
कल्मषापहर-कीर्तनम् / Kīrtana for the Removal of Impurity
Upa-parva: Pāpa-nāśana-stava (Deva–Ṛṣi–Rājarṣi-kīrtana) Sub-episode
Yudhiṣṭhira opens with a normative inquiry: what is śreyas for a person, what conduct yields happiness, how one becomes free from pāpa, and what destroys kalmaṣa. Bhīṣma answers by prescribing a recitation characterized as ‘daivatavaṃśa’ and ‘ṛṣivaṃśa-samanvita,’ to be read at both twilight junctions (dvi-saṃdhyā), explicitly labeled as a supreme remover of impurity. The chapter then unfolds as a catalogic stava: it names major deities and cosmic authorities (including creator and preserver forms), assemblies of gods, celestial musicians and apsarases, ethical abstractions (dharma, satya, tapas, dīkṣā), time-units and astral bodies, followed by extensive sacred geography—rivers, tīrthas (e.g., Prayāga, Naimiṣa), and mountains (Himavān, Vindhya, Meru). A second catalog lists tapas-siddha ṛṣis aligned with directions, and then a long rājarṣi roll-call of exemplary kings. The discourse closes with protective and purificatory claims: one who praises, honors, and repeats these names is released from faults and fear, and the speaker appends a brief wish-prayer for freedom from obstacles and for steadfast success and higher destiny.
Chapter Arc: पार्वती का प्रश्न उठता है—मनुष्य किन शीलों, सदाचारों, कर्मों और किस प्रकार के दान से स्वर्गगति पाता है; धर्म का मार्ग एक जिज्ञासा नहीं, जीवन-मरण का निर्णय बनकर सामने आता है। → महेश्वर दान और लोकहित के कर्मों की विस्तृत सूची खोलते हैं—ब्राह्मण-सत्कार, दीन-आर्त-कृपणों पर करुणा, अन्न-जल-वस्त्र का दान, विश्राम-स्थल, सभा-गृह, कूप, प्रपा, पुष्करिणी आदि जनोपयोगी निर्माण; साथ ही संकेत देते हैं कि इन मर्यादाओं से विचलन नरक और पतन की ओर ले जाता है। → धर्म-उल्लंघन का कठोर फल उद्घाटित होता है—नरक से छूटने पर भी दीर्घकाल तक कुत्सित कुलों (श्वपाक, पुल्कस आदि) में जन्म का दारुण विधान; और इसके प्रतिपक्ष में निर्णायक वाक्य—‘प्राणों से प्रिय कुछ नहीं, इसलिए जैसे अपने प्रति वैसे ही पर-प्राणियों के प्रति दया’—अहिंसा/प्राणिदया को धर्म का शिखर बना देता है। → महेश्वर निष्कर्ष देते हैं कि यह ‘सतां धर्म’ कल्याणकारी है और मनुष्यों के हितार्थ कहा गया है; शास्त्र लोकधर्म की मर्यादाएँ स्थापित करते हैं, और जो उन्हें प्रमाण मानकर दृढ़व्रत रहते हैं वे उन्नति पाते हैं—संशय-च्छेदन के रूप में कुशल-अकुशल का धर्मसागर स्पष्ट हो जाता है।
Verse 1
पार्वतीने पूछा--भगवन्! मनुष्य किस प्रकारके शील, कैसे सदाचार और किन कर्मोसे युक्त होकर अथवा किस दानके द्वारा स्वर्गमें जाता है
পার্বতী জিজ্ঞাসা করলেন—“ভগবান! মানুষ কী ধরনের শীল, কী রকম সদাচার ও কোন কোন কর্মে যুক্ত হয়ে, অথবা কোন দানের দ্বারা স্বর্গ লাভ করে?”
