Adhyaya 27
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 2727 Verses

Adhyaya 27

अन्तर्वन-विद्यारण्योपमा (The Allegory of the Inner Forest of Knowledge)

Upa-parva: Āśvamedhika-parva — Adhyāya 27 (Vidyāraṇya/Antaḥ-vana Allegory)

A brāhmaṇa declares he has crossed a dangerous path dominated by sense-objects and the antagonism of desire and anger, entering a ‘great forest’ characterized by afflictive forces (saṅkalpa as biting insects; lobha as serpentine predators; moha as darkness). Questioned about its location and features, he explains paradoxically that it is neither separate nor distant in ordinary terms, and that it exceeds ordinary measures of small/large, sorrow/joy. The discourse then enumerates symbolic structures: seven great trees, seven fruits/guṇas, seven guests, seven āśramas, seven samādhis, and seven dīkṣās—presenting a schematic of disciplined life and contemplative attainments. Multiple trees generate divine flowers and fruits of varying colors, culminating in an image of a single ‘fire’ and the five senses as fuel, from which ‘mokṣas’ are said to arise through dīkṣā and cultivated qualities. Seven seers receive hospitality; a ‘vow-tree’ with the shade of peace and a knowledge-support appears, illuminated by the inner knower (kṣetrajña). Those who reach this domain are described as free from fear; further sevens appear (women/mothers, Saptarṣis, seven lights following the sun), along with mountains and rivers bearing ‘brahma-born’ waters and a confluence leading the self-satisfied disciplined to Pitāmaha (Brahmā). The chapter closes by stating that knowers of the ‘forest of knowledge’ recite an ṛc and abide in what the kṣetrajña indicates—framing liberation as an inwardly verified orientation rather than external travel.

Chapter Arc: ब्राह्मण एक अद्भुत ‘महावन’ का संकेत देता है—जहाँ संकल्प डाँस-मच्छर हैं, शोक-हर्ष, हिम-आतप, मोह का अन्धकार और लोभ की व्याधियाँ सरीसृपों की भाँति रेंगती हैं; यह वन बाहर नहीं, भीतर है। → ब्राह्मणी जिज्ञासा से पूछती है—वह वन कहाँ है, उसके वृक्ष-सरिताएँ-गिरि कौन-से हैं, और वहाँ तक पहुँचने का पथ कितना कठिन है? उत्तर में ब्राह्मण बताता है कि विषयों का एकान्त-आध्वान, काम-क्रोध का विरोध, और ‘महादुर्ग’ को पार करना पड़ता है; साधक को भीतर उतरना होता है, जहाँ भ्रम और आसक्ति मार्ग रोकते हैं। → वन का तेजस्वी रहस्योद्घाटन—वहाँ ‘प्रज्ञा-वृक्ष’ हैं, ‘मोक्ष-फल’ लगते हैं, ‘शान्ति-छाया’ है; ज्ञान आश्रय है, तृप्ति जल है, और अन्तःक्षेत्र में ‘क्षेत्रज्ञ-सूर्य’ प्रकाशित है। उसी गूढ़ हृदयाकाश में नदियों का संगम संक्षेप से होता है; योग-यज्ञ का विस्तार चलता रहता है; और वही साक्षात् पितामह-स्वरूप की ओर ले जाने वाला मार्ग बनता है। → ब्राह्मण निष्कर्ष देता है कि जिनकी आशाएँ कृश हो गई हैं, जो सुव्रत हैं, तप से पाप-दग्ध हैं—वे आत्मा में आत्मा को प्रवेश कर ब्रह्मा/परब्रह्म की उपासना करते हैं। ऐसे गुणों वाला यह पुण्य ‘अरण्य’ ब्राह्मण जानते हैं; तत्त्वदर्शी (क्षेत्रज्ञ) के निर्देश से इसे जानकर आचरण करने पर साधक स्वात्मतृप्त होकर परम लक्ष्य—साक्षात् पितामह—की ओर गमन करता है।

Shlokas

Verse 1

/ है अर ० छा | अ-क्राछ सप्तविशो< ध्याय: अध्यात्मविषयक महान्‌ वनका वर्णन ब्राह्मण उवाच संकल्पदंशमशकं शोकहर्षहिमातपम्‌ । मोहान्धकारतिमिरं लोभव्याधिसरीसूपम्‌,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! जहाँ संकल्परूपी डाँस और मच्छरोंकी अधिकता होती है। शोक और हर्षरूपी गर्मी, सर्दीका कष्ट रहता है, मोहरूपी अन्धकार फैला हुआ है, लोभ तथा व्याधिरूपी सर्प विचरा करते हैं। जहाँ विषयोंका ही मार्ग है, जिसे अकेले ही तै करना पड़ता है तथा जहाँ काम और क्रोधरूपी शत्रु डेरा डाले रहते हैं, उस संसाररूपी दुर्गम पथका उल्लंघन करके अब मैं ब्रह्मरूपी महान्‌ वनमें प्रवेश कर चुका हूँ

