
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, पुत्र के जंघा-भंग से पृथ्वी पर गिरने का समाचार सुनकर, संजय से पूछते हैं—परमाहव में उस टूटे हुए, क्रोधाग्नि से दग्ध दुर्योधन ने क्या कहा? → संजय ‘यथावृत्त’ वर्णन आरम्भ करते हैं: रणभूमि में पराजित-देह, पर अडिग-अहंकार वाला दुर्योधन अपने सारथियों/वाहकों और आसपास के जनों को संबोधित कर विलाप करता है, अपने प्रियजनों—दुःशासन, लक्ष्मण और असंख्य कौरवों—का स्मरण कर संदेश भेजने की व्यवस्था करता है; माता-पिता के शोक की कल्पना उसे भीतर से मथती है, पर वह अपने ‘क्षत्रिय-धर्म’ की ढाल भी उठाए रहता है। → दुर्योधन अपने अंत को ‘इष्ट’ क्षत्रिय-मृत्यु घोषित करता है—समन्तपञ्चक क्षेत्र में मृत्यु पाकर सनातन लोकों की प्राप्ति का दावा करता है; उसके प्रलाप/घोषणा से जनसमूह अश्रुपूर्ण हो उठता है और भय-व्याकुल होकर दसों दिशाओं में भागता है। → विलाप के बाद दृश्य का निष्कर्ष भयावह संकेतों में उतरता है—धरती समुद्र-वन-चराचर सहित काँपती है, दिशाएँ व्याकुल होती हैं, वज्र-गर्जना-सा नाद फैलता है; दुर्योधन का अंत निकट और अपरिहार्य प्रतीत होता है। → प्रकृति के इन अपशकुनों के बीच, टूटे हुए राजा के अंतिम क्षणों में आगे कौन-सा संदेश पहुँचेगा और किसके हाथों अंतिम परिणति घटेगी—यह प्रश्न अगले अध्याय पर छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
अत्-#-#क+ चतु:षष्टितमो<5 ध्याय: दुर्योधनका संजयके सम्मुख विलाप और वाहकोंद्वारा अपने साथियोको संदेश भेजना धृतराष्ट्र रवाच अधिष्ित: पदा मूर्थ्नि भग्नसक्थो महीं गत: । शौटीर्यमानी पुत्रो मे किमभाषत संजय
قال دريتاراشترا: «يا سنجيا، حين سقط ابني على الأرض وقد تكسّرت فخذاه، ووضع خصمه قدمه على رأسه، ماذا قال؟ لقد كان مغترًّا ببأسه. وفي ساحة القتال تلك، إذ وقع في بلاءٍ عظيم، بأيّ كلمات نطق دوريودھانا؟»
Verse 2
अत्यर्थ कोपनो राजा जातवैरश्न पाण्डुषु व्यसन परमं प्राप्त: किमाह परमाहवे
قال فايشَمبايانا: إن الملك دوريودھانا، شديد الغضب، المولود على عداوةٍ لباندافا، قد وقع في أقصى البلاء في تلك المعركة العظمى. فماذا قال حينئذ؟ (ويُسأل هذا في سياق أنّه بعد أن كُسرت فخذاه سقط إلى الأرض، ووضع بهيماسينا قدمه على رأس دوريودھانا—وهو فعلٌ يزيد حدّة التوتر الأخلاقي بين نصرٍ يُعدّ حقًّا وبين إفراط الانتقام.)
Verse 3
संजय उवाच शृणु राजन प्रवक्ष्यामि यथावृत्तं नराधिप । राज्ञा यदुक्त भग्नेन तस्मिन् व्यसन आगते
قال سنجيا: «اسمع يا ملك؛ سأقصّ عليك ما جرى على وجهه، يا سيّد الرجال—ما نطق به ذلك الملك حين انكسر وداهمته النازلة.»
Verse 4
संजयने कहा--राजन्! सुनिये। नरेश्वर! उस भारी संकटमें पड़ जानेपर टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनने जो कुछ कहा था, वह सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ ।।
قال سنجيا: «أيها الملك، اصغِ. يا سيّد الرجال، إذ وقع في تلك النازلة العظيمة، سأقصّ عليك صدقًا كل ما قاله الملك دوريودھانا وقد تكسّرت فخذاه. كان الملك، وفخذاه مكسوران، مطروحًا على الأرض، مغطّى بالغبار. جمع شعره المنفلت ونظر حوله إلى الجهات العشر. ثم أخذ يعيب أكبر الباندافا، وأطلق زفرةً مُرّة وشرع يتكلم—نَفَسُه خشن، وقلبه متّقد بالغضب والمهانة.»
Verse 5
केशान् नियम्य यत्नेन नि:श्वसन्नुरगो यथा । संरम्भाश्रुपरीताभ्यां नेत्राभ्यामभिवीक्ष्य माम्
قال سانجيا: «بجهدٍ كبحَ شعره، وهو يلهثُ لَهاثَ الأفعى، ثم حدّق إليّ بعينين غمرتهما دموعٌ وُلِدت من اضطرابٍ عاصفٍ شديد.»
