Adhyaya 5
Sauptika ParvaAdhyaya 541 Versesयुद्ध समाप्ति के बाद का चरण; कौरव-पक्ष के शेष योद्धा प्रतिशोध हेतु रात्रि में पाण्डव-पांचाल शिविर की ओर बढ़ते हैं।

Adhyaya 5

Chapter Arc: रात्रि के सन्नाटे में कृपाचार्य अश्वत्थामा को विनय और धर्मार्थ-विवेक का उपदेश देते हैं—कि केवल शौर्य या विद्या नहीं, संयम ही मनुष्य को धर्म-निर्णय तक ले जाता है। → अश्वत्थामा के भीतर अपमान, शोक और प्रतिशोध की आग भड़कती है। वह युद्ध के अन्यायपूर्ण वधों का स्मरण कराता है—भूरिश्रवा का युयुधान द्वारा गिराया जाना, और विशेषतः अपने पिता द्रोण का धृष्टद्युम्न द्वारा शस्त्र-त्याग की अवस्था में वध। कृप की नीति-भाषा और अश्वत्थामा की प्रतिहिंसा-प्रतिज्ञा टकराती रहती है। → अश्वत्थामा निर्णायक स्वर में कृप और कृतवर्मा को आदेश देता है कि वे शीघ्र कवच धारण कर, खड्ग-धनुष लेकर उसके साथ चलें—और तीनों एक साथ पाण्डव-पांचाल शिविर की ओर प्रस्थान करते हैं, यज्ञाग्नि की तरह प्रज्वलित। → तीनों महारथी शत्रु-शिविर के द्वार-प्रदेश तक पहुँचते हैं; भीतर जन-समुदाय निद्रा में डूबा है। अश्वत्थामा द्वार पर ठहरकर अवसर और प्रवेश का उपाय देखता है—अब वध का क्षण निकट है। → सुप्त शिविर के द्वार पर खड़ा द्रोणपुत्र—क्या वह धर्म-सीमा लाँघकर रात्रि-वध करेगा, और कौन उसे रोकेगा?

Shlokas

Verse 1

अपन क्ाता छा अर: पञठ्चमो<ध्याय: अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान कृप उवाच शुश्रूषुरपि दुर्मेधा: पुरुषो5नियतेन्द्रिय: । नालं॑ वेदयितुं कृत्स्नौ धर्मार्थाविति मे मति:,कृपाचार्य बोले--अश्व॒त्थामन्‌! मेरा विचार है कि जिस मनुष्यकी बुद्धि दुर्भावनासे युक्त है तथा जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें नहीं रखा है, वह धर्म और अर्थकी बातोंको सुननेकी इच्छा रखनेपर भी उन्हें पूर्णरूपसे समझ नहीं सकता

กฤปะกล่าวว่า “ตามความเห็นของเรา บุรุษผู้มีปัญญาบิดเบือนและอินทรีย์ไร้วินัย ย่อมไม่อาจเข้าใจธรรมะและอรรถะได้โดยสิ้นเชิง แม้จะกล่าวว่าปรารถนาจะฟังและเรียนรู้ก็ตาม”

Verse 2

तथैव तावन्मेधावी विनयं यो न शिक्षते । न च किंचन जानाति सो<पि धर्मार्थनिश्चयम्‌,इसी प्रकार मेधावी होनेपर भी जो मनुष्य विनय नहीं सीखता, वह भी धर्म और अर्थके निर्णयको थोड़ा भी नहीं समझ पाता है

ฉันใดก็ฉันนั้น แม้ผู้ใดจะเฉลียวฉลาด หากไม่เรียนรู้ความนอบน้อมและวินัย ก็ย่อมไม่รู้เลยแม้แต่น้อยว่าจะตัดสินสิ่งใดเป็นธรรมะและสิ่งใดเป็นอรรถะ

Verse 3

चिरं हाापि जड: शूर: पण्डितं पर्युपास्य हि । न स धर्मान्‌ विजानाति दर्वी सूपरसानिव,जिसकी बुद्धिपर जडता छा रही हो, वह शूरवीर योद्धा दीर्घकालतक विद्वानकी सेवामें रहनेपर भी धर्मोका रहस्य नहीं जान पाता। ठीक उसी तरह जैसे करछुल दालनमें डूबी रहनेपर भी उसके स्वादको नहीं जानती है