婆罗门说道:“爱者啊,有一境界:躁动的意向如蚊虻成群;忧与喜的交替之苦,如寒与暑相逼;迷妄之暗如夜幕弥漫;贪欲与疾病如蛇般游走其间。越过那难以逾越的世间险途——此途须独自前行,而欲与嗔如仇敌扎营盘踞——如今我已入于梵之大林,进入那内在的灵性实境。”

Verse 2

विषयैकात्ययाध्वानं कामक्रोधविरोधकम्‌ | तदतीत्य महादुर्ग प्रविष्टोडस्मि महद्‌ वनम्‌,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! जहाँ संकल्परूपी डाँस और मच्छरोंकी अधिकता होती है। शोक और हर्षरूपी गर्मी, सर्दीका कष्ट रहता है, मोहरूपी अन्धकार फैला हुआ है, लोभ तथा व्याधिरूपी सर्प विचरा करते हैं। जहाँ विषयोंका ही मार्ग है, जिसे अकेले ही तै करना पड़ता है तथा जहाँ काम और क्रोधरूपी शत्रु डेरा डाले रहते हैं, उस संसाररूपी दुर्गम पथका उल्लंघन करके अब मैं ब्रह्मरूपी महान्‌ वनमें प्रवेश कर चुका हूँ

婆罗门说道:“我已越过那如堡垒般的巨大艰难——那条孤独之路只趋向诸欲境界,其上欲与嗔如仇敌盘踞相抗——如今我已进入广大无边的梵(Brahman)之林。”

Verse 3

ब्राह्मण्युवाच क्व तद्‌ वन महाप्राज्ञ के वृक्षा: सरितश्न॒ का: । गिरय: पर्वताश्चैव कियत्यध्वनि तद्‌ वनम्‌,ब्राह्मणीने पूछा--महाप्राज्ञ! वह वन कहाँ है? उसमें कौन-कौनसे वृक्ष, गिरि, पर्वत और नदियाँ हैं तथा वह कितनी दूरीपर है

婆罗门女说道:“大智者啊,那片森林在何处?其中有哪些树木?有哪些河流流淌?又有哪些山岳与峰峦?沿路而去,那森林有多远?”

Verse 4

ब्राह्मण उवाच नैतदस्ति पृथग्भाव: किंचिदन्‍्यत्‌ ततः सुखम्‌ | नैतदस्त्यपृथग्भाव: किंचिद्‌ दुःखतरं ततः,ब्राह्मणने कहा--प्रिये! उस वनमें न भेद है न अभेद, वह इन दोनोंसे अतीत है। वहाँ लौकिक सुख और दु:ख दोनोंका अभाव है

婆罗门说道:“在那里并无彼此分隔、分裂之相——也无有超出彼者的别样安乐;在那里亦无不分不二之相——也无有比彼更剧烈的苦。”其意在指向超越常见对待(差别与无差别)的境界,世间的乐与苦于彼不复适用。

Verse 5

तस्माद्‌ हस्वतरं नास्ति न ततो$स्ति महत्तरम्‌ | नास्ति तस्मात्‌ सूक्ष्मतरं नास्त्यन्यत्‌ तत्समं सुखम्‌,उससे अधिक छोटी, उससे अधिक बड़ी और उससे अधिक सूक्ष्म भी दूसरी कोई वस्तु नहीं है। उसके समान सुखरूप भी कोई नहीं है

婆罗门说道:“因此,没有任何事物比‘彼’更小,也没有任何事物比‘彼’更大;没有任何事物比‘彼’更微妙,也没有任何安乐能与‘彼’等同。”

Verse 6

न तत्राविश्य शोचन्ति न प्रहृष्यन्ति च द्विजा: । न च बिभ्यति केषांचित्‌ तेभ्यो बिभ्यति केचन,उस वनमें प्रवष्टि हो जानेपर द्विजातियोंको न हर्ष होता है, न शोक। न तो वे स्वयं किन्हीं प्राणियोंसे डरते हैं और न उन्हींसे दूसरे कोई प्राणी भय मानते हैं

