Adhyaya 45
Anushasana ParvaAdhyaya 4534 Verses

Adhyaya 45

Śulka, Kanyā, and Dauhitra-Riktha: Discourse on Bride-Price and Inheritance Rights (शुल्क-कन्या-दौहित्र-रिक्थविचारः)

Upa-parva: Dāna-Dharma and Social Jurisprudence (Inheritance & Marriage-Custom Discourse)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma how to proceed when a maiden has been assigned a śulka (bride-price/consideration) yet no husband is forthcoming. Bhīṣma responds by analogizing the case to inheritance settlement for an heirless person, then addresses the moral and legal implications of treating marriage as purchase. The chapter distinguishes dharma validated by sādhus’ conduct (sadācāra) from practices that may be observed but remain ethically defective. It cites an instructive precedent and critiques “asad-ācāra” as unworthy of repetition, framing such deviation as a form of dharma-confusion tied to greed. The discourse then shifts to inheritance: daughter is equated with son in relation to the father’s selfhood, and the dauhitra (daughter’s son) is presented as a legitimate inheritor for an पुत्रहीन (sonless) father, including ritual reciprocity (piṇḍa offerings) to paternal and maternal ancestors. The chapter concludes with a strong denunciation of selling children or giving a daughter for price, portraying such acts as morally ruinous and economically futile when wealth is gained through adharma.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से विपुल की कथा छेड़ते हैं—गुरु की आज्ञा से दिव्य पुष्प लाने निकला शिष्य, और साथ ही उसके भीतर उठता हुआ अपने ही दुष्कर्मों का स्मरण। → तपस्या और गुरु-पत्नी की रक्षा जैसे पुण्यकर्म से विपुल के मन में सूक्ष्म गर्व जन्म लेता है—वह स्वयं को ‘उभय लोक-विजयी’ मानने लगता है। मार्ग में विचित्र संकेत, गिरते हुए अम्लान पुष्पों का देश, और परस्पर ‘नेति-नेति’ कहते दो जन—ये सब उसके भीतर के द्वंद्व को तीखा करते हैं। → सोने-चाँदी के पासों के साथ लोभ-हर्ष में डूबे पुरुषों का दर्शन और उनसे जुड़ी शपथ/वचन-प्रसंग विपुल को भीतर तक झकझोर देता है; वह पहचान लेता है कि बाह्य तप के बीच अंतःकरण में लोभ, हर्ष, गर्व जैसे दोष ही वास्तविक पतन हैं—और वह इसे अपने ‘आत्मनि दुष्कृत’ के रूप में स्वीकार करता है। → विपुल चम्पा नगरी लौटकर गुरु को पुष्प अर्पित करता है और विधिवत् पूजन करता है—कर्म की पूर्णता के साथ अहं का शमन भी करता है; गुरु-भक्ति और आत्म-निरीक्षण से कथा स्थिर होती है।

Shlokas

Verse 1

अफ्-४-णक+ द्विचत्वारिशोड ध्याय: पलक गुड आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना भीष्म उवाच विपुलस्त्वकरोत्‌ तीव्र तपः कृत्वा गुरोर्वच: । तपोयुक्तमथात्मानममन्यत स वीर्यवान्‌

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! বিপুল গুরুর আদেশ পালন করে অত্যন্ত কঠোর তপস্যা করল। সেই তপোবলে বীর্যবান সে নিজেকে মহাতপস্বী বলে মনে করতে লাগল।

Verse 2

स तेन कर्मणा स्पर्थन्‌ पृथिवीं पृथिवीपते । चचार गतभी: प्रीतो लब्धकीर्तिवरो नृप

ভীষ্ম বললেন—হে পৃথিবীপতি! সেই কর্মের (তপস্যার) ফলে অন্তরে গর্ব জন্মে সে অন্যদের সঙ্গে প্রতিযোগিতা করতে লাগল। হে নৃপ! গুরুর কাছ থেকে খ্যাতি ও বর—উভয়ই পেয়ে সে নির্ভয় ও সন্তুষ্ট হয়ে পৃথিবীতে বিচরণ করতে লাগল।

