
Tilottamā, Sunda–Upasunda, and the Pāṇḍava Samaya (Ādi Parva 204)
Upa-parva: Draupadī-Svayaṃvara and Pāṇḍava Samaya (Tilottamā–Sunda-Upasunda Exemplum)
Nārada recounts that the daitya-brothers Sunda and Upasunda, after subduing the earth and extracting treasures, live in unopposed pleasure. While enjoying revelry in the Vindhya region, they see Tilottamā gathering flowers; intoxicated and desire-driven, each seizes one of her hands and claims exclusive right. Anger escalates into armed confrontation; they strike one another with maces and fall dead, causing their followers to flee in fear. Brahmā arrives with gods and sages to honor Tilottamā, grants her a boon and declares her unassailable in beauty; he then restores governance to Indra and returns to Brahmaloka. Nārada applies the exemplum as counsel to the Pāṇḍavas: they must avoid division concerning Draupadī. Vaiśaṃpāyana concludes that the Pāṇḍavas, in Nārada’s presence, establish a rule: whoever intrudes upon another while seated with Draupadī must live twelve years in the forest as a celibate; thereafter they maintain mutual non-interference.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र के सम्मुख विदुर, भीष्म और द्रोण के पूर्वोक्त हित-वचनों का समर्थन करते हुए निर्भीकता से कहते हैं कि राजा को बान्धवों द्वारा ‘श्रेयो’ ही सुनना चाहिए—प्रिय नहीं, सत्य। → विदुर धृतराष्ट्र को स्मरण कराते हैं कि भीष्म- द्रोण ने जो हित कहा, उसे कर्ण ‘हित’ नहीं मानता; और राजा के पास ऐसा कोई समर्थ पुरुष नहीं जो अर्जुन-भीम जैसे सिंहों से बढ़कर हो। पाण्डव-पक्ष की शक्ति—भीम का अतुल बल, कृष्ण का मन्त्रित्व, बलराम-सात्यकि का पक्ष—एक-एक कर उजागर होती जाती है। → विदुर का निर्णायक निष्कर्ष: ‘यतः कृष्णस्ततः सर्वे, यतः कृष्णस्ततो जयः’—जहाँ कृष्ण हैं, वहीं समस्त सामर्थ्य और विजय है; अतः दुर्योधन के अपराध से राज्य-प्रजा का विनाश निश्चित है, यदि अभी भी नीति न बदली। → विदुर धृतराष्ट्र को अंतिम बार चेताते हैं कि वे गुणवान होकर भी पुत्रमोह में फँसकर कुल-क्षय का कारण न बनें; भीष्म-द्रोण की सम्मति स्वीकार कर शान्ति-मार्ग अपनाएँ। → धृतराष्ट्र क्या विदुर की कठोर-हितकारी वाणी स्वीकार करेंगे, या दुर्योधन के पक्ष में रहकर अनिवार्य विनाश की ओर बढ़ेंगे?
Verse 1
अफत--#क+ चतुर्राधिकद्विशततमो< ध्याय: विदुरजीकी सम्मति--द्रोण और भीष्मके वचनोंका ही समर्थन विदुर उवाच राजन् निःसंशयं श्रेयो वाच्यस्त्वमसि बान्धवै: । न त्वशुश्रूषमाणे वै वाक््यं सम्प्रतितिष्ठति
قال فيدورا: «أيها الملك، لا ريب أن على ذوي قرباك والمخلصين لك واجبًا أن يقولوا لك، بلا تردد، ما هو حقًّا لخيرك. ولكن حين لا تريد أن تسمع، فإن نصحهم الصالح لا يجد موطئًا فيك ولا يستطيع أن يرسخ.»
Verse 2
प्रियं हितं च तद् वाक्यमुक्तवान् कुरुसत्तम: । भीष्म: शांतनवो राजन प्रतिगृह्नासि तन्न च
قال فيدورا: «أيها الملك، إن بهيشما ابن شانتانو—أعظم رجال الكورو—قد نطق بكلامٍ يجمع بين الإرضاء والمنفعة الحقّة، ولكنك لا تقبله.»
