
Kṛpa’s Archery Display; Śikhaṇḍin Checked; Suketu Slain; Dhṛṣṭadyumna–Kṛtavarmā Clash (कृपशौर्य–पार्षतहार्दिक्ययुद्धम्)
Upa-parva: Karṇa-parva — Śāradvata-Kṛpa and Pārṣata Engagement Cycle (Chapter 38)
Sañjaya reports that, seeing the Kaurava host distressed by fear of the Pāṇḍavas, leading Kaurava fighters move to recover the situation. A sharp engagement follows: Kṛpa (Śāradvata/Gautama) overwhelms Śikhaṇḍin with dense arrow volleys, disables his chariot team, and forces him to dismount with sword and shield. Śikhaṇḍin’s advance is repeatedly screened by Kṛpa’s fire, prompting Dhṛṣṭadyumna to ride out to counter Kṛpa; Kṛtavarmā immediately intercepts Dhṛṣṭadyumna, producing a separate, intense duel marked by alternating weapon-showers and defensive dispersals. Meanwhile, Suketu (son of Citraketu) attempts to assist by attacking Kṛpa; Kṛpa answers with precise strikes, culminates in a beheading with a razor-headed arrow, and Suketu’s followers scatter. The chapter closes with Dhṛṣṭadyumna, after gaining advantage over his immediate opponent, turning his missiles to restrain advancing Kaurava forces as the melee continues.
Chapter Arc: कौरव-सेना के रथ पर, सारथि-राज शल्य कर्ण को ‘दानवीर’ कहकर नहीं, ‘मूढ़’ कहकर छेड़ते हैं—और उसी क्षण दान का गौरव अपमान का कारण बन जाता है। → शल्य कर्ण के दान को विवेकहीन बताकर कहते हैं कि वह कुबेर की तरह धन लुटाता है, अपात्र-दान के दोष नहीं समझता, और आज अर्जुन के सामने उसका भ्रम टूटेगा। वे उपमानों की शृंखला से कर्ण को ‘शृगाल’ और अर्जुन को ‘सिंह/व्याघ्र’ ठहराते हैं, यह जताते हुए कि वे दुर्योधन के हित के लिए बोल रहे हैं। → शल्य का तीखा निर्णायक प्रहार—‘तुम नित्य शृगाल हो, धनंजय नित्य सिंह’—और बल-भेद के उदाहरण (चूहा-बिलाव, कुत्ता-व्याघ्र, शृगाल-सिंह, खरगोश-हाथी; असत्य-सत्य, विष-अमृत) कर्ण की प्रतिष्ठा पर सीधा आघात करते हैं। → कर्ण प्रत्युत्तर देता है कि वह अपने बाहुबल के भरोसे रण में अर्जुन को ललकारता है; शल्य को ‘मित्रमुख शत्रु’ कहकर उसकी वाणी को भय-उत्पादक और विश्वासघाती ठहराता है। → अर्जुन से होने वाले निर्णायक संग्राम से ठीक पहले, सारथि की वाणी और योद्धा का अहं आमने-सामने खड़े हैं—क्या कर्ण शल्य की कटु भविष्यवाणी को झुठला पाएगा?
Verse 1
अपन का बा | अत-#-#कत एकोनचत्वारिशोड ध्याय: शल्यका कर्णके प्रति अतन्त आक्षेपपूर्ण वचन कहना शल्य उवाच मा सूतपुत्र दानेन सौवर्ण हस्तिषड्गवम् । प्रयच्छ पुरुषायाद्य द्रक्ष्यसि त्वं धनंजयम्
قال شَليَة: «يا ابن السائق، لا تُعطِ اليومَ أحدًا، على سبيل الهبة، تلك العربةَ الذهبيةَ التي تجرّها ستةُ ثيرانٍ ممتلئةٍ قوية، جبّارةٌ كالفيل. فإنك اليوم لا محالة سترى دهننجايا (أرجونا).»
