
Vānaprastha-dharma and Tapas: Śiva–Umā Saṃvāda (Forest-Stage Discipline and Austerity)
Upa-parva: Āśrama-dharma Anuśāsana (Vānaprastha-dharma discourse)
Umā describes ascetics residing in pleasant regions—mountain springs, groves, and forest gardens—and asks Śaṅkara to state the “pious method” (vidhi) of vānaprasthas who live by their own bodies’ resources. Maheśvara enumerates a regulated program: thrice-daily ablution, worship of ancestors and deities, agnihotra and iṣṭi-homa procedures, gathering nīvāra grains, subsisting on fruits and roots, and using oils such as iṅguda and eraṇḍa for necessary unction. He adds yogic conduct and moral restraint—abandoning desire and anger—along with austerities like pañcatapa in summer, maṇḍūka-yoga discipline, vīrāsana, sleeping on bare ground, and practices termed śīta-yoga and agni-yoga. Dietary restraints range from water-only and air-only regimens to limited foods (algae, fallen leaves), with travel and dwelling prescribed “according to time, dharma, and rule.” The text integrates ritual obligations: pañca-yajña, nāga-pañcamī observance, aṣṭamī rites, cāturmāsya, and full-moon offerings; it frames forest renunciants as detached from household entanglements and oriented to higher worlds (Brahmaloka, Somaloka). Umā then asks about “siddhi-vāda” forest-dwellers who may be married; Śiva explains their discipline, emphasizing that sexuality is permitted only as rule-governed (ṛtu-kāla) and not by impulse. The discourse culminates in a virtue-ethical emphasis: granting “abhaya-dakṣiṇā” (assurance of safety), compassion, and especially ārjava (straightforwardness) as dharma’s core, contrasted with crookedness as adharma. Finally, Śiva lists outcome-claims (phalāni): specific vows and austerities are said to yield posthumous enjoyments in Gandharva, Nāga, Yakṣa, Varuṇa, Agni, Śakra, or “vīra” realms, and in some cases worldly sovereignty after prolonged discipline, thereby presenting a traditional motivational taxonomy for tapas.
Chapter Arc: युधिष्ठिर के प्रश्न से अध्याय खुलता है—‘दानों में सर्वोत्तम दान कौन-सा है, किस वस्तु को किस विधि से देना चाहिए?’ और भीष्म, गंगानन्दन, श्राद्ध-धर्म के गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हैं। → वैशम्पायन के वचन से संवाद का भार बढ़ता है: भीष्म ‘धर्माणां परमं गुह्यम्’ बताने लगते हैं—पिण्ड, तर्पण, पितृगति, और विधि-भ्रंश से होने वाले दोषों का सूक्ष्म विवेचन; साथ ही यह जिज्ञासा उभरती है कि पिण्ड को जल में डालने जैसी क्रियाएँ वास्तव में किस देवता को तृप्त करती हैं और पितरों का उद्धार कैसे करती हैं। → पिण्डेषु त्रिषु या गति—तीन पिण्डों के फल और पितृलोक-गमन का निर्णायक कथन; तथा विशिष्ट कर्मों (वृषोत्सर्ग, वर्षा-ऋतु में दीपदान, अमावस्या को तिलोदक-तर्पण) के प्रत्यक्ष फल का उद्घोष—‘पितर सोमलोक को जाते हैं’ और ‘दीपदान से नरक का तम नष्ट होता है’। → भीष्म श्राद्ध को दान-धर्म का शिखर बताकर विधि, श्रद्धा, और उद्देश्य (पितृ-तृप्ति व कुल-रक्षा) को स्थिर करते हैं—संतानोत्पत्ति सहित पितृश्रद्धा को भी ‘दुर्गम नरक से प्रपितामहों के उद्धार’ का साधन कहा जाता है। → पिण्ड-क्रिया की सूक्ष्मता पर प्रश्न बना रहता है—‘कं वा प्रीणयते देवम्, कथं तारयते पितृन्’—अगले उपदेश में विधि के निर्णायक तर्क और अपवादों की अपेक्षा जगती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २८६ श्लोक मिलाकर कुल ६७३ श्लोक हैं) # जी श्यु 8 पजञ्चविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका
যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! মানবজন্মরূপ এই অতি দুর্লভ কর্মক্ষেত্র লাভ করে যে দরিদ্র ব্যক্তি পরম কল্যাণ কামনা করে, তার কী কর্তব্য?
Verse 2
दानानामुत्तमं यच्च देयं यच्च यथा यथा । मान्यान् पूज्यांश्व गाड़ेय रहस्यं वक्तुमहसि
যুধিষ্ঠির বললেন— হে গাঙ্গেয়! সকল দানের মধ্যে কোনটি শ্রেষ্ঠ, কী বস্তু কীভাবে দান করা উচিত, আর কারা সত্যই মান্য ও পূজ্য— এই গূঢ় উপদেশ আমাকে বলুন।
Verse 3
वैशम्पायन उवाच एवं पृष्टो नरेन्द्रेण पाण्डवेन यशस्विना । धर्माणां परम॑ गुह्ां भीष्म: प्रोवाच पार्थिवम्
বৈশম্পায়ন বললেন— জনমেজয়! যশস্বী পাণ্ডব নরেন্দ্র যুধিষ্ঠির এভাবে প্রশ্ন করলে ভীষ্ম রাজাকে ধর্মের পরম গূঢ় তত্ত্ব বলতে আরম্ভ করলেন।
Verse 4
भीष्म उवाच शृणुष्वावहितो राजन् धर्मगुह्दानि भारत । यथा हि भगवान् व्यास: पुरा कथितवान् मयि
ভীষ্ম বললেন— রাজন্, ভারতকুলনন্দন! মনোযোগ দিয়ে শোনো। আমি ধর্মের গূঢ় রহস্য বলছি, যেমন পূর্বকালে ভগবান ব্যাস আমাকে বলেছিলেন।
Verse 5
