Mahabharata Adhyaya 178
Adi ParvaAdhyaya 17831 Verses

Adhyaya 178

Ādi Parva, Adhyāya 178 — Royal Contestants Assemble; Cosmic Witnesses; The Bow Remains Unstrung

Upa-parva: Svayaṃvara (Draupadī) Episode — Princes’ Contest and Assembly Spectacle

Vaiśaṃpāyana describes a densely populated arena where ornamented young kṣatriyas, inflated by self-assessed strength, lineage, and youth, compete in mutual rivalry while claiming Draupadī (“Kṛṣṇā”) as the desired prize. The narration employs comparative imagery—intoxicated elephants and divine assemblies—to convey both the intensity of desire and the political gravity of the gathering. The episode broadens the audience beyond human royalty: deities, sages, gandharvas, and other classes arrive in aerial vehicles, marking the contest as a cosmologically observed event. Kṛṣṇa and Balarāma are present with the Vṛṣṇi-Andhakas; they survey the Pāṇḍavas and identify them, with Kṛṣṇa’s attention focusing on the brothers’ formidable presence. One by one, kings attempt the prescribed bow but cannot string it; their failure produces visible distress and disorder in the assembly. As the contenders withdraw, Arjuna (Kuntī’s son, “Jiṣṇu”) resolves to take up the bow with arrows, signaling an imminent reversal of the contest’s outcome.

Chapter Arc: वसिष्ठ अपने पौत्र के जन्म-संस्कार स्वयं करते हैं—और वंश-परंपरा के भीतर छिपी हुई एक अद्भुत कथा का द्वार खुलता है। → गर्भस्थ शिशु द्वारा वसिष्ठ का ‘परासु’ (मृत्यु-इच्छुक) अवस्था से लौटाया जाना और फिर पराशर का अपनी माता अदृश्यन्ती के साथ संवाद—इन संकेतों से स्पष्ट होता है कि यह जन्म साधारण नहीं, किसी पुराने भय और रक्त-ऋण की छाया में हुआ है। वसिष्ठ आगे भृगुवंश पर आए संकट का कारण बताते हैं: कृतवीर्य-अर्जुन के वंशजों/क्षत्रियों का भृगुओं पर क्रोध, और गर्भस्थ शिशुओं तक का संहार। भय से भृगुपत्नियाँ दुर्गम हिमालय की शरण लेती हैं; एक गर्भ विशेष रूप से बचाने का प्रयत्न कथा को और तीखा करता है। → भृगुवंश के गर्भस्थ बालकों की हत्या का वर्णन और स्त्रियों का हिमवन्त के दुर्ग में पलायन—वंश-नाश की सीमा तक पहुँचा हुआ प्रतिशोध चरम पर है। इसी पृष्ठभूमि में ‘दृष्टि’ (दर्शन/जीवन-प्रकाश) लौटाने की याचना—“पुनर्दृष्टिप्रदानेन”—मानवता की अंतिम पुकार बनकर उठती है। → वसिष्ठ अपने तर्क से उग्र निश्चय को रोकते हैं—प्रतिशोध की आग पर धर्म-बुद्धि का जल छिड़कते हुए, वे बताते हैं कि अंधा क्रोध वंशों को नहीं, समूची पृथ्वी की मर्यादा को काटता है। कथा का प्रवाह हिंसा से संयम की ओर मुड़ता है; संस्कार, उपदेश और शमन के द्वारा जीवन-धारा पुनः स्थिर होती है। → भृगु-क्षत्रिय वैर का अंतिम परिणाम और बचाए गए गर्भ/वंश की आगे की नियति—यह संकेत देकर अध्याय समाप्त होता है कि शमन के बाद भी कर्म-छाया पूरी तरह मिटती नहीं।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑ीके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठचरित्रके प्रसंगें सौदासको पुत्र-प्राप्तिविषयक एक सौ छिह्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७६ ॥/ ऑपन--माज बक। अकाल सप्तसप्तत्याधेकशततमोब< ध्याय: शक्तिपुत्र पपशरका जन्म और पिताकी हाल सुनकर कुपित हुए पराशरको शान्त करनेके लिये वसिष्ठजीका उन्हें और्वोपाख्यान सुनाना गन्धर्व उवाच आश्रमस्था तत: पुत्रमदृश्यन्ती व्यजायत । शक्ते: कुलकरं राजन्‌ द्वितीयमिव शक्तिनम्‌

