
Jayadratha-rakṣā: Conch Signals and Encirclement of Arjuna (Chapter 79)
Upa-parva: Jayadratha-rakṣā (Protective Encirclement Episode)
Saṃjaya reports that Kaurava champions, upon sighting the Vṛṣṇi-Andhaka leader (Kṛṣṇa) and the Kuru-foremost archer (Arjuna), advance with urgency, their ornamented chariots and formidable bows described through fire-and-serpent similes to mark brilliance and threat. A coalition of major rathins—Bhūriśravā, Śalya, Karṇa, Vṛṣasena, Jayadratha, Kṛpa, the Madra king, and Droṇa’s son (Drauṇi/Aśvatthāman)—closes in, supported by swift, regionally sourced horses. Conches and instruments surge: Kaurava conches answer, while Arjuna’s Devadatta and Kṛṣṇa’s Pāñcajanya dominate the soundscape, producing fear in the anxious and exhilaration in the resolute, and unsettling the opposing host’s animals and chariots. The tactical situation hardens into a protective ring around Jayadratha. Missile exchanges intensify: Drauṇi strikes Kṛṣṇa and Arjuna; Arjuna counters with dense arrow-showers, repeatedly targeting Karṇa and Vṛṣasena and severing Śalya’s bow at the grip, while also wounding Drauṇi and others. Bhūriśravā damages Kṛṣṇa’s goad and showers Arjuna; Arjuna, likened to a strong wind scattering clouds, checks the attackers with sharp, rapid volleys, demonstrating control under encirclement and the narrative logic of escalation-through-retaliation.
Chapter Arc: अभिमन्यु-वध का समाचार अभी ताज़ा है; केशव के वचनों को सुनते ही सुभद्रा शोक से विह्वल होकर पुत्र के लिए करुण विलाप आरम्भ करती है। → सुभद्रा बार-बार उस मुख का स्मरण करती है जो रण-रेणु से ढँक गया—नीलोत्पल-श्याम, चारुलोचन, सुन्दर दन्तपंक्ति—और पूछती है कि अब वह उसे निर्व्रण कैसे देखेगी; शोक के साथ अपराध-बोध, असहायता और मातृत्व की टूटन बढ़ती जाती है। → वह अभिमन्यु को ‘पितुस्तुल्य-पराक्रम’ कहकर पुकारती है और अपने भाग्य को धिक्कारती हुई उस वीर के रण में निपातित होने पर विलाप करती है—यही करुण-शिखर है, जहाँ मातृ-हृदय का समस्त संसार एक क्षण में ढह जाता है। → श्रीकृष्ण सुभद्रा तथा उपस्थित स्वजनों को आश्वासन देते हैं—धर्मनिष्ठ जीवन, माता-पिता की सेवा, दान-शील, ब्राह्मण-सत्कार, तीर्थ-सेवन आदि के पुण्य-मार्ग का स्मरण कराते हुए शोक को मर्यादा में बाँधते हैं; फिर राजाओं, बन्धुओं और अर्जुन से अनुमति लेकर अंतःपुर में प्रवेश करते हैं और सभा/जन अपने-अपने स्थान लौटते हैं। → अभिमन्यु-वध का प्रतिशोध और प्रतिज्ञा-धर्म अभी शेष है; शोक के नीचे प्रतिकार की अग्नि सुलगती रहती है।
Verse 1
ऑपन-माज बछ। डे अष्टसप्ततितमो< ध्याय: सुभद्राका विलाप और श्रीकृष्णका सबको आश्वासन संजय उवाच एतच्छुत्वा वचस्तस्य केशवस्य महात्मन: । सुभद्रा पुत्रशोकार्ता विललाप सुदु:खिता
قال سَنجايا: أيها الملك، لما سمعت سوبهادرا كلام كيشافا العظيم النفس، وقد أضناها حزنها على ولدها وأثقلها الأسى الشديد، أخذت تندب على هذا النحو. ويؤطر المشهد توتراً أخلاقياً بين مواساة كṛṣṇa وإرشاده، وبين لوعة أمّ لا تُكبح وسط خراب الحرب.
