
शल्यवधे कौरवसेनाभङ्गः, भीमस्य गदायुद्धं, दुर्योधनस्य समाह्वानम् (Rout after Śalya’s fall; Bhīma’s mace engagement; Duryodhana’s rally)
Upa-parva: Śalya-vadha-anantara-saṃjñā (Aftermath of Śalya’s fall: rout, pursuit, and Duryodhana’s rally)
Saṃjaya reports that upon the fall of Śalya, the Kaurava host largely turns away in disarray, likened to merchants seeking shore after a shipwreck and to leaderless animals seeking protection. The Pandavas and Pañcālas, perceiving the rout, pursue with renewed confidence and proclaim the day’s reversal of fortune. A concentrated infantry force confronts Bhīma; he dismounts, seizes a heavy, gold-adorned gadā, and breaks the massed foot-soldiers, producing a vivid battlefield tableau of fallen, ornamented bodies and shattered standards. Meanwhile Duryodhana, not yet far withdrawn, addresses his charioteer and troops: he asserts that Arjuna will not overrun him from the rear, urges controlled repositioning, and argues that dispersion invites destruction. He reframes the moment through kṣatriya-dharma—death is universal, and a disciplined stand is preferable to flight—thereby prompting the kings and warriors to turn back and re-engage as the Pandava forces advance.
Chapter Arc: शल्य-वध के बाद रणभूमि पर धूल, रथ-खंड, गिरे अश्व और कबन्धों का उठना—युद्ध का दृश्य मानो स्वयं मृत्यु का उत्सव बन जाता है। → दुर्योधन पर्वत-सम दीप्त रथ पर छत्र-चामर से सेवित होकर आगे बढ़ता है; मद्रदेशीय वीर उसे बार-बार रोकते हैं—“न गन्तव्यं”—पर वह नहीं रुकता। उधर पाण्डव-ध्वजिनी आँधी से क्षुब्ध नदी-सी उफनती है और युधिष्ठिर के चारों ओर पाण्डव-श्रेष्ठ घेरा बनाकर शत्रु-सेना को समुद्र में मकरों-सा मथने लगते हैं। → रण का उन्माद चरम पर: सर्वत्र कबन्ध उठते दिखते हैं; टूटे रथ, जुए-धुरे, मरे महारथी और धराशायी अश्वों से पृथ्वी ढक जाती है। घोड़े जुए में बँधे रथों को वायु-वेग से इधर-उधर घसीटते हैं, कुछ आधे रथ लेकर दिशाओं में भटकते हैं—व्यवस्था टूटकर अराजकता बन जाती है। → दोनों पक्षों की सेनाएँ भारी क्षति के बीच भी भिड़ी रहती हैं; शत्रु-सैनिकों में क्षणिक हर्ष-कोलाहल उठता है, पर रणभूमि का वास्तविक निष्कर्ष ‘विजय’ नहीं—केवल बढ़ती हुई विनाश-छाया है। → दुर्योधन के अडिग आगे बढ़ने और पाण्डवों के संगठित घेराव के बीच अगला निर्णायक टकराव आसन्न रहता है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें शल्यका वधविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ९४ श्लोक हैं।) ऑपन-आक्रात छा 2 अष्टादशो< ध्याय: मद्रराजके अनुचरोंका वध और कौरव-सेनाका पलायन संजय उवाच शल्ये5थ निहते राजन् मद्रराजपदानुगा: । रथा: सप्तशता वीरा निर्ययुर्महतो बलात्