Verse 2
श्रीमहेश्वर उवाच दाता ब्राह्मणसत्कर्ता दीनार्तकृपणादिषु । भक्ष्यभोज्यान्नपानानां वाससां च प्रदायक:
শ্রীমহেশ্বর বললেন—হে দেবী! যে ব্যক্তি দাতা, ব্রাহ্মণদের সৎকার করে এবং দীন, আর্ত ও দরিদ্রদের প্রতি করুণা প্রদর্শন করে; যে ভক্ষ্য-ভোজ্য, অন্ন-পান ও বস্ত্র দান করে—সে দানের দ্বারা ধর্ম পালন করে।
Verse 3
प्रतिश्रयान् सभा: कूपान् प्रपा: पुष्करिणीस्तथा । नैत्यकानि च सर्वाणि किमिच्छकमतीव च
শ্রীমহেশ্বর বললেন—হে দেবী! (দানরূপে) আশ্রয়স্থান, সভাগৃহ, কূপ, পানীয়জল-স্থাপন (প্যাউ) এবং পুষ্করিণী (পুকুর) প্রভৃতি নির্মাণ করা উচিত; আর নিত্য দানযোগ্য সকল বস্তু—বিশেষত গ্রহীতার ইচ্ছা জেনে।
Verse 4
आसन शयनं यान गृहं रत्नं धनं तथा । सस्यजातानि सर्वाणि गा: क्षेत्राण्यथ योषित:
শ্রীমহেশ্বর বললেন—হে দেবী! (দানরূপে) আসন, শয্যা, যানবাহন, গৃহ, রত্ন ও ধন; তদ্রূপ সকল প্রকার শস্য-উৎপন্ন, গাভী, ক্ষেত্র এবং কন্যা (বিবাহদানে) প্রদান করা হয়।
Verse 5
सुप्रतीतमना नित्यं यः प्रयच्छति मानव: । एवंभूतो नरो देवि देवलोकेडभिजायते
শ্রীমহেশ্বর বললেন—হে দেবী! যে মানুষটি সদা প্রসন্নচিত্তে নিত্য দান করে, এমন নর, দেবী, দেবলোকে জন্ম লাভ করে।
Verse 6
तत्रोष्य सुचिरं काल॑ भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् | सहाप्सतेभिमुदितो रमते नन्दनादिषु,वहाँ चिरकालतक निवास करके उत्तम भोगोंका भोग करते हुए ननन््दन आदि वनोंमें अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रमण करता है
সেখানে সে দীর্ঘকাল বাস করে অনুত্তম ভোগ উপভোগ করে; আনন্দিত হয়ে অপ্সরাদের সঙ্গে নন্দন প্রভৃতি উদ্যানে ক্রীড়া করে।
Verse 7
तस्मात् स्वर्गाच्च्युतो लोकान् मानुषेषु प्रजायते । महाभोगकुले देवि धनधान्यसमन्वित:
অতএব, হে দেবী! স্বর্গ থেকে পতিত হয়ে যখন সে নীচের লোকসমূহে ফিরে আসে, তখন মানুষের মধ্যে মহাভোগসম্পন্ন কুলে জন্ম লাভ করে এবং ধন-ধান্যে সমৃদ্ধ হয়।
Verse 8
तत्र कामगुणै: सर्वे: समुपेतो मुदा युतः । महाभोगो महाकोशो धनी भवति मानव:
সেখানে সে সকল কাম্য গুণে সমুপেত হয়ে আনন্দে পরিপূর্ণ থাকে। তার কাছে মহাভোগের সামগ্রী সঞ্চিত থাকে, তার কোষাগারও বৃহৎ হয়, এবং সে মানুষ সর্বতোভাবে ধনী হয়ে ওঠে।
Verse 9
एते देवि महाभागा: प्राणिनो दानशीलिन: । ब्रह्मणा वै पुरा प्रोक्ता: सर्वस्य प्रियदर्शना:
হে দেবী! এই দানশীল প্রাণীরা মহাভাগ্যবান। প্রাচীনকালে ব্রহ্মাই তাদের বিষয়ে এভাবেই বলেছিলেন; তারা সকলের দৃষ্টিতে প্রিয় ও মনোহর।
Verse 10
देवि! ये दानशील प्राणी ही ऐसे महान् सौभाग्यसे सम्पन्न होते हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इनका ऐसा ही परिचय दिया है। दाता मनुष्य सभीकी दृष्टि में प्रिय होते हैं ।।
কিন্তু, হে দেবী! অন্য অনেক মানুষ দান করতে কৃপণ। তারা অল্পবুদ্ধি; ধন থাকা সত্ত্বেও ব্রাহ্মণদের প্রার্থনায় কিছুই দেয় না।
Verse 11
दीनान्धकृपणान् दृष्टवा भिक्षुकानतिथीनपि । याच्यमाना निवर्तन्ते जिह्वालोभसमन्विता:
তারা দীন, অন্ধ ও দরিদ্রকে—ভিক্ষুককে, এমনকি অতিথিকেও—দেখামাত্রই মুখ ফিরিয়ে নেয়। প্রার্থনা করলেও, জিহ্বার লোভে আচ্ছন্ন হয়ে, তারা অন্ন দেয় না।
Verse 12
