Adhyaya 16
Anushasana ParvaAdhyaya 1682 Verses

Adhyaya 16

अध्याय १६ — शङ्कर-उमा-वरदानम् तथा तण्डि-स्तुतिः (Śaṅkara–Umā Boon-Granting and Taṇḍi’s Hymn)

Upa-parva: Śiva-stuti and Vara-pradāna (Śarva/Īśāna praise and boon-bestowal episode)

Chapter 16 presents a composite devotional narrative framed as Vāsudeva-Kṛṣṇa’s speech. It opens with Kṛṣṇa’s prostration and petition for qualities and prosperities—steadfastness in dharma, victory in conflict, eminent fame, strength, affinity for yoga, closeness to the deity, and abundant progeny—followed by Śaṅkara’s assent. Umā (Śarvāṇī) then grants additional boons, including the birth of Sāmba and further social goods (non-anger among dvijas, parental favor, lineage harmony, calmness, competence), along with statements about marital abundance and enduring affection. The narrative transitions to a report addressed to Upamanyu, culminating in a panegyric: a ṛṣi named Taṇḍi performs long austerities, beholds Mahādeva, and praises him as the supreme principle underlying time, gods, elements, guṇas, and the paths of sacrifice, asceticism, renunciation, and knowledge. The hymn articulates a monistic-theological synthesis (Śiva as source, support, and dissolution of all), asserts liberation through knowing him, and enumerates multiple ‘gatis’ (destinations) obtainable only by divine grace. The chapter closes with Śiva granting Taṇḍi a boon (firm devotion), the ṛṣi’s later transmission of the account, and the introduction of secret names of Śarva said to be vast in the Vedas and condensed in śāstric lists.

Chapter Arc: उपमन्यु शिष्य-भाव से कथा का द्वार खोलते हैं—सत्ययुग के ऋषि तण्डि ने कठोर तप से महादेव को प्रसन्न किया और स्तुतियों द्वारा उस दुर्विद्य परमात्मा का साक्षात्कार किया। → तण्डि की स्तुति शिव को ‘आत्मदेहस्थ’—सबके भीतर स्थित, देवताओं के लिए भी दुर्जेय—रूप में पहचानती हुई गहराती जाती है; वह बताता है कि अनेक जन्मों के प्रयत्नों से उसे साक्षात् भक्ति-जन्य अनुभूति मिली है, और उसी भक्ति से अमृत-तत्त्व का ज्ञान होता है। → महादेव का विराट-कालस्वरूप उद्घाटित होता है—रात-दिन उनके नेत्र-कर्ण, पक्ष-मास उनके अंग, और मृत्यु-यम-अग्नि तथा संहार-वेगवान काल उनके ही रूप; वे काल के भी परम कारण और सनातन क्षय हैं—यह ब्रह्माण्ड-देह का दर्शन अध्याय की चरम ऊँचाई बनता है। → स्तुति वेद-मार्ग से स्थिर होती है—ऋग, यजुः आदि वेदज्ञ यज्ञ में जिनकी महिमा गाते हैं; पितृयान-देवयान के द्वार, दिशाएँ, संवत्सर-युग आदि सब उन्हीं में प्रतिष्ठित बताए जाते हैं, और निष्कर्ष यह कि भक्तानुग्रहकारी देव को जानकर अमृतत्व की ओर गति होती है। → उपमन्यु की वाणी संकेत देती है कि इस स्तुति-परंपरा का फल केवल दर्शन नहीं—वरदान/अनुग्रह की अगली कड़ी में शिव-भक्ति का प्रत्यक्ष प्रतिफल प्रकट होने वाला है।

Shlokas

Verse 1

/ अपन बछ। है २ >> - यहाँ श्रीकृष्णके माँगे हुए आठ वरोंको एवं 'भविष्यति' इस वाक्यके द्वारा देनेके पश्चात्‌ पार्वतीजी अपनी ओरसे आठ वर और देती हैं। इनमें 'अमरप्रभाव” इस सम्बोधनके द्वारा देवोपम प्रभावका दान ही पहला वरदान सूचित किया गया है। “मैं कभी झूठ नहीं बोलती” इस कथनके द्वारा “तुम भी कभी झूठ नहीं बोलोगे” यह दूसरा वर सूचित होता है। सोलह हजार रानियोंके प्राप्त होनेका वर तीसरा है। उनका प्रिय होना चौथा वर है। अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति पाँचवाँ वर है। बान्धवोंकी प्रीति छठा

উপমন্যু বললেন—হে তাত! কৃতযুগে তণ্ডি নামে প্রসিদ্ধ এক ঋষি ছিলেন। তিনি ভক্তিভরে সমাধিস্থ হয়ে দশ হাজার বছর দেব মহাদেবের আরাধনা করেছিলেন। তিনি যে ফল লাভ করেছিলেন, তা আমি বলছি—শোনো।

Verse 2

आराधितो<भूद्‌ भक्तेन तस्योदर्क निशामय । स दृष्टवान्‌ महादेवमस्तौषीच्च स्तवैर्विभुम्‌

বায়ু বললেন—সে ভক্তির ফল শোনো। ভক্তের শ্রদ্ধাপূর্ণ আরাধনায় প্রসন্ন হয়ে প্রভু ফল দান করলেন; তিনি মহাদেবকে দর্শন করলেন এবং স্তোত্রে সেই সর্বব্যাপী অধিপতিকে স্তব করলেন।

Verse 3

इति तण्डिस्तपोयोगात्‌ परमात्मानमव्ययम्‌ | चिन्तयित्वा महात्मानमिदमाह सुविस्मित:,इस तरह तण्डिने तपस्यामें संलग्न होकर अविनाशी परमात्मा महामना शिवका चिन्तन करके अत्यन्त विस्मित हो इस प्रकार कहा था--

এইভাবে তপস্যা ও যোগসাধনায় নিমগ্ন তণ্ডি অবিনশ্বর পরমাত্মা, মহাত্মা শিবকে ধ্যান করে বিস্ময়ে পরিপূর্ণ হয়ে এই বাক্যগুলি বলল।

Verse 4

यं पठन्ति सदा सांख्याश्षिन्तयन्ति च योगिन: । परं प्रधानं पुरुषमधिष्ठातारमी श्वरम्‌

যাঁকে সাংখ্যের ঋষিগণ সদা পাঠ ও স্তব করেন এবং যোগীগণ নিরন্তর ধ্যান করেন—যাঁকে তাঁরা পরম, প্রধান, পুরুষ, অধিষ্ঠাতা ও ঈশ্বর বলে অভিহিত করেন—সেই পরম প্রভুর শরণ আমি গ্রহণ করি।