Verse 6
बाहू धरण्यां निष्पिष्य सुदुर्मत्त इव द्विप: । प्रकीर्णान् मूर्थजान् धुन्वन् दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन्
قال سانجيا: «كان يضغط ذراعيه على الأرض سحقًا كفيلٍ هائجٍ مسعور، ويهزّ شعره المنفلت، ويطحن أسنانه بأسنانه—عاصفةٌ ظاهرة من الحزن والسخط، تُبيّن كيف تدفع الحرب حتى الأقوياء إلى كربٍ عاجزٍ يلتهم صاحبه.»
Verse 7
भीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे शस्त्रभृतां वरे
قال سانجيا: «حين كان بهيشما، ابن شانتانو، السيد الحامي، وحين كان كارنا، المتقدّم بين حَمَلة السلاح، (حاضرين/مُتَّخَذين قادة)…»
Verse 8
गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे । अश्वत्थाम्नि तथा शल्ये शूरे च कृतवर्मणि
قال سانجيا: «في غوتاما، وفي شاكوني أيضًا، وفي درونا—وهو المتقدّم بين حَمَلة السلاح—وكذلك في أشڤاتثاما، وفي شاليا، وفي كريتافارمان البطل…»
Verse 9
इमामवस्थां प्राप्तोडस्मि कालो हि दुरतिक्रम: । 'शान्तनुनन्दन भीष्म, अस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण, कृपाचार्य, शकुनि, अस्त्रधारियोंमें सर्वश्रेष्ठ द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, शूरवीर शल्य तथा कृतवर्मा मेरे रक्षक थे तो भी मैं इस दशाको आ पहुँचा। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है।।
قال سانجيا: «لقد انتهيتُ إلى هذه الحال، لأن كالا—الزمن/القَدَر—عسيرٌ حقًّا أن يُتَجاوَز. ومع أن حُماتي كانوا بهيشما ابن شانتانو، وكارنا المتقدّم بين حَمَلة السلاح، والمعلّم كريبا، وشاكوني، ودرونا أفضلَ جميعِ حَمَلة السلاح، وأشڤاتثاما، وشاليا البطل، وكريتافارمان—فقد سقطتُ مع ذلك في هذه الورطة. حقًّا إن تجاوزَ حكم الزمن بالغُ الصعوبة على أيّ أحد. أنا، قائدُ إحدى عشرة فرقة، قد بلغتُ هذه الحال.»
Verse 10
आखूयातव्यं मदीयानां ये5स्मिन् जीवन्ति संयुगे
قال سنجيا: «يجب أن يُبلَّغ قومي—مَن لا يزالون أحياءً في هذه المعركة».
Verse 11
बहूनि सुनृशंसानि कृतानि खलु पाण्डवै:
قال سنجيا: «حقًّا لقد ارتكب الباندافا أعمالًا كثيرة قاسيةً لا رحمة فيها».
Verse 12
इदं चाकीर्तिजं कर्म नृशंसै: पाण्डवै: कृतम्
قال سنجيا: «وهذا أيضًا فعلٌ يجلب العار—صنيعُ قسوةٍ ارتكبه الباندافا».
Verse 13
का प्रीति: सत्त्वयुक्तस्य कृत्वोपधिकृतं जयम्
قال سنجيا: «أيُّ رضًا لمن استقام على الفضيلة الحقّة، إذا لم تُنال الغلبة إلا بشروطٍ مُصطنعة وحِيَلٍ خفيّة؟»
Verse 14
अधर्मेण जयं लब्ध्वा को नु हृष्येत पण्डित:
قال سنجيا: «إذا نال المرءُ النصرَ باللاأدرما (adharma)، فأيُّ حكيمٍ يفرح حقًّا؟ إن ظفرًا مولودًا من اللاأدرما لا يكون سببًا لرضًا صادقٍ عند من يفهم الدهرما وعواقبها».
Verse 15
किन्नु चित्रमितस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम
قال سنجيا: «وما العجب في هذا اليوم حقًّا—أنني، وقد تَهَشَّم فخذي، أكون الآن على هذه الحال؟»
Verse 16
प्रतपन्तं श्रिया जुष्टं वर्तमानं च बन्धुषु
قال سنجيا: «(كان) متَّقِدًا بالبأس، مُؤيَّدًا بالحظ، ويتحرّك بين ذوي قرباه (في وسط قومه).»
Verse 17
अभिशनज्ञौ युद्धधर्मस्य मम माता पिता च मे
قال سنجيا: «إن أمي وأبي عالمان بدَرْمَةِ الحرب. فإذا سمعا خبر موتي غمرهما الحزن. فبلّغهما، بطلبٍ مني، هذه الرسالة: أنني أقمتُ القرابين، وكفلتُ من يستحق النفقة، وحكمتُ الأرض حكمًا حسنًا حتى حدود البحر.»
