
Cyavana’s Yogic Display and Kuśika’s Recognition of Tapas (च्यवन-योगप्रभावः कुशिकस्य तपःप्रशंसा च)
Upa-parva: Tapas–Brahmarṣi-Prabhāva Episode (Kuśika–Cyavana Narrative Unit)
Bhīṣma narrates how King Kuśika, awakening at night’s end and completing morning observances, proceeds with his wife toward a forest by the Gaṅgā. He beholds an extraordinary, palace-like vision: golden structures with jeweled pillars, landscaped hills, lotus ponds, ornamental gateways, and abundant flowering trees. The environment includes refined comforts—seats, beds, coverings, food and drink—and a soundscape of birds and sweet singing, with occasional sightings of gandharvas and apsarases. The king doubts whether the experience is dream, delusion, or reality. He then perceives the sage Cyavana reclining in a radiant aerial/palatial setting; when approached, Cyavana and the scene vanish, reappearing elsewhere with the sage seated in ascetic posture, engaged in japa. Through yogabala, the sage repeatedly manifests and withdraws the entire spectacle, and the riverbank returns to its prior, ordinary condition. Astonished, Kuśika praises tapas as superior even to universal dominion, extolling Cyavana’s capacity and the rarity of true brahminical power. Summoned, the king approaches, bows, and is welcomed; Cyavana commends Kuśika’s restraint over the senses and offers a boon. Kuśika declares the sage’s satisfaction itself as the chief boon, then raises a remaining doubt for clarification, setting up the subsequent instruction.
Chapter Arc: दानधर्म के उपाख्यान में राजा नहुष शौच-आचमन कर, अंजलि बाँध, महात्मा च्यवन के सम्मुख आत्म-परिचय देकर विनयपूर्वक उपस्थित होता है—राजा का तेज और ऋषि का तप एक ही क्षण में आमने-सामने आ खड़े होते हैं। → नहुष पूछता है—‘द्विजश्रेष्ठ! मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?’ पुरोहित भी सत्यव्रती, देवकल्प च्यवन की विधिवत् अर्चना करता है। संतोष का उपाय खोजते हुए दान का प्रश्न उभरता है: ब्राह्मण और गौ—दोनों की मर्यादा, मूल्य और ‘अप्रतिग्रह’ की सीमा क्या है? → उपाख्यान का तीखा बिंदु तब आता है जब ‘कैवर्त’ (मल्लाह) गौ अर्पित करते हैं और ऋषि कहते हैं—‘मैं तुम्हारी दी हुई धेनु स्वीकार करता हूँ; तुम मत्स्यों सहित शीघ्र स्वर्ग जाओ।’ यहाँ दान की शक्ति, दाता की जाति/वृत्ति, और ग्रहणकर्ता की तप-प्रतिष्ठा—तीनों का धर्म-निर्णय एक साथ उद्घाटित होता है। → कथा-प्रवक्ता (भीष्म) युधिष्ठिर से कहता है कि तुम्हारे प्रश्न के अनुसार यह प्रसंग—गौ-दान की महिमा और धर्म-विनिश्चय—कह दिया गया; अर्थात् दान का फल दाता की श्रद्धा और विधि से पुष्ट होता है, केवल सामाजिक श्रेणी से नहीं। → इसी बीच ‘गाय के पेट से उत्पन्न’ एक अन्य वनवासी मुनि (फल-मूलाहारी) नहुष के पास आते हैं और द्विजसत्तम राजा से संवाद आरम्भ करते हैं—अगले प्रसंग में नया धर्म-सूत्र खुलने का संकेत।