Verse 5

उत्पत्तौ च विनाशे च कारण य॑ विदुर्बुधा: । देवासुरमुनीनां च परं यस्मान्न विद्यते

যাঁকে জ্ঞানীগণ জগতের উৎপত্তি ও লয়ের কারণ বলে জানেন, এবং যাঁর চেয়ে শ্রেষ্ঠ দেব, অসুর ও মুনিদের মধ্যেও কেউ নেই—সেই পরম প্রভুর শরণ আমি গ্রহণ করি।

Verse 6

अजं तमहमीशानमनादिनिधन प्रभुम्‌ अत्यन्तसुखिनं देवमनघं शरणं व्रजे

আমি সেই অজ ঈশানের শরণ গ্রহণ করি—যিনি অনাদি ও অনন্ত প্রভু, পরমানন্দময়, দিব্য এবং নিষ্কলঙ্ক।

Verse 7

एवं ब्रुवन्नेव तदा ददर्श तपसां निधिम्‌ । तमव्ययमनौपम्यमचिन्त्यं शाश्वतं ध्रुवम्‌

এই কথা বলতে বলতেই তিনি তপস্যার সেই নিধিকে প্রত্যক্ষ দর্শন করলেন—অব্যয়, অনুপম, অচিন্ত্য, শাশ্বত ও ধ্রুব সেই ব্রহ্মকে, যিনি যোগীদের পরমানন্দ, অক্ষয় তত্ত্ব এবং স্বয়ং মোক্ষস্বরূপ।

Verse 8

निष्कलं सकल ब्रह्म निर्गुणं गुणणोचरम्‌ । योगिनां परमानन्दमक्षरं मोक्षसंज्ञितम्‌

বায়ু বললেন—“সেই ব্রহ্ম নিষ্কলও, আবার সকলও; নির্গুণ হয়েও গুণের দ্বারা উপলব্ধিযোগ্য। যোগীদের কাছে তিনিই পরমানন্দ—অক্ষয়, এবং মোক্ষ নামে অভিহিত।” এই কথা উচ্চারিত হতেই তপোনিধি তণ্ডিন সেই অব্যয়, অনুপম, অচিন্ত্য, শাশ্বত, ধ্রুব তত্ত্বকে প্রত্যক্ষ দর্শন করলেন।

Verse 9

मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम्‌ । अग्राह्ममचलं शुद्ध बुद्धिग्राह्मा मनोमयम्‌

বায়ু বললেন—“মন, ইন্দ্র, অগ্নি ও মরুদ্গণের—এমনকি সমগ্র বিশ্ব ও ব্রহ্মারও—গতি ও পরম গন্তব্য তিনিই। কিন্তু মন ও ইন্দ্রিয় দিয়ে তাঁকে ধরা যায় না। তিনি অগ্রাহ্য, অচল, শুদ্ধ; জাগ্রত বুদ্ধিতে উপলব্ধিযোগ্য এবং মনের অন্তঃসাররূপে বিরাজমান।”

Verse 10

दुर्विज्ञेगमसंख्येयं दुष्प्रपमकृतात्मभि: । योनिं विश्वस्थ जगतस्तमस: परत: परम्‌

বায়ু বললেন—“তাঁকে জানা অতি দুরূহ; তিনি অগণন, অপরিমেয়। যারা আত্মসংযম ও শুদ্ধি সাধন করেনি, তাদের কাছে তিনি দুর্লভ। তিনিই সমগ্র জগতের যোনি—কারণ; অজ্ঞতার তমসেরও বহু ঊর্ধ্বে, পরাত্পর।”

Verse 11

यः प्राणवन्तमात्मानं ज्योतिर्जीवस्थितं मन: । त॑ देवं दर्शनाकाड्क्षी बहून्‌ वर्षमणानूषि:

বায়ু বললেন—“যে ব্যক্তি নিজের অন্তরে প্রাণময় আত্মাকে—জীবন্ত জ্যোতিতে প্রতিষ্ঠিত মনকে—চিনে ফেলে, সে সেই দেবতত্ত্বের দর্শন কামনা করে; আর সেই আকাঙ্ক্ষার বলেই বহু বছর স্থিত থাকে।”

Verse 12

तण्डिस्वाच पवित्राणां पवित्रस्त्वं गतिर्गतिमतां वर

তণ্ডি বললেন—হে গতিশীলদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! তুমি পবিত্রদেরও পরম পবিত্র, আর সৎপথ অন্বেষণকারীদের জন্য সর্বোচ্চ আশ্রয় ও পরম গতি।

Verse 13

अत्युग्रं तेजसां तेजस्तपसां परमं तप: । तण्डिने कहा--सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर! आप पवित्रोंमें भी परम पवित्र तथा गतिशील प्राणियोंकी उत्तम गति हैं। तेजोंमें अत्यन्त उग्र तेज और तपस्याओंमें उत्कृष्ट तप हैं ।।

তণ্ডি বললেন—হে সর্বশ্রেষ্ঠ পরমেশ্বর! তুমি পবিত্রদেরও পরম পবিত্র এবং গতিশীল প্রাণীদের সর্বোচ্চ গতি। তুমি তেজসমূহের মধ্যে অতি উগ্র তেজ, আর তপস্যাসমূহের মধ্যে পরম তপ।

Verse 14

जातीमरणभीरूणां यतीनां यततां विभो

হে বিভো! জন্ম-মৃত্যুর চক্রকে ভয় করে যে যতিরা মুক্তির জন্য সংযমসহ সাধনায় রত—তাদের বিষয়েই এ কথা বলা হয়েছে।

Verse 15

ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षय:

বায়ু বললেন—ব্রহ্মা, শতক্রতু (ইন্দ্র), বিষ্ণু, বিশ্বেদেব এবং মহর্ষিরাও তোমাকে যথার্থরূপে জানেন না; তবে আমরা কীভাবে জানতে পারি? তোমা থেকেই সকলের উৎপত্তি, আর তোমাতেই এই সমগ্র জগৎ প্রতিষ্ঠিত।

Verse 16

न विदुस्त्वां तु तत्त्वेन कुतो वेत्स्यामहे वयम्‌ । त्वत्त: प्रवर्तते सर्व त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम्‌

বায়ু বললেন—তারা পর্যন্ত তোমাকে তত্ত্বতঃ জানে না; তবে আমরা কীভাবে জানব? তোমা থেকেই সবকিছু প্রবাহিত হয়, আর তোমাতেই সবকিছু প্রতিষ্ঠিত—ব্রহ্মা, বিষ্ণু, ইন্দ্র, বিশ্বেদেব ও মহর্ষিরাও।