Verse 18
तौ हि संजय दुःखार्तो विज्ञाप्यौ वचनाद्धि मे । इष्टं भृत्या भृता: सम्यग् भू: प्रशास्ता ससागरा
قال سنجيا: «يا سنجيا، إن هذين—والديَّ—سيغمرهما الأسى لا محالة حين يسمعان بموتي. لذلك، وبطلبي، عليك أن تبلّغهما هذه الرسالة: أنني أديتُ القرابين المأمور بها على وجهها، وكفلتُ من كان يعتمد عليّ كفالةً حسنة، وحكمتُ الأرض حكمًا صالحًا حتى البحر المحيط.»
Verse 19
मूर्थ्नि स्थितममित्राणां जीवतामेव संजय । दत्ता दाया यथाशक्ति मित्राणां च प्रियं कृतम्
قال سنجيا: «يا سنجيا، ما دام الأعداء أحياءً فقد وقفتُ فوقهم سيادةً وغلبة؛ ووزّعتُ الأنصبة والهبات بقدر طاقتي، وصنعتُ أيضًا ما يسرّ أصدقائي.»
Verse 20
मानिता बान्धवा: सर्वे वश्य: सम्पूजितो जन:
قال سنجيا: «لقد كُرِّم جميعُ ذوي القُربى كما ينبغي، وأُخضع الناسُ للنظام والسلطان—مُحاطين بالاحترام التامّ ومُستقبَلين على الوجه اللائق».
Verse 21
त्रितयं सेवितं सर्व को नु स्वन्ततरो मया । “मैंने सभी बन्धु-बान्धवोंको सम्मान दिया। अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले लोगोंका सत्कार किया और धर्म, अर्थ एवं काम सबका सेवन कर लिया। मेरे समान सुन्दर अन्त किसका हुआ होगा? ।।
«لقد أكرمتُ جميعَ الأقارب والأهل. وأحسنتُ استقبالَ من كانوا تحت أمري، واستوفيتُ الثلاثة: الدَّرْمَا (الواجب)، والأَرْثَا (المصلحة/الثروة)، والكَامَا (اللذة). فمن ذا الذي نال خاتمةً أجمل من خاتمتي؟ ثم إن منزلةً نادرةً بين الملوك قد نلتُها بأمرٍ مُطاع.»
Verse 22
यातानि परराष्ट्राणि नूपा भुक्ताश्च दासवत्
قال سنجيا: «لقد مضَوا إلى ممالكَ أخرى، وهناك أُكرهوا على العيش تبعًا لغيرهم—يُستَخدمون ويُستَغلّون كأنهم عبيد.»
Verse 23
अधीतं विधिवदू दत्तं प्राप्तमायुर्निरामयम्
قال سنجيا: «لقد درستُ كما هو مقرر، وقدّمتُ العطايا على الوجه الصحيح، ونلتُ عمرًا طويلًا خاليًا من السقم. وبحسن الطالع كانت لي ثروةٌ ملكيةٌ عظيمة، ولم تنتقل إلى يدِ غيري إلا بعد موتي، يا ذا البأس.»
Verse 24
स्वर्मेण जिता लोका: को नु स्वन्ततरो मया । दिष्ट्या नाहं जित: संख्ये परान् प्रेष्यवदाश्रित:
قال سنجيا: «بسلوكي أنا غلبتُ عوالمَ السماء—فمن ذا يكون أملكَ لنفسه مني؟ وبحسن الطالع لم أُهزم في المعركة، ولم أُذَلّ حتى أعيش معتمدًا على غيري كخادمٍ حقير.»
Verse 25
यदि क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम्
قال سانجيا: «لو أنّ أولئك الذين ليسوا إلا “أقرباء للكشاتريا” ومع ذلك يدّعون منزلة المحارب، اتّبعوا حقًّا واجبهم الخاص…»
Verse 26
दिष्ट्या नाहं परावृत्तो वैरात् प्राकृतवज्जित:
قال سانجيا: «بحسن الطالع لم أرتدّ بسبب العداوة، ولم أسلك سلوكًا دنيئًا كسلوك العامة.»
Verse 27
सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद् विषेण वा
قال سانجيا: «كما قد يصرع المرء رجلًا نائمًا أو غافلًا—أو يهلكه بالسم—فكذلك يُذكر هذا النمط من القتل»، مشيرًا إلى فعلٍ خفيٍّ مُستنكرٍ ينتهك شريعة المحارب في القتال المكشوف.
Verse 28
अश्वत्थामा महाभाग: कृतवर्मा च सात्वत:
قال سانجيا: كان أشوَتثاما، الجليل الشأن، وكريتَفارما من سلالة الساتڤَتة هناك—وقد ذُكرا بوصفهما من أبرز الفاعلين في ما يتكشف من عواقب ما بعد الحرب، حيث تظلّ الولاءات الشخصية وبقايا العنف تُشكّل الخيارات والنتائج.