Verse 2
हा पुत्र मम मन्दाया: कथमेत्यासि संयुगे | निधन प्राप्तवांस्तात पितुस्तुल्यपराक्रम:,हा पुत्र! हा बेटा अभिमन्यु! तुम मुझ अभागिनीके गर्भमें आकर क्रमश: पिताके तुल्य पराक्रमी होकर युद्धमें मारे कैसे गये?
قال سَنجايا: «وا حسرتاه يا بُنيّ—يا من وُلدتَ مني، أنا المرأة الشقيّة—كيف جئتَ إلى ساحة القتال؟ يا ولدي العزيز، يا من كانت بسالتك كَبأس أبيك، كيف لقيتَ حتفك في الحرب؟»
Verse 3
कथमिन्दीवरश्यामं सुदष्ट्रं चारुलोचनम् । मुखं ते दृश्यते वत्स गुण्ठितं रणरेणुना
قال سنجيا: «يا بُنيّ، كيف يبدو وجهك اليوم—داكنًا كزهرة اللوتس الزرقاء، مزدانًا بأسنان جميلة وعيون فاتنة—وقد حجبته الآن غبارُ المعركة؟»
Verse 4
नूनं शूरं निपतितं त्वां पश्यन्त्यनिवर्तिनम् । सुशिरोग्रीवबाद्वंसं व्यूढोरस्क॑ नतोदरम्
قال سنجيا: «لا بدّ أنهم يرونك الآن صريعًا—وأنت الذي لم تكن يومًا ممن يولّون عن القتال. كان رأسك وعنقك حسنَي التكوين، وذراعاك وكتفاك قويين جميلين، وصدرك عريضًا منبسطًا، وبطنك صلبًا مضمومًا قليلًا. ومحاربٌ بهذه الثبات قد أُسقط اليوم على وجه الأرض.»
Verse 5
चारूपचितसर्वःा्िं स्वक्षं शस्त्रक्षताचितम् | भूतानि त्वां निरीक्षन्ते नूनं चन्द्रमिवोदितम्
قال سنجيا: «كان جسدك كله متناسقًا جميلًا، ووجهك وسيمًا؛ لكنه الآن مغطّى بجراحٍ صنعتها الأسلحة. ولا ريب أن جميع الكائنات تنظر إليك كما تنظر إلى القمر حين يطلع حديثًا.»
Verse 6
शयनीयं पुरा यस्य स्पर्थ्यास्तरणसंवृतम् । भूमावद्य कथं शेषे विप्रविद्ध: सुखोचित:
قال سنجيا: «وا حسرتاه! ذاك الذي كان يُفرش له قديمًا فراشُ الراحة ويُغطّى بأثمن الأغطية—كيف يرقد أبهيمنيو نفسه، وهو أهلٌ للنعيم، اليوم على الأرض العارية وجسده مثقوب بالسهام؟»
Verse 7
यो<न्वास्यत पुरा वीरो वरस्त्रीभिर्महाभुज: । कथमन्वास्यते सो5द्य शिवाभि: पतितो मृथे
قال سنجيا: «ذلك البطل عظيم الساعدين، الذي كانت تجلس إلى جانبه من قبل نساءٌ نبيلات جميلات في خدمةٍ ورعاية—كيف صار اليوم، وقد سقط في ساحة القتال، تُحيط به إناثُ بنات آوى؟ كيف وقع هذا الانقلاب؟»
Verse 8
यो<स्तूयत पुरा हृष्टे: सूतमागधवन्दिभि: । सोड्द्य क्रव्यादगणैघोरिविनदद्धिरुपास्यते
قال سَنجايا: ذاك الذي كان في الأزمنة الخالية يُشاد به على ألسنة المنشدين—السوتا والماغَدها وأهل المديح—بقلوبٍ طافحةٍ بالابتهاج، هو اليوم، وسط الضجيج المروّع، كأنما تُقام له «عبادة» على يد أسرابٍ من الكواسر آكلة اللحم، تزأر زئيرًا مفزعًا.
Verse 9
पाण्डवेषु च नाथेषु वृष्णिवीरेषु वा विभो । पज्चालेषु च वीरेषु हत: केनास्थनाथवत्,'शक्तिशाली पुत्र! तुम्हारे रक्षक पाण्डवों, वृष्णिवीरों तथा पांचालवीरोंके होते हुए भी तुम्हें अनाथकी भाँति किसने मारा?