Verse 17

कालाख्य: पुरुषाख्यश्ष ब्रह्माख्यश्न त्वमेव हि । तनवस्ते स्मृतास्तिस््र: पुराणज्ञै: सुर्िभि:

বায়ু বললেন—কাল, পুরুষ ও ব্রহ্ম—এই তিন নামে প্রকৃতপক্ষে আপনাকেই অভিহিত করা হয়। পুরাণজ্ঞ দেবর্ষিগণ আপনার এই তিন প্রকাশ ঘোষণা করেছেন।

Verse 18

अधिपौरुषमध्यात्ममधि भूताधिदैवतम्‌ । अधिलोकाधिविज्ञानमधियज्ञस्त्वमेव हि,अधिपौरुष, अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत, अधिलोक, अधिविज्ञान और अधियज्ञ आप ही हैं

বায়ু বললেন—অধিপৌরুষ, অধ্যাত্ম, অধিভূত, অধিদৈবত, অধিলোক, অধিবিজ্ঞান এবং অধিযজ্ঞ—এ সবই আপনি।

Verse 19

त्वां विदित्वात्मदेहस्थं दुर्विदं दैवतैरपि । विद्वांसो यान्ति निर्मुक्ता: परं भावमनामयम्‌

দেবতাদের পক্ষেও আপনি দুর্বোধ্য। কিন্তু জ্ঞানীরা আপনাকে নিজ দেহে অধিষ্ঠিত অন্তর্যামী আত্মা রূপে জেনে সংসারবন্ধন থেকে মুক্ত হয়ে রোগ-শোকহীন পরম অবস্থায় পৌঁছান।

Verse 20

अनिच्छतस्तव विभो जन्ममृत्युरनेकत: । द्वारं तु स्वर्गमोक्षाणामाक्षेप्ता त्वं ददासि च

বায়ু বললেন—হে বিভো! আপনি অনুগ্রহ করতে না চাইলে জীব নানাভাবে বারবার জন্ম-মৃত্যুর চক্রে পতিত হয়। স্বর্গ ও মোক্ষের দ্বার আপনি; প্রাপ্তিতে প্রতিবন্ধকও আপনি, আর দানকারীও আপনি।

Verse 21

आप ही स्वर्ग और मोक्ष हैं। आप ही काम और क्रोध हैं तथा आप ही सत्त्व, रज, तम, अधोलोक और ऊर्ध्वलोक हैं

আপনিই স্বর্গ ও মোক্ষ। আপনিই কাম ও ক্রোধ; এবং আপনিই সত্ত্ব, রজ, তম—তথা অধোলোক ও ঊর্ধ্বলোক।

Verse 22

ब्रह्मा भवश्व विष्णुश्न स्कन्देन्द्री सविता यम: । वरुणेन्दू मनुर्धाता विधाता त्वं धनेश्वर:

বায়ু বললেন— আপনিই ব্রহ্মা, ভব (শিব) ও বিষ্ণু; আপনিই স্কন্দ, ইন্দ্র, সবিতা (সূর্য) ও যম। আপনিই বরুণ, চন্দ্র, মনু, ধাতা ও বিধাতা; এবং আপনিই ধনাধিপতি কুবের।

Verse 23

त्वं वै स्वर्गश्न मोक्षक्ष॒ काम: क्रोधस्त्वमेव च । सत्त्वं रजस्तमश्नैव अधश्चोर्थ्व त्वमेव हि

বায়ুদেব বললেন— আপনিই স্বর্গ, আপনিই মোক্ষ; আপনিই কাম, আপনিই ক্রোধ। আপনিই সত্ত্ব, রজ ও তম—তিন গুণ; এবং ঊর্ধ্ব ও অধঃ—উভয় অবস্থাও আপনিই। পৃথিবী, বায়ু, জল, অগ্নি ও আকাশ; বাক্, বুদ্ধি, স্থিতি ও মতি; কর্ম, সত্য ও অসত্য—সবই আপনিই; এবং ‘আছে’ ও ‘নেই’—দুই-ই আপনিই।

Verse 24

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्व॒ प्रकृतिभ्य: परं ध्रुवम्‌ । विश्वाविश्वपरोभावद्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि

বায়ু বললেন— আপনিই ইন্দ্রিয়সমূহ এবং ইন্দ্রিয়ের বিষয়ও। আপনিই প্রকৃতির অতীত ধ্রুব, অবিনশ্বর তত্ত্ব। আপনিই বিশ্ব ও অবিশ্ব—উভয়েরও পরের সেই অনন্য ভাব; এবং আপনিই চিন্ত্য ও অচিন্ত্য।

Verse 25

यच्चैतत्‌ परमं ब्रह्म यच्च तत्‌ परमं पदम्‌ । या गति: सांख्ययोगानां स भवान्‌ नात्र संशय:,जो यह परम ब्रह्म है, जो वह परमपद है तथा जो सांख्यवेत्ताओं और योगियोंकी गति है, वह आप ही हैं--इसमें संशय नहीं है

বায়ুদেব বললেন— যা পরম ব্রহ্ম, যা সেই পরম পদ, এবং যা সাংখ্যজ্ঞ ও যোগীদের গতি (লক্ষ্য)—তা আপনি নিজেই; এতে কোনো সংশয় নেই।

Verse 26

नूनमद्य कृतार्था: सम नून॑ प्राप्ता: सतां गतिम्‌ । यां गतिं प्रार्थयन्तीह ज्ञाननिर्मलबुद्धयः

বায়ু বললেন— নিশ্চয়ই আজ আমরা কৃতার্থ হলাম; নিশ্চয়ই আমরা সৎপুরুষদের সেই গতি লাভ করেছি। যে গতি জ্ঞান দ্বারা নির্মল বুদ্ধিসম্পন্ন জ্ঞানীরা এই জগতে প্রার্থনা করে, সেই গতি আমরা নিশ্চিতভাবেই অর্জন করেছি; অতএব আজ আমরা সত্যই সিদ্ধ।

Verse 27

अहो मूढा: सम सुचिरमिमं कालमचेतसा । यन्न विद्य: परं देवं शाश्व॒तं यं विदुर्बुधा:

বায়ু বললেন—হায়! আমরা কত মোহগ্রস্ত ছিলাম, এত দীর্ঘকাল অচেতন হয়ে! যাঁকে জ্ঞানীরা জানেন, সেই শাশ্বত পরমদেবকে আমরা চিনতে পারিনি।