三阇耶说道:“大王啊,沙利耶既被诛灭,随从摩陀罗之主的七百名车战勇士,凭借大军之势,驱车而出。”
Verse 2
दुर्योधनस्तु द्विदमारुह्माचलसंनिभम् । छत्रेण प्रियमाणेन वीज्यमानश्न चामरै:
三阇耶说道:然而都利约陀那登上一头巨象,其形如山。王伞高擎以示尊荣,又以牦牛尾拂(chāmara)为之扇拂——这是王者骄矜与外在华饰的图景,却与战争阴沉的道德重负相对照。
Verse 3
न गन्तव्यं न गन्तव्यमिति मद्रानवारयत् । दुर्योधनेन ते वीरा वार्यमाणा: पुनः पुनः
三阇耶说道:马德罗的妇女们哭喊着:“不可去——不可去!”竭力拦阻他们。然而那些英雄纵使被都利约陀那一再阻止,仍执意前行——显出急迫的武人决心与恳求克制的人间情纽之间的紧张对峙。
Verse 4
युधिष्ठिरं जिघांसन्त: पाण्डूनां प्राविशन् बलम् । संजय कहते हैं--राजन! मद्रराज शल्यके मारे जानेपर उनके अनुगामी सात सौ वीर रथी विशाल कौरव-सेनासे निकल पड़े। उस समय दुर्योधन पर्वताकार हाथीपर आरूढ़ हो सिरपर छत्र धारण किये चामरोंसे वीजित होता हुआ वहाँ आया और “न जाओ, न जाओ! ऐसा कहकर उन मद्रदेशीय वीरोंको रोकने लगा; परंतु दुर्योधनके बारंबार रोकनेपर भी वे वीर योद्धा युधिष्ठिरके वधकी इच्छासे पाण्डवोंकी सेनामें जा घुसे || १--३ $ ।। ते तु शूरा महाराज कृतचित्ताश्न योधने
三阇耶说道:“大王啊!他们一心要杀死坚战(尤提史提罗),便强行闯入般度军中。那些英雄啊,大王,他们心志已牢牢系于战斗,仍旧向前推进——既为追随已陨的主帅而尽忠,又被战争阴沉的势头所驱使,纵有人劝阻亦不能止。”
Verse 5
श्रुत्वा च निहतं शल्यं धर्मपुत्रं च पीडितम्,पूरयन् रथघोषेण दिश: सर्वा महारथ: । शल्य मारे गये और मद्रराजका प्रिय करनेमें लगे हुए मद्रदेशीय महारथियोंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पीड़ित कर रखा है; यह सुनकर कुन्तीपुत्र महारथी अर्जुन गाण्डीव धनुषकी टंकार करते और रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करते हुए वहाँ आ पहुँचे
三阇耶说道:听闻舍利耶已被诛杀,而法子(尤提史提罗)正遭强敌逼迫,昆蒂之子、大车战士阿周那便赶到那里——战车深沉的轰鸣与甘狄婆弓的铿然弦响充满四方,誓要在战争危局中扶持正法。
Verse 6
मद्रराजप्रिये युक्तैर्मद्रकाणां महारथै: । आजगाम ततः: पार्थों गाण्डीवं विक्षिपन् धनु:
三阇耶说道:随后,帕尔他(阿周那)向前推进,随行的是那些忠于其王的马德罗大车战士;他一面前来,一面挥举甘狄婆弓——昭示在战争的道义重压之前仍不改的决断与备战之心。
Verse 7
ततोड्र्जुनश्व भीमश्न माद्रीपुत्री च पाण्डवी
于是阿周那与毗摩,以及那位出自摩德丽的般度公主,也一并上前(有所行动)——三阇耶继续叙述战局的推进,点明般度一方的主要勇士。
Verse 8
सात्यकिश्न नरव्याप्रो द्रौपदेयाश्व॒ सर्वश: । धृष्टद्युम्न: शिखण्डी च पञ्चाला: सह सोमकै:
桑阇耶说道:萨底耶迦——人中之虎——与德罗帕蒂诸子俱在,又有提湿陀昙那与尸佉ṇḍin,并般遮罗与娑摩迦诸勇士,同聚战阵之中,结为一体之军。
Verse 9
युधिष्ठिरं परीप्सन्त: समन्तात् पर्यवारयन् । तदनन्तर अर्जुन, भीमसेन, माद्रीपुत्र पाण्डुकुमार नकुल, सहदेव, पुरुषसिंह सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, धृष्टद्युम्म, शिखण्डी, पांचाल और सोमक वीर--इन सबने युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये उन्हें चारों ओरसे घेर लिया || ७-८ ई ।। ते समन्तात् परिवृता: पाण्डवा: पुरुषर्षभा:
桑阇耶说道:敌军欲擒持坚战王,遂从四面合围。于是阿周那、怖摩塞那、摩德丽二子那俱罗与娑诃提婆、人中之狮萨底耶迦、德罗帕蒂五子、提湿陀昙那、尸佉ṇḍī,以及般遮罗与娑摩迦诸勇士,尽皆环列成卫,四面护持坚战。如此被围护的般度诸子——人中雄牛——依然屹立不动。
Verse 10
वृक्षानिव महावाता: कम्पयन्ति सम तावकान्,जैसे महावायु (आँधी) वृक्षोंको हिला देती है, उसी प्रकार पाण्डववीरोंने आपके सैनिकोंको कम्पित कर दिया। राजन! जैसे पूर्वी हवा महानदी गंगाको क्षुब्ध कर देती है, उसी प्रकार उन सैनिकोंने पाण्डवोंकी सेनामें भी हलचल मचा दी
如同狂风摇撼林木,般度诸勇士也使汝军震颤。大王啊,又如东风搅动大河恒伽,同样,那些战士亦令般度军中起了骚动与波澜。
Verse 11
पुरोवातेन गड़ेव क्षोभ्यमाणा महानदी । अक्षोभ्यत तदा राजन् पाण्डूनां ध्वजिनी ततः,जैसे महावायु (आँधी) वृक्षोंको हिला देती है, उसी प्रकार पाण्डववीरोंने आपके सैनिकोंको कम्पित कर दिया। राजन! जैसे पूर्वी हवा महानदी गंगाको क्षुब्ध कर देती है, उसी प्रकार उन सैनिकोंने पाण्डवोंकी सेनामें भी हलचल मचा दी
桑阇耶说道:大王啊,正如大河为东风所搅而波涛翻涌,那时般度诸子的军队也被扰动,阵中起了骚然。
Verse 12
प्रस्कन्द्य सेनां महतीं महात्मानो महारथा: । बहवश्नुक्रुशुस्तत्र क्व स राजा युधिष्ठिर:
桑阇耶说道:那些心怀伟志的摩诃战车勇士冲入浩大军阵之中,在那里一再高呼:“那位国王坚战(Yudhiṣṭhira)在哪里?”
Verse 13
धृष्टद्ुम्नो5थ शैनेयो द्रौपदेयाश्व॒ सर्वश:
桑阇耶说道:于是,持军(Dhṛṣṭadyumna)、舍尼耶(Śaineya)以及德劳帕蒂的诸子——无一遗漏——齐心并进,显出般度五子一方在战局关键转折中的同谋同决。
Verse 14
पज्चालाक्ष महावीर्या: शिखण्डी च महारथ: । *धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके सभी पुत्र, महापराक्रमी पांचाल और महारथी शिखण्डी --ये सब कहाँ हैं?' ।। एवं तान् वादिन: शूरान् द्रौपदेया महारथा:
桑阇耶说道:“般遮罗那些大勇士——大车战士尸佉ṇḍī(Śikhaṇḍī)、持军(Dhṛṣṭadyumna)、萨底耶迦(Sātyaki),以及诸德劳帕提之子(Draupadeya,皆为大车战士)——他们如今在何处?”他如此提及这些英武之士——德劳帕蒂的儿子们——凸显战事的沉重与不测:在战场与命运的混沌里,纵是名震四方的豪杰也会忽然无踪。
Verse 15
चक्रै्विमथितै: केचित् केचिच्छिन्नैर्महाध्वजै:
桑阇耶说道:有的被战车之轮碾碎搅烂;有的在大纛旌旗之间被斩落——此乃战场无休止的暴烈之象:骄矜与炫耀(旗帜)并不能遮护人免于战争的报应。
Verse 16
आलोक्य पाण्डवान् युद्धे योधा राजन् समन्ततः
桑阇耶说道:大王啊,诸战士在战阵之中,从四面八方望向般度诸子……
Verse 17
दुर्योधनश्न तान् वीरान् वारयामास सान्त्वयन्
桑阇耶说道:兜利约陀那为稳住军心,试图拦住那些勇士,并以和缓之辞加以安抚——他想以劝说维系军阵,不让愤怒或鲁莽左右行动。
Verse 18
ततो गान्धारराजस्य पुत्र: शकुनिरब्रवीत्,इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टादशो5ध्याय:
于是,健陀罗王之子沙昆尼开口说道。至此,《圣摩诃婆罗多》之《沙利耶篇》在描写那混乱而纠缠密集的战斗一节中,第十八章告终。
Verse 19
दुर्योधनं महाराज वचन वचनक्षम: । महाराज! तब प्रवचनपटु गान्धारराजपुत्र शकुनिने दुर्योधनसे यह बात कही-- ।। १८ *॥ कि नः सम्प्रेक्षमाणानां मद्राणां हन्यते बलम्
三阇耶说道:“大王啊,那时健陀罗君之子沙昆尼,善辩而工于辞令与应对,便对难敌说道:‘我们在此旁观之际,难道要任由摩陀罗人的兵力被歼灭吗?’”
