
Adhyāya 57: Tapas–Dāna Phala (On the Fruits of Austerity and Giving)
Upa-parva: Dāna–Tapas Upadeśa (Merit of Austerity and Gifts)
Yudhiṣṭhira voices intense remorse and cognitive disorientation after hearing reflections on the war’s consequences, describing the earth as depleted of prosperous rulers and lamenting the deaths of innumerable men. He worries about the condition of noble women now deprived of husbands, sons, and male kin, and anticipates negative posthumous consequences for having participated in the killing of gurus, relatives, and allies. Seeking expiation, he asks for precise instruction on rigorous tapas. Vaiśaṃpāyana reports Bhīṣma’s measured reply: Bhīṣma frames a ‘secret and wondrous’ teaching on attainments in the afterlife, then enumerates a graded economy of merit. Tapas yields heaven, fame, longevity, enjoyments, knowledge, health, beauty, prosperity, and good fortune; other disciplines (silence, brahmacarya, ahiṃsā, teacher-service, regular śrāddha) produce specific results. The chapter then systematizes dāna: water, food, comfort, light, and items of daily life generate durable reputation and capacities; major gifts—especially cows with ritual embellishments, land, and a brahmadeya maiden—are portrayed as rescuing the donor from dark destinies, likened to a boat in an ocean. The unit closes with Yudhiṣṭhira’s approval and his communication of Bhīṣma’s counsel to the Pāṇḍavas and Draupadī, who assent.
Chapter Arc: महर्षि च्यवन के प्रभाव से राजा कुशिक और उनकी रानी को एक अलौकिक, आश्चर्यमय लोक-प्रासादों का दर्शन होता है—मानो गन्धर्वनगर पृथ्वी पर उतर आया हो। → कुशिक स्वर्णमय प्रासाद, मणिस्तम्भों की सहस्र-श्रेणियाँ, रूप्य-शिखर पर्वत, नलिनियाँ, शीत-उष्ण जल, विचित्र आसन-शयन और मधुर पक्षी-ध्वनियाँ देखता जाता है; विस्मय बढ़ता है और मन में प्रश्न उठता है—यह सब किसकी माया/तपः-शक्ति है और इसका प्रयोजन क्या है? → ‘यह महान आश्चर्य क्या है?’ सोचते हुए राजा को मणिमय खम्भों से युक्त सुवर्ण-विमान के भीतर दिव्य पर्यङ्क पर शयन करते भृगुनन्दन च्यवन का साक्षात् दर्शन होता है; वहीं से उपदेश का शिखर आता है—राजा ने इन्द्रियों और मन को जीतकर तप-आराधना सिद्ध की है, इसलिए मुनि अत्यन्त प्रसन्न हैं। → च्यवन राजा की निष्कलुषता और आराधना की प्रशंसा करते हैं—उसमें सूक्ष्मतम भी दोष नहीं—और वर/अनुग्रह देने की तत्परता प्रकट करते हैं; राजा-रानी का विस्मय श्रद्धा में रूपान्तरित होता है। → मुनि कहते हैं—‘मैं तुम पर प्रसन्न हूँ; वर ग्रहण करो’—पर अध्याय का अंत वर के चयन/फल-निर्णय की प्रतीक्षा में छोड़ देता है।
Verse 1
ऑपनआक्रात बछ। सं: चतु:पञ्चाशत्तमो5 ध्याय: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना भीष्म उवाच ततः स राजा रात्र्यन्ते प्रतिबुद्धो महामना: । कृतपूर्वालह्निकः प्रायात् सभार्यस्तद् वन॑ प्रति,भीष्मजी कहते हैं--राजन! तत्पश्चात् रात्रि व्यतीत होनेपर महामना राजा कुशिक जागे और पूर्वह्निकालके नैत्यिक नियमोंसे निवृत्त होकर अपनी रानीके साथ उस तपोवनकी ओर चल दिये
ভীষ্মে ক’লে—তাৰ পিছত ৰাতিৰ অন্তত সেই মহামনা ৰজা জাগি উঠিল। পূৰ্বাহ্নৰ নিত্যকর্ম সম্পন্ন কৰি তেওঁ ৰাণীসহ সেই বনাশ্ৰমৰ পানে যাত্ৰা কৰিলে।