देवगुह्ामिदं राजन् यमेनाक्लिष्टकर्मणा । नियमस्थेन युक्तेन तपसो महतः फलम्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, এটি দেবগুহ্য ও গোপন উপদেশ। অক্লিষ্ট ও শুদ্ধকর্মা যম নিয়মে প্রতিষ্ঠিত ও যোগে সংযত হয়ে মহাতপস্যার মহৎ ফলস্বরূপ একে লাভ করেছিলেন।
Verse 6
येन यः प्रीयते देव: प्रीयन्ते पितरस्तथा । ऋषय: प्रमथा: श्रीक्ष चित्रगुप्तो दिशां गजा:,जिससे देवता, पितर, ऋषि, प्रमथगण, लक्ष्मी, चित्रगुप्त और दिग्गज प्रसन्न होते हैं
ভীষ্ম বললেন—যে কর্মে যে দেবতা প্রসন্ন হন, সেই একই কর্মে পিতৃগণও প্রসন্ন হন; তদ্রূপ ঋষিগণ, প্রমথগণ, শ্রী (লক্ষ্মী), চিত্রগুপ্ত এবং দিক্গজরাও তুষ্ট হন।
Verse 7
ऋषिधर्म: स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफल: । महादानफल चैव सर्वयज्ञफलं तथा,जिसमें महान् फल देनेवाले ऋषिधर्मका रहस्यसहित समावेश हुआ है तथा जिसके अनुष्ठानसे बड़े-बड़े दानों और सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है
ভীষ্ম বললেন—এটি ‘ঋষিধর্ম’ নামে স্মৃত; রহস্যসহিত এবং মহাফলদায়ক। এর অনুশীলনে মহাদানের পুণ্য এবং সকল যজ্ঞের ফল লাভ হয়।
Verse 8
यश्चैतदेवं जानीयाज्ज्ञात्वा वा कुरुतेडनघ । सदोषो<दोषवांश्रेह तैर्गुणै: सह युज्यते
ভীষ্ম বললেন—হে নিষ্পাপ, যে এই উপদেশকে এইরূপে জানে এবং জেনে তদনুসারে আচরণ করে, সে দোষযুক্ত হলেও সেই দোষ থেকে মুক্ত হয় এবং সেই সদ্গুণসমূহের সঙ্গে যুক্ত হয়ে উৎকর্ষে প্রতিষ্ঠিত হয়।
Verse 9
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वज: । दशध्वजसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृप:,दस कसाइयोंके समान एक तेली, दस तेलियोंके समान एक कलवार, दस कलवारोंके समान एक वेश्या और दस वेश्याओंके समान एक राजा है
ভীষ্ম বললেন—একজন তেলি দশজন কসাইয়ের সমান; একজন মদ-বিক্রেতা/কলবার দশজন তেলির সমান; একজন বারাঙ্গনা দশজন কলবারের সমান; আর একজন রাজা দশজন বারাঙ্গনার সমান বলে গণ্য।
Verse 10
अर्धेनैतानि सर्वाणि नृपति: कथ्यतेडधिक: । त्रिवर्गसहितं शास्त्र पवित्र पुण्यलक्षणम्
ভীষ্ম বললেন— রাজাকে অধিক দোষভাগী বলা হয়; অতএব এই পাপসমূহ রাজদোষের অর্ধেকেরও সমান নয়। তাই রাজার দান গ্রহণ নিষিদ্ধ। ধর্ম, অর্থ ও কাম—এই ত্রিবর্গের প্রতিপাদক যে শাস্ত্র, তা পবিত্র এবং পুণ্যের লক্ষণ প্রকাশ করে।
Verse 11
धर्मव्याकरणं पुण्यं रहस्यश्रवर्ण महत् । श्रोतव्यं धर्मसंयुक्त विहितं त्रिदशै: स्वयम्
ধর্মের ব্যাখ্যা প্রদানকারী এই পুণ্যময় উপদেশ মহৎ রহস্যতত্ত্বের শ্রবণ করায়। এটি ধর্মসমন্বিত এবং স্বয়ং দেবতাদের দ্বারা বিধিত; অতএব এর শ্রবণ করা উচিত।
Verse 12
पितृणां यत्र गुह्यानि प्रोच्यन्ते श्राद्धकर्मणि । देवतानां च सर्वेषां रहस्यं कथ्यतेडखिलम्
যেখানে পিতৃদের শ্রাদ্ধকর্ম সম্বন্ধে গূঢ় বিষয়গুলি বলা হয়েছে এবং যেখানে সকল দেবতার রহস্য সম্পূর্ণরূপে ব্যাখ্যা করা হয়েছে।
Verse 13
ऋषिधर्म: स्मृतो यत्र सरहस्यो महाफल: । महायज्ञफलं चैव सर्वदानफलं तथा
যেখানে রহস্যসহ মহাফলদায়ী ঋষিধর্ম স্মরণ করা হয়েছে এবং যেখানে মহাযজ্ঞের ফল ও সর্বপ্রকার দানের ফলও প্রতিপাদিত হয়েছে।
Verse 14
ये पठन्ति सदा मर्त्या येषां चैवोपतिष्ठति । श्रुत्वा च फलमाचचष्टे स्वयं नारायण: प्रभु:
যে মর্ত্যরা সেই শাস্ত্র সর্বদা পাঠ করে, যাদের হৃদয়ে তার তত্ত্ব প্রতিষ্ঠিত হয়, এবং যারা তার ফল শুনে অন্যদের সামনে তা ব্যাখ্যা করে—তারা স্বয়ং প্রভু নারায়ণস্বরূপ হয়ে ওঠে।
Verse 15
गवां फलं तीर्थफलं यज्ञानां चैव यत् फलम् | एतत् फलमवाप्रोति यो नरोडतिथिपूजक:,जो मानव अतिथियोंकी पूजा करता है, वह गोदान, तीर्थस्थान और यज्ञानुष्ठानका फल पा लेता है
গোদান থেকে যে পুণ্য, তীর্থসেবন থেকে যে পুণ্য, আর যজ্ঞকর্ম থেকে যে ফল—অতিথিকে সম্মান ও পূজা করে যে ব্যক্তি, সে সেই একই ফল লাভ করে।
Verse 16
श्रोतार: श्रद्धधानाश्न येषां शुद्धं च मानसम् । तेषां व्यक्त जिता लोका: श्रद्धधानेन साधुना
যারা শ্রদ্ধাসহ ধর্মশাস্ত্র শ্রবণ করে এবং যাদের মন শুদ্ধ—সেই সাধু-শ্রদ্ধাবানদের জন্য পুণ্যলোকসমূহ নিশ্চিতরূপে জয়লাভ্য হয়।
Verse 17
मुच्यते किल्बिषाच्चैव न स पापेन लिप्यते । धर्म च लभते नित्यं प्रेत्य लोकगतो नर:
সে পাপ থেকে মুক্ত হয় এবং এরপর আর পাপে লিপ্ত হয় না। সে নিত্য ধর্ম লাভ করে ও পালন করে, আর মৃত্যুর পরে উত্তম লোক প্রাপ্ত হয়।
Verse 18
कस्यचित् त्वथ कालस्य देवदूतो यदृच्छया । स्थितो हाुन्त्हितो भूत्वा पर्यईभाषत वासवम्,एक समयकी बात है, एक देवदूतने अकस्मात् पहुँचकर आकाशमें स्थित हो इन्द्रसे कहा--
এক সময়ে, আকস্মিকভাবে এক দেবদূত এসে উপস্থিত হল। সে আকাশে স্থিত থেকে বাসব (ইন্দ্র)-কে এভাবে সম্বোধন করল—
Verse 19
यौ तौ कामगुणोपेतावद्चिनौ भिषजां वरौ । आज्ञयाहं तयो: प्राप्त: सनरान् पितृदैवतान्
যে দুই অশ্বিনী-কুমার মনোহর গুণে ভূষিত এবং চিকিৎসকদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—তাঁদেরই আদেশে আমি এখানে দেবতা, পিতৃগণ ও মানুষের নিকট উপস্থিত হয়েছি।
Verse 20
कस्माद्धि मैथुन श्राद्धे दातुर्भोक्तुश्च वर्जितम् । किमर्थ च त्रय: पिण्डा: प्रविभक्ता: पृथक् पृथक्
ভীষ্ম বললেন—শ্রাদ্ধের দিনে দাতা ও শ্রাদ্ধভোজী ব্রাহ্মণ—উভয়ের জন্যই কেন মৈথুন নিষিদ্ধ? আর শ্রাদ্ধে তিনটি পিণ্ড পৃথক পৃথকভাবে ভাগ করে একে একে কেন অর্পণ করা হয়?