进入那片森林之后,诸“二生者”既不忧伤,也不狂喜;他们不惧任何众生,众生亦不惧他们。

Verse 7

तस्मिन्‌ वने सप्त महाद्रुमाश्न फलानि सप्तातिथयश्न सप्त । सप्ताश्रमा: सप्त समाधयश्नव दीक्षाश्न सप्तैतदरण्यरूपम्‌,वहाँ सात बड़े-बड़े वृक्ष हैं, सात उन वृक्षोंके फल हैं तथा सात ही उन फलोंके भोक्ता अतिथि हैं। सात आश्रम हैं। वहाँ सात प्रकारकी समाधि और सात प्रकारकी दीक्षाएँ हैं। यही उस वनका स्वरूप है

婆罗门说道:“在那片森林中,有七株参天大树;树上有七种果实,又有七位宾客享用那些果实。那里还有七处隐修之所——并具七种禅定的入定法与七种受戒修持(dīkṣā)的仪轨。此即那荒林的本来面貌。”

Verse 8

पज्चवर्णानि दिव्यानि पुष्पाणि च फलानि च | सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्‌ वनम्‌,वहाँके वृक्ष पाँच प्रकारके रंगोंके दिव्य पुष्पों और फलोंकी सृष्टि करते हुए सब ओरसे वनको व्याप्त करके स्थित हैं

婆罗门说道:“在那里,群树遍布森林,四面充盈其间,不断生出五色各异的天妙花与果。”

Verse 9

सुवर्णानि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्‌ वनम्‌,वहाँ दूसरे वृक्षोंने सुन्दर दो रंगवाले पुष्प और फल उत्पन्न करते हुए उस वनको सब ओरसे व्याप्त कर रखा है

那里的树木遍布森林,四面充盈其间,生出金辉灿然、二色相间的花与果——此乃丰饶与吉祥之象,使全景笼罩于惊异与德化之光中。

Verse 10

सुरभीणि द्विवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्‌ वनम्‌,तीसरे वृक्ष वहाँ सुगन्धयुक्त दो रंगवाले पुष्प और फल प्रदान करते हुए उस वनको व्याप्त करके स्थित हैं

婆罗门说道:“在那里,群树遍满森林,四方铺展而立,不断生出二色芬芳之花,并结出果实。”

Verse 11

सुरभीण्येकवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च | सृजन्तः पादपास्तत्र व्याप्य तिष्ठन्ति तद्‌ वनम्‌,चौथे वृक्ष सुगन्धयुक्त केवल एक रंगवाले पुष्प और फलोंकी सृष्टि करते हुए उस वनके सब ओर फैले हैं

在那里,群树遍布森林,不断生出同一色泽的芬芳花与果。此景呈现出一种静穆而有序的丰饶——自然的恒常与清净,恰与人世的躁动与争斗形成道义上的对照。

Verse 12

बहुन्यव्यक्तवर्णानि पुष्पाणि च फलानि च । विसृजन्तौ महावृक्षौ तद्‌ वन॑ व्याप्य तिषछत:,वहाँ दो महावृक्ष बहुत-से अव्यक्त रंगवाले पुष्प और फलोंकी रचना करते हुए उस वनको व्याप्त करके स्थित हैं

婆罗门说道:“那里有两株大树巍然而立,蔓延遍布、充满那片森林,不断生出无数花与果,其色泽幽昧难辨。”

Verse 13

एको वह्ि: सुमना ब्राह्मणोउत्र पज्चेन्द्रियाणि समिथधश्चात्र सन्ति । तेभ्यो मोक्षा: सप्त फलन्ति दीक्षा गुणा: फलान्यतिथय: फलाशा:,उस वनमें एक ही अग्नि है, जीव शुद्धचेता ब्राह्मण है, पाँच इन्द्रियाँ समिधाएँ हैं। उनसे जो मोक्ष प्राप्त होता है, वह सात प्रकारका है। इस यज्ञकी दीक्षाका फल अवश्य होता है। गुण ही फल है। सात अतिथि ही फलोंके भोक्ता हैं

婆罗门说道:“此林之中唯有一火;怀清净意的有情之我,即是婆罗门。五根诸识,乃投于此火的薪柴。由此内在之祭,生起七种解脱。此祭之受戒(灌顶)从不虚设:德行本身即为其果,而七位‘宾客’乃是享受这些果报者。”

Verse 14

आतिथयं प्रतिगृह्नन्ति तत्र तत्र महर्षय: । अचितेषु प्रलीनेषु तेष्वन्यद्‌ रोचते वनम्‌,वे महर्षिगण इस यज्ञमें आतिथ्य ग्रहण करते हैं और पूजा स्वीकार करते ही उनका लय हो जाता है। तत्पश्चात्‌ वह ब्रह्मरूप वन विलक्षणरूपसे प्रकाशित होता है

