Adhyaya 33
Bhishma ParvaAdhyaya 3334 Verses

Adhyaya 33

Viśvarūpa-darśana (The Vision of the Universal Form) — महायोगेश्वरस्य विश्वरूपदर्शनम्

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-adhyāya cluster within Bhīṣma-parva)

This chapter records Arjuna’s request to see Kṛṣṇa’s aiśvarya (sovereign, divine potency) after hearing a confidential metaphysical teaching. Kṛṣṇa responds by inviting Arjuna to behold innumerable divine forms and the totality of the moving and unmoving world gathered in a single locus. Because ordinary vision is deemed insufficient, Kṛṣṇa grants a divya-cakṣus (enhanced perception) and reveals the Viśvarūpa, described with countless faces, eyes, ornaments, and weapons, radiating a brilliance likened to a thousand suns. Arjuna perceives deities, sages, and cosmic orders within that form, then experiences awe and destabilization, including fear at the vision of beings entering the formidable mouths of the cosmic form. Arjuna asks the identity of the terrifying manifestation; Kṛṣṇa identifies it as Kāla (time) engaged in world-consuming transformation, positioning Arjuna as a nimitta (instrument) within an already-determined trajectory of battlefield outcomes. Arjuna offers praise, apology for familiar speech, and requests the return to the gentler four-armed/human-accessible form. Kṛṣṇa restores the familiar appearance, explains the rarity of this vision, and concludes with a bhakti-centered criterion: exclusive devotion enables true knowing, seeing, and entering into the divine reality, coupled with conduct marked by non-hostility and detachment.

Chapter Arc: जीव की दीर्घ भटकन और दुर्लभ मनुष्य-देह का स्मरण कराते हुए कृष्ण अर्जुन को जगाते हैं—यह अवसर केवल भोग के लिए नहीं, परमगति के लिए है। → अर्जुन के भीतर प्रश्न उभरता है: यदि ज्ञान-विज्ञान और उपासना इतनी महिमामयी है, तो सब उसे क्यों नहीं धारण करते? कृष्ण श्रद्धा, विधि और लक्ष्य के भेद से समझाते हैं—देव-भक्ति भी अन्ततः उन्हीं तक जाती है, पर ‘अविधिपूर्वक’ और सीमित फल के साथ। → कृष्ण अपना विराट्-व्यापक स्वरूप उद्घाटित करते हैं—सूर्य-ताप, वर्षा का आकर्षण और वर्षण, अमृत और मृत्यु, सत् और असत्—सबमें ‘मैं’ (अहं) ही हूँ; और फिर निर्णायक आदेश देते हैं: जो कुछ करो, खाओ, यज्ञ करो, दान दो, तप करो—सब मुझे अर्पित करो। → भक्ति का द्वार सर्वसुलभ घोषित होता है—स्त्री, वैश्य, शूद्र जैसे ‘पाप-योनि’ कहे जाने वाले भी शरण लेकर परमगति पा सकते हैं; फिर तो पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तों की बात ही क्या। इसलिए इस अनित्य, असुख लोक में रहते हुए भी ‘मेरा भजन’ कर। → अर्जुन के लिए अगला चरण स्पष्ट है—समर्पण-योग को युद्ध-कर्तव्य में कैसे उतारना है, यह आगे की वाणी में और तीक्ष्ण रूप से खुलता है।

Shlokas

Verse 1

१६)। ४. चौरासी लाख योनियोंमें भटकते-भटकते कभी-न-कभी भगवान्‌ दया करके जीवमात्रको मनुष्यशरीर देकर अपने तथा देवताओंके लोकोंमें जानेका सुअवसर देते हैं। उस समय यदि वह जीवनका सदुपयोग करे तो दोनोंमेंसे किसी एक मार्गके द्वारा गन्तव्य स्थानको अवश्य प्राप्त कर सकता है। अतएव प्रकारान्तरसे प्राणिमात्रके साथ इन दोनों मार्गोंका सम्बन्ध है। ये मार्ग सदासे ही समस्त प्राणियोंके लिये हैं और सदैव रहेंगे। इसीलिये इनको शाश्वत कहा है। यद्यपि महाप्रलयमें जब समस्त लोक भगवानमें लीन हो जाते हैं, उस समय ये मार्ग और इनके देवता भी लीन हो जाते हैं, तथापि जब पुनः सृष्टि होती है, तब पूर्वकी भाँति ही इनका पुनः निर्माण हो जाता है। अतः इनको 'शाश्वत' कहनेमें कोई दोष नहीं है। ५. अर्थात्‌ इसी अध्यायके २४वें श्लोकके अनुसार अर्चिमार्गसे गया हुआ योगी। ६. अर्थात्‌ इसी अध्यायके २५वें श्लोकके अनुसार धूममार्गसे गया हुआ सकाम कर्मी। ७. योगसाधनामें लगा हुआ भी मनुष्य इन मार्गोंका तत्त्व न जाननेके कारण स्वभाववश इस लोक या परलोकके भोगोंमें आसक्त होकर साधनसे भ्रष्ट हो जाता है, यही उसका मोहित होना है; किंतु जो इन दोनों मार्गोंको तत्त्वसे जानता है, वह फिर ब्रह्मलोकपर्यन्त समस्त लोकोंके भोगोंकोी नाशवान्‌ और तुच्छ समझ लेनेके कारण किसी भी प्रकारके भोगोंमें आसक्त नहीं होता एवं निरन्तर परमेश्वरकी प्राप्तिके ही साधनमें लगा रहता है। यही उसका मोहित न होना है। ८. यहाँ भगवान्‌ने जो अर्जुनको सब कालमें योगयुक्त होनेके लिये कहा है, इसका यह भाव है कि मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े ही दिनोंका है, मृत्युका कुछ भी पता नहीं है कि कब आ जाय। यदि अपने जीवनके प्रत्येक क्षणको साधनमें लगाये रखनेका प्रयत्न नहीं किया जायगा तो साधन बीच-बीचमें छूटता रहेगा और यदि कहीं साधनहीन अवस्थामें मृत्यु हो जायगी तो योगगश्रष्ट होकर पुन: जन्म ग्रहण करना पड़ेगा। अतएव मनुष्यको भगवत्प्राप्तिके साधनमें नित्य-निरन्तर लगे ही रहना चाहिये। ३. इस अध्यायमें वर्णित शिक्षाको अर्थात्‌ भगवान्‌के सगुण-निर्गुण और साकार-निराकार स्वरूपकी उपासनाको, भगवानके गुण, प्रभाव और माहात्म्यको एवं किस प्रकार साधन करनेसे मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर सकता है, कहाँ जाकर मनुष्यको लौटना पड़ता है और कहाँ पहुँच जानेके बाद पुनर्जन्म नहीं होता, इत्यादि जितनी बातें इस अध्यायमें बतलायी गयी हैं, उन सबको भलीभाँति समझ लेना ही उसे तत्त्वसे जानना है। २. यहाँ “वेद” शब्द अंगोंसहित चारों वेदोंका और उनके अनुकूल समस्त शास्त्रोंका, “यज्ञ शास्त्रविहित पूजन, हवन आदि सब प्रकारके यज्ञोंका, “तप” व्रत, उपवास, इन्द्रियसंयम, स्वधर्मपालन आदि सभी प्रकारके शास्त्रविहित तपोंका और “दान” अन्नदान, विद्यादान, क्षेत्रदान आदि सब प्रकारके शास्त्रविहित दान एवं परोपकारका वाचक है। श्रद्धा- भक्तिपूर्वक सकामभावसे वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय तथा यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे जो पुण्यसंचय होता है, उस पुण्यका जो ब्रह्मलोकपर्यन्त भिन्न-भिन्न देवलोकोंकी और वहाँके भोगोंकी प्राप्तिरूप फल वेद- शास्त्रोंमें बतलाया गया है, वही पुण्यफल है। एवं जो उन सब लोकोंको और उनके भोगोंको क्षणभंगुर तथा अनित्य समझकर उनमें आसक्त न होना और उनसे सर्वथा उपरत हो जाना है, यही उनको उल्लंघन कर जाना है। त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: (श्रीमद्भगवद्‌्गीतायां नवमो<ध्याय:) ज्ञान-विज्ञान और जगतकी उत्पत्तिका, आसुरी और दैवी सम्पदावालोंका, प्रभावसहित भगवानके स्वरूपका, सकाम-निष्काम उपासनाका एवं भगवद्धक्तिकी महिमाका वर्णन सम्बन्ध--गीताके यातवें अध्यायके आरम्भमें भथगवान्‌ने विज्ञानसह्तित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार उस विषयका वर्णन करते हुए, अन्तमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म अधिथूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्‌कों जाननेकी एवं अन्तकालके भगवच्चिन्तनकी बात कही। इसपर आठवें जअध्यायमें अजुनने उन तत्त्वोंको और अन्तकालकी उपासनाके विषयको समझनेके लिये सात प्रश्न कर दिये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर तो भगवान्‌ने संक्षेप्में तीसरे और चौथे शलोकमें दे दिया, किंतु सातवें प्रश्नके उत्तरमें उन्होंने जिस उपदेशका आरम्भ किया, उसमें सारा-का-सारा आठवाँ अध्याय पूरा हो गया। इस प्रकार सातवें अध्यायमें आरम्भ किये हुए विज्ञानसहित ज्ञानका सांगोपांग वर्णन न होनेके कारण उसी विषयको भलीभॉति समझानेके उद्देश्यसे भगवान्‌ इस नव अध्यायका आरम्भ करते हैं तथा सातवें अध्यायमें वर्णित उपदेशके साथस इसका घनिष्ठ सम्बन्ध दिखलानेके लिये पहले शलोकमे पुनः उसी विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं-- श्रीभगवानुवाच इदं तु ते गृह्ृतमंर प्रवक्ष्याम्यनसूयवे* । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेडशुभात्‌,श्रीभगवान्‌ बोले--तुझ दोषदृष्टिरहित भक्तके लिये इस परम गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञानको पुनः भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसारसे* मुक्त हो जायगा

قال أرجونا: (تُقدِّم الآية أرجونا بوصفه المتكلّم، مُعلِنةً استعداده للسؤال والتعلّم وسط التوتّر الأخلاقي في ساحة القتال. وفي الإطار السردي للغيتا، فهذا صوت التلميذ—يلتمس البيان في الواجب، والعمل القويم، والتحرّر.)