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवनमुनिका उपाख्यानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५० ॥ एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना
ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! চ্যবন মুনি এমন অবস্থায় নিকটে এসেছেন শুনে রাজা নহুষ মন্ত্রী ও পুরোহিতসহ দ্রুত সেখানে উপস্থিত হলেন।
Verse 2
शौचं कृत्वा यथान्यायं प्राज्जलि: प्रयतो नृप: । आत्मानमाचचक्षे च च्यवनाय महात्मने,उन्होंने पवित्रभावसे हाथ जोड़कर मनको एकाग्र रखते हुए न््यायोचित रीतिसे महात्मा च्यवनको अपना परिचय दिया
যথাবিধি শৌচ সম্পন্ন করে, করজোড়ে ও সংযতচিত্তে সেই নৃপতি মহাত্মা চ্যবনের কাছে নিজের পরিচয় দিলেন।
Verse 3
अर्चयामास तं चापि तस्य राज्ञ: पुरोहित: । सत्यव्रतं महात्मानं देवकल्पं विशाम्पते,प्रजानाथ! राजाके पुरोहितने देवताओंके समान तेजस्वी सत्यव्रती महात्मा च्यवनमुनिका विधिपूर्वक पूजन किया
হে প্রজাপতি! সেই রাজার পুরোহিতও সত্যব্রতী, দেবতুল্য দীপ্তিমান মহাত্মা চ্যবন মুনির যথাবিধি পূজা করলেন।
Verse 4
नहुष उवाच करवाणि प्रियं कि ते तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम । सर्व कर्तास्मि भगवन् यद्यपि स्यात् सुदुष्करम्
নহুষ বললেন—হে দ্বিজোত্তম, আপনার প্রিয় কোন সেবা আমি করব? তা আমাকে বলুন। ভগবন, কাজটি অতিশয় দুরূহ হলেও আমি সবই করতে প্রস্তুত।
Verse 5
तत्पश्चात् राजा नहुष बोले--द्विजश्रेष्ठ! बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? भगवन्! आपकी आज्ञासे कितना ही कठिन कार्य क्यों न हो, मैं सब पूरा करूँगा ।।
চ্যবন বললেন—হে রাজন, মাছ ধরে জীবিকা নির্বাহকারী এই কৈবর্তেরা মহাশ্রমে জালে আমাকে তুলে এনেছে। অতএব এই মাছের বিক্রয়মূল্যের সঙ্গে সঙ্গে আমারও প্রাপ্য মূল্য তাদের প্রদান করুন।
Verse 6
नह॒ष उवाच सहस्र॑ं दीयतां मूल्यं निषादेभ्य: पुरोहित | निष्क्रयार्थे भगवतो यथा55ह भृगुनन्दन:
নহুষ পুরোহিতকে বললেন—পুরোহিত, ভৃগুনন্দন যেভাবে বলেছেন, সেই অনুযায়ী ভগবানের মুক্তিমূল্য হিসেবে নিষাদদের এক হাজার মুদ্রা প্রদান করো।
Verse 7
च्यवन उवाच सहस्रन॑ नाहमहामि किं वा त्वं मन््यसे नृप । सदृशं दीयतां मूल्यं स्वबुद्ध्या निश्चयं कुरु
চ্যবন বললেন—হে নরেশ্বর, আমি এক হাজার মুদ্রায় ক্রয়যোগ্য নই। আপনি কি আমার মূল্য এতটুকুই মনে করেন? আমার উপযুক্ত মূল্য দিন; নিজের বুদ্ধিতে বিচার করে স্থির করুন তা কত হওয়া উচিত।
Verse 8
नहुष उवाच सहस्राणां शतं विप्र निषादेभ्य: प्रदीयताम् । स्यादिदं भगवन् मूल्यं कि वान्यन्मन्यते भवान्
নহুষ বললেন—হে বিপ্র, এক হাজারের মধ্যে এক শত মুদ্রা নিষাদদের দেওয়া হোক। ভগবন, এটাই মূল্য হোক; নতুবা আপনি আর কী ব্যবস্থা যথাযথ মনে করেন?