Verse 20
सहितैश्नापि योद्धव्यमित्येष समय: कृत:
三阇耶说道:“早已立下定约:他们必须并肩而战,即便在紧密队形中也要同立共斗。”
Verse 21
अथ कस्मात् परानेव घ्नतो मर्षयसे नृप । “यह शपथ ली जा चुकी है कि “हम सब लोग एक साथ होकर लड़ें।” नरेश्वर! ऐसी दशामें शत्रुओंको अपनी सेनाका संहार करते देखकर भी तुम क्यों सहन करते हो?” ।। २० ई | दुर्योधन उवाच वार्यमाणा मया पूर्व नैते चक्रुर्वचो मम
沙昆尼说道:“大王啊,为何你竟能忍受——眼看敌人屠戮我军?我们不是早已起誓:‘众人当同心并肩而战’吗?” 难敌说道:“先前我曾试图阻止他们,但他们并不听从我的话。”
Verse 22
एते विनिहता: सर्वे प्रस्कन्ना: पाण्डवाहिनीम् । दुर्योधनने कहा--मैंने पहले ही इन्हें बहुत मना किया था, परंतु इन लोगोंने मेरी बात नहीं मानी और पाण्डवसेनामें घुसकर ये प्राय: सब-के-सब मारे गये ।। शकुनिरुवाच न भर्तु: शासन वीरा रणे कुर्वन्त्यमर्षिता:
难敌说道:“这些人全都被杀了——因为他们鲁莽地冲入般度军阵。我早已严厉劝阻告诫,他们却不听我的忠言;一旦闯进敌阵,几乎尽数被斩灭。”
Verse 23
अलं क्रोद्धुमथैतेषां नायं काल उपेक्षितुम् । याम: सर्वे च सम्भूय सवाजिरथकुज्जरा:
难敌说道:“对他们的愤怒已足够;此刻不是冷眼旁观之时。让我们众人一同出发——带上战马、战车与战象。”
Verse 24
परित्रातुं महेष्वासान् मद्रराजपदानुगान् । अन्योन्यं परिरक्षामो यत्नेन महता नूप
难敌说道:“大王啊,为护持那些遵从摩陀罗王号令的伟大弓手,让我们以极大的努力与警觉彼此守护。”
Verse 25
शकुनि बोला--नरेश्वर! युद्धस्थलमें रोषामर्षके वशीभूत हुए वीर स्वामीकी आज्ञाका पालन नहीं करते हैं; वैसी दशामें इनपर क्रोध करना उचित नहीं है। यह इनकी उपेक्षा करनेका समय नहीं है। हम सब लोग एक साथ हो मद्रराजके महाधनुर्धर सेवकोंकी रक्षाके लिये हाथी, घोड़े और रथसहित चलें तथा महान् प्रयत्नपूर्वक एक-दूसरेकी रक्षा करें || २२ ++२४ ।। संजय उवाच एवं सर्वेडनुसंचिन्त्य प्रययुर्यत्र सैनिका: । एवमुक्तस्तदा राजा बलेन महता वृत:
三阇耶说道:他们如此共同思量之后,便都朝军队所在之处出发。那位国王听罢此言,当时正被一支强大的军势所环绕。
Verse 26
हत विद्धयत गृह्नलीत प्रहरध्वं निकृन्तत
三阇耶说道:“击杀倒下者;刺穿他们;擒拿他们;猛攻他们;将其斩碎!”