Verse 29
अधर्मेण प्रवृत्तानां पाण्डवानामनेकश:
قال سانجيا: «بوجوهٍ كثيرة، فإنّ الباندافا—وقد اندفعوا إلى الفعل بوسائل لا تقوم على الدارما—…»
Verse 30
वार्तिकांश्षाब्रवीद् राजा पुत्रस्ते सत्यविक्रम:
قال سانجيا: ثم إنّ الملك—ابنك، الثابت في بسالةٍ صادقة—نطق بهذه الكلمات: «سأتبعهم، كمسافرٍ تُرك خلف الركب بعدما فقد قافلته». وفي سياق الخبر، يصوّر دوريودhana موته الوشيك رحلةً منفردةً بعد سقوط رفاقه، مُلمِّحًا إلى حسابٍ أخلاقيٍّ قاتمٍ عقب حربٍ يراها قد انتهت بالأدهرما (اللا-حق).
Verse 31
अधर्माद् भीमसेनेन निहतो<हं यथा रणे । सोऊ हं द्रोणं स्वर्गगतं कर्णशल्यावुभौ तथा
قال سانجيا: «في ساحة القتال قُتلتُ على يد بهيماسينا بفعلٍ من الأدهرما. وهكذا أمضي لألقى درونا الذي مضى إلى السماء، وكذلك كَرْنا وشاليا كليهما.»
Verse 32
वृषसेनं महावीर्य शकुनिं चापि सौबलम् । जलसन्ध॑ महावीर्य भगदत्तं च पार्थिवम्
قال سانجيا: «(وكان هناك) فْرِشَسينا، ذو بأسٍ عظيم؛ وشكوني أيضًا، ابن سوبالا؛ وجالاسندها شديد البأس؛ والملك بهاگاداتّا كذلك.»
Verse 33
सोमदत्तं महेष्वासं सैन्धवं च जयद्रथम् । दुःशासनपुरोगांश्न भ्रातृनात्मसमांस्तथा
قال سانجيا: «(ولقي) سوماداتّا، الرامي العظيم، وجايادراثا أمير السِّندهو؛ ولقى أيضًا إخوته يتقدّمهم دوحشاسانا—رجالًا يساوونه عزمًا.»
Verse 34
दौ:शासनिं च विक्रान्तं लक्ष्मणं चात्मजावुभौ । एतांश्वान्यांश्व सुबहून् मदीयांश्व सहस्रश:
قال سانجيا: «(ورأيت) ابن دوحشاسانا الشجاع، ولاكشمانا، وكلا الابنين؛ وإلى جانب هؤلاء كثيرين غيرهم—آلافًا مؤلّفة من محاربي جانبي.»
Verse 35
कर्थ॑ भ्रातृन् हतान् श्र॒त्वा भर्तारं च स््वसा मम
قال سنجيا: «كيف كان ردُّ أختي حين سمعت أن إخوتها قد قُتلوا وأن زوجها أيضًا قد سقط؟»
Verse 36
स््नुषाभि: प्रस्नुषाभिश् वृद्धो राजा पिता मम
قال سنجيا: «كان أبي الملك، وقد أثقلته الشيخوخة، محاطًا بكنّاته وكنّات أحفاده.»
Verse 37
नूनं लक्ष्मणमातापि हतपुत्रा हतेश्वरा
قال سنجيا: «لا ريب أن أمَّ لكشمانا أيضًا—وقد فُجِعت بابنها وقُتل زوجها—قد صرعتها لوعةُ الحزن.»
Verse 38
यदि जानाति चार्वाक: परिव्राड् वाग्विशारद:
قال سنجيا: «إن كان تشارفـاكا—وهو ناسكٌ جوّالٌ بليغٌ حاذقٌ بالكلام—يعلم حقًّا (الأمر)…»
Verse 39
समन्तपज्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्वरुते
قال سنجيا: في سَمَنْتَپَنْچَكَة المقدّسة—المشهود لها في العوالم الثلاثة—
Verse 40
ततो जनसहस्राणि बाष्पपूर्णानि मारिष
ثمّ، أيها الجليل، امتلأ آلاف الناس بالدموع.
Verse 41
ससागरवना घोरा पृथिवी सचराचरा
قال سنجيا: إن الأرض المروِّعة—ببحارها وغاباتها، وبكل ما يتحرّك وما لا يتحرّك—بدت كأنها ترتجف من الفزع.
Verse 42
ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं नयवेदयन्
قال سنجيا: إن أولئك الرسل دنوا من ابن درونا (أشڤاتثاما) وأخبروه، كما وقع تمامًا، بالخبر كله—كيف تصرّف بهيماسينا في قتال الهراوة وكيف أُسقط الملك. وقد ألهبتهم الحسرة لما نقلوه، فلبثوا زمنًا طويلًا غارقين في فكرٍ قَلِق؛ ثم، وقد غمر الحزن والضيق عقولهم، انصرفوا كما جاءوا.
Verse 43
व्यवहारं गदायुद्धे पार्थिवस्थ च पातनम् | तदाख्याय तत: सर्वे द्रोणपुत्रस्य भारत ।।
قال سنجيا: «يا بهاراتا، بعدما أخبروا ابن درونا بكل شيء—كيف جرى قتال الهراوة وكيف أُسقط الملك—أولئك الرسل، وقد أحرقتهم اللوعة وضُربت عقولهم بالحزن، مكثوا طويلًا غارقين في التفكير. ثم، وقد استبدّ بهم الأسى والعويل، انصرفوا كما جاءوا».