قال الغندرفا: ثم إن أَدْرِشْيَنْتِي (Adṛśyantī)، وهي مقيمة في الأشرم، ولدت ابنًا—أيها الملك—يُنمّي سلالة شاكتي (Śakti)، كأن شاكتي الموني (Śakti Muni) قد وُلد ثانيةً في هيئةٍ أخرى.

Verse 2

जातकर्मादिकास्तस्य क्रिया: स मुनिसत्तम: । पौत्रस्य भरतश्रेष्ठ चकार भगवान्‌ स्वयम्‌,भरतश्रेष्ठ! मुनिवर भगवान्‌ वसिष्ठने स्वयं अपने पौत्रके जातकर्म आदि संस्कार किये

يا خيرَ آلِ بهاراتا! إنَّ ذلك الحكيمَ الأسمى، الجليلَ الموقَّر، قد قام بنفسه لِحفيدِه بجميعِ الطقوسِ المقرَّرة، مبتدئًا بطقسِ «جاتاكارما» (jātakarma)؛ وهو شعيرةُ الميلاد.

Verse 3

परासु: स यतस्तेन वसिष्ठ: स्थापितो मुनि: । गर्भस्थेन ततो लोके पराशर इति स्मृतः

إنَّ الحكيمَ فاسيشثا (Vasiṣṭha)، وقد عزم على الموت، قد كُفَّ وأُلزِمَ بالبقاء حيًّا على يدِ ذلك الطفل وهو بعدُ في الرحم. فلذلك ذُكِر في العالم باسم «باراشارا» (Parāśara)، إذ صرف فاسيشثا عن عزمه على الهلاك.

Verse 4

अमन्यत स धर्मात्मा वसिष्ठ पितरं मुनि: । जन्मप्रभृति तस्मिंस्तु पितरीवान्ववर्तत,धर्मात्मा पराशर मुनि वसिष्ठको ही अपना पिता मानते थे और जन्मसे ही उनके प्रति पितृभाव रखते थे

كان ذلك الحكيمُ التقيّ يعدُّ فاسيشثا أبًا له. ومنذ مولده كان يسلك معه سلوكَ الابن مع أبيه تمامًا.

Verse 5

स तात इति विप्रर्षिवसिष्ठं प्रत्यभाषत । मातु: समक्ष कौन्तेय अदृश्यन्त्या: परंतप,परंतप कुन्तीकुमार! एक दिन ब्रह्मर्षि पराशरने अपनी माता अदृश्यन्तीके सामने ही वसिष्ठजीको “तात” कहकर पुकारा

قال الغندرفا: «يا ابنَ كونتي، يا مُحرِقَ الأعداء! أمامَ أمِّه أَدْرِشْيَنْتِي (Adṛśyantī) خاطَبَ البراهمارِشي باراشارا (Parāśara) الحكيمَ فاسيشثا مناديًا إيّاه: “تاتا” (tāta) — أي: يا أبتِ الحبيب.»

