Adhyaya 2
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 222 Verses

Adhyaya 2

Yudhiṣṭhira’s Grief, Kṛṣṇa’s Consolation, and Vyāsa’s Admonition (युधिष्ठिरशोक-निवारणोपदेशः)

Upa-parva: Āśvamedhika-parva (Early Consolation and Counsel Unit)

Vaiśaṃpāyana reports that after Dhṛtarāṣṭra addresses the situation, a learned figure remains silent, whereupon Kṛṣṇa (Keśava/Govinda) speaks to Yudhiṣṭhira. Kṛṣṇa diagnoses grief as mentally corrosive and socially consequential, extending even to the memory of forebears; he recommends ritual action—multiple yajñas with proper gifts, offerings to devas with soma, and to pitṛs with svadhā—thereby converting sorrow into sanctioned duty. He further argues that Yudhiṣṭhira, already instructed in rājadharma by Bhīṣma, Vyāsa, Nārada, and Vidura, should not adopt the conduct of the deluded, but carry the inherited burden of kingship. Kṛṣṇa frames the warrior’s path as consistent with honor and a non-retreating ethic, and urges acceptance of inevitability: the slain cannot be restored. Yudhiṣṭhira responds with gratitude yet confesses the absence of peace after causing the deaths of elders and peers, requesting a purifying course of action. Vyāsa then admonishes him for relapsing into confusion despite prior instruction in kṣatra-dharma, mokṣa-dharma, prāyaścitta, dāna, and the broader śāstric corpus, urging intellectual steadiness and rejection of unworthy ignorance.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र के प्रश्न/वचन के बाद सभा में मौन और भारी शोक उतर आता है; युद्ध-उत्तर का धुआँ अभी भी युधिष्ठिर के मन में जल रहा है। → युधिष्ठिर अपने ही कर्मों का लेखा खोलते हैं—भीष्म, कर्ण जैसे महावीरों के पतन का भार उन्हें ‘शान्ति’ नहीं लेने देता। वे बार-बार आत्मग्लानि में लौटते हैं और अपने क्षत्रधर्म को ही दोषी ठहराने लगते हैं। → कृष्ण (और व्यास की वाणी/समर्थन) युधिष्ठिर को तीखे, धर्म-आधारित उपदेश से झकझोरते हैं—‘तुम सर्वधर्मज्ञ होकर भी अज्ञानवश क्यों मोह में पड़ते हो?’ वे बताते हैं कि मृतकों के लिए अति-शोक पितरों को भी संतप्त करता है, और प्रायश्चित्त/राजधर्म/दानधर्म के मार्ग विदित होते हुए भी इस प्रकार विलाप अनुचित है। → युधिष्ठिर को शोक से बाहर निकालने हेतु कर्म-मार्ग सुझाया जाता है—विविध यज्ञ, सोम से देव-तर्पण और स्वधा से पितृ-तर्पण; राजधर्म के अनुसार दान-धर्म और प्रायश्चित्त का आचरण। कृष्ण के प्रति कृतज्ञता भी प्रकट होती है, और मन को स्थिर करने की दिशा बनती है। → युधिष्ठिर तपोवन जाने/वैराग्य की अनुमति माँगने की ओर झुकते दिखते हैं—क्या वे राज्य-भार छोड़ेंगे या यज्ञ-मार्ग से राजधर्म में लौटेंगे?

Shlokas

Verse 1

अपना छा | अत-४-#क+ द्वितीयो<ध्याय: श्रीकृष्ण और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाना वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता । तूष्णीं बभूव मेधावी तमुवाचाथ केशव:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! बुद्धिमान्‌ राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर भी मेधावी युधिष्ठिर चुप ही रहे। तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--

毗舍波耶那说:睿智的国王持国说罢此言,聪慧的坚战仍默然无语。于是凯沙瓦(圣克里希纳)开口劝谕他——意在表明:在哀痛所致的沉默之后,当有立足于达摩与明澈之理的训诲随之而来。

Verse 2

अतीव मनसा शोक: क्रियमाणो जनाधिप । संतापयति चैतस्य पूर्वप्रेतानू पितामहान्‌,'जनेश्वर! यदि मनुष्य मरे हुए प्राणीके लिये अपने मनमें अधिक शोक करता है तो उसका वह शोक उसके पहलेके मरे हुए पितामहोंको भारी संतापमें डाल देता है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि द्वितीयो5ध्याय:

毗舍波耶那说:人中之主啊,若有人在心中对亡者纵情过度哀恸,那么这哀恸本身便会使其先逝的祖先陷入沉重的煎熬。此偈将哀悼视为一种具有伦理后果的行为,其影响超越个人、及于祖系,因此劝人节制悲伤、安住其心。