Verse 63
गर्हयन् पाण्डवं ज्येष्ठं नि:श्वस्पेदमथाब्रवीत् । राजन्! जब कौरव-नरेशकी जाँघें टूट गयीं तब वह धरतीपर गिरकर धूलमें सन गया। फिर बिखरे हुए बालोंको समेटता हुआ वहाँ दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा। बड़े प्रयत्नसे अपने बालोंको बाँधकर सर्पके समान फुफकारते हुए उसने रोष और आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंद्वारा मेरी ओर देखा। इसके बाद दोनों भुजाओंको पृथ्वीपर रगड़कर मदोन्मत्त गजराजके समान अपने बिखरे केशोंको हिलाता
قال سنجيا: وهو يذمّ أكبر أبناء الباندافا، أطلق زفراتٍ عميقة ثم تكلّم. فلما تكسّرت فخذا ملك الكورافا وسقط في التراب متلطّخًا بالغبار، جمع شعره المنفوش ونظر إلى الجهات العشر، ثم—بمشقة—شدّ شعره وأخذ يفحيح كالأفعى. وبعينين منتفختين من الغضب والدموع رمقني؛ ثم أخذ يحكّ ذراعيه بالأرض كفيلٍ مهيبٍ ثمل، يهزّ خصلاته المنسدلة، ويصرّ على أسنانه، ويقع في يودهيشثيرا، أكبر الباندافا، ثم استجمع أنفاسه وقال على هذا النحو—
Verse 64
इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनविलापे चतु:षष्टितमो<5ध्याय: ।। धड ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधनका विलापविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
قال سَنجايا: «هكذا، في المهابهاراتا المقدّسة، ضمن شاليا بارفا—وخاصةً في غادا بارفا—تنتهي الفَصْلَة الرابعة والستون، في شأن نواح دوريوذانا». وهذه الخاتمةُ تُعلن تمامَ مقطعٍ يُؤطِّر الانهيارَ الأخلاقيَّ والوجدانيَّ لحاكمٍ مهزوم؛ إذ يغدو حزنُ دوريوذانا مرآةً سرديةً لعواقب الكِبْر، والأدهرما، والخراب الذي تخلّفه الحرب.
Verse 93
काल प्राप्प महाबाहो न कश्िदतिवर्तते । “महाबाहो! मैं एक दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था; परंतु आज इस दशामें आ पड़ा हूँ। वास्तवमें कालको पाकर कोई उसका उल्लंघन नहीं कर सकता
قال سَنجايا: «يا عظيمَ الساعد، إذا حضر الزمان (كالا) فلا أحد يستطيع أن يتجاوزه. حتى من كان يومًا سيّدَ إحدى عشرة أكشوهيني من الجيوش قد يُساق إلى هذه الحال؛ إذ حقًّا لا أحد يقدر أن يخرق قضاء الزمان.»
Verse 106
यथाहं भीमसेनेन व्युत्क्रम्य समयं हतः । “मेरे पक्षके वीरोंमेंसे जो लोग इस युद्धमें जीवित बच गये हों, उन्हें यह बताना कि भीमसेनने किस तरह गदायुद्धके नियमका उल्लंघन करके मुझे मारा
قال سَنجايا: «كيف قُتلتُ على يد بهيماسينا بعدما تجاوز القاعدة المتَّفَق عليها (في مبارزة الصولجان).» تُصوِّر هذه العبارةُ القتلَ على أنه مشوبٌ بعيبٍ أخلاقي؛ إذ يعرض المتكلمُ موته لا بوصفه هزيمةً في القتال فحسب، بل ثمرةَ خرقٍ لميثاق المبارزة الذي ارتضاه الطرفان.
Verse 116
भूरिश्रवसि कर्णे च भीष्मे द्रोणे च श्रीमति । 'पाण्डवोंने भूरिश्रवा, कर्ण, भीष्म तथा श्रीमान् द्रोणाचार्यके प्रति बहुत-से नृशंस कार्य किये हैं
قال سَنجايا: «لقد ارتكب الباندافا أفعالًا كثيرةً قاسيةً في حقّ بهوريشرافاس، وكرْنا، وبيشما، ودرونا الجليل.» تُبرز هذه العبارةُ توتّرَ الحرب الأخلاقي: فحتى الأبطال المشهورون يغدون موضعَ اتهامٍ بالفظاعة، ويُصوَّر الظفرُ مثقَلًا بعبءٍ أخلاقي لا بطولةً خالصة.
Verse 126
येन ते सत्सु निर्वेद॑ गमिष्यन्ति हि मे मतिः । 'उन क्रूरकर्मा पाण्डवोंने यह भी अपनी अकीर्ति फैलानेवाला कर्म ही किया है, जिससे वे साधु पुरुषोंकी सभामें पश्चात्ताप करेंगे; ऐसा मेरा विश्वास है
قال سَنجايا: «هذه قناعتي: بما صنعوه، سيصيب أولئك الباندافا ذوو السلوك القاسي لطخةً في سمعتهم، وفي مجلس الأخيار سيُساقون إلى الندم.»