Verse 6

तातेति परिपूर्णार्थ तस्य तन्मधुरं वच: । अदृश्यन्त्यश्रुपूर्णाक्षी शृण्वती तमुवाच ह,बेटेके मुखसे परिपूर्ण अर्थका बोधक “तात” यह मधुर वचन सुनकर अदृश्यन्तीके नेत्रोमें आँसू भर आये और वह उससे बोली--

فلما سمعت أَدْرِشْيَنْتِي تلك الكلمةَ العذبة—«تاتا» (tāta)، وهي لفظةٌ تامّةُ المعنى—اغرورقت عيناها بالدموع؛ وبينما هي تُصغي إليه قالت له—

Verse 7

मा तात तात तातेति ब्रूहोनं पितरं पितु: । रक्षसा भक्षितस्तात तव तातो वनान्तरे

قال الغندرفا: «لا تُنادِه مرارًا: “يا أبي، يا أبي”؛ فهو أبو أبيك. آهٍ أيها الطفل العزيز! لقد افترس راكشسا أباك في أعماق الغابة».

Verse 8

मन्यसे यं तु तातेति नैष तातस्तवानघ । आर्य एष पिता तस्य पितुस्तव यशस्विन:,“अनघ! तुम जिन्हें तात मानते हो, ये तुम्हारे तात नहीं हैं। ये तो तुम्हारे यशस्वी पिताके भी पूजनीय पिता हैं!

قال الغندرفا: «يا من لا دنس عليه، إن الذي تناديه “أبي” ليس أباك. بل هو الأب الموقَّر لأبيك ذي المجد.»

Verse 9

स एवमुक्तो दु:खार्त: सत्यवागृषिसत्तम: । सर्वलोकविनाशाय मतिं चक्रे महामना:,माताके यों कहनेपर सत्यवादी मुनिश्रेष्ठ महामना पराशर दुःखसे आतुर हो उठे। उन्होंने उसी समय सब लोकोंको नष्ट कर डालनेका विचार किया

فلما خوطب بذلك، غمر الحزنُ أشرفَ الحكماء، الصادقَ اللسان. وفي تلك اللوعة عقد ذو النفس العظيمة عزمه على إفناء العوالم كلها.

Verse 10

तं॑ तथा निश्चितात्मानं स महात्मा महातपा: । ऋषिर्त्रह्मविदां श्रेष्ठो मैत्रावरुणिरन्त्यधी:

فلما رآه على تلك الحال، ثابتَ العزم، ضابطَ النفس، تقدّم ذلك الحكيم العظيم شديدُ الزهد—ميتراڤاروني، أرفعُ العارفين ببراهما، ذو البصيرة الدقيقة النافذة—وخاطبه بما يليق.

Verse 11

वसिष्ठ उवाच कृतवीर्य इति ख्यातो बभूव पृथिवीपति:

قال فاسيشثا: «كان في سالف الزمان ملكٌ للأرض مشهورٌ باسم كِرتَڤيرْيَة. أقام قربان السُّوما، وفي ختامِه أغدق على براهمة سلالة بهريغو أموالًا وغلالًا وافرة حتى أرضاهم تمام الرضا. فلما مضى ذلك الملكُ الفاضل إلى السماء، وقع أحفاده في الحاجة؛ وإذ علموا أن البهارغاڤا يملكون ثروةً، قصدوا إليهم سائلين. عندئذٍ عمد بعضُ البهارغاڤا إلى دفن كنوزهم التي لا تنفد في باطن الأرض.»

Verse 12

याज्यो वेदविदां लोके भृगूणां पार्थिवर्षभ: । स तानग्रभुजस्तात धान्येन च धनेन च

قال فَسِشْطَه: «يا بُنَيَّ الحبيب، في عالم العارفين بالڤيدا كان هناك ثورٌ بين الملوك، ملكٌ يَصلُح أن يكون اليَجَمانا (راعي القربان) لسلالة بْهْرِغو. وقد أرضى أولئك المتقدّمين في الاستحقاق—براهمة البهارغافا—بأن أغدق عليهم الحبوب والثروة.»

