Adhyaya 52
Anushasana ParvaAdhyaya 5230 Verses

Adhyaya 52

च्यवन-कुशिक-संवादः (Cyavana–Kuśika Dialogue on Hospitality, Service, and Lineage Questions)

Upa-parva: Upākhyāna on Cyavana and Kuśika (Genealogical-Ethical Inquiry framing Paraśurāma/Viśvāmitra themes)

Yudhiṣṭhira articulates a multi-part doubt: he seeks a full account of Jāmadagnya Rāma’s emergence, how kṣatra-like conduct appears within a brahmarṣi lineage, and how lineage transitions (including Kuśika’s line becoming brāhmaṇa-associated) are to be understood; he also asks about a perceived flaw concerning succession beyond sons. Bhīṣma introduces an ancient exemplum: the Bhārgava sage Cyavana, anticipating an impending fault within Kuśika’s clan, approaches King Kuśika and expresses a desire to dwell with him. Kuśika affirms the learned norm of sahadharma in giving and duty, offers reparative action for any transgression, and then formally receives the sage with seat, water for feet, and madhuparka according to rite. Cyavana declines wealth and power, instead institutes a niyama: he will sleep undisturbed; Kuśika and his wife must remain awake at night, massaging his feet and maintaining vigilant service. The couple complies with disciplined attentiveness; Cyavana sleeps for twenty-one days on one side while the royal pair, fasting and fatigued, continues service. Upon waking, Cyavana departs without comment; the couple follows, exhausted, until the sage vanishes from sight. Kuśika, after recovering, renews the search—leaving the narrative poised for the next doctrinal or genealogical inference.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, समाज में ‘पुत्र’ किसे कहा जाए—इस पर सुनी हुई अनेक परस्पर-विरोधी मान्यताओं को सामने रखकर भीष्म से आग्रह करते हैं कि वे संदेह का छेदन करें और वर्ण-व्यवस्था के संदर्भ में पुत्रों के भेद स्पष्ट करें। → भीष्म क्रमशः पुत्र-परिभाषाओं की परतें खोलते हैं—कौन ‘आत्मज’ है, कौन ‘क्षेत्रज’ या अन्य प्रकार का; और जब संतान जन्म से नहीं, पालन-पोषण, संस्कार, स्वामित्व और सामाजिक स्वीकृति से पहचानी जाने लगे, तब अधिकार, गोत्र, वर्ण और उत्तराधिकार के प्रश्न तीखे हो उठते हैं। → निर्णायक बिंदु तब आता है जब भीष्म ‘अस्वामिक’ (अनाथ/अस्वीकृत) बालक के विषय में कहते हैं कि वर्तमान में जो उसका स्वामी/पालक प्रत्यक्ष है, वही उसके पालन का दायित्व उठाता है और उसी के अनुसार उसका वर्ण-सम्बन्ध/सामाजिक स्थिति निर्धारित होती है—अर्थात जन्म-रहस्य से अधिक निर्णायक ‘धर्मसम्मत स्वीकृति और संस्कार’ बन जाते हैं। → भीष्म संस्कार, गोत्र-निर्णय और विवाह-व्यवहार तक के नियमों को समेटते हुए बताते हैं कि जहाँ मातृ-वर्ण/गोत्र का निश्चय हो, वहाँ कानीन/आढ्यूढ (विवाह-पूर्व/विवाह-संबंधी जटिल स्थितियों) जैसे पुत्रों के लिए भी शास्त्रीय व्यवस्था है; और युधिष्ठिर से पूछते हैं कि अब और क्या सुनना चाहते हो—इस प्रकार विषय को विधि-संगत निष्कर्ष तक पहुँचाते हैं। → भीष्म का प्रश्न—“अब और क्या श्रोतुमिच्छसि?”—अगले अध्याय में पुत्र-धर्म/प्रतिनिधि-व्यवस्था के और सूक्ष्म भेदों की ओर द्वार खोल देता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ प्रात बछ। अं काज जा एकोनपज्चाशत्तमो<ड्ध्याय: नाना प्रकारके पुत्रोंका वर्णन युधिष्ठिर उदाच ब्रूहि तात कुरुश्रेष्ठ वर्णानां त्वं पूथक्‌ पृथक्‌ । कीदृश्यां कीदृशाश्नापि पुत्रा: कस्य च के च ते