Verse 3
तथा द्रोणेन बहुधा भाषितं हितमुत्तमम् । तच्च राधासुत: कर्णो मनन््यते न हित॑ तव
قال فيدورا: «وكذلك فإن درونا قد خاطبك مرارًا وبشتى السبل بنصيحةٍ ممتازة لخيرك. غير أن كارنا ابن رادها لا يرى تلك النصيحة نافعةً لك، أيها الملك.»
Verse 4
चिन्तयंश्व न पश्यामि राजंस्तव सुद्दत्तमम् । आशभ्यां पुरुषसिंहा भ्यां यो वा स्यात् प्रज्याधिक:
قال فيدورا: «أيها الملك، بعد طول تفكّر لا أرى بين أقرب المخلصين لك أحدًا أتمَّ عطاءً من هذين الرجلين الشبيهين بالأسدين—ولا من يفوقهما بصيرةً وحُسنَ تقدير.»
Verse 5
इमौ हि वृद्धौ वयसा प्रज्ञया च श्रुतेन च । समौ च त्वयि राजेन्द्र तथा पाण्डुसुतेषु च
قال فيدورا: «هذان الشيخان يتفوقان في السنّ والحكمة والعلم الموروث. يا خير الملوك، إنهما يحملان موقفًا واحدًا متساويًا نحوك ونحو أبناء باندو أيضًا.»
Verse 6
धर्मे चानवरौ राजन् सत्यतायां च भारत । रामाद् दाशरथेश्वैव गयाच्चैव न संशय:,भरतवंशी नरेश! ये दोनों धर्म और सत्यवादितामें दशरथनन्दन श्रीराम तथा राजा गयसे कम नहीं हैं। मेरा यह कथन सर्वथा संशयरहित है
قال فيدورا: «أيها الملك، يا سليل بهاراتا، في الدharma (الاستقامة) وفي التمسك بالصدق، لا يقلّ هذان الرجلان شأنًا عن راما ابن داشاراثا، ولا عن الملك غايا. ولا شكّ في ذلك.»
Verse 7
न चोक्तवन्तावश्रेय: पुरस्तादपि किंचन । न चाप्यपकृतं किंचिदनयोर्लक्ष्यते त्वयि
قال فيدورا: «إن هذين الاثنين لم يقولا قطّ في حضرتك شيئًا يمكن أن يجلب لك ضررًا، ولا يُرى لهما عليك فعلُ أذىٍ البتّة. لذلك فإن الشكّ الذي تُضمره نحوهما لا يقوم على أساسٍ بيّن، لا في قولٍ ولا في فعل.»
Verse 8
तावुभौ पुरुषव्याप्रावनागसि नृपे त्वयि । न मन्त्रयेतां त्वच्छेय: कथं सत्यपराक्रमौ
قال فيدورا: «أيها الملك، لم ترتكب ذنبًا في حقّ هذين الرجلين النشيطين النبيلين. فكيف إذن يمكن لهما—وهما ممن يقوم بأسُهما على الصدق—أن يمتنعَا عن إسداء المشورة لما فيه صلاحك، أيها الملك العظيم؟»
Verse 9
प्रज्ञावन्ती नरश्रेष्ठावस्मिललोके नराधिप । त्वन्निमित्तमतो नेमौ किंचिज्जिद्यां वदिष्यत:,नरेश्वर! ये दोनों इस लोकमें नरश्रेष्ठ और बुद्धिमान हैं, अतः आपके लिये ये कोई कुटिलतापूर्ण बात नहीं कहेंगे
قال فيدورا: «أيها الملك، إن هذين الاثنين من خيار الرجال وأحكمهم في هذا العالم. لذلك، ومن أجلك، لن يقولا شيئًا معوجًّا ولا مخادعًا.»
Verse 10
इति मे नैछिकी बुद्धिर्वर्ततेि कुरुनन्दन । न चार्थहेतोर्धर्मज्ञौ वक्ष्यत: पक्षसंश्रितम्
«هذه قناعتي الراسخة، يا بهجة آل كورو: إن هذين الاثنين من العارفين بالدارما، ولذلك لن يقولا—طلبًا لمنفعةٍ شخصية—كلامًا يميل إلى جانبٍ واحد أو يخدم هوى فئةٍ بعينها.»
