে দেবসমূহকে আহ্বান করে, প্রসন্নচিত্তে, মন্ত্রোচ্চারণসহ অগ্নিতে হব্য অর্পণ করলেন।

Verse 33

ततः पीत्वा बलभित्‌ सोममग्रयं ये चाप्यन्ये सोमपा देवसंघा: । सर्वेडनुज्ञाता: प्रययु: पार्थिवेन यथाजोष॑ तर्पिता: प्रीतिमन्‍्त:,तत्पश्चात्‌ इन्द्र तथा सोमपानके अधिकारी अन्य देवताओंने उत्तम सोमरसका पान किया। इससे सबको तृप्ति एवं प्रसन्नता हुई। फिर सब देवता राजा मरुत्तकी अनुमति लेकर अपने-अपने स्थानको चले गये

তারপর বলভিত্‌ (ইন্দ্র) শ্রেষ্ঠ সোম পান করলেন, এবং সোমপায়ী অন্যান্য দেবসমূহও সেই উৎকৃষ্ট সোমরস পান করল। সকলেই তৃপ্ত ও প্রীত হল; পরে পার্থিব রাজার অনুমতি নিয়ে তারা প্রত্যেকে নিজ নিজ ধামে প্রস্থান করল।

Verse 34

ततो राजा जातरूपस्य राशीन्‌ पदे पदे कारयामास हृष्ट: । द्विजातिभ्यो विसृजन्‌ भूरि वित्तं रराज वित्तेश इवारिहन्ता,तदनन्तर शत्रुहन्ता राजा मरुत्तने बड़े हर्षके साथ वहाँ ब्राह्मणोंको बहुत-से धनका दान करते हुए उनके लिये पग-पगपर सुवर्णके ढेर लगवा दिये। उस समय धनाध्यक्ष कुबेरके समान उनकी शोभा हो रही थी

তারপর আনন্দিত রাজা পদে পদে স্বর্ণের স্তূপ স্থাপন করালেন। দ্বিজদের প্রতি অঢেল ধন দান করতে করতে, শত্রুহন্তা সেই রাজা ধনাধিপ কুবেরের ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে উঠলেন।

Verse 35

ततो वित्त विविध संनिधाय यथोत्साहं कारयित्वा च कोषम्‌ | अनुज्ञातो गुरुणा संनिवृत्य शशास गामखिलां सागरान्ताम्‌,इसके बाद ब्राह्मणोंके ले जानेसे जो नाना प्रकारका धन बच गया, उसको मरुत्तने उत्साहपूर्वक कोष-स्थान बनवाकर उसीमें जमा कर दिया। फिर अपने गुरु संवर्तकी आज्ञा लेकर वे राजधानीको लौट आये और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य करने लगे

তারপর নানাবিধ যে ধন অবশিষ্ট ছিল, মরুত্ত নিজের সামর্থ্য ও উৎসাহ অনুযায়ী কোষাগার নির্মাণ করিয়ে তাতে সঞ্চয় করলেন। গুরু সংবর্তের অনুমতি নিয়ে তিনি রাজধানীতে প্রত্যাবর্তন করে সমুদ্র-পর্যন্ত সমগ্র পৃথিবী ধর্মপূর্বক শাসন করতে লাগলেন।

Verse 36

एवंगुण: सम्बभूवेह राजा यस्य क्रतौ तत्‌ सुवर्ण प्रभूतम्‌ । तत्‌ त्वं समादाय नरेन्द्र वित्तं यजस्व देवांस्तर्पयानो निवापै:,नरेन्द्र! राजा मरुत्त ऐसे प्रभावशाली हुए थे। उनके यज्ञमें बहुत-सा सुवर्ण एकत्र किया गया था। तुम उसी धनको मँगवाकर यज्ञभागसे देवताओंको तृप्त करते हुए यजन करो