যুধিষ্ঠির জিজ্ঞাসা করলেন—তাত! হে কুরুশ্রেষ্ঠ! আপনি বর্ণসম্বন্ধে ক্রমানুসারে পৃথক্ পৃথক্ করে বলুন—কেমন নারীর গর্ভে কেমন পুত্র জন্মায়? আর কোন পুত্র কার বলে গণ্য হয়?

Verse 2

विप्रवादा: सुबहव: श्रूयन्ते पुत्रकारिता: । अत्र नो मुहतां राजन्‌ संशयं छेत्तुमहसि

ভীষ্ম বললেন—পুত্রপ্রাপ্তি বিষয়ে পণ্ডিতদের নানা ও বিচিত্র মত শোনা যায়। হে রাজন, এ বিষয়ে আমরা বিভ্রান্ত হয়ে স্থির সিদ্ধান্তে পৌঁছাতে পারি না; অতএব আপনি আমাদের সংশয় ছিন্ন করুন।

Verse 3

भीष्म उवाच आत्मा पुत्रश्न विज्ञेयस्तस्यानन्तरजश्न यः । निरुक्तजश्न विज्ञेय: सुत: प्रसृतजस्तथा

ভীষ্ম বললেন—যে পুত্র স্বামী-স্ত্রীর সংযোগে তৃতীয় কারও হস্তক্ষেপ ছাড়া, কেবল স্বামীর বীর্য থেকেই জন্মায়, সে ‘অনন্তরজ’ (ঔরস); তাকে নিজের আত্মারই সমান জ্ঞান করা উচিত। দ্বিতীয়টি ‘নিরুক্তজ’ এবং তৃতীয়টি ‘প্রসৃতজ’। (এই দুইটি ক্ষেত্রজ পুত্রেরই উপভেদ।)

Verse 4

पतितस्य तु भार्याया भर्त्रा सुसमवेतया । तथा दत्तकृतौ पुत्रावध्यूदक्ष तथापर:

ভীষ্ম বললেন—যদি পুরুষ পতিত হয়, তবু তার স্ত্রী স্বামীর সঙ্গে বিধিমতে যুক্ত থাকে, তবে দত্তক/নিয়োগ দ্বারা প্রাপ্ত এবং অন্যান্যভাবে প্রাপ্ত পুত্রও, অন্যান্য স্বীকৃত ক্ষেত্রে যেমন, তেমনি উদক-তর্পণ প্রভৃতি ক্রিয়ার অধিকারী বলে গণ্য হয়।

Verse 5

पतित पुरुषका अपनी स्त्रीके गर्भसे स्वयं ही उत्पन्न किया हुआ पुत्र चौथी श्रेणीका पुत्र है। इसके सिवा “दत्तक' और “क्रीत' पुत्र भी होते हैं। ये कुल मिलाकर छः हुए। सातवाँ है “अध्यूढ” पुत्र (जो कुमारी-अवस्थामें ही माताके पेटमें आ गया और विवाह करनेवालेके घरमें आकर जिसका जन्म हुआ) ।।

ভীষ্ম বললেন—এছাড়াও ছয় প্রকার ‘অপধ্বংসজ’ পুত্র আছে; তদুপরি ‘কানীন’ ও ‘অপসদ’ও বলা হয়েছে। হে ভারত! এ সকল প্রকার এখানে গণনা করা হল; ধর্মবিচারে এগুলিকে স্বীকৃত পুত্রভেদ বলে জেনো।