قال سَنجايا: «يا ذا البأس! مع أن الباندڤا كانوا حماةً، ومعهم أبطال ڤْرِشْنِي وفرسان پانچالا—فبيدِ مَن قُتلتَ كأنك بلا وليّ ولا نصير؟»
Verse 10
अतृप्तदर्शना पुत्र दर्शनस्य तवानघ । मन्दभाग्या गमिष्यामि व्यक्तमद्य यमक्षयम्
قال سَنجايا: «يا بُنيّ، ما زالت عيناي غير مُرتويتين، تتلهفان لرؤيتك؛ ولم تُطفأ ظمأهما. يا من لا دنس فيه، ما أشدَّ سوء حظي! لا ريب أنني اليوم سأمضي إلى مملكة يَما التي لا تفنى.»
Verse 11
विशालाक्षं सुकेशान्तं चारुवाक्यं सुगन्धि च । तव पुत्र कदा भूयो मुखं द्रक्ष्यामि निर्व्रणम्
قال سَنجايا: «يا بُنيّ، متى أرى من جديد وجهك الجميل الذي لا جراح فيه—واسع العينين، تحفّه خصلات شعرٍ حسنة، عذبَ الكلام، طيّبَ الرائحة؟»
Verse 12
धिग् बल॑ भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य धनुष्मताम् | धिग् वीर्य वृष्णिवीराणां पञ्चालानां च धिग् बलम्
قال سَنجايا: «العار على قوة بِهيماسينا؛ والعار على براعة پارثا (أرجونا) في القوس! والعار على بأس أبطال ڤْرِشْنِي، والعار كذلك على قوة پانچالا!»
Verse 13
'भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके धनुष-धारणको धिककार है, वृष्णिवंशी वीरोंके पराक्रमको धिक्कार है तथा पांचालोंके बलको भी धिककार है! ।।
قال سانجيا: «العار على الكِكَيَة، وعلى الشِّيدِي، وعلى المَتْسْيَة، وعلى السِّرِنْجَيَة—أولئك المحاربين الذين لم يقدروا أن يحمُوك، أيها البطل، حين دخلتَ ساحة القتال.»
Verse 14
अद्य पश्यामि पृथिवीं शून्यामिव हतत्विषम् । अभिमन्युमपश्यन्ती शोकव्याकुललोचना,“अभिमन्युको न देखनेके कारण मेरे नेत्र शोकसे व्याकुल हो रहे हैं। आज मुझे सारी पृथ्वी सूनी एवं कान्तिहीन-सी दिखायी देती है
قال سانجيا: «اليوم تبدو لي الأرض كأنها خالية وقد سُلبت بهاءها. ولأنني لا أرى أبهيمانيو، فقد اضطربت عيناي واهتزّتا من شدة الحزن.»
Verse 15
स्वस्त्रीयं वासुदेवस्य पुत्र गाण्डीवधन्चन: । कथं त्वातिरथं वीर द्रक्ष्याम्पद्य निपातितम्
قال سانجيا: «كيف أطيق اليوم أن أرى ذلك الابن الباسل—المصاهرَ لڤاسوديفا (كريشنا) والمولودَ من حامل قوس غانديفا—وهو أَتِيرَثَة بين المحاربين، مطروحًا على الأرض صريعًا؟»
Verse 16
एह्ोहि तृषितो वत्स स्तनौ पूर्णो पिबाशु मे । अड्कमारुह्ा मन्दाया हातृप्तायाश्न दर्शने
قال سانجيا: «تعالَ يا بُنيّ—تعال! لا بد أنك عطشان. اصعد إلى حِجر أمّك الشقيّة التي ظمئتْ لمجرد رؤيتك، واشرب سريعًا من هذين الثديين الممتلئين لبنًا.»
