
आचारप्रशंसा (Praise of Ācāra as the Basis of Longevity, Fame, and Prosperity)
Upa-parva: Ācāra–Āyuḥ–Kīrti–Śrī Anuśāsana (Conduct and the Causes of Longevity, Fame, and Prosperity)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma why humans—despite the Vedic ideal of a hundred-year lifespan—often die young, and by what means one gains longevity, fame, and prosperity: through austerity, celibacy, mantra, sacrifice, medicines, birth, or behavior. Bhīṣma responds with a programmatic claim: ācāra (regulated conduct) is the generator of āyus and śrī, and the foundation of kīrti both in this world and beyond. He contrasts durācāra—marked by fear-inducing behavior, impiety, and transgression of guru and śāstra—with the long-lived person characterized by non-anger, truthfulness, non-violence, and absence of envy. The chapter then catalogs practical injunctions spanning daily routine (waking at brāhma-muhūrta, sandhyā observances), cleanliness and waste-disposal norms, etiquette toward elders and teachers, speech ethics (avoiding harsh or humiliating words), dietary and hospitality rules, sexual restraint and prohibited relations, and household/ritual proprieties. The discourse culminates in a summarizing refrain: ācāra produces well-being, increases reputation, supports dharma, and removes inauspiciousness—presented as a compassionate, universal guideline for all social groups.
Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से पूछते हैं—मनुष्य दीर्घायु कैसे होता है, अल्पायु क्यों होता है, कीर्ति और श्री (समृद्धि) किससे मिलती है? (V2) → भीष्म उत्तर को केवल ‘धर्म’ के सिद्धान्तों तक सीमित नहीं रखते; वे जीवन-व्यवहार के सूक्ष्म नियमों—यज्ञ-परम्परा (शम्या फेंककर वेदी-सीमा), तप-ब्रह्मचर्य-जप-होम, मन-वाणी-शरीर की शुद्धि, क्रोध-नियंत्रण, शयन-आहार-वस्त्र-आचरण की मर्यादाएँ—एक-एक कर रखते जाते हैं। (V1, V3, V37, V49, V85, V93, V863) → भीष्म ‘आचरण-धर्म’ को निर्णायक बताते हैं: क्रोध में किसी पर दण्ड न उठाना, केवल पुत्र/शिष्य को भी शिक्षा-हेतु मर्यादित ताड़न की अनुमति (V37); शयन, वस्त्र, स्नानोत्तर लेपन, भोजन-नियम, और ‘दूसरे के वस्त्र’ न पहनने जैसे निषेध (V49, V85, V93, V863)—ये सब दीर्घायु, कीर्ति और श्री के प्रत्यक्ष कारण बनते हैं। → अध्याय का निष्कर्ष यह बनता है कि उन्नति चाहने वाला बुद्धिमान पुरुष हर कार्य का शुभारम्भ ब्राह्मण द्वारा विधिपूर्वक (वास्तुपूजन आदि) कराए और शौच-शुद्धि को भोजन के आदि-अन्त तक हितकर माने। (V1176, V1310) → युधिष्ठिर के प्रश्नों का विस्तार अगले उपदेशों की ओर संकेत करता है—शौच, आहार, गृह-धर्म और सामाजिक मर्यादा के और सूक्ष्म विधान आगे कैसे व्यवस्थित होंगे?
Verse 1
ऑपन-माज बक। अपि्-छऋाज > यज्ञकर्ता पुरुष 'शम्या' नामक एक काठका डंडा खूब जोर लगाकर फेंकता है
যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! শাস্ত্রে বলা হয়েছে—মানুষের আয়ু শতবর্ষ, এবং সে শতগুণ বীর্য নিয়ে জন্মায়। তবু আমরা দেখি, অনেকেই শৈশবেই মৃত্যুবরণ করে। এর কারণ কী?
Verse 2
आयुष्मान् केन भवति अल्पायुर्वापि मानव: | केन वा लभते कीर्ति केन वा लभते श्रियम्
কোন কারণে মানুষ দীর্ঘায়ু হয়, আর কোন কারণে অল্পায়ু হয়? কোন দ্বারা সে কীর্তি লাভ করে, আর কোন দ্বারা শ্রী—সমৃদ্ধি—লাভ করে?
Verse 3
तपसा ब्रह्मचर्येण जपहोमैस्तथौषधै: । कर्मणा मनसा वाचा तने ब्रूहि पितामह
পিতামহ! তপস্যা, ব্রহ্মচর্য, জপ, হোম এবং ঔষধি—এগুলির মধ্যে মানুষ কিসের আশ্রয় নেবে? মন, বাক্য ও কর্মের দ্বারা কীভাবে চললে সে শ্রেয়ের অংশীদার হবে—আমাকে বলুন।
Verse 4
भीष्म उवाच अत्र तेहहं प्रवक्ष्यामि यन्मां त्वमनुपृच्छसि । अल्पायुर्येन भवति दीर्घायुर्वापि मानव:
ভীষ্ম বললেন— তুমি যা জিজ্ঞাসা করেছ, তা আমি এখানে বলছি—কোন কারণে মানুষ অল্পায়ু হয় এবং কোন কারণে দীর্ঘায়ু হয়।
Verse 5
येन वा लभते कीर्ति येन वा लभते श्रियम् यथा वर्तयन् पुरुष: श्रेयसा सम्प्रयुज्यते
আর কোন আচরণে মানুষ কীর্তি লাভ করে, কোন আচরণে শ্রী—সমৃদ্ধি—লাভ করে; যে রীতিতে সে জীবনযাপন করে, সেই রীতিতেই সে শ্রেয়ের সঙ্গে যুক্ত হয়।
Verse 6
भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, इसका उत्तर देता हूँ। मनुष्य जिस कारणसे अल्पायु होता है, जिस उपायसे दीर्घायु होता है, जिससे वह कीर्ति और सम्पत्तिका भागी होता है तथा जिस बर्तावसे पुरुषको श्रेयका संयोग प्राप्त होता है, वह सब बताता हूँ, सुनो ।।
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! তুমি যা জিজ্ঞাসা করছ, তার উত্তর দিচ্ছি। কোন কারণে মানুষ অল্পায়ু হয়, কোন উপায়ে দীর্ঘায়ু হয়, কীভাবে সে খ্যাতি ও সমৃদ্ধির ভাগী হয়, এবং কোন আচরণে পুরুষ পরম শ্রেয়ের সঙ্গে যুক্ত হয়—সবই শোনো। সদাচার থেকেই আয়ু লাভ হয়, সদাচার থেকেই ঐশ্বর্য লাভ হয়, আর সদাচার থেকেই মানুষ ইহলোকে ও পরলোকে খ্যাতি অর্জন করে।
Verse 7
दुराचारो हि पुरुषो नेहायुर्विन्दते महत् । त्रसन्ति यस्माद् भूतानि तथा परिभवन्ति च
দুরাচারী ব্যক্তি এই জগতে দীর্ঘায়ু লাভ করে না; কারণ তার জন্য জীবসমূহ ভয়ে কাঁপে, আর সে নিজেও পরে তিরস্কার ও অপমানের শিকার হয়।
Verse 8
दुराचारी पुरुष, जिससे समस्त प्राणी डरते और तिरस्कृत होते हैं, इस संसारमें बड़ी आयु नहीं पाता ।।
দুরাচারী ব্যক্তি—যাকে সকল প্রাণী ভয় করে এবং যে তিরস্কৃত—এই জগতে দীর্ঘায়ু লাভ করে না। অতএব, যদি কেউ নিজের কল্যাণ ও সমৃদ্ধি চায়, তবে তাকে এখানে সদাচার অনুশীলন করতে হবে। এমনকি যার দেহই পাপে আচ্ছন্ন, সেও যদি সংযত সদাচার পালন করে, তবে তা দেহ ও মনের অশুভ লক্ষণ ও প্রবৃত্তিকে দমন করে।
Verse 9
आचारलक्षणो धर्म: संतश्षारित्रलक्षणा: । साधूनां च यथावृत्तमेतदाचारलक्षणम्
সদাচারই ধর্মের লক্ষণ। সচ্চরিত্রতাই সাধুজনের পরিচয়। সজ্জন ও সংযতেরা জীবনে যেমন আচরণ করেন—সেই জীবন্ত আচরণই ‘উচিত আচরণ’-এর প্রকৃত রূপ এবং ধর্মের চিহ্ন।
Verse 10