Verse 6

युधिछिर उवाच षडपध्वंसजा: के स्यु: के वाप्पपसदास्तथा । एतत्‌ सर्व यथातत्त्वं व्याख्यातुं मे त्वमरहसि

যুধিষ্ঠির জিজ্ঞাসা করলেন—পিতামহ! ছয় প্রকার ‘অপধ্বংসজ’ পুত্র কারা, এবং ‘অপসদ’ কাদের বলা হয়? এ সবই আপনি আমাকে যথার্থভাবে ব্যাখ্যা করুন।

Verse 7

भीष्म उवाच त्रिषु वर्णेषु ये पुत्रा ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर । वर्णयोश्ष द्वयो: स्यातां यौ राजन्यस्य भारत

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! ব্রাহ্মণের ক্ষেত্রে ক্ষত্রিয়, বৈশ্য ও শূদ্র—এই তিন বর্ণের নারীদের গর্ভে যে পুত্র জন্মায়, এই বিধানে তারা তিন প্রকার বলে গণ্য। আর হে ভারত! ক্ষত্রিয়ের ক্ষেত্রে অধস্তন দুই বর্ণের নারীদের গর্ভে যে পুত্র জন্মায়, তারা দুই প্রকার বলে কথিত।

Verse 8

एको विड्वर्ण एवाथ तथात्रैवोपलक्षित: । षडपध्वंसजास्ते हि तथैवासपदान्‌ शृणु

ভীষ্ম বললেন—এখানেও একটি মিশ্র বর্ণ বিশেষভাবে নির্দেশিত হয়েছে। সত্যই, এই আলোচনাতেই এই ছয় ‘অপধ্বংসজ’ (অনুলোম-সন্তান) উল্লেখ করা হয়েছে। এখন ‘অপসদ’—অর্থাৎ প্রতিলোম সংযোগে জন্ম—তাদের বিবরণ শোনো।

Verse 9

चाण्डालो व्रात्यवैद्यौ च ब्राह्म॒ण्यां क्षत्रियासु च वैश्यायां चैव शूद्रस्य लक्ष्यन्तेडपसदास्त्रय:

ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণী, ক্ষত্রিয়া ও বৈশ্যা—এই নারীদের গর্ভে শূদ্রের দ্বারা যে পুত্র জন্মায়, তারা ক্রমে চাণ্ডাল, ব্রাত্য ও বৈদ্য নামে পরিচিত। এরা ‘অপসদ’-এর তিন প্রকার।

Verse 10

मागधो वामकइश्नैव द्वौ वैश्यस्योपलक्षितौ । ब्राह्माण्यां क्षत्रियायां च क्षत्रियस्यैक एव तु

ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণী ও ক্ষত্রিয়ার গর্ভে বৈশ্যের দ্বারা যে পুত্র জন্মায়, তারা যথাক্রমে মাগধ ও বামক নামে দুই প্রকার ‘অপসদ’ বলে গণ্য। কিন্তু ক্ষত্রিয়ের ক্ষেত্রে এমন কেবল একটিই পুত্র স্বীকৃত—ব্রাহ্মণীর গর্ভে জন্ম, যার নাম ‘সূত’।

Verse 11

ब्राह्माण्यां लक्ष्यते सूत इत्येतेडपसदा: स्मृता: । पुत्रा होते न शक्‍्यन्ते मिथ्याकर्तु नराधिप

ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণীর গর্ভে যে পুত্র জন্মায়, সে ‘সূত’ নামে পরিচিত; এরা সকলেই ‘অপসদ’ বলে স্মৃত। হে নরাধিপ! এদেরকে মিথ্যা বলে উড়িয়ে দেওয়া যায় না।

Verse 12

युधिछिर उवाच क्षेत्रजं केचिदेवाहुः सुतं केचित्तु शुक्रजम्‌ । तुल्यावेतौ सुतौ कस्य सन्मे ब्रूहि पितामह