Verse 11
एतद्धि परम श्रेयो मन्ये5हं तव भारत । दुर्योधनप्रभूतय: पुत्रा राजन् यथा तव
قال فيدورا: «يا بهاراتا، أرى أن هذا هو الخير الأعلى لك. أيها الملك، كما أن دوريودانا ومن معه هم أبناؤك، كذلك فإن أبناء باندو هم أيضًا أبناؤك—ولا شك في ذلك. فإن كان بعض الوزراء، لعدم إدراكهم هذه الحقيقة، يشيرون عليك بإيذاء أبناء باندو، وجب أن يُقال إنهم لا يبصرون بوضوح أين تكمن مصلحتك الحقة. وإن كان في قلبك ميلٌ خاصّ إلى أبنائك، فإن الذين يكشفون ذلك الانحياز المستتر أمام الناس جميعًا لا يمكن أن يكونوا حقًّا عاملين لمنفعتك.»
Verse 12
तथैव पाण्डवेयास्ते पुत्रा राजन् न संशय: । तेषु चेदहितं किंचिन्मन्त्रयेयुरतद्विद:
قال فيدورا: «يا أيها الملك—لا ريب—إن أبناء باندو هم أيضًا أبناؤك. فإن أشار عليك بعض المستشارين، وهم يفتقرون إلى التمييز الحق، بما فيه أذى للبانداڤا، لوجب أن يُقال إن أولئك الوزراء لا يبصرون بوضوح أين تكمن مصلحتك الحقيقية.»
Verse 13
मन्त्रिणस्ते न च श्रेय: प्रपश्यन्ति विशेषत: । अथ ते हृदये राजन् विशेष: स्वेषु वर्तते । अन्तरस्थं विवृण्वाना: श्रेय: कुर्युर्न ते ध्रुवम्
قال فيدورا: «إن وزراءك لا يتبيّنون على وجه الخصوص ما هو أنفع لك حقًّا. وإن كان في قلبك، أيها الملك، ميلٌ خاصٌّ إلى أبنائك، فإن الذين لا يصنعون إلا كشف ما تُضمره في باطنك أمام الناس لن يحققوا لك خيرًا ثابتًا، يا بهاراتا.»
Verse 14
एतदर्थमिमौ राजन् महात्मानौ महाद्युती । नोचतुर्विवृतं किंचिन्न होष तव निश्चय:
قال فيدورا: «ولهذا بعينه، أيها الملك، لم يستطع هذان الرجلان العظيمان، المتلألئان بالمهابة، أن يقولا لك شيئًا على الملأ صريحًا واضحًا. لقد أسديا إليك نصحًا سديدًا حقًّا؛ غير أن عزيمتك لا تستقر عليه.»
Verse 15
यच्चाप्यशक्यतां तेषामाहतु: पुरुषर्षभौ । तत् तथा पुरुषव्याप्र तव तद् भद्रमस्तु ते,इन पुरुषशिरोमणियोंने जो पाण्डवोंके अजेय होनेकी बात बतायी है, वह बिलकुल ठीक है। पुरुषसिंह! आपका कल्याण हो
قال فيدورا: «وأما ما أعلنه ذانك الرجلان من خيرة الرجال—أن البانداڤا لا يُغلبون—فهو كذلك على التحقيق. يا نمرَ الرجال، فليكن هذا الحق سببًا لخيرك.»
Verse 16
कथं हि पाण्डव: श्रीमान् सव्यसाची धनंजय: । शक्यो विजेतुं संग्रामे राजन् मघवतापि हि
وسأل فيدورا، في تحذيرٍ أخلاقيٍّ لاذعٍ للملك: «كيف يُقهر في ساحة القتال ذلك البانداڤيُّ المجيد دهننْجَيا—أرجونا، المشهور بلقب سَڤيَسَاتشي لإتقانه الرمي بكلتا يديه؟ يا أيها الملك، إن مَغهاڤات (إندرا) نفسه ليعسر عليه أن يهزمه في الحرب.»
Verse 17
भीमसेनो महाबाहुर्नागायुतबलो महान् | कथं सम युधि शक््येत विजेतुममरैरपि,दस हजार हाथियोंके समान महान् बलवान् महाबाहु भीमसेनको युद्धमें देवता भी कैसे जीत सकते हैं?