হে নরেন্দ্র! রাজা মরুত্ত এইরূপ গুণসম্পন্ন ও প্রভাবশালী ছিলেন; তাঁর যজ্ঞে প্রচুর স্বর্ণ সঞ্চিত হয়েছিল। অতএব তুমি সেই ধন আনিয়ে যজ্ঞভাগের আহুতি দ্বারা দেবতাদের তৃপ্ত করে যজন কর।

Verse 37

वैशम्पायन उवाच ततो राजा पाण्डवो हृष्टरूप: श्रुत्वा वाक्‍्यं सत्यवत्या: सुतस्य । मनश्नक्रे तेन वित्तेन यह ततोअमात्यैर्मन्त्रयामास भूय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सत्यवतीनन्दन व्यासजीके ये वचन सुनकर पाण्डुकुमार राजा युधिष्छिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उस धनके द्वारा यज्ञ करनेका विचार किया तथा इस विषयमें मन्त्रियोंके साथ बारंबार मन्त्रणा की

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! সত্যবতীনন্দন ব্যাসের এই বাক্য শুনে পাণ্ডব রাজা যুধিষ্ঠির আনন্দে দীপ্ত হলেন। তিনি সেই ধন দ্বারা যজ্ঞ করার সংকল্প করলেন এবং এ বিষয়ে মন্ত্রীদের সঙ্গে বারবার পরামর্শ করলেন।

Verse 215

नरेश्वर! मैं अभी उन्हें स्तम्भित करता हूँ; अतः तुम इन्द्रसे न डरो। मैंने सम्पूर्ण देवताओंके अस्त्र-शस्त्र भी क्षीण कर दिये हैं। चाहे दसों दिशाओंमें वज्ञ गिरे, आँधी चले, इन्द्र स्वयं ही वर्षा बनकर सम्पूर्ण वनोंमें निरन्तर बरसते रहें, आकाशमें व्यर्थ ही जलप्लावन होता रहे और बिजली चमके तो भी तुम भयभीत न होओ ।। वह्निदेवस्त्रातु वा सर्वतस्ते कामानू्‌ सर्वान्‌ वर्षतु वासवो वा | वज्र तथा स्थापयतां वधाय महाघोरं प्लवमानं जलौघचै:

সংবর্ত বললেন—হে নরেশ্বর! আমি এই মুহূর্তেই তাদের স্তম্ভিত করি; অতএব ইন্দ্রকে ভয় কোরো না। আমি সমস্ত দেবতার অস্ত্র-শস্ত্রও ক্ষীণ করে দিয়েছি। দশ দিকেই বজ্রপাত হোক, প্রচণ্ড ঝড় উঠুক, ইন্দ্র নিজেই বৃষ্টিরূপ হয়ে সর্ব বনভূমিতে অবিরাম বর্ষণ করুক, আকাশ অনর্থক জলপ্লাবনে ভরে উঠুক এবং বিদ্যুৎ বৃথাই ঝলকাক—তবু তুমি ভীত হয়ো না। অগ্নিদেব চারদিক থেকে তোমাকে রক্ষা করুন বা বাসব (ইন্দ্র) তোমার সব কামনা বর্ষণ করুন, কিংবা বধের জন্য বজ্র স্থাপন করে ভয়ংকর জলরাশি উথলে উঠুক—তুমি স্থির থাকো, নির্ভয় থাকো।

Frequently Asked Questions

Whether a king should yield to a superior power’s coercive demand (Indra’s ultimatum) by replacing his chosen priest, or uphold ritual propriety and loyalty to the officiant, accepting risk while seeking a dharmic resolution.

Authority is stabilized when force is subordinated to dharma: tapas and mantra function as instruments of restraint and reconciliation, enabling lawful participation of all stakeholders rather than victory through intimidation.

Yes. The concluding frame (Vaiśaṃpāyana) redirects the exemplum toward Yudhiṣṭhira’s intention to perform sacrifice, positioning the episode as a precedent-text for post-conflict governance, ritual legitimacy, and socially productive wealth distribution.