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! কেউ বলেন স্ত্রীর গর্ভে জন্মানো পুত্র ‘ক্ষেত্রজ’, আবার কেউ বলেন পুরুষের বীর্যজাত পুত্রই ‘শুক্রজ’ ও প্রকৃত পুত্র। এ দুই পুত্র কি মর্যাদায় সমান? অধিকার কার—স্ত্রীর স্বামীর, না গর্ভাধানকারী পুরুষের? স্পষ্ট করে বলুন।

Verse 13

भीष्म उवाच रेतजो वा भवेत्‌ पुत्रस्त्यक्तो वा क्षेत्रजो भवेत्‌ अध्यूढ: समयं भिनत्त्वेत्येतददेव निबोध मे

ভীষ্ম বললেন—রাজন! নিজের বীর্যজাত পুত্র তো অবশ্যই নিজের। আর ‘ক্ষেত্রজ’ পুত্রও, যদি গর্ভাধানকারী পুরুষ তার দাবি ত্যাগ করে, তবে ক্ষেত্রস্বামী (স্বামী)-এরই পুত্র বলে গণ্য হয়। ‘অধ্যূঢ়’ পুত্রের ক্ষেত্রেও একই কথা—সময়/চুক্তির ভেদে অধিকার নির্ধারিত হয়।

Verse 14

युधिषछ्िर उवाच रेतजं विद्य वै पुत्र क्षेत्रजस्यागम: कथम्‌ | अध्यूढं विद्य वै पुत्र भित्ता तु समयं कथम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আমরা তো বীর্যজাত পুত্রকেই পুত্র বলে জানি। তবে বীর্য ছাড়া ‘ক্ষেত্রজ’ পুত্রের আগমন কীভাবে সম্ভব? আর ‘অধ্যূঢ়’কে কোন নিয়মে, কোন ‘সময়-ভেদে’ পুত্র বলে মানতে হবে?

Verse 15

भीष्म उवाच आत्मजं पुत्रमुत्पाद्य यस्त्यजेत्‌ कारणान्तरे । न तत्र कारणं रेत: स क्षेत्रस्वामिनो भवेत्‌

ভীষ্ম বললেন—বৎস! যে পুরুষ নিজের বীর্য থেকে পুত্র উৎপন্ন করে অন্য কোনো কারণে তাকে ত্যাগ করে, সেখানে কেবল বীর্য-স্থাপনই অধিকার স্থাপনের কারণ থাকে না। সে পুত্র ক্ষেত্রস্বামী (গৃহ-वंশের দায়বদ্ধ ব্যক্তি)-এর বলে গণ্য হয়।

Verse 16

पुत्रकामो हि पुत्रार्थे यां वृणीते विशाम्पते । क्षेत्रजं तु प्रमाणं स्यान्न वै तत्रात्मज: सुत:

ভীষ্ম বললেন—প্রজানাথ! যে পুরুষ পুত্রকামনায় কেবল পুত্রলাভের উদ্দেশ্যে গর্ভবতী নারীকে স্ত্রী হিসেবে গ্রহণ করে, তার গর্ভ থেকে জন্মানো ‘ক্ষেত্রজ’ পুত্র আইনত সেই বিবাহকারী স্বামীরই পুত্র বলে স্বীকৃত। সেখানে গর্ভাধানকারীর কোনো অধিকার থাকে না।

Verse 17

अन्यत्र क्षेत्रज: पुत्रो लक्ष्यते भरतर्षभ । न हाात्मा शक्‍्यते हन्तुं दृष्टान्तोपगतो हासौ

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! অন্যের ক্ষেত্রে জন্মানো পুত্র নানা লক্ষণে চিহ্নিত হয়ে যায়—সে কার পুত্র। কেউ নিজের প্রকৃত পরিচয় ঢাকতে পারে না; তা আপনিই প্রকাশ পায়।

Verse 18

क्वचिच्च कृतक: पुत्र: संग्रहादेव लक्ष्यते । न तत्र रेत: क्षेत्र वा यत्र लक्ष्येत भारत