Verse 17
हा वीर दृष्टो नष्टश्न धनं स्वप्न इवासि मे । अहो हानित्यं मानुष्यं जलबुदबुदचउ्चलम्
قال سانجيا: «وا حسرتاه، أيها البطل! لقد ظهرتَ لي ثم تلاشيْتَ—كثروةٍ تُنال في حلم. آه، ما أشدَّ تقلب حياة الإنسان وفناءها، ترتجف كفقاعةٍ على الماء.»
Verse 18
इमां ते तरुणीं भार्या तवाधिभिरभिप्लुताम् । कथं संधारयिष्यामि विवत्सामिव धेनुकाम्
قال سنجيا: «إن زوجتك الفتية هذه قد غمرها الوجع، وغاصت في حزن فراقك. وهي قلقة كالبقرة التي فقدت عجلها؛ فكيف لي أن أُثبّت قلبها وأشدّ أزرها؟»
Verse 19
(उत्तरामुत्तमां जात्या सुशीलां प्रियभाषिणीम् । शनकै: परिरभ्यैनां स्नुषां मम यशस्विनीम् ।।
قال سنجيا: «إن أوتّارا شريفة المولد، حسنة السيرة، لطيفة القول—كنّتي المجيدة والمحبوبة. هي رقيقة، واسعة العينين، ووجهها بهيّ كالبدر. أطرافها نحيلة كالغصون الغضّة، ومشيتها بطيئة ووقورة كمشية فيلٍ سكران. وشفتاها حمراوان كثمر البِمبا. يا أبهيمانيو، ضُمَّ كنّتي برفقٍ وأدخل السرور إلى قلبها.»
Verse 20
नूनं गति: कृतान्तस्य प्राजैरपि सुदुर्विदा । यत्र त्वं केशवे नाथे संग्रामेडनाथवद्धत:
قال سنجيا: «حقًّا إن مسار كالا—الموت، والزمان—عسير الإدراك حتى على أحكم الحكماء. فبسلطانه قُتلت في ساحة القتال كمن لا حامي له، مع أن كيشافا (كريشنا) كان سيدك ووليّك.»
Verse 21
यज्वनां दानशीलानां ब्राह्मणानां कृतात्मनाम् चरितत्रह्वाचर्याणां पुण्यतीर्थावगाहिनाम्
قال سنجيا: «(كانوا) براهمة—مقيمين للقرابين، مواظبين على العطاء، مهذّبين لأنفسهم—سيرتهم موسومة بالنسك والرياضات، وقد اغتسلوا في التيرثات، معابر الحج المقدّسة.»
Verse 22
कृतज्ञानां वदान्यानां गुरुशुश्रूषिणामपि । सहस्रदक्षिणानां च या गतिस्तामवाप्रुहि
قال سنجيا: «أخبرني ما المصير الأخير الذي يناله من يعرفون الشكر ولا ينسون الإحسان، ومن يسخون بالعطاء، ومن يخدمون معلميهم بإخلاص، ومن يمنحون الألوف دَكْشِنَا—أجور القربان—في الطقوس. بيّن لي تلك العاقبة.»
Verse 23
“वत्स! यज्ञकर्ता, दानी, जितेन्द्रिय, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, पुण्यतीर्थोमें नहानेवाले, कृतज्ञ, उदार, गुरुसेवा-परायण और सहस्रोंकी संख्यामें दक्षिणा देनेवाले धर्मात्मा पुरुषोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।।
قال سانجيا: «يا بُنيّ! لَعَلَّكَ تنال المصير المبارك نفسه الذي يناله رجال الدَّرما: الذين يقيمون اليَجْنَة (القرابين)، ويجودون بالعطاء، ويقهرون الحواس، ويعرفون البراهمان، والبراهمة الذين يلتزمون بالبراهماتشاريا، ويغتسلون في المعابر المقدسة (تيرثا)، ويعرفون الفضل، ويتّسعون سخاءً، ويلازمون خدمة المعلّم، ويهبون الدكشِنا (عطايا الطقس) بالآلاف. ولَعَلَّكَ تبلغ أيضًا ذلك المصير الذي هو نصيب الأبطال الذين، وقد عزموا القتال، لا يرتدّون خطوة—الذين يقتلون أعداءهم ثم يسقطون هم أنفسهم في صدام السلاح.»