Verse 27
पाण्डवास्तु रणे दृष्टवा मद्रराजपदानुगान्
三阇耶说道:然而般度五子在战场上看见了那些追随摩陀罗王步伐的人。
Verse 28
ते मुहूर्ताद रणे वीरा हस्ताहस्ति विशाम्पते
三阇耶说道:就在那一刻起,噢,万民之主,战场上的英雄们彼此逼近,手搏相持,短兵相接——这是战争阴冷迫近的写照:勇武不再凭借距离与器械,而在正面相遇中受其考验。
Verse 29
निहताः: प्रत्यदृश्यन्त मद्रराजपदानुगा: । प्रजानाथ! वे मद्रराजके अनुगामी वीर रणभूमिमें दो ही घड़ीके भीतर हाथों-हाथ मारे गये दिखायी दिये ।। ततो नः सम्प्रयातानां हता मद्रास्तरस्विन:
三阇耶说道:“噢,万民之主,人们看见追随摩陀罗王足迹的战士们横陈而亡。那些依附摩陀罗王的勇士在战场上似乎在极短的时间内便被迅速斩落——于近身格斗中相继倒下。于是,当我军推进之时,那些性急勇猛的摩陀罗人也被杀戮殆尽。”
Verse 30
उत्थितानि कबन्धानि समदृश्यन्त सर्वश:
三阇耶说道:四面八方都看见无首之躯仍在起立——那是战场毁灭的骇人景象,战争的暴烈将活生生的身体削成残余。
Verse 31
पपात महती चोल्का मध्येनादित्यमण्डलम् । सब ओर कबन्ध खड़े दिखायी दे रहे थे और सूर्यमण्डलके बीचसे वहाँ बड़ी भारी उल्का गिरी ।। रथैर्भग्नैर्युगाक्षैश्न निहतैश्व महारथै:
三阇耶说道:一颗巨大的流星坠落,仿佛穿过太阳圆轮的正中。四面皆见无首之躯兀立,而在日轮中心处,一道巨大的火兆降临其地。战场上遍布破碎的战车、折断的轭与车轴,以及被击倒的伟大战士——凶兆加深了战争终局时的道德黑暗。
Verse 32
वातायमानैस्तुरगैर्युगासक्तैस्ततस्तत:
三阇耶说道:随后,套在轭上的战马如同被风驱使般奔涌向前,他们从此处疾驰到彼处——这是战阵挤压之中无休止奔动的景象。
Verse 33
भग्नचक्रान् रथान् केचिदहरंस्तुरगा रणे
三阇耶说道:在战阵之中,有些战马拖拽着车轮已被击碎的战车而去——此景昭示战争的无情暴烈:连征战之器亦告崩坏,在混乱中被卷走。
Verse 34
तत्र तत्र व्यदृश्यन्त योक्त्रै: श्लिष्टा: सम वाजिन:
三阇耶说道:此处彼处可见战马——仍被缰绳紧系——在战场喧乱中列成紧绷而齐整的行伍。此景表明:纵使毁灭四起,战争之中仍有纪律的约束与随时出击的戒备。
Verse 35
रथिन: पतमानाश्ष दृश्यने सम नरोत्तमा: | गगनात् प्रच्युता: सिद्धा: पुण्यानामिव संक्षये
三阇耶说道:“那些人中翘楚、伟大的车战勇士,竟被看见纷纷坠落——如同成就者(悉地,siddha)在福德耗尽之时自天穹坠下。”
Verse 36
जहाँ-तहाँ जोतोंसे जुड़े हुए घोड़े और नरश्रेष्ठ रथी गिरते दिखायी दे रहे थे, मानो सिद्ध (पुण्यात्मा) पुरुष पुण्यक्षय होनेपर आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हों ।। निहतेषु च शूरेषु मद्रराजानुगेषु वै अस्मानापततकश्चापि दृष्टवा पार्था महारथा:,मद्रराजके उन शूरवीर सैनिकोंके मारे जानेपर हमें आक्रमण करते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले महारथी पाण्डवयोद्धा शंखध्वनिके साथ बाणोंकी सनसनाहट फैलाते हुए हमारा सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आये
三阇耶说道:此处彼处可见仍系在辔具与鞍饰上的战马,也可见人中最杰出的车战勇士倒伏于地——恰如有福的成就者(悉地)在功德耗尽时自天坠落于尘土。又当随从摩陀罗王的勇士被诛之后,般度诸子中的大车战士见我军前逼,便为求胜利疾驰而来迎战;螺号轰鸣,箭矢破空的嗖嗖怒响弥漫长空。
Verse 37
अभ्यवर्तन्त वेगेन जयगृद्धा: प्रहारिण: । बाणशब्दरवान् कृत्वा विमिश्रान् शड्खनिः:स्वनै:,मद्रराजके उन शूरवीर सैनिकोंके मारे जानेपर हमें आक्रमण करते देख विजयकी अभिलाषा रखनेवाले महारथी पाण्डवयोद्धा शंखध्वनिके साथ बाणोंकी सनसनाहट फैलाते हुए हमारा सामना करनेके लिये बड़े वेगसे आये