Verse 2
ततो ददर्श नृपति: प्रासादं सर्वकाउ्चनम् । मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम्,वहाँ पहुँचकर नरेशने एक सुन्दर महल देखा, जो सारा-का-सारा सोनेका बना हुआ था। उसमें मणियोंके हजारों खम्भे लगे हुए थे और वह अपनी शोभासे गन्धर्वनगरके समान जान पड़ता था
সেখানে উপস্থিত হৈ নৃপতিয়ে এটা প্ৰাসাদ দেখিলে, যি সম্পূৰ্ণ স্বৰ্ণময় আছিল। মণিখচিত সহস্ৰ স্তম্ভে সমৃদ্ধ সেই প্ৰাসাদ শোভাত গন্ধৰ্বনগৰৰ সদৃশ প্ৰতীয়মান হ’ল।
Verse 3
तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा । पर्वतान् रूप्यसानूंश्व नलिनीश्व सपड़कजा:
সেই ঠাইত তেতিয়া কুশিকে দিব্য অভিপ্ৰায় সূচক বিস্ময়কৰ দৃশ্য দেখিলে—ৰূপালী ঢালযুক্ত পৰ্বত, আৰু পদ্ম-নীলউৎপলৰে ভৰা সৰোবৰ; যেন সেই স্থান মঙ্গলময় আৰু উচ্চ লক্ষ্যলৈ মন টানি নিয়ে।
Verse 4
चित्रशालाक्ष विविधास्तोरणानि च भारत । शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम्
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত, তাত নানাবিধ সুসজ্জিত চিত্ৰশালা আৰু তোৰণ আছিল; ভূমি ক’তিয়াবা সেউজ ঘাঁহেৰে আচ্ছাদিত, ক’তিয়াবা সোণেৰে মণ্ডিত পকা মেঝেত পাতা আছিল।
Verse 5
भारत! उस समय राजा कुशिकने वहाँ शिल्पियोंके अभिप्रायके अनुसार निर्मित और भी बहुत-से दिव्य पदार्थ देखे। कहीं चाँदीके शिखरोंसे सुशोभित पर्वत, कहीं कमलोंसे भरे सरोवर, कहीं भाँति-भाँतिकी चित्रशालाएँ तथा तोरण शोभा पा रहे थे। भूमिपर कहीं सोनेसे मढ़ा हुआ पक्का फर्श और कहीं हरी-हरी घासकी बहार थी ।। सहकारान् प्रफुल्लांश्व केतकोद्दालकान् वरान् | अशोकान् सहकुन्दांश्व॒ फुल्लांश्वैवातिमुक्तकान्,अमराइयोंमें बौर लगे थे। जहाँ-तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे। राजा और रानीने उन सबको देखा
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত, সেই সময়ত ৰজা কুশিকে তাত শিল্পীসকলৰ অভিপ্ৰায় অনুসাৰে নিৰ্মিত বহু দিৱ্য বস্তু দেখিলে। ক’তিয়াবা ৰূপালী শিখৰে শোভিত পৰ্বত, ক’তিয়াবা পদ্মে ভৰা সৰোবৰ; আন ঠাইত নানাবিধ চিত্ৰশালা আৰু দীপ্তিমান তোৰণ। ভূমি ক’তিয়াবা সোণেৰে মণ্ডিত দৃঢ় মেঝে, ক’তিয়াবা সেউজ ঘাঁহৰ শোভা। আমগছত মুকুল, আৰু কেতক, উদ্দালক, অশোক-কুন্দ, ফুলি উঠা অতিমুক্তক—এইদৰে সমগ্ৰ স্থান সমৃদ্ধি আৰু মঙ্গলৰ সুশৃঙ্খল দৰ্শন যেন লাগিছিল।
Verse 6
चम्पकांस्तिलकान् भव्यान् पनसान् वज्जुलानपि । पुष्पितान् कर्णिकारांश्व तत्र तत्र ददर्श ह,अमराइयोंमें बौर लगे थे। जहाँ-तहाँ केतक, उद्दालक, अशोक, कुन्द, अतिमुक्तक, चम्पा, तिलक, कटहल, बेंत और कनेर आदिके सुन्दर वृक्ष खिले हुए थे। राजा और रानीने उन सबको देखा
ভীষ্মে ক’লে—তেওঁ তাত তাত ফুলি উঠা ভব্য চম্পক, তিলক, পনস (কঁঠাল), বঞ্জুল আৰু পুষ্পিত কৰ্ণিকাৰ গছ দেখিলে।
Verse 7
श्यामान् वारणपुष्पांश्व तथाष्टपदिका लता: । तत्र तत्र परिक्लृप्ता ददर्श स महीपति:,राजाने विभिन्न स्थानोंमें निर्मित श्याम तमाल, वारणपुष्प तथा अष्टपदिका लताओंका दर्शन किया
ভীষ্মে ক’লে—সেই মহীপতিয়ে তাত তাত সুশৃঙ্খলভাৱে সজোৱা শ্যাম তামাল, বাৰণপুষ্প আৰু অষ্টপদিকা লতা দেখিলে।
Verse 8
रम्यान् पद्मोत्यलधरान् सर्वर्तुकुसुमांस्तथा । विमानप्रतिमांश्वापि प्रासादान् शैलसंनिभान्,कहीं कमल और उत्पलसे भरे हुए रमणीय सरोवर शोभा पाते थे। कहीं पर्वत-सदूश ऊँचे-ऊँचे महल दिखायी देते थे जो विमानके आकारमें बने हुए थे। वहाँ सभी ऋतुओंके फूल खिले हुए थे
