Kailāsa-darśana, Badarī-vāsa, and Sarasvatī–Dvaitavana Transition (कैलासदर्शन–बदरीवास–सरस्वतीद्वैतवनगमनम्)
सर्वकामगुणोपेतं वीतशोकमनामयम् ब्रह्मणा भरतश्रेष्ठ कालकेयकृते कृतम्,राजेन्द्र! उन दोनोंने यह भी प्रार्थना की कि “हमारे पुत्र देवता, राक्षस तथा नागोंके लिये भी अवध्य हों। इनके रहनेके लिये एक सुन्दर नगर होना चाहिये, जो अपने महान प्रभा- पुज्जसे जगमगा रहा हो। वह नगर विमानकी भाँति आकाशमें विचरनेवाला होना चाहिये, उसमें सब प्रकारके रत्नोंका संचय रहना चाहिये, देवता, महर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, असुर तथा राक्षस कोई भी उसका विध्वंस न कर सके। वह नगर समस्त मनोवाजञ्छित गुणोंसे सम्पन्न, शोकशून्य तथा रोग आदिसे रहित होना चाहिये।” भरतश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने कालकेयोंके लिये वैसे ही नगरका निर्माण किया था। यह वही आकाशचारी दिव्य नगर है, जो सर्वत्र विचरता है। इसमें देवताओंका प्रवेश नहीं है। वीरवर! इसमें पौलोम और कालकंज नामक दानव ही निवास करते हैं
arjuna uvāca | sarvakāma-guṇopetaṁ vītaśokam anāmayam | brahmaṇā bharataśreṣṭha kālakeya-kṛte kṛtam |
อรชุนกล่าวว่า “โอ้ผู้ประเสริฐแห่งภารตะ! พระพรหมได้เนรมิตนครให้พวกกาลเกยะ เป็นนครที่เพียบพร้อมด้วยคุณอันพึงปรารถนาทุกประการ ปราศจากโศก และไม่ถูกโรคภัยแตะต้อง. เพื่อสนองคำขอของพวกเขา นครนั้นจึงเป็นที่มั่นซึ่งแม้เหล่าเทวะก็ยากจะตีแตก และมหาฤๅษี ยักษ์ คนธรรพ์ นาค อสูร และรากษส ก็ไม่อาจทำลายได้; นครนั้นส่องประกายเป็นพวงรัศมีใหญ่ เคลื่อนในเวหาดุจวิมาน และอุดมด้วยทรัพย์รัตนะทั้งปวง. นี่เองคือนครทิพย์ผู้ท่องเวหา เที่ยวไปทั่วทุกทิศ; เหล่าเทวะไม่มีสิทธิ์เข้าสู่ที่นั่น; และมีทานพชื่อเปาลোমะกับกาลกาญชะพำนักอยู่.”
अजुन उवाच