Verse 9
नहुष बोले--विप्रवर! इन निषादोंको एक लाख मुद्रा दीजिये। (यों पुरोहितको आज्ञा देकर वे मुनिसे बोले--) भगवन्! क्या यह आपका उचित मूल्य हो सकता है या अभी आप कुछ और देना चाहते हैं? ।।
নহুষ বললেন—“বিপ্রবর! এই নিষাদদের এক লক্ষ মুদ্রা দাও।” (পুরোহিতকে আদেশ দিয়ে তিনি মুনিকে বললেন—) “ভগবন! এটাই কি আপনার যথোচিত মূল্য, না আপনি আরও কিছু দিতে চান?” চ্যবন বললেন—“রাজশ্রেষ্ঠ! আমাকে এক লক্ষে সীমাবদ্ধ করে মূল্যায়ন কোরো না। উপযুক্ত প্রতিদান দাও; মন্ত্রীদের সঙ্গে পরামর্শ করে স্থির করো।”
Verse 10
नहुष उवाच कोटि: प्रदीयतां मूल्यं निषादेभ्य: पुरोहित । यदेतदपि नो मूल्यमतो भूय: प्रदीयताम्
নহুষ বললেন—“পুরোহিত! এই নিষাদদের মূল্য হিসেবে এক কোটি মুদ্রা দাও। আর যদি এটাও যথেষ্ট না হয়, তবে আরও বেশি দাও।”
Verse 11
च्यवन उवाच राजन् नाहंम्यहं कोटिं भूयो वापि महाद्युते । सदृशं दीयतां मूल्यं ब्राह्मणैः सह चिन्तय
চ্যবন বললেন—“হে রাজন, হে মহাতেজস্বী! আমি এক কোটি—বা তারও বেশি—মুদ্রায় বিক্রেয় নই। আমার জন্য যা যথোচিত, সেই প্রতিদান দাও; ব্রাহ্মণদের সঙ্গে পরামর্শ করে স্থির করো।”
Verse 12
नहुष उवाच अर्ध राज्यं समग्रं वा निषादेभ्य: प्रदीयताम् | एतन्मूल्यमहं मन्ये कि वान्यन्मन्यसे द्विज
নহুষ বললেন—“হে ব্রাহ্মণ! যদি তাই হয়, তবে এই নিষাদদের আমার অর্ধ রাজ্য—অথবা সমগ্র রাজ্যই—দিয়ে দেওয়া হোক। আমি এটাকেই আপনার যথোচিত মূল্য মনে করি। হে দ্বিজ, এর বাইরে আপনি আর কী মনে করেন?”
Verse 13
च्यवन उवाच अर्ध राज्यं समग्र च मूल्यं नाहामि पार्थिव । सदृशं दीयतां मूल्यमृषिभि: सह चिन्त्यताम्
চ্যবন বললেন—“হে পৃথিবীনাথ! আপনার অর্ধ রাজ্য বা সমগ্র রাজ্যও আমার যথোচিত মূল্য নয়। উপযুক্ত প্রতিদান দাও; আর যদি তার পরিমাপ তোমার মনে না আসে, তবে ঋষিদের সঙ্গে পরামর্শ করো।”
Verse 14
भीष्म उवाच महर्षेरवचनं श्रुत्वा नहुषो दुःखकर्शित: । स चिन्तयामास तदा सहामात्यपुरोहित:
ভীষ্ম বললেন—মহর্ষির বাক্য শুনে দুঃখে কাতর রাজা নহুষ গভীরভাবে বিচলিত হলেন। তখন তিনি মন্ত্রী ও পুরোহিতকে সঙ্গে নিয়ে কী করা উচিত তা নিয়ে পরামর্শ ও চিন্তা করতে লাগলেন।
Verse 15
तत्र त्वन्यो वनचर: कश्चिन्मूलफलाशन: । नहुषस्य समीपस्थो गविजातो5भवन्मुनि:
ভীষ্ম বললেন—সেখানে আর-এক বনচারী, যে মূল-ফল ভক্ষণ করে তপস্যা করত, নহুষের নিকটেই এক মুনি গোরূপে জন্ম নিলেন।
Verse 16