三阇耶说道:渴求胜利、出手凶猛的般度勇士疾速奔涌而来,与我军相接。其推进之际,箭矢的嘶啸与轰鸣弥漫长空,夹杂着螺号的回响——这股冲锋既宣示他们的决断,也昭示战场无情之律:纵经惨重损失,双方仍必争胜不休。
Verse 38
अस्मांस्तु पुनरासाद्य लब्धलक्ष्यप्रहारिण: । शरासनानि धुन्वाना: सिंहनादान प्रचुक्तुशु:,हमारे पास पहुँचकर लक्ष्य वेधनेमें सफल और प्रहारकुशल पाण्डव-सैनिक अपने धनुष हिलाते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे
三阇耶说道:般度族的勇士们再度逼近我军;他们箭无虚发、善于击杀,抖动弓弦,发出震天的狮子吼。
Verse 39
ततो हतमभिप्रेक्ष्य मद्रराजबलं महत् । मद्रराजं च समरे दृष्टवा शूरं निपातितम्
三阇耶说道:随后,见摩陀罗王的大军尽被诛灭,又见那位英勇的摩陀罗王在战场上被击倒……
Verse 40
दुर्योधनबलं सर्व पुनरासीत् पराड्मुखम् | मद्रराजकजी वह विशाल सेना मारी गयी तथा शूरवीर मद्रराज शल्य पहले ही समरभूमिमें धराशायी किये जा चुके हैं, यह सब अपनी आँखों देखकर दुर्योधनकी सारी सेना पुनः पीठ दिखाकर भाग चली ।। वध्यमानं महाराज पाण्डवैर्जितकाशिभि: । दिशो भेजे5थ सम्भ्रान्तं भ्रामितं दृढ्धन्विभि:,महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले दृढ़ धनुर्धर पाण्डवोंकी मार खाकर कौरव-सेना घबरा उठी और भ्रान्त-सी होकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागने लगी
三阇耶说道:大王啊,杜尤陀那的全军又一次背转而逃。被般度族那些弓力坚强、因胜利而振奋的勇士痛击,俱卢军惊惶失措、迷乱不堪,四散奔逃于各方。
Verse 43
धनु:शब्दं महत् कृत्वा सहायुध्यन्त पाण्डवै: । महाराज! उन शूरवीरोंने युद्ध करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया था, अतः धनुषकी गम्भीर टंकार करके पाण्डवोंके साथ संग्राम आरम्भ कर दिया
三阇耶说道:大王啊,那些勇士既已立下决战之志,便以弓弦发出巨响,与般度族并肩开战。
Verse 63
पूरयन् रथघोषेण दिश: सर्वा महारथ: । शल्य मारे गये और मद्रराजका प्रिय करनेमें लगे हुए मद्रदेशीय महारथियोंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पीड़ित कर रखा है; यह सुनकर कुन्तीपुत्र महारथी अर्जुन गाण्डीव धनुषकी टंकार करते और रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करते हुए वहाँ आ पहुँचे
三阇耶说道:那位大勇士阿周那驾车赶到,战车的轰鸣如雷,充满四方。因为沙利耶既已阵亡,摩陀罗的强大战士们为取悦其王,正猛烈逼迫法子犹提施提罗。闻此危急,昆蒂之子阿周那急拈甘狄婆弓,使弓弦作响,又以战车深沉的咆哮震荡诸方,疾驰而至。
Verse 96
क्षोभयन्ति सम तां सेनां मकरा: सागरं यथा | युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए पुरुषप्रवर पाण्डव उस सेनाको उसी प्रकार क्षुब्ध करने लगे, जैसे मगर समुद्रको
三阇耶说道:般度五子——人中之杰——从四面合围那支军队,开始使其陷入骚乱,犹如摩伽罗在大海中翻搅激荡一般。
Verse 123
भ्रातरो वास्य ते शूरा दृश्यने नेह केन च । वे बहुसंख्यक महामनस्वी मद्रमहारथी विशाल पाण्डव-सेनाको मथकर जोर-जोरसे पुकार-पुकारकर कहने लगे--“कहाँ है वह राजा युधिष्ठिर? अथवा उसके वे शूरवीर भाई? वे सब यहाँ दिखायी क्यों नहीं देते?