Verse 2

१, २; बृहदारण्यक उप० ६,६), “अत्रैव समवलीयन्ते” (बृहदारण्यक उप० ३ ४ बृहदारण्यक उप० ६ ५, ६, ७; बृहदारण्यक उप० ६ राजविद्या: राजगुह्ांँ पवित्रमिदमुत्तममरें । प्रत्यक्षावगमं" धर्म्य सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌5 यह विज्ञानसहित ज्ञान सब विद्याओंका राजा, सब गोपनीयोंका राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करनेमें बड़ा सुगम* और अविनाशी है

هذه التعاليم—معرفةٌ مقرونةٌ بالتحقّق—هي ملكُ المعارف وأشدُّ الأسرار حراسةً؛ مطهِّرةٌ غايةَ التطهير ولا نظير لها. تُدرَك إدراكًا مباشرًا، موافقةٌ للدارما، يسيرةُ الممارسة، ونتيجتُها غيرُ فانية.

Verse 3

सम्बन्ध-- जब विज्ञानसहित ज्ञानकी इतनी महिमा है और इसका साधन भी इतना युगम है तो फिर सभी मनुष्य इसे धारण क्यों नहीं करते? इस जिज्ञासापर अश्रद्धाकों ही इसमें प्रधान कारण दिखलानेके लिये भगवान्‌ अब इसपर श्रद्धा न करनेवाले मनुष्योंकी निन्‍्दा करते हैं-- अश्रद्दधाना: पुरुषा धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि,है परंतप! इस उपर्युक्त धर्ममें श्रद्धारहित पुरुष: मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसारचक्रमें भ्रमण करते रहते हैं

يا مُحرِقَ الأعداء، إنّ الرجال الذين لا إيمان لهم بهذا الدارما لا يبلغونني؛ بل يرجعون مرارًا على طريق الموت، في دوّامة السَّمسارا.

Verse 4

१५) संवत्सरके अभिमानी देवताके पास पहुँचा देना इसका काम है। वहाँसे आगे संवत्सरका अभिमानी देवता उसे सूर्यलोकमें पहुँचाता है। वहाँसे क्रमश: आदित्याभिमानी देवता चन्द्राभिमानी देवताके अधिकारमें और वह विद्युत्‌ु-अभिमानी देवताके अधिकारमें पहुँचा देता है। फिर वहाँपर भगवानके परमधामसे भगवान्‌के पार्षद आकर उसे परमधाममें ले जाते हैं और तब उसका भगवानसे मिलन हो जाता है। ध्यान रहे कि इस वर्णनमें आया हुआ “चन्द्र” शब्द हमें दीखनेवाले चन्द्रलोकका और उसके अभिमानी देवताका वाचक नहीं है। ३. इस श्लोकमें 'ब्रह्मविद:” पद निर्गुण ब्रह्मके तत्त्वको या सगुण परमेश्वरके गुण, प्रभाव, तत्त्व और स्वरूपको शास्त्र और आचार्योंके उपदेशानुसार श्रद्धापूर्वक परोक्षभावसे जाननेवाले उपासकोंका तथा निष्कामभावसे कर्म करनेवाले कर्मयोगियोंका वाचक है। यहाँका “ब्रह्मविदः” पद परब्रह्म परमात्माको प्राप्त ज्ञानी महात्माओंका वाचक नहीं है; क्योंकि उनके लिये एक स्थानसे दूसरे स्थानमें गमनका वर्णन उपयुक्त नहीं है। श्रुतिमें भी कहा है--“न तस्य प्राणा ह्ुत्क्रामन्ति' (बृहदारण्यक उप० ४,११), “ब्रह्मैव सन्‌ ब्रह्माप्पेति' (बृहदारण्यक उप० ४ सम्बन्ध-- पूर्वश्लीकर्में भगवान्‌ने जिस विज्ञानसहित ज्ञानका उपदेश करनेकी प्रतिज्ञा की थी तथा जिसका माहात्म्य वर्णन किया था; अब उसका आरम्भ करते हुए वे सबसे पहले प्रभावके साथ अपने निराकारस्वरूपके तत्त्वका वर्णन करते हैं-- मया ततमिदं सर्व जगदव्यक्तमूर्तिनाः । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:

قال أرجونا: «بصورتي غير المتجلّية أَسري في هذا الكون كلّه. جميع الكائنات قائمةٌ بي، ومع ذلك لستُ محصورًا فيها». وفي الإطار الأخلاقي لتعليم الغيتا في ساحة القتال، يقرّر هذا حضورَ الرب في كل شيء دون أن يحدّه شيء: فهو الذي يسند الحياة والواجب، ويبقى منزّهًا عن تقلّبات الحرب والفعل والعاقبة.

Verse 5

४ ।। न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌* । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन:,वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं; किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्तिको देख कि भूतोंका धारण-पोषण करनेवाला और भूतोंको उत्पन्न करनेवाला भी मेरा आत्मा वास्तवमें भूतोंमें स्थित नहीं है:

«ومع ذلك فالكائنات لا تقوم بي على الحقيقة—فانظر يوغاي الإلهيّ ذي السلطان: ذاتي تسند جميع الكائنات وتُخرجها إلى الوجود، ومع هذا لا تُحصر فيها.» هكذا يكشف الرب نمطًا من الحضور يعضد العالم دون أن يقيّده، ويدعو أرجونا إلى تجاوز التصوّرات المألوفة عن المكان والاعتماد.

Verse 6

यथा55काशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान्‌ । तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय,जैसे आकाशसे उत्पन्न सर्वत्र विचरनेवाला महान्‌ वायु सदा आकाशमें ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्पद्वारा उत्पन्न होनेसे सम्पूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जानः

كما أن الريح العظيمة، تجول في كل مكان، وهي على الدوام قائمةٌ في الفضاء، كذلك فاعلم أن جميع الكائنات—وإن بدت تعمل وتتحرّك على وجوه لا تُحصى—إنما تقيم فيَّ. تُعلِّم هذه الصورة أن حركة العالم لا تنفصل عن الأساس الإلهي للوجود؛ فكل موجود مسنودٌ ومحتوى في العليّ، حتى في خضمّ اضطراب الحرب وحسم القرار الأخلاقي.

Verse 7

सम्बन्ध-- विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करते हुए भगवान्‌ने यहॉतक प्रभावसाहित अपने निराकारस्वरूपका तत्त्व समझानेके लिये अपनेको सबमें व्यापक: सबका आधार सबका उत्पादक; असंग और निर्विकार बतलाया। अब अपने भ्रूतभावन स्वरूपका स्पष्टीकरण करते हुए यृष्टिरचनादि कर्मोका तत्त्व समझाते हैं-- सर्वभूतानिः कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌ । कल्पक्षयेः पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌

يا أرجونا، يا ابن كونتي، عند انقضاء دورة كونية تندمج جميع الكائنات في بركريتي الخاصة بي؛ وعند ابتداء دورة جديدة أُطلقها من جديد. يضع هذا التعليم الخلقَ والفناءَ في نظامٍ دوريّ محكومٍ بالسنّة تحت سلطان الإلهي، داعيًا إلى ثبات الذهن ووضوح البصيرة الأخلاقية وسط اضطراب الحرب.

Verse 8

७ ।। प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुन: पुन: । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌,अपनी प्रकृतिको अंगीकार* करके स्वभावके बलसे परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण भूतसमुदायको बार-बार उनके कर्मोके अनुसार रचता हूँ?

مستندًا إلى بركريتي الخاصة بي (الطبيعة الخلّاقة)، أُخرج إلى الوجود مرارًا وتكرارًا هذه الجموع كلّها من الكائنات—عاجزةً لأنها تُساق بقوة بركريتي. تؤكّد الآية أن ذوي الأجساد يعملون تحت قيود طبيعتهم المشروطة، بينما الربّ يبقى سيّدًا مطلقًا، يُظهر نظام العالم مرّة بعد مرّة لتستمرّ الحياة وتستقيم سببيّة الكارما الأخلاقية.

Verse 9

सम्बन्ध-- इस प्रकार जगत्‌-रचनादि समस्त कर्म, करते हुए भी भगवान्‌ उन कर्मोके बन्धनमें क्यों नहीं पड़ते, अब यही तत्त्व यमझानेके लिये भगवान्‌ कहते हैं-- नच मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय । उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु,हे अर्जुन! उन कर्मोमें आसक्तिरहित और उदासीनके सदृश स्थित मुझ परमात्माको वे कर्म नहीं बाँधते5 इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशाम्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्युयोगो नाम नवमो<थध्याय:

يا دهنَنْجَيا (أرجونا)، تلك الأفعال لا تُقيِّدني. وإن كنتُ أُباشر تدبير العالم وإقامته، فإني أبقى كمن هو غير مبالٍ—مستقرًّا في الباطن، غير متعلّق بتلك الأعمال. والعبرة الأخلاقية أن القيد ينشأ من التعلّق والأنانية لا من الفعل ذاته؛ والمثال الإلهي هو العمل بلا تملّك ولا أَنا.