Verse 2
बाल्यादिह त्वं त्यजसि वसु वैश्रवणो यथा । अयल्नेनैव राधेय द्रष्टास्यद्य धनंजयम्,राधापुत्र! तुम मूर्खतासे ही यहाँ कुबेरके समान धन लुटा रहे हो, आज अर्जुनको तो तुम बिना यत्न किये ही देख लोगे
قال شَليَة: «يا ابن رادها، إنك من محض طيشٍ صبيانيّ تُبدِّد ثروتك هنا، كأنك أنتَ فايشرافَنا (كوبيـرا) نفسه. واليوم سترى دهننجايا (أرجونا) من غير عناءٍ ولا سعي.»
Verse 3
परान् सृजसि यद् वित्तं किंचित्त्वं बहु मूढवत् । अपात्रदाने ये दोषास्तान् मोहान्नावबुध्यसे
قال شَليَة: «ما دمتَ تُخرِج كثيرًا من مالك للآخرين كالمضلَّل، فإن ذلك يدلّ على أنك، من فرط الافتتان، لا تُدرِك العيوب التي تنشأ من بذل العطايا لغير المستحقّين.»
Verse 4
यत् त्वं प्रेरयसे वित्तं बहु तेन खलु त्वया । शक्यं बहुविधैर्यज्ञिर्यट्टं सूत यजस्व तै:
يا سوتا! إنك تُعلن هنا أنك ستبذل مالًا كثيرًا؛ وبذلك المال حقًّا يمكن إقامة أنواع شتّى من اليَجْنَا (القرابين). فإذًا، يا سوتا، أقم اليَجْنَا بتلك الثروات والنعَم.
Verse 5
यच्च प्रार्थयसे हन्तुं कृष्णौ मोहाद् वृथैव तत् । न हि शुश्रुम सम्मर्दे क्रोष्टा सिंहौ निपातितो
وأما ما تطلبه—بدافع الوهم—من قتل شري كريشنا وأرجونا، فذلك سعيٌ باطل. فما سمعنا قطّ أن ابنَ آوى يصرع أسدين في ساحة القتال.
Verse 6
अप्रार्थितं प्रार्थयसे सुह्ददो न हि सन्ति ते । ये त्वां न वारयन्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने
«إنك تطلب ما لم يطلبه أحد من قبل. ويبدو أنه لا مُحبّين صادقين لك—أولئك الذين كانوا سيُسارعون إلى كفّك وأنت تندفع رأسًا إلى النار.»
Verse 7
कार्याकार्य न जानीषे कालपक्वो<5स्यसंशयम् | बह्नबद्धमकर्णीयं को हि ब्रूयाज्जिजीविषु:
«إنك لا تعرف البتّة ما ينبغي فعله وما لا ينبغي. ولا شكّ أن الزمان قد أنضجك للموت—كثمرةٍ ناضجةٍ توشك أن تسقط. وإلا فأيُّ رجلٍ ما زال يرغب في الحياة ينطق بهذا القدر من الكلام القاسي، غير اللائق بالسماع، العبثي؟»
Verse 8
समुद्रतरणं दोर्भ्या कण्ठे बद्ध्वा यथा शिलाम् | गिर्यग्राद् वा निपतनं तादूक् तव चिकीर्षितम्
«إن ما تنويه من سعيٍ كمن يريد عبور البحر بقوة ذراعيه وقد ربط حجرًا في عنقه، أو كمن يتمنى أن يهوي من قمة جبل إلى الأرض. كذلك فإن مجمل كدحك ورغبتك تدميرٌ للذات، ومآله الفشل لا محالة.»
Verse 9
सहित: सर्वयोधैस्त्वं व्यूढानीकै: सुरक्षित: । धनंजयेन युध्यस्व श्रेयश्वेत् प्राप्तुमिच्छसि
قال شاليا: «اثبتْ مع جميع محاربيك مجتمعين، في حماية تشكيلٍ قتاليٍّ مُحكمٍ مُرتَّب، وقاتِلْ دهننجايا (أرجونا). فإن كنتَ تريد بلوغ ما هو حقًّا أنفعُ وأصلح (śreyas)، فواجهه في القتال تحت هذا الحِمى المنضبط».
Verse 10
हितार्थ धार्तराष्ट्रस्य ब्रवीमि त्वां न हिंसया । श्रद्धस्वैवं मया प्रोक्तं यदि तेडस्ति जिजीविषा
قال شاليا: «إنما أقول لك ابتغاءَ مصلحةِ ابنِ دِهرتراشترا، لا رغبةً في الإيذاء. فصدِّق ما قلته لك على هذا النحو—إن كانت فيك بعدُ رغبةٌ في الحياة».