Verse 28

सेयमासादिता साक्षात्‌ त्वद्धक्तिजन्मभिमया । भक्तानुग्रहकृद्‌ देवो य॑ ज्ञात्वामृतमश्लुते

অসংখ্য জন্মের সাধনায় আমি এখন প্রত্যক্ষভাবে আপনার ভক্তি লাভ করেছি। আপনি ভক্তদের প্রতি অনুগ্রহকারী মহান দেব; আপনাকে সত্যভাবে জেনে জ্ঞানীরা অমৃতত্ব—মোক্ষ—লাভ করেন।

Verse 29

देवासुरमुनीनां तु यच्च गुहां सनातनम्‌ । गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं मुनेरपि

দেব, অসুর ও মুনিদের কাছেও যে সনাতন রহস্য-গুহা—হৃদয়-গুহায় নিহিত সেই ব্রহ্ম, যা ধ্যানী মুনির পক্ষেও দুর্বোধ্য—সেই-ই এই ভগবান।

Verse 30

स एष भगवान्‌ देव: सर्वकृत्‌ सर्वतोमुख: । सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वग: सर्ववेदिता

বায়ু বললেন—এই-ই ভগবান দেব—সর্বকর্তা, সর্বদিকমুখ। তিনি সর্বাত্মা, সর্বদর্শী, সর্বব্যাপী ও সর্বজ্ঞ।

Verse 31

देहकृद्‌ देहभद्‌ देही देहभुगदेहिनां गति: । प्राणकृत्‌ प्राणभृत्‌ प्राणी प्राणद: प्राणिनां गति:

আপনি দেহের স্রষ্টা, দেহের ধারক—তাই ‘দেহী’; দেহের ভোক্তা এবং দেহধারীদের পরম গতি। আপনি প্রাণের উৎপাদক, প্রাণের ধারক, প্রাণিস্বরূপ, প্রাণদাতা এবং সকল প্রাণীর গতি।

Verse 32

अध्यात्मगतिरिष्टानां ध्यायिनामात्मवेदिनाम्‌ | अपुनर्भवकामानां या गति: सोडयमी श्वरः

বায়ুদেব বললেন—ধ্যানরত প্রিয় ভক্তদের যে অধ্যাত্মগতি, আর পুনর্জন্ম না-চাওয়া আত্মজ্ঞ ঋষিদের যে পরম গতি বলা হয়েছে—সেই লক্ষ্য স্বয়ং এই ঈশ্বরই।

Verse 33

अयं च सर्वभूतानां शुभाशुभगतिप्रद: । अयं च जन्ममरणे विदध्यात्‌ सर्वजन्तुषु,ये ही समस्त प्राणियोंको शुभ और अशुभ गति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही समस्त प्राणियोंको जन्म और मृत्यु प्रदान करते हैं

বায়ু বললেন—ইনিই সকল প্রাণীর শুভ ও অশুভ গতি প্রদান করেন; এবং সকল জীবের মধ্যে জন্ম ও মৃত্যুর বিধান স্থাপন করেন।

Verse 34

अयं संसिद्धिकामानां या गति: सो5यमीश्वर: । भूराद्यान्‌ सर्वभुवनानुत्पाद्य सदिवौकस: । दधाति देवस्तनुभिरष्टाभियों बिभर्ति च

বায়ু বললেন—সিদ্ধি (মুক্তি) কামনাকারীদের যে পরম গতি, তা এই ঈশ্বরই। পৃথিবী প্রভৃতি সকল লোক দেবতাসহ সৃষ্টি করে, এই মহাদেবই তাঁর অষ্টমূর্তি দ্বারা তাদের ধারণ ও পালন করেন।

Verse 35

अतः: प्रवर्तते सर्वमस्मिन्‌ सर्व प्रतिष्ठितम्‌ । अम्मिंक्ष प्रलयं याति अयमेक: सनातन:

অতএব, সকল কিছুর প্রবাহ তাঁর থেকেই; সমগ্র জগৎ তাঁর মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত; এবং প্রলয়ের কালে সবই তাঁর মধ্যেই লীন হয়। তিনিই একমাত্র সনাতন পুরুষ।

Verse 36

अयं स सत्यकामानां सत्यलोक: परं सताम्‌ | अपवर्गश्न मुक्तानां कैवल्यं चात्मवेदिनाम्‌

বায়ু বললেন—সত্যকামী সৎপুরুষদের জন্য এ-ই পরম সত্যলোক। এ-ই মুক্তদের অপবর্গ (মোক্ষ) এবং আত্মজ্ঞদের কৈবল্য।

Verse 37

अयं ब्रह्मादिभि: सिद्धैर्गुहायां गोपित: प्रभु: । देवासुरमनुष्याणामप्रकाशो भवेदिति

বায়ু বললেন— এই পরম প্রভুকে ব্রহ্মা প্রভৃতি সিদ্ধগণ হৃদয়-গুহায় গোপন করে রেখেছেন, যেন দেব, অসুর ও মানুষের কাছে তিনি প্রকাশিত না হন।

Verse 38

त॑ त्वां देवासुरनरास्तत्त्वेन न विदुर्भवम्‌ मोहिता: खल्वनेनैव हृदिस्थेनाप्रकाशिना

বায়ু বললেন— হে ভব (মহাদেব)! দেব, অসুর ও মানুষ আপনাকে তত্ত্বত জানে না; কারণ হৃদয়ে নিহিত ও অপ্রকাশিত এই শক্তিতেই তারা মোহিত।

Verse 39

ये चैन॑ प्रतिपद्यन्ते भक्तियोगेन भाविता: । तेषामेवात्मना5>त्मानं दर्शयत्येष हृच्छय:

যারা ভক্তিযোগে পরিশুদ্ধ হয়ে সেই পরমেশ্বরের শরণ গ্রহণ করে, হৃদয়-মন্দিরে নিহিত এই ভগবান কেবল তাদেরই নিজের আত্মস্বরূপে নিজের দর্শন দেন।

Verse 40

य॑ ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरणं चापि विद्यते । यं विदित्वा पर वेद्यं वेदितव्यं न विद्यते

বায়ু বললেন— যাঁকে জানলে আর পুনর্জন্ম হয় না, মৃত্যুও আর বন্ধন থাকে না; এবং যাঁকে জেনে তাঁর ঊর্ধ্বে আর কোনো পরম জ্ঞেয় অবশিষ্ট থাকে না।

Verse 41

यं लब्ध्वा परमं लाभ॑ नाधिकं मन्यते बुध: । यां सूक्ष्मां परमां प्राप्तिं गच्छन्नव्ययमक्षयम्‌