قال فيدورا: «إنَّ بهيماسينا، البطلَ عظيمَ الساعدين، ذوُ قوّةٍ هائلةٍ تعادل قوّةَ عشرةِ آلافِ فيل. فكيف يُمكن أن يُقهَر في ساحةِ القتال، حتى ولو على أيدي الآلهة أنفسهم؟»
Verse 18
तथैव कृतिनौ युद्धे यमौ यमसुताविव । कथं विजेतुं शक््यौ तौ रणे जीवितुमिच्छता
«وكذلك هذان الاثنان—التوأمان الماهرَان في القتال، المهيبان كابنَي يَما—فكيف يُستطاع قهرُهما في الحرب على يدِ من لا يزال يبتغي حفظَ حياته؟»
Verse 19
यस्मिन् धृतिरनुक्रोश: क्षमा सत्यं पराक्रम: । नित्यानि पाण्डवे ज्येष्ठे स जीयेत रणे कथम्
قال فيدورا: «إنَّ في أكبرِ أبناءِ الباندافا، يودهيشثيرا، تقيمُ على الدوامِ الثباتُ والرحمةُ والعفوُ والصدقُ والبأسُ البطولي. فكيف يُقهَرُ مثلُ هذا الرجلِ في ساحةِ القتال؟»
Verse 20
येषां पक्षधरो रामो येषां मन्त्री जनार्दन: । कि नु तैरजितं संख्ये येषां पक्षे च सात्यकि:
يقول فيدورا: «إذا كان بالاراما نصيرَهم، وإذا كان جناردانا (شري كريشنا) مستشارَهم، وإذا كان بطلٌ كساتياكي يقاتل في صفّهم—فمَن ذا الذي يعجزون عن هزيمته في ساحة الحرب؟»
Verse 21
ट्रुपद: श्वशुरो येषां येषां श्यालाश्व पार्षता: । धृष्टद्युम्नमुखा वीरा भ्रातरो द्रुपदात्मजा:
قال فيدورا: «دروبادا هو حموُهم، وأبطالُ البارْشَتَة—أبناءُ دروبادا، يتقدّمهم دْهريشْتَديومنَة—هم أصهارُهم. إنَّ مثلَ هؤلاء الباندافا يستحيل قهرُهم في ميدان القتال، يا بهاراتا. فإذا علمتَ ذلك، وذكرتَ أيضًا أن أباهم كان من قبلُ صاحبَ المُلك، فهم—بحكم العدل والدَّرما—الورثةُ الشرعيون؛ فاعمل على معاملتهم بأحسنِ السلوك.»
Verse 22
सो<5शकक््यतां च विज्ञाय तेषामग्रे च भारत । दायाद्यतां च धर्मेण सम्यक् तेषु समाचर
قال فيدورا: «يا بهاراتا، إذ قد عرفتَ أنهم لا يُقهَرون في ساحة القتال، وتذكّرتَ كذلك حقَّهم السابق—لأن أباهم كان قد ملك هذه المملكة من قبل—فأحسن معاملتهم على وجه الصواب. واعترف، وفقًا للدهرما، بأنهم الورثة الشرعيون، وتعامل معهم بما يليق من شرفٍ واحترام.»
Verse 23
इदं निर्दिष्टमयश: पुरोचनकृतं महत् | तेषामनुग्रहेणाद्य राजन् प्रक्षालयात्मन:
قال فيدورا: «إن هذا العار العظيم الذي أحدثه بوروتشانا قد شاع في الآفاق ولطّخ اسمك. أيها الملك، اغسل هذه الوصمة اليوم بإظهار الإحسان إلى الباندافا.»
Verse 24
तेषामनुग्रहश्चायं सर्वेषां चैव न: कुले । जीवितं च परं श्रेय: क्षत्रस्यथ च विवर्धनम्
قال فيدورا: «إن هذا الإحسان إليهم سيكون، في سائر سلالتنا، حِرزًا للحياة نفسها، ويجلب أعظم الخير، ويزيد ازدهار طبقة الكشاتريا ومكانتها.»
Verse 25
ट्रुपदो5पि महान् राजा कृतवैरश्न नः पुरा । तस्य संग्रहणं राजन् स्वपक्षस्य विवर्धनम्
قال فيدورا: «إن دروبادا أيضًا ملك عظيم، وقد كانت بيننا وبينه عداوة في سالف الزمان. لذلك، أيها الملك، إن استمالته حليفًا يزيد جانبنا قوةً ونماءً.»