अप्यदृष्टं श्रवादेव पुरुषं धर्मचारिणम् | भूतिकर्माणि कुर्वाणं तं जना: कुर्वते प्रियम्
যে ব্যক্তি ধর্মাচরণ করে এবং লোককল্যাণের কাজে নিয়োজিত থাকে, তাকে চোখে না দেখলেও মানুষ কেবল তার নাম শুনেই তাকে স্নেহ করতে শুরু করে।
Verse 11
ये नास्तिका निष्क्रियाश्व गुरुशास्त्राभिलड्घिन: । अधर्मज्ञा दुराचारास्ते भवन्ति गतायुष:
ভীষ্ম বললেন—যারা নাস্তিক, কর্তব্যকর্মে নিষ্ক্রিয়, গুরু ও শাস্ত্রের আদেশ লঙ্ঘনকারী, অধর্মজ্ঞ এবং দুরাচারী—তাদের আয়ু ক্ষীণ হয়ে যায়।
Verse 12
विशीला भिजन्नमर्यादा नित्यं संकीर्णमैथुना: । अल्पायुषो भवन्तीह नरा निरयगामिन:
ভীষ্ম বললেন—যে পুরুষ শীলহীন, সর্বদা ধর্মের সীমা ভঙ্গকারী এবং নিষিদ্ধ সীমা অতিক্রম করে অবৈধ কামাচারে লিপ্ত থাকে—সে এ লোকেই স্বল্পায়ু হয়, আর মৃত্যুর পরে নরকে গমন করে।
Verse 13
सर्वलक्षणहीनो5पि समुदाचारवान् नर: । श्रद्दधानोडनसूयुश्च॒ शतं वर्षाणि जीवति
ভীষ্ম বললেন—সব শুভ লক্ষণ থেকে বঞ্চিত হলেও যে ব্যক্তি সদাচারী, শ্রদ্ধাবান এবং দোষদৃষ্টি-হীন—সে শতবর্ষ জীবিত থাকে।
Verse 14
अक्रोधन: सत्यवादी भूतानामविहिंसक: । अनसूयुरजिद्दाश्व शतं वर्षाणि जीवति
ভীষ্ম বললেন—যে ক্রোধহীন, সত্যবাদী, সকল প্রাণীর প্রতি অহিংস, দোষদৃষ্টি-হীন ও কপটশূন্য—সে শতবর্ষ জীবিত থাকে। সে সংযতচিত্তে প্রাতে ও সায়ং আহার করবে; মাঝেমাঝে খাবে না। জোর করে বা অনুচিতভাবে আহার করবে না, এবং পরের শ্রাদ্ধের অন্নও গ্রহণ করবে না।
Verse 15
लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नर: । नित्योच्छिष्ट: संकुसुको नेहायुर्विन्दते महत्
ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি ঢেলা চূর্ণ করে, ঘাসের ডগা ছিঁড়ে, নখ কামড়ায়, আর সর্বদা উচ্ছিষ্ট-অশুচি ও অস্থির থাকে—সে এ লোকেতে দীর্ঘায়ু লাভ করে না।
Verse 16
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थों चानुचिंतयेत् । उत्थायाचम्य तिषछेत पूर्वा संध्यां कृताज्जलि:
ব্রাহ্মমুহূর্তে জাগ্রত হয়ে ধর্ম ও অর্থ বিষয়ে চিন্তা করবে। তারপর শয্যা ত্যাগ করে আচমন করে, করজোড়ে পূর্বদিকের প্রাতঃসন্ধ্যা যথাবিধি পালন করবে।
Verse 17
एवमेवापरां संध्यां समुपासीत वाग्यत: । नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं नास्तं यान््तं कदाचन,इसी प्रकार सायंकालमें भी मौन रहकर संध्योपासना करे। उदय और अस्तके समय सूर्यकी ओर कदापि न देखे
এইভাবেই বাক্সংযম রেখে সায়ংসন্ধ্যাও পালন করবে। সূর্যোদয় ও সূর্যাস্তের সময় কখনোই সূর্যের দিকে দৃষ্টি দেবে না।
Verse 18
नोपसूष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् | ऋषयो नित्यसंध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्तुवन्
ঋষিরা না অপবিত্র দূষিত স্থানে থাকতেন, না জলাবদ্ধ অঞ্চলে, না আকাশের মধ্যভাগে গমন করতেন। নিত্য সन्ध্যা-অনুষ্ঠানে স্থিত থাকার ফলে তাঁরা দীর্ঘায়ু লাভ করেছিলেন।
Verse 19
ये न पूर्वामुपासन्ते द्विजा: संध्यां न पश्चिमाम्
যে দ্বিজেরা না প্রাতঃকালের পূর্বসন্ধ্যা পালন করে, না সায়ংকালের পশ্চিমসন্ধ্যা।
Verse 20
परदारा न गन्तव्या सर्ववर्णेषु कहिचित्
কোনো বর্ণের পুরুষেরই কখনো পরস্ত্রীর কাছে গমন করা উচিত নয়; পরস্ত্রী-সেবনে মানুষের আয়ু দ্রুত ক্ষয় হয়। জগতে পরস্ত্রী-সমাগমের মতো পুরুষের আয়ু নাশকারী আর কোনো কর্ম নেই।
Verse 21
न हीदृशमनायुष्यं लोके किंचन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्
ভীষ্ম বললেন— এই জগতে পরস্ত্রীর সঙ্গে সংসর্গের মতো আয়ু-নাশক আর কিছু নেই। এখানে পুরুষের জন্য পরের স্ত্রীর ভোগ-অনুসরণ যত নিশ্চিতভাবে জীবন সংক্ষিপ্ত করে, তেমন অন্য কোনো কর্ম করে না।
Verse 22
यावन्तो रोमकूपाः स्युः स्त्रीणां गात्रेषु निर्मिता: । तावद् वर्षसहस्राणि नरकं पर्युपासते,स्त्रियोंके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक व्यभिचारी पुरुषोंको नरकमें रहना पड़ता है
ভীষ্ম বললেন— নারীদের অঙ্গে যতগুলি রোমকূপ সৃষ্টি হয়েছে, ব্যভিচারী পুরুষরা তত হাজার বছর নরকে অবস্থান করে।
Verse 23
प्रसाधनं च केशानामज्जनं दन्तधावनम् | पूर्वाह्न एव कार्याणि देवतानां च पूजनम्
চুল সাজানো, চোখে অঞ্জন দেওয়া, দাঁত-মুখ পরিষ্কার করা এবং দেবতাদের পূজা—এসব কাজ পূর্বাহ্নেই করা উচিত।
Verse 24
पुरीषमूत्रे नोदीक्षेत्राधितिषछ्ठेत् कदाचन । नातिकल्यं नातिसायं न च मध्यन्दिने स्थिते
ভীষ্ম বললেন— মল-মূত্রে অপবিত্র স্থানে কখনও বসবে না, সেখানে অবস্থানও করবে না। আর অনুচিত সময়েও নয়—না অতিশয় ভোরে, না অতিশয় সন্ধ্যায়, না মধ্যাহ্নে দাঁড়িয়ে।
Verse 25
पन्था देयो ब्राह्म॒णाय गोभ्यो राजभ्य एव च
ব্রাহ্মণকে, গাভীকে এবং রাজাকেও পথ ছেড়ে দিতে হবে।
Verse 26
प्रदक्षिणं च कुर्वीत परिज्ञातान् वनस्पतीन्
ভীষ্ম বললেন—যে বৃক্ষগুলি সুপরিচিত ও যথার্থভাবে জানা, তাদেরও শ্রদ্ধাভরে প্রদক্ষিণা করা উচিত; পরিচিত উদ্ভিদকেও সম্মান ও সতর্কতার যোগ্য বলে মানতে হবে।
Verse 27
चतुष्पथान् प्रकुर्वीत सवनिव प्रदक्षिणान् । मार्गमें चलते समय अश्वत्थ आदि परिचित वृक्षों तथा समस्त चौराहोंको दाहिने करके जाना चाहिये ।। मध्यन्दिने निशाकाले अर्धरात्रे च सर्वदा
ভীষ্ম বললেন—চতুষ্পথ (চৌরাস্তা) অতিক্রম করার সময় তাকে ডানদিকে রেখে, যেন প্রদক্ষিণা করা হচ্ছে—এইভাবে শ্রদ্ধা দেখাতে হবে। পথ চলতে অশ্বত্থ প্রভৃতি পরিচিত বৃক্ষ এবং সকল সংযোগস্থল ডানদিকে রেখে যেতে হবে। মধ্যাহ্নে, রাত্রিতে, অর্ধরাত্রিতে—সর্বদাই এই বিধি পালনীয়।
Verse 28
चतुष्पथ्थं न सेवेत उभे संध्ये तथैव च । दोपहरमें, रातमें, विशेषत:ः आधी रातके समय और दोनों संध्याओंके समय कभी चौराहोंपर न रहे ।।
ভীষ্ম বললেন—উভয় সন্ধিক্ষণে (প্রভাত ও সায়ং) চতুষ্পথে থাকা বা বারবার সেখানে যাতায়াত করা উচিত নয়। আর অন্যের পরিহিত জুতো-চটি ও বস্ত্র ধারণ করা উচিত নয়।
Verse 29
ब्रह्मचारी च नित्य॑ं स्यात् पादं पादेन नाक्रमेत् अमावास्यां पौर्णमास्यां चतुर्दश्यां च सर्वश:
ভীষ্ম বললেন—মানুষের নিত্য ব্রহ্মচারী হওয়া উচিত; এক পা দিয়ে অন্য পা চেপে ধরা/দলিত করা উচিত নয়। অমাবস্যা, পূর্ণিমা এবং প্রত্যেক পক্ষের চতুর্দশীতে সর্বতোভাবে সংযম রেখে ব্রহ্মচর্য পালন করতে হবে।
Verse 30
अष्टम्यां सर्वपक्षाणां ब्रह्मचारी सदा भवेत् | आक्रोशं परिवादं च पैशुन्यं च विवर्जयेत्