Verse 11
कर्ण उवाच स्वबाहुवीर्यमाश्रित्य प्रार्थयाम्यर्जुनं रणे । त्वं तु मित्रमुख: शत्रुर्मा भीषयितुमिच्छसि
قال كارنا: «يا شاليا! إنما أعتمد على بأس ذراعيّ وبطولتي، وأتطلع إلى لقاء أرجونا في ساحة القتال. أما أنت فصديقٌ باللسان، عدوٌّ في الحقيقة، تريد أن تُرهبني هنا.»
Verse 12
न मामस्मादभिप्रायात् कश्चिदद्य निवर्तयेत् । अपीन्द्रो वज्मुद्यम्य किमु मर्त्य: कथंचन
«ولكن لا أحد اليوم يستطيع أن يردّني عن هذا العزم. حتى إندرا، رافعًا صاعقته (الفَجْرَ/الفَجْرَا vajra)، لا يقدر أن يزعزعني عن هذا القرار—فكيف بإنسانٍ فانٍ!»
Verse 13
संजय उवाच इति कर्णस्य वाक्यान्ते शल्य: प्राहोत्तरं वच: । चुकोपयिषुरत्यर्थ कर्ण मद्रेश्वर: पुन:
قال سنجيا: «أيها الملك! لما فرغ كارنا من كلامه، أجابه شاليا، سيدُ مَدْرا. وكان يريد أن يستثير في كارنا غضبًا شديدًا مرةً أخرى، فشرع يقول هذه الكلمات—»
Verse 14
यदा वै त्वां फाल्गुनवेगयुक्ता ज्याचोदिता हस्तवता विसृष्टा: । अन्वेतार: कड्कपत्रा: सिताग्रा- स्तदा तप्स्यस्यर्जुनस्थानुयोगात्
قال سنجيا: حين تبدأ تلك السهام—المندفعة بسرعة فالغونا (أرجونا)، والمُحرَّكة بوتر القوس، والمُطلَقة من يده المتمرّسة—المزيّنة بريش النسر، والمسنونة برؤوس بيضاء لامعة حادّة—في اختراق جسدك، فحينئذٍ ستندم، بسبب إصرارك العنيد على تحدّي أرجونا.
Verse 15
यदा दिव्यं धनुरादाय पार्थ: प्रतापयन् पृतनां सव्यसाची । त्वां मर्दयिष्यन्निशितै: पृषत्कै- सस््तदा पश्चात् तप्स्यसे सूतपुत्र
قال سنجيا: حين يأخذ أرجونا—سافْياساشي، البطل الذي يرمي بكلتا يديه—قوسه الإلهي ويُظهر بأسه فيضغط على الجيش، ثم يقصد إلى سحقك بسهامه الحادّة، فحينئذٍ، يا ابن السائق، ستكتوي بعد ذلك بندمٍ مُحرق.
Verse 16
'सूतपुत्र! जब सव्यसाची कुन्तीकुमार अर्जुन अपने हाथमें दिव्य धनुष लेकर शत्रुसेनाको तपाते हुए पैने बाणोंद्वारा तुम्हें रौंदने लगेंगे, तब तुम्हें अपने कियेपर पछतावा होगा ।।
قال سنجيا: يا ابن السائق! حين يأخذ أرجونا ابن كونتي—سافْياساشي رامِي السهام بكلتا يديه—قوسه الإلهي، فيُلهب جموع الأعداء ويطأك بسهامه الحادّة، فستندم على ما صنعت. وكما أن طفلاً راقداً في حجر أمه يتمنى بجهلٍ أن يقبض على القمر، كذلك أنت، وقد أضلّك الوهم، تطمح اليوم إلى قهر أرجونا المتلألئ الجالس على مركبته.
Verse 17
त्रिशूलमाश्रित्य सुतीक्षणधारं सर्वाणि गात्राणि विघर्षसि त्वम् । सुतीक्षणधारोपमकर्म णा त्वं युयुत्ससे यो<र्जुनेनाद्य कर्ण
قال سنجيا: يا كارنا! كأنك تتناول رمحاً ثلاثيّ الشعب حادَّ الحدّ كالموسى، ثم تكشط به جميع أطرافك. هكذا، بإقدامك على فعلٍ في خطورته كحدّ التريشولا، تريد اليوم أن تقاتل أرجونا.