大圣仙时而在此、时而在彼显现,受纳所献的款待与敬礼。当那些不可觉知的圣者复又融入无形之中时,森林便以另一种奇妙的相貌辉耀起来,仿佛显露出更为微妙、近乎梵(brahman)性的光明。

Verse 15

प्रज्ञावृक्षं मोक्षफलं शान्तिच्छायासमन्वितम्‌ । ज्ञानाश्रयं तृप्तितोयमन्तःक्षेत्रज्रभास्करम्‌,उसमें प्रज्ञारूपी वृक्ष शोभा पाते हैं, मोक्षरूपी फल लगते हैं और शान्तिमयी छाया फैली रहती है। ज्ञान वहाँका आश्रयस्थान और तृप्ति जल है। उस वनके भीतर आत्मारूपी सूर्यका प्रकाश छाया रहता है

婆罗门说道:“有一处奇妙的内在林苑:其树为智慧,其果为解脱,清凉的寂静之荫遍覆其上。知识为其依止,知足为其甘水;而其中有‘知田者’(自我、我灵)之日照耀,从内而外照明一切。”

Verse 16

येडथिगच्छन्ति तं सन्तस्तेषां नास्ति भयं पुनः । ऊर्ध्व॑ चाधश्व तिर्यक्‌ च तस्य नान्तोडथिगम्यते,जो श्रेष्ठ पुछणष उस वनका आश्रय लेते हैं, उन्हें फिर कभी भय नहीं होता। वह वन ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर सब ओर व्याप्त है। उसका कहीं भी अन्त नहीं है

婆罗门说道:“凡善良而有智慧者,若得至并归依于‘彼’(至上实相),便不再为恐惧所攫。它遍满上与下、横与竖、四方八面;其终际无处可达,亦无处可知。”

Verse 17

सप्त स्त्रियस्तत्र वसन्ति सद्य- स्त्ववाड्मुखा भानुमत्यो जनित्रय: । ऊर्ध्व रसानाददते प्रजाभ्य: सर्वान्‌ यथा सत्यमनित्यता च,वहाँ सात स्त्रियाँ निवास करती हैं, जो लज्जाके मारे अपना मुँह नीचेकी ओर किये रहती हैं। वे चिन्मय ज्योतिसे प्रकाशित होती हैं। वे सबकी जननी हैं और वे उस वनमें रहनेवाली प्रजासे सब प्रकारके उत्तम रस उसी प्रकार ग्रहण करती हैं, जैसे अनित्यता सत्यको ग्रहण करती है

婆罗门说道:“那里住着七位女子,常因羞怯而垂首低面。她们以觉知之光而辉耀,是一切众生之母。她们从居于那片‘森林’的诸有情之中汲取一切最上妙精华——正如无常以其自身的方式攫取真实。”

Verse 18

तत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनस्तत्रोपयन्ति च | सप्त सप्तर्षय: सिद्धा वसिष्ठप्रमुखै:ः सह,सात सिद्ध सप्तर्षि वसिष्ठ आदिके साथ उसी वनमें लीन होते और उसीसे उत्पन्न होते हैं

他们就在那里安住;又复归于那同一处。以婆悉吒为首的七位成就仙人——七仙(Saptarṣi)——据说融入那片森林,又从其中再度显现,昭示此为一处圣域:证悟者在此循环地隐没与复出。

Verse 19

यशो वर्चो भगश्चैव विजय: सिद्धतेजस: । एवमेवानुवर्तन्ते सप्त ज्योतींषि भास्करम्‌,यश, प्रभा, भग (ऐश्वर्य), विजय, सिद्धि (ओज) और तेज--ये सात ज्योतियाँ उपर्युक्त आत्मारूपी सूर्यका ही अनुसरण करती हैं

婆罗门说道:“名声、灵性光辉、富饶与主宰之福、胜利、成就、以及圆满的精进之力——这七种光明随日而行。同样,这些德相并非独立的占有;它们依附于内在真实的自我,如同光线依附太阳;当人与那自我相应时,便自然显现。”

Verse 20

गिरय: पर्वताश्षैव सन्ति तत्र समासत: । नद्यश्न सरितो वारि वहन्त्यो ब्रह्म॒ुसम्भवम्‌,उस ब्रद्मतत्त्वमें ही गिरि, पर्वत, झरनें, नदी और सरिताएँ स्थित हैं, जो ब्रह्म णनित जल बहाया करती हैं

