Mahabharata Adhyaya 70
Virata ParvaAdhyaya 7029 Verses

Adhyaya 70

Chapter Arc: अज्ञातवास की प्रतिज्ञा पूर्ण होते ही विराट-सभा के द्वार पर एक अद्भुत दृश्य—युधिष्ठिर को अग्रणी बनाकर, समस्त आभूषणों से विभूषित, तेजस्वी महारथी पाण्डव ऐसे चमकते हैं जैसे द्वार पर मदमत्त गजराज। → सभा में प्रवेश कर वे राजासन-सम आसनों पर अग्नि-सदृश दीप्त होकर बैठते हैं; पहचान का क्षण निकट है—विराट, सभासद, और नगर-जन सबके मन में विस्मय और आशंका साथ-साथ उठती है कि ये कौन दिव्य पुरुष हैं। → सभा में युधिष्ठिर के गुणों का महिमामंडन—दीर्घदर्शी, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, यज्ञ-धर्मपरायण, मनु के समान प्रजापालक—ऐसी स्तुति के साथ उनका राजोचित अधिकार प्रकट होता है; ‘ऐसे धर्मात्मा को आसन न देना कैसे संभव?’—यही पहचान-प्रकाश का शिखर बनता है। → पाण्डवों का ‘प्राकट्य’ (प्रकाश) स्थापित होता है—वे अब छिपे सेवक नहीं, धर्म-तेज से युक्त क्षत्रिय-श्रेष्ठ हैं; विराट-सभा में उनका सम्मान और स्थान सुनिश्चित होता है। → अब जब पहचान खुल गई, तो कौरवों तक यह समाचार पहुँचेगा—और द्रौपदी-विवाह/उत्तर-परिणय के सूत्रों के साथ युद्ध की आहट निकट आती है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्या भारत विराटपवके अन्तर्गत वैवाहिकपरववमें पाण्डवप्राकट्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७० ॥। बपाडानडज () | अऑपटआ छणडट एकसप्ततितमो<्ध्याय: विराटको अन्य पाण्डवोंका भी परिचय प्राप्त होना तथा विराटके द्वारा युधिष्ठिरको राज्य समर्पण करके अर्जुनके साथ उत्तराके विवाहका प्रस्ताव करना विराट उवाच यद्येष राजा कौरव्य: कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । कतमोडस्यार्जुनो भ्राता भीमश्न॒ कतमो बली

قال فَيْشَمْپايَنَة: يا جَنَمِجَيَ، ثم بعد ذلك—وقد وفّى الإخوة الخمسة من الباندافا بنذرهم إلى الأجل المعيّن—وهم فرسانُ المركبات العظام، متّقدون كالنار، اغتسلوا في اليوم الثالث، ولبسوا ثيابًا بيضاء، وتزيّنوا بكل حُليّ الملوك. ووقفوا عند باب قاعة الملك يتلألأون كالفيلة السادة الثملة بالقوة عند بوابة القصر. ثم جعلوا الملك يُدْهِشْتِيرَ في المقدمة، فدخلوا مجلسَ فيرَاطَ وجلسوا على العروش المخصّصة للملوك. وفي تلك اللحظة بدوا مشعّين كالنيران المقدسة الموقدة على مذابح القرابين المتعددة.

Verse 2

युधिष्ठिरं पुरस्कृत्य सर्वाभरणभूषिता: । द्वारि मत्ता यथा नागा भ्राजमाना महारथा:

قال فَيْشَمْپايَنَة: وقد جُعِلَ يُدْهِشْتِيرُ في المقدمة، وقف فرسانُ المركبات العظام—وقد تزيّنوا بكل حُليّ الملوك—يتلألأون عند الباب، كالفيلة السادة الثملة بالقوة عند البوابة. وكان ذلك المشهد يبرز عودتهم المنضبطة إلى الوقار والمقام اللائقين بعد وفائهم بالنذر.

Verse 3

विराटस्य सभां गत्वा भूमिपालासनेष्वथ । निषेदु: पावकप्रख्या: सर्वे धिष्ण्येष्विवाग्नय:

قال فَيْشَمْپايَنَة: ولما دخلوا مجلسَ فيرَاطَ جلسوا على العروش المعدّة للملوك. وكانوا جميعًا متلألئين كالنار، جالسين كأنهم نيرانٌ مقدسة موقدة على مذابحها الخاصة.

Verse 4

तेषु तत्रोपविष्टेषु विराट: पृथिवीपति: । आजगाम सभां कर्तु राजकार्याणि सर्वश:,पाण्डवोंके वहाँ बैठ जानेपर राजा विराट अपने समस्त राजकाज करनेके लिये सभामें आये

فلما جلسوا هناك، أقبل الملكُ فيرَاطَةُ، سيّدُ الأرض، إلى قاعةِ المجلس ليتولّى جميع شؤون الدولة.