Verse 3

यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बहुभि: स्वाप्तदक्षिणै: । देवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितृनपि,“इसलिये आप बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये और सोमरसके द्वारा देवताओं तथा स्वधाद्वारा पितरोंको तृप्त कीजिये

毗舍ṃ波耶那说:“因此,当以多种祭祀、屡屡举行,并以相称的祭资与厚赐具足其礼。以苏摩使诸天满足;以‘斯瓦达’之供使祖灵亦得满足。”此劝诫以互报之责为王道之基:以周备的仪式与慷慨的施与,奉敬神明与祖先。

Verse 4

अतिथीनन्नपानेन कामैरन्यैरकिंचनान्‌ | विदितं वेदितव्यं ते कर्तव्यमपि ते कृतम्‌,“अतिथियोंको अन्न और जल देकर तथा अकिंचन मनुष्योंको दूसरी-दूसरी मनचाही वस्तुएँ देकर संतुष्ट कीजिये। आपने जाननेयोग्य तत्त्वको जान लिया है। करनेयोग्य कार्यको भी पूर्ण कर लिया है

“以饮食与清水款待宾客,使之满足;又以种种所需之物随其所愿,抚慰那一无所有的贫者(akincana)。当知之理,你已尽知;当行之事,你亦已成办。”

Verse 5

श्रुताश्ष॒ राजधर्मास्ति भीष्माद्‌ भागीरथीसुतात्‌ । कृष्णद्वैपायनाच्चैव नारदाद्‌ विदुरात्‌ तथा,“आपने गंगानन्दन भीष्मसे राजधर्मोका वर्णन सुना है। श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और विदुरजीसे कर्तव्यका उपदेश श्रवण किया है

“你已从毗湿摩——婆伽罗提(恒河)之子——那里听闻王法(rājadharma)的阐述;同样,你也从黑天·岛生者毗耶娑、从天仙那罗陀,以及从毗度罗那里,聆受了关于本分与正行的教诲。”

Verse 6

नेमामह्सि मूढानां वृत्तिं त्वमनुवर्तितुम्‌ । पितृपैतामहं वृत्तमास्थाय धुरमुद्गह,अतः आपको मूढ़ पुरुषोंके इस बर्तावका अनुसरण नहीं करना चाहिये। पिता- पितामहोंके बर्तावका आश्रय लेकर राजकार्यका भार सँभालिये

你不应追随愚人迷妄的行径。应当依止父王与列祖列宗所传承的正道,担起王权之重,履行治国之责。

Verse 7

युक्त हि यशसाक्षात्रं स्वर्ग प्राप्तुमसंशयम्‌ | न हि वच्रिद्धि शूराणां निहतो5त्र पराड्मुख:,“इस युद्धमें वीरोचित सुयशसे युक्त हुआ सारा क्षत्रियसमुदाय स्वर्गलोक पानेका अधिकारी है, क्‍योंकि इन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्धमें पीठ दिखाकर नहीं मारा गया है

在此战中,具足武人荣名的一切刹帝利众,无疑皆有资格升入天界;因为这些勇士之中,没有一人是在战场上背向敌人而被杀的。

Verse 8

त्यज शोकं॑ महाराज भवितव्यं हि तत्तथा । न शकक्‍्यास्ते पुनर्द्रष्ठं त्वया ये5स्मिन्‌ रणे हता:,“महाराज! शोक त्याग दीजिये, क्योंकि जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी। इस युद्धमें जो लोग मारे गये हैं, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते'

毗舍摩耶那说道:“大王啊,且放下悲恸吧;所发生的一切,本就命定如此。那些在此战中被你所杀的人,你再也不能见到了。”

Verse 9

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ,एतावदुक्‍त्वा गोविन्दो धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ । विरराम महातेजास्तमुवाच युधिष्िर: धर्मराज युधिष्ठिस्से ऐसा कहकर महातेजस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब युधिष्ठिरने उनसे कहा

如是,《圣摩诃婆罗多》之阿湿婆梅陀迦篇中,阿湿婆梅陀篇第一章至此圆满。戈文达对奉持法义的尤提施提罗只说了这些,便以大威德之光默然止语。于是尤提施提罗开口对他说道。

Verse 10

युधिछिर उवाच गोविन्द मयि या प्रीतिस्तव सा विदिता मम । सौहृदेन तथा प्रेम्णा सदा मय्यनुकम्पसे,युधिष्ठिर बोले--गोविन्द! आपका जो मेरे ऊपर प्रेम है, वह मुझे अच्छी तरह ज्ञात है। आप स्नेह और सौहार्दवश सदा ही मुझपर कृपा करते रहते हैं