ক’তাও পদ্ম-উৎপলে ভৰা মনোৰম সৰোবৰ শোভা পাইছিল; ক’তাও পৰ্বতসম উচ্চ প্ৰাসাদ দেখা গৈছিল, যিবোৰ বিমানসদৃশ আকাৰত নিৰ্মিত। তাত সকলো ঋতুৰ ফুল ফুলি আছিল।
Verse 9
शीतलानि च तोयानि क्वचिदुष्णानि भारत । आसनानि विचित्राणि शयनप्रवराणि च,भरतनन्दन! कहीं शीतल जल थे तो कहीं उष्ण, उन महलोंमें विचित्र आसन और उत्तमोत्तम शय्याएँ बिछी हुई थीं
হে ভাৰতনন্দন! ক’তাও শীতল জল, ক’তাও উষ্ণ জল আছিল; আৰু সেই ভব্য গৃহসমূহত বিচিত্ৰ আসন আৰু শ্ৰেষ্ঠ শয্যা সাজি থোৱা আছিল।
Verse 10
पर्यड्कान् रत्नसौवर्णान् परारघ्यास्तरणावृतान् | भक्ष्यं भोज्यमनन्तं च तत्र तत्रोपकल्पितम्,सोनेके बने हुए रत्नजटित पलंगोंपर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। विभिन्न स्थानोंमें अनन्त भक्ष्य, भोज्य पदार्थ रखे गये थे
সোণাৰে নিৰ্মিত, ৰত্নখচিত পলংসমূহত অতি মূল্যবান আচ্ছাদন পতা আছিল; আৰু ঠাই ঠাইত অসংখ্য ভক্ষ্য-ভোজ্য দ্ৰব্য সজাই থোৱা আছিল।
Verse 11
वाणीवादान् शुकांश्वैव सारिकान् भृंगराजकान् | कोकिलान् शतपपत्रांक्ष सकोयष्टिककुक्कुभान्,समन््ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं
ৰাজাই চাৰিওফালে মনোহৰ দৃশ্য দেখিলে—মানুহৰ দৰে কথা কোৱা শুক আৰু সাৰিকা, ভৃঙ্গৰাজ, কোকিল, শতপত্ৰ, কোয়ষ্টি আৰু কুক্কুভ আদি; সকলোৱে আনন্দিত হৈ সৰ্বত্ৰ বিচৰণ কৰিছিল।
Verse 12
मयूरान् कुक्कुटांश्चापि दात्यूहानू जीवजीवकान् । चकोरान् वानरान् हंसान् सारसां श्रक्रसाह्नयान्
ময়ূৰ আৰু কুক্কুট, দাত্যূহ আৰু জীৱজীৱক, চকোৰ, বানৰ, হাঁস, সাৰস আৰু ‘শক্রসাহ্নয়’ নামে জনা পাখিসকলও (তাত আছিল)।
Verse 13
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव,पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন, পৃথ্বীনাথ! ক’তিয়াবা অপ্সৰাসকলৰ দল আনন্দেৰে বিহাৰ কৰিছিল; আন ক’তিয়াবা গন্ধৰ্বসকলৰ গোট নিজৰ প্ৰিয়তমাসকলৰ আলিঙ্গন-পাশত আবদ্ধ যেন দেখা গৈছিল। ৰজাই তেওঁলোক সকলোকে দেখিলে—কিন্তু কেতিয়াবা দেখা পালে, কেতিয়াবা নাপালে।
Verse 14
कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह | न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नुप:,पृथ्वीनाथ! कहीं झुंड-की-झुंड अप्सराएँ विहार कर रही थीं। कहीं गन्धर्वोके समुदाय अपनी प्रियतमाओंके आलिंगन-पाशमें बँधे हुए थे। उन सबको राजाने देखा। वे कभी उन्हें देख पाते थे और कभी नहीं देख पाते थे
তাত ৰজাই আন কিছুমানকো তেওঁলোকৰ কান্তাসকলৰ আলিঙ্গনত আবদ্ধ অৱস্থাত দেখিলে। তাৰ পাছত তেওঁলোকক দেখা নাপালে; আৰু পুনৰ এবাৰ দেখা পালে।
Verse 15
गीतध्वनिं सुमधुरं तथैवाध्यापनध्वनिम् । हंसान् सुमधुरांश्चापि तत्र शुश्राव पार्थिव:,राजा कभी संगीतकी मधुर ध्वनि सुनते, कभी वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष उनके कानोंमें पड़ता और कभी हंसोंकी मीठी वाणी उन्हें सुनायी देती थी
তাত ৰজাই কেতিয়াবা অতি-মধুৰ গীতধ্বনি, কেতিয়াবা বেদস্বাধ্যায়ৰ গম্ভীৰ ঘোষ, আৰু কেতিয়াবা হাঁহ (হংস)ৰ মিঠা কলৰৱ শুনিলে।
Verse 16
त॑ दृष्टवात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा । स्वप्लोडयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु,उस अति अदभुत दृश्यको देखकर राजा मन-ही-मन सोचने लगे--“अहो! यह स्वप्न है या मेरे चित्तमें भ्रम हो गया है अथवा यह सब कुछ सत्य ही है
সেই অতি অদ্ভুত দৃশ্য দেখি ৰজাই মনে মনে চিন্তা কৰিলে—“আহা! এইটো স্বপ্ন নে? নে মোৰ চিত্ত বিভ্ৰান্ত হৈছে? নে এই সকলো সত্যই?”