ভীষ্ম বললেন—উভয় পক্ষের অষ্টমীতে সর্বদা ব্রহ্মচর্য পালন করবে। আর গালাগালি, নিন্দা ও পরচর্চা/চুগলি পরিত্যাগ করবে।
Verse 31
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनत: परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत नतां वदेद् रुशतीं पापलोक्याम्
ভীষ্ম বললেন— অন্যের মর্মে আঘাতকারী হবে না, নিষ্ঠুর বাক্য বলবে না। কাউকে হেয় করে তাকে ছাপিয়ে যেতে চাইবে না। যে কথায় অন্যের মনে উদ্বেগ জাগে, সে রূঢ় বাক্য পাপলোকের পথে নিয়ে যায়; অতএব এমন কথা কখনও বলা উচিত নয়।
Verse 32
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहत: शोचति रात्र्यहानि । परस्य वा मर्मसु ये पतन्ति तान् पण्डितो नावसूजेत् परेषु
ভীষ্ম বললেন— মুখ থেকে বাক্যরূপী বাণ বেরিয়ে যায়; তাতে আঘাত পেলে মানুষ দিনরাত শোকে ডুবে থাকে। যে কথাগুলি অন্যের মর্মস্থানে বিদ্ধ হয়, পণ্ডিত ব্যক্তি তা কখনও অন্যের প্রতি নিক্ষেপ করে না।
Verse 33
रोहते सायकैरिंद्ध वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम्
ভীষ্ম বললেন— বাণে বিদ্ধ ও কুঠারে কাটা বনও আবার গজিয়ে ওঠে; কিন্তু কদুক্তির অস্ত্রে করা ভয়ংকর বাক্-ক্ষত আর সারে না।
Verse 34
कर्णिनालीकनाराचान् निर्हरन्ति शरीरत: । वाक्शल्यस्तु न निर्हर्तु शक्यो हृदिशयो हि सः
ভীষ্ম বললেন— কর্ণি, নালীক ও নারাচ—এমন বাণ শরীরে গেঁথে গেলে চিকিৎসক তা বের করে দেন; কিন্তু বাক্যরূপ শল্য বের করা যায় না, কারণ তা হৃদয়ের ভিতরেই গেঁথে থাকে।
Verse 35
हीनांगानतिरिक्तांगान् विद्याहीनान् विगर्हितान् | रूपद्रविणहीनांश्व सत्त्वहीनांश्व नाक्षिपेत्
ভীষ্ম বললেন— অঙ্গহীন বা বিকলাঙ্গ, অতিরিক্ত অঙ্গযুক্ত, বিদ্যাহীন, নিন্দিত, রূপ ও ধনহীন, এবং সাহস-শক্তিহীন লোকদের প্রতি কটাক্ষ করা উচিত নয়।
Verse 36
नास्तिक्यं वेदनिन्दां च देवतानां च कुत्सनम् । देषस्तम्भो5भिमानं च तैक्ष्ण्यं च परिवर्जयेत्
ভীষ্ম বললেন— নাস্তিকতা, বেদের নিন্দা, দেবতাদের অবমাননা, বিদ্বেষ, জেদ, অহংকার ও কঠোরতা—এই দোষসমূহ পরিত্যাগ করা উচিত; কারণ এগুলি ধর্মকে ক্ষয় করে।
Verse 37
परस्य दण्डं नोद्यच्छेत् क्रुद्धो नैन॑ निपातयेत् । अन्यत्र पुत्राच्छिष्याच्च शिक्षार्थ ताडनं स्मृतम्
ক্রোধে অন্য কারও উপর দণ্ড তুলবে না, তাকে ভূমিতে ফেলে দেবে না। কেবল পুত্র বা শিষ্যকে শিক্ষার উদ্দেশ্যে শাসন করা শাস্ত্রে অনুমোদিত।
Verse 38
न ब्राह्मणान् परिवदेन्नक्षत्राणि न निर्दिशेत् । तिथिं पक्षस्य न ब्रूयात् तथास्यायुर्न रिष्यते
ব্রাহ্মণদের নিন্দা করবে না; নক্ষত্র দেখিয়ে বেড়াবে না; এবং পক্ষের তিথিও ঘোষণা করবে না। এভাবে চললে মানুষের আয়ু ক্ষয় হয় না।
Verse 39
(अमावास्यामृते नित्यं दंतधावनमाचरेत् । इतिहासपुराणानि दान वेदं च नित्यश: ।।
অমাবস্যা ব্যতীত প্রতিদিন দন্তধাবন করা উচিত। ইতিহাস-পুরাণ পাঠ, বেদস্বাধ্যায় ও দান—এসব নিত্যকর্ম। একাগ্রচিত্তে সন্ধ্যোপাসনা করে প্রতিদিন গায়ত্রী জপ-মনন করবে। মল-মূত্র ত্যাগের পরে এবং পথে চলাফেরা করে ফিরে এসে, তদ্রূপ স্বাধ্যায় ও ভোজনের আগে, পা ধুয়ে শুদ্ধ হবে।
Verse 40
त्रीणि देवा: पवित्राणि ब्राह्णानामकल्पयन् । अदृष्टमद्धिर्निर्णिक्ते यच्च वाचा प्रशस्यते
ভীষ্ম বললেন— দেবতারা ব্রাহ্মণদের জন্য তিনটি পবিত্রকারী বিধান করেছেন: অদৃষ্ট (সৎকর্মের পুণ্য), জল যা ধৌত করে শুদ্ধ করে, এবং যা বাক্য দ্বারা প্রশংসিত ও পবিত্র করা হয়।
Verse 41
जिसपर किसीकी दूषित दृष्टि न पड़ी हो, जो जलसे धोया गया हो तथा जिसकी ब्राह्मणलोग वाणीद्वारा प्रशंसा करते हों--ये ही तीन वस्तुएँ देवताओं ने ब्राह्मणोंके उपयोगमें लाने योग्य और पवित्र बतायी हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—সংযাব, কৃসর (খিচুড়ি), মাংস, শষ্কুলী (পিঠে/পুড়ি) ও পায়স—এগুলি নিজের ভোগের জন্য প্রস্তুত করা উচিত নয়; দেবতাদের অর্ঘ্য নিবেদনের উদ্দেশ্যেই প্রস্তুত করা উচিত।
Verse 42
नित्यमग्निं परिचरेद् भिक्षां दद्याच्च नित्यदा | वाग्यतो दन्तकाषछं च नित्यमेव समाचरेत्
প্রতিদিন অগ্নির পরিচর্যা করবে এবং নিত্য ভিক্ষা/দান দেবে। বাক্যে সংযমী হবে এবং দন্তকাষ্ঠ দ্বারা প্রতিদিন দন্তধাবন করবে।
Verse 43
प्रतिदिन अग्निकी सेवा करे, नित्यप्रति भिक्षुको भिक्षा दे और मौन होकर प्रतिदिन दन्तथधावन किया करे ।।
সন্ধ্যাকালে কখনও ঘুমাবে না; স্নান করে সর্বদা শুচি থাকবে। সূর্যোদয়ের পরে শুয়ে থাকবে না; যদি তেমন হয় তবে প্রায়শ্চিত্ত করবে। উঠে প্রথমেই মাতাপিতাকে প্রণাম করবে।
Verse 44
आचार्यमथवाप्यन्यं तथायुर्विन्दते महत् | सायंकालमें न सोये
আচার্য কিংবা অন্য গুরুজনকে শ্রদ্ধাভরে সেবা-অভিবাদন করলে মহৎ দীর্ঘায়ু লাভ হয়। আর যে দন্তকাষ্ঠগুলি নিষিদ্ধ, সেগুলি নিত্য বর্জন করবে।
Verse 45
उदड़्मुखश्नव सततं शौचं कुर्यात् समाहित:
উত্তরমুখে স্নান করবে এবং একাগ্রচিত্তে সর্বদা শৌচ-শুদ্ধি রক্ষা করবে।
Verse 46
अकृत्वा देवपूजां च नाभिगच्छेत् कदाचन । अन्यत्र तु गुरुं वृद्ध धार्मिक वा विचक्षणम्,देवपूजा किये बिना गुरु, वृद्ध, धार्मिक तथा विद्वान् पुरुषको छोड़कर दूसरे किसीके पास न जाय
ভীষ্ম বললেন—দেবপূজা না করে কখনও কারও কাছে যেতে নেই। কেবল গুরু, বৃদ্ধ, ধার্মিক বা বিচক্ষণ ব্যক্তির কাছে গেলে তা ব্যতিক্রম।
Verse 47
अवलोक्यो न चादर्शो मलिनो बुद्धिमत्तरै: । न चाज्ञातां स्त्रियं गच्छेद् गर्भिणीं वा कदाचन
ভীষ্ম নীতিবচন দিলেন—অতি বুদ্ধিমান পুরুষের উচিত নয় মলিন দর্পণে নিজের মুখ দেখা। অপরিচিতা নারী কিংবা গর্ভবতী নারীর কাছে কখনও যাওয়া উচিত নয়।
Verse 48
(दारसंग्रहणात् पूर्व नाचरेन्मैथुनं बुध: । अन्यथा त्ववकीर्ण: स्यात् प्रायश्षित्तं समाचरेत् ।।
ভীষ্ম বললেন—বিবাহের পূর্বে জ্ঞানী পুরুষের মৈথুন করা উচিত নয়; নচেৎ সে ব্রহ্মচর্যভঙ্গকারী (অবকীর্ণ) গণ্য হয় এবং প্রায়শ্চিত্ত করা কর্তব্য। পরস্ত্রীর দিকে তাকাবে না, গোপনে তার সঙ্গে একই আসনে বসবে না। ইন্দ্রিয় সংযত রাখবে, স্বপ্নেও মন শুদ্ধ রাখবে। উত্তর বা পশ্চিমদিকে মাথা করে শোবে না; বিদ্বান পূর্ব বা দক্ষিণদিকে মাথা করে শোবে।
Verse 49
न भग्ने नावशीर्णे च शयने प्रस्वपीत च । नान्तर्थाने न संयुक्ते न च तिर्यक् कदाचन
ভীষ্ম বললেন—ভাঙা বা ঢিলা শয্যায় শোয়া উচিত নয়। অন্ধকারে রাখা শয্যায় না দেখে শোবে না—আলো এনে পরীক্ষা করবে। অন্য কারও সঙ্গে একই খাটে শোবে না। আর কখনও আড়াআড়ি হয়ে নয়, সোজা হয়ে শোবে।