แม้เป็นนักรบผู้กล้า หากปัญญาถูกความเฉื่อยทึบปิดบัง ต่อให้อยู่รับใช้บัณฑิตเนิ่นนาน ก็ไม่รู้แก่นแห่งธรรมะ—ดุจทัพพีที่จมอยู่ในแกง แต่ไม่ลิ้มรสของมัน

Verse 4

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ,मुहूर्तमपि त॑ प्राज्ञ: पण्डितं पर्युपास्य हि । क्षिप्रं धर्मान्‌ विजानाति जिह्नला सूपरसानिव जैसे जिह्ना दालके स्वादको जानती है, उसी प्रकार बुद्धिमान्‌ पुरुष यदि दो घड़ी भी विवेकशीलकी सेवामें रहे तो वह शीघ्र ही धर्मोका रहस्य जान लेता है

ผู้มีปัญญาแม้จะเข้าไปอยู่รับใช้บัณฑิตผู้รอบรู้เพียงชั่วครู่ ก็ย่อมเข้าใจหลักแห่งธรรมะได้โดยเร็ว—ดุจลิ้นที่รู้รสอาหารได้ในทันที

Verse 5

शुश्रूषुस्त्वेव मेधावी पुरुषो नियतेन्द्रिय: । जानीयादागमानू्‌ सर्वान्‌ ग्राह्मूं च न विरोधयेत्‌,अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला मेधावी पुरुष यदि विद्वानोंकी सेवामें रहे और उनसे कुछ सुननेकी इच्छा रखे तो वह सम्पूर्ण शास्त्रोंकी समझ लेता है तथा ग्रहण करनेयोग्य वस्तुका विरोध नहीं करता इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिगमने पठचमो<5ध्याय:

บุรุษผู้มีปัญญา ใฝ่ฟังใฝ่เรียน และสำรวมอินทรีย์ เมื่ออยู่รับใช้บัณฑิตและปรารถนาจะสดับคำสอน ย่อมรู้ทั่วถึงคัมภีร์อันเป็นหลักฐานทั้งปวง และไม่คัดค้านสิ่งที่ควรรับไว้

Verse 6

अनेयस्त्ववमानी यो दुरात्मा पापपूरुष: | दिष्टमुत्सूज्य कल्याणं करोति बहुपापकम्‌,परंतु जिसे सन्मार्गपर नहीं ले जाया जा सकता, जो दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला है तथा जिसका अन्तःकरण दूषित है, यह पापात्मा पुरुष बताये हुए कल्याणकारी पथको छोड़कर बहुत-से पापकर्म करने लगता है

ผู้ใดไม่อาจนำไปสู่หนทางธรรมได้ เป็นผู้ดูหมิ่นผู้อื่น และมีจิตใจเศร้าหมอง—ผู้นั้นคือคนบาปผู้ละทิ้งมรรคาอันเป็นสิริมงคลที่กำหนดไว้ แล้วหันไปกระทำบาปกรรมมากมาย

Verse 7

नाथवन्तं तु सुहृद: प्रतिषेधन्ति पातकात्‌ । निवर्तते तु लक्ष्मीवान्‌ नालक्ष्मीवान्‌ निवर्तते,जो सनाथ है, उसे उसके हितैषी सुहृद्‌ पापकर्मोंसे रोकते हैं, जो भाग्यवान्‌ है--जिसके भाग्यमें सुख भोगना बदा है, वह मना करनेपर उस पापकर्मसे रुक जाता है; परंतु जो भाग्यहीन है, वह उस दुष्कर्मसे नहीं निवृत्त होता है

ผู้ที่มีที่พึ่งพิง ย่อมมีสหายผู้หวังดีคอยห้ามปรามจากบาปกรรม ผู้มีวาสนาย่อมหันกลับเมื่อถูกห้าม; แต่ผู้ไร้วาสนาไม่ยอมละจากความชั่วนั้น

Verse 8

यथा हाुच्चावचैववक्यै: क्षिप्तचित्तो नियम्यते । तथैव सुहृदा शक्‍्यो न शक्‍्यस्त्ववसीदति,जैसे मनुष्य विक्षिप्त चित्तवाले पागलको नाना प्रकारके ऊँच-नीच वचनोंद्वारा समझा- बुझाकर या डरा-धमकाकर काबूमें लाते हैं, उसी प्रकार सुहृदगण भी अपने स्वजनको समझा-बुझाकर और डाँट-डपटकर वशमें रखनेकी चेष्टा करते हैं। जो वशमें आ जाता है, वह तो सुखी होता है और जो किसी तरह काबूमें नहीं आ सकता, वह दुःख भोगता है

