Dhanañjaya-viraha-śoka and the Resolve to Enter Gandhamādana (धनंजय-विरह-शोकः गन्धमादन-प्रवेश-संकल्पश्च)
मक्षिकादंशमशकानू् सिंहान् व्याप्रान् सरीसूपान् | प्राप्रोत्यनियत: पार्थ नियतस्तान् न पश्यति,भीमसेन! जो अपने मन और इन्द्रियोंपर संयम नहीं रखता, ऐसे मनुष्यको वहाँ जानेपर मक्खी, डाँस, मच्छर, सिंह, व्याप्र और सर्पोका सामना करना पड़ता है, परंतु जो संयम- नियमसे रहनेवाला है, उसे उन जन्तुओंका दर्शनतक नहीं होता
makṣikādaṃśamaśakān siṃhān vyāghrān sarīsṛpān | prāpnoty aniyataḥ pārtha niyatas tān na paśyati bhīmasena ||
โอ ปารถะ! ผู้ไร้วินัยเมื่อไปที่นั่นย่อมประสบแมลงวัน เหลือบ ยุง สิงโต เสือ และงูเลื้อยคลานทั้งหลาย; แต่ผู้สำรวมอยู่ในระเบียบวินัย ย่อมไม่เห็นสัตว์เหล่านั้นแม้แต่เงา
युधिछिर उवाच