Verse 50
न चापि गच्छेत् कार्येण समयाद् वापि नास्तिकै: । आसन तु पदा55कृष्य न प्रसज्जेत् तथा नर:
ভীষ্ম বললেন—কাজের প্রয়োজনে হলেও নাস্তিকদের সঙ্গে যেও না; তাদের চুক্তি বা শপথ থাকলেও তাদের সঙ্গে যাত্রা কোরো না। আর পা দিয়ে টেনে আনা আসনে বসার অভ্যাসও কোরো না।
Verse 51
न नग्न: कर्तहिचित् स्नायान्न निशायां कदाचन । स्नात्वा च नावमृज्येत गात्राणि सुविचक्षण:
ভীষ্ম বললেন— জ্ঞানী ব্যক্তি কখনও নগ্ন হয়ে স্নান করবে না, আর কখনও রাত্রিতে স্নানও করবে না। স্নানান্তে বিচক্ষণ ব্যক্তি তেল প্রভৃতি দিয়ে অঙ্গমর্দন করবে না।
Verse 52
न चानुलिम्पेदस्नात्वा स्नात्वा वासो न निर्धुनेत् । न चैवार्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:
ভীষ্ম বললেন— স্নান না করে চন্দন বা অঙ্গরাগ প্রভৃতি শরীরে মাখবে না। স্নানান্তে ভেজা বস্ত্র ঝটকা দিয়ে ঝাড়বে না। আর মানুষ যেন অভ্যাসবশে ভেজা কাপড় পরিধান না করে।
Verse 53
स्रजश्न नावकृष्येत न बहिर्धारयीत च । उदक्यया च सम्भाषां न कुर्वीत कदाचन,गलेमें पड़ी हुई मालाको कभी न खींचे। उसे कपड़ेके ऊपर न धारण करे। रजस्वला सत्रीके साथ कभी बातचीत न करे
ভীষ্ম বললেন— গলায় পরা মালা কখনও টানবে না, আর তা বস্ত্রের উপর বাইরে প্রদর্শন করে পরবে না। এবং ঋতুমতী নারীর সঙ্গে কখনও কথাবার্তা বলবে না।
Verse 54
नोत्सूजेत पुरीषं च क्षेत्रे ग्रामस्य चान्तिके । उभे मूत्रपुरीषे तु नाप्सु कुर्यात् कदाचन,बोये हुए खेतमें, गाँवके आस-पास तथा पानीमें कभी मल-मूत्रका त्याग न करे
ভীষ্ম বললেন— বোনা ক্ষেতে এবং গ্রামের নিকটে মলত্যাগ করবে না। আর মূত্র ও মল—উভয়ই কখনও জলে ত্যাগ করবে না।
Verse 55
(देवालये5थ गोवन्दे चैत्ये सस्येषु विश्रमे । भक्ष्यान् भूक्त्वा क्षुतेअध्वानं गत्वा मूत्रपुरीषयो: ।।
ভীষ্ম বললেন— দেবালয়ের নিকটে, গোরক্ষার স্থানে, চৈত্য/তীর্থে, পূজাসংযুক্ত বৃক্ষের কাছে, বিশ্রামস্থানের সন্নিকটে এবং শস্যে ভরা ক্ষেতেও মূত্র-মল ত্যাগ করা উচিত নয়। ভোজনের পরে, হাঁচি এলে, পথে চলার পরে এবং মূত্র-মল ত্যাগের পরে বিধিমতো শুদ্ধি করে দু’বার আচমন করবে—এমন পরিমাণ জল পান করবে যেন তা হৃদয় পর্যন্ত পৌঁছায়। যে ভোজন করতে উদ্যত, সে মুখে তিনবার জল স্পর্শ (আচমন) করবে; ভোজনান্তেও তদ্রূপ তিনবার আচমন করবে এবং পরে দু’বার মুখ মুছবে।
Verse 56
प्राडमुखो नित्यमश्रीयाद् वाग्यतो5न्नमकुत्सयन् । प्रस्कन्दयेच्च मनसा भुक्त्वा चाग्निमुपस्पृशेत्
ভীষ্ম বললেন— আহারকারী ব্যক্তি প্রতিদিন পূর্বমুখে নীরবে ও সংযমে আহার করবে। পরিবেশিত অন্নের নিন্দা করবে না। সামান্য অংশ অখাদ্য রেখে দেবে এবং আহারশেষে মনে মনে পবিত্র অগ্নির স্মরণ করবে।
Verse 57
आयुष्य॑ प्राड्मुखो भुड्क्ते यशस्यं दक्षिणामुख: । धन्य पश्चान्मुखो भुड्क्ते ऋतं भुड्क्ते उदडमुख:
ভীষ্ম বললেন— পূর্বমুখে আহার করলে আয়ু বৃদ্ধি পায়; দক্ষিণমুখে আহার করলে যশ লাভ হয়; পশ্চিমমুখে আহার করলে ধন-সমৃদ্ধি ও মঙ্গল লাভ হয়; আর উত্তরমুখে আহার করলে সত্যের প্রাপ্তি হয়।
Verse 58
जो मनुष्य पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके भोजन करता है, उसे दीर्घायु, जो दक्षिणकी ओर मुँह करके भोजन करता है उसे यश, जो पश्चिमकी ओर मुख करके भोजन करता है उसे धन और जो उत्तराभिमुख होकर भोजन करता है उसे सत्यकी प्राप्ति होती है ।।
ভীষ্ম বললেন— যে পূর্বমুখে আহার করে সে দীর্ঘায়ু লাভ করে; যে দক্ষিণমুখে আহার করে সে যশ পায়; যে পশ্চিমমুখে আহার করে সে ধন লাভ করে; আর যে উত্তরমুখে আহার করে সে সত্য লাভ করে। এরপর অগ্নি স্পর্শ করে জল দ্বারা সকল প্রাণশক্তি (ইন্দ্রিয়), সমগ্র দেহ, নাভি এবং দুই তালু স্পর্শ করে শুদ্ধি সাধন করবে।
Verse 59
नाधितिषछेत् तुषं जातु केशभस्मकपालिका: । अन्यस्य चाप्यवस्नातं दूरत: परिवर्जयेत्,भूसी, भस्म, बाल और मुर्देकी खोपड़ी आदिपर कभी न बैठे। दूसरेके नहाये हुए जलका दूरसे ही त्याग कर दे
ভীষ্ম বললেন— তুষ (ভূসি), চুল, ভস্ম বা খুলি ইত্যাদির উপর কখনও বসবে না। আর অন্যের স্নান-জল দূর থেকেই পরিহার করবে—তার থেকে দূরে থাকবে।
Verse 60
शान्तिहोमांश्व॒ कुर्वीत सावित्राणि च धारयेत् । निषण्णश्नापि खादेत न तु गच्छन् कदाचन
ভীষ্ম বললেন— শান্তিহোম সম্পাদন করবে এবং সাবিত্রী (গায়ত্রী) প্রভৃতি মন্ত্রের জপ-স্বাধ্যায় বজায় রাখবে। আহার সর্বদা বসে করবে; চলতে চলতে কখনও আহার করবে না।
Verse 61
मूत्रं नोत्तिषठतता कार्य न भस्मनि न गोव्रजे । आर्द्रपादस्तु भुंजीत नार्द्रपादस्तु संविशेत्,खड़ा होकर पेशाब न करे। राखमें और गोशालामें भी मूत्र त्याग न करे, भीगे पैर भोजन तो करे, परंतु शयन न करे
ভীষ্ম বললেন— দাঁড়িয়ে প্রস্রাব করা উচিত নয়; ছাইয়ের উপর বা গোয়ালঘরের ভিতরেও প্রস্রাব করা উচিত নয়। পা ভেজা থাকলে আহার করা যায়, কিন্তু ভেজা পায়ে শয়ন করা উচিত নয়।
Verse 62
आर्द्रपादस्तु भुंजानो वर्षाणां जीवते शतम् । त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट आलभेत कदाचन
ভীষ্ম বললেন— ভেজা পায়ে আহার করলে মানুষ শতবর্ষ বাঁচে। কিন্তু অশুচি (উচ্ছিষ্ট) অবস্থায় তিন প্রকার তেজ/অগ্নিকে কখনও স্পর্শ বা প্রয়োগ করা উচিত নয়।
Verse 63
त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट उदीक्षेत्र कदाचन
ভীষ্ম বললেন— হে অনুচ্ছিষ্ট! তিন প্রকার তেজকে কখনও তাচ্ছিল্যভরে দৃষ্টিপাত করো না।
Verse 64
ऊर्ध्व प्राणा ह्ुत्क्रामन्ति यून: स्थविर आयति
ভীষ্ম বললেন— যুবকের প্রাণ ঊর্ধ্বদিকে উঠে দ্রুত প্রস্থান করতে উদ্যত হয়; বৃদ্ধের প্রাণ ধীরে চলে এবং কষ্টে আসা-যাওয়া করে।
Verse 65
प्रत्युत्थानाभिवादा भ्यां पुनस्तान् प्रतिपद्यते । वृद्ध पुरुषके आनेपर तरुण पुरुषके प्राण ऊपरकी ओर उठने लगते हैं। ऐसी दशामें जब वह खड़ा होकर वृद्ध पुरुषोंका स्वागत और उन्हें प्रणाम करता है, तब वे प्राण पुनः पूर्वावस्थामें आ जाते हैं |। ६४ ई ।।
ভীষ্ম বললেন— উঠে অভ্যর্থনা করা ও প্রণাম নিবেদন করার দ্বারা সেই প্রাণশক্তি আবার পূর্বাবস্থায় ফিরে আসে। অতএব বৃদ্ধদের প্রণাম করবে এবং নিজে তাদের আসন দেবে।
Verse 66
कृतांजलिरुपासीत गच्छन्तं पृष्ठतो5न्वियात् । इसलिये जब कोई वृद्ध पुरुष अपने पास आवे, तब उसे प्रणाम करके बैठनेकी आसन दे और स्वयं हाथ जोड़कर उसकी सेवामें उपस्थित रहे। फिर जब वह जाने लगे, तब उसके पीछे-पीछे कुछ दूरतक जाय ।।