বায়ু বললেন— যাঁকে লাভ করে জ্ঞানী আর কোনো লাভকে তার চেয়ে বড় মনে করে না; এবং সেই সূক্ষ্ম, পরম প্রাপ্তি অর্জন করে সে অব্যয়, অক্ষয় অবস্থায় গমন করে।

Verse 42

यं सांख्या गुणतत्त्वज्ञा: सांख्यशास्त्रविशारदा: । सूक्ष्मज्ञानतरा: सूक्ष्मं ज्ञात्वा मुच्यन्ति बन्धनै:

বায়ু বললেন—যে সূক্ষ্ম পরম তত্ত্বকে গুণ ও তত্ত্ব-জ্ঞ, সাংখ্যশাস্ত্রে পারদর্শী এবং অতিসূক্ষ্ম বোধসম্পন্ন সাংখ্যগণ উপলব্ধি করেন—সেই সূক্ষ্ম তত্ত্বকে জেনে তারা সকল বন্ধন থেকে মুক্ত হয়।

Verse 43

यं च वेदविदो वेद्यं वेदान्ते च प्रतिष्ठितम्‌ । प्राणायामपरा नित्यं यं विशन्ति जपन्ति च

বায়ু বললেন—যে তত্ত্বকে বেদজ্ঞরা জ্ঞেয় বলে মানেন এবং যা বেদান্তে প্রতিষ্ঠিত, প্রाणায়াম-পরায়ণ সাধকেরা সেই নিত্য তত্ত্বেই নিরন্তর প্রবেশ করে, এবং তারই জপ ও ধ্যান করে।

Verse 44

ओंकाररथमारुह्य ते विशन्ति महेश्वरम्‌ । अयं स देवयानानामादित्यो द्वारमुच्यते

বায়ু বললেন—ওঁকাররূপ রথে আরূঢ় হয়ে সেই সিদ্ধপুরুষেরা মহেশ্বরে প্রবেশ করে। এই আদিত্যই দেবযান—দেবপথের—দ্বার বলে কথিত।

Verse 45

अयं च पितृयानानां चन्द्रमा द्वारमुच्यते । एष काष्ठा दिशश्वैव संवत्सरयुगादि च

বায়ু বললেন—পিতৃযান-পথের যাত্রীদের জন্য চন্দ্রকে দ্বার বলা হয়। তাঁর থেকেই কাষ্ঠা, দিকসমূহ এবং বর্ষ ও যুগ প্রভৃতি কালপরিমাপের গণনা নির্ধারিত হয়।

Verse 46

एन॑ प्रजापति: पूर्वमाराध्य बहुभि: स्तवै:

পূর্বকালে প্রজাপতি বহু স্তব-স্তোত্র দ্বারা তাঁর আরাধনা করে তাঁকে প্রসন্ন করেছিলেন।

Verse 47

ऋग्भिर्यमनुशासन्ति तत्त्वे कर्मणि बहवृचा:

বায়ু বললেন—ঋগ্বেদের বহ্বৃচ পণ্ডিতেরা তত্ত্ব ও কর্মের যথার্থ নীতিতে ঋক্‌মন্ত্র দ্বারা তাঁকে উপদেশ দেন ও স্তব করেন। যজুর্বেদের জ্ঞাতা দ্বিজেরা যজ্ঞে যজুঃসূত্রে তাঁকে আহুতি দেন এবং তাঁকেই দক্ষিণাগ্নি, গার্হপত্য ও আহবনীয়—এই ত্রিবিধ পবিত্র অগ্নিরূপে জানেন। শুদ্ধচিত্ত সামগায়কেরা সামসুরে তাঁর প্রশংসা গায়। অথর্ববেদী ব্রাহ্মণেরা ঋত, সত্য এবং পরব্রহ্মগামী পথ অবলম্বন করে তাঁকে স্তব করেন। যেহেতু তিনিই যজ্ঞের পরম কারণ, তাই তিনিই সকল যজ্ঞের পরম প্রভু ও অধিপতি বলে স্বীকৃত।

Verse 48

यजुर्भियत्र्तरिधा वेद्यं जुद्धत्यध्वर्यवो5ध्वरे । सामभिर्य॑ च गायन्ति सामगा: शुद्धबुद्धयः

বায়ু বললেন—সেই পবিত্র যজ্ঞে অধ্বর্যু পুরোহিতেরা যজুঃমন্ত্রে বেদীকে ত্রিবিধভাবে শুদ্ধ করেন। আর সেখানে শুদ্ধচিত্ত সামগায়কেরা সামের স্তোত্র গায়।

Verse 49

ऋतं सत्य परं ब्रह्म स्तुवन्त्याथर्वणा द्विजा: । यज्ञस्य परमा योनि: पतिश्नायं पर: स्मृत:

বায়ু বললেন—অথর্ববেদী দ্বিজ পুরোহিতেরা ঋত, সত্য এবং পরব্রহ্মের স্তব করেন। তিনিই যজ্ঞের পরম উৎস (যোনি) এবং তিনিই পরম প্রভু—স্তবনীয়—বলে স্মৃত।

Verse 50

रात्यहः:श्रोत्रनयन: पक्षमासशिरो भुज: । ऋतुवीर्यस्तपोधैर्यो हृब्दगुह्दोौरुपादवान्‌

বায়ু বললেন—রাত্রি ও দিন তার কর্ণ ও নয়ন; পক্ষ ও মাস তার মস্তক ও বাহু। ঋতুগুলি তার বীর্য; তপস্যা তার ধৈর্য; আর বর্ষ তার গুহ্য অঙ্গ, ঊরু ও পদ।

Verse 51

मृत्युर्यमो हुताशश्व॒ काल: संहारवेगवान्‌ । कालस्य परमा योनि: कालक्षायं सनातन:,मृत्यु, यम, अग्नि, संहारके लिये वेगशशाली काल, कालके परम कारण तथा सनातन काल भी--ये महादेव ही हैं

বায়ুদেব বললেন—মৃত্যু, যম ও অগ্নি; সংহারের জন্য বেগবান কাল; কালের পরম কারণ; এবং সেই সনাতন তত্ত্ব যেখানে কালেরও ক্ষয় ঘটে—এ সবই মহাদেব।

Verse 52

चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ ग्रहाश्न सह वायुना । ध्रुव: सप्तर्षयश्चैव भुवना: सप्त एव च

বায়ুদেব বললেন—চন্দ্র ও সূর্য, নক্ষত্র ও গ্রহসমূহসহ, এবং বায়ুর সঙ্গে; ধ্রুব ও সপ্তর্ষি; আর সাত ভুবনও—এই সকলই বিশ্বব্যবস্থায় সাক্ষী।