Verse 18
क्रुद्धं सिंह केसरिणं बृहन्तं बालो मूढ: क्षुद्रमृगस्तरस्वी । समाह्दयेत् तद्धदेतत् तवाद्य समाद्टदानं सूतपुत्रार्जुनस्य
قال سنجيا: يا ابن السائق! كما أن مخلوقاً صغيراً طفوليّاً أحمق—غزالاً ضئيلاً سريعاً—قد يتهوّر فيتحدّى أسداً عظيماً ذا لِبدةٍ كثيفة متّقد الغضب، كذلك هو تحدّيك اليوم لأرجونا إلى القتال. إنها استفزازة طائشة، عمياء عن مقدار القوة وعاقبة الأمر.
Verse 19
मा सूतपुत्राह्दय राजपुत्र महावीर्य॑ केसरिणं यथैव । वने शृगाल: पिशितेन तृप्तो मा पार्थमासाद्य विनड्क्ष्यसि त्वम्
قال سنجيا: «يا أيها الأمير العظيم البأس، لا تتخذ قلبَ الأسد لمجرد أنك ابنُ سائقِ العربة. فكما أن ابنَ آوى في الغابة إذا شبع من اللحم توهّم أنه أسد، كذلك لا تندفع إلى بارثا (أرجونا) فتلقى هلاكك».
Verse 20
'सूतपुत्र! तुम महापराक्रमी राजकुमार अर्जुनका आह्वान न करो। जैसे वनमें मांस- भक्षणसे तृप्त हुआ गीदड़ महाबली सिंहके पास जाकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी अर्जुनसे भिड़कर विनाशके गर्तमें न गिरो ।।
قال سنجيا: «يا ابنَ سائقِ العربة، لا تتحدَّ الأميرَ الجبار أرجونا. فكما أن ابنَ آوى إذا شبع من اللحم في الغابة اقترب من أسدٍ شديدٍ فهلك، كذلك لا تصطدم بأرجونا فتسقط في هوّة الدمار. يا كَرْنَة، إنك تدعو إلى القتال ابنَ كونتي، دهننجايا (بارثا)، كأن أرنبًا يستدعي في الحرب فيلًا عظيمًا، أنيابه كالعصا الغليظة ووجهه يقطر بسائل الهياج (المَسْت).»
Verse 21
बिलस्थं कृष्णसर्प त्वं बाल्यात् काछेन विध्यसि । महाविषं॑ पूर्णकोप॑ं यत् पार्थ योद्धुमिच्छसि
قال سنجيا: «بطيشِ الصبيان أنتَ تنخس بعصًا حيّةً سوداء شديدة السُّمّ، جاثمةً في جحرها. وكذلك إن كنتَ حقًّا تريد مقاتلة بارثا (أرجونا) وهو ممتلئ غضبًا—كأفعى عظيمة السُّمّ في ذروة هيجانها—فإنك تستدعي خطرًا سيرتدّ عليك.»
Verse 22
सिंहं केसरिणं क्रुद्धमतिक्रम्याभिनर्दसे । शृगाल इव मूढस्त्वं नूसिंहं कर्ण पाण्डवम्
قال سنجيا: «يا كَرْنَة، إنك تزأر بعد أن تجاوزتَ أسدًا ذا لِبدةٍ وهو في غضبه. كابنِ آوى المخدوع الذي يهين أسدًا هائجًا ثم يعوي، كذلك أنت تتباهى بعد أن استخففتَ بالپاندڤا، “أسدِ الرجال”، أرجونا، الجبار في البأس والمتقد غضبًا.»
Verse 23
सुपर्ण पतगश्रेष्ठ वैनतेयं तरस्विनम् । भोगीवाह्नयसे पाते कर्ण पार्थ धनंजयम्
قال سنجيا: «يا كَرْنَة، كما أن حيّةً تطلب سقوطها فتستدعي السريع ڤايناتيا—غارودا، سيّد الطير—كذلك أنت تتحدّى بارثا دهننجايا (أرجونا)، كأنك تدعو إلى هلاكك بيدك.»
