Viśvarūpa-darśana (The Vision of the Universal Form) — महायोगेश्वरस्य विश्वरूपदर्शनम्
१६)। ४. चौरासी लाख योनियोंमें भटकते-भटकते कभी-न-कभी भगवान् दया करके जीवमात्रको मनुष्यशरीर देकर अपने तथा देवताओंके लोकोंमें जानेका सुअवसर देते हैं। उस समय यदि वह जीवनका सदुपयोग करे तो दोनोंमेंसे किसी एक मार्गके द्वारा गन्तव्य स्थानको अवश्य प्राप्त कर सकता है। अतएव प्रकारान्तरसे प्राणिमात्रके साथ इन दोनों मार्गोंका सम्बन्ध है। ये मार्ग सदासे ही समस्त प्राणियोंके लिये हैं और सदैव रहेंगे। इसीलिये इनको शाश्वत कहा है। यद्यपि महाप्रलयमें जब समस्त लोक भगवानमें लीन हो जाते हैं, उस समय ये मार्ग और इनके देवता भी लीन हो जाते हैं, तथापि जब पुनः सृष्टि होती है, तब पूर्वकी भाँति ही इनका पुनः निर्माण हो जाता है। अतः इनको 'शाश्वत' कहनेमें कोई दोष नहीं है। ५. अर्थात् इसी अध्यायके २४वें श्लोकके अनुसार अर्चिमार्गसे गया हुआ योगी। ६. अर्थात् इसी अध्यायके २५वें श्लोकके अनुसार धूममार्गसे गया हुआ सकाम कर्मी। ७. योगसाधनामें लगा हुआ भी मनुष्य इन मार्गोंका तत्त्व न जाननेके कारण स्वभाववश इस लोक या परलोकके भोगोंमें आसक्त होकर साधनसे भ्रष्ट हो जाता है, यही उसका मोहित होना है; किंतु जो इन दोनों मार्गोंको तत्त्वसे जानता है, वह फिर ब्रह्मलोकपर्यन्त समस्त लोकोंके भोगोंकोी नाशवान् और तुच्छ समझ लेनेके कारण किसी भी प्रकारके भोगोंमें आसक्त नहीं होता एवं निरन्तर परमेश्वरकी प्राप्तिके ही साधनमें लगा रहता है। यही उसका मोहित न होना है। ८. यहाँ भगवान्ने जो अर्जुनको सब कालमें योगयुक्त होनेके लिये कहा है, इसका यह भाव है कि मनुष्य-जीवन बहुत थोड़े ही दिनोंका है, मृत्युका कुछ भी पता नहीं है कि कब आ जाय। यदि अपने जीवनके प्रत्येक क्षणको साधनमें लगाये रखनेका प्रयत्न नहीं किया जायगा तो साधन बीच-बीचमें छूटता रहेगा और यदि कहीं साधनहीन अवस्थामें मृत्यु हो जायगी तो योगगश्रष्ट होकर पुन: जन्म ग्रहण करना पड़ेगा। अतएव मनुष्यको भगवत्प्राप्तिके साधनमें नित्य-निरन्तर लगे ही रहना चाहिये। ३. इस अध्यायमें वर्णित शिक्षाको अर्थात् भगवान्के सगुण-निर्गुण और साकार-निराकार स्वरूपकी उपासनाको, भगवानके गुण, प्रभाव और माहात्म्यको एवं किस प्रकार साधन करनेसे मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर सकता है, कहाँ जाकर मनुष्यको लौटना पड़ता है और कहाँ पहुँच जानेके बाद पुनर्जन्म नहीं होता, इत्यादि जितनी बातें इस अध्यायमें बतलायी गयी हैं, उन सबको भलीभाँति समझ लेना ही उसे तत्त्वसे जानना है। २. यहाँ “वेद” शब्द अंगोंसहित चारों वेदोंका और उनके अनुकूल समस्त शास्त्रोंका, “यज्ञ शास्त्रविहित पूजन, हवन आदि सब प्रकारके यज्ञोंका, “तप” व्रत, उपवास, इन्द्रियसंयम, स्वधर्मपालन आदि सभी प्रकारके शास्त्रविहित तपोंका और “दान” अन्नदान, विद्यादान, क्षेत्रदान आदि सब प्रकारके शास्त्रविहित दान एवं परोपकारका वाचक है। श्रद्धा- भक्तिपूर्वक सकामभावसे वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय तथा