ভীষ্ম বললেন—বৃদ্ধের কাছে করজোড়ে বিনীতভাবে সেবায় উপস্থিত থাকবে; আর তিনি প্রস্থান করলে কিছুদূর পর্যন্ত তাঁর পেছনে পেছনে যাবে। তাঁর থেকে পৃথক আসনে বসবে না, পৃথক পাত্রও ব্যবহার করবে না—এতেই জ্যেষ্ঠের প্রতি নম্রতা ও সেবাভাব রক্ষা হয়।
Verse 67
स्वप्तव्यं नैव नग्नेन न चोच्छिष्टोडपि संविशेत्
ভীষ্ম বললেন—নগ্ন হয়ে শয়ন করবে না, এবং উচ্ছিষ্ট (অশুচি) অবস্থায়ও শুয়ে বিশ্রাম নেবে না। এ বিধান দেহসংযম ও দৈনন্দিন শৌচাচারের শিক্ষা দেয়।
Verse 68
उच्छिष्टो न स्पृशेच्छीर्ष सर्वे प्राणास्तदा श्रया: । नंगे होकर न सोये। उच्छिष्ट अवस्थामें भी शयन न करे। जूठे हाथसे मस्तकका स्पर्श न करे; क्योंकि समस्त प्राण मस्तकके ही आश्रित हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—উচ্ছিষ্ট হাতে মস্তক স্পর্শ করবে না; কারণ সকল প্রাণশক্তির আশ্রয় মস্তকেই বলা হয়েছে। অতএব চুল ধরে টানা এবং মাথায় আঘাত করা—এসব পরিত্যাগ করবে।
Verse 69
न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मन: शिर: । न चाभीक्ष्णं शिर: स्नायात् तथास्यायुर्न रिष्यते
ভীষ্ম বললেন—দুই হাত একত্র করে মাথা চুলকাবে না, এবং বারবার মস্তক স্নান করাবে বা ভিজিয়ে দেবে না। এই সংযম মানলে মানুষের আয়ু ক্ষয় হয় না।
Verse 70
शिर:स्नातस्तु तैलैश्व नांगं किंचिदपि स्पृशेत् । तिलसृष्टं न चाश्नीयात् तथास्यायुर्न रिष्यते
ভীষ্ম বললেন—মস্তক স্নান করে তেল লাগানোর পর সেই হাত দিয়ে শরীরের অন্য অঙ্গ স্পর্শ করবে না; এবং তিলজাত খাদ্যও গ্রহণ করবে না। এই সংযম মানলে মানুষের আয়ু ক্ষয় হয় না।
Verse 71
नाध्यापयेत् तथोच्छिष्टो नाधीयीत कदाचन । वाते च पूतिगन्धे च मनसापि न चिन्तयेत्
যে উচ্ছিষ্ট (জুঠো-মুখ) অবস্থায় থাকে, সে যেন বেদপাঠ না শেখায় এবং কখনও স্বাধ্যায়ও না করে। দুর্গন্ধযুক্ত বাতাস বইলে মনেও পাঠের চিন্তা করা উচিত নয়।
Verse 72
अत्र गाथा यमोदगीता: कीर्तयन्ति पुराविद: । आयुरस्य निकृन्तामि प्रजास्तस्थाददे तथा
এ বিষয়ে প্রাচীন কাহিনির জ্ঞানীরা যমের গীত গাথা আবৃত্তি করেন—“আমি তার আয়ু ছেঁটে দিই, আর তার সন্তানসন্ততিও কেড়ে নিই।”
Verse 73
उच्छिष्टो यः प्राद्रवति स्वाध्यायं चाधिगच्छति । यश्चानध्यायकाले5पि मोहादभ्यस्यति द्विज:
যে উচ্ছিষ্ট অবস্থায় দৌড়াদৌড়ি করে স্বাধ্যায়ে প্রবৃত্ত হয়, আর যে দ্বিজ মোহবশে অনধ্যায়-কালে পর্যন্ত অধ্যয়ন করে—
Verse 74
तस्य वेद: प्रणश्येत आयुश्च परिहीयते । तस्माद् युक्तो हानध्याये नाधीयीत कदाचन
তার বেদ (জ্ঞানফল) নষ্ট হয় এবং আয়ুও ক্ষয় পায়। অতএব সংযমী ব্যক্তি অনধ্যায়-কালে কখনও অধ্যয়ন করবে না।
Verse 75
प्रत्यादित्य॑ प्रत्यनलं प्रति गां च प्रति द्विजान् ये मेहन्ति च पन्थानं ते भवन्ति गतायुष:
যারা সূর্যের দিকে, অগ্নির দিকে, গাভীর দিকে এবং ব্রাহ্মণদের দিকে মুখ করে মূত্রত্যাগ করে, আর যারা পথের মাঝখানে প্রস্রাব করে—তারা সকলেই অল্পায়ু হয়।
Verse 76
उभे मूत्रपुरीषे तु दिवा कुर्यादुदड्मुख: । दक्षिणाभिमुखो रात्रौ तथा ह्ायुर्न रिष्यते,मल और मूत्र दोनोंका त्याग दिनमें उत्तराभिमुख होकर करे और रातमें दक्षिणाभिमुख। ऐसा करनेसे आयुका नाश नहीं होता
ভীষ্ম বললেন—দিনে উত্তরমুখে এবং রাতে দক্ষিণমুখে মূত্র ও বিষ্ঠা ত্যাগ করা উচিত; এই সদাচার মানলে আয়ু ক্ষয় হয় না।
Verse 77
त्रीन् कृशान् नावजानीयाद् दीर्घमायुर्जिजीविषु: । ब्राह्मण क्षत्रियं सर्प सर्वे ह्याशीविषास्त्रय:
ভীষ্ম বললেন—যে দীর্ঘায়ু কামনা করে, সে তিন ‘দুর্বল’কে কখনও অবজ্ঞা করবে না—ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও সাপ; কারণ এ তিনজনই প্রকৃতপক্ষে বিষধর সাপের মতো।
Verse 78
जिसे दीर्घ कालतक जीवित रहनेकी इच्छा हो, वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प--इन तीनोंके दुर्बल होनेपर भी इनको न छेड़े; क्योंकि ये सभी बड़े जहरीले होते हैं ।।
ভীষ্ম বললেন—যে দীর্ঘায়ু কামনা করে, সে ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও সাপ—এ তিনজনকে দুর্বল মনে হলেও উসকাবে না; কারণ এ তিনজনই নিজ নিজ রূপে ভীষণ ঘাতক। ক্রুদ্ধ সাপ যতদূর চোখ যায় ততদূর ঝাঁপিয়ে দংশন করে; ক্রুদ্ধ ক্ষত্রিয় তার বীর্য-তেজে শত্রুকে ভস্ম করতে উদ্যত হয়; আর ব্রাহ্মণ ক্রুদ্ধ হলে দৃষ্টি ও সংকল্পের বলেই অপমানকারীর সমগ্র বংশকে দগ্ধ করতে পারে। অতএব জ্ঞানী ব্যক্তি যত্নসহকারে এ তিনজনকে সম্মান ও সেবা করবে।
Verse 79
ब्राह्मणस्तु कुलं हन्याद् ध्यानेनावेक्षितेन च । तस्मादेतत् त्रयं यत्नादुपसेवेत पण्डित:
ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণ ধ্যান ও স্থির দৃষ্টিমাত্রেই কারও বংশ ধ্বংস করতে পারেন; অতএব পণ্ডিতের উচিত, যত্নসহকারে সেই তিনজনের প্রতি যথোচিত সম্মান ও সতর্কতা রাখা।
Verse 80
गुरुणा चैव निर्बन्धो न कर्तव्य: कदाचन । अनुमान्य: प्रसाद्यश्न गुरु: क्रुद्धो युधिष्ठिर
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির, গুরুর সঙ্গে কখনও জেদ বা বিতর্কে জড়ানো উচিত নয়; গুরু ক্রুদ্ধ হলেও যথোচিত সম্মান রেখে তাঁকে প্রসন্ন করে মিলন-সুলভ আচরণই করা উচিত।
Verse 81
गुरुके साथ कभी हठ नहीं ठानना चाहिये। युधिष्ठिर! यदि गुरु अप्रसन्न हों तो उन्हें हर तरहसे मान देकर मनाकर प्रसन्न करनेकी चेष्टा करनी चाहिये ।।
গুরুর সঙ্গে কখনও জেদ করে বিরোধ করা উচিত নয়। হে যুধিষ্ঠির! গুরু যদি অসন্তুষ্ট হন, তবে সর্বপ্রকার যথোচিত সম্মান দিয়ে তাঁকে তুষ্ট ও প্রসন্ন করার চেষ্টা করা উচিত। গুরু সঠিক বা ভুল পথে চলছেন বলে মনে হলেও, এ জগতে তাঁর প্রতি যথাযথ আচরণই কর্তব্য; কারণ গুরুনিন্দা মানুষের আয়ু দগ্ধ করে—এ বিষয়ে সন্দেহ নেই।
Verse 82
दूरादावसथान्मूत्रं दूरात् पादावसेचनम् | उच्छिष्टोत्सर्जनं चैव दूरे कार्य हितैषिणा,अपना हित चाहनेवाला मनुष्य घरसे दूर जाकर पेशाब करे, दूर ही पैर धोवे और दूरपर ही जूठे फेंके
যে নিজের মঙ্গল চায়, সে গৃহ থেকে দূরে গিয়ে মূত্রত্যাগ করবে, দূরেই পা ধোবে, এবং উচ্ছিষ্ট/অশুদ্ধ অবশিষ্টও দূরে ফেলে দেবে।
Verse 83
रक्तमाल्यं न धार्य स्याच्छुक्लं धार्य तु पण्डितै: । वर्जयित्वा तु कमलं तथा कुवलयं प्रभो
হে প্রভু! পণ্ডিতজনের উচিত লাল ফুলের মালা না পরে শ্বেত পুষ্পের মালা ধারণ করা। তবে পদ্ম ও কুবলয় (নীলপদ্ম) ব্যতিক্রম—সেগুলি লালাভ হলেও ধারণে দোষ নেই।