Verse 21
प्रथम: कस्य दातव्यो मध्यम: क्व च गच्छति । उत्तरश्न स्मृत: कस्य एतदिच्छामि वेदितुम्
প্রথম পিণ্ড কাকে দেওয়া উচিত? মধ্য পিণ্ড কোথায় যায়? আর ‘শেষে ভোজনকারী’ বলে কাকে গণ্য করা হয়? এ কথা আমি জানতে চাই।
Verse 22
"प्रथम पिण्ड किसे देना चाहिये? दूसरा पिण्ड किसे प्राप्त होता तथा तीसरे पिण्डपर किसका अधिकार माना गया है? यह सब कुछ मैं जानना चाहता हूँ” ।।
“প্রথম পিণ্ড কাকে দেওয়া উচিত? দ্বিতীয় পিণ্ড কে পায়, আর তৃতীয় পিণ্ডের অধিকার কার বলে মানা হয়? এ সবই আমি জানতে চাই।” সেই শ্রদ্ধাবান দূত ধর্মসম্মত কথা বললে, পূর্বদিকে অবস্থানকারী সকল দেবগণ ও পূজ্য পিতৃগণ আকাশচারী সেই পুরুষকে প্রশংসা করে উত্তর দিতে লাগলেন।
Verse 23
पितर ऊचुः स्वागत ते<स्तु भद्रे ते श्रूयतां खेचरोत्तम । गूढार्थ: परम: प्रश्नो भवता समुदीरित:
পিতৃগণ বললেন—হে আকাশচারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! তোমার স্বাগতম; তোমার মঙ্গল হোক। তুমি গূঢ় অর্থবহ অতি উত্তম প্রশ্ন উত্থাপন করেছ; তার উত্তর শোনো।
Verse 24
भ्राद्धं दत्त्वा च भुक्त्वा च पुरुषो यः स्त्रियं ब्रजेत् । पितरस्तस्य तं॑ मासं तस्मिन् रेतसि शेरते
যে পুরুষ শ্রাদ্ধ দান করে এবং (শ্রাদ্ধভোজ) গ্রহণ করে তারপর স্ত্রীর কাছে (সমাগমে) যায়, তার পিতৃগণ সেই সমগ্র মাস সেই বীর্যেই শয়ন করেন—এমনই বলা হয়।
Verse 25
प्रविभागं तु पिण्डानां प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वश: । पिण्डो हाथस्ताद् गच्छंस्तु अप आविश्य भावयेत्
ভীষ্ম বললেন— “এখন আমি ক্রমানুসারে পিণ্ডগুলির যথাযথ বিভাগ বলছি। শ্রাদ্ধে যেখানে তিনটি পিণ্ড নির্দিষ্ট, সেখানে প্রথম পিণ্ড জলেতে অর্পণ করতে হবে; মধ্য পিণ্ড কেবল শ্রাদ্ধকারীর পত্নীই গ্রহণ করবে; আর তৃতীয় পিণ্ড অগ্নিতে আহুতি দিতে হবে।”
Verse 26
पिण्डं तु मध्यमं तत्र पत्नी त्वेका समश्षुते । पिण्डस्तृतीयो यस्तेषां तै दद्याज्जातवेदसि
ভীষ্ম বললেন— “সেখানে মধ্য পিণ্ড কেবল পত্নীই ভক্ষণ করবে; আর তাদের মধ্যে তৃতীয় পিণ্ড জাতবেদস্—অগ্নিতে—অর্পণ করতে হবে।”
Verse 27
एष श्राद्धविधि: प्रोक्तो यथा धर्मो न लुप्यते । पितरस्तस्य तुष्यन्ति प्रहष्टटनस: सदा
ভীষ্ম বললেন— “এই শ্রাদ্ধবিধি এমনভাবে বলা হলো যাতে ধর্ম লুপ্ত না হয়। যে এভাবে পালন করে, তার প্রতি পিতৃগণ সর্বদা প্রসন্ন থাকেন, আনন্দিতচিত্তে।”
Verse 28
देवदूत उवाच आनुपूर्व्येण पिण्डानां प्रविभाग: पृथक् पृथक्
দেবদূত বললেন— “পিণ্ডগুলির ভাগ পৃথক পৃথকভাবে, এবং যথাক্রমে বণ্টিত হয়।”
Verse 29
एक: समुद्धृतः पिण्डो हाधस्तात् कस्य गच्छति
দেবদূত বললেন— “একটি পিণ্ড তোলা হয়েছে—হায়, তা নীচে কার ভাগে পড়ে?”
Verse 30
मध्यमं तु तदा पत्नी भुद्धक्तेडनुज्ञातमेव हि
তখন মধ্যম অবস্থার পত্নীকেও বিধিপূর্বক সম্মতি দিয়ে অনুমোদন করা হল—যাতে প্রতিষ্ঠিত ক্রম ও সম্মতির অনুসারে যথোচিত কর্ম অগ্রসর হয়।
Verse 31
अत्र यस्त्वन्तिम: पिण्डो गच्छते जातवेदसम्
এখানে যে অন্তিম পিণ্ড, তা জাতবেদস্—অগ্নির নিকট গমন করে; তাতেই অন্ত্যকর্ম সম্পূর্ণ হয় এবং প্রেতকে ধর্ম-ব্যবস্থার অধীনে সমর্পণ করা হয়।
Verse 32
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पिण्डेषु त्रिषु या गति:
আমি শুনতে চাই—তিন প্রকার পিণ্ডে গতি কী রূপ হয়।
Verse 33
पितर ऊचु. सुमहानेष प्रश्नो वै यस्त्वया समुदीरित:
পিতৃগণ বললেন—হে আকাশচারী দেবদূত! তুমি যে প্রশ্ন উত্থাপন করেছ, তা অতিশয় মহান। তুমি আমাদের কাছে এক আশ্চর্য ও সূক্ষ্ম রহস্য জিজ্ঞাসা করেছ। এই পিতৃকর্মকে দেবতা ও মুনিরাও প্রশংসা করেন।
Verse 34
रहस्यमद्भुतं चापि पृष्टा: सम गगनेचर । एतदेव प्रशंसन्ति देवाश्न मुन॒यस्तथा
হে গগনচারী! আমাদের কাছে এক আশ্চর্য ও গূঢ় বিষয় জিজ্ঞাসা করা হয়েছে। এই শিক্ষাই দেবতা ও মুনিরাও প্রশংসা করেন।
Verse 35
तेडप्येवं नाभिजानन्ति पितृकार्यविनिश्चयम् । वर्जयित्वा महात्मानं चिरजीविनमुत्तमम्
তারাও এইরূপে পিতৃকার্যের যথার্থ সিদ্ধান্ত জানে না—শুধু সেই পরম মহাত্মা, উত্তম চিরঞ্জীবীকে বাদ দিলে; একমাত্র তিনিই এই জ্ঞান থেকে বর্জনীয় নন।
Verse 36
त्रयाणामपि पिण्डानां श्रुत्वा भगवतो गतिम्
ভগবান বিষ্ণুর নিকট থেকে তিন পিণ্ডের গতি শুনে সে শ্রাদ্ধের রহস্য উপলব্ধি করল। হে দেবদূত! তুমি যে শ্রাদ্ধবিধির নির্ণয় জানতে চেয়েছ, সেই অনুসারে এখন তিন পিণ্ডের পরিণতি বলা হচ্ছে। মনোযোগ দিয়ে আমার কথা শোনো।
Verse 37
देवदूतेन यः पृष्ट: श्राद्धस्य विधिनिश्चय: । गतिं त्रयाणां पिण्डानां शृणुष्वावहितो मम
দেবদূত বলল: “তুমি শ্রাদ্ধবিধির যথার্থ সিদ্ধান্ত জানতে চেয়েছ। এখন তিন পিণ্ডের গতি শোনো—মনোযোগ দিয়ে আমার কথা শোনো।”
Verse 38
अपो गच्छति यो ह्वात्र शशिनं होष प्रीणयेत् । शशी प्रीणयते देवान् पितृश्चैव महामते
দেবদূত বলল: “হে মহামতি! এখানে যে জল অর্পণ করে চন্দ্রকে তৃপ্ত করে—এ কথা জেনে রেখো—সে দেবতাদেরও এবং পিতৃগণকেও তৃপ্ত করে।”
Verse 39
महामते! इस श्राद्धमें जो पहला पिण्ड पानीके भीतर चला जाता है, वह चन्द्रमाको तृप्त करता है और चन्द्रमा स्वयं देवता तथा पितरोंको तृप्त करते हैं ।।
দেবদূত বলল: “হে মহামতি! এই শ্রাদ্ধে যে প্রথম পিণ্ড জলমধ্যে গমন করে, তা চন্দ্রকে তৃপ্ত করে; আর চন্দ্র দেবতাদের ও পিতৃগণকে তৃপ্ত করেন। তদ্রূপ, শ্রাদ্ধকারীর স্ত্রী গুরুজনদের অনুমতিতে যে মধ্য পিণ্ড ভক্ষণ করে, তাতে প্রসন্ন পিতামহগণ সন্তানকামী পুরুষকে পুত্র দান করেন।”