न धनानि न वासांसि न भोगान् न च काउचनम् । न गावो नान्नविकृतिं प्रयच्छन्ति कदाचन,वेन धन, न वस्त्र, न भोग, न सुवर्ण, न गौ और न अन्नकी बनी हुई नाना प्रकारकी खाद्य वस्तुओंका कभी दान करते हैं
শ্রী মহেশ্বর বললেন— তারা কখনও দান করে না— না ধন, না বস্ত্র, না ভোগসামগ্রী, না স্বর্ণ; না গাভী, না অন্ন থেকে প্রস্তুত নানা প্রকার খাদ্য। এইভাবে তারা দানধর্ম ও উদারতা থেকে সর্বদা বিমুখ থাকে।
Verse 13
अप्रवृत्ताश्न ये लुब्धा नास्तिका दानवर्जिता: | एवंभूता नरा देवि निरयं यान्त्यबुद्धय:,देवि! ऐसे अकर्मण्य, लोभी, नास्तिक तथा दानधर्मसे दूर रहनेवाले बुद्धिहीन मनुष्य नरकमें पड़ते हैं
শ্রী মহেশ্বর বললেন— হে দেবী! যারা কর্মবিমুখ, পরিশ্রমে অনিচ্ছুক, লোভী, নাস্তিক এবং দানধর্ম থেকে দূরে থাকে— এমন বুদ্ধিহীন মানুষ নরকে পতিত হয়।
Verse 14
ते वै मनुष्यतां यान्ति यदा कालस्य पर्ययात् | धनरिक्ते कुले जन्म लभन्ते स्वल्पबुद्धयः,यदि कालचक्रके फेरसे वे मन्दबुद्धि मानव पुनः मनुष्ययोनिमें जन्म लेते हैं तो निर्धन कुलमें ही उत्पन्न होते हैं
মহেশ্বর বললেন— কালের চক্র ঘুরে যখন তারা আবার মানবযোনিতে ফিরে আসে, তখন অল্পবুদ্ধি সেই সত্তারা ধনশূন্য বংশে জন্ম লাভ করে।
Verse 15
क्षुत्पिपासापरीताश्व सर्वलोकबहिष्कृता: । निराशा: सर्वभोगेभ्यो जीवन्त्यधर्मजीविकाम्
তারা ক্ষুধা-তৃষ্ণায় কাতর থাকে, সকলের দ্বারা বহিষ্কৃত হয়; আর সব ভোগ থেকে নিরাশ হয়ে অধর্মের জীবিকায় জীবন ধারণ করে।
Verse 16
अल्पभोगकुले जाता अल्पभोगरता नरा: । अनेन कर्मणा देवि भवन्त्यधनिनो नरा:,देवि! इस पापकर्मसे ही मनुष्य अल्प भोगवाले कुलमें जन्म लेता है, थोड़े-से ही भोग भोगते और सदा निर्धन रहते हैं
মহেশ্বর বললেন— হে দেবী! এই পাপকর্মের ফলে মানুষ অল্প-ভোগের বংশে জন্মায়, সামান্য ভোগেই আসক্ত থাকে, এবং সর্বদা দরিদ্রই থাকে।
Verse 17
अपरे स्तम्भिनो नित्यं मानिन: पापतो रता: । आसनार्हसय ये पीठं न प्रयच्छन्त्यचेतस:
এদের ছাড়াও আরও কিছু লোক আছে, যারা সর্বদা দম্ভ ও অহংকারে স্ফীত এবং পাপে আসক্ত। তারা মূঢ়—আসনযোগ্য পূজনীয় ব্যক্তিকে বসার জন্য পিঁড়ি বা চৌকি পর্যন্তও দেয় না।
Verse 18
मार्गहिस्थ च ये मार्ग न यच्छन्त्यल्पबुद्धय: । पाद्या्हस्य च ये पाद्यं न ददत्यल्पबुद्धय:
যারা অল্পবুদ্ধি—পথে দাঁড়িয়েও পথ দেখানো উচিত এমন ব্যক্তিকে পথ দেখায় না, এবং পাদ্য অর্পণযোগ্য পূজনীয় অতিথিকে পাদ্য (পা ধোয়ার জল) দেয় না।
Verse 19
अर्घ्यहिन् न च सत्कारैरर्चयन्ति यथाविधि । अर्घ्यमाचमनीयं वा न यच्छन्त्यल्पबुद्धय:
তদুপরি তারা অর্ঘ্য পাওয়ার যোগ্য মান্য ব্যক্তিকে নানা প্রকার সৎকারে বিধিপূর্বক পূজা করে না; আর সেই মূঢ়েরা তাদের অর্ঘ্য বা আচমনীয়ও দেয় না।
Verse 20
गुरु चाभिगतं प्रेम्णा गुरुवन्न बुभूषते । अभिमानप्रवृत्तेन लोभेन समवस्थिता:
গুরু আগমন করলে তারা প্রেমসহকারে তাঁর সেবা-সম্মান করে না—গুরুর মতো মর্যাদা দিতে চায় না। অহংকারপ্রসূত লোভে স্থিত হয়ে তারা সম্মানীয়দের অপমান করে এবং বয়োজ্যেষ্ঠদের তিরস্কার করে।
Verse 21
सम्मान्यांश्षावमन्यन्ते वृद्धान् परिभवन्ति च । एवंविधा नरा देवि सर्वे निरयगामिन:
তারা সম্মানযোগ্যদের অবজ্ঞা করে এবং বৃদ্ধদেরও অপমান করে। দেবি! এই ধরনের সকল মানুষই নরকগামী।
Verse 22
ते वै यदि नरास्तस्मान्निरयादुत्तरन्ति वै । वर्षपूगैस्ततो जन्म लभन्ते कुत्सिते कुले