Verse 5

श्रीमतः पाण्डवान्‌ दृष्टवा ज्वलत: पावकानिव । मुहूर्तमिव च ध्यात्वा सरोष: पृथिवीपति:

فلما رأى الملكُ فيرَاطَةُ، سيّدُ الأرض، آلَ باندو الممجَّدين يتلألأون كالنيران المتّقدة، توقّف هنيهةً يتفكّر في باطنه. ثم لما ثارت حميّته، خاطب كَنْكَ، القائمَ في بهاءٍ كإندرا بين أتباعٍ كأنهم جموعُ المَرُوت.

Verse 6

अथ मत्स्यो5ब्रवीत्‌ कड्कं॑ देवरूपमिव स्थितम्‌ । मरुद्गणैरुपासीन त्रिदशानामिवेश्वरम्‌

قال فَيْشَمْبَايَنَة: ثم إن ملكَ مَتْسْيَا (فيرَاطَة) خاطب كَنْكَ، القائمَ بهيئةٍ إلهية، تحفّ به جموعُ المَرُوت، كأنه سيّدُ الآلهة الثلاثة والثلاثين. ولما رأى آلَ باندو متلألئين كالنيران المتّقدة ومفعمين بالبهاء، تفكّر فيرَاطَةُ في باطنه هنيهة؛ ثم إذ ارتفع غضبه، كلّم كَنْكَ الذي كان يلمع كإندرا بين المَرُوت.

Verse 7

स किलाक्षातिवापस्त्वं सभास्तारो मया वृतः । अथ राजासने कस्मादुपविष्टस्त्वलंकृत: ७ ।। “कंक! तुम्हें तो मैंने पासा फेंकनेवाला सभासद्‌ बनाया था। आज बन-ठनकर राजसिंहासनपर कैसे बैठ गये?”

وقال: «يا كَنْكَ! إنما اخترتُك عضوًا في المجلس لتكون مُلقيَ النَّرْد. فكيف جلستَ اليوم، متزيّنًا متأنّقًا، على عرشِ الملك؟»

Verse 8

वैशम्पायन उवाच परिहासेप्सया वाकक्‍्यं विराटस्य निशम्य तत्‌ | स्मयमानोडर्जुनो राजन्निदं वचनमत्रवीत्‌

قال فَيْشَمْبَايَنَة: أيها الملك (جَنَمِيجَيَة)، لما سمع أرجونا كلامَ فيرَاطَةَ كأنه قيل على سبيل المزاح، ابتسم ثم أجاب بهذه الكلمات.

Verse 9

अर्जुन उवाच इन्द्रस्यार्धासनं राजन्नयमारोदुमर्हति । ब्रह्माण्य: श्रुतवांस्त्यागी यज्ञशीलो दृढव्रत:

قال أرجونا: «أيها الملك، دعْ عنك عرشَك—فإن هذا الرجل جديرٌ حتى بأن يرتقي نصفَ مقعدِ إندرا. إنه مُخلصٌ للبراهمة، عالمٌ بالمعارف المقدسة، زاهدٌ مُنكرٌ لذاته، مواظبٌ على واجب القربان، ثابتٌ على حفظ نذوره.»

Verse 10

एष विग्रहवान्‌ धर्म एष वीर्यवर्तां वर: । एष बुद्धपबाधिको लोके तपसां च परायणम्‌

قال أرجونا: «ها هو ذا الدارما متجسِّداً؛ وها هو خيرُ الشجعان. في هذا العالم هو الأسمى بصيرةً وتمييزاً، وهو الملجأ الأعلى لأهل الزهد والتقشّف.»

Verse 11

एषो<स्त्र॑ विविध॑ वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे | न चैवान्य: पुमान्‌ वेत्ति न वेत्स्यति कदाचन

قال أرجونا: «إنه يعرف شتّى أصناف الأسلحة في العوالم الثلاثة، بما فيها ما يتحرّك وما لا يتحرّك. لا يعرفها رجلٌ غيره، ولن يعرفها أحدٌ قط.»

Verse 12

न देवा नासुरा: केचिन्न मनुष्या न राक्षसा: । गन्धर्वयक्षप्रवरा: सकिन्नरमहोरगा:,जिन अस्त्रोंको देवता, असुर, मनुष्य, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर और बड़े-बड़े नाग भी नहीं जानते, उन सबका इन्हें ज्ञान है

قال أرجونا: «ثَمَّةَ أسلحةٌ لا يعرفها الآلهة ولا الأسورا، ولا البشر ولا الرّاكشسا، ولا حتى أفاضل الغندهرفا والياكشا، ولا الكِنّارا، ولا الحيّات العظام. ومع ذلك فهو يعلمها جميعاً.»