Verse 17
अहो सह शरीरेण प्राप्तो5स्मि परमां गतिम् । उत्तरान् वा कुरून् पुण्यानथवाप्यमरावतीम्,“अहो! क्या मैं इसी शरीरसे परम गतिको प्राप्त हो गया हूँ अथवा पुण्यमय उत्तरकुरु या अमरावतीपुरीमें-आ पहुँचा हूँ
“আহা! এই দেহসহেই মই পৰম গতি লাভ কৰিলোঁ নেকি? নে মই পুণ্যময় উত্তৰকুরু দেশত আহি পৰিলোঁ—অথবা দেৱলোকৰ অমৰাৱতী নগৰীত?”
Verse 18
किंचेदं महदाश्चर्य सम्पश्यामीत्यचिन्तयत् । एवं संचिन्तयन्नेव ददर्श मुनिपुंगवम्,“यह महान् आश्वर्यकी बात जो मुझे दिखायी दे रही है, क्या है?” इस तरह वे बारंबार विचार करने लगे। राजा इस प्रकार सोच ही रहे थे कि उनकी दृष्टि मुनिप्रवर च्यवनपर पड़ी
ভীষ্ম ক’লে—“মই যি মহা আশ্চৰ্য দেখিছোঁ, সেয়া কি?”—এইদৰে ভাবি তেওঁ বাৰে বাৰে চিন্তা কৰিবলৈ ধৰিলে। এনেদৰে চিন্তা কৰোঁতেই ৰজাৰ দৃষ্টি তপস্বীসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ এক মুনিপুঙ্গৱৰ ওপৰত পৰিল।
Verse 19
तस्मिन् विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले । महाहें शयने दिव्ये शयानं भूगुनन्दनम्
ভীষ্ম ক’লে—মণিখচিত স্তম্ভে ভৰপূৰ সেই সোণালী বিমানে মই ভৃগুবংশৰ গৌৰৱক এক মহৎ দিব্য শয্যাত শায়িত দেখিলোঁ।
Verse 20
मणिमय खम्भोंसे युक्त सुवर्णमय विमानके भीतर बहुमूल्य दिव्य पर्यकपर वे भृगुनन्दन च्यवन लेटे हुए थे ।। तमभ्ययात् प्रहर्षेण नरेन्द्र: सह भार्यया । अन्तर्हितस्ततो भूयक्ष्यवन: शयनं च तत्,उन्हें देखते ही पत्नीसहित महाराज कुशिक बड़े हर्षके साथ आगे बढ़े। इतनेहीमें फिर महर्षि च्यवन अन्तर्धान हो गये। साथ ही उनका वह पलंग भी अदृश्य हो गया
মণিখচিত স্তম্ভে স্থিত সেই সোণালী বিমানের ভিতৰত, অমূল্য দিব্য পৰ্যঙ্কত ভৃগুনন্দন চ্যবন শায়িত আছিল। তেওঁক দেখি নৰেন্দ্ৰ কুশিক ৰাণীৰ সৈতে হর্ষে আগবাঢ়িল; কিন্তু সেই ক্ষণতেই মহর্ষি চ্যবন আৰু সেই শয্যাও অন্তৰ্ধান হ’ল।
Verse 21
ततोडन्यस्मिन् वनोद्देशे पुनरेव ददर्श तम् | कौश्यां बृस्यां समासीनं जपमानं महाव्रतम्,तदनन्तर वनके दूसरे प्रदेशमें राजाने फिर उन्हें देखा, उस समय वे महान् व्रतधारी महर्षि कुशकी चटाईपर बैठकर जप कर रहे थे
তাৰ পাছত বনৰ অন্য এক অঞ্চলত ৰজাই তেওঁক পুনৰ দেখিলে। সেই সময়ত মহাব্ৰতধাৰী মহর্ষি কুশাসনত বহি মন্ত্ৰজপত লীন আছিল।
Verse 22
एवं योगबलाद् विप्रो मोहयामास पार्थिवम् । क्षणेन तद् वनं॑ चैव ते चैवाप्सरसां गणा:,इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवनने अपनी योगशक्तिसे राजा कुशिकको मोहमें डाल दिया। एक ही क्षणमें वह वन, वे अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व और वृक्ष सब-के-सब अदृश्य हो गये। नरेश्वर! गंगाका वह तट पुनः शब्द-रहित हो गया
এইদৰে যোগবলেৰে সেই বিপ্ৰ মহর্ষিয়ে ৰজাক মোহত পেলালে। এক নিমেষতে সেই বন আৰু অপ্সৰাসকলৰ সেই গণ—সকলো দৃষ্টিৰ পৰা অদৃশ্য হ’ল।
Verse 23