যদি সেই মানুষরা কোনোভাবে সেই নরক থেকে উঠে আসতেও পারে, তবু বহু বছরের পরেই তাদের পুনর্জন্ম হয়—এবং তা-ও নিন্দিত, অধম কুলে। অতএব যারা গুরুজন, বৃদ্ধ ও পূজনীয়দের অবজ্ঞা করে, তারা দুঃখ ভোগ করে; মুক্তির পরেও নিন্দিত সম্প্রদায়ে জন্ম নিয়ে কর্মফল ভোগ করে।
Verse 23
श्वरपाकपुल्कसादीनां कुत्सितानामचेतसाम् | कुलेषु तेषु जायन्ते गुरुवृद्धापचायिन:
সেই নরক থেকে মুক্ত হলে, নীচবুদ্ধি মানুষরা শ্বপাক, পুল্কস প্রভৃতি নিন্দিত সম্প্রদায়ের কুলে জন্মায়। যারা গুরুজন ও বৃদ্ধদের অবমাননা করে, সেই অধমেরা ওই নিন্দিত বংশেই উৎপন্ন হয়।
Verse 24
न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजक: । लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्मितो मधुरं वच:
হে দেবি! যে না উদ্ধত, না অহংকারী; যে দেবতা ও দ্বিজদের পূজা করে; যে লোকসমাজে পূজ্য বলে গণ্য; যে বয়োজ্যেষ্ঠদের প্রণাম করে; যে বিনয়ী এবং মধুর বাক্য বলে—সে এই ধর্মলক্ষণসমূহে ধর্মপথ অনুসরণ করে।
Verse 25
सर्ववर्णप्रियकर: सर्वभूतहित: सदा । अद्वेषी सुमुख: श्लक्षण: स्निग्धवाणीप्रद: सदा
হে দেবি! যে সকল বর্ণের প্রিয়, সর্বদা সকল প্রাণীর হিতসাধনে রত; যে দ্বেষহীন; যার মুখ প্রসন্ন; যার স্বভাব কোমল; এবং যে সর্বদা স্নেহময় বাক্য বলে—সে লোকসমাজে সম্মান পায় ও শুভ লোক লাভ করে; পরে মানবযোনিতে এসে উৎকৃষ্ট কুলে জন্মায়।
Verse 26
स्वागतेनैव सर्वेषां भूतानामविहिंसक: । यथार्हसत्क्रियापूर्वमर्चचन्तवतिष्ठति
হে দেবি! যে সকল প্রাণীর প্রতি অহিংস; যে স্নেহসহকারে সকলকে স্বাগত জানায়; এবং যে যথাযোগ্য সম্মান-সত্কারের সঙ্গে তাদের পূজা-আদর করে—সে উপযুক্ত মর্যাদা ও শিষ্টাচারের কর্ম দ্বারা সর্বদা ধর্মে প্রতিষ্ঠিত থাকে।
Verse 27
मार्गार्हाय ददन्मार्ग गुरुं गुरुवदर्चयन् । अतिथियद्रग्रहरतस्तथाभ्यागतपूजक:
যে পথ দেওয়ার যোগ্য ব্যক্তিকে পথ দেয়, গুরুকে গুরুর মতোই সম্মান করে, অতিথি-সৎকার ও সেবায় নিবিষ্ট থাকে এবং স্বয়ং আগত অতিথিকেও ভক্তিভরে পূজা করে—হে দেবী, এমন শিষ্টাচার-নিষ্ঠ ও বিনয়ী মানুষ স্বর্গলোক লাভ করে; পরে মানবযোনিতে ফিরে এসে বিশিষ্ট কুলে জন্ম গ্রহণ করে।
Verse 28
एवंभूतो नरो देवि स्वर्गतिं प्रतिपद्यते । ततो मानुषतां प्राप्प विशिष्टकुलजो भवेत्
মহেশ্বর বললেন—হে দেবী, এমন স্বভাব-আচরণসম্পন্ন মানুষ স্বর্গগতি লাভ করে; তারপর মানবজীবনে ফিরে এসে বিশিষ্ট কুলে জন্মায়।
Verse 29
तत्रासौ विपुलैभोंगै: सर्वरत्नसमायुतः । यथार्हदाता चार्हेषु धर्मचर्यापरो भवेत्
সেই জন্মে সে প্রভূত ভোগে সমৃদ্ধ হয় এবং সর্বপ্রকার রত্নে অলংকৃত থাকে; যোগ্য ব্রাহ্মণদের যথোচিত দান করে এবং ধর্মাচরণে নিবিষ্ট থাকে।
Verse 30
सम्मतः सर्वभूतानां सर्वलोकनमस्कृत: । स्वकर्मफलमाप्रोति स्वयमेव नर: सदा,वहाँ सब प्राणी उसका सम्मान करते हैं और सब लोग उसके सामने नतमस्तक होते हैं। इस प्रकार मनुष्य अपने कर्मोका फल सदा स्वयं ही भोगता है
সে সর্বভূতের কাছে সম্মানিত হয় এবং সকল লোক তার সামনে নত হয়। এভাবেই মানুষ সর্বদা নিজের কর্মের ফল নিজেই লাভ করে।
Verse 31
उदात्तकुलजातीय उदात्ताभिजन: सदा । एष धर्मों मया प्रोक्तो विधात्रा स्वयमीरित:
মহাদেব বললেন—ধর্মাত্মা মানুষ সর্বদা উৎকৃষ্ট কুল ও মহৎ বংশে জন্ম লাভ করে। এই ধর্মই আমি ঘোষণা করলাম—যা স্বয়ং বিধাতা প্রথমে উচ্চারণ করেছিলেন।