Verse 26
बलवन्तश्न दाशार्हा बहवश्न विशाम्पते । यत: कृष्णस्ततः सर्वे यतः कृष्णस्ततो जय:
قال فيدورا: «يا سيّد الناس، إن الداشارهـا (اليادافا) كثيرون وأشدّاء. حيثما يقف كريشنا يقف الجميع. لذلك، يا ملك الأرض، إن الفريق الذي يكون فيه كريشنا فله النصر لا محالة.»
Verse 27
यच्च साम्नैव शक्येत कार्य साधयितुं नूप । को दैवशप्तस्तत् कार्य विग्रहेण समाचरेत्
قال فيدورا: «أيها الملك، إذا كان الأمر يُقضى بالمصالحة وحدها—بالمشورة الهادئة والإقناع—فمن ذا الذي لعنته الأقدار فيختار أن يبلغه بالنزاع؟ إن تفضيل الخصام حيث تكفي السِّلم ليس قوةً بل عمى، وهو انتهاك لواجب الملك في صون الأرواح وحفظ النظام.»
Verse 28
श्रुत्वा च जीवत: पार्थान् पौरजानपदा जना: । बलवदू दर्शने हृष्टास्तेषां राजन् प्रियं कुरू
قال فيدورا: «لما سمع الناس أن أبناء پṛthā (الباندافا) أحياء، اضطرب أهل المدينة وأهل القرى من حولها فرحًا، واشتد شوقهم إلى رؤيتهم. أيها الملك، امنحهم ما هو عزيز عليهم—دعهم ينالون تلك الرؤية وتمام الرضا.»
Verse 29
दुर्योधनश्व कर्णश्व शकुनिश्चापि सौबल: । अधर्मयुक्ता दुष्प्रज्ञा बाला मैषां वच: कृथा:,दुर्योधन, कर्ण और सुबलपुत्र शकुनि--ये अधर्मपरायण, खोटी बुद्धिवाले और मूर्ख हैं; अतः इनका कहना न मानिये
يحذّر فيدورا: «إن دوريوذانا وكَرْنا وشكوني ابن سوبالا مصطفّون مع الأدهرما؛ قد ضلّ حكمهم وطفل رأيهم، فلا تتبع أقوالهم.»
Verse 30
उक्तमेतत् पुरा राजन् मया गुणवतस्तव । दुर्योधनापराधेन प्रजेयं वै विनड्क्ष्यति,भूपाल! आप गुणवान् हैं। आपसे तो मैंने पहले ही यह कह दिया था कि दुर्योधनके अपराधसे निश्चय ही यह समस्त प्रजा नष्ट हो जायगी
قال فيدورا: «أيها الملك، لقد نطقتُ بهذا التحذير لك منذ زمن، لأنك رجلُ فضيلة. وبسبب جرم دوريوذانا ستُهلك هذه الرعية كلها لا محالة، يا حامي الأرض.»
Verse 203
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें द्रोणवाक्यविषयक दो सौ तीसरा अध्याय पूरा हुआ
وهكذا تنتهي الفصلُ الثالثُ بعد المئتين من «آدي پرفا» من «شري مهابهاراتا»، ضمن مقطع قدوم فيدورا ونيل المُلك، والمتعلّق على وجه الخصوص بكلمات درونا.
Verse 204
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि विदुरवाक्ये चतुरधिकद्विशततमो<ध्याय:
وهكذا، في «المهابهارتا» الشريفة، ضمن «آدي بارفا»—وخاصة في القسم المتعلّق بقدوم فيدورا ونيل المُلك—تنتهي هنا السورة (الفصل) الرابعة بعد المئتين، المعنونة «خطاب فيدورا».
The dilemma is how to prevent fraternal unity from collapsing under exclusive possessiveness: the narrative contrasts cooperative power with the risk that unchecked desire can convert shared prosperity into rivalry and self-harm.
Desire (kāma), when unregulated by restraint and agreed norms, becomes a catalyst for conflict; sustainable harmony requires explicit boundaries, self-control, and accountability mechanisms that protect relationships and social order.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides applied meta-commentary: Nārada converts the exemplum into prescriptive guidance, and the Pāṇḍavas institutionalize it as a samaya with a defined disciplinary outcome, signaling the epic’s emphasis on practice over mere narration.
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