Verse 40
हव्यवाहे तु यः पिण्डो दीयते तन्निबोध मे । पितरस्तेन तृप्यन्ति प्रीता:ः कामान् दिशन्ति च
হব্যবাহ অগ্নিতে যে পিণ্ড অর্পণ করা হয়, সে বিষয়ে আমার কাছ থেকে জেনে নাও। সেই অর্পণে পিতৃগণ তৃপ্ত হন, এবং প্রসন্ন হয়ে মানুষের অভীষ্ট কামনা পূর্ণ করেন।
Verse 41
एतत् ते कथित सर्व त्रिषु पिण्डेषु या गति: । ऋत्विग्यो यजमानस्य पितृत्वमनुगच्छति
এ সবই তোমাকে বলা হল—তিন পিণ্ডের যে গতি ও ফল, তাও। শ্রাদ্ধভোজে আহূত ঋত্বিজ সেই দিনে যজমানের পিতৃভাব গ্রহণ করে।
Verse 42
तस्मिन्नहनि मन्यन्ते परिहार्य हि मैथुनम् । शुचिना तु सदा श्राद्धं भोक्तव्यं खेचरोत्तम
অতএব সেই দিনে মৈথুন পরিহার্য বলে মানা হয়। হে খেচরশ্রেষ্ঠ! স্নানাদি দ্বারা শুচি হয়ে তবেই সর্বদা শ্রাদ্ধভোজ গ্রহণ করা উচিত।
Verse 43
ये मया कथिता दोषास्ते तथा स्युर्न चान्यथा । तस्मात् स्नात:ः शुचि: क्षान्तः श्राद्ध भुञज्जीत वै द्विज:
আমি যে দোষগুলির কথা বলেছি, সেগুলি ঠিক তেমনই ঘটে—অন্যথা নয়। অতএব স্নান করে, শুচি ও সংযত হয়ে দ্বিজের শ্রাদ্ধভোজ গ্রহণ করা উচিত।
Verse 44
मैंने जो दोष बताये हैं, वे वैसे ही प्राप्त होते हैं। इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता; अतः ब्राह्मण स्नान करके पवित्र एवं क्षमाशील हो श्राद्धमें भोजन करे ।।
যে এভাবে শ্রাদ্ধ-দান করে, তার সন্তান-সন্ততি বৃদ্ধি পায় এবং যশও লাভ হয়। পিতৃগণ এ কথা বলার পর মহাতপস্বী ঋষি বিদ্যুৎপ্রভ তখন তাঁর প্রশ্ন উত্থাপন করলেন।
Verse 45
आदित्यतेजसा तस्य तुल्यं रूप॑ प्रकाशते | स च धर्मरहस्यानि श्रुत्वा शक्रमथाब्रवीत्
আদিত্যের তেজে তার রূপ সমান দীপ্তিতে প্রকাশিত হল। আর ধর্মের গূঢ় রহস্য শুনে সে তখন শক্র (ইন্দ্র)-কে সম্বোধন করল।
Verse 46
उनका रूप सूर्यके समान तेजसे प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने धर्मके रहस्योंको सुनकर इन्द्रसे पूछा-- ।।
মোহগ্রস্ত মর্ত্যরা তির্যক্যোনিতে জন্মানো প্রাণীদের হিংসা করে—পোকা, পিঁপড়ে, সাপ, ভেড়া, এবং মৃগ ও পক্ষীকেও হত্যা করে। ধর্মের সূক্ষ্ম রহস্য শুনে আমি ইন্দ্রকে জিজ্ঞাসা করি—অজ্ঞানে আচ্ছন্ন মানুষ কেন এদের মতো দুর্বল প্রাণীদের আঘাত করে?
Verse 47
ततो देवगणा: सर्वे ऋषयश्न॒ तपोधना:
তখন সকল দেবগণ এবং তপোধন ঋষিগণ (সেখানে) সমবেত হলেন।
Verse 48
पितरश्न महाभागा: पूजयन्ति सम तं मुनिम् । उनका यह प्रश्न सुनकर सम्पूर्ण देवता, तपोधन ऋषि तथा महाभाग पितर विद्युत्प्रभ मुनिकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे ।।
মহাভাগ পিতৃগণ সেই মুনিকে পূজা করতে লাগলেন। তখন শক্র বললেন—কুরুক্ষেত্র, গয়া, গঙ্গা, প্রভাস এবং পুষ্কর।
Verse 49
एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत् ततो जलम् । तथा मुच्यति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा
এগুলিকে মনে ধ্যান করে তারপর জলে অবগাহন করবে; তেমনি সে পাপ থেকে মুক্ত হয়—যেমন রাহুর গ্রাস থেকে চন্দ্র মুক্ত হয়।
Verse 50
इन्द्र बोले--मुने! मनुष्यको चाहिये कि कुरुक्षेत्र, गया, गंगा, प्रभास और पुष्करक्षेत्रका मन-ही-मन चिन्तन करके जलमें स्नान करे। ऐसा करनेसे वह पापसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे चन्द्रमा राहुके ग्रहणसे ।।
ইন্দ্র বললেন—মুনে! মানুষ কুরুক্ষেত্র, গয়া, গঙ্গা, প্রভাস ও পুষ্করক্ষেত্র—এ সকল তীর্থকে মনে মনে স্মরণ করে জলে স্নান করবে। তাতে সে পাপমুক্ত হয়, যেমন রাহুর গ্রাস থেকে চন্দ্র মুক্ত হয়। সে যেন তিন দিন স্নান করেছে এমন ফল পায়, নিরাহার থাকে; আর যে গাভীদের পিঠ স্পর্শ করে ও তাদের লেজকে প্রণাম করে, সে উক্ত পুণ্য লাভ করে।
Verse 51
जो मनुष्य गायकी पीठ छूता और उसकी पूँछको नमस्कार करता है, वह मानो उपर्युक्त तीर्थोमें तीन दिनतक उपवासपूर्वक रहकर स्नान कर लेता है ।।
ইন্দ্র বললেন—যে মানুষ গাভীর শয়নস্থান/আসন স্পর্শ করে এবং তার লেজকে প্রণাম করে, সে যেন পূর্বোক্ত তীর্থসমূহে তিন দিন উপবাসসহ স্নান করেছে—এমন পুণ্য লাভ করে। তখন বিদ্যুৎপ্রভ বাসব (ইন্দ্র)-কে বললেন—হে শতক্রতু! এ ধর্ম আরও সূক্ষ্ম; একে ভালো করে বুঝে নাও।
Verse 52
तदनन्तर विद्युत्प्रभने इन्द्रसे कहा--“शतक्रतो! यह सूक्ष्मतर धर्म मैं बता रहा हूँ। इसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।। घृष्टो वटकषायेण अनुलिप्त: प्रियंगुणा । क्षीरेण षष्टिकान् भुक््त्वा सर्वपापै: प्रमुच्यते
এরপর বিদ্যুৎপ্রভ ইন্দ্রকে বললেন—হে শতক্রতু! আমি আরও সূক্ষ্ম ধর্ম বলছি; মনোযোগ দিয়ে শোনো। যে বটগাছের ছালের ক্বাথ দিয়ে শরীর ঘষে, প্রিয়ঙ্গু লেপন করে, তারপর দুধের সঙ্গে ষষ্টিক ধান/চাল ভোজন করে—সে সর্বপাপ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 53
“बरगदकी जटासे अपने शरीरको रगड़े, राईका उबटन लगाये और दूधके साथ साठीके चावलोंकी खीर बनाकर भोजन करे तो मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।।
যে বটগাছের জটা দিয়ে নিজের শরীর ঘষে, সর্ষের উবটান মাখে এবং দুধে ষষ্টিক চালের ক্ষীর রান্না করে ভোজন করে—সে মানুষ সর্বপাপ থেকে মুক্ত হয়। এখন আর-এক গূঢ় রহস্য শোনো, যা ঋষিরা চিন্তা করেছেন। স্থাণু (শিব)-এর স্থানে বृहস্পতির মুখে বলতে শুনেছিলাম।
