
Adhyāya 40: Brahmā on Mahān (The Great Principle) and the All-Pervading Puruṣa
Upa-parva: Ātma-Mahattva (Mahān-Ātman) Upadeśa — Brahmā’s Discourse on the Great Principle
This chapter is structured as a compact doctrinal exposition introduced by ‘Brahmā said.’ It first states that the Mahān—described as a great-souled, great-minded principle—arises prior to the manifest (avyakta), and is named the first creation and the origin associated with the guṇas. It then enumerates synonymous designations and functional correlates: the Mahān is identified through epithets such as Viṣṇu, Viśva, and Śambhu, and through cognitive-ethical capacities including buddhi (discernment), prajñā (insight), upalabdhi (apprehension), khyāti (recognition), dhṛti (steadfastness), and smṛti (memory). The discourse asserts that knowing this principle prevents delusion in the learned listener. The chapter further portrays the puruṣa as all-pervasive—having hands, feet, eyes, heads, mouths everywhere—standing while pervading all, and residing in the heart of all beings as a radiant, imperishable light. It concludes by characterizing those who attain this ‘mahattva’ as renunciant, meditative, truth-bound, sense-controlled, non-greedy, free from possessiveness and egoism; such knowledge is presented as the highest auspicious path, with Viṣṇu described as self-existent in primordial creation.
Chapter Arc: ब्रह्मवाणी में शिष्य के सामने ‘महत्तत्त्व’ और ‘परमात्मतत्त्व’ का द्वार खुलता है—अव्यक्त से उत्पन्न महानात्मा, और उसके अनेक नाम-रूपों का संकेत देकर जिज्ञासा को तीक्ष्ण किया जाता है। → परम पुरुष के पर्यायवाचक नामों (महानात्मा, मति, विष्णु, जिष्णु, शम्भु, बुद्धि, प्रज्ञा, स्मृति आदि) की शृंखला के साथ यह प्रश्न उभरता है कि एक ही सत्य इतने रूपों में कैसे जाना जाए; फिर हृदयस्थ परमात्मा की अणिमा-लघिमा आदि विभूतियों और साधक-लक्षणों (ध्यान, नित्ययोग, सत्यसंधता, जितेन्द्रियता) से साधना का कठोर पथ सामने आता है। → अहंकार से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति और प्रलय में उन्हीं के विनाश का वर्णन आते ही चरम बिंदु बनता है—जब महाभूत-विनाश के समय समस्त प्राणियों में ‘महद् भय’ उठता है, तब जो धीर पुरुष परमात्मतत्त्व को जानता है वह मोह में नहीं पड़ता। → ज्ञान का फल स्पष्ट किया जाता है: जो ब्राह्मण/विद्वान परमात्मा को इन पर्यायों के पार एक तत्त्व रूप में पहचान लेता है, वह प्रमोह से बचता है; प्रलय-भय के बीच भी धैर्य और विवेक से स्थित रहता है।
Verse 1
पम्प बछ। अऑ-छकऋ--> चत्वारिशो< ध्याय: महत्तत््वके नाम और परमात्मतत्त्वको जाननेकी महिमा ब्रह्मोवाच अव्यक्तात् पूर्वमुत्पन्नो महानात्मा महामतिः । आदिर्गुणानां सर्वेषां प्रथम: सर्ग उच्यते,ब्रह्माजी बोले-महर्षिगण! पहले अव्यक्त प्रकृतिसे महान् आत्मस्वरूप महाबुद्धितत्त्व उत्पन्न हुआ। यही सब गुणोंका आदि तत्त्व और प्रथम सर्ग कहा जाता है
梵天(Brahmā)说道:“诸大圣仙啊!从不显之自性(Prakṛti)之中,最先生起的是大原理——摩诃(Mahān),大我与广大之智。它被称为一切诸德(guṇa)之本源,并被说为最初的创造。”
Verse 2
महानात्मा मतिर्विष्णुर्जिष्णु: शम्भुश्न वीर्यवान् । बुद्धि: प्रज्ञोपलब्धिश्व॒ तथा ख्यातिर्धति: स्मृति:,महान् आत्मा, मति, विष्णु, जिष्णु, शम्भु, वीर्यवान्, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, ख्याति, धृति, स्मृति--इन पर्यायवाची नामोंसे महान् आत्माकी पहचान होती है। उसके तत्त्वको जाननेवाला दविद्दान् ब्राह्मण कभी मोहमें नहीं पड़ता
