Adhyaya 67
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 6721 Verses

Adhyaya 67

Janmaveśma-praveśa and Uttarā’s Śaraṇāgati (Entry into the Birth-Chamber and Uttarā’s Appeal)

Upa-parva: Garbha-rakṣaṇa (Protection of the Unborn Heir) Episode

Vaiśaṃpāyana reports that Keśihā/Hṛṣīkeśa (Kṛṣṇa) responds affirmatively and, by his words, heartens the gathered people. He enters the janmaveśma associated with the listener’s father, described as properly honored and ritually arranged. The chamber is prepared with full water jars placed in all directions, substances such as ghee and mustard, and protective implements; clean weapons and fires are positioned around, and capable physicians and attendants are present. Seeing the orderly preparations, Kṛṣṇa expresses approval (“sādhu, sādhu”). Draupadī quickly goes to Vairāṭī (Uttarā) to announce Kṛṣṇa’s arrival. Uttarā, restraining tears, approaches in a composed manner yet inwardly distressed, and laments that her child—along with Abhimanyu’s line—has been struck down by Droṇa’s son’s weapon. She bows and petitions Kṛṣṇa to revive the unborn heir, reflecting on the futility of her hopes, the perceived cruelty of the act, and her fear of facing Arjuna after failing to come earlier despite a prior resolve.

Chapter Arc: कुरुवंश के क्षीण हो जाने पर अभिमन्यु का पुत्र जन्म लेता है—समाचार से पहले अपार हर्ष, पर शिशु में जीवन-चिह्न न देखकर वही हर्ष क्षण में शोक बनकर उमड़ पड़ता है। → कुन्ती के बैठ जाने के बाद सुभद्रा अपने भाई श्रीकृष्ण की ओर देखकर फूट-फूटकर रोती है और कहती है कि अभिमन्यु-जैसे वीर का पुत्र मरा हुआ पैदा होना इससे बड़ा दु:ख क्या हो सकता है; वह कृष्ण के सामर्थ्य को जानकर उनसे करुणा की याचना करती है। → सुभद्रा कृष्ण से आग्रह करती है—‘अभिमन्युज को संजीवित करो’; वह उन्हें धर्मात्मा, सत्यवान, सत्यविक्रम कहकर स्मरण कराती है कि सत्पुरुषों की वाणी को सत्य करने का सामर्थ्य उन्हीं में है, और बहिन/शरणागत/हतपुत्रा समझकर दया करने की प्रार्थना करती है। → अध्याय का केंद्र सुभद्रा की करुण पुकार और कृष्ण के प्रति पूर्ण शरणागति है—परिणाम (जीवनदान) का निर्णायक कर्म अगले प्रसंग/अध्याय की ओर संकेतित रहता है। → क्या श्रीकृष्ण अपने प्रभाव से मृतप्राय शिशु को जीवन देंगे और कुरुवंश की अंतिम आशा को बचाएंगे?

Shlokas

Verse 1

/ >> हज भी -्िसस > पहले तो पुत्र-जन्मके समाचारसे सबको अपार हर्ष हुआ; किंतु उनमें जीवनका कोई चिह्न न देखकर तत्काल शोकका समुद्र उमड़ पड़ा। सप्तषष्टितमो< ध्याय: परीक्षित्‌को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना वैशम्पायन उवाच उत्थितायां पृथायां तु सुभद्रा भ्रातरं तदा । दृष्टवा चुक्रोश दुःखार्ता वचन चेदमब्रवीत्‌

毗湿摩波耶那说道:当普利塔(昆蒂)起身之时,苏跋陀罗在那一刻见到自己的兄长,悲恸呼号,遂说出如下言辞。此景铺陈出家族的哀痛与迫切:长辈与亲族在惧怕新生继嗣毫无生机之际,皆转向奎师那(Kṛṣṇa)求其庇护,并请其指引合乎正法之举。

Verse 2

पुण्डरीकाक्ष पश्य त्वं पौत्रं पार्थस्य धीमतः । परिक्षीणेषु कुरुषु परिक्षीणं गतायुषम्‌,'भैया कमलनयन! तुम अपने सखा बुद्धिमान्‌ पार्थके इस पौत्रकी दशा तो देखो। कौरवोंके नष्ट हो जानेपर इसका जन्म हुआ; परंतु यह भी गतायु होकर नष्ट हो गया