Verse 32
यस्तु रौद्रसमाचार: सर्वसत्त्वभयंकर: । हस्ताभ्यां यदि वा पदभ्यां रज्ज्वा दण्डेन वा पुन:
মহাদেব বললেন—যে ব্যক্তি উগ্র ও নিষ্ঠুর আচরণে অভ্যস্ত, সকল জীবের ভয়ংকর—সে হাত দিয়ে আঘাত করুক বা পা দিয়ে, কিংবা আবার দড়ি বা লাঠি ব্যবহার করুক—এইরূপ হিংস্র আচরণই এখানে বর্ণিত।
Verse 33
लोष्टै: स्तम्भैरायुधैर्वा जन्तून् बाधति शोभने । हिंसार्थ निकृतिप्रज्ञ: प्रोद्ेजयति चैव ह
মহেশ্বর বললেন—হে শোভনে! বিকৃত বুদ্ধিসম্পন্ন ব্যক্তি হিংসার উদ্দেশ্যে জীবদের কষ্ট দেয়—মাটির ঢেলা দিয়ে, লাঠি বা খুঁটি দিয়ে, কিংবা অস্ত্র দিয়ে। ক্ষতি সাধনের বাসনায় সে ইচ্ছাকৃতভাবে তাদের আতঙ্কিত করে এবং হিংসা উসকে দেয়।
Verse 34
उपक्रामति जनन््तूंश्च उद्वेशजनन: सदा । एवंशीलसमाचारो निरयं प्रतिपद्यते
যে জীবদের উপর আক্রমণ করে এবং সর্বদা বিদ্বেষের জন্ম দেয়—যার আচরণ এমনই—সে নরকে পতিত হয়।
Verse 35
शोभने! जिस मनुष्यका आचरण क्रूरतासे भरा हुआ है
শ্রী মহেশ্বর বললেন—হে শোভনে! যে মানুষের আচরণ নিষ্ঠুরতায় ভরা, যে সকল প্রাণীর ভয়ের কারণ; যে হাত-পা দিয়ে, দড়ি, লাঠি ও ঢেলা দিয়ে আঘাত করে, খুঁটিতে বেঁধে এবং মারণাস্ত্রের প্রহারে জীবজন্তুকে যন্ত্রণা দেয়; যে ছল-কপটে পারদর্শী হয়ে হিংসার জন্য তাদের মধ্যে আতঙ্ক ও অস্থিরতা জাগায়; এবং নিজে ভীতিসঞ্চারী হয়ে সর্বদা তাদের উপর আক্রমণ চালায়—এমন স্বভাব ও আচরণধারী মানুষ নরকে পতিত হয়। আর যদি কালের চক্রে সে আবার মানবজন্ম লাভ করে, তবে বহু বাধা-বিপত্তিতে ক্লিষ্ট অধম কুলে তার জন্ম হয়।
Verse 36
लोकद्देष्यो5धम: पुंसां स्वयं कर्मफलै: कृत्तै: एष देवि मनुष्येषु बोद्धव्यो ज्ञातिबन्धुषु
শ্রী মহেশ্বর বললেন—মানুষদের মধ্যে অধম সেই, যে নিজেরই কর্মফলের দ্বারা সমাজে ঘৃণিত হয়ে ওঠে। হে দেবি! মানবজীবনে বিশেষত আত্মীয়-স্বজন ও বন্ধুবান্ধবের সম্পর্কেই এটি চিনে নিতে হয়।
Verse 37
देवि! ऐसा मनुष्य अपने ही किये हुए कर्मोके फलके अनुसार मनुष्योंमें तथा जाति- बन्धुओंमें नीच समझा जाता है और सब लोग उससे द्वेष रखते हैं ।।
মহেশ্বর বললেন—“দেবি! যে মানুষ এইরূপ আচরণ করে, সে নিজেরই কর্মফলের দ্বারা মানুষের মধ্যে এবং নিজের জাতি-বন্ধুদের মধ্যেও নীচ বলে গণ্য হয়; সকলেই তাকে ঘৃণা করে। কিন্তু এর বিপরীতে যে সকল প্রাণীকে করুণাদৃষ্টিতে দেখে, সকলকে বন্ধু জ্ঞান করে, সকলের প্রতি পিতার ন্যায় স্নেহ রাখে, কারও সঙ্গে বৈর করে না এবং ইন্দ্রিয়সমূহ সংযত রাখে—যে হাত-পা সংযমে রেখে কোনো জীবকে না উদ্বিগ্ন করে, না হত্যা করে; যাকে সকল প্রাণী বিশ্বাস করে; যে দড়ি, লাঠি, ঢেলা কিংবা ঘাতক অস্ত্রশস্ত্র দিয়ে কোনো প্রাণীকে কষ্ট দেয় না; যার কর্ম কোমল ও নির্দোষ এবং যে সদা দয়াপরায়ণ—সে পুরুষ স্বর্গ লাভ করে, দিব্য দেহ ধারণ করে এবং সেখানে দিব্য প্রাসাদে দেবতাদের ন্যায় আনন্দে বাস করে।”
Verse 38
नोद्वेजयति भूतानि न विधातयते तथा । हस्तपादै: सुनियतैरविश्वास्य: सर्वजन्तुषु
সে প্রাণীদের উদ্বিগ্ন করে না, তাদের বিনাশও করে না। হাত-পা সুসংযত রাখায় সে সকল জীবের কাছে বিশ্বাসযোগ্য হয়। এমন কোমল আচরণ, অহিংস কর্ম এবং স্থির করুণাসম্পন্ন ব্যক্তি স্বর্গে দিব্য দেহ লাভ করে দেবতাদের ন্যায় আনন্দে বাস করে।
Verse 39