三阇耶说道:“你的勇武兄弟在此全然不见。”那位来自摩陀罗的高魂大车战士,在众人簇拥之下,冲搅穿行于广阔的般度军中,便一再高声呼喊:“国王坚战(Yudhiṣṭhira)在哪里?他的英勇兄弟们又在哪里?为何他们都不在此现身?”
Verse 143
अभ्यघ्नन् युयुधानश्न मद्रराजपदानुगान् । ऐसी बातें कहते हुए उन मद्रराजके अनुगामी वीर योद्धाओंको द्रौपदीके महारथी पुत्रों और सात्यकिने मारना आरम्भ किया
三阇耶说道:优优陀那(萨底耆)开始击杀那些追随摩陀罗王脚步的战士。就在同一阵战潮中,德罗帕蒂的诸位大车战之子与萨底耆一道,着手屠戮那些归附摩陀罗一方的勇士。
Verse 156
ते दृश्यन्तेडपि समरे तावका निहताः परै: । समरांगणमें आपके वे सैनिक शत्रुओंद्वारा मारे जाने लगे। कुछ योद्धा छिन्न-भिन्न हुए रथके पहियों और कुछ कटे हुए विशाल ध्वजोंके साथ ही धराशायी होते दिखायी देने लगे
三阇耶说道:即便仍可在战场上看见,你方的战士也正被敌军击杀。在厮杀的混乱中,有人碎裂倒下于破损的战车轮间;也有人与被斩断的巨大旗幡一同倾覆——这是武勇之傲迅速崩塌、战争代价惨烈的景象。
Verse 163
वार्यमाणा ययुर्वेगात् पुत्रेण तव भारत । राजन्! भरतनन्दन! वे योद्धा युद्धमें सब ओर फैले हुए पाण्डवोंको देखकर आपके पुत्रके मना करनेपर भी वेगपूर्वक आगे बढ़ गये
三阇耶说道:噢,婆罗多啊,尽管你的儿子加以阻拦,那些战士仍以猛势向前冲去。大王啊,婆罗多族之荣光——见般度五子在战场上四面铺开,他们便不顾你儿子的制止而贸然推进,被战争的势头所驱使,而非出于审慎的克制。
Verse 176
न चास्य शासन केचित्तत्र चक्रुर्महारथा: । दुर्योधनने उन वीरोंको सान्त्वना देते हुए बहुत मना किया, किंतु वहाँ किन्हीं महारथियोंने उसकी इस आज्ञाका पालन नहीं किया
三阇耶说道:然而,在场的诸位大车战士无一人奉行他的命令。尽管难敌竭力劝阻并抚慰那些英雄,他们仍不肯顺从——这表明在战火炽烈之时,个人的决意与武人的傲气,竟能凌驾于君王的号令之上。
Verse 193
न युक्तमेतत् समरे त्वयि तिष्ठति भारत । “भारत! हमलोगोंके देखते-देखते मद्रदेशकी यह सेना क्यों मारी जाती है? तुम्हारे रहते ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये
三阇耶说道:“此事不当——当你,噢婆罗多,在战阵中仍屹立不动之时。摩陀罗的军队怎能在我们眼前被屠戮殆尽?有你在,此等事绝不该被允许发生。”
Verse 253
प्रययौँ सिंहनादेन कम्पयन्निव मेदिनीम् | संजय कहते हैं--राजन्! ऐसा विचारकर सब लोग वहीं गये, जहाँ वे सैनिक मौजूद थे। शकुनिके वैसा कहनेपर राजा दुर्योधन विशाल सेनाके साथ सिंहनाद करता और पृथ्वीको कँपाता हुआ-सा आगे बढ़ा
三阇耶说道:“大王啊,如此思量之后,他们都前往军队驻扎之处。及至沙昆尼那般言说,难敌王便率领浩大军势前进,狮吼震天,仿佛令大地也为之战栗。”
Verse 263
इत्यासीत् तुमुल: शब्दस्तव सैन्यस्य भारत । भारत! उस समय आपकी सेनामें “मार डालो, घायल करो, पकड़ लो, प्रहार करो और टुकड़े-टुकड़े कर डालो” यह भयंकर शब्द गूँज रहा था
三阇耶说道:“于是,噢婆罗多,你军中响起了喧天的轰鸣——可怖的战吼齐声回荡:‘杀!伤!擒!击!碎尸万段!’”