Verse 136
को वा समयके त्तारं बुध: सम्मन्तुमर्हति । “छलसे विजय पाकर किसी सत्त्वगुणी या शक्तिशाली पुरुषको क्या प्रसन्नता होगी? अथवा जो युद्धके नियमको भंग कर देता है, उसका सम्मान कौन विद्वान् कर सकता है?
قال سَنْجَيا: «مَن ذا الذي يراه الحكيمُ جديرًا بالإكرام، وهو ينتهك القواعد المتَّفَق عليها في القتال؟ وإذا نال النصرَ بالخديعة، فأيُّ رضا يبقى لرجلٍ حقًّا فاضلٍ أو شديدِ البأس؟ ومن كسر سننَ الحرب، فأيُّ عالمٍ يستطيع أن يوقِّره بحقّ؟»
Verse 143
यथा संहृष्यते पाप: पाण्डुपुत्रो वृकोदर: | “अधर्मसे विजय प्राप्त करके किस बुद्धिमान् पुरुषको हर्ष होगा? जैसा कि पापी पाण्डुपुत्र भीमसेनको हो रहा है
قال سَنْجَيا: «كيف يفرح رجلٌ حكيمٌ بنصرٍ ناله بالأدهرما، بغير الحق؟ ومع ذلك فإن فْرِكودَرا—بهيمسينا ابن باندو—وهو آثمٌ، يتهلّل على هذا النحو.»
Verse 153
क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिर: । “आज जब मेरी जाँघें टूट गयी हैं; ऐसी दशामें कुपित हुए भीमसेनने मेरे मस्तकको जो पैरसे ठुकराया है, इससे बढ़कर आश्वर्यकी बात और क्या हो सकती है?
قال سَنْجَيا: وفي غضبه داس بهيمسينا الرأسَ بقدمه. «اليوم وقد تكسّرت فخذاي؛ وفي مثل هذه الحال ركل بهيمسينا الغاضب رأسي بقدمه—فأيُّ أمرٍ أعجب من هذا؟»
Verse 163
एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै संजय पूजित: । “संजय! जो अपने तेजसे तप रहा हो
قال سَنْجَيا: «يا سَنْجَيا، إنما يُعَدُّ جديرًا بالتبجيل من يسلك هذا المسلك. فحين يكون العدوُّ متَّقدًا بالبأس، تخدمه سَعْدةُ المُلك، ويقف بين أنصاره من ذوي القربى والحلفاء، لا يقدر على معاملته على الوجه المرسوم إلا الشجاعُ الحق. فأيُّ مجدٍ في ضرب من قد قُتِل؟»
Verse 193
अमित्रा बाधिता: सर्वे को नु स्वन्ततरो मया । “संजय! मैंने जीवित शत्रुओंके ही मस्तकपर पैर रखा। यथाशक्ति धनका दान और मित्रोंका प्रिय किया। साथ ही सम्पूर्ण शत्रुओंको सदा ही क्लेश पहुँचाया। संसारमें कौन ऐसा पुरुष है
قال سَنْجَيا: «لقد سُحِقَ جميعُ أعدائي—فمَن ذا الذي لقي خاتمةً أوفرَ حُسنًا من خاتمتي؟ لقد وضعتُ قدمي على رؤوس أعداءٍ ما زالوا أحياء؛ وبقدر استطاعتي بذلتُ المال صدقةً وفعلتُ ما يُرضي أصدقائي؛ وكنتُ أوقع الكربَ بأعدائي جميعًا على الدوام. ففي هذا العالم، أيُّ رجلٍ نال ختامًا جميلًا كختامي؟»
Verse 213
आजानेयैस्तथा यात॑ को नु स्वन्ततरो मया । “बड़े-बड़े राजाओंपर हुक्म चलाया, अत्यन्त दुर्लभ सम्मान प्राप्त किया तथा आजानेय (अरबी) घोड़ोंपर सवारी की, मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा?