गन्धर्वा: पादपाश्रैव सर्वमन्तरधीयत । नि:शब्दम भवच्चापि गंगाकूलं॑ पुनर्न॒ूप,इस प्रकार ब्रह्मर्षि च्यवनने अपनी योगशक्तिसे राजा कुशिकको मोहमें डाल दिया। एक ही क्षणमें वह वन, वे अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व और वृक्ष सब-के-सब अदृश्य हो गये। नरेश्वर! गंगाका वह तट पुनः शब्द-रहित हो गया
ভীষ্ম ক’লে—গন্ধৰ্ব আৰু গছ-গছনিও এক মুহূৰ্ততে সকলো দৃষ্টিৰ পৰা অন্তৰ্ধান হ’ল। আৰু হে নৰেশ্বৰ, গঙ্গাৰ তীৰ পুনৰ সম্পূৰ্ণ নীৰৱ হৈ পৰিল।
Verse 24
कुशवल्मीकभूयिष्ठं बभूव च यथा पुरा । ततः स राजा कुशिक: सभार्यस्तेन कर्मणा,वहाँ पहलेके ही समान कुश और बाँबीकी अधिकता हो गयी। तत्पश्चात् पत्नीसहित राजा कुशिक ऋषिका वह महान् अद्भुत प्रभाव देखकर उनके उस कार्यसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। इसके बाद हर्षमग्न हुए कुशिकने अपनी पत्नीसे कहा--
সেই স্থান আগৰ দৰে পুনৰ কুশঘাঁহ আৰু বাঁবিৰে ঘন হৈ উঠিল। তেতিয়া সেই কৰ্মৰ আশ্চৰ্য প্ৰভাৱ দেখি ৰজা কুশিক ৰাণীসহ মহা বিস্ময়ত পৰিল।
Verse 25
विस्मयं परम॑ प्राप्तस्तद् दृष्टया महदद्भुतम् । ततः प्रोवाच कुशिको भार्या हर्षसमन्वित:,वहाँ पहलेके ही समान कुश और बाँबीकी अधिकता हो गयी। तत्पश्चात् पत्नीसहित राजा कुशिक ऋषिका वह महान् अद्भुत प्रभाव देखकर उनके उस कार्यसे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए। इसके बाद हर्षमग्न हुए कुशिकने अपनी पत्नीसे कहा--
সেই মহান অদ্ভুত দৃশ্য দেখি কুশিক পৰম বিস্ময়ত ভৰি উঠিল। তাৰ পাছত হর্ষে পৰিপূৰ্ণ হৈ ৰজা কুশিকে নিজৰ পত্নীক ক’লে।
Verse 26
पश्य भद्ठे यथा भावाश्षित्रा दृष्टा: सुदुर्लभा: । प्रसादाद् भगुमुख्यस्य किमन्यत्र तपोबलात्
হে ভদ্ৰে, চোৱা—কিমান বিচিত্ৰ আৰু অতি দুৰ্লভ ভাব আমি প্ৰত্যক্ষ দেখিলোঁ। ভৃগুকুলশ্ৰেষ্ঠৰ প্ৰসাদ নোহোৱাকৈ—তপোবল নোহোৱাকৈ—এনে দৰ্শন আৰু ক’ৰ পৰা আহিব?
Verse 27
“कल्याणी! देखो, हमने भूगुकुलतिलक च्यवन मुनिकी कृपासे कैसे-कैसे अद्भुत और परम दुर्लभ पदार्थ देखे हैं। भला, तपोबलसे बढ़कर और कौन-सा बल है? ।। तपसा तदवाप्यं हि यत् तु शक््यं मनोरथै: । त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते,“जिसकी मनके द्वारा कल्पना मात्र की जा सकती है, वह वस्तु तपस्यासे साक्षात् सुलभ हो जाती है। त्रिलोकीके राज्यसे भी तप ही श्रेष्ठ है
কল্যাণী! ভৃগুকুল-তিলক চ্যবন মুনিৰ কৃপাৰে আমি বহু অদ্ভুত আৰু পৰম দুৰ্লভ বস্তু প্ৰত্যক্ষ দেখিলোঁ। তপোবলতকৈ ডাঙৰ বল আৰু কি? যি বস্তু মন কেৱল ইচ্ছা-ৰূপে কল্পনা কৰিব পাৰে, তপস্যাৰে সেয়া প্ৰত্যক্ষ লাভ হয়। ত্ৰিলোকৰ ৰাজ্যতকৈও তপেই শ্ৰেষ্ঠ।
Verse 28
तपसा हि सुतप्तेन शक््यो मोक्षस्तपोबलात् । अहो प्रभावो ब्रह्मार्षेक्ष्यवनस्य महात्मन:,“अच्छी तरह तपस्या करनेपर उसकी शक्तिसे मोक्षतक मिल सकता है। इन ब्रह्मर्षि महात्मा च्यवनका प्रभाव अद्भुत है
ভীষ্মে ক’লে— যি তপস্যা সত্যকৈ আৰু অতি তীব্ৰভাৱে সম্পন্ন হয়, তাৰ তপোবলে মোক্ষো লাভ কৰিব পাৰি। আহা! মহাত্মা ব্ৰহ্মৰ্ষি চ্যৱনৰ আধ্যাত্মিক প্ৰভাৱ কিমান আশ্চৰ্য!