尤提施提罗说道:“戈文达啊,你对我的慈爱,我深知无疑。出于友谊与深情,你总是不断怜悯护念于我。”

Verse 11

प्रियं तु मे स्थात्‌ सुमहत्कृतं चक्रगदाधर । श्रीमन्‌ प्रीतेन मनसा सर्व यादवनन्दन

尤提士提罗说道:“噢,执轮与持杵者!你所行之事,于我极其可爱,且大有裨益。噢,光辉的尊者,噢,雅陀婆族之欢悦——愿你以欢喜而慈和之心,受纳这一切。”

Verse 12

न हि शान्तिं प्रपश्यामि पातयित्वा पितामहम्‌

尤提士提罗说道:“在我击倒那位祖父之后,我看不见自己还能得到怎样的安宁。”在这哀叹中,他以达摩与良知衡量胜利,觉得毗湿摩——受人敬仰的长者与道德之柱——的倒下,使胜利蒙上悲恸与伦理不安的阴影。

Verse 13

कर्मणा येन मुच्येयमस्मात्‌ क्रूरादरिंदम

尤提士提罗说道:“凭借何种行为,我才能从这残酷的重负中解脱——噢,降伏仇敌者?”

Verse 14

कर्मणा तद्‌ विधत्स्वेह येन शुध्यति मे मन: । शत्रुदमन श्रीकृष्ण! अब जिस कर्मके द्वारा मुझे अपने इस क्रूरतापूर्ण पापसे छुटकारा मिले तथा जिससे मेरा चित्त शुद्ध हो, वही कीजिये || १३ $ ।। तमेवं वादिनं पार्थ व्यास: प्रोवाच धर्मवित्‌,कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले महातेजस्वी व्यासजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ एवं सार्थक वचन कहा--“तात! तुम्हारी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई है। तुम पुनः बालकोचित अविवेकके कारण मोहमें पड़ गये

尤提士提罗说道:“就在此时此地,请为我制定那能净化我心的行为。噢,室利·奎师那,降伏仇敌者——请施行那件事,使我得以从这残酷的罪业中解脱,并使我内心澄净。” 他如此言说时,通晓达摩的毗耶娑对普利塔之子开口。见昆蒂之子尤提士提罗这般言语,光辉的毗耶娑安慰他,宣说吉祥而切要之言:“孩子,你的理解尚未净化;你又因孩童般缺乏辨别而坠入迷妄……”

Verse 15

सान्त्वयन्‌ सुमहातेजा: शुभं वचनमर्थवत्‌ | अकृता ते मतिस्तात पुनर्बालयेन मुहाुसे,कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको ऐसी बातें करते देख धर्मके तत्त्वको जाननेवाले महातेजस्वी व्यासजीने उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ एवं सार्थक वचन कहा--“तात! तुम्हारी बुद्धि अभी शुद्ध नहीं हुई है। तुम पुनः बालकोचित अविवेकके कारण मोहमें पड़ गये

毗耶娑以安慰之意,伟力炽盛,宣说吉祥而切要之言:“孩子,你的理解尚未澄明;你又因孩童般缺乏辨别而坠入迷妄。”于是,见昆蒂之子尤提士提罗如此言说,毗耶娑——通达达摩真义者——开口劝诫,以定其心,复其正见。

Verse 16

किमाकारा वयं तात प्रलपामो मुहुर्मुहुः । विदिता: क्षत्रधर्मस्ति येषां युद्धेन जीविका,“तात! अब हमलोग किस लायक रह गये। हम बारंबार जो कुछ कहते या समझाते हैं वह सब व्यर्थका प्रलाप सिद्ध हो रहा है। युद्धसे ही जिनकी जीविका चलती है, उन क्षत्रियोंके धर्म भलीभाँति तुम्हें विदित हैं

尤提士提罗说道:“亲爱的啊,如今我们成了什么模样?我们一遍又一遍地开口,终究只化作空谈。你早已深知刹帝利之法——那些以战争为生计之人的法度。”

Verse 17

तथाप्रवृत्तो नृपतिर्नाधिबन्धेन युज्यसे । मोक्षधर्माश्न निखिला याथातथ्येन ते श्रुता:,“उनके अनुसार बर्ताव करनेवाला राजा कभी मानसिक चिन्तासे ग्रस्त नहीं होता। तुमने सम्पूर्ण मोक्षधर्मोंको भी यथार्थरूपसे सुना है

尤提士提罗说道:“君王若如此行事,便不为心中忧苦所缚。你也已按其真实旨趣,听闻了全部关于解脱的教法(mokṣa-dharma)。”