ดุจคนผู้มีจิตฟุ้งซ่านวิกลจริต ถูกควบคุมด้วยถ้อยคำหลากหลาย—บ้างอ่อนโยน บ้างเข้มงวด—ฉันใด สหายผู้หวังดีก็พยายามยับยั้งญาติของตนด้วยคำตักเตือน และเมื่อจำเป็นด้วยการตำหนิอย่างเคร่งครัดฉันนั้น ผู้ที่ยอมอยู่ในวินัยย่อมถึงความเกษม; ผู้ที่ห้ามมิได้ย่อมจมลงสู่ความทุกข์

Verse 9

तथैव सुद्ठदं प्राज्ञ कुर्वाणं कर्म पापकम्‌ । प्राज्ञा: सम्प्रतिषेधन्ति यथाशक्ति पुन: पुन:,इसी तरह विद्वान्‌ पुरुष पापकर्ममें प्रवृत्त होनेवाले अपने बुद्धिमान सुहृदको भी यथाशक्ति बारंबार मना करते हैं

ฉันนั้นเอง หากสหายผู้มีปัญญายังแน่วแน่จะกระทำบาปกรรม บัณฑิตผู้รู้ย่อมห้ามปรามตามกำลังของตน ซ้ำแล้วซ้ำเล่า

Verse 10

स कल्याणे मन: कृत्वा नियम्यात्मानमात्मना | कुरु मे वचनं तात येन पश्चान्न तप्यसे,तात! तुम भी स्वयं ही अपने मनको काबूमें करके उसे कल्याणसाधनमें लगाकर मेरी बात मानो, जिससे तुम्हें पश्चात्ताप न करना पड़े

ดูลูกรัก จงตั้งจิตไว้ในทางอันเป็นสิริมงคล และฝึกตนให้สำรวมด้วยตนเอง จงทำตามคำของเรา เพื่อภายหลังเจ้าจะไม่ร้อนรุ่มด้วยความเสียใจ

Verse 11

न वध: पूज्यते लोके सुप्तानामिह धर्मत: । तथैवापास्तशस्त्राणां विमुक्तरथवाजिनाम्‌,जो सोये हुए हों, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये हों, रथ और घोड़े खोल दिये हों, “जो मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहे हों, जो शरणमें आ गये हों, जिनके बाल खुले हुए हों तथा जिनके वाहन नष्ट हो गये हों, इस लोकमें ऐसे लोगोंका वध करना धर्मकी दृष्टिसे अच्छा नहीं समझा जाता

กฤปะกล่าวว่า “ในโลกนี้ การฆ่าผู้ที่กำลังหลับหาได้รับการยกย่องว่าเป็นธรรมไม่ อีกทั้งการสังหารผู้ที่วางอาวุธแล้ว และผู้ที่ปลดรถศึกกับม้าออกแล้ว—ผู้ซึ่งมิได้อยู่ในสภาพพร้อมรบ—ก็ไม่เป็นไปตามธรรมเช่นกัน”

Verse 12

ये च ब्रूयुस्तवास्मीति ये च स्यु: शरणागता: । विमुक्तमूर्थजा ये च ये चापि हतवाहना:,जो सोये हुए हों, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये हों, रथ और घोड़े खोल दिये हों, “जो मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहे हों, जो शरणमें आ गये हों, जिनके बाल खुले हुए हों तथा जिनके वाहन नष्ट हो गये हों, इस लोकमें ऐसे लोगोंका वध करना धर्मकी दृष्टिसे अच्छा नहीं समझा जाता

กฤปะกล่าวว่า “ผู้ที่กล่าวว่า ‘ข้าพเจ้าเป็นของท่าน’ ผู้ที่มาขอพึ่งพิง ผู้ที่ปล่อยผมสยาย (เป็นนัยแห่งความทุกข์หรือยอมจำนน) และผู้ที่พาหนะถูกทำลาย—การสังหารคนเช่นนี้ในโลกนี้หาได้ถือว่าเป็นธรรมไม่”

Verse 13

अद्य स्वप्स्यन्ति पञ्चाला विमुक्तकवचा विभो । विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतस:,प्रभो! आज रातमें समस्त पांचाल कवच उतारकर निश्रिन्त हो मुर्दोके समान अचेत सो रहे होंगे। उस अवस्थामें जो क्रूर मनुष्य उनके साथ द्रोह करेगा, वह निश्चय ही नौकारहित अगाध एवं विशाल नरकके समुद्रमें डूब जायगा