Verse 84
रक्त शिरसि धार्य तु तथा वानेयमित्यपि । कांचनीयापि माला या न सा दुष्यति कहिचित्,लाल रंगके फूल तथा वन्य पुष्पको मस्तकपर धारण करना चाहिये। सोनेकी माला पहननेसे कभी अशुद्ध नहीं होती
লাল রঙের ফুল এবং বনফুলও মস্তকে ধারণ করা যায়। আর স্বর্ণের মালা কখনও অশুদ্ধ হয় না।
Verse 85
स्नातस्य वर्णकं नित्यमार्द्र दद्याद् विशाम्पते | विपर्ययं न कुर्वीत वाससो बुद्धिमान् नर:
হে প্রজানাথ! স্নানের পর মানুষকে নিত্য কপালে ভেজা চন্দনাদি সুগন্ধি লেপ লাগানো উচিত। বুদ্ধিমান ব্যক্তি বস্ত্র পরিধানে উলট-পালট করবে না—অর্থাৎ উপরের বস্ত্রকে নিচের বস্ত্রের স্থানে, আর নিচের বস্ত্রকে উপরের স্থানে পরবে না।
Verse 86
तथा नान्यधूृतं धार्य न चापदशमेव च । अन्यदेव भवेद् वास: शयनीये नरोत्तम
ভীষ্ম বললেন—অন্যের পরিধেয় বস্ত্র পরিধান করা উচিত নয়; বিপদের সময়েও নয়। উত্তম পুরুষের শয়নবস্ত্র পৃথক হওয়া উচিত।
Verse 87
प्रियंगुचन्दना भ्यां च बिल्वेन तगरेण च
ভীষ্ম বললেন—(পূজা) প্রিয়ঙ্গু ও চন্দন দিয়ে, এবং বিল্ব ও তগর দিয়েও করা উচিত।
Verse 88
पृथगेवानुलिम्पेत केसरेण च बुद्धिमान् । बुद्धिमान् पुरुष राई, चन्दन, बिल्व, तगर तथा केसरके द्वारा पृथक्ू-पृथक् अपने शरीरमें उबटन लगावे ।। उपवासं च कुर्वीत स्नात: शुचिरलंकृत:
ভীষ্ম বললেন—বুদ্ধিমান ব্যক্তি কেশর প্রভৃতি সুগন্ধি দ্রব্য দিয়ে পৃথক পৃথকভাবে দেহে অনুলেপন করবে। স্নান করে শুচি ও অলংকৃত হয়ে উপবাসও পালন করবে।
Verse 89
पर्वकालेषु सर्वेषु ब्रहद्मयचारी सदा भवेत् | मनुष्य सभी पर्वोके समय स्नान करके पवित्र हो वस्त्र एवं आभूषणोंसे विभूषित होकर उपवास करे तथा पर्वकालमें सदा ही ब्रह्मचर्यका पालन करे ।।
ভীষ্ম বললেন—হে জনেশ্বর! সকল পার্বণকালে স্নান করে শুচি হয়ে নির্মল বস্ত্র ও অলংকার ধারণ করে উপবাস করবে এবং সর্বদা ব্রহ্মচর্য পালন করবে। একই পাত্রে অন্যের সঙ্গে আহার করবে না। ঋতুমতী নারীর স্পর্শে অপবিত্র অন্ন কখনও খাবে না; যার সার নিঃশেষে নেওয়া হয়েছে তাও খাবে না; আর যে ব্যক্তি আকুল দৃষ্টিতে অন্নের দিকে চেয়ে আছে, তাকে না দিয়ে আহার করবে না।
Verse 90
नालीढया परिहतं भक्षयीत कदाचन । तथा नोद्धृतसाराणि प्रेक्ष्यते नाप्रदाय च
ভীষ্ম বললেন—হে জনেশ্বর! ঋতুমতী নারীর স্পর্শে অপবিত্র অন্ন কখনও খাবে না। যার সার তুলে নেওয়া হয়েছে তাও খাবে না। আর যে ব্যক্তি আকুল দৃষ্টিতে অন্নের দিকে চেয়ে আছে, তাকে না দিয়ে আহার করবে না।
Verse 91
न संनिकृष्टे मेधावी नाशुचेर्न च सत्सु च | प्रतिषिद्धान् नधर्मेषु भक्ष्यान् भुज्जीत पृष्ठत:
বুদ্ধিমান ব্যক্তি যেন অপবিত্র মানুষের একেবারে কাছে বসে, কিংবা সজ্জনদের সামনে বসে আহার না করে। আর ধর্মশাস্ত্রে নিষিদ্ধ, অধর্মসংশ্লিষ্ট খাদ্য সে যেন পিঠ ফিরিয়ে গোপনে হলেও না খায়।
Verse 92
पिप्पलं च वर्ट चैव शणशाकं तथैव च । उदुम्बरं न खादेच्च भवार्थी पुरुषोत्तम:,अपना कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पीपल, बड़ और गूलरके फलका तथा सनके सागका सेवन नहीं करना चाहिये
হে পুরুষোত্তম! যে ব্যক্তি নিজের কল্যাণ কামনা করে, সে যেন পিপ্পল, বট ও উদুম্বরের ফল এবং শণশাক ভক্ষণ না করে।
Verse 93
न पाणौ लवणं दिद्वान् प्राश्नीयान्न च रात्रिषु दधिसक्तून् न भुज्जीत वृथा मांसं च वर्जयेत्
জ্ঞানী ব্যক্তি যেন হাতের তালুতে লবণ রেখে চেটে না খায়। রাত্রে দই ও সত্তু ভক্ষণ না করে। আর মাংসকে অনুচিত আহার জেনে সম্পূর্ণ ত্যাগ করে।
Verse 94
प्रतिदिन सबेरे और शामको ही एकाग्रचित्त होकर भोजन करे। बीचमें कुछ भी खाना उचित नहीं है। जिस भोजनमें बाल पड़ गया हो, उसे न खाय तथा शत्रुके श्राद्धमें कभी अन्न न ग्रहण करे
প্রতিদিন প্রাতে ও সন্ধ্যায় একাগ্রচিত্তে আহার করবে; মাঝখানে কিছু খাওয়া উচিত নয়। যে খাদ্যে চুল পড়েছে তা খাবে না; আর শত্রুর শ্রাদ্ধে কখনও অন্ন গ্রহণ করবে না।
Verse 95
वाग्यतो नैकवस्त्रश्ष नासंविष्ट: कदाचन । भूमौ सदैव नाश्नीयान्नानासीनो न शब्दवत्
ভোজনকালে বাক্সংযম করে নীরব থাকা উচিত। একটিমাত্র বস্ত্র পরে বা শুয়ে কখনও আহার করবে না। খাদ্য মাটির উপর রেখে কখনও খাবে না। দাঁড়িয়ে, অশোভন ভঙ্গিতে বসে, কিংবা শব্দ করে/কথা বলতে বলতে কখনও আহার করবে না।
Verse 96
तोयपूर्व प्रदायान्नमतिथि भ्यो विशाम्पते । पश्चाद् भुञज्जीत मेधावी न चाप्यन्यमना नर:
ভীষ্ম বললেন—হে প্রজাপতি! প্রথমে অতিথিদের জল অর্পণ করে পরে অন্ন প্রদান করতে হবে। তারপরই জ্ঞানী ব্যক্তি নিজে আহার করবে, এবং আহারের সময় মন যেন বিচলিত না হয়।
Verse 97
प्रजानाथ! बुद्धिमान् पुरुष पहले अतिथिको अन्न और जल देकर पीछे स्वयं एकाग्रचित्त हो भोजन करे ।।
ভীষ্ম বললেন—হে প্রজানাথ! জ্ঞানী ব্যক্তি প্রথমে অতিথিকে অন্ন ও জল দেবে, তারপর একাগ্রচিত্তে নিজে আহার করবে। আর হে নরেশ্বর! এক সারিতে বসে ভোজন হলে সকলকে সমানভাবে অন্ন পরিবেশন করা উচিত। যে সুহৃদজনকে না দিয়ে একা খায়, সে যেন মরণঘাতী হালাহল বিষই ভক্ষণ করে।
Verse 98
पानीयं पायसं सक्तून् दथिसर्पिमि धून्यपि । निरस्य शेषमन्येषां न प्रदेयं तु कस्यचित्,पानी, खीर, सत्तू, दही, घी और मधु--इन सबको छोड़कर अन्य भक्ष्य पदार्थोंका अवशिष्ट भाग दूसरे किसीको नहीं देना चाहिये
ভীষ্ম বললেন—পানি, ক্ষীর, সত্তু, দই, ঘি ও মধু—এগুলো আলাদা করে রেখে দান করা যায়; কিন্তু অন্যান্য খাদ্যদ্রব্যের উচ্ছিষ্ট বা অবশিষ্ট অংশ কাউকে দেওয়া উচিত নয়।
Verse 99
भुज्जानो मनुजव्याप्र नैव शंकां समाचरेत् । दधि चाप्यनुपान वै न कर्तव्यं भवार्थिना
ভীষ্ম বললেন—হে মনুষ্যব্যাঘ্র! আহারকালে খাদ্য সম্বন্ধে সন্দেহ করা উচিত নয়। আর যে নিজের মঙ্গল চায়, সে ভোজনের শেষে দইকে পানীয় (অনুপান) হিসেবে গ্রহণ করবে না।
Verse 100
आचम्य चैकहस्तेन परिप्लाव्यं तथोदकम् । अंगुष्ठं चरणस्याथ दक्षिणस्यावसेचयेत्
ভীষ্ম বললেন—এক হাতে আচমন করে, তদ্রূপ জল মুখে ঘুরিয়ে কুলকুচি করবে। তারপর ডান পায়ের বৃদ্ধাঙ্গুলিতে জল ঢালবে।
Verse 101
भोजन करनेके पश्चात् कुल्ला करके मुँह धो ले और एक हाथसे दाहिने पैरके अँगूठेपर पानी डाले ।।
ভীষ্ম বললেন—ভোজনের পরে কুলি করে মুখ ধুয়ে নেবে; তারপর এক হাতে ডান পায়ের বৃদ্ধাঙ্গুষ্ঠে জল ঢালবে। এরপর একাগ্রচিত্ত হয়ে করতল মস্তকে স্থাপন করে মনে মনে পবিত্র অগ্নিকে স্পর্শ (শ্রদ্ধায় স্মরণ) করবে। এই বিধিতে পারদর্শী ব্যক্তি আত্মীয়দের মধ্যে শ্রেষ্ঠত্ব লাভ করে।