Verse 10

५ तथा ५,६) अर्थात्‌ “क्योंकि उसके प्राण उत्क्रान्तिको नहीं प्राप्त होते--शरीरसे निकलकर अन्यत्र नहीं जाते, “यहींपर लीन हो जाते हैं', “वह ब्रह्म हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।' २. यहाँ “ब्रह्म” शब्द सगुण परमेश्वरका वाचक है। उनके कभी नाश न होनेवाले नित्य धाममें, जिसे सत्यलोक, परमधाम, साकेतलोक, गोलोक, वैकुण्ठलोक आदि नामोंसे कहा है, पहुँचकर भगवानूको प्रत्यक्ष कर लेना ही उनको प्राप्त होना है। ३. यहाँ 'धूम:” पद धूमाभिमानी देवताका अर्थात्‌ अन्धकारके अभिमानी देवताका वाचक है। उसका स्वरूप अन्धकारमय होता है। अग्नि-अभिमानी देवताकी भाँति पृथ्वीके ऊपर समुद्रसहित समस्त देशमें इसका भी अधिकार है तथा दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाले साथकोंको रात्रि-अभिमानी देवताके पास पहुँचा देना इसका काम है। दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाला जो साधक दिनमें मर जाता है उसे यह दिनभर अपने अधिकारमें रखकर रात्रिका आरम्भ होते ही रात्रि- अभिमानी देवताको सौंप देता है और जो रात्रिमें मरता है, उसे तुरंत ही रात्रि-अभिमानी देवताके अधीन कर देता है। ४. यहाँ 'रात्रि: पदको भी रात्रिके अभिमानी देवताका ही वाचक समझना चाहिये। इसका स्वरूप अन्धकारमय होता है। दिनके अभिमानी देवताकी भाँति इसका अधिकार भी जहाँतक पृथ्वीलोककी सीमा है, वहाँतक है। भेद इतना ही है कि पृथ्वीलोकमें जिस समय जहाँ दिन रहता है, वहाँ दिनके अभिमानी देवताका अधिकार रहता है और जिस समय जहाँ रात्रि रहती है, वहाँ रात्रि-अभिमानी देवताका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाले साधकको पृथ्वीलोककी सीमासे पार करके अन्तरिक्षमें कृष्णपक्षके अभिमानी देवताके अधीन कर देना इसका काम है। यदि वह साधक शुक्लपक्षमें मरता है, तब तो उसे कृष्णपक्षके आनेतक अपने अधिकारमें रखकर और यदि कृष्णपक्षमें मरता है तो तुरंत ही अपने अधिकारसे पार करके कृष्णपक्षाभिमानी देवताके अधीन कर देता है। ५. कृष्णपक्षाभिमानी देवताका वाचक यहाँ “कृष्ण:” पद है। इसका स्वरूप भी अन्धकारमय होता है। पृथ्वी-मण्डलकी सीमाके बाहर अन्तरिक्षलोकमें, जिन पितृलोकोंमें पंद्रह दिनका दिन और उतने ही समयकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका भी अधिकार है। भेद इतना ही है कि जिस समय जहाँ उस लोकमें शुक्लपक्ष रहता है, वहाँ शुक्लपक्षाभिमानी देवताका अधिकार रहता है और जहाँ कृष्णपक्ष रहता है, वहाँ कृष्णपक्षाभिमानी देवताका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे स्वर्गमें जानेवाले साधकोंको दक्षिणायनाभिमानी देवताके अधीन कर देना इसका काम है। जो दक्षिणायन-मार्गका अधिकारी साधक उत्तरायणके समय इसके अधिकारमें आता है, उसे दक्षिणायनका समय आनेतक अपने अधिकारमें रखकर और जो दक्षिणायनके समय आता है, उसे तुरंत ही यह अपने अधिकारसे पार करके दक्षिणायनाभिमानी देवताके पास पहुँचा देता है। ६. जिन छ: महीनोंमें सूर्य दक्षिण दिशाकी ओर चलते रहते हैं, उस छमाहीको दक्षिणायन कहते हैं। उसके अभिमानी देवताका वाचक यहाँ “दक्षिणायनम्‌” पद है। इसका स्वरूप भी अन्धकारमय होता है। अन्तरिक्षतोकके ऊपर जिन देवताओंके लोकोंमें छ: महीनोंका दिन और छ: महीनोंकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका भी अधिकार है। भेद इतना ही है कि उत्तरायणके छ: महीनोंमें उसके अभिमानी देवताका वहाँ अधिकार रहता है और दक्षिणायनके छ: महीनोंमें इसका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे स्वर्गमें जानेवाले साधकोंको अपने अधिकारसे पार करके उपनिषयदोंमें वर्णित पितृलोकाभिमानी देवताके अधिकारमें पहुँचा देना इसका काम है। वहाँसे पितृलोकाभिमानी देवता साधकको आकाशाभिमानी देवताके पास और वह आकाशाभिमानी देवता चन्द्रमाके लोकमें पहुँचा देता है (छान्दोग्य उप० ५ १६)। यहाँ चन्द्रमाका लोक उपलक्षणमात्र है; अत: ब्रह्मेके लोकतक जितने भी पुनरागमनशील लोक हैं, चन्द्रलोकसे उन सभीको समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे कि उपनिषदोंमें वर्णित यह पितृलोक वह पितृलोक नहीं है, जो अन्तरिक्षके अन्तर्गत है और जहाँ पंद्रह दिनका दिन और उतने ही समयकी रात्रि होती है। ३. स्वर्गादिके लिये पुण्यकर्म करनेवाला पुरुष भी अपनी ऐहिक भोगोंकी प्रवृत्तिका निरोध करता है, इस दृष्टिसे उसे भी “योगी” कहना उचित है। इसके सिवा योगगश्रष्ट पुरुष भी इस मार्गसे स्वर्गमें जाकर वहाँ कुछ कालतक निवास करके वापस लौटते हैं। वे भी इसी मार्गसे जानेवालोंमें हैं। अत: उनको “योगी” कहना उचित ही है। यहाँ “योगी” शब्दका प्रयोग करके यह बात भी दिखलायी गयी है कि यह मार्ग पापकर्म करनेवाले तामस मनुष्योंके लिये नहीं है, उच्च लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी शास्त्रीय कर्म करनेवाले पुरुषोंके लिये ही है (गीता २४२, ४३, ४४ तथा ९।२०, २१ आदि)। २. चन्द्रमाके लोकमें उसके अभिमानी देवताका स्वरूप शीतल प्रकाशमय है। उसीके-जैसे प्रकाशमय स्वरूपका नाम “ज्योति” है और वैसे ही स्वरूपको प्राप्त हो जाना--चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होना है। वहाँ जानेवाला साधक उस लोकमें शीतल प्रकाशमय दिव्य देवशरीर पाकर अपने पुण्यकर्मोके फलस्वरूप दिव्य भोगोंको भोगता है। 3. चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर वहाँ रहनेका नियत समय समाप्त हो जानेपर इस मृत्युलोकमें वापस आ जाना ही वहाँसे लौटना है। जिन कर्मोंके फलस्वरूप स्वर्ग और वहाँके भोग प्राप्त होते हैं, उनका भोग समाप्त हो जानेसे जब वे क्षीण हो जाते हैं, तब प्राणीको बाध्य होकर वहाँसे वापस लौटना पड़ता है। वह चन्द्रलोकसे आकाशमें आता है, वहाँसे वायुरूप हो जाता है, फिर धूमके आकारमें परिणत हो जाता है, धूमसे बादलमें आता है, बादलसे मेघ बनता है, इसके अनन्तर जलके रूपमें पृथ्वीपर बरसता है, वहाँ गेहूँ, जौ, तिल, उड़द आदि बीजोंमें या वनस्पतियों में प्रविष्ट होता है। उनके द्वारा पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होकर स्त्रीकी योनिमें सींचा जाता है और अपने कर्मानुसार योनिको पाकर जन्म ग्रहण करता है। (छान्दोग्य उप० ५ मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्‌ । हेतुनानेन कौन्तेय जगत्‌ विपरिवर्तते हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाताके सकाशसे प्रकृति चराचरसहित सर्वजगत्‌को रचती हैः और इस हेतुसे ही यह संसार-चक्र घूम रहा है

يا أرجونا، (المقطع المزوَّد ليس هو البيت السنسكريتي نفسه، بل تعليق هندي مطوّل) يتناول طريقين بعد الموت—دِڤايانا وپِتْرِياانا—عبر رموز مثل الدخان، والليل، والنصف المظلم من الشهر، ومسار الشمس نحو الجنوب. وأخلاقيًّا يقرر أن المصير بعد الموت يتشكل بالانضباط في السلوك وبالأعمال ذات الفضل؛ وأن حتى نيل العوالم السماوية غير دائم، إذ يعود المرء إلى الميلاد من جديد حين ينفد رصيده من الاستحقاق.

Verse 11

सम्बन्ध-- अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करते हुए भगवान्‌ने चौथेसे छठे शलोकतक प्रभावसहित सगुण-निराकार स्वरूपका तत्त्व समझाया। फिर सातवेंसे दसवें श*लोकतक युष्टि-रचनादि समस्त कर्मो्नें अपनी असंगता और निर्विकारता दिखलाकर उन कर्मोकी दिव्यताका तत्त्व बतलाया। अब अपने सगुण-साकार रूपका महत्त्व उसकी भक्तिका प्रकार और उसके गुण और प्रभावका तत्त्व समझानेके लिये पहले दो श्लोकोंगें उसके प्रभावकों न जाननेवाले, अयुर-प्रकृतिके मनुष्योंकी निन्‍दा करते हैं-- अवजानन्ति मां मूढाः मानुषीं तनुमाश्रितम्‌ । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌,मेरे परम भावको न जाननेवालेरं मूढलोग मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले मुझ सम्पूर्ण भूतोंके महान्‌ ईश्वरको तुच्छ समझते हैं अर्थात्‌ अपनी योगमायासे संसारके उद्धारके लिये मनुष्यरूपमें विचरते हुए मुझ परमेश्वरको साधारण मनुष्य मानते हैं

يا أرجونا، إن المخدوعين يزدرونني حين أتخذ جسدًا بشريًّا. إذ لا يعرفون حقيقتي العليا، يعاملونني—أنا الربّ العظيم لجميع الكائنات—كإنسان عادي، مع أني أظهر بين الناس بقوة إلهية لهداية العالم ورفعته.

Verse 12

मोघाशा: मोघकर्माणोः मोघज्ञानाईं विचेतस: । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता:

آمالهم تذهب سُدى، وأعمالهم تذهب سُدى، ومعرفتهم تذهب سُدى؛ وعقولهم مُضلَّلة. إنهم يلجؤون إلى طبيعة مُوهِمة—رَاكْشَسِيّة وآسُرِيّة—فيعرضون عن صواب التمييز وضبط النفس الأخلاقي.

Verse 13

१२ ।। सम्बन्ध-- भगवान्‌का प्रभाव न जाननेवाले आयुरी प्रकृतिके मनुष्योंकी निन्‍दा करके अब सगुणरूपकी भक्तिका तत्त्व समझानेके लिये भगवान्‌के प्रभावकों जाननेवाले, दैवी प्रकृतिके आश्रित, उच्च श्रेणीके अनन्य भक्तोंके लक्षण बतलाते हैं-- महात्मानस्तुः मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिता: । भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्‌

لكن العظام النفوس، يا بارثا، إذ يأوون إلى الطبيعة الإلهية، يعبدونني بقلب غير منقسم، لعلمهم أني الأصل الذي لا يفنى لجميع الكائنات. وأخلاقيًّا تقابل الآية بين الحكم السطحي على الإلهي وبين العبادة الناضجة لمن عرف الربّ مصدرًا لا يزول للحياة، فوهب نفسه كلّها للعبادة ولتوجيه الذهن توجيهًا قويمًا.

Verse 14

सततंः कीर्तयन्तो मां यतन्तश्नः दृढव्रता:+ । नमस्यन्तश्न मां भक्‍्त्या नित्ययुक्ताईं उपासते,वे दृढ़ निश्चयवाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणोंका कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यानमें युक्त होकर अनन्यप्रेमसे मेरी उपासना करते हैं?

أولئك العابدون ذوو العزم الراسخ يداومون على تمجيد اسمي وصفاتي؛ ويسعون إلى التحقّق، ويكثرون السجود لي بخشوع، وهم—دائمًا منضبطون في الاتحاد الباطني—يعبدونني بمحبة لا تتزعزع.