तोषयिष्याम्यहं क्षिप्रं यथा तुष्टो भविष्यति
“আমি শীঘ্রই এমনভাবে তাঁদের সন্তুষ্ট করব যে তাঁরা প্রসন্ন হবেন।”
Verse 17
नाहं मिथ्यावचो ब्रूयां स्वैरेष्वपि कुतो5न्यथा । भवतो यदहं ब्रूयां तत्कार्यममविशंकया
“রাজন! আমি স্বচ্ছন্দ কৌতুকেও মিথ্যা কথা বলি না; তবে এমন সময়ে অসত্য কীভাবে বলব? আমি যা বলব, আপনি তা নিঃসন্দেহে পালন করুন।”
Verse 18
नहुष उवाच ब्रवीतु भगवान् मूल्यं महर्षे: सदृशं भूगो: । परित्रायस्व मामस्मद्विषयं च कुलं च मे
নহুষ বললেন—“ভগবন! ভৃগুবংশীয় মহর্ষির যোগ্য যে মূল্য, তা বলুন। তা করে আমাকে, আমার রাজ্যকে এবং আমার কুলকে এই বিপদ থেকে উদ্ধার করুন।”
Verse 19
हन्याद्धि भगवान् क्रुद्धस्त्रलोक्यमपि केवलम् | किं पुनर्मा तपोहीनं बाहुवीर्यपरायणम्
ভগবান ক্রুদ্ধ হলে একাই ত্রিলোক ধ্বংস করতে পারেন; তবে তপোবলহীন, কেবল বাহুবলের উপর নির্ভরশীল আমার মতোকে বিনাশ করা তাঁর পক্ষে কতই বা কঠিন?
Verse 20
ये भगवान् च्यवन मुनि यदि कुपित हो जायँ तो तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकते हैं; फिर मुझ-जैसे तपोबलशून्य केवल बाहुबलका भरोसा रखनेवाले नरेशको नष्ट करना इनके लिये कौन बड़ी बात है? ।।
নহুষ বললেন—“পূজ্য মুনি চ্যবন ক্রুদ্ধ হলে তিন লোককে দগ্ধ করে ভস্ম করতে পারেন; তবে তপোবলহীন, কেবল বাহুবলে নির্ভর আমার মতো রাজাকে ধ্বংস করা তাঁর কাছে কতই বা কঠিন? আমি আমার মন্ত্রী ও ঋত্বিজ পুরোহিতসহ বিপদের অতল সাগরে ডুবে যাচ্ছি। হে মহর্ষি, আপনি নৌকা হয়ে আমাকে পার করান; উপযুক্ত প্রতিদানের সিদ্ধান্ত দিন।”
Verse 21
भीष्म उवाच नहुषस्य वच: श्रुत्वा गविजात: प्रतापवान् । उवाच हर्षयन् सर्वानमात्यान् पार्थिवं च तम्
ভীষ্ম বললেন—নহুষের কথা শুনে গাভীর গর্ভজাত সেই প্রতাপশালী মহর্ষি রাজা ও সকল মন্ত্রীকে আনন্দিত করে বললেন।
Verse 22
(ब्राह्मणानां गवां चैव कुलमेकं द्विधा कृतम् । एकत्र मन्त्रास्तिष्ठन्ति हविरन्यत्र तिष्ठतति ।।
“মহারাজ! ব্রাহ্মণ ও গোর বংশ এক, কিন্তু তা দুই রূপে বিভক্ত—এক স্থানে মন্ত্র, অন্য স্থানে হবি (যজ্ঞের আহুতি)। রাজন, দ্বিজগণ বর্ণসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ও অমূল্য; আর গোরাও, হে পুরুষব্যাঘ্র, মূল্যাতীত। অতএব সম্মান-চিহ্নরূপে একটি গোকেই ‘মূল্য’ নির্ধারণ করুন।”
Verse 23
महर्षि च्यवनका मूल्याड्कन नहुषस्तु ततः श्रुत्वा महर्षेवचनं नृप । हर्षेण महता युक्त: सहामात्यपुरोहितः,“नरेश्वर! महर्षिका यह वचन सुनकर मन्त्री और पुरोहितसहित राजा नहुषको बड़ी प्रसन्नता हुई