Verse 102
अद्विः प्राणान् समालभ्य नाभिं पाणितले तथा | स्पृशंश्वैव प्रतिछ्ेत न चाप्याद्रेण पाणिना
এরপর জল দিয়ে চোখ, নাক প্রভৃতি ইন্দ্রিয় এবং নাভি স্পর্শ করবে, আর দুই হাতের তালু ধুয়ে নেবে। ধোয়ার পরে ভেজা হাতে বসবে না; বস্ত্র দিয়ে মুছে হাত শুকিয়ে নেবে।
Verse 103
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अंतर्गत दानधर्मपर्वमें ब्रह्मा और भगीरथका संवादविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ
বৃদ্ধাঙ্গুষ্ঠের মূলদেশের ফাঁককে ‘ব্রাহ্ম-তীর্থ’ বলা হয়েছে। আর কনিষ্ঠা (ছোট আঙুল)-এর পশ্চাৎ/উর্ধ্ব-পশ্চাৎ অংশকে এখানে ‘দেব-তীর্থ’ বলা হয়।
Verse 104
अड््गुष्ठस्य च यन्मध्यं प्रदेशिन्याश्व॒ भारत । तेन पित्र्याणि कुर्वीत स्पृष्टवापो न्न्यायत: सदा
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! বৃদ্ধাঙ্গুষ্ঠ ও তর্জনীর মধ্যবর্তী স্থানকে ‘পিতৃ-তীর্থ’ বলা হয়। সেই স্থান দিয়ে শাস্ত্রবিধি অনুসারে জল গ্রহণ করে সর্বদা পিতৃকার্য সম্পাদন করা উচিত।
Verse 105
परापवाद न ब्रूयान्नाप्रियं च कदाचन । न मन्यु: कश्रिदुत्पाद्य: पुरुषेण भवार्थिना
ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি নিজের সত্য কল্যাণ কামনা করে, সে কখনও অন্যের নিন্দা করবে না, কখনও অপ্রিয় কঠোর বাক্য বলবে না। আর নিজের আচরণে কারও মনে ক্রোধও জাগাবে না।
Verse 106
पतितैस्तु कथां नेच्छेद् दर्शनं च विवर्जयेत् । संसर्ग च न गच्छेत तथा<<युर्विन्दते महत्
ভীষ্ম বললেন—পতিত (নীতিভ্রষ্ট) লোকদের সঙ্গে কথাবার্তা চাইবে না, তাদের দর্শনও পরিহার করবে এবং তাদের সঙ্গেও মিশবে না। এই সংযমে মানুষ দীর্ঘায়ু লাভ করে।
Verse 107
न दिवा मैथुन गच्छेन्न कन्यां न च बन्धकीम् | न चास्नातां स्त्रियं गच्छेत् तथायुर्विन्दते महत्
ভীষ্ম বললেন—দিনের বেলায় মৈথুন করবে না; কুমারী কন্যার কাছে যাবে না, দাসী/বন্দিনী নারীর কাছেও নয়। যে নারী স্নান করেনি, তার কাছেও যাবে না। এভাবে সংযম মানলে মানুষ দীর্ঘায়ু লাভ করে।
Verse 108
दिनमें कभी मैथुन न करे। कुमारी कन्या और कुलटाके साथ कभी समागम न करे। अपनी पत्नी भी जबतक ऋतुस्नाता न हो तबतक उसके साथ समागम न करे। इससे मनुष्यको बड़ी आयु प्राप्त होती है ।।
ভীষ্ম বললেন—দিনের বেলায় কখনও মৈথুন করবে না। কুমারী কন্যা ও কুলটা নারীর সঙ্গে কখনও সঙ্গম করবে না। নিজের স্ত্রীকেও ঋতুস্নাতা না হওয়া পর্যন্ত কাছে যাবে না। এতে মানুষ দীর্ঘায়ু লাভ করে। আর কাজ উপস্থিত হলে নিজ নিজ তীর্থে আচমন করে তিনবার জল পান করবে এবং দুবার ঠোঁট মুছবে; এতে মানুষ শুচি হয়।
Verse 109
इन्द्रियाणि सकृत्स्पृश्य त्रिरभ्युक्ष्य च मानव: । कुर्वीत पित्र्यं दैवं च वेददृष्टेन कर्मणा
ভীষ্ম বললেন—প্রথমে একবার চোখ প্রভৃতি ইন্দ্রিয় স্পর্শ করে, তারপর তিনবার নিজের উপর জল ছিটাবে। এরপর বেদবিধি অনুসারে দেবযজ্ঞ ও পিতৃযজ্ঞ সম্পাদন করবে।
Verse 110
कुरुनन्दन! अब ब्राह्मणके लिये भोजनके आदि और अन्तमें जो पवित्र एवं हितकारक शुद्धिका विधान है, उसे बता रहा हूँ, सुनो
ভীষ্ম বললেন—হে কুরু-নন্দন, শোনো। এখন আমি ব্রাহ্মণের জন্য ভোজনের শুরুতে ও শেষে যে পবিত্র ও কল্যাণকর শৌচবিধান আছে, তা বলছি।
Verse 111
सर्वशौचेषु ब्राह्ेण तीर्थेन समुपस्पृशेत् । निष्ठीव्य तु तथा क्षुत्त्वा स्पृश्यापो हि शुचिर्भवेत्
ভীষ্ম বললেন—সমস্ত শৌচকর্মে ব্রাহ্ম-তীর্থে আচমন করা উচিত। তদ্রূপ থুথু ফেলা বা হাঁচি দেওয়ার পরে জল স্পর্শ করে (আচমন করে) মানুষ পুনরায় শুচি হয়।
Verse 112
ब्राह्मणको प्रत्येक शुद्धिके कार्यमें ब्राह्मतीर्थसी आचमन करना चाहिये। थूकने और छींकनेके बाद झलका स्पर्श (आचमन) करनेसे वह शुद्ध होता है ।।
ভীষ্ম বললেন—প্রত্যেক শুদ্ধিকর্মে ব্রাহ্মণকে ব্রাহ্ম-তীর্থে আচমন করা উচিত। থুথু ফেলা বা হাঁচি দেওয়ার পরে কেবল জল-স্পর্শ—অর্থাৎ আচমন—করলেই সে পুনরায় শুচি হয়। তদ্রূপ বৃদ্ধ আত্মীয়, দরিদ্র বন্ধু এবং সৎকুলজাত বিদ্বান ব্যক্তি যদি নিঃস্ব হয়ে পড়ে, তবে সাধ্য অনুযায়ী তাদের রক্ষা করা উচিত। তাদের নিজ গৃহে আশ্রয় দিলে ধন ও আয়ু বৃদ্ধি পায়।
Verse 113
गृहे पारावता धन्या: शुकाश्न सहसारिका: । गृहेष्वेते न पापाय तथा वै तैलपायिका:,(देवता प्रतिमा55दर्शाश्वन्दना: पुष्पवल्लिका: । शुद्ध जल॑ सुवर्ण च रजतं गृहमंगलम् ।।
ভীষ্ম বললেন—গৃহে ঘুঘু শুভ, তদ্রূপ টিয়া ও শালিকাও শুভ। এদের গৃহে থাকা পাপ বা অমঙ্গলের কারণ নয়; ‘তৈলপায়িকা’ নামে যে অশুভ পাখিদের কথা বলা হয়, এরা তাদের মতো নয়। তদ্রূপ দেবমূর্তি, দর্পণ, চন্দন, ফুলের লতা, শুদ্ধ জল, স্বর্ণ ও রৌপ্য—এসবই গৃহের মঙ্গলবর্ধক।
Verse 114
उद्दीपकाश्न गृध्राश्ष॒ कपोता भ्रमरास्तथा | निविशेयुर्यदा तत्र शान्तिमेव तदा55चरेत् । अमंगल्यानि चैतानि तथाक्रोशो महात्मनाम्
ভীষ্ম বললেন—যদি কখনও উদ্দীপক-পাখি, শকুন, বন্য কবুতর ও ভ্রমর প্রভৃতি গৃহে প্রবেশ করে, তবে তখন কেবল শান্তিকর্মই করা উচিত; কারণ এগুলি অমঙ্গলসূচক বলে গণ্য। তদ্রূপ মহাত্মাদের নিন্দাও মানুষের অকল্যাণ ডেকে আনে।
Verse 115
महात्मनो5तिगुह्यानि न वक्तव्यानि कर्िचित् । अगम्याक्ष न गच्छेत राज्ञ: पत्नी सखीस्तथा
ভীষ্ম বললেন—মহাত্মা পুরুষদের অতি গোপন বিষয় কখনও প্রকাশ করা উচিত নয়। যে নারীরা ‘অগম্যা’ (যাদের নিকট গমন নিষিদ্ধ), তাদের কাছে কখনও যাওয়া বা তাদের সঙ্গে সঙ্গ করা উচিত নয়। বুদ্ধিমান ব্যক্তি রাজপত্নী ও রাজার সখীদের নিকটও গমন করবে না।
Verse 116
वैद्यानां बालवृद्धानां भृत्यानां च युधिष्ठिर । बन्धूनां ब्राह्मणानां च तथा शारणिकस्य च
ভীষ্ম বললেন— হে যুধিষ্ঠির! চিকিৎসক, শিশু ও বৃদ্ধ, ভৃত্য-পরিজন, আত্মীয়স্বজন, ব্রাহ্মণ এবং শরণাগতদের যথোচিত যত্ন ও আশ্রয়-সহায়তা প্রদান করা উচিত।
Verse 117
सम्बन्धिनां च राजेन्द्र तथा<<युर्विन्दते महत् । राजेन्द्र युधिष्ठिर! वैद्यों, बालकों, वृद्धों, भृत्यों, बन्धुओं, ब्राह्मणों, शरणार्थियों तथा सम्बन्धियोंकी स्त्रियोंक पास कभी न जाय। ऐसा करनेसे दीर्घायु प्राप्त होती है ।।
ভীষ্ম বললেন— হে রাজেন্দ্র! এই সংযমের দ্বারা মহৎ দীর্ঘায়ু লাভ হয়। হে রাজেন্দ্র যুধিষ্ঠির! কামনা বা অনুচিত উদ্দেশ্যে চিকিৎসক, শিশু, বৃদ্ধ, ভৃত্য, আত্মীয়, ব্রাহ্মণ, শরণাগত এবং নিজের সম্পর্কীয়দের স্ত্রীদের নিকট কখনও গমন করবে না। এভাবে আচরণ করলে মানুষ দীর্ঘায়ু লাভ করে।