Verse 53

प्रधानं महदव्यक्तं विशेषान्तं सवैकृतम्‌ । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं भूतादि सदसच्च यत्‌

বায়ু বললেন—প্রধান, মহত্তত্ত্ব, অব্যক্ত, এবং বিকারসমেত বিশেষপর্যন্ত সমস্ত তত্ত্ব; ব্রহ্মা থেকে তৃণ-স্তম্ভ (ঘাসের তৃণ) পর্যন্ত; ভূতাদিস্বরূপ, এবং যা সৎ ও অসৎ (ব্যক্ত-অব্যক্ত)—এই সবই (উক্ত ব্যাপ্তিতে) অন্তর্ভুক্ত।

Verse 54

अष्टौ प्रकृतयश्चैव प्रकृतिभ्यश्न यः पर: । चन्द्रमा

বায়ু বললেন—আট প্রকৃতি এবং প্রকৃতির অতীত যে পুরুষ; চন্দ্র, সূর্য, নক্ষত্র, গ্রহ, বায়ু, ধ্রুব, সপ্তর্ষি ও সাত ভুবন; মূল প্রকৃতি, মহত্তত্ত্ব, বিকারসমেত বিশেষপর্যন্ত সমস্ত তত্ত্ব; ব্রহ্মা থেকে কীট পর্যন্ত সমগ্র জগৎ; ভূতাদি এবং সৎ-অসৎ—এই সকল রূপেই মহাদেব বিরাজমান। আর এই দেবের সেই পূর্ণ অংশ, যা চক্রের ন্যায় অবিরাম ঘূর্ণায়মান হয়ে সমগ্র জগৎকে চালিত করে—সেও তিনিই। তিনিই পরমানন্দস্বরূপ, তিনিই শাশ্বত ব্রহ্ম; তিনিই বিরাগীদের গতি এবং তিনিই সৎপুরুষদের পরমভাব।

Verse 55

एतत्‌ परममानन्दं यत्‌ तच्छाश्वतमेव च । एषा गतिर्विरेक्तानामेष भाव: पर: सताम्‌

বায়ু বললেন—এটাই পরমানন্দ, এবং এটাই একমাত্র শাশ্বত। এটাই বিরাগীদের গতি, এবং এটাই সৎজনদের পরমভাব।

Verse 56

एतत्‌ पदमनुद्धिग्नमेतद्‌ ब्रह्म सनातनम्‌ । शास्त्रवेदाड़विदुषामेतद्‌ ध्यानं परं पदम्‌

বায়ু বললেন—এটাই উদ্বেগহীন পরমপদ; এটাই সনাতন ব্রহ্ম। শাস্ত্র ও বেদাঙ্গে পারদর্শীদের জন্য এটাই ধ্যানযোগ্য সর্বোচ্চ পদ।

Verse 57

इयं सा परमा काष्ठा इयं सा परमा कला । इयं सा परमा सिद्धिरियं सा परमा गति:

বায়ু বললেন— এটাই পরম পরাকাষ্ঠা, এটাই পরম উৎকর্ষ। এটাই সর্বোচ্চ সিদ্ধি, এবং এটাই চূড়ান্ত গতি।

Verse 58

इयं सा परमा शान्तिरियं सा निर्वति: परा । य॑ं प्राप्प कृतकृत्या: सम इत्यमन्यन्त योगिन:

বায়ু বললেন— এটাই পরম শান্তি; এটাই সর্বোচ্চ নির্বৃতি। একে লাভ করে কৃতকৃত্য যোগীরা সকলকে সম বলে জেনেছিল।

Verse 59

यही वह पराकाष्छठा, यही वह परम कला, यही वह परम सिद्धि और यही वह परम गति हैं एवं यही वह परम शान्ति और वह परम आनन्द भी हैं, जिसको पाकर योगीजन अपनेको कृतकृत्य मानते हैं ।।

এটাই সেই পরম পরাকাষ্ঠা, এটাই পরম উৎকর্ষ; এটাই পরম সিদ্ধি এবং এটাই পরম গতি; এটাই পরম শান্তি এবং পরম আনন্দও। একে লাভ করে যোগীরা নিজেদের কৃতকৃত্য মনে করে। এটাই তৃপ্তি, এটাই সিদ্ধি, এটাই শ্রুতি ও এটাই স্মৃতি; ভক্তদের এটাই অধ্যাত্মগতি এবং বিদ্বানদের এটাই অব্যয় প্রাপ্তি।

Verse 60

यह तुष्टि, यह सिद्धि, यह श्रुति, यह स्मृति, भक्तोंकी यह अध्यात्मगति तथा ज्ञानी पुरुषोंकी यह अक्षय प्राप्ति (पुनरावृत्तिरहित मोक्षलाभ) आप ही हैं ।।

বায়ুদেব বললেন— আপনিই সেই তৃপ্তি ও সেই সিদ্ধি; আপনিই শ্রুতির প্রামাণ্য এবং স্মৃতির শক্তি। ভক্তদের অধ্যাত্মগতি আপনিই, আর জ্ঞানীদের অব্যয় প্রাপ্তি—পুনরাবৃত্তিহীন মুক্তি—আপনিই। আর যারা কামনাসহ যজ্ঞ করে, বিপুল দক্ষিণা দান করে, যজ্ঞশীলদের যে গতি লাভ হয়—সে গতিও নিঃসন্দেহে আপনিই।

Verse 61

सम्यग्‌ योगजपै: शान्तिर्नियमैदेहतापनै: । तप्यतां या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान्‌

বায়ু বললেন— যথাযথ যোগসাধনা ও জপে, এবং দেহকে তপিত করে এমন নিয়মে যে শান্তি লাভ হয়; আর তপস্যাকারীদের, হে দেব, যে পরম গতি প্রাপ্ত হয়—সে পরম গতি আপনিই।

Verse 62

कर्मन्यासकृतानां च विरक्तानां ततस्तत: । या गतिर्ब्रह्मयसदने सा गतिस्त्वं सनातन,सनातन देव! कर्म-संन्यासियोंको और विरक्तोंको ब्रह्मलोकमें जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वह आप ही हैं

বায়ু বললেন—কর্ম-সংন্যাস গ্রহণকারী এবং বৈরাগ্যবানদের জন্য ব্রহ্মসদনে যে পরম গতি কথিত, হে সনাতন, হে সনাতন দেব! সেই গতি আপনি নিজেই।