Verse 29
इच्छयैष तपोवीर्यादन्यॉललोकान् सृजेदपि । ब्राह्मणा एव जायेरन् पुण्यवाग्बुद्धिकर्मण:
ভীষ্মে ক’লে— তপস্যাজাত শক্তিৰ বলে তেওঁ কেৱল ইচ্ছামাত্ৰে আন আন লোকো সৃষ্টি কৰিব পাৰে; আৰু সেই লোকসমূহত পুণ্য বাক্য, পুণ্য বুদ্ধি আৰু পুণ্য কৰ্ম থকা ব্ৰাহ্মণসকলেই জন্ম ল’ব।
Verse 30
'ये इच्छा करते ही अपनी तपस्याकी शक्तिसे दूसरे लोकोंकी सृष्टि कर सकते हैं। इस पृथ्वीपर ब्राह्मण ही पवित्रवाक्, पवित्रबुद्धि और पवित्र कर्मवाले होते हैं ।। उत्सहेदिह कृत्वैव को<न्यो वै च्यवनादते । ब्राह्मण्यं दुर्लभ लोके राज्यं हि सुलभं नरै:,“महर्षि च्यवनके सिवा दूसरा कौन है, जो ऐसा महान् कार्य कर सके? संसारमें मनुष्योंको राज्य तो सुलभ हो सकता है, परंतु वास्तविक ब्राह्मणत्व परम दुर्लभ है
ভীষ্মে ক’লে— যিসকলে কেৱল সংকল্প কৰামাত্ৰে নিজৰ তপোবলে আন আন লোকো সৃষ্টি কৰিব পাৰে, তেওঁলোক তেনে মহাত্মা। এই পৃথিৱীত পবিত্ৰ বাক্য, পবিত্ৰ বুদ্ধি আৰু পবিত্ৰ কৰ্মে চিহ্নিত লোক ত ব্ৰাহ্মণসকলেই। মহর্ষি চ্যৱনক বাদ দি ইয়াত আন কোনে এনে মহৎ কাৰ্য সাধন কৰিব পাৰে? মানুহৰ বাবে ৰাজ্য লাভ সহজ হ’ব পাৰে, কিন্তু সত্য ব্ৰাহ্মণ্য এই লোকত অতি দুৰ্লভ।
Verse 31
ब्राह्माण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत् । इत्येवं चिन्तयान: स विदितश्न्यवनस्य वै,“ब्राह्मणत्वके प्रभावसे ही महर्षिने हम दोनोंको अपने वाहनोंकी भाँति रथमें जोत दिया था।” इस तरह राजा सोच-विचार कर ही रहे थे कि महर्षि च्यवनको उनका आना ज्ञात हो गया
‘ব্ৰাহ্মণ্যৰ প্ৰভাৱতেই মহর্ষিয়ে আমাক দুয়োক নিজৰ বাহনৰ দৰে ৰথত জুৰি দিছিল’— এইদৰে ৰজা চিন্তা কৰি থাকোঁতেই মহর্ষি চ্যৱনৰ ওচৰত তাৰ আগমনৰ কথা বিদিত হ’ল।
Verse 32
सम्प्रेक्ष्योवाच नृपतिं क्षिप्रमागम्यतामिति । इत्युक्त: सहभार्यस्तु सो5भ्यगच्छन्महामुनिम्
দেখি মহর্ষিয়ে ৰজাক ক’লে— “শীঘ্ৰে ইয়ালৈ আহা।” এইদৰে কোৱা হ’লে ৰজা পত্নীসহ সেই মহামুনিৰ ওচৰলৈ গ’ল।
Verse 33
शिरसा वन्दनीयं तमवन्दत च पार्थिव: । उन्होंने राजाकी ओर देखकर कहा--'भूपाल! शीघ्र यहाँ आओ।” उनके इस प्रकार आदेश देनेपर पत्नीसहित राजा उनके पास गये तथा उन वन्दनीय महामुनिको उन्होंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया ।। तस्याशिष: प्रयुज्याथ स मुनिस्तं नराधिपम्
ভীষ্মে ক’লে—ৰাজাই মস্তক নত কৰি সেই বন্দনীয় মহামুনিক প্ৰণাম কৰিলে। তাৰ পাছত মুনিয়ে আশীৰ্বাদ দি নৰাধিপক সম্বোধন কৰি ক’লে—ধৰ্ম ৰক্ষাৰ বাবে ৰাজশক্তিও বিনয়েৰে, তপস্যা আৰু জ্ঞানক সন্মান দি প্ৰয়োগ কৰিব লাগে।
Verse 34
ततः प्रकृतिमापन्नो भार्गवो नूपते नृपम्
তাৰ পাছত ভাৰ্গৱে নিজৰ স্বাভাৱিক অৱস্থালৈ ঘূৰি আহি ৰজাক সম্বোধন কৰি ক’লে।
Verse 35
राजन् सम्यग् जितानीह पञड्च पज्च स्वयं त्वया
হে ৰাজন, ইয়াত তুমি নিজৰেই প্ৰচেষ্টাৰে পাঁচ আৰু পাঁচক যথাযথভাৱে জয় কৰিছা।
Verse 36
सम्यगाराधित: पुत्र त्वया प्रवदतां वर
পুত্ৰ, তুমি যথাযথভাৱে আৰাধনা কৰিছা; সেয়ে দানযোগ্য বৰসমূহৰ মাজৰ পৰা শ্ৰেষ্ঠ বৰটো বিচাৰ।
Verse 37
अनुजानीहि मां राजन् गमिष्यामि यथागतम्
হে ৰাজন, মোক অনুমতি দিয়ক; মই যিদৰে আহিছিলোঁ সিদৰে ঘূৰি যাম।
Verse 38