“莲眼者啊,请看这位智者帕尔塔(阿周那)的孙儿。库鲁一族既已耗尽而覆灭,他方才降生;而今他也同样衰竭倒卧,寿分被截断了。”

Verse 3

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! कुन्तीदेवीके बैठ जानेपर सुभद्रा अपने भाई श्रीकृष्णणी ओर देखकर फूट-फ़ूटकर रोने लगी और दु:ःखसे आर्त होकर यों बोली --,इषीका द्रोणपुत्रेण भीमसेनार्थमुद्यता । सोत्तरायां निपतिता विजये मयि चैव ह 'टद्रोणपुत्र अश्वत्थामाने भीमसेनको मारनेके लिये जो सींकका बाण उठाया था, वह उत्तरापर, तुम्हारे सखा विजयपर और मुझपर गिरा है

毗湿摩波耶那说道:“阇那美阇耶啊!昆蒂王后坐定之后,苏跋陀罗望向她的兄长圣奎师那,放声恸哭。她悲痛欲绝,说道:‘德罗那之子阿湿婆他摩为杀毗摩塞那而举起的那支如芦苇般的箭矢,却落在了乌塔罗——落在了你的同伴毗阇耶身上——也落在了我身上。’”

Verse 4

सेयं विदीर्णे हृदये मयि तिष्ठति केशव । यन्न पश्यामि दुर्धर्ष सहपुत्र तु तं॑ प्रभो,“दुर्धष वीर केशव! प्रभो! वह सींक मेरे इस विदीर्ण हुए हृदयमें आज भी कसक रही है; क्योंकि इस समय मैं पुत्रसहित अभिमन्युको नहीं देख पाती हूँ

“凯沙瓦啊,不可征服的主啊——纵使我心已碎,这痛楚仍在我胸中盘桓;因为此刻我看不见他——阿毗曼纽——与他的儿子同在。”

Verse 5

कि नु वक्ष्यति धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिर: । भीमसेनार्जुनौ चापि माद्रवत्या: सुतौ च तौ,“अभिमन्युका बेटा जन्म लेनेके साथ ही मर गया--इस बातको सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर क्या कहेंगे? भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेव भी क्‍या सीचेंगे? श्रीकृष्ण! आज द्रोणपुत्रने पाण्डवोंका सर्वस्व लूट लिया

毗湿摩波耶那说道:“如今,坚守达摩的正义之王——坚毅的由提施提罗——将会说什么?毗摩塞那与阿周那又将说什么?还有摩德丽的那两位儿子,也将如何开口?”

Verse 6

श्रुत्वाभिमन्योस्तनयं जातं च मृतमेव च । मुषिता इव वार्ष्णेय द्रोणपुत्रेण पाण्डवा:,“अभिमन्युका बेटा जन्म लेनेके साथ ही मर गया--इस बातको सुनकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर क्या कहेंगे? भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेव भी क्‍या सीचेंगे? श्रीकृष्ण! आज द्रोणपुत्रने पाण्डवोंका सर्वस्व लूट लिया

毗湿摩波耶那说道:“听闻阿毗曼纽之子虽已降生,却又立刻死去,般度五子——噢,瓦尔什涅耶——只觉仿佛被德罗那之子夺走了一切。此讯直击他们对血脉延续与未来的希望,使胜利化作道义的煎熬与悲恸。”

Verse 7

अभिमन्यु: प्रिय: कृष्ण भ्रातृणां नात्र संशय: । ते श्र॒त्वा कि नु वक्ष्यन्ति द्रोणपुत्रास्त्रनिर्जिता:,“श्रीकृष्ण! अभिमन्यु पाँचों भाइयोंको अत्यन्त प्रिय था--इसमें संशय नहीं है। उसके पुत्रकी यह दशा सुनकर अभ्वृत्थामाके अस्त्रसे पराजित हुए पाण्डव कया कहेंगे?

毗湿摩波耶那说道:“噢,奎师那,阿毗曼纽为诸兄弟所挚爱——此事毫无疑问。待他们听闻其子之境况,那些已被德罗那之子之武器所压倒的般度五子,又还能说出什么呢?”

Verse 8

भवितात: परं दु:खं कि तदन्यज्जनार्दन । अभिमन्यो: सुतात्‌ कृष्ण मृताज्जातादरिंदम,'शत्रुसूदन! जनार्दन! श्रीकृष्ण! अभिमन्यु-जैसे वीरका पुत्र मरा हुआ पैदा हो, इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है?