न रज्ज्वा न च दण्डेन न लोष्टैर्नायुधेन च । उद्वेजयति भूतानि श्लक्षणकर्मा दयापर:
সে দড়ি দিয়ে নয়, লাঠি দিয়ে নয়, ঢেলা দিয়ে নয়, অস্ত্রশস্ত্র দিয়েও নয়—কোনোভাবেই প্রাণীদের ভীত করে না। তার কর্ম কোমল ও নির্দোষ; সে করুণায় নিবিষ্ট।
Verse 40
एवंशीलसमाचार: स्वर्गे समुपजायते । तत्रासौ भवने दिव्ये मुदा वसति देववत्
এমন শীল ও এমন আচরণসম্পন্ন ব্যক্তি স্বর্গে জন্ম লাভ করে। সেখানে সে দিব্য প্রাসাদে দেবতাদের ন্যায় আনন্দে বাস করে।
Verse 41
स चेत् कर्मक्षयान्मर्त्यों मनुष्येष्पजायते । अल्पाबाधो निरातड्क: स जात: सुखमेधते
মহাদেব বললেন—“যদি পুণ্যক্ষয় হলে সে আবার মানবলোকে জন্মায়, তবে তার উপর অল্পই বিপদ-ব্যাধি আসে; সে ভয় ও অশান্তি থেকে মুক্ত থাকে। এমন জন্ম নিয়ে সে সুখে সমৃদ্ধ হয়—কল্যাণের অংশীদার হয়ে, ক্লেশ ও উদ্বেগহীন জীবন যাপন করে। দেবি! এটাই সৎপুরুষদের পথ, যেখানে বিঘ্ন-বাধা প্রবেশ করতে পারে না।”
Verse 42
सुखभागी निरायासो निरुद्धवेग: सदा नर: । एष देवि सतां मार्गो बाधा यत्र न विद्यते
এমন ব্যক্তি সুখের অংশীদার হয়—অনায়াস, সংযত বেগসম্পন্ন এবং সর্বদা স্থির। হে দেবি! এটাই সজ্জনদের পথ, যেখানে কোনো বাধা বা বিঘ্নের আশ্রয় হয় না।
Verse 43
उमोवाच इमे मनुष्या दृश्यन्ते ऊहापोहविशारदा: । ज्ञानविज्ञानसम्पन्ना: प्रज्ञावन्तो<र्थकोविदा:
উমা বললেন—ভগবান! এই মানুষদের মধ্যে কিছুকে দেখা যায় তর্ক-বিতর্কে পারদর্শী, জ্ঞান ও প্রয়োগজ্ঞানসম্পন্ন, প্রজ্ঞাবান এবং অর্থ-ব্যবহারে নিপুণ।
Verse 44
दुष्प्रज्ञाश्नापरे देव ज्ञानविज्ञानवर्जिता: । केन कर्मविशेषेण प्रज्ञावान् पुरुषो भवेत्
হে দেব! আবার কিছু মানুষকে দেখা যায় জ্ঞান ও প্রয়োগজ্ঞানহীন এবং দুর্বুদ্ধি। এমন অবস্থায় কোন বিশেষ কর্মের দ্বারা মানুষ প্রজ্ঞাবান হতে পারে?
Verse 45
अल्पप्रज्ञो विरूपाक्ष कथं भवति मानव: । एतन्मे संशयं छिन्धि सर्वधर्मविदां वर,विरूपाक्ष! मनुष्य मन्दबुद्धि कैसे होता है? सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ महादेव! आप मेरे इस संदेहका निवारण कीजिये
হে বিরূপাক্ষ! মানুষ কীভাবে অল্পপ্রজ্ঞ হয়? হে ধর্মজ্ঞদের শ্রেষ্ঠ মহাদেব, আমার এই সংশয় ছিন্ন করুন।
Verse 46
जात्यन्धाक्षापरे देव रोगार्ताश्षापरे तथा । नरा: क्लीबाश्व दृश्यन्ते कारणं ब्रूहि तत्र वै,देव! कुछ लोग जन्मान्ध, कुछ रोगसे पीड़ित और कितने ही नपुंसक देखे जाते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये
হে দেব! কিছুকে জন্মান্ধ, কিছুকে রোগপীড়িত, আর কিছুকে নপুংসক দেখা যায়। এর প্রকৃত কারণ আমাকে বলুন।
Verse 47
श्रीमहेश्वर उवाच ब्राह्मणान् वेदविदुष: सिद्धान् धर्मविदस्तथा । परिपृच्छन्त्यहरह: कुशला: कुशलं तथा
শ্রীমহেশ্বর বললেন—দেবি! যে কুশলী জন প্রতিদিন বেদজ্ঞ, সিদ্ধ ও ধর্মজ্ঞ ব্রাহ্মণদের কুশল-ক্ষেম জিজ্ঞাসা করে, শ্রদ্ধাভরে তাঁদের সম্মান করে এবং অশুভ কর্ম ত্যাগ করে শুভ কর্মে প্রবৃত্ত হয়—সে পরলোকে স্বর্গ লাভ করে এবং ইহলোকে স্থির সুখ পায়।
Verse 48
वर्जयन्तो5शुभं कर्म सेवमाना: शुभं तथा । लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिहलोके तथा सुखम्
মহাদেব বললেন—যারা অশুভ কর্ম বর্জন করে এবং নিরন্তর শুভ আচরণ করে, তারা পরলোকে নিত্য স্বর্গগতি লাভ করে এবং এই লোকেই স্থায়ী সুখ পায়।
Verse 49