Verse 15

ऑपि-जफाप बछ। सं: ३. उनतीसवें श्लोकमें वर्णित “ब्रह्म', जीवसमुदायरूप “अध्यात्म', भगवान्‌का आदि संकल्परूप “कर्म” तथा उपर्युक्त जडवर्गरूप “अधिभूत', हिरण्यगर्भरूप “अधिदैव” और अन्तर्यामीरूप “अधियज्ञ'--सब एक भगवान्‌के ही स्वरूप हैं। यही भगवान्‌का समग्ररूप है। अध्यायके आरम्भमें भगवानने इसी समग्ररूपको बतलानेकी प्रतिज्ञा की थी। फिर सातवें श्लोकमें “मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है', बारहवेंमें 'सात््विक, राजस और तामसभाव सब मुझसे ही होते हैं' और उन्नीसवेंमें 'सब कुछ वासुदेव ही है” कहकर इसी समग्रका वर्णन किया है तथा यहाँ भी उपर्युक्त शब्दोंसे इसीका वर्णन करके अध्यायका उपसंहार किया गया है। इस समग्रको जान लेना अर्थात्‌ जैसे जलके परमाणु, भाप, बादल, धूम, जल और बर्फ सभी जलस्वरूप ही हैं, वैसे ही ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ--सब कुछ वासुदेव ही हैं--इस प्रकार यथार्थरूपसे अनुभव कर लेना ही समग्र ब्रह्मको या भगवान्‌को जानना है। २. अक्षरके साथ “परम” विशेषण देकर भगवान्‌ यह बतलाते हैं कि गीताके सातवें अध्यायके उनतीसवें श्लोकमें प्रयुक्त “ब्रह्म' शब्द निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्दघन परमात्माका वाचक है; वेद, ब्रह्मा और प्रकृति आदिका नहीं। ३. 'स्वो भाव: स्वभाव:” इस व्युत्पत्तिके अनुसार अपने ही भावका नाम स्वभाव है। जीवरूपा भगवान्‌की चेतन परा प्रकृतिरूप आत्मतत्त्व ही जब आत्म-शब्दवाच्य शरीर, इन्द्रिय, मन-बुद्धयादिरूप अपरा प्रकृतिका अधिष्ठाता हो जाता है, तब उसे “अध्यात्म” कहते हैं। अतएव गीताके सातवें अध्यायके उनतीसवें श्लोकमें भगवानने “कृत्स्न" विशेषणके साथ जो “अध्यात्म” शब्दका प्रयोग किया है, उसका अर्थ “चेतन जीवसमुदाय” समझना चाहिये। २. 'भूत” शब्द चराचर प्राणियोंका वाचक है। इन भूतोंके भावका उद्भव और अभ्युदय जिस त्यागसे होता है, जो सृष्टि- स्थितिका आधार है, उस “त्याग” का नाम ही कर्म है। महाप्रलयमें विश्वके समस्त प्राणी अपने-अपने कर्म-संस्कारोंके साथ भगवान्‌में विलीन हो जाते हैं। फिर सृष्टिके आदिमें भगवान्‌ जब यह संकल्प करते हैं कि “मैं एक ही बहुत हो जाऊँ”, तब पुनः उनकी उत्पत्ति होती है। भगवान्‌का यह “आदि संकल्प” ही अचेतन प्रकृतिरूप योनिमें चेतनरूप बीचकी स्थापना करना है। यही महान विसर्जन है और इसी विसर्जन (त्याग)-का नाम 'विसर्ग! है। 3. अपरा प्रकृति और उसके परिणामसे उत्पन्न जो विनाशशील तत्त्व है, जिसका प्रतिक्षण क्षय होता है, उसका नाम *क्षरभाव” है। इसीको गीताके तेरहवें अध्यायमें “क्षेत्र” (शरीर) के नामसे और पंद्रहवें अध्यायमें “क्षर' पुरुषके नामसे कहा गया है। ४. 'पुरुष' शब्द यहाँ 'प्रथम पुरुष” का वाचक है; इसीको सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति या ब्रह्मा कहते हैं। जड- चेतनात्मक सम्पूर्ण विश्वका यही प्राणपुरुष है, समस्त देवता इसीके अंग हैं, यही सबका अधिष्ठाता, अधिपति और उत्पादक है; इसीसे इसका नाम “अधिदैव' है। ५. अर्जुनने दो बातें पूछी थीं--“अधियज्ञ” कौन है? और वह इस शरीरमें कैसे है? दोनों प्रश्नोंका भगवान्‌ने एक ही साथ उत्तर दे दिया है। भगवान्‌ ही सब यज्ञोंके भोक्ता और प्रभु हैं (गीता ५।२९; ९२४) और समस्त फलोंका विधान वे ही करते हैं (गीता ७।२२) तथा वे ही अन्तर्यामीरूपसे सबके अंदर व्यापक हैं; इसलिये वे कहते हैं कि “इस शरीरमें अन्तर्यामीरूपसे अधियज्ञ मैं स्वयं ही हूँ।' ६. यहाँ अन्तकालका विशेष महत्त्व प्रकट किया गया है, अतः भगवानके कहनेका यहाँ यह भाव है कि जो सदा-सर्वदा मेरा अनन्यचिन्तन करते हैं उनकी तो बात ही कया है, जो इस मनुष्य-जन्मके अन्तिम क्षणतक भी मेरा चिन्तन करते हुए शरीर त्यागकर जाते हैं, उनको भी मेरी प्राप्ति हो जाती है। ७, अन्तकालमें भगवानका स्मरण करनेवाला मनुष्य किसी भी देश और किसी भी कालमें क्‍यों न मरे एवं पहलेके उसके आचरण चाहे जैसे भी क्‍यों न रहे हों, उसे भगवानकी प्राप्ति निःसंदेह हो जाती है। इसमें जरा भी शंका नहीं है। <. ईश्वर, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष, मकान, जमीन आदि जितने भी चेतन और जड पदार्थ हैं, उन सबका नाम “भाव” है। अन्तकालमें किसी भी पदार्थका चिन्तन करना, उस भावका स्मरण करना है। ९. अन्तकालमें प्रायः उसी भावका स्मरण होता है जिस भावसे चित्त सदा भावित होता है। पूर्वसंस्कार, संग, वातावरण, आसक्ति, कामना, भय और अध्ययन आदिके प्रभावसे मनुष्य जिस भावका बार-बार चिन्तन करता है, वह उसीसे भावित हो जाता है तथा मरनेके बाद सूक्ष्मरूपसे अन्तःकरणमें अंकित हुए उस भावसे भावित होता-होता समयपर उस भावको पूर्णतया प्राप्त हो जाता है। किसी मनुष्यका छायाचित्र (फोटो) लेते समय जिस क्षण फोटो (चित्र) खींचा जाता है, उस क्षणमें वह मनुष्य जिस प्रकारसे स्थित होता है, उसका वैसा ही चित्र उतर जाता है; उसी प्रकार अन्तकालमें मनुष्य जैसा चिन्तन करता है, वैसे ही रूपका फोटो उसके अन्तःकरणमें अंकित हो जाता है। उसके बाद फोटोकी भाँति अन्य सहकारी पदार्थोंकी सहायता पाकर उस भावसे भावित होता हुआ वह समयपर स्थूलरूपको प्राप्त हो जाता है। यहाँ अन्त:ःकरण ही कैमरेका प्लेट है, उसमें होनेवाला स्मरण ही प्रतिबिम्ब है और अन्य सूक्ष्म शरीरकी प्राप्ति ही चित्र खिंचना है; अतएव जैसे चित्र लेनेवाला सबको सावधान करता है और उसकी बात न मानकर इधर-उधर हिलने-डुलनेसे चित्र बिगड़ जाता है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंका चित्र उतारनेवाले भगवान्‌ मनुष्यको सावधान करते हैं कि “तुम्हारा फोटो उतरनेका समय अत्यन्त समीप है, पता नहीं वह अन्तिम क्षण कब आ जाय; इसलिये तुम सावधान हो जाओ, नहीं तो चित्र बिगड़ जायगा।” यहाँ निरन्तर परमात्माके स्वरूपका चिन्तन करना ही सावधान होना है और परमात्माको छोड़कर अन्य किसीका चिन्तन करना ही अपने चित्रको बिगाड़ना है। ३. जो भगवानके गुण और प्रभावको भलीभाँति जाननेवाला अनन्यप्रेमी भक्त है, जो सम्पूर्ण जगत्‌को भगवानके द्वारा ही रचित और वास्तवमें भगवानसे अभिन्न तथा भगवान्‌की क्रीड़ास्थली समझता है, उसे प्रह्लमाद और गोपियोंकी भाँति प्रत्येक परमाणुमें भगवान्‌के दर्शन प्रत्यक्षकी भाँति होते रहते हैं; अतएव उसके लिये तो निरन्तर भगवत्स्मरणके साथ- साथ अन्यान्य कर्म करते रहना बहुत आसान बात है तथा जिसका विषयभोगोंमें वैराग्य होकर भगवान्‌में मुख्य प्रेम हो गया है, जो निष्कामभावसे केवल भगवान्‌की आज्ञा समझकर भगवान्‌के लिये ही वर्णधर्मके अनुसार कर्म करता है, वह भी निरन्तर भगवान्‌का स्मरण करता हुआ अन्यान्य कर्म कर सकता है। जैसे अपने पैरोंका ध्यान रखती हुई नटी बाँसपर चढ़कर अनेक प्रकारके खेल दिखलाती है अथवा जैसे हैंडलपर पूरा ध्यान रखता हुआ मोटर-ड्राइवर दूसरोंसे बातचीत करता है और विपत्तिसे बचनेके लिये रास्तेकी ओर भी देखता रहता है, उसी प्रकार निरन्तर भगवान्‌का स्मरण करते हुए वर्णाश्रमके सब काम सुचारुरूपसे हो सकते हैं। २. बुद्धिसे भगवानके गुण, प्रभाव, स्वरूप, रहस्य और तत्त्वको समझकर परमश्रद्धांके साथ अटल निश्चय कर लेना और मनसे अनन्य श्रद्धा-प्रेमपूर्वक गुण, प्रभावके सहित भगवानका निरन्तर चिन्तन करते रहना--यही मन-बुद्धिको भगवानमें समर्पित कर देना है। 3. यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यानके अभ्यासका नाम “अभ्यासयोग” है। ऐसे अभ्यासयोगके द्वारा जो चित्त भलीभाँति वशमें होकर निरन्तर अभ्यासमें ही लगा रहता है, उसे “अभ्यासयोगयुक्त” कहते हैं। ४. इसी अध्यायके चौथे श्लोकमें जिसको “अधियज्ञ" कहा है और बाईसवें श्लोकमें जिसको “परम पुरुष” बतलाया है, भगवानके उस सृष्टि, स्थिति और संहार करनेवाले सगुण निराकार सर्वव्यापी अव्यक्त ज्ञानस्वरूपको यहाँ “दिव्य परम पुरुष” कहा गया है। उसका चिन्तन करते-करते उसे यथार्थरूपमें जानकर उसके साथ तद्रूप हो जाना ही उसको प्राप्त होना है। ५. परमेश्वर अन्तर्यामीरूपसे सब प्राणियोंके शुभ और अशुभ कर्मके अनुसार शासन करनेवाले होनेसे “सबके नियन्ता' हैं। ३. वेदके जाननेवाले ज्ञानी महात्मा पुरुष कहते हैं कि यह “अक्षर' है अर्थात्‌ यह एक ऐसा महान्‌ तत्त्व है, जिसका किसी भी अवस्थामें कभी भी किसी भी रूपमें क्षय नहीं होता; यह सदा अविनश्वर, एकरस और एकरूप रहता है। गीताके बारहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें जिस अव्यक्त अक्षरकी उपासनाका वर्णन है, यहाँ भी यह उसीका प्रसंग है। २. “ब्रह्मचर्य” का वास्तविक अर्थ है, ब्रह्ममें अथवा ब्रह्मके मार्गमें संचरण करना--जिन साधनोंसे ब्रह्मप्राप्तिके मार्गमें अग्रसर हुआ जा सकता है, उनका आचरण करना। ऐसे साधन ही ब्रह्मचारीके व्रत कहलाते हैं, सब प्रकारसे वीर्यकी रक्षा करना भी इन्हींके अन्तर्गत है। ये ब्रह्मचर्य-आश्रममें आश्रमधर्मके रूपमें अवश्य पालनीय हैं और साधारणतया तो अवस्थाभेदके अनुसार सभी साधकोंको यथाशक्ति उनका अवश्य पालन करना चाहिये। यहाँ भगवानने यह प्रतिज्ञा की है कि उपर्युक्त वाक्योंमें जिस परब्रह्म परमात्माका निर्देश किया गया है, वह ब्रह्म कौन है और अन्तकालमें किस प्रकार साधन करनेवाला मनुष्य उसको प्राप्त होता है--यह बात मैं तुम्हें संक्षेपसे कहूँगा। 