กฤปะกล่าวว่า “คืนนี้ชาวปัญจาลจะหลับใหล โอ้ผู้ทรงเดช โดยถอดเกราะออกแล้ว ทั้งหมดจะวางใจและไร้การระวังตลอดราตรี นอนแน่นิ่งดุจผู้ตาย ไร้สติสัมปชัญญะ”

Verse 14

यस्तेषां तदवस्थानां द्रह्ेत पुरुषोडनृजु: । व्यक्ते स नरके मज्जेदगाधे विपुले5प्लवे,प्रभो! आज रातमें समस्त पांचाल कवच उतारकर निश्रिन्त हो मुर्दोके समान अचेत सो रहे होंगे। उस अवस्थामें जो क्रूर मनुष्य उनके साथ द्रोह करेगा, वह निश्चय ही नौकारहित अगाध एवं विशाल नरकके समुद्रमें डूब जायगा

ข้าแต่พระองค์! ในสภาพเช่นนั้น ผู้ใดมีใจคดและโหดเหี้ยมคิดทรยศทำร้ายพวกเขา ผู้นั้นย่อมจมลงแน่แท้ในมหาสมุทรแห่งนรกอันกว้างใหญ่และลึกสุดหยั่ง—ไร้เรือให้พ้นภัย

Verse 15

सर्वस्त्रिविदुषां लोके श्रेष्ठस्त्वमसि विश्रुत: । नच ते जातु लोके5स्मिन्‌ सुसूक्ष्ममपि किल्बिषम्‌

กฤปะกล่าวว่า “ในโลกนี้ ท่านเลื่องชื่อว่าเป็นผู้ยอดเยี่ยมที่สุดในหมู่ผู้รู้ศาสตร์แห่งอาวุธทั้งปวง และในโลกนี้ ไม่เคยปรากฏในตัวท่านแม้เพียงมลทินแห่งความผิดอันละเอียดที่สุด”

Verse 16

संसारके सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें तुम श्रेष्ठ हो। तुम्हारी सर्वत्र ख्याति है। इस जगतमें अबतक कभी तुम्हारा छोटे-से-छोटा दोष भी देखनेमें नहीं आया है ।। त्वं पुनः सूर्यसंकाश: श्वोभूत उदिते रवौ । प्रकाशे सर्वभूतानां विजेता युधि शात्रवान्‌,कल खबेरे सूर्योदय होनेपर तुम सूर्यके समान प्रकाशित हो उजालेमें युद्ध छेड़कर समस्त प्राणियोंके सामने पुन: शत्रुओंपर विजय प्राप्त करना

กฤปะกล่าวว่า “ในบรรดาผู้รู้ศาสตร์แห่งอาวุธทั้งปวงในโลกนี้ เจ้าเป็นผู้เลิศที่สุด เกียรติยศของเจ้าขจรไปทั่ว และจนบัดนี้ยังไม่เคยมีผู้ใดเห็นความบกพร่องแม้เพียงน้อยนิดในตัวเจ้าเลย เพราะฉะนั้น พรุ่งนี้เมื่อสุริยะอุทัย จงส่องประกายดุจสุริยันเอง ในแสงสว่างแจ่มชัด จงเปิดศึกกับศัตรูต่อหน้าสรรพชีวิตทั้งหลาย และจงมีชัยเหนือปฏิปักษ์ของเจ้า”

Verse 17

असम्भावितरूपं हि त्वयि कर्म विगर्हितम्‌ । शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम,जैसे सफेद वस्त्रमें लाल रंगका धब्बा लग जाय, उस प्रकार तुममें निन्दित कर्मका होना सम्भावनासे परेकी बात है, ऐसा मेरा विश्वास है

ที่เจ้าจะกระทำการอันน่าติเตียนนั้น แท้จริงเกินกว่าจะคาดหมายได้ มันจะเป็นดุจรอยเปื้อนสีแดงบนผ้าขาว—นี่คือความเชื่อมั่นของเรา

Verse 18

अश्वत्थामोवाच एवमेव यथा<5त्थ त्वं मातुलेह न संशय: । तैस्तु पूर्वमयं सेतु: शतधा विदलीकृत:,अश्वत्थामा बोला--मामाजी! आप जैसा कहते हैं, निःसंदेह वही ठीक है; परंतु पाण्डवोंने ही पहले इस धर्म-मर्यादाके सैकड़ों टुकड़े कर डाले हैं