Verse 3

उभौ लोकौ जितौ चापि तथैवामन्यत प्रभु: । कर्मणा तेन कौरव्य तपसा विपुलेन च,कुरुनन्दन! शक्तिशाली विपुल उस गुरुपत्नी-संरक्षणरूपी कर्म तथा प्रचुर तपस्याद्वारा ऐसा समझने लगे कि मैंने दोनों लोक जीत लिये

ভীষ্ম বললেন—হে কৌরব্য! সেই কর্ম এবং বিপুল তপস্যার বলেই সেই শক্তিমান মনে করতে লাগল—‘আমি দুই লোকই জয় করেছি’।

Verse 4

अथ काले व्यतिक्रान्ते कस्मिंश्चित्‌ कुरुनन्दन । रुच्या भगिन्या आदानं प्रभूतधनधान्यवत्‌

ভীষ্ম বললেন—হে কুরুনন্দন! কিছু কাল অতিবাহিত হলে রুচির জ্যেষ্ঠ ভগিনীর গৃহে বিবাহোৎসবের উপলক্ষ উপস্থিত হল, যেখানে প্রচুর ধন-ধান্য ব্যয় হওয়ার ছিল।

Verse 5

एतस्मिन्नेव काले तु दिव्या काचिद्‌ वराड़ना । बिभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहायसा,उन्हीं दिनों एक दिव्य लोककी सुन्दरी दिव्यांगगा परम मनोहर रूप धारण किये आकाशभमार्गसे कहीं जा रही थी

ঠিক সেই সময়ে এক দিব্য অপ্সরা, পরম মনোহর রূপ ধারণ করে, আকাশপথে গমন করছিল।

Verse 6

तस्या: शरीरात्‌ पुष्पाणि पतितानि महीतले । तस्याश्रमस्याविदूरे दिव्यगन्धानि भारत,भारत! उसके शरीरसे कुछ दिव्य पुष्प, जिनसे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी, देवशमकि आश्रमके पास ही पृथ्वीपर गिरे

হে ভারত! তার দেহ থেকে কিছু ফুল ভূমিতে ঝরে পড়ল; তার আশ্রমের নিকটেই সেগুলি পড়ে দিব্য সুগন্ধ ছড়াল।

Verse 7

तान्यगृह्नात्‌ ततो राजन्‌ रुचिललितलोचना । तदा निमन्त्रकस्तस्या अड्ञेभ्य: क्षिप्रमागमत्‌,राजन! तब मनोहर नेत्रोंवाली रुचिने वे फूल ले लिये। इतनेमें ही अंगदेशसे उसका शीघ्र ही बुलावा आ गया

হে রাজন! তখন মনোহর নয়নবিশিষ্ট রুচি সেই ফুলগুলি তুলে নিল। ঠিক তখনই অঙ্গদেশ থেকে তাকে আহ্বান করতে এক দূত দ্রুত এসে পৌঁছাল।

Verse 8

तस्या हि भगिनी तात ज्येष्ठा नाम्ना प्रभावती । भार्या चित्ररथस्याथ बभूवाड्रेश्वरस्य वै,तात! रुचिकी बड़ी बहिन, जिसका नाम प्रभावती था, अंगराज चित्ररथको ब्याही गयी थी

হে তাত! তার জ্যেষ্ঠ ভগিনীর নাম প্রভাবতী; সে পর্বতাধিপতি চিত্ররথের পত্নী হয়েছিল।

Verse 9

पिनह्ा[ तानि पुष्पाणि केशेषु वरवर्णिनी । आमन्त्रिता ततो5गच्छद्‌ रुचिरजड्गपतेर्गृहम्‌,उन दिव्य फूलोंको अपने केशोंमें गूँथकर सुन्दरी रुचि अंगराजके घर आमन्त्रित होकर गयी

সেই দিব্য ফুলগুলি কেশে গেঁথে, সুন্দরীটি—নিমন্ত্রিত হয়ে—তখন অঙ্গাধিপতি রুচিরের গৃহে গেল।

Verse 10

पुष्पाणि तानि दृष्ट्वा तु तदाड़्जेन्द्रवराड़ना । भगिनीं चोदयामास पुष्पार्थे चारुलोचना

সেই ফুলগুলি দেখে অঙ্গরাজের শ্রেষ্ঠা রানি, পদ্মনয়না প্রভাবতী, নিজের ভগিনীকে তেমনই ফুল আনতে অনুরোধ করলেন।