قال سَنْجَيا: «لقد ركبتُ خيولَ الآجانيَةِ النفيسة، وبسطتُ أمري على ملوكٍ عظام، ونلتُ من الشرف ما يعزّ نيله—فمَن ذا، حقًّا، لقي خاتمةً خيرًا من خاتمتي؟»
Verse 223
प्रियेभ्य: प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया । “दूसरे राष्ट्रोपर आक्रमण किया और कितने ही राजाओंसे दासकी भाँति सेवाएँ लीं। जो अपने प्रिय व्यक्ति थे
قال سَنْجَيا: «لقد أحسنتُ إلى من كانوا أحبّ الناس إليّ؛ فمن ذا، حقًّا، لقي خاتمةً خيرًا من خاتمتي؟ لقد هاجمتُ ممالكَ أخرى وألزمتُ ملوكًا كثيرين أن يؤدّوا الخدمة كالأرقّاء، ومع ذلك ضمنتُ رفاهَ أحبّتي وصلاحَهم—فأيُّ خاتمةٍ تُعدّ أسمى من خاتمتي؟»
Verse 243
दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीमृते त्वन्यगता विभो । “विधिवत् वेदोंका स्वाध्याय किया
قال سَنْجَيا: «بحُسن الطالع، إنّ السَّعةَ من النعمةِ الملكيّة التي كانت لي لم تنتقل إلى غيري إلا بعد موتي، أيّها الجبّار. لقد أديتُ تلاوةَ الفيدا ودراستَها على وجهها وفق الشعائر، وقدّمتُ عطايا شتّى، ونلتُ عمرًا خاليًا من السقم. وفوق ذلك، بدَرْمِي (دَهَرْمَا) ظفرتُ بعوالم الثواب. فمن ذا، حقًّا، كانت له خاتمةٌ خيرٌ من خاتمتي؟ وبحُسن الطالع لم أُهزم قطّ في قتال، ولم ألتمس ملجأً عند الأعداء كعبدٍ ذليل. وبحُسن الطالع ظلّت السيادةُ العظمى والحظوةُ الملكيّة تحت سلطاني، ولم تفارقني إلى غيري إلا حين غبتُ عن الدنيا.»
Verse 253
निधन तन्मया प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया । “अपने धर्मका पालन करनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वैसी ही मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा?
قال سَنْجَيا: «لقد نلتُ موتًا كما يشتهيه ذوو القربى من الكشاتريا الذين يقيمون دَهَرْمَا المحارب. لذلك، فمن ذا، حقًّا، لقي خاتمةً خيرًا من خاتمتي؟»
Verse 266
दिष्टया न विमतिं कांचिद् भजित्वा तु पराजित: । /हर्षकी बात है कि मैं युद्धमें पीठ दिखाकर भागा नहीं। निम्नश्रेणीके मनुष्यकी भाँति हार मानकर वैरसे कभी पीछे नहीं हटा तथा कभी किसी दुर्विचारका आश्रय लेकर पराजित नहीं हुआ--यह भी मेरे लिये गौरवकी ही बात है
قال سَنْجَيا: «إنها لنعمةٌ أنني، وإن هُزمتُ، لم ألجأ إلى عزمٍ مضلِّلٍ قط. وحتى في الخسارة لم أتّخذ سترًا من استسلامٍ دنيء، ولا من فكرةٍ معوجّةٍ مستقبَحة—وهذا أيضًا موضعُ شرف.»
Verse 273
एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समयं हत: । “जैसे कोई सोये अथवा पागल हुए मनुष्यको मार दे या धोखेसे जहर देकर किसीकी हत्या कर डाले
قال سنجيا: «وهكذا، على يدِ من انحرف عن الدَّرما—بعد أن تجاوز العهدَ المتَّفق عليه في القتال—قُضِيَ عليَّ بضربةٍ أسقطتني.» إن هذا السطر لا يصوِّر القتلَ هزيمةً في ساحة الحرب فحسب، بل خرقًا أخلاقيًّا: فالمتكلِّم يزعم أن الضربة انتهكت “السَّمايا” أي القاعدة المتَّفق عليها في مبارزة الهراوات، ولذلك يعدّها أدهرما لا نصرًا مشروعًا.
Verse 286
कृप: शारद्वतश्वैव वक्तव्या वचनान्मम | “महाभाग अअश्वत्थामा, सात्वतवंशी कृतवर्मा तथा शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य--इन सबको मेरी यह बात सुना देना
قال سنجيا: «بلِّغوا كلماتي إلى كِرِپا ابنِ شارَدْفان. وكذلك إلى أشوَتثاما النبيل، وإلى كِرتَفَرما من سلالة الساتڤَتا. انقلوا رسالتي هذه إليهم جميعًا.»
Verse 296
विश्वासं समयघ्नानां न यूय॑ गन्तुमर्ह थ । 'पाण्डवोंने अधर्ममें प्रवृत्त होकर अनेकों बार युद्धकी मर्यादा तोड़ी है; अतः आपलोग कभी उनका विश्वास न करें"
قال سنجيا: «لا ينبغي لكم أن تضعوا ثقتكم في ناقضي العهود والمواثيق. إن الباندڤا، وقد مالوا إلى الأدهرما، قد خرقوا مرارًا قيود الحرب المتعارف عليها؛ لذلك فلا تعتمدوا عليهم أبدًا.»
Verse 343
पृष्ठतोडनुगमिष्यामि सार्थहीनो यथाध्वग: । इसके बाद आपके सत्यपराक्रमी पुत्र राजा दुर्योधनने संदेशवाहक दूतोंसे इस प्रकार कहा-- 'भीमसेनने रणभूमिमें अधर्मसे मेरा वध किया है। अब मैं स्वर्गमें गये हुए द्रोणाचार्य
قال سنجيا: «سأتبع من خلف—كالمسافر الذي تُرك بلا قافلته.» وفي سياقها تُفصح العبارة عن قفرٍ أخلاقيٍّ ووجدانيٍّ: فمن بعد هلاك الرفاق بالحرب وبالخطأ، لا يبقى للمرء إلا أن يمضي وراءهم إلى المصير ذاته، محرومًا من السند ومن الدلالة.