อัศวัตถามากล่าวว่า “เป็นดังที่ท่านว่าจริง ๆ ท่านลุง หาได้มีข้อสงสัยไม่ ทว่า ‘สะพาน’ แห่งขอบเขตธรรมะนี้ เขาทั้งหลายต่างหากที่ทำลายเสียก่อน ให้แตกเป็นร้อยเสี่ยง”

Verse 19

प्रत्यक्ष भूमिपालानां भवतां चापि संनिधौ । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातित:,धष्टद्युम्नने समस्त राजाओंके सामने और आपलोगोंके निकट ही मेरे उस पिताको मार गिराया, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये थे

ต่อหน้าบรรดากษัตริย์ทั้งหลาย และแม้ในที่ซึ่งพวกท่านยืนอยู่ใกล้ ๆ บิดาของเรา—ผู้วางอาวุธแล้ว—ถูกธฤษฏทยุมน์ฟันล้มลง

Verse 20

कर्णक्ष पतिते चक्रे रथस्य रथिनां वर: । उत्तमे व्यसने मग्नो हतो गाण्डीवधन्चना,रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णको भी गाण्डीवधारी अर्जुनने उस अवस्थामें मारा था, जब कि उनके रथका पहिया गड्ढेमें गिरकर फँस गया था और इसीलिये वे भारी संकटमें पड़े हुए थे

เมื่อกงล้อรถศึกของกรรณะจมติดอยู่ในหลุม ยอดนักรบรถศึกผู้นั้นตกอยู่ในหายนะอันใหญ่หลวง ครั้นแล้วผู้ถือคันธนูกาณฑีวะก็สังหารเขาเสีย

Verse 21

इसी प्रकार शान्तनुनन्दन भीष्म जब हथियार डालकर अस्त्रहीन हो गये, उस अवस्थामें शिखण्डीको आगे करके गाण्डीवधारी धनंजयने उनका वध किया था

ฉันใดก็ฉันนั้น เมื่อภีษมะ โอรสแห่งศานตนุ วางอาวุธลงจนเป็นผู้ไร้อาวุธ ธนัญชัย (อรชุน) ผู้ทรงคันธนูกาณฑีวะ ได้ให้ศิขัณฑีอยู่เบื้องหน้า แล้วกระทำให้ท่านถึงความพินาศ

Verse 22

भूरिश्रवा महेष्वासस्तथा प्रायगतो रणे । क्रोशतां भूमिपालानां युयुधानेन पातितः,महाधनुर्थधर भूरिश्रवा तो रणभूमिमें अनशन व्रत लेकर बैठ गये थे। उस अवस्थामें समस्त भूमिपाल चिल्ला-चिल्लाकर रोकते ही रह गये; परंतु सात्यकिने उन्हें मार गिराया

ภูริศรวา ผู้เป็นมหาธนูรธร ได้ตั้งสัตย์ปฺรายโอปเวศะ คืออดอาหารจนตาย ท่ามกลางสนามรบ แม้บรรดากษัตริย์จะร้องตะโกนห้ามปรามกันอื้ออึง เขาก็ยังถูกยุยุธาน (สาตยกี) ฟันให้ล้มลง

Verse 23

दुर्योधनश्व भीमेन समेत्य गदया रणे । पश्यतां भूमिपालानामधर्मेण निपातित:,भीमसेनने भी सम्पूर्ण राजाओंके देखते-देखते रणभूमिमें गदायुद्ध करते समय दुर्योधनको अधर्मपूर्वक गिराया था

ทุรโยธนะได้เข้าประจัญบานกับภีมะด้วยกระบองในสนามรบ แต่ต่อหน้ากษัตริย์ทั้งหลายที่ยืนดูอยู่ ภีมเสนะกลับทำให้เขาล้มลงด้วยวิธีอันผิดธรรม

Verse 24

एकाकी बहुभिस्तत्र परिवार्य महारथै: । अधर्मेण नरव्याप्रो भीमसेनेन पातित:,नरश्रेष्ठ राजा दुर्योधन अकेला था और बहुत-से महारथियोंने उसे वहाँ घेर रखा था, उस दशामें भीमसेनने उसको धराशायी किया है