Verse 13

दीर्घदर्शी महातेजा: पौरजानपदप्रिय: । पाण्डवानामतिरथो यज्ञधर्मपरो वशी

قال أرجونا: «إنه بعيدُ النظر، عظيمُ التوهّج، محبوبٌ لدى أهل المدن والقرى. وهو بين الباندافا فارسٌ من طبقة الأتيراثا، مواظبٌ على اليَجْنَة والدارما، قاهرٌ لنفسه، ضابطٌ لعقله وحواسّه.»

Verse 14

महर्षिकल्पो राजर्षि: सर्वलोकेषु विश्रुत: । बलवान धृतिमान्‌ दक्ष: सत्यवादी जितेन्द्रिय: । धनैश्न सज्चयैश्नैव शक्रवैश्रवणोपम:

قال أرجونا: «إنه كالحكيم العظيم، وكالملك الناسك المشهور في جميع العوالم—قويّ، ثابت العزم، كفء، صادق القول، مالكٌ لزمام حواسه. وفي الثروة وما جُمِع من خزائن، يُضاهِي شَكرا (إندرا) وفايشرافَنا (كوبيرا).»

Verse 15

यथा मनुर्महातेजा लोकानां परिरक्षिता । एवमेष महातेजा: प्रजानुग्रहकारक:,जैसे महातेजस्वी मनु समस्त लोकोंके रक्षक हैं उसी प्रकार ये महातेजस्वी नरेश भी प्रजाजनोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं

قال أرجونا: «كما أن مانو (Manu)، المشرّع العظيم المتلألئ، هو حامي جميع الناس، كذلك هذا الملك العظيم المتلألئ—يُفيض الإحسان ويُظهر العطف العملي على رعيته.»

Verse 16

अयं कुरूणामृषभो धर्मराजो युधिष्ठिर: । अस्य कीर्ति: स्थिता लोके सूर्यस्येवोद्यत: प्रभा

قال أرجونا: «هذا هو يودهِشْتِهيرا (Yudhiṣṭhira)، الملك العادل—سيد الكورو وأفضلهم. إن سمعته الحسنة ثابتة في العالم، لطيفة نافعة كإشراق الشمس الهادئ عند طلوعها.»

Verse 17

संसरन्ति दिश: सर्वा यशसो<स्य इवांशव: । उदितस्थेव सूर्यस्य तेजसो5नु गभस्तय:

قال أرجونا: «كما أنه عند شروق الشمس تنتشر الأشعة التي تتبع لمعانها في جميع الجهات، كذلك ينتشر بريق شهرة هذا الرجل في كل مكان—مجدٌ ناصع لا دنس فيه، أبيض كالرحيق، يرافق صيته.»

Verse 18

एनं दशसहस्राणि कुण्जराणां तरस्विनाम्‌ | अन्वयु: पृष्ठतो राजन्‌ यावदध्यावसत्‌ कुरून्‌,राजन! ये महाराज जब कुरुदेशमें रहते थे, उस समय इनके पीछे दस हजार वेगवान्‌ हाथी चला करते थे

قال أرجونا: «أيها الملك، ما دام يقيم بين الكورو، كانت عشرة آلاف من الفيلة القوية السريعة تسير خلفه.»

Verse 19

त्रिंशदेनं सहस्राणि रथा: काउ्चनमालिन: । सदश्वैरुपसम्पन्ना: पृष्ठतो5नुययुस्तदा

قال أرجونا: «ثم إن ثلاثين ألف عربة حربية، مزدانة بأكاليل من ذهب ومكتملة التجهيز بخيول ممتازة، كانت تتبع من خلفه في ذلك الحين».

Verse 20

इस प्रकार अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए सुवर्णमालामण्डित तीस हजार रथ भी उस समय इनका अनुसरण करते थे ।।

قال أرجونا: «وكما مجّد الحكماء الأقدمون إندرا، كذلك كان ثمانمائة من المنشدين—من السُّوتا مع الماغَدها—وقد تزيّنوا بأقراط كالجواهر مصقولة الإتقان، يرفعون أصواتهم بإنشاد مناقب هذا البطل وهو يتقدّم، تحفّ به بهجة المُلك وحاشية السلطان.»

Verse 21

एन॑ नित्यमुपासन्त कुरव: किंकरा यथा । सर्वे च राजन्‌ राजानो धनेश्वरमिवामरा:,राजन! जैसे देवगण धनाध्यक्ष कुबेरका दरबार किया करते हैं, वैसे ही सब राजा और कौरव किंकरोंकी भाँति इनकी नित्य उपासना करते थे

قال أرجونا: «أيها الملك، كان الكورو يلازمون خدمته على الدوام كأنهم عبيد. بل إن جميع الملوك كانوا يؤدّون له التحية والخضوع، كما تحضر الآلهة مجلس كوبيرا، ربّ الثروة.»