Verse 118
संध्यायां न स्वपेद् राजन् विद्यां न च समाचरेत्
ভীষ্ম বললেন— হে রাজন! সন্ধিক্ষণে (সন্ধ্যায়) ঘুমাবে না, আর সেই সময় বিদ্যার অধ্যয়ন-অনুশীলনও করবে না।
Verse 183
तस्मात् तिछेत् सदा पूर्वा पश्चिमां चैव वाग्यतः । ग्रहण और मध्याह्नके समय भी सूर्यकी ओर दृष्टिपात न करे तथा जलनमें स्थित सूर्यके प्रतिबिम्बकी ओर भी न देखे। ऋषियोंने प्रतिदिन संध्योपासन करनेसे ही दीर्घ आयु प्राप्त की थी। इसलिये सदा मौन रहकर द्विजमात्रको प्रात:काल और सायंकालकी संध्या अवश्य करनी चाहिये
ভীষ্ম বললেন— অতএব বাক্সংযম ও শিষ্টাচার রক্ষা করে সর্বদা পূর্ব-পশ্চিমের বিধি মান্য করো। গ্রহণকালে ও মধ্যাহ্নে সূর্যের দিকে দৃষ্টি দেবে না, জলেতে প্রতিফলিত সূর্যকেও দেখবে না। ঋষিগণ প্রতিদিন সন্ধ্যোপাসনা করেই দীর্ঘায়ু লাভ করেছিলেন। সুতরাং মৌন ও আত্মসংযম অবলম্বন করে প্রত্যেক দ্বিজের উচিত প্রাতে ও সায়ং সন্ধ্যা-কর্ম অবশ্যই করা।
Verse 196
सर्वास्तान् धार्मिको राजा शूद्रकर्माणि कारयेत् | जो द्विज न तो प्रातःकालकी संध्या करते हैं और न सायंकालकी ही, उन सबसे धार्मिक राजा शूद्रोचित कर्म करावे
ভীষ্ম বললেন— যে দ্বিজেরা না প্রাতে সন্ধ্যা করে, না সায়ং সন্ধ্যা করে, ধর্মপরায়ণ রাজা তাদের সকলকে শূদ্রোচিত কর্মে নিয়োজিত করবে।
Verse 246
नाज्ञातैः सह गच्छेत नैको न वृषलै: सह । मल-मूत्रकी ओर न देखे
অপরিচিত লোকের সঙ্গে যাত্রা করবে না, একা যাবে না, আর নীচ/অধার্মিকদের সঙ্গও করবে না। মল-মূত্রের অশুচি স্থানের দিকে তাকাবে না, তাতে কখনও পা দেবে না। অতিভোরে, সন্ধ্যা পেরিয়ে গভীর গোধূলিতে, এবং ঠিক মধ্যাহ্নকালে বাইরে যাবে না। অপরিচিত পুরুষদের সঙ্গে, শূদ্রদের সঙ্গে, কিংবা একাকী—কোনওভাবেই যাত্রা করবে না।
Verse 256
वृद्धाय भारतप्ताय गर्भिण्यै दुर्बलाय च । ब्राह्मण, गाय, राजा, वृद्ध पुरुष, गर्भिणी स्त्री, दुर्बल और भारपीड़ित मनुष्य यदि सामनेसे आते हों तो स्वयं किनारे हटकर उन्हें जानेका मार्ग देना चाहिये
বৃদ্ধ, ভারাক্রান্ত/কষ্টপীড়িত, গর্ভিণী, দুর্বল—এবং বিশেষভাবে মান্য যেমন ব্রাহ্মণ, গাভী ও রাজা—যদি সম্মুখ থেকে আসেন, তবে নিজে সরে দাঁড়িয়ে তাঁদের পথ দিতে হবে; এটাই ধর্মসম্মত সৌজন্য।
Verse 446
भक्षयेच्छास्त्रदृष्टानि पर्वस्वपि विवर्जयेत् । शास्त्रोंमें जिन काष्ठोंका दाँतन निषिद्ध माना गया है
শাস্ত্রে যে কাঠ দন্তধাবনের জন্য নিষিদ্ধ, তা সর্বদা ত্যাগ করবে। শাস্ত্রসম্মত কাঠ দিয়েই দন্তধাবন করবে; কিন্তু পর্ব/ব্রতদিনে তাও বর্জন করবে।
Verse 456
अकृत्वा देवपूजां च नाचरेद् दन्तधावनम् | सदा एकाग्रचित्त हो दिनमें उत्तरकी ओर मुँह करके ही मल-मूत्रका त्याग करे। दन्तधावन किये बिना देवताओंकी पूजा न करे
দেবপূজা না করে দন্তধাবন করবে না; আবার দন্তধাবন না করে দেবতাদের পূজাও করবে না। সর্বদা একাগ্রচিত্ত হয়ে, দিনে উত্তরমুখে মল-মূত্র ত্যাগ করবে।
Verse 626
आगननिं गां ब्राह्मणं चैव तथा हायुर्न रिष्यते । भीगे पैर भोजन करनेवाला मनुष्य सौ वर्षोतक जीवन धारण करता है। भोजन करके हाथ-मुँह धोये बिना मनुष्य उच्छिष्ट (अपवित्र) रहता है। ऐसी अवस्थामें उसे अग्नि
এই বিধি মানলে আয়ু ক্ষয় হয় না। আহার শেষে হাত-মুখ না ধোয়া পর্যন্ত মানুষ উচ্ছিষ্ট (অপবিত্র) থাকে; সেই অবস্থায় অগ্নি, গাভী ও ব্রাহ্মণ—এই তিন তেজস্বী সত্তাকে স্পর্শ করা উচিত নয়।
Verse 636
सूर्याचन्द्रमसौ चैव नक्षत्राणि च सर्वश: । उच्छिष्ट मनुष्यको सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र--इन त्रिविध तेजोंकी ओर कभी दृष्टि नहीं डालनी चाहिये
উচ্ছিষ্ট অবস্থায় মানুষকে সূর্য, চন্দ্র এবং সর্বপ্রকার নক্ষত্রের দিকে দৃষ্টি দেওয়া উচিত নয়; এই তিনই পবিত্র তেজের আধার, তাই শুচিতা ও সংযমেই তাদের প্রতি শ্রদ্ধা রক্ষা হয়।
Verse 663
नैकवस्त्रेण भोक्तव्यं न नग्न: स्नातुमर्हति । फटे हुए आसनपर न बैठे। फूटी हुई काँसीकी थालीको काममें न ले। एक ही वस्त्र (केवल धोती) पहनकर भोजन न करे (साथमें गमछा भी लिये रहे)। नग्न होकर स्नान न करे
একটিমাত্র বস্ত্র পরে আহার করা উচিত নয়, এবং নগ্ন হয়ে স্নানও করা উচিত নয়। ছেঁড়া আসনে বসবে না, ফাটা কাঁসার থালাও ব্যবহার করবে না—এগুলি লজ্জা, শুচিতা ও সংযম রক্ষার আচরণবিধি।
Verse 863
अन्यद् रथ्यासु देवानामर्चायामन्यदेव हि । नरश्रेष्ठ) दूसरेके पहने हुए कपड़े नहीं पहनने चाहिये। जिसकी कोर फट गयी हो
অন্যের পরিহিত বস্ত্র পরা উচিত নয়, আর যার পাড় ছিঁড়ে গেছে তাও ধারণ করা উচিত নয়। শয়নের জন্য এক বস্ত্র, পথে চলার জন্য আর এক, এবং দেবপূজার জন্য পৃথক বস্ত্র রাখা উচিত—এটাই শুচিতা ও শিষ্টাচার।
Verse 1176
तदावसेत् सदा प्राज्ञो भवार्थी मनुजेश्वर । मनुजेश्वर! अपनी उन्नति चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको उचित है कि ब्राह्मणके द्वारा वास्तुपूजनपूर्वक आरम्भ कराये और अच्छे कारीगरके द्वारा बनाये हुए घरमें सदा निवास करे
হে মনুজেশ্বর! যে জ্ঞানী পুরুষ উন্নতি কামনা করে, তার উচিত ব্রাহ্মণের দ্বারা বাস্তুপূজন করিয়ে নির্মাণ আরম্ভ করা, এবং দক্ষ কারিগরের নির্মিত সুগঠিত গৃহে সদা বাস করা।
Verse 1310
ब्राह्म॒णार्थे च यच्छौचं तच्च मे शृूणु कौरव । पवित्र च हितं चैव भोजनाद्यन्तयोस्तथा
হে কৌরব! ব্রাহ্মণদের নিমিত্ত যে শৌচবিধি, তা আমার মুখে শোনো। তা পবিত্রকর ও কল্যাণকর—বিশেষত ভোজনের আরম্ভ ও অন্তে।
Yudhiṣṭhira seeks a causal account of unequal lifespans—why some die young despite Vedic ideals—and asks which factors (austerity, ritual, medicine, birth, or behavior) truly generate longevity, fame, and prosperity.
Bhīṣma’s core teaching is that ācāra is the decisive instrument: disciplined conduct—truthful, non-violent, restrained, and purity-oriented—produces āyus, śrī, and kīrti more reliably than status claims or isolated techniques.
Yes in functional form: the chapter repeatedly asserts benefit-statements (āyus/śrī/kīrti increase through ācāra; inauspiciousness is removed; misconduct shortens life), framing ethical practice as yielding both social and post-mortem outcomes.