Verse 54
रुद्रेण सह देवेश तन्निबोध शचीपते । “एक दूसरा गूढ़ रहस्य, जिसका ऋषियोंने चिन्तन किया है, सुनिये। इसे मैंने भगवान् शंकरके स्थानमें भाषण करते हुए बृहस्पतिजीके मुखसे भगवान् रुद्रके साथ ही सुना था। देवेश! शचीपते! उसे ध्यानपूर्वक सुनिये ।।
ইন্দ্র বললেন—হে দেবেশ, হে শচীপতি! রুদ্রের সঙ্গে এ কথা বুঝে নাও। ঋষিদের চিন্তিত আর-এক গভীর রহস্য শোনো। শঙ্করের স্থানে, রুদ্রের উপস্থিতিতে, বृहস্পতির মুখে বলতে আমি এটি শুনেছিলাম। হে দেবেশ, হে শচীপতি! মনোযোগ দিয়ে শোনো। যে ব্যক্তি পর্বতে আরোহণ করে, আহারের পূর্বে এক পায়ে দাঁড়ায়, উভয় বাহু ঊর্ধ্বে তোলে, করজোড়ে প্রণাম করে এবং অগ্নি ও দিব্য আকাশের দিকে দৃষ্টি রাখে—সে মহাতপস্যায় যুক্ত হয়ে উপবাসের ফল লাভ করে।
Verse 55
निरीक्षेत निराहार ऊर्ध्वबाहुः कृताज्जलि: । तपसा महता युक्त उपवासफलं लभेत्
যে ব্যক্তি আহার ত্যাগ করে, বাহু উর্ধ্বে তুলে, করজোড়ে একাগ্র দৃষ্টিতে স্থির থাকে—সে মহাতপস্যায় যুক্ত হয়ে উপবাসের ফল লাভ করে।
Verse 56
रश्मिभिस्तापितो<र्कस्य सर्वपापमपोहति । ग्रीष्मकाले5थ वा शीते एवं पापमपोहति
যে সূর্যের রশ্মিতে তপ্ত হয়, সে সমস্ত পাপ দূর করে। গ্রীষ্মে হোক বা শীতে—এইভাবেই পাপ অপসৃত হয়।
Verse 57
ततः पापात् प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती । तेजसा सूर्यवद् दीप्तो भ्राजते सोमवत् पुन:
তখন পাপমুক্ত ব্যক্তির মধ্যে শাশ্বত দীপ্তি উদ্ভূত হয়। সে নিজের তেজে সূর্যের মতো দ্যুতিমান এবং পুনরায় চন্দ্রের মতো উজ্জ্বল হয়ে শোভা পায়।
Verse 58
मध्ये त्रिदशवर्गस्य देवराज: शतक्रतुः । उवाच मधुरं वाक्यं बृहस्पतिमनुत्तमम्
ত্রিদশদের সভার মধ্যভাগে দেবরাজ শতক্রতু ইন্দ্র অনুত্তম বৃহস্পতিকে মধুর বাক্যে সম্বোধন করলেন।
Verse 59
तत्पश्चात् देवराज शतक्रतु इन्द्रने देवमण्डलीके बीचमें अपने सर्वश्रेष्ठ गुरु बृहस्पतिजीसे मधुर वाणीमें कहा-- ।।
ভগবন্! মানুষের সুখবাহী ধর্মের গূঢ় গুহা এবং রহস্যসহ যে দোষসমূহ আছে—সেগুলিও যথাযথভাবে বর্ণনা করুন।
Verse 60
ब॒हस्पतिर्वाच प्रतिमेहन्ति ये सूर्यमनिलं द्विषते च ये । हव्यवाहे प्रदीप्ते च समिधं ये न जुह्नति
বৃহস্পতি বললেন—যারা প্রতিমায় আঘাত করে, যারা সূর্য ও বায়ুকে বিদ্বেষ করে, এবং প্রজ্বলিত হব্যবাহ অগ্নিতে সমিধা অর্পণ করে না—তারা পবিত্র ধর্ম-ব্যবস্থার প্রতি বৈরভাব পোষণ করে।
Verse 61
बालवसत्सां च ये धेनुं दुहन्ति क्षीरकारणात् । तेषां दोषान् प्रवक्ष्यामि तान् निबोध शचीपते
শক্র বললেন—যারা কেবল দুধ পাওয়ার লোভে অল্পবয়সী বাছুর-সহ গাভীকেও দোহন করে, তাদের দোষ আমি বলব। হে শচীপতে, মনোযোগ দিয়ে শোনো।
Verse 62
बृहस्पतिजीने कहा--शचीपते! जो सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्र त्याग करते हैं, वायुदेवसे द्वेष रखते हैं अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्र त्याग करते हैं, जो प्रज्वलित अम्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते तथा जो दूधके लोभसे बहुत छोटे बछड़ेवाली धेनुको भी दुह लेते हैं, उन सबके दोषोंका वर्णन करता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो ।।
শক্র বললেন—হে শচীপতে! যারা সূর্যের দিকে মুখ করে মূত্র ত্যাগ করে, যারা বায়ুদেবকে বিদ্বেষ করে অর্থাৎ বায়ুর সম্মুখে মূত্র ত্যাগ করে, যারা প্রজ্বলিত হব্যবাহ অগ্নিতে সমিধা অর্পণ করে না, এবং যারা দুধের লোভে অতি ছোট বাছুর-সহ গাভীকেও দোহন করে—তাদের সকলের দোষ আমি বলব; মনোযোগ দিয়ে শোনো। হে বাসব! সূর্য, বায়ু, হব্যবাহ অগ্নি এবং লোকমাতা গাভীগণ—এদের সৃষ্টি স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা করেছেন।
Verse 63
लोकांस्तारयितुं शक्ता मर्त्येंष्वेतेषु देवता: । सर्वे भवन्त: शृण्वन्तु एकैकं धर्मनिश्चयम्
এই দেবতাগণ মর্ত্যলোকে অবস্থান করেও সমগ্র জগতকে উদ্ধার করতে সক্ষম। আপনারা সকলেই শুনুন; আমি একে একে ধর্মের সিদ্ধান্ত বলছি।
Verse 64
वर्षाणि षडशीतिं तु दुर्वत्ता: कुलपांसना: । स्त्रिय: सर्वा्न दुर्वत्ता: प्रतिमेहन्ति या रविम्
শক্র বললেন—ছিয়াশি বছর ধরে সেই নারীরা দুষ্কর্মে লিপ্ত, বংশের কলঙ্ক; তারা সকলেই দুরাচারিণী—যারা সূর্যের দিকে মূত্রত্যাগ করারও দুঃসাহস করে।
Verse 65
हव्यवाहस्य दीप्तस्य समिध॑ ये न जुह्नति
শক্র বললেন—যারা প্রজ্বলিত হব্যবাহ (অগ্নি)-তে সমিধা অর্পণ করে না—
Verse 66
क्षीर॑ तु बालवत्सानां ये पिबन्तीह मानवा:
শক্র বললেন—যে মানুষরা এ জগতে অতি কচি বাছুর-সহ গাভীর দুধ দোহন করে পান করে—
Verse 67
न तेषां क्षीरपा: केचिज्जायन्ते कुलवर्धना: । प्रजाक्षयेण युज्यन्ते कुलवंशक्षयेण च
তাদের বংশে দুধপায়ী, কুলবর্ধক কোনো সন্তান জন্মায় না; তারা প্রজাক্ষয়ে পতিত হয়, এবং কুল ও বংশেরও ক্ষয় ঘটে।
Verse 68
एवमेतत् पुरा दृष्टं कुलवृद्धैर्द्धिजातिभि: । तस्माद् वर्ज्यानि वर्ज्यानि कार्य कार्य च नित्यश:
এভাবেই প্রাচীন কালে কুলের বৃদ্ধ দ্বিজগণ তা প্রত্যক্ষ করেছিলেন। অতএব যা বর্জনীয় তা বর্জন করো, আর যা কর্তব্য তা নিত্য পালন করো।
Verse 69
ततः सर्वा महाभाग देवता: समरुद्गणा:
তদনন্তর মরুদ্গণসহ সকল মহাভাগ দেবতা সমবেত হলেন।
Verse 70
पितर: केन तुष्यन्ति मर्त्यानामल्पचेतसाम्
শক্র জিজ্ঞাসা করলেন— “অল্পবুদ্ধি মর্ত্যদের ক্ষেত্রে পিতৃগণ কোন উপায়ে তুষ্ট হন?”