হে নরেশ্বর! মহর্ষির এই বাক্য শুনে, মন্ত্রী ও পুরোহিতসহ রাজা নহুষ মহা আনন্দে পরিপূর্ণ হলেন।
Verse 24
अभिगम्य भृगो: पुत्र च्यवनं संशितव्रतम् । इदं प्रोवाच नृपते वाचा संतर्पयज्निव,राजन! वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले भृगुपुत्र महर्षि च्यवनके पास जाकर उन्हें अपनी वाणीद्वारा तृप्त करते हुए-से बोले
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, ভৃগুপুত্র কঠোর ব্রতনিষ্ঠ মহর্ষি চ্যবনের নিকট গিয়ে, যেন শ্রদ্ধাভরা মধুর বাক্যে তাঁকে সন্তুষ্ট করে, এই কথা বলল।
Verse 25
नहुष उवाच उत्तिषोत्तिष्ठ विप्रर्षे गवा क्रीतोडसि भार्गव । एतन्मूल्यमहं मनन््ये तव धर्मभूतां वर
নহুষ বলল—উঠুন, উঠুন, ব্রাহ্মণঋষিদের শ্রেষ্ঠ! হে ভার্গব! এক গাভী দিয়ে আমি আপনাকে ক্রয় করেছি; ধর্মবানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, এটিই আমি আপনার যথোচিত মূল্য মনে করি।
Verse 26
व्यवन उवाच उत्तिष्ठाम्येष राजेन्द्र सम्यक् क्रीतो5स्मि तेडनघ । गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किंचिदिहाच्युत
চ্যবন বললেন—হে নিষ্পাপ রাজেন্দ্র, আমি এখন উঠছি। আপনি যথোচিত মূল্য দিয়ে আমাকে ক্রয় করেছেন। হে মর্যাদা থেকে কখনও বিচ্যুত না হওয়া নৃপতি, এই জগতে গাভীর সমান আর কোনো ধন আমি দেখি না।
Verse 27
कीर्तन श्रवर्णं दान॑ दर्शनं चापि पार्थिव | गवां प्रशस्यते वीर सर्वपापहरं शिवम्
হে বীর নৃপতি! গাভীর নাম ও গুণের কীর্তন ও শ্রবণ, গাভী দান, এবং গাভী দর্শন—শাস্ত্রে এ সকলের মহিমা বিশেষভাবে প্রশংসিত। এগুলি সর্বপাপহর ও পরম মঙ্গলদায়ক বলে ঘোষিত।
Verse 28
गावो लक्ष्म्या: सदा मूलं गोषु पाप्मा न विद्यते । अन्नमेव सदा गावो देवानां परमं हवि:
চ্যবন বললেন—গাভীই সর্বদা লক্ষ্মীর মূল; গাভীর মধ্যে পাপের লেশমাত্র নেই। গাভীই মানুষের জন্য সদা অন্নদাত্রী, আর দেবতাদের জন্য পরম হব্য।
Verse 29
स्वाहाकारवषट्कारीौ गोषु नित्यं प्रतिछ्ठितौ । गावो यज्ञस्य नेत्र्यो वै तथा यज्ञस्य ता मुखम्,स्वाहा और वषट्कार सदा गौआओंमें ही प्रतिष्ठित होते हैं। गौएँ ही यज्ञका संचालन करनेवाली तथा उसका मुख हैं
‘স্বাহা’ ও ‘বষট্’—এই যজ্ঞধ্বনি সদাই গাভীদের মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত। গাভীরাই যজ্ঞকে পথ দেখায়, আর গাভীরাই যজ্ঞের মুখ।