Verse 24
सर्वाम्भसां निर्धि भीम॑ मूर्तिमन्तं झषायुतम् । चन्द्रोदये विवर्धन्तमप्लव: संस्तितीर्षसि
قال سنجيا: «إنك تحاول، من غير قارب، وبيديك العاريتين، أن تعبر ذلك المحيط المهيب—مستودع المياه كلها—المكتظّ بالأسماك وسائر دوابّ الماء، والمتعاظم عند طلوع القمر. إنّه عزمٌ طائشٌ تدفعه الثقة المفرطة، يتجاهل الوسائل الرشيدة وحدود طاقة البشر.»
Verse 25
ऋषभ दुन्दुभिग्रीवं तीक्षणश्द्ढं प्रहारिणम् । वत्स आह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थ धनंजयम्
قال سنجيا: «يا كَرْنَةُ، يا بُنيّ! إنك تتحدّى للقتال أرجونا—بارثا، دهننجايا—وهو كالثور الجسور: حنجرةٌ عميقة كرنّة طبل الدُندُبي، وقرونٌ حادّة، ومهارةٌ في الضرب.» وفي نبرته الأخلاقية تحذيرٌ من مغبّة استفزاز محاربٍ ثبتت قوّته وانضباطه؛ فالكِبرُ في زخم الحرب المدمّر تجاوزٌ يجرّ إلى الهلاك.
Verse 26
महामेघं महाघोरें दर्दुरः प्रतिनर्दसि । बाणतोयप्रदं लोके नरपर्जन्यमर्जुनम्
قال سنجيا: «كما ينعق الضفدع متحدّياً سحابة رعدٍ هائلةٍ مروّعة، كذلك تزأر أنت في وجه أرجونا—“سحابة البشر” في العالم—الذي يهطل بوابلٍ من السهام كالمطر. إنّ هذه الصورة تفضح اختلال الموازين الأخلاقية في التبجّح أمام بأسٍ كاسح: فالفخر الأجوف في الحرب خداعٌ للنفس حين يُقاس بمحاربٍ حقّاً رهيب.»
Verse 27
यथा च स्वगृहस्थ:ः श्वा व्याप्रं वनगतं भषेत् । तथा त्वं भषसे कर्ण नरव्याप्रं धनंजयम्
قال سنجيا: «يا كَرْنَة! كما أن كلباً جالساً آمناً في بيته ينبح على نمرٍ ساكنٍ في الغابة، كذلك أنت لا تعدو أن تنبح في وجه دهننجايا (أرجونا)، نمرِ الرجال.» إنّها تُصوّر كلام كَرْنَة المتباهي شجاعةً جوفاء، وتُقابل الضجيج العدواني بالقوة الحقيقية المجرَّبة لمحاربٍ أصيل.
Verse 28
शृगालो5पि वने कर्ण शशै: परिवृतो वसन् | मन्यते सिंहमात्मानं यावत् सिंहं न पश्यति,“कर्ण! वनमें खरगोशोंके साथ रहनेवाला गीदड़ भी जबतक सिंहको नहीं देखता, तबतक अपनेको सिंह ही मानता रहता है
قال سنجيا: «يا كَرْنَة، حتى ابنُ آوى الساكنُ في الغابة، المحاطُ بالأرانب، يظنّ نفسه أسداً ما دام لم يرَ أسداً حقيقياً.» إنّها حكمةٌ تُحذّر من أنّ الثقة الزائفة تنمو حين يغيب المعيار الحقّ للقوة والفضيلة؛ فإذا ظهرت القدرة الأصيلة انكشف الادّعاء.
Verse 29
तथा त्वमपि राधेय सिंहमात्मानमिच्छसि । अपश्यन् शत्रुदमनं नरव्याप्रं धनंजयम्,“राधानन्दन! उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंका दमन करनेवाले पुरुषसिंह अर्जुनको न देखनेके कारण ही अपनेको सिंह समझना चाहते हो
قال سنجيا: «وكذلك أنتَ، يا ابن رادها، تريد أن تحسب نفسك أسدًا—لأنك لا ترى دهننجايا أرجونا، مُذلِّل الأعداء، نمرَ الرجال. إن ثقتك بنفسك مولودة من أنك لم تواجه بعدُ المقياس الحق لخصمك.»