Verse 63

अपुनर्भवकामानां वैराग्ये वर्ततां च या । प्रकृतीनां लयानां च सा गतिस्त्वं सनातन

বায়ু বললেন—হে সনাতন, হে সনাতন পরমেশ্বর! যারা পুনর্জন্মহীন মুক্তি কামনা করে বৈরাগ্যের পথে চলে, তাদের যে গতি; আর যারা প্রকৃতিতে লয় প্রাপ্ত হয়, তাদের যে গতি—সে গতি আপনি নিজেই।

Verse 64

ज्ञानविज्ञानयुक्तानां निरुपाख्या निरज्जना | कैवल्या या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान्‌

বায়ু বললেন—হে দেব! জ্ঞান ও বিজ্ঞান-সমন্বিত সাধকদের যে পরম গতি—‘সারূপ্য’ প্রভৃতি নাম-উপাধি থেকে মুক্ত, নির্মল ও কৈবল্যরূপ—সেই সর্বোচ্চ গতি আপনি নিজেই।

Verse 65

वेदशास्त्रपुराणोक्ता: पञ्चैता गतय: स्मृता: । त्वत्प्रसादाद्धि लभ्यन्ते न लभ्यन्तेडन्यूथा विभो

হে প্রভু! বেদ, শাস্ত্র ও পুরাণে উল্লিখিত এই পাঁচ গতি স্মৃতিসিদ্ধ; কিন্তু হে বিভো! এগুলি কেবল আপনার প্রসাদেই লাভ হয়—অন্যথা নয়।

Verse 66

इति तण्डिस्तपोराशिस्तुष्टावेशानमात्मना । जगौ च परमं ब्रह्म यत्‌ पुरा लोककृज्जगौ

এইভাবে তপস্যার ভাণ্ডার তণ্ডি একাগ্রচিত্তে ঈশান (মহাদেব)-এর স্তব করলেন; এবং প্রাচীনকালে লোকস্রষ্টা ব্রহ্মা যে পরম ব্রহ্মস্বরূপ স্তোত্র গেয়েছিলেন, সেই স্তোত্রই তিনিও গাইলেন।

Verse 67

उपमन्युरुवाच एवं स्तुतो महादेवस्तण्डिना ब्रह्म॒वादिना । उवाच भगवान्‌ देव उमया सहित: प्रभु:

উপমনু বললেন—ব্রাহ্মণবক্তা তণ্ডি এইভাবে স্তব করলে, উমাসহ পরাক্রমশালী ভগবান মহাদেব তাকে সম্বোধন করে বললেন।

Verse 68

ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षय: । न विदुस्त्वामिति ततस्तुष्ट: प्रोवाच तं शिव:

“ব্রহ্মা, শতক্রতু (ইন্দ্র), বিষ্ণু, বিশ্বেদেব ও মহর্ষিরাও আপনাকে যথার্থরূপে জানেন না”—এ কথা শুনে ভগবান শিব অত্যন্ত সন্তুষ্ট হয়ে তণ্ডিকে বললেন।

Verse 69

श्रीभगवानुवाच अक्षयश्चाव्ययश्वैव भविता दुःखवर्जित: । यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वित:,भगवान्‌ श्रीशिवने कहा--ब्रह्मन! तुम अक्षय, अविकारी, दुःखरहित, यशस्वी, तेजस्वी एवं दिव्यज्ञानसे सम्पन्न होओगे

ভগবান বললেন—হে ব্রাহ্মণ! তুমি অক্ষয় ও অব্যয় হবে, দুঃখমুক্ত হবে; যশস্বী, তেজস্বী এবং দিব্যজ্ঞানে সমন্বিত হবে।

Verse 70

ऋषीणामभिगम्यश्न सूत्रकर्ता सुतस्तव । मत्प्रसादाद्‌ द्विजश्रेष्ठ भविष्यति न संशय:

তোমার পুত্র ঋষিদের কাছে গিয়ে সেবা করবে এবং সূত্ররচয়িতা হবে। আমার প্রসাদে সে দ্বিজদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হবে—এতে সন্দেহ নেই।

Verse 71

कं वा काम॑ ददाम्यद्य ब्रूहि यद्‌ वत्स काड्क्षसे । द्विजश्रेष्ठ! मेरी कृपासे तुम्हें एक विद्वान पुत्र प्राप्त होगा

বৎস! বলো, আজ আমি তোমাকে কোন বর দিই? তুমি যা কামনা কর, তাই বলো। (তখন তণ্ডি করজোড়ে বলল—) প্রভো! আপনার প্রতি আমার ভক্তি দৃঢ় হোক।

Verse 72

उपमन्युरुवाच एतान्‌ दत्त्वा वरान्‌ देवो वन्द्यमान: सुरभि: | स्तूयमानश्व विबुधैस्तत्रैवान्तरधीयत

উপমনু বললেন—সুরভি কর্তৃক বন্দিত এবং দেবগণের দ্বারা স্তূত হয়ে দেবাধিদেব এই বরগুলি দান করে সেই স্থানেই অন্তর্ধান করলেন।

Verse 73

अन्तरहिते भगवति सानुगे यादवेश्वर । ऋषिराश्रममागम्य ममैतत्‌ प्रोक्ततानिह,यादवेश्वर! जब पार्षदोंसहित भगवान्‌ अन्तर्धान हो गये, तब ऋषिने मेरे आश्रमपर आकर यहाँ मुझसे ये सब बातें बतायीं

হে যাদবেশ্বর! ভগবান্‌ পার্ষদসহ অন্তর্ধান করলে ঋষি আমার আশ্রমে এসে এখানে আমাকে এই সব কথা বললেন।

Verse 74

यानि च प्रथितान्यादौ तण्डिराख्यातवान्‌ मम । नामानि मानवश्रेष्ठ तानि त्वं शृणु सिद्धये

হে মানবশ্রেষ্ঠ! আদিকাল থেকে প্রসিদ্ধ যে নামগুলি তণ্ডি মুনি আমাকে বলেছিলেন, সিদ্ধিলাভের জন্য তুমি সেগুলি শোনো।

Verse 75

दशनामसहस््राणि देवेष्वाह पितामह: । शर्वस्य शास्त्रेषु तथा दशनामशतानि च,पितामह ब्रह्माने पूर्वकालमें देवताओंके निकट महादेवजीके दस हजार नाम बताये थे और शास्‍्त्रोंमें भी उनके सहस्र नाम वर्णित हैं

পিতামহ ব্রহ্মা পূর্বকালে দেবগণের নিকট শর্ব (মহাদেব)-এর দশ হাজার নাম ঘোষণা করেছিলেন; তদ্রূপ শাস্ত্রসমূহেও তাঁর শত শত নাম বর্ণিত আছে।

