Adhyaya 17
Sauptika ParvaAdhyaya 1726 Versesयुद्ध समाप्ति के बाद का प्रतिध्वनि-काल; विजय के भीतर शोक और नैतिक संकट।

Adhyaya 17

Yudhiṣṭhira’s Lament and Kṛṣṇa’s Rudra-Cosmogony Explanation (सौप्तिक पर्व, अध्याय १७)

Upa-parva: Sauptika-upākhyāna (Aftermath Discourse on the Night Raid and Rudra’s Agency)

Vaiśaṃpāyana reports that, after the night raid has annihilated the remaining forces, King Yudhiṣṭhira—overcome by grief—questions Vāsudeva Kṛṣṇa about the apparent impossibility that Droṇa’s son (Drauṇi) could single-handedly devastate the entire camp and fell highly trained warriors, including Drupada’s sons and Dhṛṣṭadyumna. Kṛṣṇa answers by positing that Drauṇi sought refuge in Mahādeva (Rudra), whose favor can grant even immortality and a potency capable of subduing Indra. To substantiate Rudra’s supremacy, Kṛṣṇa narrates a compact purāṇic cosmogony: Rudra’s prolonged tapas while immersed in waters; Brahmā’s impatience and creation of a secondary creator; the creation of Prajāpatis and beings; the immediate hunger of newly created populations and the establishment of sustenance through plants and a hierarchy wherein weaker beings become food for stronger ones; the resulting proliferation of life; Rudra’s anger upon witnessing the abundant forms and his act of casting down his liṅga; Brahmā’s pacifying inquiry; Rudra’s complaint that another has created the beings and that his tapas-earned provisions are being diverted; and Rudra’s withdrawal to Muñjavat for further austerity. The chapter thus links post-war catastrophe to a broader metaphysical frame about divine agency, creation, and the regulation of life through ordained limits.

Chapter Arc: रात्रि-वध की धूल अभी बैठी भी नहीं कि युधिष्ठिर का हृदय फट पड़ता है—वे श्रीकृष्ण से पूछते हैं: द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, ‘क्षुद्र’ और ‘पापात्मा’ होकर भी, मेरे समस्त पुत्रों और द्रुपद-पुत्रों जैसे महावीरों को अकेला कैसे मार गया? → युधिष्ठिर का प्रश्न केवल शोक नहीं, न्याय का भी है—‘उसने कौन-सा कर्म किया, कौन-सी सिद्धि पाई?’ उत्तर में कथा का प्रवाह युद्ध-भूमि से हटकर देव-तत्त्व की ओर मुड़ता है: महादेव की उपासना, तप, और वह शक्ति जो प्रसन्न होने पर अमरत्व तक दे सकती है—ऐसी शक्ति जो इन्द्र-संहार तक समर्थ कर दे। → शिव-तत्त्व का महिमामय प्रसंग उभरता है—हरिकेश (शिव) का दीर्घ तप, जल में लीन साधना, और ब्रह्मा के साथ संवाद; लिंग का भूमौ प्रतिष्ठित होना और लोकगुरु शिव का प्रजासृष्टि/प्रजापालन के प्रयोजन पर तीव्र प्रश्न—यहाँ स्पष्ट होता है कि अश्वत्थामा की ‘असाध्य’ क्षमता का मूल किसी मानवीय पराक्रम में नहीं, देव-प्रसाद/वर-प्रभाव में है। → ब्रह्मा-शिव संवाद से प्रजाओं के पोषण का विधान सामने आता है—तप से अन्न/ओषधियों का प्रादुर्भाव और उनका निरन्तर रूपान्तरण; संकेत यह कि जगत का क्रम (सृष्टि-पालन) देव-तप और देव-नियम से चलता है, और उसी देव-शक्ति का अंश/आश्रय लेकर अश्वत्थामा ने रात्रि-वध किया। युधिष्ठिर के प्रश्न को श्रीकृष्ण ‘कारण’ की दिशा में मोड़ते हैं—घटना का रहस्य शिव-प्रभाव में है, केवल रण-कौशल में नहीं। → देव-वर से समर्थ होकर भी अधर्म-कर्म करने वाले का फल क्या होगा—और पाण्डव उस ‘वर-समर्थ’ अपराधी से कैसे निपटेंगे?