Verse 356
रोखूयमाणा दु:खार्ता दुःशला सा भविष्यति | “हाय! अपने भाइयों और पतिकी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो अत्यन्त रोदन करती हुई मेरी बहिन दुःशलाकी क्या दशा होगी?
قال سنجيا: «ستغمرها الكآبة ويَنفجر منها نواحٌ لا ينقطع، فتُستَنفَد أختي دُهشَلا. آهٍ—حين تسمع خبر موت إخوتها وموت زوجها، إلى أي حالٍ ستُردّ؟»
Verse 363
गान्धारीसहितकश्नैव कां गतिं प्रतिपत्स्यति । “पुत्रों और पौत्रोंकी बिलखती हुई बहुओंके साथ मेरे बूढ़े पिता राजा धृतराष्ट्र माता गान्धारीसहित किस अवस्थाको पहुँच जायँगे?
قال سنجيا: «ومع غانداري، إلى أيِّ حالٍ أو مآلٍ سيبلغ؟» بعد كارثة كوروكشيترا، يشير هذا السؤال إلى ما يخلّفه الحرب من عاقبةٍ أخلاقية ووجودية: ما الذي ينتظر الشيخ دريتاراشترا وملِكته حين تحطّم نسلُهما ولم يبقَ في الدار إلا النواح؟
Verse 373
विनाशं यास्यति क्षिप्रं कल्याणी पृथुलोचना । “निश्चय ही जिसके पति और पुत्र मारे गये हैं, वह कल्याणमयी विशाललोचना लक्ष्मणकी माता भी सारा समाचार सुनकर तुरंत ही प्राण दे देगी
قال سنجيا: «تلك السيدة المباركة، الواسعة العينين، ستلقى حتفها سريعًا. حقًّا، حين تسمع الخبر كلَّه بأن زوجها وابنها قد قُتلا، فإن أمَّ لكشمانا ستُسلم الروح في الحال.»
Verse 386
करिष्यति महाभागो श्रुवं चापचितिं मम । 'संन्यासीके वेषमें सब ओर घूमनेवाले प्रवचनकुशल चार्वाकको- यदि मेरी दशा ज्ञात हो जायगी तो वे महाभाग निश्चय ही मेरे वैरका बदला लेंगे
قال سنجيا: «إن ذلك الشريف سيمنحني يقينًا ما أستحقه من إرضاءٍ وجزاء. فإذا علم تشارفـاكا البليغ—الذي يطوف في كل مكان متزيّيًا بزيّ الزاهد المتنسّك—بحالي، فإن ذلك الرجل العظيم سيستوفي الثأر لعداوَتي لا محالة.»
Verse 393
अहं निधनमासाद्य लोकानू प्राप्स्यामि शाश्वतान् | “तीनों लोकोंमें विख्यात पुण्यमय समन्त-पंचवकक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होकर अब मैं सनातन लोकोंमें जाऊँगा'
قال سنجيا: «إذا لقيتُ الموتَ بلغتُ العوالمَ الأبدية. فبموتي في سَمَنْتَ-بَنْجَكَة، ذلك الموضع الأسمى بركةً والمشهور في العوالم الثلاثة، أمضي إلى الديار الخالدة.»
Verse 403
प्रलापं नृपते: श्र॒त्वा व्यद्रवन्त दिशो दश । मान्यवर! राजा दुर्योधनका यह विलाप सुनकर हजारों मनुष्योंकी आँखोंमें आँसू भर आये और वे दसों दिशाओंमें भाग चले
قال سنجيا: «لمّا سمعوا نحيبَ الملك استولى عليهم الخوفُ والاضطراب، فاغرورقت عيونُهم بالدموع، وفرّوا إلى الجهات العشر»—صورةٌ تُبيّن كيف أن الحزنَ واليأسَ إذا نُطِقا على لسانِ حاكمٍ زلزلا معنوياتِ من حوله وفتّتا نظامَ الجيش.
Verse 413
चचालाथ सनिर्लहादा दिशश्वैवाविलाभवन् । उस समय समुद्र, वन और चराचर प्राणियोंसहित यह पृथ्वी भयानक रूपसे हिलने लगी। सब ओर वज्रकी-सी गर्जना होने लगी और सारी दिशाएँ मलिन हो गयीं
قال سانجيا: عندئذٍ أخذت الأرض ترتجّ ارتجافًا مروّعًا—مع البحار والغابات وجميع الكائنات المتحركة والساكنة. ودوى من كل جانب قصفٌ كقصف الفَجْرَة (الفَجْرَة/الفَجْرَة: الفَجْرَة هنا بمعنى الفَجْرَة؟) كصاعقة الفَجْرَة، كصوت الفَجْرَة (vajra)، فاسودّت الجهات وتكدّرت، كأنّ الطبيعة نفسها تنكص رهبةً مما ينكشف من عنفٍ في ساحة القتال.
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