3. यहाँ ज्ञानयोगीके अन्तकालका प्रसंग होनेसे 'माम्‌” पद सच्चिदानन्दघन निर्गुण-निराकार ब्रह्मका वाचक है। ४. श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रिय और वाणी आदि पाँच कर्मेन्द्रिय--इन दसों इन्ट्रियोंके द्वारा विषयोंका ग्रहण होता है, इसलिये इनको “द्वार' कहते हैं। इसके अतिरिक्त इनके रहनेके स्थानों (गोलकों)-को भी “द्वार” कहते हैं। इन इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर अर्थात्‌ देखने-सुनने आदिकी समस्त क्रियाओंको बंद करके, साथ ही इन्द्रियोंक गोलकोंको भी रोककर इन्द्रियोंकी वृत्तिको अन्तर्मुख कर लेना ही सब द्वारोंका संयम करना है। इसीको योगशास्त्रमें 'प्रत्याहार' कहते हैं। ५. नाभि और कण्ठ--इन दोनों स्थानोंके बीचका स्थान, जिसे हृदयकमल भी कहते हैं और जो मन तथा प्राणोंका निवासस्थान माना गया है, हृद्देश है और इधर-उधर भटकनेवाले मनको संकल्प-विकल्पोंसे रहित करके हृदयमें निरुद्ध कर देना ही उसको ह॒द्देशमें स्थिर करना है। ६. निर्गुण-निराकार ब्रह्मको अभेदभावसे प्राप्त हो जाना, परम गतिको प्राप्त होना है। इसीको सदाके लिये आवागमनसे मुक्त होना, मुक्तिलाभ कर लेना, मोक्षको प्राप्त होना अथवा निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होना कहते हैं। ७, जिसका चित्त अन्य किसी भी वस्तुमें न लगकर निरन्तर अनन्य प्रेमके साथ केवल परम प्रेमी परमेश्वरमें ही लगा रहता हो, उसे “अनन्यचेता:” कहते हैं। ८. यहाँ “माम्‌” पद सगुण-साकार पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्णका वाचक है; परंतु जो श्रीविष्णु और श्रीराम या भगवानके दूसरे रूपको इष्ट माननेवाले हैं, उनके लिये वह रूप भी “माम्‌ का ही वाच्य है तथा परम प्रेम और श्रद्धाके साथ निरन्तर भगवान्‌के स्वरूपका अथवा उनके नाम, गुण, प्रभाव और लीला आदिका चिन्तन करते रहना ही उनका स्मरण करना है। ३. अनन्यभावसे भगवानका चिन्तन करनेवाला प्रेमी भक्त जब भगवान्‌के वियोगको नहीं सह सकता तब “ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌' (गीता ४।११) के अनुसार भगवान्‌कों भी उसका वियोग असहा हो जाता है और जब भगवान्‌ स्वयं मिलनेकी इच्छा करते हैं, तब कठिनताके लिये कोई स्थान ही नहीं रह जाता। इसी हेतुसे ऐसे भक्तके लिये भगवान्‌को सुलभ बतलाया गया है। २. अतिशय श्रद्धा और प्रेमके साथ नित्य-निरन्तर भजन-ध्यानका साधन करते-करते जब साधनकी वह पराकाष्ठारूप स्थिति प्राप्त हो जाती है, जिसके प्राप्त होनेके बाद फिर कुछ भी साधन करना शेष नहीं रह जाता और तत्काल ही उसे भगवानका प्रत्यक्ष साक्षात्कार हो जाता है--उस पराकाष्ठाकी स्थितिको “परम सिद्धि" कहते हैं और भगवानके जो भक्त इस परम सिद्धिको प्राप्त हैं, उन ज्ञानी भक्तोंके लिये “महात्मा” शब्दका प्रयोग किया गया है। ३. मरनेके बाद कर्मपरवश होकर देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि योनियोंमेंसे किसी भी योनिमें जन्म लेना ही पुनर्जन्म कहलाता है और ऐसी कोई भी योनि नहीं है, जो दुःखपूर्ण और अनित्य न हो। अतः पुनर्जन्ममें गर्भसे लेकर मृत्युपर्यन्त दुःख-ही-दुःख होनेके कारण उसे दुःखोंका घर कहा गया है और किसी भी योनिका तथा उस योनिमें प्राप्त भोगोंका संयोग सदा न रहनेवाला होनेसे उसे अशाश्व॒त (क्षणभंगुर) बतलाया गया है। ४. जो चतुर्मुख ब्रह्मा सृष्टिके आदिमें भगवान्‌के नाभिकमलसे उत्पन्न होकर सारी सृष्टिकी रचना करते हैं, जिनको प्रजापति, हिरण्यगर्भ और सूत्रात्मा भी कहते हैं तथा इसी अध्यायमें जिनको “अधिदैव” कहा गया है (गीता ८।४), वे जिस ऊर्ध्वलोकमें निवास करते हैं, उस लोकविशेषका नाम “ब्रह्मलोक' है। उपर्युक्त ब्रह्मलोकके सहित उससे नीचेके जितने भी विभिन्न लोक हैं, उन सबको पुनरावर्ती समझना चाहिये। ५. बार-बार नष्ट होना और उत्पन्न होना जिनका स्वभाव हो, उन लोकोंको 'पुनरावर्ती” कहते हैं। ६. यहाँ “युग” शब्द “दिव्य युग" का वाचक है--जो सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग चारों युगोंक समयको मिलानेपर होता है। यह देवताओंका युग है, इसलिये इसको “दिव्य युग” कहते हैं। इस देवताओंके समयका परिमाण हमारे समयके परिमाणसे तीन सौ साठ गुना अधिक माना जाता है। अर्थात्‌ हमारा एक वर्ष देवताओंका एक दिन-रात, हमारे तीस वर्ष देवताओंका एक महीना और हमारे तीन सौ साठ वर्ष उनका एक दिव्य वर्ष होता है। ऐसे बारह हजार दिव्य वर्षोका एक “दिव्य युग” होता है। इसे “महायुग” और “चतुर्युगी' भी कहते हैं। इस संख्याके जोड़नेपर हमारे ४३,२०,००० वर्ष होते हैं। दिव्य वर्षोंके हिसाबसे बारह सौ दिव्य वर्षोका हमारा कलियुग, चौबीस सौका द्वापर, छत्तीस सौका त्रेता और अड़तालीस सौ वर्षोका सत्ययुग होता है। कुल मिलाकर १२,००० वर्ष होते हैं। इसे दूसरी तरह समझिये। हमारे युगोंके समयका परिमाण इस प्रकार है-- कलियुग--४,३२,००० वर्ष द्वापरयुग--८,६४,००० वर्ष (कलियुगसे दुगुना) त्रेतायुग--१२,९६,००० वर्ष (कलियुगसे तिगुना) सत्ययुग--१७,२८,००० वर्ष (कलियुगसे चौगुना) कुल जोड़--४३,२०,००० वर्ष यह एक दिव्य युग हुआ। ऐसे हजार दिव्य युगोंका अर्थात्‌ हमारे ४,३२,००,००,००० (चार अरब बत्तीस करोड़) वर्षका ब्रह्माका एक दिन होता है और इतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है। मनुस्मृतिके प्रथम अध्यायमें चौंसठवेंसे तिहत्तरवें श्लोकतक इस विषयका विशद वर्णन है। ब्रह्माके दिनको “कल्प” या 'सर्ग' और रात्रिको प्रलय कहते हैं। ऐसे तीस दिन-रातका ब्रह्माका एक महीना, ऐसे बारह महीनोंका एक वर्ष और ऐसे सौ वर्षोकी ब्रह्माकी पूर्णायु होती है। ब्रह्माके दिन-रात्रिका परिमाण बतलाकर भगवान्‌ने यह भाव दिखलाया है कि इस प्रकार ब्रह्माका जीवन और उनका लोक भी सीमित तथा कालकी अवधिवाला है, इसलिये वह भी अनित्य ही है और जब वही अनित्य है, तब उसके नीचेके लोक और उनमें रहनेवाले प्राणियोंके शरीर अनित्य हों, इसमें तो कहना ही क्या है? ३. देव, मनुष्य, पितर, पशु, पक्षी आदि योनियोंमें जितने भी व्यक्तरूपमें स्थित देहधारी चराचर प्राणी हैं, उन सबको “व्यक्ति कहा है। प्रकृतिका जो सूक्ष्म परिणाम है, जिसको ब्रह्माका सूक्ष्म शरीर भी कहते हैं, स्थूल पंचमहाभूतोंके उत्पन्न होनेसे पूर्वकी जो स्थिति है, उस सूक्ष्म अपरा प्रकृतिका नाम यहाँ “अव्यक्त' है। ब्रह्माके दिनके आगममें अर्थात्‌ जब ब्रह्मा अपनी सुषुप्ति-अवस्थाका त्याग करके जाग्रत्‌-अवस्थाको स्वीकार करते हैं, तब उस सूक्ष्म प्रकृतिमें विकार उत्पन्न होता है और वह स्थूलरूपमें परिणत हो जाती है एवं उस स्थूलरूपमें परिणत प्रकृतिके साथ सब प्राणी अपने-अपने कर्मानुसार विभिन्न रूपोंमें सम्बद्ध हो जाते हैं। यही अव्यक्तसे व्यक्तियोंका उत्पन्न होना है। २. एक हजार दिव्य युगोंके बीत जानेपर जिस क्षणमें ब्रह्मा जाग्रत्‌-अवस्थाका त्याग करके सुषुप्ति-अवस्थाको स्वीकार करते हैं, उस प्रथम क्षणका नाम ब्रह्माकी रात्रिका आगम प्रवेश-काल है। उस समय स्थूलरूपमें परिणत प्रकृति सूक्ष्म अवस्थाको प्राप्त हो जाती है और समस्त देहधारी प्राणी भिन्न-भिन्न स्थूल शरीरोंसे रहित होकर प्रकृतिकी सूक्ष्म अवस्थामें स्थित हो जाते हैं। यही उस अव्यक्तमें समस्त व्यक्तियोंका लय होना है। 3. अव्यक्तमें लीन हो जानेसे भूतप्राणी न तो मुक्त होते हैं और न उनकी भिन्न सत्ता ही मिटती है। इसीलिये ब्रह्माकी रात्रिका समय समाप्त होते ही वे सब पुनः अपने-अपने गुण और कर्मोंके अनुसार यथायोग्य स्थूल शरीरोंको प्राप्त करके प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार यह भूतसमुदाय अनादिकालसे उत्पन्न हो-होकर लीन होता चला आ रहा है। ब्रह्माकी आयुके सौ वर्ष पूर्ण होनेपर जब ब्रह्माका शरीर भी मूल प्रकृतिमें लीन हो जाता है और उसके साथ-साथ सब भूतसमुदाय भी उसीमें लीन हो जाते हैं (गीता ९७), तब भी इनके इस चक्‍्करका अन्त नहीं आता। ये उसके बाद भी उसी तरह पुनः-पुनः उत्पन्न होते रहते हैं (गीता ९॥