Verse 30
अमृतं हाृव्ययं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च । अमृतायतनं चैता: सर्वलोकनमस्कृता:,वे विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती और दुहनेपर अमृत ही देती हैं। वे अमृतकी आधारभूत हैं। सारा संसार उनके सामने नतमस्तक होता है
তারা দিব্য, অবিনশ্বর অমৃত ধারণ করে এবং দোহনে অমৃতই ঝরায়। তারাই অমৃতের আশ্রয় ও আধার; সকল লোক তাদের প্রতি নতমস্তক।
Verse 31
तेजसा वपुषा चैव गावो वह्लिसमा भुवि | गावो हि सुमहत् तेज: प्राणिनां च सुखप्रदा:,इस पृथ्वीपर गौएँ अपनी काया और कान्तिसे अग्निके समान हैं। वे महान् तेजकी राशि और समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाली हैं
এই পৃথিবীতে গাভীরা তাদের দেহ ও দীপ্তিতে অগ্নির সমান। গাভীরাই মহাতেজের আধার এবং সকল প্রাণীর কল্যাণ ও সুখদাত্রী।
Verse 32
निविष्टं गोकुलं यत्र श्वासं मुडचति निर्भयम् । विराजयति त॑ देशं पापं चास्यापकर्षति
যেখানে গাভীদের পাল বসে নির্ভয়ে নিশ্বাস ফেলে, সেই স্থানকে তারা শোভিত করে এবং সেই দেশের পাপও আকর্ষণ করে দূর করে দেয়।
Verse 33
गाव: स्वर्गस्य सोपानं गाव: स्वर्गेडपि पूजिता: । गाव: कामदुहो देव्यो नान्यत् किंचित् परं स्मृतम्
গাভীরাই স্বর্গে ওঠার সোপান; স্বর্গেও গাভীরা পূজিত। গাভীরা কামধেনু-স্বরূপা দেবী—তাদের চেয়ে উচ্চতর আর কিছু স্মরণ করা হয় না।
Verse 34
इत्येतद् गोषु मे प्रोक्त माहात्म्यं भरतर्षभ । गुणैकदेशवचनं शक्यं पारायणं न तु
এইভাবে, হে ভরতবংশের শ্রেষ্ঠ! আমি তোমাকে গাভীদের মাহাত্ম্য বললাম। কিন্তু যা বলা হল তা তাদের গুণের কেবল একাংশ; কিছু বলা সম্ভব, সম্পূর্ণ গুণসমূহের পূর্ণ পাঠ বা সমাপ্তি করা সম্ভব নয়।
Verse 35
भरतश्रेष्ठ! यह मैंने गौओंका माहात्म्य बताया है। इसमें उनके गुणोंका दिग्दर्शन मात्र कराया गया है। गौओंके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता ।।
নিষাদরা বলল—মুনে! আমরা আপনার দর্শনও করেছি এবং আপনার সঙ্গে কথাও বলেছি। সজ্জনদের মধ্যে তো সঙ্গে সাত পা চললেই মৈত্রী স্থাপিত হয়; অতএব, প্রভো! আমাদের প্রতি প্রসন্ন হয়ে কৃপা করুন।
Verse 36
हवींषि सर्वाणि यथा हुपभुड्धक्ते हुताशन: । एवं त्वमपि धर्मात्मन् पुरुषाग्नि: प्रतापवान्
ব্যাস বললেন—ধর্মাত্মন! যেমন হব্যভোজী অগ্নিদেব সকল আহুতি গ্রাস করেন, তেমনি আপনিও ‘পুরুষাগ্নি’র ন্যায় প্রতাপশালী; আমাদের দোষ ও দুর্গুণ দগ্ধ করতে সক্ষম।