Verse 18

(यथा वै कामजां मायां परित्यक्तुं त्वमहसि । तथा तु कुर्वन्‌ नृपतिननिबन्धेन युज्यते ।।) तुम्हें कामजनित मायाका जिस प्रकार परित्याग करना चाहिये, उस प्रकार उसका त्याग करनेवाला नरेश कभी बन्धनमें नहीं पड़ता ।। असकृच्चापि संदेहाश्छिन्नास्ते कामजा मया । अभश्रद्दधानो दुर्मेधा लुप्तस्मृतिरसि ध्रुवम्‌,“मैंने अनेक बार तुम्हारे कामजनित संदेहोंका निवारण किया है; परंतु तुम दुर्बद्धि होनेके कारण उसपर श्रद्धा नहीं करते। निश्चय इसीलिये तुम्हारी स्मरणशक्ति लुप्त हो गयी है

尤提士提罗说道:“正如你应当舍弃由欲望生起的幻相,同样,君王若如此行事——弃绝由贪欲所生的迷妄——便不致受缚。我一次又一次斩断你那些由渴求而起的疑惑;然而你缺乏信受,见解昏乱,终不肯领纳。想必因此,你的记忆与辨识已被遮蔽。”

Verse 19

मैवं भव न ते युक्तमिदमज्ञानमीदृशम्‌ । प्रायश्षित्तानि सर्वाणि विदितानि च तेडनघ । राजधर्मश्न ते सर्वे दानधर्माश्च ते श्रुता:,“तुम ऐसे न बनो, तुम्हारे लिये इस तरह अज्ञानका अवलम्बन उचित नहीं है। निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके प्रायश्चित्तोंका भी ज्ञान है। तुमने सब प्रकारके राजधर्म और दानधर्म भी सुने हैं

尤提士提罗说道:“不要如此。你不该依凭这般无明。无垢之王啊,你早已知晓一切赎罪之法;也已听闻并习得诸般王法与布施之法。因此,莫要言行得仿佛不知法度一般。”

Verse 20

स कथं सर्वधर्मज्ञ: सर्वागमविशारद: । परिमुहा[सि भूयस्त्वमज्ञानादिव भारत,“भारत! इस प्रकार सब धर्मोके ज्ञाता और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विद्वान होकर भी तुम अज्ञानवश बारंबार मोहमें क्यों पड़ते हो?”

尤提士提罗说道:“噢,婆罗多啊,你既通晓一切法度,又精熟诸般圣教,为何仍因无明一般,一次又一次坠入迷妄?”

Verse 116

यदि मामनुजानीयाद भवान्‌ गन्तुं तपोवनम्‌ | (कृतकृत्यो भविष्यामि इति मे निश्चिता मतिः ।) चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीमान्‌ यादवनन्दन! यदि आप प्रसन्न मनसे मुझे तपोवनमें जानेकी आज्ञा दे दें तो मेरा सारा और महान प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय। उस दशामें मैं कृतकार्य हो जाऊँगा, यह मेरा निश्चित विचार है

尤提士提罗说道:“若你准许我前往苦行之林,我便认为此生之旨已得圆满——此乃我既定之信念。噢,光耀的夜度之子,执神轮与钉锤者!若你怀欢悦之心,允我辞去而往仙修之苑,则我最宏大、最珍爱的愿望便告成就;届时,我将成为‘已尽其所当尽’之人。”

Verse 126

(नृशंस: पुरुषव्याप्रं गुरु वीर्यबलान्वितम्‌ ।) कर्ण च पुरुषव्याप्रं संग्रामेष्वपलायिनम्‌ । मैं क्रूरतापूर्वक पितामह भीष्मको, बल-पराक्रमसे सम्पन्न पुरुषसिंह गुरुदेव द्रोणाचार्यको और युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको मरवाकर कभी शान्ति नहीं पा सकता

尤提士提罗说道:“我使毗湿摩祖父陨落,又使德罗那——我所敬奉的师长、众人之狮、具足威力与强劲者——以及从不背离战阵的至上男子迦尔纳战死;在如此残酷之举之后,我决不能获得安宁。”

Frequently Asked Questions

He experiences moral distress and lack of inner peace after being causally implicated in the deaths of revered elders and renowned fighters, leading him to consider renunciation (going to the forest) rather than continuing kingship.

Transform grief into disciplined duty: honor devas and ancestors through sanctioned rites and gifts, accept inevitability without paralysis, and uphold inherited rājadharma rather than adopting conduct deemed socially and intellectually unfit.

No explicit phalaśruti formula appears here; the chapter’s meta-function is practical and doctrinal—re-situating personal anguish within dharma, ritual obligation, and the continuity of instruction already received.