८)। जबतक प्राणीको परमात्माकी प्राप्ति नहीं हो जाती, तबतक वह बार-बार इसी प्रकार उत्पन्न हो- होकर प्रकृतिमें लीन होता रहेगा। यहाँ ब्रह्माके दिन-रातका प्रसंग होनेसे यही समझना चाहिये कि ब्रह्मा ही समस्त प्राणियोंको उनके गुण-कर्मानुसार शरीरोंसे सम्बद्ध करके बार-बार उत्पन्न करते हैं। महाप्रलयके बाद जिस समय ब्रह्माकी उत्पत्ति नहीं होती, उस समय तो सृष्टिकी रचना स्वयं भगवान्‌ करते हैं; परंतु ब्रह्माके उत्पन्न होनेके बाद सबकी रचना ब्रह्मा ही करते हैं। गीताके नवें अध्यायमें (श्लोक ७ से १०) और चौदहवें अध्यायमें (लोक ३, ४) जो सृष्टिरचनाका प्रसंग है, वह महाप्रलयके बाद महासर्गके आदिकालका है और यहाँका वर्णन ब्रह्माकी रात्रिके (प्रलयके) बाद ब्रह्माके दिनके (सर्गके) आरम्भ-समयका है। ३. अठारहवें श्लोकमें जिस “अव्यक्त' में समस्त व्यक्तियों (भूत-प्राणियों)-का लय होना बतलाया गया है, उसीका वाचक यहाँ “अव्यक्तात्‌' पद है; उस पूर्वोक्त “अव्यक्त'” से इस “अव्यक्त*” को “पर” और “अन्य” बतलाकर उससे इसकी अत्यन्त श्रेष्ठठा और विलक्षणता सिद्ध की गयी है। अभिप्राय यह है कि दोनोंका स्वरूप “अव्यक्त' होनेपर भी दोनों एक जातिकी वस्तु नहीं हैं। वह पहला “अव्यक्त” जड, नाशवान्‌ और ज्ञेय है; परंतु यह दूसरा चेतन, अविनाशी और ज्ञाता है। साथ ही यह उसका स्वामी, संचालक और अधिष्ठाता है; अतएव यह उससे अत्यन्त श्रेष्ठ और विलक्षण है। अनादि और अनन्त होनेके कारण इसे “सनातन” कहा गया है। इसलिये यह सबके नष्ट होनेपर भी नष्ट नहीं होता। २. जिसे पूर्वश्लोकमें “सनातन अव्यक्तभाव” के नामसे और आठवें तथा दसवें श्लोकोंमें 'परम दिव्य पुरुष” के नामसे कहा है, उसी अधियज्ञ पुरुषको यहाँ “अव्यक्त' और “अक्षर' कहा है। ३. जो मुक्ति सर्वोत्तम प्राप्य वस्तु है, जिसे प्राप्त कर लेनेके बाद और कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता, उसका नाम “परम गति' है। इसलिये जिस निर्मुण-निराकार परमात्माको “परम अक्षर” और '“ब्रह्म' कहते हैं, उसी सच्चिदानन्दघन ब्रह्मको 'परम गति” कहा गया है (गीता ८।१३)। ४. अभिप्राय यह है कि भगवानके नित्य धामकी, भगवद्धावकी और भगवान्‌के स्वरूपकी प्राप्तिमें कोई वास्तविक भेद नहीं है। इसी तरह अव्यक्त अक्षरकी प्राप्तिमें तथा परमगतिकी प्राप्तिमें और भगवान्‌की प्राप्तिमें भी वस्तुतः कोई भेद नहीं है। साधनाके भेदसे साधकोंकी दृष्टिमें फलका भेद है। इसी कारण उसका भिन्न-भिन्न नामोंसे वर्णन किया गया है। यथार्थमें वस्तुगत कुछ भी भेद न होनेके कारण यहाँ उन सबकी एकता दिखलायी गयी है। ५. जैसे वायु, तेज, जल और पृथ्वी--चारों भूत आकाशके अन्तर्गत हैं, आकाश ही उनका एकमात्र कारण और आधार है, उसी प्रकार समस्त चराचर प्राणी अर्थात्‌ सारा जगत्‌ परमेश्वरके ही अन्तर्गत है, परमेश्वरसे ही उत्पन्न है और परमेश्वरके ही आधारपर स्थित है तथा जिस प्रकार वायु, तेज, जल, पृथ्वी--इन सबमें आकाश व्याप्त है, उसी प्रकार यह सारा जगत्‌ अव्यक्त परमेश्वरसे व्याप्त है, यही बात गीताके नवम अध्यायके चौथे, पाँचवें और छठे श्लोकोंमें विस्तारपूर्वक दिखलायी गयी है। ६. सर्वाधार, सर्वान्ति्यामी, सर्वशक्तिमानू, परम पुरुष परमेश्वरमें ही सब कुछ समर्पण करके उनके विधानमें सदा परम संतुष्ट रहना और सब प्रकारसे अनन्य प्रेमपूर्वक नित्य-निरन्तर उनका स्मरण करना ही अनन्यभक्ति है। इस अनन्य- भक्तिके द्वारा साधक अपने उपास्यदेव परमेश्वरके गुण, स्वभाव और तत्त्वको भलीभाँति जानकर उनमें तन्मय हो जाता है और शीघ्र ही उनका साक्षात्कार करके कृतकृत्य हो जाता है। यही साधकका उन परमेश्वरको प्राप्त कर लेना है। $. यहाँ “काल” शब्द उस मार्गका वाचक है, जिसमें कालाभिमानी भिन्न-भिन्न देवताओंका अपनी-अपनी सीमातक अधिकार है; क्योंकि इस अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें इसीको “शुक्ल” और “कृष्ण” दो प्रकारकी “गति'के नामसे और सत्ताईसवें श्लोकमें 'सृति" के नामसे कहा है। वे दोनों ही शब्द मार्गवाचक हैं। इसके सिवा “अग्नि:', “ज्योति: और “धूम:' पद भी समयवाचक नहीं हैं। अतएव चौबीसवें और पचीसवें श्लोकोंमें आये हुए “तत्र” पदका अर्थ *समय' मानना उचित नहीं होगा। इसीलिये यहाँ “काल” शब्दका अर्थ कालाभिमानी देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाला “मार्ग” मानना ही ठीक है। संसारमें लोग जो दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायणके समय मरना अच्छा समझते हैं, यह समझना भी एक प्रकारसे ठीक ही है; क्योंकि उस समय उस-उस कालाभिमानी देवताओंके साथ तत्काल सम्बन्ध हो जाता है। अत: उस समय मरनेवाला योगी गन्तव्य स्थानतक शीघ्र और सुगमतासे पहुँच जाता है। पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि रात्रिके समय मरनेवाला तथा कृष्णपक्षमें और दक्षिणायनके छ: महीनोंमें मरनेवाला अर्चिमार्गसे नहीं जाता; बल्कि यह समझना चाहिये कि चाहे जिस समय मरनेपर भी, वह जिस मार्गसे जानेका अधिकारी होगा, उसी मार्गसे जायगा। २. 'योगीजन” से यह बात समझनी चाहिये कि जो साधारण मनुष्य इसी लोकमें एक योनिसे दूसरी योनिमें बदलनेवाले हैं या जो नरकादियमें जानेवाले हैं, उनकी गतिका यहाँ वर्णन नहीं है। 3. यहाँ “ज्योति: पद “अग्नि: का विशेषण है और “अग्नि:' पद अग्नि-अभिमानी देवताका वाचक है। उपनिषदोंमें इसी देवताको “अर्चि:” कहा गया है। इसका स्वरूप दिव्य प्रकाशमय है, पृथ्वीके ऊपर समुद्रसहित सब देशमें इसका अधिकार है तथा उत्तरायण-मार्गमें जानेवाले अधिकारीका दिनके अभिमानी देवतासे सम्बन्ध करा देना ही इसका काम है। उत्तरायण मार्गसे जानेवाला जो उपासक रात्रिमें शरीर त्याग करता है, उसे यह रातभर अपने अधिकारमें रखकर दिनके उदय होनेपर दिनके अभिमानी देवताके अधीन कर देता है और जो दिनमें मरता है, उसे तुरंत ही दिनके अभिमानी देवताको सौंप देता है। ४. 'अहः” पद दिनके अभिमानी देवताका वाचक है, इसका स्वरूप अग्नि-अभिमानी देवताकी अपैक्षा बहुत अधिक दिव्य प्रकाशमय है। जहाँतक पृथ्वी-लोककी सीमा है अर्थात्‌ जितनी दूरतक आकाश्में पृथ्वीके वायुमण्डलका सम्बन्ध है, वहाँतक इसका अधिकार है और उत्तरायणमार्गमें जानेवाले उपासकको शुक्लपक्षके अभिमानी देवतासे सम्बन्ध करा देना ही इसका काम है। अभिप्राय यह है कि उपासक यदि कृष्णपक्षमें मरता है तो शुक्लपक्ष आनेतक उसे यह अपने अधिकारमें रखकर और यदि शुक्लपक्षमें मरता है तो तुरंत ही अपनी सीमातक ले जाकर उसे शुक्लपक्षके अभिमानी देवतासे अधीन कर देता है। ५. 'शुक्ल:' पद शुक्लपक्षाभिमानी देवताका वाचक है। इसका स्वरूप दिनके अभिमानी देवतासे भी अधिक दिव्य प्रकाशमय है। भूलोककी सीमासे बाहर अन्तरिक्षलोकमें--जिन पितृ-लोकोंमें पंद्रह दिनके दिन और उतने ही समयकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका अधिकार है और उत्तरायणमार्गसे जानेवाले अधिकारीको अपनी सीमासे पार करके उत्तरायणके अभिमानी देवताके अधीन कर देना इसका काम है। यह भी पहलेवालोंकी भाँति यदि साधक दक्षिणायनमें इसके अधिकारमें आता है तो उत्तरायणका समय आनेतक उसे अपने अधिकारमें रखकर और यदि उत्तरायणमें आता है तो तुरंत ही अपनी सीमासे पार करके उत्तरायण-अभिमानी देवताके अधिकारमें सौंप देता है। ६. जिन छ: महीनोंमें सूर्य उत्तर दिशाकी ओर चलते रहते हैं, उस छमाहीको उत्तरायण कहते हैं। उस उत्तरायण- कालाभिमानी देवताका वाचक यहाँ “षण्मासा उत्तरायणम्‌” पद है। इसका स्वरूप शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे भी बढ़कर दिव्य प्रकाशमय है। अन्तरिक्षतोकके ऊपर जिन देवताओं के लोकोंमें छः महीनोंके दिन एवं उतने ही समयकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका अधिकार है और उत्तरायणमार्गसे परमधामको जानेवाले अधिकारीको अपनी सीमासे पार करके, उपनिषदोंमें वर्णित--(छान्दोग्य उप० ४,सम्बन्ध-- भगवान्‌के गुण, प्रभाव आदिको जाननेवाले अनन्यप्रेमी भ्क्तोंके भजनका प्रकार बतलाकर अब भगवान्‌ उनसे भिन्न श्रेणीके उपासकोंकी उपासनाका प्रकार बतलाते ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्‌ दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्मका ज्ञान-यज्ञके द्वारा अभिन्नभावसे पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं,“ और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकारसे स्थित मुझ विराट्स्वरूप परमेश्वरकी पृथक्‌ भावसे उपासना करते हैं+