风神说道:“大我以这些同义之名而为人所识——大灵、大智(Mati)、毗湿奴、胜者(Jiṣṇu)、善福者(Śambhu)、大力者;又名为理解、智慧、直接证知、名闻、坚忍与忆念。真正洞悉大我实相的博学婆罗门,永不堕入迷妄。”
Verse 3
पर्यायवाचकै: शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते । तं जानन ब्राह्मणो विद्वान प्रमोहें नाधिगच्छति,महान् आत्मा, मति, विष्णु, जिष्णु, शम्भु, वीर्यवान्, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, ख्याति, धृति, स्मृति--इन पर्यायवाची नामोंसे महान् आत्माकी पहचान होती है। उसके तत्त्वको जाननेवाला दविद्दान् ब्राह्मण कभी मोहमें नहीं पड़ता
大我当由作为其同义名的言辞而领会。真正知晓此实相的博学婆罗门,不会陷入迷妄。“摩诃阿特曼(Mahān Ātmā)”“摩提(Mati)”“毗湿奴(Viṣṇu)”“吉什努(Jiṣṇu)”“商布(Śambhu)”“毗力耶梵(Vīryavān)”“布提(Buddhi)”“般若(Prajñā)”“优波拉布提(Upalabdhi)”“名闻(Khyāti)”“坚忍(Dhṛti)”“忆念(Smṛti)”等名,皆用以指示那大我;把握其精髓者,不为纷乱所胜。
Verse 4
सर्वतःपाणिपादश्च सर्वतो$क्षिशिरोमुख: । सर्वतः:श्रुतिमॉल्लोके सर्व व्याप्प स तिष्ठति,परमात्मा सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है
风神说道:“至上之我四方皆有手足;四方皆有眼、首与面;诸处皆有耳。因为祂遍满世间一切众生而安住——在万有之内,亦在万有之外。”
Verse 5
महाप्रभाव: पुरुष: सर्वस्य हृदि निश्चित: । अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्यय:,सबके हृदयमें विराजमान परम पुरुष परमात्माका प्रभाव बहुत बड़ा है। अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियाँ उसीके स्वरूप हैं। वह सबका शासन करनेवाला, ज्योतिर्मय और अविनाशी है
风神说道:“至上之人(至上神我)威德无量,坚然安住于一切众生之心。微细(aṇimā)、轻安(laghimā)、遍至(prāpti)等神通皆由祂而生。祂为万有之主,自光明,且不坏。”
Verse 6
तत्र बुद्धिविदो लोका: सद्धभावनिरताश्न ये । ध्यानिनो नित्ययोगाश्न सत्यसंधा जितेन्द्रिया:,संसारमें जो कोई भी मनुष्य बुद्धिमान, सद्भाव-परायण, ध्यानी, नित्य योगी, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, ज्ञानवान् लोभहीन, क्रोधको जीतनेवाले, प्रसन्नचित्त, धीर तथा ममता और अहंकारसे रहित हैं, वे सब मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं। जो सर्वश्रेष्ठ परमात्माकी महिमाको जानता है, उसे पुण्यदायक उत्तम गति मिलती है
在那里,凡具辨慧、志向高洁、常修观想、恒住瑜伽、守真誓、能制诸根之人——皆脱离世缚而证得至上之我。凡真实了知至上主之威德者,必得最为吉祥、具大福德的归趣。
Verse 7
ज्ञानवन्तश्न ये केचिदलुब्धा जितमन्यव: । प्रसन्नमनसो धीरा निर्ममा निरहंकृता:,संसारमें जो कोई भी मनुष्य बुद्धिमान, सद्भाव-परायण, ध्यानी, नित्य योगी, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, ज्ञानवान् लोभहीन, क्रोधको जीतनेवाले, प्रसन्नचित्त, धीर तथा ममता और अहंकारसे रहित हैं, वे सब मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं। जो सर्वश्रेष्ठ परमात्माकी महिमाको जानता है, उसे पुण्यदायक उत्तम गति मिलती है
风神伐由说道:“世间凡真正具足智慧之人——离贪欲,胜忿怒,心意澄明安泰,坚忍不移,无所执取,亦无我慢——皆得解脱,证至至上之我(至尊自性)。又凡了知那至上主宰之威德光荣者,必得最为吉祥、具足功德的最高归趣。”
Verse 8
विमुक्ता: सर्व एवैते महत्त्वमुपयान्त्युत । आत्मनो महतो वेद य: पुण्यां गतिमुत्तमाम्,संसारमें जो कोई भी मनुष्य बुद्धिमान, सद्भाव-परायण, ध्यानी, नित्य योगी, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, ज्ञानवान् लोभहीन, क्रोधको जीतनेवाले, प्रसन्नचित्त, धीर तथा ममता और अहंकारसे रहित हैं, वे सब मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त होते हैं। जो सर्वश्रेष्ठ परमात्माकी महिमाको जानता है, उसे पुण्यदायक उत्तम गति मिलती है
风神伐由说道:“凡此等人,一旦脱离系缚,确实得至至上大威德。谁若真实了知大我(至尊主宰)之尊严与威势,便能抵达最高、具足功德的归趣。”
Verse 9
अहंकारात् प्रसूतानि महाभूतानि पञ्च वै । पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्व॒ पठचमम्,पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज--ये पाँचों महाभूत अहंकारसे उत्पन्न होते हैं