কখনও কখনও ‘কৃতক’ (কৃত্রিম/দত্তক) পুত্র কেবল গ্রহণ ও আশ্রয়দানের দ্বারাই পুত্ররূপে চিহ্নিত হয়। হে ভারত, সেখানে না বীজ (রেতঃ), না ক্ষেত্র (গর্ভ) — যেখানে গ্রহণই লক্ষণ, সেখানে এগুলিই খোঁজা হয় না।

Verse 19

भरतनन्दन! कहीं-कहीं कृत्रिम पुत्र भी देखा जाता है। वह ग्रहण करने या अपना मान लेने मात्रसे ही अपना हो जाता है। वहाँ वीर्य या क्षेत्र कोई भी उसके पुत्रत्व-निश्चयमें कारण होता दिखायी नहीं देता ।।

যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভারত! যে কেবল গ্রহণ করলেই পুত্ররূপে পরিচিত হয়, আর যেখানে পুত্রত্ব নির্ণয়ে না শুক্র (বীজ) না ক্ষেত্র (গর্ভ) কোনো প্রমাণ বলে গণ্য হয়—সে ‘কৃতক’ পুত্র কেমন?

Verse 20

भीष्म उवाच मातापितृभ्यां यस्त्यक्तः पथि यस्तं प्रकल्पयेत्‌ । न चास्य मातापितरी ज्ञायेतां स हि कृत्रिम:

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! যে শিশুকে তার মাতা-পিতা পথে ফেলে যায়, এবং অনুসন্ধান করেও যার মাতা-পিতার পরিচয় জানা যায় না—যে তাকে গ্রহণ করে লালন-পালন করে, সেই-ই তার ‘কৃতক’ পিতা; আর সেই শিশু তার ‘কৃতক’ পুত্র।

Verse 21

अस्वामिकस्य स्वामित्वं यस्मिन्‌ सम्प्रति लक्ष्यते । यो वर्ण: पोषयेत्‌ तं च तद्धर्णस्तस्य जायते

যে অনাথের কোনো স্বামী/অভিভাবক নেই, তার ক্ষেত্রে বর্তমানে যাকে অভিভাবক রূপে দেখা যায় এবং যে তাকে পালন-পোষণ করে—তার যে বর্ণ, সেই বর্ণই ঐ শিশুরও গণ্য হয়।

Verse 22

युधिछिर उवाच कथमस्य प्रयोक्तव्य: संस्कार: कस्य वा कथम्‌ । देया कन्या कथं चेति तन्मे ब्रूहि पितामह

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! এই শিশুর সংস্কার কীভাবে করা উচিত, এবং কার বর্ণের বিধি অনুসারে? তার প্রকৃত বর্ণ কীভাবে নির্ণয় করা যায়? আর কোন রীতিতে, কোন সম্প্রদায়ের কন্যাকে তার বিবাহে দেওয়া উচিত— এ সব আমাকে বলুন।

Verse 23

भीष्म उवाच आत्मवत्‌ तस्य कुर्वीत संस्कारं स्वामिवत्‌ तथा । त्यक्तो मातापितृभ्यां यः सवर्ण प्रतिपद्यते

ভীষ্ম বললেন— বৎস! এমন শিশুর সংস্কার নিজের সন্তানের মতোই, এবং আশ্রিতের মতোই করা উচিত। যাকে পিতা-মাতা ত্যাগ করেছে, সে যে অভিভাবক তাকে গ্রহণ করে পালন করে, তারই বর্ণে গণ্য হয়; অতএব পালক পিতার উচিত নিজের বর্ণানুসারে তার সংস্কার সম্পন্ন করা।

Verse 24

तदगोत्रबन्धुजं तस्य कुर्यात्‌ संस्कारमच्युत । अथ देया तु कन्या स्यात्‌ तद्वर्णस्य युधिछ्िर