Verse 13

सोमान्ते तर्पयामास विपुलेन विशाम्पति: । तस्मिन्‌ नृपतिशार्दूले स्वर्यातेडथ कथंचन

قال فَسِشْطَه: «عند ختام قربان السُّوما، أشبع ذلك السيّدُ على الناسِ رضا البهارغافا بعطايا غزيرة. ثم إنّ نمرَ الملوك—كِرْتَڤِيرْيَه—مضى إلى السماء؛ وبمنعطفٍ من المقادير أحسّ نسله بالحاجة إلى المال. ولمّا علم أبناءُ الملوك أنّ براهمة سلالة بْهْرِغو ذوو ثراء، قصدوا أولئك البهارغافا العظام متسوّلين. وعندئذٍ دفن بعضُ البهارغافا كنزهم الذي لا ينفد في باطن الأرض.»

Verse 14

बभूव तत्कुलेयानां द्रव्यकार्यमुपस्थितम्‌ । भगूणां तु धन ज्ञात्वा राजान: सर्व एव ते

قال فَسِشْطَه: «ثم قامت بين ذرية تلك السلالة حاجةٌ إلى المال. ولمّا علموا أنّ عشيرة بْهْرِغو تملك الثروة، قصد أولئك الأمراء جميعًا براهمة البهارغافا الأجلّاء متسوّلين.»

Verse 15

याचिष्णवो5भिजममुस्तांस्ततो भार्गवसत्तमान्‌ | भूमौ तु निदधु: केचिद्‌ भूगवों धनमक्षयम्‌

ثم إنهم، وقد صاروا متسوّلين، دنَوا من أولئك البهارغافا الأجلّاء من البراهمة؛ غير أنّ بعض البهارغافا دفنوا ثروتهم التي لا تنفد في الأرض.

Verse 16

ददुः केचिद्‌ द्विजातिभ्यो ज्ञात्वा क्षत्रियतो भयम्‌ | भृगवस्तु ददुः केचित्‌ तेषां वित्तं यथेप्सितम्‌

فمنهم من أدرك الخطرَ الذي يشكّله الكشاتريا، فسلّم أمواله إلى «ذوي الميلادين» (البراهمة) ليحفظوها. ومنهم—من البهارغافا من سلالة بْهْرِغو—من أعطى أولئك الكشاتريا من المال بقدر ما اشتهوا.

Verse 17

क्षत्रियाणां तदा तात कारणान्तरदर्शनात्‌ । ततो महीतल तात क्षत्रियेण यदृच्छया

قال فاسيشثا: «يا بُنَيّ، إذ ذاك، وبالنظر إلى أسبابٍ أخرى طارئة، منحوا الثروة للكشاتريّين. ثم على وجه الأرض، عثر كشاتريٌّ، بمحض المصادفة وهو يحفر، على كنزٍ مدفون في بيتِ أحدِ سلالةِ بهريغو. فاجتمع خِيارُ الكشاتريّين وتفحّصوا ذلك المال.»

Verse 18

खनताधिगतं वित्तं केनचिद्‌ भुगुवेश्मनि । तद्‌ वित्त ददृशु: सर्वे समेता: क्षत्रियर्षभा:

قال فاسيشثا: «وأثناء الحفر عثر أحدهم على مالٍ مدفون في بيتِ أحدِ سلالةِ بهريغو. فاجتمع جميعُ خِيارِ الكشاتريّين وتفحّصوا ذلك الكنز.»

Verse 19

अवमन्य ततः क्रोधाद्‌ भृगूंस्ताउछरणागतान्‌ | निजषघ्नु: परमेष्वासा: सर्वास्तान्‌ निशितै: शरै:

ثم إنهم، من شدة الغضب، ازدرَوا وأهانوا حتى آلَ بهريغو الذين جاءوا مستجيرين. فأولئك الرماةُ العظام قتلوا جميعَ البهارغَفَة بسهامٍ ماضية، وأرسلوهم إلى عالمِ يَمَ.