0 &.* 7 एप कतचजत णः हपफ तक ज्ज्ल्च्य कण का यक्ुम्त्ाप ग ः 2० [! 7472 5५2 ५ ॥#/ ८ कुशिक उवाच अग्निमध्ये गतेनेव भगवन् संनिधौ मया
কুশিকে ক’লে— ভগৱান, আপোনাৰ সান্নিধ্যত মোৰ এনে লাগে যেন মই অগ্নিমধ্যত প্ৰৱেশ কৰিলোঁ।
Verse 39
वर्तितं भूगुशार्दूल यन्न दग्धो5स्मि तद् बहु । एष एव वरो मुख्य: प्राप्तो मे भूगुनन्दन
কুশিকে ক’লে— হে ভৃগুশাৰ্দূল, এই পৰীক্ষা পাৰ হৈও মই দগ্ধ নহ’লোঁ— এইটোৱেই মোৰ বাবে মহা বৰ। হে ভৃগুনন্দন, এইটোৱেই মোৰ প্ৰাপ্ত মুখ্য আশীৰ্বাদ।
Verse 40
कुशिक बोले--भगवन्! भृगुश्रेष्ठी मैं आपके निकट उसी प्रकार रहा हूँ, जैसे कोई प्रज्वलित अग्निके बीचमें खड़ा हो। उस अवस्थामें रहकर भी मैं जलकर भस्म नहीं हुआ, यही मेरे लिये बहुत बड़ी बात है। भृगुनन्दन! यही मैंने महान् वर प्राप्त कर लिया ।। यत् प्रीतोडसि मया ब्रह्मन् कुलं त्रातं च मेडनघ । एष मे&नुग्रहो विप्र जीविते च प्रयोजनम्,निष्पाप ब्रह्मर्ष! आप जो प्रसन्न हुए हैं तथा आपने जो मेरे कुलको नष्ट होनेसे बचा दिया, यही मुझपर आपका भारी अनुग्रह है। और इतनेसे ही मेरे जीवनका सारा प्रयोजन सफल हो गया
কুশিকে ক’লে— ভগৱান, ভৃগুশ্ৰেষ্ঠ, মই আপোনাৰ ওচৰত এনেদৰে আছিলোঁ যেন জ্বলি থকা অগ্নিমধ্যত থিয় হৈ আছোঁ। তথাপি মই জ্বলি ভস্ম নহ’লোঁ— এইটোৱেই মোৰ বাবে মহা আশ্চৰ্য। হে ভৃগুনন্দন, এইটোৱেই মই লাভ কৰা মহাবৰ। হে ব্ৰাহ্মণ, আপুনি মোৰ ওপৰত প্ৰসন্ন হৈ মোৰ বংশক বিনাশৰ পৰা ৰক্ষা কৰিলে— এইটোৱেই মোৰ ওপৰত আপোনাৰ মহা অনুগ্ৰহ। হে নিষ্পাপ ব্ৰহ্মর্ষি, ইমানেই মোৰ জীৱনৰ উদ্দেশ্য সিদ্ধ হ’ল।
Verse 41
एतदू् राज्यफलं चैव तपसश्न॒ फलं मम । यदि त्वं प्रीतिमान् विप्र मयि वै भूगुनन्दन
কুশিকে ক’লে— হে বিপ্ৰ, হে ভৃগুনন্দন, যদি আপুনি সঁচাকৈ মোৰ ওপৰত প্ৰসন্ন, তেন্তে এইটোৱেই মোৰ ৰাজ্যৰ ফল আৰু এইটোৱেই মোৰ তপস্যাৰ ফল।
Verse 42
अस्ति मे संशय: कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमहसि
কুশিকে ক’লে— মোৰ এটা সংশয় আছে; সেয়া আপুনি মোক ব্যাখ্যা কৰিব লাগে।
Verse 53
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত চ্যৱন আৰু কুশিকৰ সংলাপ-বিষয়ক ত্ৰিপঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Verse 54
भृगुनन्दन! यही मेरे राज्यका और यही मेरी तपस्याका भी फल है। विप्रवर! यदि आपका मुझपर प्रेम हो तो मेरे मनमें एक संदेह है, उसका समाधान करनेकी कृपा करें ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे चतुः:पञ्चाशत्तमो5ध्याय:
ভৃগুনন্দন! এইয়াই মোৰ ৰাজ্যৰ ফল, আৰু এইয়াই মোৰ তপস্যাৰো ফল। হে বিপ্ৰবৰ! যদি মোৰ প্ৰতি আপোনাৰ স্নেহ থাকে, তেন্তে মোৰ মনত এটা সংশয় আছে—অনুগ্ৰহ কৰি তাৰ সমাধান কৰক। ইতি শ্ৰীমহাভাৰতে অনুশাসনপৰ্বণি দানধৰ্মপৰ্বণি চ্যৱনকুশিকসংবাদে চতুঃপঞ্চাশত্তমোऽধ্যায়ঃ।
Verse 123
समन््ततः प्रमुदितान् ददर्श सुमनोहरान् । राजाने देखा, मनुष्योंकी-सी वाणी बोलनेवाले तोते और सारिकाएँ चहक रही हैं। भृंगराज, कोयल, शतपत्र, कोयष्टि, कुक्कुभ, मोर, मुर्गे, दात्यूह, जीवजीवक, चकोर, वानर, हंस, सारस और चक्रवाक आदि मनोहर पशु-पक्षी चारों ओर सानन्द विचर रहे हैं