ณ ที่นั้น ราชาทุรโยธนะ ผู้เป็นพยัคฆ์ในหมู่มนุษย์ ยืนอยู่เพียงลำพัง แต่ถูกมหารถีจำนวนมากล้อมไว้ กระนั้นภีมเสนะก็ยังทำให้เขาล้มลงด้วยวิถีอันผิดธรรม

Verse 25

विलापो भग्नसक्थस्य यो मे राज्ञ: परिश्रुत: । वार्तिकाणां कथयतां स मे मर्माणि कृन्तति,टूटी जाँघोंवाले राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने सुना है और संदेशवाहक दूतोंके मुखसे जो समाचार मुझे ज्ञात हुआ है, वह सब मेरे मर्मस्थानोंको विदीर्ण किये देता है

เสียงคร่ำครวญของพระราชาผู้มีต้นขาแตกหักที่ข้าพเจ้าได้ยิน และข่าวสารที่เหล่าทูตเล่าขานเมื่อถ่ายทอดเหตุการณ์—ทั้งหมดนั้นกรีดเฉือนถึงมर्मลึกในใจของข้าพเจ้า

Verse 26

एवं चाधार्मिका: पापा: पठ्चाला भिन्नसेतव: । तानेवं भिन्नमर्यादान्‌ कि भवान्‌ न निगहति,इस प्रकार वे सब-के-सब पापी और अधार्मिक हैं। पांचालोंने भी धर्मकी मर्यादा तोड़ डाली है। इस तरह मर्यादा भंग करनेवाले उन पाण्डवों और पांचालोंकी आप निन्दा क्‍यों नहीं करते हैं?

ฉันใดก็ฉันนั้น ชาวปัญจาละก็เป็นคนบาปและอธรรม—ผู้ทำลายคันกั้นแห่งขอบเขตธรรมะ เมื่อพวกเขาล่วงละเมิดขอบเขตทั้งปวงถึงเพียงนี้ เหตุใดท่านจึงไม่ยับยั้งพวกเขา?

Verse 27

पितृहन्तृनहं हत्वा पज्चालान्‌ निशि सौप्तिके । काम॑ कीट: पतड़ो वा जन्म प्राप्प भवामि वै,पिताकी हत्या करनेवाले पांचालोंका रातको सोते समय वध करके मैं भले ही दूसरे जन्ममें कीट या पतंग हो जाऊँ, सब कुछ स्वीकार है

เมื่อข้าฆ่าชาวปัญจาละ—ผู้สังหารบิดาของข้า—ในยามราตรีขณะพวกเขาหลับใหล ผลกรรมใด ๆ ข้ายอมรับทั้งสิ้น แม้ชาติหน้าต้องเกิดเป็นหนอนหรือผีเสื้อกลางคืนก็ช่างเถิด

Verse 28

त्वरे चाहमनेनाद्य यदिदं मे चिकीर्षितम्‌ । तस्य मे त्वरमाणस्य कुतो निद्रा कुत: सुखम्‌

วันนี้ข้าร้อนรนจะกระทำสิ่งที่ตั้งใจให้สำเร็จ เมื่อข้ากำลังเร่งรุดไปสู่จุดหมายนั้น จะมีหลับได้อย่างไร จะมีความสบายได้อย่างไร

Verse 29

इस समय मैं जो कुछ करना चाहता हूँ, उसीको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे उतावला हो रहा हूँ। इतनी उतावलीमें रहते हुए मुझे नींद कहाँ और सुख कहाँ? ।। न स जात: पुमॉल्लोके कश्चिन्न स भविष्यति । यो मे व्यावर्तयेदेतां वधे तेषां कृतां मतिम्‌,इस संसारमें ऐसा कोई पुरुष न तो पैदा हुआ है और न होगा ही, जो उन पांचालोंके वधके लिये किये गये मेरे इस दृढ़ निश्चयको पलट दे

ยามนี้ข้าถูกความเร่งร้อนผลักดันให้ทำสิ่งที่ตั้งใจให้สำเร็จ ในความกระวนกระวายเช่นนี้ ข้าจะมีหลับได้ที่ไหน จะมีความสบายได้ที่ไหน? ในโลกนี้ไม่เคยมี และจักไม่มีชายใด ที่จะหันเหข้าจากปณิธานอันแน่วแน่ซึ่งข้าตั้งไว้—เพื่อสังหารชาวปัญจาละเหล่านั้น