Verse 30
व्याप्र॑ त्वं मन्यसे55त्मानं यावत् कृष्णौ न पश्यसि । समास्थितावेकरयथे सूर्याचन्द्रमसाविव
قال سنجيا: «ما دمتَ لا تُبصر كريشنا و(أرجونا) ابن كريشنا معًا، تظن نفسك نمرًا. فإذا رأيتهما—ثابتين على عربة واحدة، متلألئين كالشمس والقمر—عرفتَ المقياس الحق لقوتك.»
Verse 31
यावद् गाण्डीवघोषं त्वं न शुणोषि महाहवे । तावदेव त्वया कर्ण शक््यं वक्तुं यथेच्छसि,“कर्ण! महासमरमें जबतक गाण्डीवकी टंकार नहीं सुनते हो, तभीतक तुम जैसा चाहो, बक सकते हो
قال سنجيا: «ما دمتَ لم تسمع في المعركة العظمى رنّة غانديفا المدوية، فحينئذٍ فقط، يا كارنا، تستطيع أن تقول ما تشاء. فإذا سُمِع ذلك الصوت، ابتُلِيَت مفاخرتك بالفعل.»
Verse 32
रथशब्दधनु:शब्दैर्नादयन्तं दिशो दश । नर्दन्तमिव शार्टूल॑ दृष्टवा क्रोष्टा भविष्यसि
قال سنجيا: «حين تُبصر أرجونا—كأنه أسد—يزأر ويُدوّي الجهات العشر برعد عربته وطنين قوسه، ستغدو في الحال ابنَ آوى.»
Verse 33
नित्यमेव शृगालस्त्व॑ नित्यं सिंहो धनंजय: । वीरप्रद्वेषणान्मूढ तस्मात् क्रोष्टेव लक्ष्यसे
قال سنجيا: «أنتَ ابنُ آوى على الدوام، ودهننجايا (أرجونا) أسدٌ على الدوام. أيها المغرور الضالّ، لأنك تبغض الأبطال، لذلك لا تُرى إلا عوّاءً—كابن آوى.»
Verse 34
यथाखुः स्याद् विडालबश्न श्वा व्याप्रश्न बलाबले । यथा शृगाल: सिंहश्व यथा च शशकुञ्जरौ
قال سَنْجَايَا: «كما يكون الفأر فريسةً للقط، والكلبُ لا يقوى على النمر—وكما لا يُضاهي ابنُ آوى الأسدَ، ولا يُضاهي الأرنبُ الفيلَ—كذلك يتجلّى هنا تفاوتُ القوة: أنت الأضعف، وأرجونا هو الأقوى».
Verse 35
यथानृतं च सत्यं च यथा चापि विषामृते । तथा त्वमपि पार्थक्ष प्रर्यातावात्मकर्मभि:
قال سَنْجَايَا: «كما أن الكذب والصدق، وكذلك السمّ والرحيق، لكلٍّ منها أثره المتميّز—كذلك أنت وبارثا (أرجونا) مشهودٌ لكما بالذكر في كل مكان، كلٌّ بحسب الأفعال التي هي حقًّا أفعاله.»
Verse 39
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्याधिक्षेपे एकोनचत्वारिंशो5ध्याय:
وهكذا تنتهي الفصل التاسع والثلاثون من «كارنا بارفا» في «شري مهابهاراتا»، في المقطع المتعلّق بتبادل التعيير اللاذع بين كارنا وشاليا. وتُثبت خاتمةُ النصّ (الكولوفون) انقضاءَ وحدةٍ سرديةٍ تتكشّف فيها قسوةُ القول وجرحُ الكبرياء تحت وطأة الامتحان الأخلاقي للحرب.
The episode frames a recurrent Mahābhārata dilemma: whether immediate relief of an ally (protective duty) justifies escalating engagements that widen casualties and destabilize command priorities.
Local superiority must be converted into controlled containment: the text repeatedly shows that timely interception, disciplined targeting, and protection of mobility assets (chariot, horses, charioteer) decide outcomes more than sheer aggression.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its significance is contextual—demonstrating how tactical choices and rapid interventions function as causal links within the epic’s broader moral and historical accounting.
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