Verse 11

सा भरत्रें सर्वमाचष्ट रुचि: सुरुचिरानना । भगिन्या भाषितं सर्वमृषिस्तच्चा भ्यनन्दत

আশ্রমে ফিরে সুন্দরমুখী রুচি বোনের বলা সব কথা স্বামীকে জানালেন; তা শুনে ঋষি প্রসন্ন হয়ে সেই প্রার্থনা মঞ্জুর করলেন।

Verse 12

ततो विपुलमानाय्य देवशर्मा महातपा: । पुष्पार्थे चोदयामास गच्छ गच्छेति भारत,भारत! तब महा तपस्वी देवशर्माने विपुलको बुलवाकर उन्हें फ़ूल लानेके लिये आदेश दिया और कहा, “जाओ, जाओ'

তখন মহাতপস্বী দেবশর্মা বিপুলকে ডেকে ফুল আনতে আদেশ দিলেন এবং বললেন—“যাও, যাও, হে ভারত!”

Verse 13

विपुलस्तु गुरोर्वाक्यमविचार्य महातपा: । स तथेत्यब्रवीद्‌ राज॑स्तं च देशं जगाम ह

হে রাজন! মহাতপস্বী বিপুল গুরুর বাক্য নিয়ে কোনো দ্বিধা না করে বললেন, “তথাস্তু”, এবং সেই স্থানের দিকে রওনা হলেন।

Verse 14

यस्मिन्‌ देशे तु तान्यासन्‌ पतितानि नभस्तलात्‌ | अम्लानान्यपि तत्रासन्‌ कुसुमान्यपराण्यपि

হে রাজন! যে অঞ্চলে আকাশ থেকে সেই ফুলগুলি পড়েছিল, সেখানে আরও বহু ফুল পড়ে ছিল—সেগুলিও ছিল সতেজ, ম্লান হয়নি।

Verse 15

स ततस्तानि जग्राह दिव्यानि रुचिराणि च | प्राप्तानि स्वेन तपसा दिव्यगन्धानि भारत,भारत! तदनन्तर अपने तपसे प्राप्त हुए उन दिव्य सुगन्धसे युक्त मनोहर दिव्य पुष्पोंको विपुलने उठा लिया

তদনন্তর, হে ভারত! নিজের তপস্যাবলে প্রাপ্ত দিব্য সুগন্ধে ভরা সেই মনোহর স্বর্গীয় পুষ্পগুলি সে সংগ্রহ করল।

Verse 16

सम्प्राप्य तानि प्रीतात्मा गुरोवंचनकारक: । तदा जगाम तूर्ण च चम्पां चम्पकमालिनीम्‌

সেই পুষ্পগুলি পেয়ে আনন্দিতচিত্ত হয়ে, গুরুকে প্রতারণা না-করা শিষ্যরূপে, সে তৎক্ষণাৎ চম্পকবৃক্ষে শোভিত চম্পা নগরীর দিকে রওনা দিল—গুরুর আদেশ পালন করতে।

Verse 17

स वने निर्जने तात ददर्श मिथुनं नृणाम्‌ । चक्रवत्‌ परिवर्तन्तं गृहीत्वा पाणिना करम्‌

হে তাত! নির্জন বনে সে এক নর-নারীর যুগলকে দেখল—তারা পরস্পরের হাত ধরে কুমোরের চাকার মতো ঘুরছিল।

Verse 18

तत्रैकस्तूर्णमगमत्‌ तत्पदे च विवर्तयन्‌ । एकस्तु न तदा राजंश्वक्रतु: कलहं तत:,राजन! उनमेंसे एकने अपनी चाल तेज कर दी और दूसरेने वैसा नहीं किया। इसपर दोनों आपसमें झगड़ने लगे

হে রাজন! তাদের একজন তৎক্ষণাৎ গতি বাড়াল, এমনকি সেই স্থানে পা-চালও বদলে ফেলল; কিন্তু অন্যজন তখন তা করল না। এই ভিন্নতা থেকেই তাদের মধ্যে কলহ শুরু হল।

Verse 19

त्वं शीघ्र गच्छसीत्येकोब्रवीज्नेति तथा पर: । नेति नेति च तौ राजन्‌ परस्परमथोचतु:

হে নরেশ্বর! একজন বলল, “তুমি খুব তাড়াতাড়ি হাঁটছ।” অন্যজন বলল, “না।” এভাবে, হে রাজন, তারা পরস্পরকে অস্বীকার করতে করতে “না, না” বলে একে অন্যের ওপর দোষ চাপাতে লাগল।

Verse 20

तयोर्विस्पर्थतोरेवे शपथो5यमभूत्‌ तदा । सहसोद्दिश्य विपुलं ततो वाक्यमथोचतु:

দু’জনের পারস্পরিক প্রতিদ্বন্দ্বিতা চলতে চলতে তখন এই শপথ স্থির হল। তারপর হঠাৎ ব্রাহ্মণ বিপুলকে লক্ষ্য করে তারা দু’জনেই দৃঢ় ও প্রভাবশালী বাক্য উচ্চারণ করল।

Verse 21

इस प्रकार एक-दूसरेसे स्पर्धा रखते हुए उन दोनोंमें शपथ खानेकी नौबत आ गयी। फिर तो सहसा विपुलको लक्ष्य करके वे दोनों इस प्रकार बोले-- ।।

এভাবে পরস্পরের সঙ্গে প্রতিযোগিতা করতে করতে তাদের শপথ নেওয়ার অবস্থা এসে পড়ল। তখন হঠাৎ ব্রাহ্মণ বিপুলকে লক্ষ্য করে তারা বলল—“আমাদের মধ্যে যে মিথ্যা বলেছে, পরলোকে তার গতি হোক সেই গতি, যা ব্রাহ্মণ বিপুলের জন্য নির্ধারিত।”

Verse 22

एतत्‌ श्र॒ुत्वा तु विपुलो विषण्णवदनो5भवत्‌ | एवं तीव्रतपाश्चाहं कष्टश्षायं परिश्रम:

এ কথা শুনে বিপুলের মুখ বিষণ্ণ হয়ে গেল। সে ভাবল—“আমি তো এমন কঠোর তপস্যা করি, তবু যদি আমার দুর্গতি হয়, তবে এই তপস্যার ভয়ংকর পরিশ্রম তো কেবল দুঃখই হয়ে দাঁড়াল।”

Verse 23

मिथुनस्यास्य कि मे स्यात्‌ कृतं पापं यथा गति: । अनिष्टा सर्वभूतानां कीर्तितानेन मेडद्य वै

“আমি এমন কী পাপ করেছি যে আমার এমন গতি হবে—যা সকল প্রাণীর জন্য অমঙ্গলকর—এবং যা এই নারী-পুরুষ যুগলের জন্য বলা হয়েছে, যা তারা আজ আমার সামনে বর্ণনা করল?”

Verse 24

एवं संचिन्तयन्नेव विपुलो राजसत्तम । अवाड्मुखो दीनमना दध्यौ दुष्कृतमात्मन:,नृपश्रेष्ठ! ऐसा सोचते हुए ही विपुल नीचे मुँह किये दीनचित्त हो अपने दुष्कर्मका स्मरण करने लगे

হে নৃপশ্রেষ্ঠ! এভাবে চিন্তা করতে করতে বিপুল মাথা নিচু করে, বিষণ্ণচিত্তে, নিজেরই কুকর্ম স্মরণ করতে লাগল।

Verse 25

ततः षडन्यान्‌ पुरुषानक्षै: काउ्चनराजतै: । अपश्यद्‌ दीव्यमानान्‌ वै लोभहर्षान्वितांस्तथा

ভীষ্ম বললেন—তখন বিপুল আরও ছয়জন পুরুষকে দেখল, যারা সোনা-রুপোর পাশা দিয়ে জুয়া খেলছিল। তারা লোভ ও উল্লাসে মত্ত ছিল এবং পূর্বে যে নারী-পুরুষ যুগল শপথ করেছিল, তারই পুনরুক্তি করছিল। বিপুলের দিকে দৃষ্টি স্থির করে তারা তাকে বলল।

Verse 26

कुर्वतः शपथं तेन य: कृतो मिथुनेन तु । विपुलं वै समुद्दिश्य तेडपि वाक्यमथाब्रुवन्‌

ভীষ্ম বললেন—যে শপথ সেই নারী-পুরুষ যুগল করেছিল, সেই শপথই তারাও পুনরায় উচ্চারণ করল। তারপর বিপুলকে নির্দেশ করে তারা তাকে বলল।