Verse 71
अक्षयं च कथं दानं भवेच्चैवोर्ध्वदेहिकम् । आनृण्यं वा कथं मर्त्या गच्छेयु: केन कर्मणा
শক্র বললেন— “দান কীভাবে অক্ষয় হয় এবং মৃত্যুর পরেও কীভাবে ফল দেয়? আর কোন কর্মে মর্ত্যরা পিতৃঋণ থেকে মুক্তি পায়?”
Verse 72
एतदिच्छामहे श्रोतुं परं कौतूहलं हि न: । “मनुष्योंकी बुद्धि थोड़ी होती है; अतः वे कौन-सा कर्म करें
শক্র বললেন— “আমরা এ কথা শুনতে চাই; আমাদের কৌতূহল অত্যন্ত। মানুষের বুদ্ধি অল্প—তারা কোন কর্ম করলে সকল পিতৃগণ তুষ্ট হন? শ্রাদ্ধে প্রদত্ত দান কীভাবে অক্ষয় হয়? আর কোন কর্মে, কীভাবে, পিতৃঋণ থেকে মুক্তি মেলে?” পিতৃগণ বললেন— “হে মহাভাগ্যবানগণ! তোমাদের সংশয় ন্যায়সঙ্গতভাবেই উত্থাপিত হয়েছে।”
Verse 73
' नीलषण्डप्रमोक्षेण अमावास्यां तिलोदकै:ः
“নীলবর্ণ ষাঁড় মুক্ত করে এবং অমাবস্যায় তিলমিশ্রিত জল দিয়ে তর্পণ করলে…”
Verse 74
वर्षासु दीपकैश्वैव 3438 36 णामनृणो भवेत् | नीले रंगके साँड़ छोड़नेसे, अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्दारा तर्पण करनेसे और वर्षा-ऋतुमें पितरोंके लिये दीप देनेसे मनुष्य उनके ऋणसे मुक्त हो सकता है ।।
“বর্ষাকালে পিতৃদের উদ্দেশ্যে প্রদীপ দান করলে মানুষ পিতৃঋণ থেকে মুক্ত হয়। এই দান অক্ষয়, নিষ্কপট এবং মহাফলদায়ক।”
Verse 75
अस्माकं परितोषश्न अक्षय: परिकीरत्त्यते | इस तरह निष्कपट भावसे किया हुआ दान अक्षय एवं महान् फलदायक होता है और उससे हमें भी अक्षय संतोष प्राप्त होता है--ऐसा शास्त्रका कथन है ।।
শক্র বললেন—আমাদের তৃপ্তিও অক্ষয় বলে ঘোষিত। অতএব নিষ্কপট ও নির্মল হৃদয়ে প্রদত্ত দান অক্ষয় হয় এবং মহাফল দান করে; তার দ্বারা আমরাও অনন্ত সন্তোষ লাভ করি—এটাই শাস্ত্রের বাণী। আর যে মর্ত্যরা শ্রদ্ধায় দান করে, তারা স্থায়ী বংশধারা লাভ করে।
Verse 76
दुर्गात् ते तारयिष्यन्ति नरकात् प्रपितामहान् । जो मनुष्य पितरोंमें श्रद्धा रखकर संतान उत्पन्न करेंगे, वे अपने प्रपितामहोंका दुर्गम नरकसे उद्धार कर देंगे ।। पितृणां भाषितं श्रुत्वा हृष्टरोेमा तपोधन:
শক্র বললেন—তারা তোমার প্রপিতামহদের বিপদ থেকে ও নরক থেকে উদ্ধার করবে। যে পুরুষেরা পিতৃদের প্রতি শ্রদ্ধা রেখে সন্তান উৎপন্ন করে, তারা তাদের প্রপিতামহদের দুরতিক্রম্য নরক থেকে তুলে আনে। পিতৃদের বিষয়ে এই বাক্য শুনে তপোধন ঋষির রোমাঞ্চ হল।
Verse 77
के गुणा नीलषण्डस्य प्रमुक्तस्य तपोधना:
শক্র বললেন—হে তপোধন! মুক্তিপ্রাপ্ত নীলষণ্ডের কী কী গুণ আছে?