Verse 273
सहितानभ्यवर्तन्त गुल्ममास्थाय मध्यमम् | रणभूमिमें मद्रराजके सेवकोंको एक साथ धावा करते देख पाण्डवोंने मध्यम गुल्म (सेना)-का आश्रय ले उनका सामना किया
三阇耶说道:战场上,见摩陀罗王的随从兵众结成一团齐冲而来,般度五子便依托其中军阵(中部“古尔摩”战列),迎头抵住那一击——在战势挤压之中仍以严整之序稳守不退。
Verse 296
हृष्ा: किलकिलाशब्दमकुर्वन् सहिता: परे । वहाँ हमारे पहुँचते ही मद्रदेशके वे वेगशाली वीर कालके गालमें चले गये और शत्रुसैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो एक साथ किलकारियाँ भरने लगे
三阇耶说道:敌方诸勇士欣喜若狂,齐声发出凯呼——一同高喊震天的战吼。在叙事的推进中,这一幕标志着战局关键时刻敌军士气与自信的猛然高涨:集体的欢呼既是威吓之器,也是他们自认占据上风的明证。
Verse 313
अश्वैर्निपतितैश्वैव संछन्नाभूद् वसुन्धरा । टूटे-फूटे रथों, जूओं और धुरोंसे, मारे गये महारथियोंसे तथा धराशायी हुए घोड़ोंसे भूमि ढक गयी थी
三阇耶说道:大地尽被倒毙的战马所覆盖。战场仿佛铺满战争的残骸——破碎的战车、断裂的轭与车轴——以及被斩杀的伟大车战士的尸身,显出战斗的暴烈如何将人和他们引以为傲的器具一并碾作废墟。
Verse 326
अदृश्यन्त महाराज योधास्तत्र रणाजिरे | महाराज! वहाँ समरांगणमें बहुत-से योद्धा जूएमें बँधे हुए वायुके समान वेगशाली घोड़ोंद्वारा इधर-उधर ले जाये जाते दिखायी देते थे
三阇耶说道:“大王啊,在那战场上,人们看见许多战士被风一般迅疾的战马拖拽着,因轭与缰具紧紧束缚,任其牵引,来回奔走。”此景凸显战争阴冷的机括:纵是强者也被迫失去自主,随马与战车的冲势而去;暴烈在混乱中剥夺人的意志与尊严。
Verse 333
रथार्ध केचिदादाय दिशो दश विबशभ्रमु: । कुछ घोड़े रणभूमिमें टूटे पहियोंवाले रथोंको लिये जा रहे थे और कितने ही अश्व आधे ही रथको लेकर दसों दिशाओंमें चक्कर लगाते थे
三阇耶说道:有些战马只拖着半截战车,便在十方之间兜转徘徊。战场上,有的马牵着断轮破车乱奔;又有许多马仅带半车,仍向十方打转,显见战争把原本有序的武艺与阵法,碾成一片混乱的残破。
The tension is between survival-driven flight and duty-bound steadiness: whether warriors should disperse to avoid immediate danger or remain disciplined, accepting risk as part of kṣatriya obligation and collective responsibility.
He argues that cohesion and resolve are strategically and ethically superior to panic: since death is inevitable for all, a controlled stand aligned with kṣatra-dharma preserves honor, reduces vulnerability, and can restore tactical initiative.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as narrative-ethical commentary by depicting how leadership rhetoric and disciplined action shape outcomes within the epic’s broader dharma framework.