Verse 27

लोभमास्थाय योअस्माकं विषमं कर्तुमुत्सहेत्‌ । विपुलस्य परे लोके या गतिस्तामवाप्लुयात्‌

ভীষ্ম বললেন—আমাদের মধ্যে যে কেউ লোভের আশ্রয় নিয়ে অসৎ কাজ করতে সাহস করবে, পরলোকে সে বিপুলের জন্য নির্ধারিত সেই একই গতি লাভ করবে।

Verse 28

एतत्‌ श्र॒त्वा तु विपुलो नापश्यद्‌ धर्मसंकरम्‌ । जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मन:

ভীষ্ম বললেন—হে কৌরবকুলশ্রেষ্ঠ! এ কথা শুনে বিপুল জন্ম থেকে এ পর্যন্ত নিজের কৃতকর্মসমূহ স্মরণ করে বিচার করল; কিন্তু নিজের মধ্যে কোথাও ধর্মের সংকর—অর্থাৎ ধর্মের সঙ্গে পাপের মিশ্রণ—সে দেখতে পেল না।

Verse 29

सम्प्रदध्यौ तथा राजन्नग्नावग्निरिवाहित: । दहामानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! তেমন অভিশাপ শুনে বিপুল আবার গভীর চিন্তায় নিমগ্ন হল—যেন এক আগুনের উপর আরেক আগুন রাখা হয়েছে। তার মন আরও দগ্ধ হতে লাগল; অন্তরের শোকাগ্নিতে দহ্য হয়ে সে পুনরায় ভাবতে লাগল—এখন কী করা উচিত।

Verse 30

तस्य चिन्तयतस्तात वहूव्यो दिननिशा ययु: । इदमासीन्मनसि स रुच्या रक्षणकारितम्‌

হে প্রিয়! এভাবে চিন্তা করতে করতে তার বহু দিন ও বহু রাত্রি অতিবাহিত হল। তখন রুচিকে রক্ষা করার উদ্দেশ্যে তার মনে এক দৃঢ় সংকল্প উদিত হল।

Verse 31

लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च । विधाय न मया चोक्तं सत्यमेतद्‌ गुरोस्तथा

আমার ইন্দ্রিয়গুলি তার ইন্দ্রিয়ের সঙ্গে এবং আমার মুখ তার মুখের সঙ্গে যুক্ত হয়েছিল। তবু—গুরুপত্নীকে রক্ষা করার জন্য করা হলেও—এমন অনুচিত কর্ম করে আমি গুরুকে এই সত্য বলিনি।

Verse 32

एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा | अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशय:,महाभाग कुरुनन्दन! उस समय विपुलने अपने मनमें इसीको पाप माना और निस्संदेह बात भी ऐसी ही थी

হে কৌরববংশীয় মহাভাগ! সেই সময় বিপুল নিজের অন্তরে এটিকে পাপকর্ম বলে গণ্য করেছিল; এবং নিঃসন্দেহে তা তেমনই ছিল।

Verse 33

स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ । पूजयामास च गुरुं विधिवत्‌ स गुरुप्रिय:,चम्पानगरीमें जाकर गुरुप्रेमी विपुलने वे फूल गुरुजीको अर्पित कर दिये और उनका विधिपूर्वक पूजन किया

তারপর গুরুর প্রিয় শিষ্য বিপুল চম্পা নগরীতে গিয়ে সেই পুষ্পগুলি গুরুকে অর্পণ করল এবং বিধিপূর্বক গুরুর পূজা করল।

Verse 42

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने द्विचत्वारिंशो5ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে বিপুলোপাখ্যানের বিয়াল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

How to resolve a case where a maiden has an assigned/received śulka but lacks a husband, raising questions about whether marriage has been treated as a purchase and what dharmic remedy applies.

Bhīṣma articulates parity between son and daughter in relation to the father’s personhood, and legitimizes the dauhitra as heir for a sonless father, supported by ritual duty (piṇḍa offerings) and lineage continuity.

Yes: it argues that not every practiced custom becomes dharma; only sadācāra is weighty as a dharma-marker, while greed-driven or “asad-ācāra” is treated as a distortion that should not be propagated.