Verse 78
पितर ऊचु. नीलषण्डस्य लाडूगूलं तोयमभ्युद्धरेद् यदि
পিতৃগণ বললেন—যদি কেউ নীলষণ্ডের ‘লাডূগূল’ থেকে জল তুলে আনে…
Verse 79
षष्टिं वर्षमहस्राणि पितरस्तेन तर्पिता: । पितरोंने कहा--मुने! छोड़े हुए नीले रंगके साँड़की पूँछ यदि नदी आदिके जलमें भीगकर उस जलको ऊपर उछालती है तो जिसने उस साँड़को छोड़ा है उसके पितर साठ हजार वर्षोतक उस जलसे तृप्त रहते हैं ।।
পিতৃগণ বললেন—সে কর্মে পিতৃরা ষাট হাজার বছর তৃপ্ত থাকেন। আর যে কেউ নদীতীরে বিপদে পতিত পরিত্যক্ত প্রাণীকে কাদামাটি থেকে তুলে নিরাপদে রাখে, সেই করুণ রক্ষার পুণ্য পিতৃদের জন্য পিণ্ড-উদকের ন্যায় হয়ে দীর্ঘকাল তাদের তৃপ্ত করে।
Verse 80
वर्षासु दीपदानेन शशिवच्छो भते नर:
বর্ষাকালে দীপদান করলে মানুষ চন্দ্রের মতো দীপ্তিমান হয়—অন্ধকার ও দুর্দশার মধ্যে সে আলো ও পথনির্দেশের দৃশ্যমান উৎস হয়ে ওঠে।
Verse 81
अमावास्यां तु ये मर्त्या: प्रयच्छन्ति तिलोदकम्
শক্র বললেন—“তপোধন! যারা অমাবস্যার দিনে তিলমিশ্রিত জল অর্পণ করে—তামার পাত্রে মধু ও তিল মিশিয়ে সেই জল দিয়ে পিতৃদের তৃপ্তি সাধন করে—তাদের শ্রাদ্ধকর্ম রহস্যসহ যথাযথ বিধিতে সম্পন্ন হয়।”
Verse 82
पात्रमौदुम्बरं गृह मधुमिश्र॑ तपोधन । कृतं भवति तै: श्राद्धं सरहस्यं यथार्थवत्
তপোধন! উদুম্বরের পাত্র গ্রহণ করে মধুমিশ্রিত (তিলোদক) দ্বারা যে পিতৃদের তৃপ্তি সাধন করে, তার শ্রাদ্ধকর্ম রহস্যসহ যথাযথভাবে সম্পন্ন হয়।
Verse 83
हृष्टपुष्टमनास्तेषां प्रजा भवति नित्यदा । कुलवंशस्य वृद्धिस्तु पिण्डदस्य फलं भवेत् । श्रद्दधानस्तु यः कुर्यात् पितृणामनृणो भवेत्
শক্র বললেন—“তাদের প্রজারা সর্বদা হৃষ্ট, পুষ্ট ও প্রসন্নচিত্ত থাকে। কুল ও বংশপরম্পরার বৃদ্ধি শ্রাদ্ধের ফল; পিণ্ডদানকারীর কাছে এই ফল সহজলভ্য। আর যে শ্রদ্ধাভরে পিতৃদের শ্রাদ্ধ করে, সে পিতৃঋণ থেকে মুক্ত হয়।”
Verse 84
एवमेव समुद्दिष्ट: श्राद्धकालक्रमस्तथा । विधि: पात्र फलं चैव यथावदनुकीर्तितम्
শক্র বললেন—“এইভাবে শ্রাদ্ধের সময়-ক্রম নির্দিষ্ট করা হলো; এবং বিধি, যোগ্য পাত্র (গ্রহণকারী) ও ফল—সবই যথাযথভাবে বর্ণিত হলো।”
Verse 124
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुर्बल और पाण्डुवर्णके राक्षमका आख्यानविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে পবিত্র মহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে দুর্বল ও পাণ্ডুবর্ণ রাক্ষসের আখ্যান-বিষয়ক একশো চব্বিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 125
इस प्रकार यह श्राद्धके काल, क्रम, विधि, पात्र और फलका यथावतरूपसे वर्णन किया गया है ।। इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितृरहस्यं नाम पज्चविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
শক্র বললেন—এইভাবে শ্রাদ্ধের কাল, ক্রম, বিধি, যোগ্য পাত্র এবং ফল—সবই যথাযথভাবে বর্ণিত হল। ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘পিতৃরহস্য’ নামক একশো পঁচিশতম অধ্যায় সমাপ্ত।
Verse 276
प्रजा विवर्धते चास्य अक्षयं चोपतिष्ठति । यही श्राद्धकी विधि बतायी गयी है
এই নির্দিষ্ট শ্রাদ্ধবিধি অনুসারে যে মানুষ আচরণ করে, তার বংশবৃদ্ধি হয় এবং অক্ষয় সমৃদ্ধি তার পাশে স্থিত থাকে। এতে ধর্মের লোপ ঘটে না। যে এই ধর্ম পালন করে, তার পিতৃগণ সদা প্রসন্ন ও সন্তুষ্ট থাকেন; তার সন্ততি বৃদ্ধি পায়, কখনও ক্ষয়প্রাপ্ত হয় না।
Verse 286
पितृणां त्रिषु सर्वेषां निरुक्त कथितं त्वया । देवदूतने पूछा--पितृगण! आपलोगोंने क्रमश: पिण्डोंका विभाग बतलाया और तीनों लोकोंमें जो समस्त पितर हैं, उनको पिण्डदान करनेका शास्त्रोक्त प्रकार भी बतला दिया
দেবদূত বললেন—পিতৃগণ! তিন লোকের সকল পিতৃদের বিষয়ে শাস্ত্রসম্মত ব্যাখ্যা আপনি স্পষ্ট করে বলেছেন। আপনি ক্রমানুসারে পিণ্ডের বিভাগ এবং পিণ্ডদানের বিধিও প্রকাশ করেছেন।
Verse 296
कं वा प्रीणयते देव॑ कथं तारयते पितृन् | किंतु पहले पिण्डको उठाकर जो नीचे जलमें डाल देनेकी बात कही गयी है
দেবদূত জিজ্ঞাসা করল—হে দেব! এই অর্ঘ্য প্রকৃতপক্ষে কার কাছে পৌঁছায়? কোন দেবতাকে তৃপ্ত করে? আর কীভাবে পিতৃদের উদ্ধার করে? পূর্বে বলা হয়েছে পিণ্ড তুলে নিচে জলে নিক্ষেপ করতে; বিধি অনুসারে যদি তা জলে ফেলা হয়, তবে তা কার প্রাপ্য হয়?
Verse 306
किमर्थ पितरस्तस्य कव्यमेव च भुड्जते । इसी प्रकार यदि गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार मध्यम पिण्ड पत्नी ही खाती है तो उसके पितर किस प्रकार उस पिण्डका उपभोग करते हैं?
দেবদূত বললেন— “কেন সেই ব্যক্তির পিতৃগণ কেবল কাব্য (শ্রাদ্ধ-অর্ঘ্য)ই ভোগ করেন? আর গুরুজনদের আদেশ অনুসারে যদি মধ্য পিণ্ড স্ত্রী নিজেই ভক্ষণ করে, তবে তার পিতৃগণ কীভাবে সেই পিণ্ডের ভোগ লাভ করেন?”
Verse 313
भवते का गतिस्तस्य क॑ वा समनुगच्छति । तथा अन्तिम पिण्ड जब अग्निमें डाल दिया जाता है, तब उसकी क्या गति होती है? वह किस देवताको प्राप्त होता है?
দেবদূত জিজ্ঞাসা করলেন— “যখন শেষ পিণ্ড অগ্নিতে নিক্ষেপ করা হয়, তখন তার গতি কী হয়? কে তার সঙ্গে গমন করে? এবং সে কোন দেবতাকে প্রাপ্ত হয়?”
Verse 326
फल वृत्तिं च मार्ग च यश्चैनं प्रतिपद्यते । यह सब मैं सुनना चाहता हूँ। तीनों पिण्डोंकी जो गति होती है, उसका जो फल, वृत्ति और मार्ग है तथा जो देवता उस पिण्डको पाता है, उन सबपर प्रकाश डालिये
দেবদূত বললেন— “আমি এ সবই শুনতে চাই— তিনটি পিণ্ডের যে গতি, তার ফল, বিধান/প্রক্রিয়া ও পথ কী; আর সেই পিণ্ড কে প্রাপ্ত হয়, কোন দেবতার তাতে অংশ— সবই স্পষ্ট করে বলুন।”
Verse 356
पितृभक्तस्तु यो विप्रो वरलब्धो महायशा: । परन्तु वे भी इस प्रकार पितृकार्यके रहस्यको निश्चित रूपसे नहीं जानते हैं। जो पिताके भक्त हैं और जिन महायशस्वी ब्राह्मणको वर प्राप्त हुआ है
পিতৃভক্ত, বরপ্রাপ্ত ও মহাযশস্বী যে ব্রাহ্মণগণ— তাঁরাও পিতৃকার্যের রহস্য নিশ্চিতভাবে জানেন না। সর্বশ্রেষ্ঠ চিরঞ্জীব মহাত্মা মার্কণ্ডেয়কে বাদ দিয়ে আর কারও কাছে তার তত্ত্ব জানা নেই।
Verse 466
किल्बिषं सुबह प्राप्ता: किंस्विदेषां प्रतिक्रिया । “देवराज! मनुष्य मोहवश जो तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियों
দেবদূত বললেন— “তারা গুরুতর পাপ অর্জন করেছে; তাদের প্রতিকার কী? দেবরাজ! মানুষ মোহবশে তির্যক্যোনিতে জন্মানো প্রাণীদের— হরিণ, পাখি, ভেড়া প্রভৃতি— এবং কীট, পিঁপড়ে ও সাপকে হিংসা করে; এতে তারা বহু পাপ সঞ্চয় করে। সেই পাপ থেকে মুক্তির উপায় কী?”