यज्ञ, दान और तप आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे जो पुण्यसंचय होता है, उस पुण्यका जो ब्रह्मलोकपर्यन्त भिन्न-भिन्न देवलोकोंकी और वहाँके भोगोंकी प्राप्तिरूप फल वेद- शास्त्रोंमें बतलाया गया है, वही पुण्यफल है। एवं जो उन सब लोकोंको और उनके भोगोंको क्षणभंगुर तथा अनित्य समझकर उनमें आसक्त न होना और उनसे सर्वथा उपरत हो जाना है, यही उनको उल्लंघन कर जाना है। त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: (श्रीमद्भगवद््गीतायां नवमो<ध्याय:) ज्ञान-विज्ञान और जगतकी उत्पत्तिका, आसुरी और दैवी सम्पदावालोंका, प्रभावसहित भगवानके स्वरूपका, सकाम-निष्काम उपासनाका एवं भगवद्धक्तिकी महिमाका वर्णन सम्बन्ध--गीताके यातवें अध्यायके आरम्भमें भथगवान्ने विज्ञानसह्तित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार उस विषयका वर्णन करते हुए, अन्तमें ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म अधिथूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित भगवान्कों जाननेकी एवं अन्तकालके भगवच्चिन्तनकी बात कही। इसपर आठवें जअध्यायमें अजुनने उन तत्त्वोंको और अन्तकालकी उपासनाके विषयको समझनेके लिये सात प्रश्न कर दिये। उनमेंसे छः प्रश्नोंका उत्तर तो भगवान्ने संक्षेप्में तीसरे और चौथे शलोकमें दे दिया, किंतु सातवें प्रश्नके उत्तरमें उन्होंने जिस उपदेशका आरम्भ किया, उसमें सारा-का-सारा आठवाँ अध्याय पूरा हो गया। इस प्रकार सातवें अध्यायमें आरम्भ किये हुए विज्ञानसहित ज्ञानका सांगोपांग वर्णन न होनेके कारण उसी विषयको भलीभॉति समझानेके उद्देश्यसे भगवान् इस नव अध्यायका आरम्भ करते हैं तथा सातवें अध्यायमें वर्णित उपदेशके साथस इसका घनिष्ठ सम्बन्ध दिखलानेके लिये पहले शलोकमे पुनः उसी विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं-- श्रीभगवानुवाच इदं तु ते गृह्ृतमंर प्रवक्ष्याम्यनसूयवे* । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेडशुभात्,श्रीभगवान् बोले--तुझ दोषदृष्टिरहित भक्तके लिये इस परम गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञानको पुनः भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसारसे* मुक्त हो जायगा
arjuna uvāca
قال أرجونا: (تُقدِّم الآية أرجونا بوصفه المتكلّم، مُعلِنةً استعداده للسؤال والتعلّم وسط التوتّر الأخلاقي في ساحة القتال. وفي الإطار السردي للغيتا، فهذا صوت التلميذ—يلتمس البيان في الواجب، والعمل القويم، والتحرّر.)
अजुन उवाच
This line itself is a speaker-marker rather than a doctrinal statement; it frames the ethical and spiritual inquiry by presenting Arjuna’s voice as the questioning disciple, which is essential for the Gītā’s method of teaching through dialogue.
The text indicates that Arjuna is speaking, transitioning the dialogue to his question or response within the battlefield setting where he seeks guidance on duty, action, and the path to liberation.