Shlokas

Verse 1

/ ऑपन-माज बक। डे सप्तदशो< ध्याय: अपने समस्त पुत्रों और सैनिकोंके मारे जानेके विषयमें युधिष्ठिरका और उत्तरमें श्रीकृष्णके द्वारा जी हित प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच हतेषु सर्वसैन्येषु सौप्तिके तै रथैस्त्रिभि: | शोचन्‌ युधिष्ठटिरो राजा दाशाहमिदमब्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! रातको सोते समय उन तीन महारथियोंने पाण्डवोंकी सारी सेनाओंका जो संहार कर डाला था, उसके लिये शोक करते हुए राजा युधिष्ठिरने दशा्ईनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा--

ไวศัมปายนะกล่าวว่า—เมื่อกองทัพทั้งปวงถูกสังหารสิ้นในเหตุสังหารยามราตรี (เสาปฺติกะ) โดยมหารถีทั้งสามนั้น พระเจ้ายุธิษฐิระผู้โศกเศร้าได้ทูลดาศารหะ คือพระศรีกฤษณะ ด้วยถ้อยคำดังนี้

Verse 2

कथं नु कृष्ण पापेन क्षुद्रेणाकृतकर्मणा । द्रौणिना निहता: सर्वे मम पुत्रा महारथा:,“श्रीकृष्ण! नीच एवं पापात्मा द्रोणकुमारने कोई विशेष तप या पुण्यकर्म भी तो नहीं किया था, जिससे उसमें अलौकिक शक्ति आ जाती। फिर उसने मेरे सभी महारथी पुत्रोंका वध कैसे कर डाला?

โอ้พระกฤษณะ! ดรโณปุตรผู้อธรรม ต่ำช้า และมิได้ประกอบกรรมอันควรใด ๆ เขาสังหารบุตรของข้าผู้เป็นมหารถีทั้งสิ้นได้อย่างไร?

Verse 3

तथा कृतास्त्रविक्रान्ता: सहस्रशतयोधिन: । द्रुपदस्यात्मजाश्वैव द्रोणपुत्रेण पातिता:,“ट्रुपदके पुत्र तो अस्त्र-विद्याके पूरे पण्डित, पराक्रमी तथा लाखों योद्धाओंके साथ युद्ध करनेमें समर्थ थे तो भी द्रोणपुत्रने उन्हें मार गिराया, यह कितने आश्वर्यकी बात है?

โอ้แม้บุตรของทฺรุปทะจะชำนาญศัสตราวุธ กล้าหาญ และสามารถเผชิญนักรบเป็นร้อยเป็นพันได้ กระนั้นก็ยังถูกบุตรแห่งโทรณะทำให้ล้มลง—ช่างน่าพิศวงยิ่งนัก!

Verse 4

यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम्‌ । निजषघ्ने रथिनां श्रेष्ठ धृष्टद्युम्न॑ कथं नु सः,“महाथनुर्धर द्रोणाचार्य युद्धमें जिसके सामने मुँह नहीं दिखाते थे, उसी रथियोंमें श्रेष्ठ धष्टद्युम्नको अश्वत्थामाने कैसे मार डाला?

ผู้ซึ่งแม้โทรณาจารย์ผู้เป็นมหาธนูรธรก็มิกล้าเผชิญหน้าในสนามรบ แต่เขากลับสังหารธฤษฏทยุมน์ ผู้เลิศในหมู่รถีได้อย่างไรเล่า?

Verse 5

कि नु तेन कृतं कर्म तथायुक्तं नरर्षभ । यदेक: समरे सर्वानिवधीजन्नो गुरो: सुत:,“नरश्रेष्ठ) आचार्यपुत्रने ऐसा कौन-सा उपयुक्त कर्म किया था, जिससे उसने अकेले ही समरांगणमें हमारे सभी सैनिकोंका वध कर डाला'

โอ้ยอดแห่งบุรุษ! บุตรแห่งอาจารย์ได้กระทำกรรมอันเหมาะสมด้วยกลอุบายใดเล่า จึงสามารถสังหารไพร่พลของเราทั้งหมดได้เพียงลำพังในสนามรบ?