Verse 643
अनिलद्ठेषिण: शक्र गर्भस्था च्यवते प्रजा । इन्द्र! जो दुराचारी और कुलांगार पुरुष तथा जो समस्त दुराचारिणी स्त्रियाँ सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करती हैं और जो लोग वायुसे द्वेष रखते अर्थात् वायुके सम्मुख मूत्रत्याग करते हैं उन सबकी छियासी वर्षोतक गर्भमें आयी हुई संतान गिर जाती है
শক্র বললেন—হে ইন্দ্র! যারা বায়ুকে ঘৃণা করে, তারা গর্ভস্থ সন্তানকে পতিত করে। যে দুষ্কর্মী, কুলকলঙ্ক পুরুষ, এবং যে সর্বতোভাবে দুষ্চরিত্রা নারী সূর্যের দিকে মুখ করে মূত্রত্যাগ করে, আর যারা বায়ুকে অবজ্ঞা করে তার সম্মুখে মূত্রত্যাগ করে—এমন সকলেরই গর্ভে প্রবিষ্ট সন্তান, দীর্ঘকাল স্থিত থাকলেও, নষ্ট হয়ে যায়—এ কথা শোনা যায়।
Verse 653
अग्निकार्येषु वै तेषां हव्यं नाश्नाति पावक: । जो प्रज्वलित यज्ञाग्निमें समिधाकी आहुति नहीं देते
শক্র বললেন—যারা অগ্নিসংক্রান্ত কর্তব্য অবহেলা করে, তাদের হব্য পাৱক গ্রহণ করেন না। যারা প্রজ্বলিত যজ্ঞাগ্নিতে সমিধার আহুতি দেয় না, তাদের অগ্নিহোত্রে অগ্নিদেব হবিশ্য গ্রহণ করেন না; অতএব অগ্নিকে বিধিমতো প্রজ্বলিত করেই আহুতি প্রদান করা উচিত।
Verse 683
भूतिकामेन मर्त्येन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । इस प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए ब्राह्मणोंने पूर्वकालमें यह प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया है; अत: अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको शास्त्रमें जिन्हें त्याज्य बतलाया है
শক্র বললেন—সমৃদ্ধি ও মঙ্গল কামনাকারী মর্ত্যের কাছে আমি এই সত্য কথাই বলছি। পূর্বকালে উত্তম কুলে জন্ম নেওয়া ব্রাহ্মণরা এটিকে প্রত্যক্ষ দেখেছে ও অভিজ্ঞতায় যাচাই করেছে; অতএব যে নিজের কল্যাণ চায়, তাকে শাস্ত্রে যেসব কর্ম ত্যাজ্য বলা হয়েছে সেগুলি পরিত্যাগ করতে হবে, আর যেসব কর্তব্যকর্ম বিধিবদ্ধ সেগুলি নিত্য পালন করতে হবে। এটাই আমার সত্য উপদেশ।
Verse 693
ऋषयश्च महाभागा: पृच्छन्ति सम पितृंस्ततः । तब मरुदगणोंसहित सम्पूर्ण महाभाग देवता और परम सौभाग्यशाली ऋषियोंने पितरोंसे पूछा--
তখন মরুদ্গণের সঙ্গে সকল মহাভাগ দেবতা এবং পরম সৌভাগ্যশালী ঋষিগণ পিতৃদের জিজ্ঞাসা করলেন।
Verse 723
श्रूयतां येन तुष्यामो मर्त्याना साधुकर्मणाम् । पितरोंने कहा--महाभाग देवताओ! आपने न्यायत:ः अपना संदेह उपस्थित किया है। उत्तम कर्म करनेवाले मनुष्योंके जिस कार्यसे हम संतुष्ट होते हैं, उसको सुनिये
পিতৃগণ বললেন—হে মহাভাগ দেবগণ! তোমরা ন্যায়সঙ্গতভাবে তোমাদের সংশয় উপস্থিত করেছ। এখন শোনো—সৎকর্মপরায়ণ মর্ত্যদের যে আচরণ ও যে কর্মে আমরা পিতৃগণ সন্তুষ্ট হই, তা-ই আমরা বলছি।
Verse 763
वृद्धगार्ग्यों महातेजास्तानेवं वाक्यमब्रवीत् । पितरोंका यह भाषण सुनकर तपस्याके धनी महातेजस्वी वृद्धगार्ग्यके शरीरमें रोमांच हो आया और उनसे इस प्रकार पूछा--
মহাতেজস্বী তপোধন বৃদ্ধ গার্গ্য তাঁদের উদ্দেশে এই কথা বললেন। পিতৃগণের বাণী শুনে তপস্যাধনী মহাতেজস্বী বৃদ্ধ গার্গ্যের দেহে ভক্তিভরে রোমাঞ্চ জাগল, এবং তিনি তাঁদের এইভাবে প্রশ্ন করলেন।
Verse 776
वर्षासु दीपदानेन तथैव च तिलोदकैः । “तपोधनो! नीले रंगके साँड़ छोड़ने, वर्षा-ऋतुमें दीप देने और अमावास्याको तिलमिश्रित जलद्वारा तर्पण करनेसे क्या लाभ होते हैं?”
“হে তপোধন! নীলবর্ণ ষাঁড়কে মুক্তিদান (বৃষোৎসর্গ), বর্ষাকালে দীপদান, এবং অমাবস্যায় তিলমিশ্রিত জলে তর্পণ—এই তিন কর্মে কী ফল লাভ হয়?”
Verse 796
पितरस्तेन गच्छन्ति सोमलोकमसंशयम् | जो नदी या तालाबके तटसे अपने सींगोंद्वारा कीचड़ उछालकर खड़ा होता है, उससे वृषोत्सर्ग करनेवालेके पितर निस्संदेह चन्द्रलोकमें जाते हैं
“সে কর্মের দ্বারা পিতৃগণ নিঃসন্দেহে সোমলোকে গমন করেন। যে ষাঁড় নদী বা সরোবরের তীরে শিং দিয়ে কাদা ছিটিয়ে দাঁড়ায়, এমন বৃষভকে মুক্তিদানকারী ব্যক্তির পিতৃগণ নিশ্চিতই চন্দ্রলোকে পৌঁছান।”
Verse 806
तमोरूपं न तस्यास्ति दीपकं य: प्रयच्छति । वर्षा-ऋतुमें दीपदान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान शोभा पाता है। जो दीपदान करता है, उसके लिये नरकका अन्धकार है ही नहीं
যে প্রদীপ দান করে, তার জন্য নরকের অন্ধকাররূপ তম নেই। বর্ষাকালে দীপদান করলে মানুষ চন্দ্রের ন্যায় দীপ্তি লাভ করে।
Beyond listing rites and austerities, it asserts that dharma is fundamentally grounded in non-violence, truthfulness, compassion, and especially ārjava (straightforwardness), while condemning crookedness (jihmatā) as adharma.
Trikāla abhiṣeka, pitṛ-deva worship, agnihotra and homa, pañca-yajña, regulated forest diet (nīvāra, fruits/roots; in extremes water/air-based restraints), sthaṇḍila sleeping, vīrāsana, pañcatapa, and śīta/agni-yoga as disciplined austerities.
Yes. It attributes differentiated results (e.g., enjoyment in Gandharva/Nāga/Yakṣa/Varuṇa/Agni/Śakra or vīra realms, and some claims of worldly kingship after long discipline) as a traditional motivational taxonomy linking tapas and niyama to cosmological reward models.