毗湿摩波耶那说道:“噢,阇那尔达那,还有什么悲痛能胜过此事?噢,奎师那,降敌者——阿毗曼纽那般英雄之子,竟生而无命。”

Verse 9

साहं प्रसादये कृष्ण त्वामद्य शिरसा नता । पृथेयं द्रौपदी चैव ता: पश्य पुरुषोत्तम,“पुरुषोत्तम! श्रीकृष्ण! आज मैं तुम्हारे चरणोंपर मस्तक रखकर तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ। बूआ कुन्ती और बहिन द्रौपदी भी तुम्हारे पैरोंपर पड़ी हुई हैं। इन सबकी ओर देखो

毗湿摩波耶那说道:“噢,奎师那,今日我俯首叩拜,祈求蒙受你的慈恩。普利塔之女昆蒂与德劳帕迪也同样伏倒在你足下。噢,至上之人(Puruṣottama),请垂顾她们。”

Verse 10

यदा द्रोणसुतो गर्भान्‌ पाण्डूनां हन्ति माधव । तदा किल त्वया द्रौणि: क्रुद्धेनोक्तोडरिमर्दन,'शत्रुमर्दन माधव! जब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पाण्डवोंके गर्भकी भी हत्या करनेका प्रयत्न कर रहा था, उस समय तुमने कुपित होकर उससे कहा था

毗舍波耶那说:“噢,摩陀婆!当德罗那之子(阿湿婆他摩)竟欲毁灭般度族连未出世的继嗣之时——人们如此追忆——你以合乎正法的震怒,向那德罗那之子发言,噢,摧敌者!”

Verse 11

अकाम त्वां करिष्यामि ब्रह्मुबन्धो नराधम । अहं संजीवयिष्यामि किरीटितनयात्मजम्‌,“ब्रह्मबन्धो! नराधम! मैं तेरी इच्छा पूर्ण नहीं होने दूँगा। अर्जुनके पौत्रको अपने प्रभावसे जीवित कर दूँगा

毗舍波耶那说:“噢,婆罗门之徒(徒具名分者)!噢,人中最下者!我决不让你的欲望得逞。凭我自身之力,我将使基利丁(阿周那)之子之子复生。”

Verse 12

इत्येतद्‌ वचन श्र॒ुत्वा जानानाहं बलं तव | प्रसादये त्वां दुर्धष जीवतामभिमन्युज:,'भैया! तुम दुर्धर्ष वीर हो। मैं तुम्हारी उस बातको सुनकर तुम्हारे बलको अच्छी तरह जानती हूँ। इसीलिये तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ। तुम्हारे कृपा-प्रसादसे अभिमन्युका यह पुत्र जीवित हो जाय

毗舍波耶那说:“听了这些话,我如今已明了你的威力。噢,不可攻破的英雄!因此我愿求得你的垂怜——愿阿毗曼纽之子,因你慈恩之赐而得以存活。”

Verse 13

यद्येतत्‌ त्वं प्रतिश्रुत्य न करोषि वच: शुभम्‌ | सकल वृष्णिशार्दूल मृतां मामवधारय,*वृष्णिवंशके सिंह! यदि तुम ऐसी प्रतिज्ञा करके अपने मंगलमय वचनका पूर्णतः पालन नहीं करोगे तो यह समझ लो, सुभद्रा जीवित नहीं रहेगी--मैं अपने प्राण दे दूँगी

毗舍波耶那说:“若你既已许诺,却不践行那吉祥之言——须确知,噢,弗利什尼族中的猛虎:我便等同于死去;我将舍弃此身。”

Verse 14

अभिमन्यो: सुतो वीर न संजीवति यद्ययम्‌ । जीवति त्वयि दुर्धर्ष कि करिष्याम्यहं त्वया,“दुर्धर्ष वीर! यदि तुम्हारे जीते-जी अभिमन्युके इस बालकको जीवनदान न मिला तो तुम मेरे किस काम आओगे

毗舍波耶那说:“噢,英雄!若阿毗曼纽之子不能复生,那么纵使你仍在世,噢,不可攻破者,你于我何用?若在你尚存之时,这阿毗曼纽之子仍不得生命,你的神勇对我的所求又有何价值?”