Verse 37
प्रसादयामहे विद्वन् भवन्तं प्रणता वयम् । अनुग्रहार्थमस्माकमियं गौ: प्रतिगृह्यताम्
হে বিদ্বান! আমরা নতশিরে আপনাকে প্রসন্ন করতে চাই। আমাদের প্রতি অনুগ্রহ করার জন্য এই গাভীটি গ্রহণ করুন।
Verse 38
(अत्यन्तापदि मग्नानां परित्राणं हि कुर्वताम् । या गतिर्विदिता त्वद्य नरके शरणं भवान् ।।
চ্যবন বললেন—হে নিষাদগণ! দীন-দুঃখীর, মুনির এবং বিষধর সাপের ক্রুদ্ধ দৃষ্টি মানুষকে শিকড়সমেত দগ্ধ করে—যেমন জ্বলন্ত অগ্নি শুকনো ঘাসঝাড়কে ভস্ম করে দেয়।
Verse 39
प्रतिगृह्नामि वो धेनुं कैवर्ता मुक्तकिल्बिषा: | दिवं गच्छत वै क्षिप्रं मत्स्यै: सह जलोद्धवै:
হে মল্লাহগণ! তোমাদের প্রদত্ত গাভী আমি গ্রহণ করলাম। এই গোদান-প্রভাবে তোমাদের সকল পাপ মোচন হয়েছে। এখন তোমরা জলজাত এই মাছগুলির সঙ্গে শীঘ্রই স্বর্গে গমন কর।
Verse 40
भीष्म उवाच ततस्तस्य प्रभावात् ते महर्षेर्भावितात्मन: । निषादास्तेन वाक्येन सह मत्स्यैर्दिवं ययु:
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! তারপর বিশুদ্ধচিত্ত মহর্ষি চ্যবনের সেই বাক্য উচ্চারিত হতেই তাঁর প্রভাবে সেই নিষাদ (মল্লাহ)রা মাছগুলির সঙ্গে স্বর্গলোকে গমন করল।
Verse 41
ततः स राजा नहुषो विस्मित: प्रेक्ष्य धीवरान् । आरोहमाणांस्त्रिदिवं मत्स्यांक्ष भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ] उस समय उन मल्लाहों और मत्स्योंको भी स्वर्गलोककी ओर जाते देख राजा नहुषको बड़ा आश्चर्य हुआ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তখন সেই মল্লাহদের এবং মাছগুলিকেও স্বর্গলোকে আরোহণ করতে দেখে রাজা নহুষ বিস্ময়ে অভিভূত হলেন।
Verse 42
ततस्तौ गविजश्नैव च्यवनश्न भूगूद्वह: । वराभ्यामनुरूपाभ्यां छन्दयामासतुर्न॒ुपम्
তারপর গাবিজ এবং ভৃগুকুলশ্রেষ্ঠ চ্যবন—এই দুইজন—রাজাকে তাঁর মর্যাদার উপযুক্ত দুই বর প্রদান করে তাঁর সম্মতি অর্জনের জন্য তাঁকে সন্তুষ্ট করতে লাগলেন।
Verse 43
तत्पश्चात् गौसे उत्पन्न महर्षि और भृगुनन्दन च्यवन दोनोंने राजा नहुषसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा ।। ततो राजा महावीर्यों नहुष: पृथिवीपति: । परमित्यब्रवीत् प्रीतस्तदा भरतसत्तम
তারপর গাবিজ-জাত মহর্ষি এবং ভৃগুনন্দন চ্যবন—এই দুইজন—রাজা নহুষকে ইচ্ছামতো বর চাইতে বললেন। তখন মহাবীর্য পৃথিবীপতি রাজা নহুষ আনন্দিত হয়ে বললেন—“পরম (তথাস্তु),” হে ভরতসত্তম!