Verse 30

संजय उवाच एवमुक्त्वा महाराज द्रोणपुत्र: प्रतापवान्‌ । एकान्ते योजयित्वाश्वान्‌ प्रायादभिमुख: परान्‌,संजय कहते हैं--महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा एकान्तमें घोड़ोंको जोतकर शत्रुओंकी ओर चल दिया

สัญชัยกล่าวว่า “ข้าแต่มหาราช ครั้นกล่าวดังนั้นแล้ว อัศวัตถามา โอรสแห่งโทรณะผู้ทรงเดช ได้เทียมม้าในที่ลับ แล้วออกเดินทางโดยหันหน้าไปทางฝ่ายศัตรู”

Verse 31

तमब्रूतां महात्मानौ भोजशारद्वतावुभौ । किमर्थ स्यन्दनो युक्त: किज्च कार्य चिकीर्षितम्‌,उस समय भोजवंशी कृतवर्मा और शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य दोनों महामनस्वी वीरोंने उससे कहा--'अश्व॒त्थामन्‌! तुमने किसलिये रथको जोता है? तुम इस समय कौन-सा कार्य करना चाहते हो?

ครั้งนั้น กฤตวรมะแห่งวงศ์โภชะ และกฤปะบุตรแห่งศรทวัต—วีรบุรุษผู้มีจิตใจสูงส่งทั้งสอง—กล่าวแก่เขาว่า “อัศวัตถามัน! เจ้าผูกเทียมรถศึกไว้เพื่อเหตุใด? บัดนี้เจ้ามุ่งจะกระทำกิจใด?”

Verse 32

एकसर्थप्रयातौ स्वस्त्वया सह नरर्षभ । समदुःखसुखौ चापि नावां शड्कितुमरहसि

โอ้ยอดบุรุษ! เราออกเดินทางร่วมกับเจ้าเพื่อจุดหมายเดียวกัน ทั้งสุขและทุกข์เราก็ร่วมรับเสมอกัน ฉะนั้นเจ้าไม่ควรระแวงเรา

Verse 33

“नरश्रेष्ठट हम दोनों एक साथ तुम्हारी सहायताके लिये चले हैं। तुम्हारे दुःख-सुखमें हमारा समान भाग होगा, तुम्हें हम दोनोंपर संदेह नहीं करना चाहिये” ।। अश्वत्थामा तु संक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन्‌ । ताभ्यां तथ्यं तथा55चख्यौ यदस्यात्मचिकीर्षितम्‌,उस समय अश्वत्थामा पिताके वधका स्मरण करके रोषसे आगबबूला हो रहा था। उसके मनमें जो कुछ करनेकी इच्छा थी, वह सब उसने उन दोनोंसे ठीक-ठीक कह सुनाया

“โอ้ยอดแห่งมนุษย์! เราทั้งสองออกเดินทางมาด้วยกันเพื่อช่วยเจ้า ในทุกข์และสุขของเจ้าเราจะร่วมรับส่วนเท่าเทียมกัน เพราะฉะนั้นอย่าได้ระแวงเราทั้งสองเลย” แต่เมื่ออัศวัตถามันระลึกถึงการถูกสังหารของบิดา ก็เดือดดาลด้วยโทสะ และได้บอกความจริงแก่ทั้งสองถึงสิ่งที่ตนตั้งใจจะกระทำ

Verse 34

हत्वा शतसहस््राणि योधानां निशितै: शरै: । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातित:,वह बोला--"मेरे पिता अपने तीखे बाणोंसे लाखों योद्धाओंका वध करके जब अस्त्र- शस्त्र नीचे डाल चुके थे, उस अवस्थामें धृष्टद्युम्नने उन्हें मारा है

เขากล่าวว่า “บิดาของข้าได้สังหารนักรบเป็นแสนด้วยศรอันคมกล้า ครั้นเมื่อท่านวางอาวุธลงแล้ว ธฤษฏทยุมน์กลับโค่นท่านลงและสังหารเสีย”

Verse 35

त॑ तथैव हनिष्यामि न्यस्तथर्माणमद्य वै | पुत्र पाउ्चालराजस्य पाप॑ पापेन कर्मणा,“अतः धर्मका परित्याग करनेवाले उस पापी पांचालराजकुमारको भी मैं उसी प्रकार पापकर्मद्वारा ही मार डालूँगा