ৰাজাই চাৰিওফালে পৰম প্ৰমুদিত আৰু মনোহৰ দৃশ্য দেখিলে। মানুহৰ দৰে বাণী কোৱা টিয়া আৰু শালিকাবোৰ কূজন কৰি আছিল। ভৃংগৰাজ, কোকিল, শতপত্ৰ, কোয়ষ্টি, কুক্কুভ, ময়ূৰ, মুৰ্গী-মুৰ্গা, দাত্যূহ, জীৱজীৱক, চকোৰ, বানৰ, হাঁস, সাৰস আৰু চক্ৰৱাক আদি মনোহৰ পশু-পক্ষী চাৰিওফালে আনন্দে বিচৰণ কৰি আছিল।
Verse 336
निषीदेत्यब्रवीद् धीमान् सान्त्वयन् पुरुषर्षभ: । तब उन पुरुषप्रवर बुद्धिमान् मुनिने राजाको आशीर्वाद देकर सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा--'“आओ बैठो”'
তেতিয়া পুৰুষশ্ৰেষ্ঠ ৰজাক সান্ত্বনা দি ধীমন্ত মুনিয়ে আশীৰ্বাদ কৰি মৃদুভাৱে ক’লে—“আহা, বহা।”
Verse 346
उवाच श्लक्ष्णया वाचा तर्पयन्निव भारत | भरतवंशी नरेश! तदनन्तर स्वस्थ होकर भृगुपुत्र च्यवन मुनि अपनी स्निग्ध मुधर वाणीद्वारा राजाको तृप्त करते हुए-से बोले--
হে ভাৰতবংশীয় নৃপতি! তাৰ পিছত স্থিৰচিত্ত হৈ ভৃগুপুত্ৰ মুনি চ্যৱনে স্নিগ্ধ, মসৃণ আৰু মধুৰ বাক্যৰে—যেন তৃপ্তি দান কৰিছে—ৰজাক সম্বোধন কৰি ক’লে।
Verse 353
मनः:षष्ठानीन्द्रियाणि कृच्छान्मुक्तोडसि तेन वै । “राजन! तुमने पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों और छठे मनको अच्छी तरह जीत लिया है। इसीलिये तुम महान् संकटसे मुक्त हुए हो
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন, তুমি পাঁচ ইন্দ্ৰিয় আৰু ষষ্ঠ মনক সম্পূৰ্ণৰূপে জয় কৰিছা; সেয়ে তুমি মহা সংকটৰ পৰা মুক্ত হৈছা।
Verse 363
नहि ते वृजिनं किंचित् सुसूक्ष्ममपि विद्यते । “वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! तुमने भलीभाँति मेरी आराधना की है। तुम्हारे द्वारा कोई छोटे- से-छोटा या सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं हुआ है
ভীষ্মে ক’লে—পুত্ৰ, তোমাৰ ভিতৰত অতি সূক্ষ্ম দোষো নাই। তুমি মোৰ যথাযথ সেবা-আৰাধনা কৰিছা; সেয়ে সৰুতম অপৰাধৰ পৰাও তুমি মুক্ত।
Verse 3736
प्रीतो5स्मि तव राजेन्द्र वरश्न प्रतिगृह्मताम् । “राजन! अब मुझे विदा दो। मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा। राजेन्द्र! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ; अतः तुम कोई वर माँगो”
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজেন্দ্ৰ, মই তোমাৰ ওপৰত প্ৰসন্ন; সেয়ে এটা বৰ গ্ৰহণ কৰা। এতিয়া মোক বিদায় দিয়া; মই যেনেকৈ আহিছিলোঁ তেনেকৈয়ে উভতি যাম।
Yudhiṣṭhira confronts the ethical aftermath of kin-slaying and guru-slaying in a civil war: how to understand culpability, the suffering of survivors (especially bereaved women), and the prospect of adverse karmic destinies.
Expiation and restoration are operationalized through disciplined practices: tapas and targeted dāna are presented as structured means to generate merit, cultivate virtues, and re-anchor social order after collapse.
Yes in functional form: the chapter repeatedly attaches explicit ‘phala’ (fruits) to practices—asserting predictable outcomes in this world and posthumously (e.g., heaven, reputation, rescue from dark destinies), thereby positioning the teaching as an efficacy-mapped ethical manual.