स चेन्मानुषतां याति मेधावी तत्र जायते । श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य कल्याणमुपजायते
এমন আচরণকারী ব্যক্তি যদি স্বর্গ থেকে ফিরে আবার মানবযোনিতে জন্মায়, তবে সে মেধাবী হয়। তার ক্ষেত্রে শাস্ত্রশ্রুত জ্ঞানও তার প্রজ্ঞার অনুসারী হয়; তাই তার জন্য সদা কল্যাণ উদ্ভূত হয়।
Verse 50
परदारेषु ये चापि चक्षुर्दुष्ट प्रयुझ्जते । तेन दुष्टस्वभावेन जात्यन्धास्ते भवन्ति ह
মহেশ্বর বললেন—যারা পরস্ত্রীর প্রতি দুষ্ট ও কামাতুর দৃষ্টি নিক্ষেপ করে, সেই দুষিত স্বভাবের ফলেই তারা নিশ্চয়ই জন্মান্ধ হয়।
Verse 51
जो परायी स्त्रियोंके प्रति सदा दोषभरी दृष्टि डालते हैं, उस दुष्ट स्वभावके कारण वे जन्मान्ध होते हैं ।।
যারা কলুষিত মনে নগ্না নারীর দিকে চেয়ে থাকে, সেই দুষ্কর্মী পুরুষেরা এই লোকেই রোগে কাতর হয়।
Verse 52
ये तु मूढा दुराचारा वियोनौ मैथुने रता: । पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञा क्लीबत्वमुपयान्ति ते
মহাদেব বললেন—যারা মোহগ্রস্ত ও দুরাচারী, যারা অযোনি/বিপরীত রীতির মৈথুনে আসক্ত, এবং পুরুষসম্বন্ধে অত্যন্ত বিকৃত বুদ্ধিসম্পন্ন—তারা ক্লীবত্ব (নপুংসকতা) প্রাপ্ত হয়।
Verse 53
जो दुराचारी, दुर्बुद्धि एवं मूढ़ मनुष्य पशु आदिकी योनिमें मैथुन करते हैं, वे पुरुषोंमें नपुंसक होते हैं ।।
মহেশ্বর বলেন—যারা পশুহত্যা করায়, যারা গুরুর শয্যা লঙ্ঘন করে, এবং যারা উচ্ছৃঙ্খল/বিচ্ছিন্ন মৈথুনে প্রবৃত্ত—তারা মানুষ ক্লীব (নপুংসক) হয়ে জন্মায়।
Verse 54
उमोवाच सावद्यं किन्नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च । श्रेय: कुर्वन्नवाप्रोति मानवो देवसत्तम,पार्वतीने पूछा--देवश्रेष्ठ] कौन सदोष कर्म हैं और कौन निर्दोष, कौन-सा कर्म करके मनुष्य कल्याणका भागी होता है?
উমা বললেন—হে দেবসত্তম! কোন কর্ম দোষযুক্ত এবং কোন কর্ম নির্দোষ? কোন কর্ম করলে মানুষ শ্রেয় (কল্যাণ) লাভ করে?
Verse 55
श्रीमहेश्वर उवाच श्रेयांसं मार्गमन्विच्छन् सदा य: पृच्छति द्विजान् । धर्मान्विषी गुणाकांक्षी स स्वर्ग समुपाश्षुते
শ্রীমহেশ্বর বললেন—যে শ্রেয় পথের অনুসন্ধানে সদা দ্বিজদের (বিদ্বান ব্রাহ্মণদের) জিজ্ঞাসা করে, যে ধর্মের অন্বেষী ও গুণের আকাঙ্ক্ষী—সে স্বর্গ লাভ করে।
Verse 56
श्रीमहेश्वरने कहा--जो श्रेष्ठ मार्गको पानेकी इच्छा रखकर सदा ही ब्राह्मणोंसे उसके विषयमें पूछता है, धर्मका अन्वेषण करता और सद्गुणोंकी अभिलाषा रखता है, वही स्वर्गलोकके सुखका अनुभव करता है ।।
শ্রীমহেশ্বর বললেন—যে শ্রেয় পথ লাভের ইচ্ছায় সদা ব্রাহ্মণদের কাছে তার বিষয়ে জিজ্ঞাসা করে, ধর্মের অন্বেষণ করে এবং সদ্গুণের আকাঙ্ক্ষা রাখে—সেই স্বর্গলোকের সুখ ভোগ করে। আর হে দেবি! সে যদি কখনও মানবযোনিতে আসে, তবে সাধারণত মেধাবী ও ধারণাশক্তিসম্পন্ন হয়ে জন্মায়।
Verse 57
एष देवि सतां धर्मो मन्तव्यो भूतिकारक: । नृणां हितार्थाय मया तव वै समुदाह्ृत:
হে দেবী! এটাই সৎজনদের ধর্ম; একে সত্যকল্যাণ ও সমৃদ্ধির কারণ বলে মান্য করা উচিত। মানুষের মঙ্গলের জন্য আমি তোমার কাছে এই উপদেশ স্পষ্টভাবে ঘোষণা করেছি।
Verse 58
उमोवाच अपरे स्वल्पविज्ञाना धर्मविद्वेषिणो नरा: । ब्राह्मणान् वेदविदुषो नेच्छन्ति परिसर्पितुम्
উমা বললেন—ভগবান! আরও কিছু মানুষ অল্পবুদ্ধির কারণে ধর্মকে ঘৃণা করে। তারা বেদজ্ঞ ব্রাহ্মণদের কাছে যেতেও চায় না।