Verse 24
गोसहस्रप्रदातृणां क्रतुदानां च या गति: । नैवेशिकं चाभिमतं ददतां या गति: शुभा
قال سانجيا: «لَعَلَّكَ تنال المصير الميمون نفسه الذي يناله من يهب ألف بقرة، ومن يقدّم العطايا لأجل اليَجْنَة، ومن يمنح مسكنًا مُهيّأً بكل ما يُشتهى. فلتكن تلك المثوبة المباركة لك أيضًا.»
Verse 25
ब्राह्मणेभ्य: शरण्येभ्यो निधिं निदधतां च या । या चापि न्यस्तदण्डानां तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سانجيا: «يا بُنيّ العزيز، لَعَلَّكَ تنال المصير نفسه الذي يناله من يكونون ملجأً للبراهمة، فيقيمون لهم أوقافًا وعطايا ثابتة، ومن يضعون عصا العقاب جانبًا فلا يؤذون كائنًا حيًّا.»
Verse 26
ब्रह्मचर्येण यां यान्ति मुनय: संशितब्रता: । एकपनन्यश्व यां यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سانجيا: «يا بُنيّ، امضِ إلى تلك الحال نفسها التي يبلغها الحكماء ذوو النذور المحكمة بفضل البراهماتشاريا، والتي تبلغها الزوجات الوفيات المكرَّسات لزوج واحد. ولْيَكُن بلوغ ذلك الهدف الأعلى يسيرًا عليك.»
Verse 27
राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती । चतुराश्रमिणां पुण्यै: पावितानां सुरक्षितै:
قال سانجيا: «لَعَلَّكَ تنال المصير الأبدي الذي تناله الملوك بحسن سيرتهم، والذي يبلغه أهل الآشرمات الأربع (āśrama) ممن تحميهم أعمالهم الصالحة وتطهّرهم، فيحيون في الدَّرما.»
Verse 28
दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् | पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سنجيا: «يا بُنيّ، لعلّك تبلغ تلك المنزلة الأبدية نفسها التي ينالها الرحماء بالمكروبين، الذين يداومون على اقتسام ما عندهم، ويكفّون عن الوشاية والغيبة ونقل الكلام».
Verse 29
व्रतिनां धर्मशीलानां गुरुशुश्रूषिणामपि । अमोघातिथिनां या च तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سنجيا: «يا بُنيّ، امضِ إلى تلك المنزلة المباركة نفسها التي ينالها الثابتون على النذور، الملتزمون بالدارما، المجتهدون في خدمة المعلّمين، والذين لا يردّون ضيفًا قطّ خائبًا.»
Verse 30
कृच्छेषु या धारयतामात्मानं व्यसनेषु च । गति: शोकाग्निदग्धानां तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سنجيا: «يا بُنيّ، لعلّك تنال المصير نفسه الذي يناله من يثبتون أنفسهم في الشدائد والمحن؛ أولئك الذين، وإن أحرقتهم نار الحزن، ظلّوا ممسكين بزمام النفس لا يضطربون.»
Verse 31
मातापित्रोश्व शुश्रूषां कल्पयन्तीह ये सदा । स्वदारनिरतानां च या गतिस्तामवाप्लुहि
قال سنجيا: «لعلّك تبلغ ذلك المصير نفسه الذي يناله في هذا العالم من يلازمون خدمة الأمّ والأبّ، ويثبتون على الإخلاص لزوجتهم الشرعية وحدها.»
Verse 32
ऋतुकाले स्वकां भार्या गच्छतां या मनीषिणाम् | परस्त्री भ्यो निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سنجيا: «يا بُنيّ، لعلّك تنال المصير نفسه الذي يفوز به الحكماء: الذين لا يقربون إلا زوجتهم في الوقت اللائق، ويعتزلون اعتزالًا تامًّا نساءَ غيرهم.»
Verse 33
साम्ना ये सर्वभूतानि पश्यन्ति गतमत्सरा: । नारुंतुदानां क्षमिणां या गतिस्तामवाप्रुहि
قال سانجيا: «ليتك تنال تلك المنزلة نفسها التي ينالها من تخلّصوا من الحسد، فنظروا إلى جميع الكائنات بعقلٍ متساوٍ؛ ومن لا يجرحون الناس في مواضع ضعفهم بالكلام؛ ومن يثبتون على العفو عن الجميع».