Verse 44
भरतभूषण! तब वे महापराक्रमी भूपाल राजा नहुष प्रसन्न होकर बोले--“बस, आपलोगोंकी कृपा ही बहुत है' ।।
তখন ইন্দ্রসম দীপ্তিমান নৃপতি ধর্মে স্থিত থাকার বর প্রার্থনা করলেন। দুই ঋষি প্রসন্ন হয়ে বললেন—“তথাস্তु”। তাতে আনন্দিত রাজা যথাবিধি উভয় ঋষির পূজা ও সম্মান করলেন।
Verse 45
समाप्तदीक्षश्ष्यवनस्ततोडगच्छत् स्वमाश्रमम् | गविजश्न महातेजा: स्वमाश्रमपर्द ययौ
সেদিন মহর্ষি চ্যবনের দীক্ষা সম্পূর্ণ হলে তিনি নিজ আশ্রমে গমন করলেন। তারপর মহাতেজস্বী গবিষ্ঠ (গোজাত) মুনিও নিজের আশ্রমে প্রত্যাবর্তন করলেন।
Verse 46
निषादाश्च दिवं जग्मुस्ते च मत्स्या जनाधिप । नहुषो5पि वरं लब्ध्वा प्रविवेश स्वकं पुरम्,नरेश्वर! वे मलल्लाह और मत्स्य तो स्वर्गलोकमें चले गये और राजा नहुष भी वर पाकर अपनी राजधानीको लौट आये
হে জনাধিপ! নিষাদ ও মৎস্যগণ স্বর্গলোকে গমন করল; আর নহুষ রাজাও বর লাভ করে নিজের রাজধানীতে প্রবেশ করলেন।
Verse 47
एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि । दर्शने यादृश: स्नेह: संवासे वा युधिछ्िर
বৎস, তুমি যা জিজ্ঞাসা করেছিলে, তাই আমি তোমাকে বললাম। হে যুধিষ্ঠির, কেবল দর্শনে যে স্নেহ জন্মায় আর সহবাসে যে স্নেহ—তাও এই কাহিনিতে স্পষ্ট হয়েছে।
Verse 48
महाभाग्यं गवां चैव तथा धर्मविनिश्चयम् । कि भूय: कथ्यतां वीर कि ते हृदि विवक्षितम्
গোর মহাভাগ্য এবং এ বিষয়ে ধর্মের স্থির সিদ্ধান্তও আমি বলেছি। হে বীর, আর কী বলব? তোমার হৃদয়ে আর কী শোনার বাসনা আছে?
Verse 51
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने एकपज्चाशत्तमो5ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে চ্যবনোপাখ্যানের অন্তর্গত একান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 156
स तमाभाष्य राजानमब्रवीद् द्विजसत्तम: । इतनेहीमें फल-मूलका भोजन करनेवाले एक दूसरे वनवासी मुनि, जिनका जन्म गायके पेटसे हुआ था, राजा नहुषके समीप आये और वे द्विजश्रेष्ठ उन्हें सम्बोधित करके कहने लगे--
এইভাবে রাজাকে সম্বোধন করে দ্বিজশ্রেষ্ঠ বললেন। ঠিক তখনই ফল-মূলভোজী অন্য বনবাসী মুনিগণ—যাঁদের জন্ম গাভীর উদর থেকে হয়েছে বলে শোনা যায়—রাজা নহুষের নিকট উপস্থিত হলেন। তখন দ্বিজশ্রেষ্ঠ তাঁদের সম্বোধন করে কথা আরম্ভ করলেন।
Kuśika must interpret an overwhelming sensory spectacle without losing discernment—testing whether a ruler’s perception is governed by curiosity and desire or by disciplined inquiry and humility.
Extraordinary power is portrayed as secondary to its foundation: tapas and mastery of the senses. The chapter teaches that ethical self-governance is a prerequisite for stable external governance.
Rather than a formal phalaśruti, the text embeds an evaluative claim: Cyavana affirms Kuśika’s moral purity and sense-restraint, presenting the sage’s approval (prasāda) and the offer of a boon as the operative “result” of disciplined conduct.