Verse 20

आगर्भादवकृन्तन्तश्वेरु: सर्वा वसुन्धराम्‌ । तत उच्छिद्यमानेषु भृगुष्वेवं भयात्‌ तदा

وهم يقتلون حتى الأجنّة في الأرحام، جال الكشاتريّون، وقد أعمتهم الحميّة، في أرجاء الأرض كلّها. ثم لما كان آلُ بهريغو يُستأصلون على هذا النحو، اختبأت نساؤهم، من شدة الفزع، في كهوف الهيمالايا الوعرة التي لا تُنال.

Verse 21

भगुपत्न्यो गिरिं दुर्ग हिमवन्तं प्रपेदिरे । तासामन्यतमा गर्भ भयाद्‌ दश्ने महौजसम्‌

قال فاسيشثا: «إن زوجات آلِ بهريغو لجأن إلى معاقل جبال الهيمالايا الوعرة. وكانت بينهن امرأةٌ، من شدة الفزع، أخفت جنينها القويَّ المتلألئ بأن وضعته في شقٍّ أحدثته في فخذها—جرأةً قصدت بها حفظَ نسلِ زوجها وإدامته. فلما شاع خبرُ ذلك الحملِ المستور، فزعت امرأةٌ برهمنية، فأسرعت وحدها إلى الكشاتريّين وأخبرتهم. فمضى أولئك الكشاتريّون، وقد أعمتهم الحميّة، عازمين على إهلاك حتى الوارث الذي لم يولد بعد، إلى هناك ليقتلوا الطفل في الرحم.»

Verse 22

ऊरुणैकेन वामोरुर्भ्तु: कुलविवृद्धये । तद्‌ गर्भमुपलभ्याशु ब्राह्मणी या भयार्दिता

قال فَسِشْتَه: «إن المرأة المسماة فامورو (ذات الفخذ الأيسر) قد أقدمت، بفخذٍ واحد، على ذلك ابتغاءَ زيادة نسل زوجها. غير أنّ خبر ذلك الحمل ما لبث أن انكشف سريعًا، ففزعت امرأةٌ برهمنية—وقد غلبها الخوف—فمضت وحدها على عَجَل وأبلغت الكشاتريين. فاندفع أولئك الكشاتريون، وقد عزموا على قتل الجنين، إلى ذلك الموضع».

Verse 23

गत्वैका कथयामास क्षत्रियाणामुपद्नरे । ततस्ते क्षत्रिया जम्मुस्तं गर्भ हन्तुमुद्यता:

قال فَسِشْتَه: «ثم إن امرأةً مضت وحدها فأخبرت الكشاتريين بالأمر. فلما سمعوا، انطلق أولئك الكشاتريون من فورهم، وقد عزموا على قتل الجنين.»

Verse 24

ददृशु््राह्मणीं तेडथ दीप्यमानां स्वतेजसा । अथ गर्भ: स भित्त्वोरुं ब्राह्माण्या निर्जागम ह

ثم أبصروا المرأةَ البرهمنية متلألئةً بتألّقها الذاتي. وفي تلك اللحظة بعينها شقّ الجنينُ فخذَها وخرج إلى العلن.

Verse 25

मुष्णन्‌ दृष्टी: क्षत्रियाणां मध्याह्न इव भास्कर: | ततकश्नक्षुविहीनास्ते गिरिदुर्गेषु बच्रमु:

وكالشمس المتأجّجة في كبد السماء، ما إن ظهر الطفل المتلألئ حتى سلب الكشاتريين أبصارهم بقوة إشراقه. فعمُوا في الحال، وأخذوا يهيمون على وجوههم في شعاب الجبال الوعرة وحصونها.

Verse 26

ततस्ते मोहमापन्ना राजानो नष्टदृष्टय: । ब्राह्मणीं शरणं जममुर्दृष्ट्यूर्थ तामनिन्दिताम्‌

ثم إن أولئك الملوك، وقد استولى عليهم الوَهْم وفقدوا أبصارهم، قصدوا تلك المرأةَ البرهمنيةَ التي لا عيب فيها يلتمسون عندها الملجأ، راجين أن تُردَّ إليهم الرؤية.