قال أرجونا: إنه يسأل كريشنا أن يبيّن المعاني العميقة للألفاظ التي ذُكرت من قبل—ما هو «براهْمان»، وما المقصود بـ«أدهياتما» (الذات الباطنة)، وما دلالة «الكَرْما» على المستوى الكوني، وكيف يُفهم «أدهيبهوته» و«أدهي دايفا» و«أدهي يَجْنْيا»، ولا سيما في صلتها بالإنسان المتجسّد. وفي السياق الأخلاقي والروحي لساحة القتال، تعكس مسألة أرجونا انتقالًا من قلقٍ تكتيكي إلى طلب الفهم القويم الذي يهدي الفعل بلا التباس، مُؤسِّسًا الواجب (الدهرما) على معرفة الحقيقة والذات الإلهية.

Verse 16

सम्बन्ध-- यमस्त विश्वकी उपासना भ्रगवान्‌की ही उपासना कैसे है--यह स्पष्ट समझानेके लिये अब चार शलोकोंद्वाय भगवान्‌ इस बातका प्रतिपादन करते हैं कि समस्त जगत्‌ मेरा ही स्वरूप है-- अहं क्रतुरहं! यज्ञ: स्वधाहमहमौषधम्‌ः | मन्त्रो5हमहमेवाज्यमहमग्निरहंरं हुतम्‌,क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, ओषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ

قال الربّ: «أنا الطقسُ الفيديّ (كراتو)؛ وأنا الذبيحة (يَجْنْيا). أنا السْفَدْها—قربانُ الأسلاف؛ وأنا العُشبةُ الشافية. أنا المانترا؛ وأنا وحدي السمنُ المُصفّى. أنا النار، وأنا أيضًا فعلُ الإراقةِ في القربان نفسه».

Verse 17

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामह: । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्‌ साम यजुरेव च,इस सम्पूर्ण जगत॒का धाता अर्थात्‌ धारण करनेवाला एवं कर्मोंके फलको देनेवाला, पिता, माता,” पितामह,* जाननेयोग्य, पवित्र, ओंकार* तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ"?

قال الربّ: «أنا أبُ هذا العالم كلّه، وأمُّه، والحاملُ له، والمُعطي ثمارَ الأعمال، والجدُّ الأعلى. أنا ما ينبغي أن يُعرَف؛ وأنا المُطهِّر؛ وأنا المقطعُ المقدّس أوم؛ وأنا كذلك الرِّغ والسّام واليَجُر من الفيدا».

Verse 18

गतिर्भ्ताः5 प्रभु: साक्षी निवास: शरणं5३ सुह्ृत्‌*३ | प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌5४,प्राप्त होनेयोग्य परम धाम, भरण-पोषण करनेवाला, सबका स्वामी, शुभाशुभक्त देखनेवाला, सबका वासस्थान, शरण लेनेयोग्य, प्रत्युयकार न चाहकर हित करनेवाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलयका हेतु, स्थितिका आधार, निधानः और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ:

قال الربّ: «أنا الغايةُ المُرتجاة، والمُعيل، والربّ، والشاهد. أنا مَسكنُ الجميع، والملجأ، والوليّ المُحسن الذي يعمل للآخرين دون طلبِ جزاء. أنا مصدرُ النشوء والفناء، وأساسُ الثبات، والمستودعُ الأخير، والبذرةُ—العلّةُ التي لا تبلى».

Verse 19

तपाम्यहमहं वर्ष निगृल्नाम्युत्सूजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्न सदसच्चाहमर्जुन,मैं ही सूर्यरूपसे तपता हूँ, वर्षाका आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ*। हे अर्जुन! मैं ही अमृत” और मृत्यु& हूँ और सत्‌-असत्‌ भी मैं ही हूँ?

أنا الذي يتوهّج كالشمس؛ أنا أستجلب الأمطار وأُرسلها. يا أرجونا، أنا وحدي الخلود والموت، وأنا الوجود واللاوجود معًا.

Verse 20

सम्बन्ध--तेरहवेंसे पंद्रहवें *लीकतक अपने सगुण-निर्गुण और विराट्‌ू रूपकी उपासनाओंका वर्णन करके भगवान्‌ने उन्नीसवें "्त्रीकतक समस्त विश्वको अपना स्वरूप बतलाया। 'समस्त विश्व मेरा ही स्वरूप होनेके कारण इन्द्रादि अन्य देवोंकी उपासना भी प्रकारान्तरसे मेरी ही उपासना है, परंतु ऐसा न जानकर फलासक्तिपूर्वक पृथक्‌-पृथक्‌ भावसे उपासना करनेवालोंको मेरी प्राप्ति न होकर विनाशी फल ही मिलता है।” इसी बातको दिखलानेके लिये अब दो शलोकोंमें भगवान्‌ उस उपासनाका फलसहित वर्णन करते त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा यज्ैरिष्टवा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक- मश्न्ति दिव्यान्‌ दिवि देवभोगान्‌,तीनों वेदोंमें विधान किये हुए सकामकर्मोौंको करनेवाले, सोमरसको पीनेवाले, पापरहित पुरुष£ मुझको यज्ञोंके द्वारा पूजकर स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं; ये पुरुष अपने पुण्योंके फलरूप स्वर्गलोकको* प्राप्त होकर स्वर्गमें दिव्य देवताओंके भोगोंको भोगते हैं

الذين يتّبعون الشعائر المأمور بها في الفيدات الثلاث—شاربو السُّوما (Soma)، المطهَّرون من الإثم—يعبدونني بالقرابين (يَجْنَا yajña) ويسألون بلوغ السماء. فإذا نالوا بعاقبة البرّ عالمَ إندرا، تمتعوا في العالم السماوي بلذّاتٍ إلهية بهيّة تليق بالآلهة.

Verse 21

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोक॑ विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते,वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्गके साधनरूप तीनों वेदोंमें कहे हुए सकामकर्मका आश्रय लेनेवाले और भोगोंकी कामनावाले पुरुष बार-बार आवागमनको प्राप्त होते हैं, अर्थात्‌ पुण्यके प्रभावसे स्वर्गमें जाते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आते हैं:

بعد أن يتمتعوا بتلك السماء الواسعة، إذا نفد رصيدُهم من البرّ عادوا فدخلوا عالمَ الفناء من جديد. وهكذا فإن الذين يلجؤون إلى شريعة الفيدات الثلاث وسيلةً لنيل اللذّات المرغوبة—أناسًا تسوقهم الشهوة—لا ينالون إلا تكرار المجيء والذهاب: يصعدون إلى السماء بقوة الاستحقاق، ثم يرجعون إلى عالم الموتى حين ينفد ذلك الاستحقاق.

Verse 22

अनन्याश्रिन्तयन्तोः मां ये जना: पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्पहम्‌,किंतु जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वरको निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्कामभावसे भजते हैं, उन नित्य-निरन्तर मेरा चिन्तन करनेवाले पुरुषोंका योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ

أما الذين يعبدونني بمحبةٍ لا شريك لها، يذكرونني على الدوام ويلازمون عبادتي بثبات—فأولئك المخلصون المواظبون أتولى أنا نفسي «يوغا-كشِما» (yoga-kṣema): أجلب لهم ما ينقصهم وأحفظ لهم ما بأيديهم.

Verse 23

ये5प्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विता:* । तेडपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌

حتى الذين، وهم ذوو إيمان، يعبدون آلهةً أخرى—يا ابنَ كونتي—فإنما يعبدونني أنا وحدي في الحقيقة؛ غير أنهم يفعلون ذلك على غير الوجه الصحيح، لقصور فهمهم للمبدأ الحقّ وللطريقة المقررة.