ভীষ্ম বললেন— ধর্মে অচ্যুত যুধিষ্ঠির! পালক পিতার একই গোত্রের আত্মীয়দের যেভাবে সংস্কার হয়, সেভাবেই এরও সংস্কার করা উচিত; এবং পরে সেই একই বর্ণের কন্যাই তার বিবাহে দেওয়া উচিত।

Verse 25

संस्कर्तु वर्णगोत्रं च मातृवर्णविनि श्चये । कानीनाध्यूढजौ वापि विज्ञेयौ पुत्र किल्बिषौ

ভীষ্ম বললেন— বৎস! যদি মাতার বর্ণ ও গোত্র নিশ্চিতভাবে জানা যায়, তবে সংস্কারের জন্য মাতারই বর্ণ ও গোত্র গ্রহণ করা উচিত। আর ‘কানীন’ ও ‘অধ্যূঢ়জ’— এই দুই প্রকার পুত্রকে দোষযুক্ত (কলুষিত অবস্থাসম্পন্ন) বলে জানবে।

Verse 26

तावपि स्वाविव सुतौ संस्कार्याविति निश्चय: । क्षेत्रजो वाप्यपसदो ये<वध्यूढास्तेषु चाप्युत

ভীষ্ম বললেন— ঐ দুই প্রকার পুত্রেরও নিজের সন্তানের মতোই সংস্কার করা উচিত— এটাই শাস্ত্রের স্থির সিদ্ধান্ত। আর ক্ষেত্রজ, অপসদ ও অবধ্যূঢ়— এই সব প্রকার পুত্রকেও নিজের মতোই সংস্কার দেওয়ার বিধান আছে। বর্ণ-সম্পর্কিত সংস্কারের বিষয়ে ধর্মশাস্ত্রগুলির সিদ্ধান্ত এটাই দেখা যায়। আমি সবই তোমাকে বললাম; আর কী শুনতে চাও?

Verse 27

आत्मवद्‌ वै प्रयुड्जीरन्‌ संस्कारान्‌ ब्राह्मणादय: । धर्मशास्त्रेषु वर्णानां निश्चयो<यं प्रदृश्यते

ভীষ্ম বললেন— ব্রাহ্মণ প্রভৃতি বর্ণের লোকদের উচিত, নিজেদের জন্য যেমন সংস্কার বিধান করা হয়, তেমনি পুত্রদের জন্যও সেই নির্দিষ্ট সংস্কার সম্পাদন করা। বর্ণসমূহের সংস্কার-বিষয়ে ধর্মশাস্ত্রে এই সিদ্ধান্তই সুপ্রতিষ্ঠিত।

Verse 28

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं कि भूय: श्रोतुमिच्छसि

ভীষ্ম বললেন— এ সবই তোমাকে সম্পূর্ণভাবে বলা হলো; এখন আর কী শুনতে চাও?

Verse 48

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके प्रसंगमें वर्णयंकरकी उत्पत्तिका वर्णणविषयक अड्भधतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে, বিবাহধর্মের প্রসঙ্গে, বর্ণসংকর-উৎপত্তির বর্ণনাবিষয়ক অষ্টচত্বারিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 49

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे पुत्रप्रतिनिधिकथने एकोनपज्चाशत्तमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে, বিবাহধর্মের প্রসঙ্গে, পুত্র-প্রতিনিধি নির্ধারণ-বিষয়ক ঊনপঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns how to interpret lineage and duty when social roles appear to cross expected boundaries (brahmarṣi vs. kṣatra conduct) and how a householder-king should uphold hospitality and vows even when the obligations impose severe personal hardship.

Dharma is demonstrated through disciplined action: correct reception of guests, truthful consent to a niyama, and sustained service without resentment are treated as measurable indicators of moral steadiness and as causes with long-range social and genealogical effects.

No explicit phalaśruti appears within this chapter segment; its meta-function is pedagogical—Bhīṣma frames the narrative as an itihāsa exemplar intended to clarify Yudhiṣṭhira’s doubt about lineage irregularities and the ethical mechanics underlying them.