婆罗门说道:“在那里,略而言之,有群山与峻峰;江河溪流不断流淌,载着从梵(Brahman)而生的水。”此言将景观置于神圣而具教化之意:自然不只是地理形貌,而是根植于终极原理的显现,召唤人们对一切滋养生命之物怀敬畏、守节制、持清净。

Verse 21

नदियोंका संगम भी उसीके अत्यन्त गूढ़ हृदयाकाशमें संक्षेपसे होता है। जहाँ योगरूपी यज्ञका विस्तार होता रहता है। वही साक्षात्‌ पितामहका स्वरूप है। आत्मज्ञानसे तृप्त पुरुष उसीको प्राप्त होते हैं

诸河之汇合,也被简要地摄入那心中极深的内在虚空之内。于彼处,名为瑜伽的祭献不断在其广大之境中展开。那一真实无他,正是祖父神(梵天 Brahmā)的显现之形。以自我之智而得满足者,唯证得此而已。

Verse 22

कृशाशा: सुव्रताशाश्च॒ तपसा दग्धकिल्बिषा: । आत्मन्यात्मानमाविश्य ब्रह्माणं समुपासते,जिनकी आशा क्षीण हो गयी है, जो उत्तम व्रतके पालनकी इच्छा रखते हैं। तपस्यासे जिनके सारे पाप दग्ध हो गये हैं। वे ही पुरुष अपनी बुद्धिको आत्मनिष्ठ करके परब्रह्मकी उपासना करते हैं

凡世间希求已枯竭者,愿守持清净善誓者,诸罪为苦行之火所焚尽者——如是之人,回心内照,使我住于我中,奉敬至上梵(Brahman)。

Verse 23

शममप्यत्र शंसन्ति विद्यारण्यविदो जना: । तदारण्यमभिप्रेत्य यथाधीरभिजायत,विद्या (ज्ञान)-के ही प्रभावसे ब्रह्मरूपी वनका स्वरूप समझमें आता है। इस बातको जाननेवाले मनुष्य इस वनमें प्रवेश करनेके उद्देश्यसे शम (मनोनिग्रह)-की ही प्रशंसा करते हैं, जिससे बुद्धि स्थिर होती है

在此,真正通达“知识之林”的人,也称赞“奢摩”(śama,调心制意)。为求进入那内在之林,当修习奢摩;由此,慧解得以安住而坚固。

Verse 24

एतदेवेदृशं पुण्यमरण्यं ब्राह्मणा विदु: । विदित्वा चानुतिष्ठ त्ति क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिता,ब्राह्मण ऐसे गुणवाले इस पवित्र वनको जानते हैं और तत्त्वदर्शीके उपदेशसे प्रबुद्ध हुए आत्मज्ञानी पुरुष उस ब्रह्मवनको शास्त्रतटः जानकर शम आदि साधनोंके अनुष्ठानमें लग जाते हैं

婆罗门知此森林——如其本然——为圣洁福德之林。既已了悟,又蒙“知田者”(kṣetrajña,即自我)示现真谛者,便投身于有纪律的修行,实行内在的调伏及诸相应的道品。

Verse 26

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

至此,《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀迦篇之《阿努吉塔》部中,以“婆罗门之歌”为题的第二十六章终。

Verse 27

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु सप्तविंशोडध्याय:

如是,在《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀迦篇、《阿努吉塔》部之“婆罗门诸歌”(Brāhmaṇa-gītā)中,第二十七章终。

Verse 231

नदीनां सड़मश्नैव वैताने समुपद्लरे । स्वात्मतृप्ता यतो यान्ति साक्षादेव पितामहम्‌

婆罗门说道:“在祭祀仪轨中,他们享用萨达(saḍa)供献;并且在自我之中获得内在的满足后,他们便从那里径直前往毗多摩诃(Pitāmaha)本身——直接抵达。”

Frequently Asked Questions

The speaker frames a practical ethical conflict: how to traverse a life dominated by sensory fixation (viṣaya) while countering the destabilizing forces of desire and anger without being consumed by grief, elation, or fear.

The ‘forest’ signifies the inner field of experience: suffering and safety depend on identification and clarity. Knowledge (jñāna) and recognition of the inner knower (kṣetrajña) reorganize perception, making fearlessness a function of insight and discipline.

Yes. Mokṣa is presented as emerging from disciplined engagement with the senses (five as ‘fuel’) under a unifying inner principle (single ‘fire’), supported by structured practices and qualities (the repeated sapta schema), rather than as a merely external achievement.