Verse 27

ऊचुश्चैनां महाभागां क्षत्रियास्ते विचेतस: । ज्योतिः प्रहीणा दु:खार्ता: शान्तार्चिष इवाग्नय:

إن أولئك الكشاتريا، وقد اضطربت حواسّهم، خاطبوا تلك السيدة العظيمة الحظ. حُرموا نور أبصارهم وعُذِّبوا بالألم، فكانوا كالنيران التي خمدت ألسنتها. وفي شدّتهم استرحموها، راجين أن تُعاد إليهم الرؤية، ثم بعد استراحة يسيرة ينسحبون من ذلك الموضع معًا، معترفين بإثمهم وملتمسين الرحيل جميعًا.

Verse 28

भगवत्या: प्रसादेन गच्छेत्‌ क्षत्र॑ं सचक्षुषम्‌ । उपारम्य च गच्छेम सहिता: पापकर्मिण:

قال فاسيشثا: «بفضل عطف الإلهة المباركة، فلتستعد هذه الجماعة من الكشاتريا أبصارها ولتمضِ. وبعد أن نستريح قليلًا، فلنغادر نحن أيضًا—وإن كنا مثقلين بالأعمال الآثمة—هذا المكان معًا».

Verse 29

सपुत्रा त्वं प्रसाद नः कर्तुमहसि शोभने । पुनर्दृष्टिप्रदानेन राज्ञ: संत्रातुमहिसि,'शोभने! तुम अपने पुत्रके साथ हम सबपर प्रसन्न हो जाओ और पुन: नूतन दृष्टि देकर हम सभी राजपुत्रोंकी रक्षा करो”

قال فاسيشثا: «يا سيدتي الميمونة، تفضّلي علينا برضاك مع ابنك. وبإعادة البصر مرة أخرى، احمي الملك، وبذلك تصونين هؤلاء الورثة الملوكيين».

Verse 103

वसिष्ठो वारयामास हेतुना येन तच्छूणु । उनके मनका ऐसा निश्चय जान ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातपस्वी

لقد منع فاسيشثا (باراشارا) بسببٍ ما—فاسمع ذلك السبب. إذ أدرك ما استقرّ في قلبه من عزم، قام فاسيشثا، الزاهد العظيم والروح الجليلة، ابن ميترا وفارونا، والأرفع بين العارفين بالبراهمن، فصدّ باراشارا عن الإقدام على ذلك. وأما العلة والحجة التي بها نجح في منعه—فاسمعها.

Verse 177

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौवोपाख्याने सप्तसप्तत्यधिकशततमो<ध्याय:

وهكذا تنتهي السورة/الفصل الثامن والسبعون بعد المئة من «الأدي بارفا» من «شري مهابهاراتا»، ضمن قسم «تشيترا راثا» (Caitraratha)، في الخبر المعروف بحكاية «أوباريتشارا فاسو». وهذا خاتمةٌ توثيقية (colophon) تُعلِم بانقضاء الفصل، وليست بيتًا من القول على لسان مُعلِّم أو واعظ.

Frequently Asked Questions

The chapter stages a dharma-sankat between competitive pride and disciplined merit: contenders pursue a socially sanctioned aim (marriage alliance) yet risk moral and political disorder when desire and ego override composure and capability.

Public legitimacy is portrayed as performance under constraint: strength and lineage are insufficient without steadiness, training, and adherence to agreed norms—an implicit critique of self-assessment untested by action.

No explicit phalaśruti appears in this unit; its meta-function is structural—escalating narrative tension by contrasting mass failure with the imminent competence of a prepared agent, thereby integrating ethics, capability, and fate into the plot’s next turn.

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