Verse 34
मधुमांसनिवृत्तानां मदाद् दम्भात् तथानृतात् । परोपतापत्यक्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سانجيا: «يا بُنيّ، انل تلك العاقبة المباركة التي ينالها من يمتنعون عن العسل واللحم، ويبتعدون عن السُّكر والرياء والكذب، ولا يُوقعون الأذى والكدَر بالآخرين».
Verse 35
ह्वीमन्त: सर्वशास्त्रज्ञा ज्ञानतृप्ता जितेन्द्रिया: । यां गतिं साधवो यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक
قال سانجيا: «يا بُنيّ الحبيب، كن متواضعًا ضابطًا لنفسك: عارفًا بتعاليم الشاسترا كلّها، قانعًا بالمعرفة الحقّة، قاهرًا للحواس. وامضِ إلى تلك المنزلة عينها التي يبلغها الصالحون».
Verse 36
एवं विलपतीं दीनां सुभद्रां शोककर्शिताम् अन्वपद्यत पाज्चाली वैराटीसहितां तदा,इस प्रकार उत्तरासहित विलाप करती हुई दीन-दुःखी एवं शोकसे दुर्बल सुभद्राके पास उस समय द्रौपदी भी आ पहुँची
قال سانجيا: في ذلك الحين جاءت دروبدي، سيدة بانچالا، إلى سوبهدرا—وهي بائسة تنتحب وقد أنهكها الحزن—وكانت معها أوتّارا ابنة فيرَاطا.
Verse 37
ता: प्रकामं रुदित्वा च विलप्य च सुदुःखिता: । उन्मत्तवत् तदा राजन् विसंज्ञान्यपतन् क्षितौ
قال سانجيا: «يا أيها الملك، لقد غمرهنّ حزنٌ عظيم، فبكين كما شئن وندبن بصوتٍ عالٍ؛ ثم كمن سُلب العقل، غُشي عليهنّ فسقطن على الأرض».
Verse 38
सोपचारस्तु कृष्णश्न दुःखितां भृशदु:खित: । सिक्त्वाम्भसा समाश्चास्य तत्तदुक्त्वा हितं वच:
قال سنجيا: وقد أثقل الحزنُ كريشنا وأضناه، شرع يداوي بلطفٍ ليعيد إلى المكلومين رباطة جأشهم. فنضح الماء على أخته المفجوعة سوبهدرا، وخاطبها بوجوهٍ شتّى بكلماتٍ يراد بها خيرها، فسكّن روعها وواساها. وكانت، وقد أصابها وجعُ فقد ابنها في صميم القلب، تبكي وترتجف وقد قاربت الإغماء؛ وفي تلك الحال كلّمها الربّ المبارك—مبيّنًا أنّ الرحمة والثبات والنصح في أوانه واجبٌ نحو المتألّمين، ولو في خضمّ الحرب.
Verse 39
विसंज्ञकल्पां रुदतीं मर्मविद्धां प्रवेषतीम् । भगिनीं पुण्डरीकाक्ष इदं वचनमत्रवीत्
قال سنجيا: لما رأى أخته توشك أن تنحدر إلى حالٍ كحال الإغماء—تبكي وترتجف وقد نفذ الحزن إلى لبّها—خاطبها بُندَريكاكشا (كريشنا ذو العينين كاللوتس) بهذه الكلمات. ويُبرز المشهد واجب الرحمة في قلب الحرب: فحتى مع الفاجعة العظمى، يتقدّم كريشنا أولًا لإعادة السكينة وتقديم عزاءٍ مقرونٍ بنصحٍ يراد به خير المفجوعة.
Verse 40
सुभद्रे मा शुच:ः पुत्र पाउ्चाल्याश्वासयोत्तराम् । गतो5भिमन्यु: प्रथितां गतिं क्षत्रियपुज्रव:
قال سنجيا: «يا سوبهدرا، لا تجزعي على ابنك. ويا بانچالي، ابنة دروبادا، ثبّتي أُتّارا وطيّبي خاطرها. لقد بلغ أبهيمانيو، وهو أبرع المحاربين، المصيرَ المشهورَ الأعلى—سقط في ساحة القتال بكرامة، كما يليق بالكشترِيّا.»