Verse 76

गुह्वानीमानि नामानि तण्डिर्भगवतो<च्युत । देवप्रसादाद्‌ देवेश: पुरा प्राह महात्मने

হে অচ্যুত! ভগবানের এই গুহ্য নামগুলি তণ্ডি মহাত্মা আমাকে বলেছিলেন—যা প্রাচীনকালে দেব (মহাদেব)-এর প্রসাদে দেবেশ ব্রহ্মা মহাত্মা তণ্ডিকে বলেছিলেন।

Verse 113

तपस्युग्रे स्थितो भूत्वा दृष्टवा तुष्टाव चेश्वरम्‌ ।।

বায়ু বললেন—ঘোর তপস্যায় স্থিত হয়ে, প্রভুর দর্শন লাভ করে তিনি ঈশ্বরের স্তব করলেন। যে দেবতা প্রাণরূপ, জীবস্বরূপ হয়ে অন্তরে মনোময় জ্যোতিরূপে অবস্থান করেন—তাঁর দর্শনের আকাঙ্ক্ষায় তণ্ডি মুনি বহু বছর কঠোর তপস্যা করেছিলেন। যখন সেই দিব্য দর্শন প্রাপ্ত হল, তখন সেই মুনীশ্বর জগদীশ্বর শিবের এইরূপ স্তব আরম্ভ করলেন।

Verse 133

भूरिकल्याणद विभो परं सत्यं नमोस्तु ते गन्धर्वराज विश्वावसु, दैत्यराज हिरण्याक्ष और देवराज इन्द्र भी आपकी वन्दना करते हैं। सबको महान्‌ कल्याण प्रदान करनेवाले प्रभो! आप परम सत्य हैं। आपको नमस्कार है

বায়ু বললেন—হে সর্বব্যাপী প্রভু, অশেষ কল্যাণদাতা, আপনাকে নমস্কার। গন্ধর্বরাজ বিশ্বাবসু, দৈত্যরাজ হিরণ্যাক্ষ এবং দেবরাজ ইন্দ্রও আপনার বন্দনা করেন। সকলকে মহৎ কল্যাণ দানকারী প্রভু, আপনি পরম সত্য। আপনাকে প্রণাম।

Verse 146

निर्वाणद सहस्रांशो नमस्ते<5स्तु सुखाश्रय । विभो! जो जन्म-मरणसे भयभीत हो संसार-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये प्रयत्न करते हैं

হে নির্বাণদাতা, সহস্ররশ্মিধারী, সুখাশ্রয়—আপনাকে নমস্কার। হে বিভো! যারা জন্ম-মৃত্যুর ভয়ে সংসারবন্ধন থেকে মুক্ত হতে সাধনা করে, সেই যতিদের নির্বাণ আপনি একাই দান করেন। আপনিই সহস্র কিরণবিশিষ্ট সূর্য হয়ে তপ্ত হয়ে জ্বলেন। সুখের আশ্রয় মহেশ্বর, আপনাকে প্রণাম।

Verse 453

दिव्यादिव्य: परो लाभ अयने दक्षिणोत्तरे । ये ही पितृयान-मार्गके द्वार चन्द्रमा कहलाते हैं। काष्ठा

বায়ু বললেন—লাভ তিন প্রকার: দিব্য লাভ, অদিব্য লাভ এবং পরম লাভ; আর কালের দুই গতি—উত্তরায়ণ ও দক্ষিণায়ণ—এগুলিও আছে। পিতৃযান নামে যে পথ, তার দ্বাররূপে চন্দ্রকে বলা হয়। কাষ্ঠা, দিকসমূহ, সংবৎসর ও যুগ প্রভৃতিও সেই একই নিয়ম-ব্যবস্থার অন্তর্গত। দেবলোকের সুখ দিব্য লাভ, এই লোকের সুখ অদিব্য লাভ, আর মোক্ষই পরম লাভ; উত্তরায়ণ ও দক্ষিণায়ণও তদনুরূপ।

Verse 459

ऋग्वेदके विद्वान तात्चिक यज्ञकर्ममें ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमाका गान करते हैं

বায়ু বললেন—ঋগ্বেদে প্রতিষ্ঠিত বিদ্বানগণ যজ্ঞকর্মে ঋক্‌মন্ত্র দ্বারা সেই প্রভুর মহিমা গেয়ে থাকেন। যজুর্বেদজ্ঞ দ্বিজেরা যজুর্মন্ত্রে দক্ষিণাগ্নি, গার্হপত্য ও আহবনীয়—এই ত্রিবিধ অগ্নিরূপে জ্ঞেয় মহাদেবের উদ্দেশ্যে আহুতি প্রদান করেন। শুদ্ধবুদ্ধি সামবেদগায়কগণ সামমন্ত্রে তাঁর স্তব গেয়ে থাকেন। অথর্ববেদী ব্রাহ্মণগণ ঋত ও সত্যের পথে, পরব্রহ্মগামী হয়ে, তাঁকে স্তব করেন। তিনিই যজ্ঞের পরম কারণ; তিনিই সর্বযজ্ঞের পরম অধিপতি বলে স্বীকৃত।

Verse 4636

प्रजार्थ वरयामास नीललोहितसंज्ञितम्‌ | पूर्वकालमें प्रजापतिने नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा इन्हीं नीललोहित नामवाले भगवान्‌की आराधना करके प्रजाकी सृष्टिके लिये वर प्राप्त किया था

বায়ু বললেন—প্রজাসৃষ্টির উদ্দেশ্যে প্রজাপতি প্রাচীনকালে নীললোহিত নামে খ্যাত প্রভুর নিকট বর প্রার্থনা করেছিলেন। নানাবিধ স্তোত্রে সেই নীললোহিতের আরাধনা করে তিনি প্রজাসৃষ্টির জন্য প্রয়োজনীয় বর লাভ করেন।

Frequently Asked Questions

How worldly aims (strength, reputation, lineage, social harmony) can be sought without severing liberation-oriented discipline—answered by framing boons within bhakti, tapas, and a theology where grace and right intention govern outcomes.

Śiva is presented as the comprehensive ground of reality—time, gods, elements, guṇas, and the highest brahman—and knowing/approaching him through devotion and disciplined practice is depicted as a decisive condition for release from rebirth.

Yes: the text asserts that multiple recognized ‘gatis’ (destinations across ritual, ascetic, renunciant, and knowledge paths) are attainable ‘only by his favor’ (tvadprasādāt), making grace a governing interpretive key for the chapter’s theology.