“ฉะนั้น ผู้ที่ละทิ้งธรรมแล้ว—โอรสแห่งกษัตริย์ปาญจาลผู้บาปนั้น—ข้าจะสังหารในวันนี้ด้วยวิธีเดียวกัน คือให้บาปตอบแทนด้วยการกระทำอันเป็นบาป”

Verse 36

कथं च निहत: पाप: पाउ्चाल्य: पशुवन्मया । शस्त्रेण विजिताललोकान्‌ नाप्नुयादिति मे मति:,“मेरा ऐसा निश्चय है कि मेरे हाथसे पशुकी भाँति मारे गये पापी पांचालराजकुमार धष्टद्यम्मको किसी तरह भी अस्त्र-शस्त्रोंद्रार मिलनेवाले पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो!!

นี่คือความเชื่อมั่นอันแน่วแน่ของข้า—โอรสแห่งปัญจาลผู้บาปนั้น ซึ่งข้าฆ่าเสียดุจสัตว์เดรัจฉาน ย่อมไม่ควรได้บรรลุโลกอันเป็นบุญที่ได้มาด้วยชัยชนะจากศัสตราวุธเป็นอันขาด

Verse 37

क्षिप्रं संनद्धकवचौ सखडूगावात्तकार्मुकौ | मामास्थाय प्रतीक्षेतां रथवर्यो परंतपौ,“आप दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर हैं। शीघ्र ही कवच बाँधकर खड्ग और धनुष लेकर रथपर बैठ जाइये तथा मेरी प्रतीक्षा कीजिये”

พวกเจ้าทั้งสองเป็นยอดนักรบรถศึก เป็นผู้เผาผลาญศัตรูให้เร่าร้อน จงรีบสวมเกราะ คว้าดาบและคันธนู ขึ้นสู่รถศึก แล้วอาศัยข้าเป็นหลัก คอยข้าอยู่เถิด

Verse 38

इत्युक्त्वा रथमास्थाय प्रायादभिमुख: परान्‌ | तमन्वगात्‌ कृपो राजन्‌ कृतवर्मा च सात्वत:,राजन! ऐसा कहकर अअभश्वत्थामा रथपर आरूढ़ हो शत्रुओंकी ओर चल दिया। कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा भी उसीके मार्गका अनुसरण करने लगे

ข้าแต่พระราชา ครั้นกล่าวดังนั้นแล้ว เขาขึ้นรถศึกและมุ่งหน้าไปยังฝ่ายศัตรู กฤปะก็ตามติดไป และกฤตวรมะแห่งวงศ์สาตวตะก็ไปด้วย

Verse 39

ते प्रयाता व्यरोचन्त परानभिमुखास्त्रय: । हूयमाना यथा यज्ञे समिद्धा हव्यवाहना:,शत्रुओंकी ओर जाते समय वे तीनों तेजस्वी वीर यज्ञमें आहुति पाकर प्रज्वलित हुए तीन अग्नियोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे

เมื่อทั้งสามมุ่งหน้าเข้าหาศัตรู ก็ส่องประกายเจิดจ้า—ดุจไฟสามกองในพิธียัญ ที่ลุกโพลงเมื่อรับเครื่องบูชา

Verse 40

ययुश्न शिबिरं तेषां सम्प्रसुप्तजनं विभो । द्वारदेशं तु सम्प्राप्य द्रौणिस्तस्थौ महारथ:,प्रभो! वे तीनों पाण्डवों और पांचालोंके उस शिविरके पास गये, जहाँ सब लोग सो गये थे। शिविरके द्वारपर पहुँचकर महारथी अश्वत्थामा खड़ा हो गया

ข้าแต่ผู้ทรงเดช พวกเขาไปถึงค่ายของพวกปาณฑพและปัญจาล ในยามที่ผู้คนทั้งปวงหลับใหลสนิท ครั้นถึงบริเวณประตูค่าย อัศวัตถามา โอรสแห่งโทรณะ ผู้เป็นมหารถี ก็ยืนหยัดอยู่ ณ ที่นั้น

Verse 231

तथा शान्तनवो भीष्मो न्यस्तशस्त्रो निरायुध: । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य हतो गाण्डीवधन्चना

ฉันนั้นเอง ภีษมะโอรสแห่งศานตนุ เมื่อวางอาวุธลงและยืนอยู่โดยปราศจากศัสตรา ก็ถูกผู้ทรงคันธนูกาณฑีวะสังหาร โดยให้ศิขัณฑินยืนเป็นฉากหน้า