Verse 41
ये चान्येडपि कुले सन्ति पुरुषा नो वरानने । सर्वे ते तां गति यान्तु हभिमन्योर्यशस्विन:,'सुमुखि! हमारी इच्छा तो यह है कि हमारे कुलमें और भी जितने पुरुष हैं, वे सब यशस्वी अभिमन्युकी ही गति प्राप्त करें
قال سنجيا: «يا حسناء الوجه، إنّ رغبتنا أن كلّ الرجال الآخرين في سلالتنا أيضًا، جميعهم، ينالون المصيرَ نفسه الذي ناله أبهيمانيو المجيد.» وفي خضمّ الحرب والفجيعة، تُصوِّر هذه العبارة موت أبهيمانيو لا كخسارةٍ مجرّدة، بل كخاتمةٍ سامية في ميزان الأخلاق: مثال الرحيل البطولي الملتزم بالواجب، الذي تُجِلّه الأسرة بل وتدعو أن تشاركه.
Verse 42
कुर्याम तद् वयं कर्म क्रियासु सुहृदश्च नः । कृतवान् यादृगद्यैकस्तव पुत्रो महारथ:,“तुम्हारे महारथी पुत्रने अकेले ही आज जैसा पराक्रम किया है, उसे हम और हमारे सुहृद् भी कार्यरूपमें परिणत करें"
قال سنجيا: «فلنحوِّل نحن، مع محبّينا وذوي الودّ لنا، ذلك العزم إلى عملٍ في المهامّ التي أمامنا—لنضاهِي ما أتى به ابنُك، ذلك المَهاراثي، من بطولةٍ اليوم وهو وحده.»
Verse 43
एवमाश्चास्य भगिनीं द्रौपदीमपि चोत्तराम् । पार्थस्यैव महाबाहु: पार्श्वमागादरिंदम:,इस प्रकार अपनी बहिन सुभद्रा, उत्तरा तथा द्रौपदीको आश्वासन देकर शत्रुदमन महाबाहु श्रीकृष्ण पुनः अर्जुनके ही पास चले आये
قال سانجيا: وبعد أن طمأن أخته، وكذلك دروبدي وأوتّارا، عاد كريشنا عظيمُ الذراعين—قاهرُ الأعداء—إلى جانب بارثا (أرجونا) من جديد.
Verse 44
ततो<भ्यनुज्ञाय नृपान् कृष्णो बन्धूंस्तथार्जुनम् । विवेशान्त:पुरे राजंस्ते च जम्मुर्यथालयम्
قال سانجيا: ثم إن كريشنا، بعد أن استأذن الملوك وأقرباءه وأرجونا، دخل إلى القصر الداخلي، أيها الملك؛ وانصرف أولئك الملوك أيضًا، كلٌّ إلى مقامه.
Verse 77
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें सुभद्राको श्रीकृष्णका आश्वासनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا تنتهي السورة السابعة والسبعون من «برتيجنا-برڤن» ضمن «درونا-برڤن» من «شري مهابهاراتا»، وفيها وصفُ تطمين شري كريشنا لسوبهادرا.
Verse 78
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि सुभद्राप्रविलापे अष्टसप्ततितमो<ध्याय:
وهكذا، في «شري مهابهاراتا» ضمن «درونا-برڤن»—وخاصة في «برتيجنا-برڤن»—تُختَتم السورة الثامنة والسبعون، وموضوعها نواحُ سوبهادرا.
The episode implies a tension between protective duty to an ally (Jayadratha-rakṣā) and the escalating retaliatory logic of battlefield necessity, where concentrated force and counter-force risk subordinating restraint to tactical urgency.
The chapter models how morale, communication (sound-signals), and disciplined coordination shape outcomes alongside personal valor; it also illustrates composure under encirclement as a strategic competence.
No explicit phalaśruti appears in this passage; its meta-significance lies in Saṃjaya’s archival narration, where acoustic imagery and tactical detail function as interpretive cues for understanding causality and escalation within the war.
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