Verse 59
व्रतवन्तो नरा: केचिच्छुद्धा धर्मपरायणा: । अव्रता भ्रष्टनियमास्तथान्ये राक्षसोपमा:,कुछ मनुष्य व्रतधारी, श्रद्धालु और धर्मपरायण होते हैं तथा दूसरे व्रतहीन, नियमश्रष्ट तथा राक्षसोंके समान होते हैं
কিছু মানুষ ব্রতধারী—আচরণে শুদ্ধ ও ধর্মপরায়ণ; আর কিছু অন্যরা ব্রতহীন, নিয়মভ্রষ্ট এবং আচরণে রাক্ষসসম।
Verse 60
यज्वानश्न तथैवान्ये निहॉमाश्ष तथापरे । केन कर्मविपाकेन भवन्तीह वदस्व मे
অনেকে যজ্ঞপরায়ণ, আবার কিছু অন্যরা হোম-যজ্ঞ থেকে বিমুখ। কোন কর্মবিপাকে এখানে মানুষের মধ্যে এমন পরস্পরবিরোধী স্বভাব জন্মায়—আমাকে বলুন।
Verse 61
श्रीमहेश्वर उवाच आगमा लोकधर्माणां मर्यादा: सर्वनिर्मिता: । प्रामाण्येनानुवर्तन्ते दृश्यन्ते च दूढब्रता:
শ্রী মহেশ্বর বললেন—আগমই লোকধর্মের সীমা ও মানদণ্ড, যা সর্বত্র প্রতিষ্ঠিত। মানুষ এগুলিকে প্রমাণ জেনে অনুসরণ করে; আর দৃঢ়ব্রতীরা সেগুলিতে অবিচলভাবে স্থিত থাকে।
Verse 62
श्रीमहेश्वरने कहा--देवि! शास्त्र लोकधर्मोकी उन मर्यादाओंको स्थापित करते हैं, जो सबके हितके लिये निर्मित हुई हैं। जो उन शास्त्रोंको प्रमाण मानते हैं, वे दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करते देखे जाते हैं ।।
শ্রীমহেশ্বর বললেন—দেবি! শাস্ত্রই লোকধর্মের সেই সীমারেখা স্থাপন করে, যা সর্বজনের কল্যাণের জন্য নির্মিত। যারা শাস্ত্রকে প্রমাণ মানে, তারা দৃঢ়চিত্তে শ্রেষ্ঠ ব্রত পালন করে দেখা যায়। কিন্তু যারা মোহবশত অধর্মকে ‘ধর্ম’ বলে—ব্রতহীন ও আচারের সীমা বিনষ্টকারী—তাদের ব্রহ্মরাক্ষস বলা হয়েছে।
Verse 63
ते चेत्कालकृतोद्योगात् सम्भवन्तीह मानुषा: । नि्ोमा निर्वषट्कारास्ते भवन्ति नराधमा:,वे मनुष्य यदि कालयोगसे इस संसारमें मनुष्य होकर जन्म लेते हैं तो होम और वषट्कारसे रहित तथा नराधम होते हैं
যদি কালের প্রেরিত উদ্যোগে তারা এখানে মানবজন্মও লাভ করে, তবু হোম ও ‘বষট্’ উচ্চারণহীন হয়ে তারা নরাধমে পরিণত হয়।
Verse 64
एष देवि मया सर्व: संशयच्छेदनाय ते । कुशलाकुशलो नृणां व्याख्यातो धर्मसागर:
দেবি! তোমার সংশয় ছেদন করার জন্য আমি মানুষের কুশল-অকুশল আচরণসহ ধর্মসাগর সম্পূর্ণভাবে ব্যাখ্যা করেছি।
Verse 145
न हि प्राणै: प्रियतमं लोके किंचन विद्यते । तस्मात् प्राणिदया कार्या यथा55त्मनि तथा परे ।।
এই জগতে প্রাণের চেয়ে প্রিয় আর কিছু নেই। অতএব সকল প্রাণীর প্রতি দয়া করা উচিত—যেমন দয়া নিজের জন্য কাম্য, তেমনই অন্যের জন্যও।
Yudhiṣṭhira’s fourfold inquiry: what constitutes śreyas, what conduct produces happiness, by what one becomes free from pāpa, and what practice destroys kalmaṣa (moral impurity).
Regular, disciplined remembrance and praise—reciting an authoritative list of devas, ṛṣis, rājarṣis, and sacred places at both twilight junctions—functions as a purificatory practice shaping conduct and reducing moral stain.
Yes. The text states that one who kīrtanas, praises, and honors these enumerated beings and loci is freed from faults (kilbiṣa/pāpa), protected from fear, and the closing prayer seeks absence of obstacles and attainment of steady success and higher destiny.