Verse 15

संजीवयैन दुर्धर्ष मृतं त्वमभिमन्युजम्‌ । सदृशाक्षसुतं वीर सस्य॑ वर्षन्निवाम्बुद:,“अजेय वीर! जैसे बादल पानी बरसाकर सूखी खेतीको भी हरी-भरी कर देता है, उसी प्रकार तुम अपने ही समान नेत्रवाले अभिमन्युके इस मरे हुए पुत्रको जीवित कर दो

毗舍波耶那说道:“噢,不可战胜的英雄啊,请使这位已死的阿毗曼纽之子复生——他的双眼与父亲相似。正如雨云倾注甘霖,使干枯的庄稼也再度繁茂;同样,请你令他起死回生。”

Verse 16

त्वं हि केशव धर्मात्मा सत्यवान्‌ सत्यविक्रम: । सतां वाचमृतां कर्तुमहसि त्वमरिंदम,'शत्रुदमन केशव! तुम धर्मात्मा, सत्यवादी और सत्यपराक्रमी हो; अतः तुम्हें अपनी कही हुई बातको सत्य कर दिखाना चाहिये

毗舍波耶那说道:“你啊,克沙瓦,内心正法,言行真实,并以真理之力坚定不移。因此,降伏仇敌者啊,你理当使你所许之言成就,使善者之诺化为既成之实。”

Verse 17

इच्छन्नपि हि लोकांस्त्रीन्‌ जीवयेथा मृतानिमान्‌ । किं पुनर्दयितं जात॑ स्वस्रीयस्यात्मजं मृतम्‌,“तुम चाहो तो मृत्युके मुखमें पड़े हुए तीनों लोकोंको जिला सकते हो, फिर अपने भानजेके इस प्यारे पुत्रको, जो मर चुका है, जीवित करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है

“只要你愿意,纵使三界都已落入死神之口,你也能令其复苏;那么,使你外甥这心爱之子——虽已死去——再得生命,于你又算得了什么大事?”

Verse 18

प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण तस्मात्‌ त्वां याचयाम्यहम्‌ । कुरुष्व पाण्डुपुत्राणामिमं परमनुग्रहम्‌,“श्रीकृष्ण! मैं तुम्हारे प्रभावको जानती हूँ। इसीलिये तुमसे याचना करती हूँ। इस बालकको जीवनदान देकर तुम पाण्डवोंपर यह महान्‌ अनुग्रह करो

毗舍波耶那说道:“噢,奎师那,我深知你神威的分量,因此恳切祈求。请赐这孩子以生命;以此向般度之子施以至高恩泽,向般度族降下大慈恩。”

Verse 19

स्वसेति वा महाबाहो हतपुत्रेति वा पुन: । प्रपन्ना मामियं चेति दयां कर्तुमिहाहसि,“महाबाहो! तुम यह समझकर कि यह मेरी बहिन है अथवा जिसका बेटा मारा गया है, वह दुखिया है अथवा शरणमें आयी हुई एक दयनीय अबला है, मुझपर दया करने योग्य हो”

“噢,伟臂者啊:无论你将她视作我的姊妹,或视作丧子之妇,或视作前来投靠求庇之人——见她如此,你都应在此施以怜悯。”

Verse 66

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें परीक्षित॒के जन्मका वर्णनविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ

至此,尊贵的《摩诃婆罗多》之阿湿婆梅陀篇(Aśvamedhika Parva)内《阿努歌谛》(Anugītā)部分,第六十六章——叙述帕利克希特(Parīkṣit)诞生之事——宣告完结。叙事者以此标明该段落的完成,并将此一篇章置于大战余波之后的法(dharma)延续之中:血脉的承继、责任的担当与正法秩序的复归,皆因新继嗣的到来而再度确证。

Verse 67

इति श्रीमहाभारते आश्चवमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सुभद्रावाक्‍्ये सप्तषष्टितमो5ध्याय:

至此,《圣摩诃婆罗多》之阿湿婆梅陀篇(Aśvamedhika Parva)内《阿努歌谛》(Anugītā)部分,第六十七章——关于苏婆陀罗(Subhadrā)之言的篇章——宣告完结;此为毗舍波耶那(Vaiśampāyana)所宣说。(此乃章末题记,并非叙事偈颂。)

Frequently Asked Questions

The crisis is the attempted destruction of an unborn heir through extraordinary force, raising questions about moral limits in conflict and the duty to protect vulnerable life to preserve social and dynastic order.

The chapter models crisis-response as both procedural and compassionate: ritual preparedness, skilled care (physicians/attendants), and a turn toward ethical appeal rather than retaliation.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-significance is implicit, positioning this episode as a hinge where post-war dharma is tested through the safeguarding of lineage and the remediation of harm.