Verse 24

हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धासे युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओंको पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात्र अज्ञानपूर्वक है? ।। अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्चयवन्ति ते,क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ;* परंतु वे मुझ परमेश्वरको तत्त्वसे नहीं जानते, इसीसे गिरते हैं अर्थात्‌ पुनर्जन्मको प्राप्त होते हैं

يا أرجونا! إن الذين يعبدون آلهةً أخرى بإيمانٍ ولكن بدافع الرغبات، إنما يعبدونني أنا أيضًا؛ غير أن عبادتهم تلك ليست على الوجه الصحيح، لأنها صادرة عن الجهل. فأنا وحدي المتقبِّل الحقّ والسيدُ المهيمن على جميع القرابين؛ لكنهم لا يعرفونني على حقيقتي، فلذلك يسقطون—ويعودون إلى دورة الميلاد المتكرر.

Verse 25

सम्बन्ध-- भगवान्‌के भ्क्त आवागमनको प्राप्त नहीं होते और अन्य देवताओंके उपासक जआवागमनको प्राप्त होते हैं; इसका क्या कारण है? इस जिज्ञासापर उपास्यके स्वरूप और उपासकके भावसे उपासनाके फलमें भेद होनेका नियम बतलाते हैं-- यान्ति देवब्रता देवान्‌ पितृन्‌ यान्ति पितृव्रता: । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोडपि माम्‌,देवताओंको पूजनेवाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरोंको पूजनेवाले पितरोंको प्राप्त होते हैं,ः भूतोंकों पूजनेवाले भूतोंको प्राप्त होते हैं: और मेरा पूजन करनेवाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं*। इसीलिये मेरे भक्तोंका पुनर्जन्म नहीं होता

من نذروا أنفسهم للآلهة يذهبون إلى الآلهة؛ ومن نذروا أنفسهم للآباء والأجداد يذهبون إلى الأسلاف. وعبّاد الأرواح والكائنات العنصرية يبلغون تلك الكائنات؛ وأما عابدوِي فيبلغونني أنا وحدي. وهكذا فإن ثمرة العبادة تتبع طبيعة المعبود ونيّة العابد—فالتفاني يحدّد المصير.

Verse 26

सम्बन्ध-- भगवान्‌की भ्क्तिका भयवत्प्राप्तिरूप महान्‌ फल होनेपर भी उसके साधनमें कोई कठिनता नहीं है; बल्कि उसका साधन बहुत ही युगम है--यही बात दिखलानेके लिये भ्रगवान्‌ कहते हैं-- पत्र॑ पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्‍्त्युह्वतमश्नामि5 ३ प्रयतात्मन:,जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेमसे पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है,< उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूपसे प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ

من قدّم لي بتفانٍ ورقَةً أو زهرةً أو ثمرةً أو ماءً—تقدمةً يخرجها التفاني من قلبٍ منضبطٍ صادق—فإني أقبلها وأتقبّلها بسرورٍ مفعمٍ بالنعمة.

Verse 27

सम्बन्ध-- यदि ऐसी ही बात है तो मुझे क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर भगवान्‌ अजुनिको उसका कर्तव्य बतलाते हैं-- यत्‌ करोषि यदश्रासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌ | यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्‌ कुरुष्व मदर्पणम्‌,हे अर्जुन! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो तप करता है,* वह सब मेरे अर्पण कर*

مهما فعلتَ، ومهما أكلتَ، ومهما قدّمتَ في القربان، ومهما تصدّقتَ، وأيَّ زهدٍ أو رياضةٍ روحيةٍ مارستَ—يا ابن كونتي—فاجعل ذلك كلَّه قربانًا لي.

Verse 28

सम्बन्ध--इस प्रकार समस्त कमोंको आपके अर्पण करनेसे कया होगा; इस जिज्ञासापर कहते हैं-- शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै: । संन्यासयोगयुक्तात्माः विमुक्तो मामुपैष्यसि,इस प्रकार, जिसमें समस्त कर्म मुझ भगवानके अर्पण होते हैं--ऐसे संन्यासयोगसे युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलरूप कर्मान्धनसे मुक्त हो जायगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगाः

وهكذا، بإهداء جميع الأعمال إليّ، تتحرّر من رباط الكارما الذي يتجلّى في ثمارٍ حسنةٍ وسيئة. وبنفسٍ منضبطةٍ بيوغا التخلّي، تصير حرًّا؛ وإذا تحرّرتَ بلغتَني أنا وحدي.

Verse 29

सम्बन्ध--उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌की भक्ति करनेवालेको भगवान्‌की प्राप्ति होती है, दूसरोंको नहीं होती--इस कथनसे भगवान्‌रें विषमताके दोषकी आशंका हो सकती है। अतएव उसका निवारण करते हुए भगवान्‌ कहते हैं-- समोऊहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यो5स्ति न प्रिय: । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌,मैं सब भूतोंमें समभावसे व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है; परंतु जो भक्त मुझको प्रेमसे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ

يُعلن الربّ أنّه قائمٌ على السواء في جميع الكائنات—لا يحمل بغضًا لأحد ولا يُحابِي أحدًا. غير أنّ الذين يعبدونه بمحبةٍ وإخلاصٍ يسكنون فيه بألفةٍ خاصة، وهو بدوره يتجلّى لهم ويسكن فيهم.

Verse 30

अपिः चेत्‌ सुदुराचारो3 भजते मामनन्यभाक्‌ । साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि सः

حتى لو كان المرء سيّئ السلوك غاية السوء، فإن عبدني بإخلاصٍ غير منقسم، وجب أن يُعَدَّ صالحًا—لأن عزمه قد استقام على الوجه الحق. والمغزى الأخلاقي أنّ التوجّه الصادق الحصري إلى الإلهي علامةُ انقلابٍ باطنيّ حاسم؛ فينبغي للحكم أن يراعي قصد التحوّل هذا، لا أن يقف عند عثرات الماضي وحدها.

Verse 31

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझको भजता हैः तो वह साधु ही माननेयोग्य है; क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है। अर्थात्‌ उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं हैः ।। क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति,वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है।। हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जानः कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता3

حتى لو كان المرء بالغ السوء في أفعاله، فإن كان يعبدني بإخلاصٍ غير منقسم بوصفه من عبّادي، وجب أن يُعَدَّ من الصالحين، لأن عزمه قد استقام حقًّا. لقد حسم أمره بأن لا شيء يعدل عبادة الربّ الأعلى. وسرعان ما يصير ذا روحٍ دينية ويبلغ سلامًا دائمًا. يا ابن كُنتي، اعلمها حقيقةً ثابتة: إن عبدي لا يهلك.

Verse 32

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास््ररूप श्रीमद्भगवद्‌्गीतोपनिषद्‌, श्रीकृष्णाजुनिसंवादमें अक्षत्रह्मययोग नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८ ॥ भीष्मपर्वमें बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,सम्बन्ध-- अब दी शलोकोंगें भगवान्‌ अच्छी-बुरी जातिके कारण होनेवाली विषमताका अपनेगें अभाव दिखलाते हुए शरणायतिरूप भ्क्तिका महत्त्व प्रतिपादन करके अजुनिको भजन करनेकी आज्ञा देते हैं-- मां हि पार्थ व्यपश्रित्य येडपिः स्यु: पापयोनय: । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेडपिः यान्ति परां गतिम्‌ हे अर्जुन! स्त्री, वैश्य, शूद्र तथा पापयोनिः--चाण्डालादि जो कोई भी हों, वे भी मेरे शरण होकरः* परमगतिको ही प्राप्त होते हैं

فيا بارثا، حتى أولئك الذين يُعَدّون «ذوي مولدٍ آثم»—كالنساء والفيشيا والشودرا—إذا احتمَوا بي واتخذوني ملجأً، فإنهم هم أيضًا يبلغون الغاية العليا. وفي عالمٍ موسومٍ بالتراتبية الاجتماعية والأحكام الأخلاقية، يؤكد الربّ أن الاستسلام الصادق والعبادة المخلصة يتجاوزان المنزلة الموروثة، ويفتحان باب التحرر لكل من يطلبه.

Verse 33

कि पुनर्ब्राह्मणा:* पुण्या भक्ता: राजर्षयस्तथा | अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्पय भजस्व माम्‌

قال أرجونا: «فكم بالحري إذن البراهمة الأبرار، والعبّاد المخلصون، والملوك الحكماء! وقد جاءوا إلى هذا العالم الزائل القليل الفرح، فليتخذوا فيك ملجأً وليعبدوك.»

Verse 34

फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण तथा राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परम गतिको प्राप्त होते हैं। इसलिये तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्यशरीरको प्राप्त होकर निरन्तर मेरा ही भजन करः |। सम्बन्ध-- पिछले शलोकमें भगवान्‌ने अपने भजनका गयहत्त्व दिखलाया और अन्तमें अजुनको भजन करनेके लिये कहा। अतएव अब भगवान्‌ अपने भ्रजनका अर्थात्‌ शरणागतिका प्रकार बतलाते हुए अध्यायकी समाप्ति करते हैं-- मन्मना भव मद्धक्तो मद्याजी मां: नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:,मुझमें मनवाला हो,” मेरा भक्त बन,* मेरा पूजन करनेवाला हो,“ मुझको प्रणाम करेे। इस प्रकार आत्माको मुझमें नियुक्त करकेः मेरे परायण* होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा?

فماذا يُقال بعد ذلك؟ إنّ البراهمة ذوي البرّ، والملوكَ الرِّشِيّين من أهل العبادة، إذا احتمَوا بملجئي نالوا الغاية العُليا. فإذ قد نلتَ هذا الجسد الإنساني الذي لا سعادةَ حقيقيةَ فيه وهو سريعُ الزوال، فداوم على عبادتي دون انقطاع. «اجعل ذهنك فيَّ؛ وكن من عبّادي؛ واعبدني؛ واسجد لي. فبهذا، إذا روّضتَ نفسك وجعلتني ملاذك الأسمى وغايتك القصوى، فستأتي إليّ يقينًا—إليّ وحدي.»

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to act responsibly when outcomes appear overwhelming and prefigured by larger forces; Arjuna’s fear and disorientation test whether duty can be sustained without collapsing into paralysis or despair.

The chapter teaches that perception and agency can be reoriented: one acts as an instrument aligned with dharma, recognizing time-bound transformation (kāla) while cultivating devotion and detachment that reduce egocentric fixation.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides a meta-criterion for access to the vision’s meaning: such reality is not reached by ritual, austerity, or study alone, but by ananyā-bhakti enabling true knowledge, vision, and participatory understanding.