风神伐由说道:“五大(mahābhūta)确由我执(ahaṅkāra)而生——地、风、空、水,以及第五的火/光。由此可知,有身之世追溯其源,皆归于内在的‘造我’之理;是以当制伏傲慢,修习辨慧。”
Verse 10
तेषु भूतानि युज्यन्ते महा भूतेषु पजचसु । ते शब्दस्पर्शरूपेषु रसगन्धक्रियासु च,उन पाँचों महाभूतों तथा उनके कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदिसे सम्पूर्ण प्राणी युक्त हैं
风神伐由说道:“一切众生皆由彼五大所成;并且亦与诸大之作用相系——声、触、色、味、香,以及由此而起的种种活动。”
Verse 11
महाभूतविनाशान्ते प्रलये प्रत्युपस्थिते । सर्वप्राणभूतां धीरा महदुत्पद्यते भयम्
风神伐由说道:“当大毁灭之终、五大坏灭已尽,而劫末溶解(pralaya)临近之时,则于一切众生之中,即便最为坚忍者,亦会生起巨大的恐惧。”
Verse 12
विष्णुरेवादिसर्गेषु स्वयम्भूर्भवति प्रभु:,आदिसर्ममें सर्वसमर्थ स्वयम्भू विष्णु ही स्वयं अपनी इच्छासे प्रकट होते है। जो इस प्रकार बुद्धिरूपी गुहामें स्थित, विश्वरूप, पुराणपुरुष, हिरण्मय देव और ज्ञानियोंकी परम गतिरूप परम प्रभुको जानता है, वह बुद्धिमान् बुद्धिकी सीमाके पार पहुँच जाता है
风神伐由说道:“在最初的诸般创化之中,正是毗湿奴——至高的主宰——自显为自生者(svayambhū)。”此教诲昭示:至上者并非由任何外缘所造;唯凭自身意志,于创世之初显现。若有人了知那位至上之主——安住于智识之“窟”中为内在的统御者,具宇宙之形,乃太古之人(Purusha),金辉灿然(hiraṇmaya),亦为智者所趋之最高归宿——便能超越寻常智虑之界限,证得至高境地。
Verse 13
एवं हि यो वेद गुहाशयं प्रभु परं पुराणं पुरुष विश्वरूपम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान बुद्धिमतीत्य तिषछठति,आदिसर्ममें सर्वसमर्थ स्वयम्भू विष्णु ही स्वयं अपनी इच्छासे प्रकट होते है। जो इस प्रकार बुद्धिरूपी गुहामें स्थित, विश्वरूप, पुराणपुरुष, हिरण्मय देव और ज्ञानियोंकी परम गतिरूप परम प्रभुको जानता है, वह बुद्धिमान् बुद्धिकी सीमाके पार पहुँच जाता है
风神伐由说道:凡真实了知那位居于心之隐秘“窟”中的至上主者——超越一切、太古本初、具普遍形相之宇宙人(Purusha)——金辉灿然(hiraṇmaya),为智者所趋之最高归宿;此人便成真正的智者,立于寻常智虑之界外。此教诲以内证高于徒然推理:认得那自显而自足的主宰就在自身之内,便能越过心识算计的边界,抵达至善至高。
Verse 39
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें गुरु-शिष्य- संवादविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
至此,《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀迦篇之《阿努歌罗》部中,关于师徒对话的第三十九章告终。此结语(题记)宣示一段教诲性问答的圆满,旨在战乱震荡之后,奠定伦理行持与严整理解之根基。
Verse 40
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे चत्वारिंशो5ध्याय:
至此,《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀迦篇之《阿努歌罗》部中,师徒对话的第四十章告终。(此为章末题记,用以标示章终,并非所宣说的教义偈颂。)
Verse 113
स धीर: सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति । धैर्यशाली महर्षियो! जब पञ्चमहाभूतोंके विनाशके समय प्रलयकाल उपस्थित होता है, उस समय समस्त प्राणियोंको महान् भयका सामना करना पड़ता है। किंतु सम्पूर्ण लोगोंमें जो आत्मज्ञानी धीर पुरुष है, वह उस समय भी मोहित नहीं होता
风神伐由说道:坚忍自持之人,于任何世界都不陷于迷妄。当劫尽溶解之时到来——五大崩解、宇宙归于终末——一切众生皆为巨大恐惧所攫;然而真正明智而果决、了知真我者,即便在那一刻也不为迷乱所动。
The chapter targets pramoha (delusion/confusion) and presents knowledge of the Mahān and the indwelling, all-pervading puruṣa as the corrective that stabilizes discernment and conduct.
Understanding the Mahān as primordial intelligence and recognizing the puruṣa as immanent and universal supports a disciplined life—truthfulness, sense-control, non-attachment, and ego-reduction—framed as a superior path toward liberation-oriented clarity.
Yes in functional form: it states that the learned person who knows this principle does not fall into delusion, and that those embodying the described virtues ‘attain mahattva,’ implying an elevated spiritual state within a mokṣa-oriented framework.