Verse 22

एष सर्वान्‌ महीपालान्‌ करदान्‌ समकारयत्‌ | वैश्यानिव महाभागो विवशान्‌ स्ववशानपि

قال أرجونا: «إن هذا الملك الجليل ألزم جميع ملوك الأرض أن يصيروا دافعي جزية. وكأنهم من طبقة الفيشيا، شاءوا أم أبوا، أخضعهم لسلطانه وجعلهم يؤدّون الخراج.»

Verse 23

अष्टाशीतिसहस््राणि स्नातकानां महात्मनाम्‌ । उपजीवन्ति राजानमेनं सुचरितव्रतम्‌

قال أرجونا: «ثمانيةٌ وثمانون ألفًا من السْناتَكا ذوي النفوس العظيمة (من أرباب البيوت العلماء الذين أتمّوا دراستهم الفيدية) يعتاشون على كفالة هذا الملك، الثابت على نذورٍ حسنة السيرة.»

Verse 24

एष वृद्धाननाथांश्व पड्गूनन्धांश्व मानवान्‌ । पुत्रवत्‌ पालयामास प्रजा धर्मेण वै विभु:

كان ذلك الملك الجبّار يحمي حتى الشيوخ والعاجزين والعرج والعميان من بين رعيّته. متمسّكًا بالدارما، كان يرعى شعبه بعنايةٍ تماثل عناية المرء بحفظ أبنائه وتربيتهم—مثالًا للملوكية قائمًا على الرحمة والواجب القويم.

Verse 25

एष धर्म दमे चैव क्रोधे चापि जितव्रतः । महाप्रसादो ब्रह्माण्य: सत्यवादी च पार्थिव:

قال أرجونا: «إن هذا الملك ثابتٌ على الدارما وعلى ضبط النفس، وقد نذر نذرًا راسخًا لقهر الغضب. وهو عظيم الإحسان، مُجلٌّ للبراهمة، صادقُ القول».

Verse 26

शीघ्र तापेन चैतस्य तप्यते स सुयोधन: । सगण: सह कर्णेन सौबलेनापि वा विभु:,इनके प्रतापसे दुर्योधन शक्तिशाली होकर भी कर्ण, शकुनि तथा अपने गणोंके साथ शीघ्र ही संतप्त होनेवाला है

قال أرجونا: «إن سُيودَهَنَة (دوريودَهَنَة)، على ما له من قوة، سيُحرق قريبًا بحرارة هذا الأمر. ومع أتباعه—مع كَرْنَة وحتى شَكُوني ابن سوبالا—سيقع سريعًا في الهلاك».

Verse 27

न शक्‍्यन्ते हास्य गुणा: प्रसंख्यातुं नरेश्वर । एष धर्मपरो नित्यमानृशंसश्न पाण्डव:

قال أرجونا: «أيها الملك، لا تُحصى فضائله عدًّا. إن هذا ابن باندو مواظبٌ على الدارما، رحيمُ الطبع. يا سيد الرجال، كيف لا يكون يودهيشثيرا—جوهرة التاج بين الملوك—وهو ذو هذه الخصال السامية، جديرًا بمقعدٍ ملكي؟»

Verse 28

एवं युक्तो महाराज: पाण्डव: पार्थिवर्षभ: । कथं नाहति राजाहमासनं पृथिवीपते

قال أرجونا: «أيها الملك العظيم، يا ثور الملوك بين الحكّام، هذا الباندافيّ الموصوف بهذه الفضائل، كيف لا يستحق المقعد الملكي؟ يا ربّ الأرض، يا سيّد الرجال! إن خصاله الشريفة لا تُحصى. ابن باندو مواظبٌ على الدارما، رحيمُ الطبع. أيها الملك، كيف لا يكون يودهيشثيرا—جوهرة تاج الملوك جميعًا—وهو ذو أسمى المزايا، صاحبَ حقٍّ في العرش؟»

Verse 70

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पाण्डवप्रकाशे सप्ततितमो< ध्याय:

هكذا تنتهي الفصل السبعون من «فيراطا بارفا» (Virāṭa Parva) من «المهابهاراتا» المباركة، ضمن القسم المتعلّق بالزواج (Vaivāhika-parvan)، في الحلقة المعروفة بـ«انكشاف الباندافا». وهذه خاتمة فصل (colophon) لا بيتًا منطوقًا، تُثبّت موضع السرد عند اللحظة التي انجلت فيها هويات الباندافا المستترة، وانفتح الطريق لتحالفٍ مشروعٍ ولإعادة إقامة الدارما عبر روابط اجتماعية شرعية.

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