Verse 6

श्रीभगवानुवाच नूनं स देवदेवानामीश्ररेश्वरमव्ययम्‌ । जगाम शरण द्रौणिरेकस्तेनावधीद्‌ बहूनू,श्रीभगवान्‌ बोले--राजन्‌! निश्चय ही अभश्रवत्थामाने ईश्वरोंके भी ईश्वर देवाधिदेव अविनाशी भगवान्‌ शिवकी शरण ली थी, इसीलिये उसने अकेले ही बहुत-से वीरोंका विनाश कर डाला

พระผู้เป็นเจ้าตรัสว่า “ดูก่อนราชัน! แท้จริงแล้ว โทฺรณี อัศวัตถามาได้เข้าพึ่งพระศิวะ ผู้เป็นเทวาธิเทพ เป็นใหญ่เหนือเหล่าเทพ และเป็นผู้ไม่เสื่อมสลาย; ด้วยเหตุนี้เขาจึงเพียงลำพังทำลายวีรชนเป็นอันมากได้”

Verse 7

प्रसन्नो हि महादेवो दद्यादमरतामपि । वीर्य च गिरिशो दद्याद्‌ येनेन्द्रमपि शातयेत्‌

ไวศัมปายนะกล่าวว่า “เมื่อมหาเทพทรงพอพระทัย พระองค์ย่อมประทานได้แม้กระทั่งความเป็นอมตะ และคิริศะย่อมประทานพลังกล้าหาญถึงเพียงว่า ด้วยพลังนั้นก็อาจปราบอินทราได้ด้วย”

Verse 8

पर्ववपर शयन करनेवाले महादेवजी तो प्रसन्न होनेपर अमरत्व भी दे सकते हैं। वे उपासकको इतनी शक्ति दे देते हैं, जिससे वह इन्द्रको भी नष्ट कर सकता है ।। वेदाहं हि महादेवं तत्त्वेन भरतर्षभ । यानि चास्य पुराणानि कर्माणि विविधानि च,भरतश्रेष्ठ! मैं महादेवजीको यथार्थरूपसे जानता हूँ। उनके जो नाना प्रकारके प्राचीन कर्म हैं, उनसे भी मैं पूर्ण परिचित हूँ

ไวศัมปายนะกล่าวว่า “มหาเทพผู้ใช้ภูผาเป็นแท่นบรรทม เมื่อทรงพอพระทัยย่อมประทานได้แม้ความเป็นอมตะ พระองค์ประทานกำลังแก่ผู้บูชาถึงเพียงว่า ผู้บูชานั้นอาจทำลายอินทราได้ด้วย ดูก่อนผู้ประเสริฐแห่งภารตะ เรารู้จักมหาเทพตามสภาวะอันแท้จริง และเราก็รู้ทั่วถึงกิจอันโบราณและหลากหลายของพระองค์ด้วย”

Verse 9

आदिरेष हि भूतानां मध्यमन्तश्न॒ भारत । विचेष्टते जगच्चेदं सर्वमस्यैव कर्मणा,भरतनन्दन! ये भगवान्‌ शिव सम्पूर्ण भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। उन्हींके प्रभावसे यह सारा जगत्‌ भाँति-भाँतिकी चेष्टाएँ करता है

ไวศัมปายนะกล่าวว่า “ดูก่อนภารตะ พระองค์นั้นแลเป็นทั้งปฐม กลาง และที่สุดแห่งสรรพสัตว์ทั้งปวง ด้วยฤทธิ์และกิจของพระองค์เอง โลกทั้งมวลนี้จึงเคลื่อนไหวและกระทำการนานาประการ”

Verse 10

एवं सिसक्षुर्भूतानि ददर्श प्रथमं विभु: । पितामहो<ब्रवीच्चैनं भूतानि सृज मा चिरम्‌,प्रभावशाली ब्रह्माजीने प्राणियोंकी सृष्टि करनेकी इच्छासे सबसे पहले महादेवजीको ही देखा था। तब पितामह ब्रह्माने उनसे कहा--'प्रभो! आप अविलम्ब सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि कीजिये'

ไวศัมปายนะกล่าวว่า “เมื่อผู้ทรงฤทธิ์คือปิตามหาพรหมประสงค์จะสร้างสรรพสัตว์ ท่านได้เห็นมหาเทพเป็นปฐม แล้วปิตามหาจึงกล่าวแก่พระองค์ว่า ‘ข้าแต่พระผู้เป็นเจ้า อย่าชักช้าเลย จงสร้างสรรพสัตว์ทั้งปวงโดยเร็วเถิด’”

Verse 11

यह सुन महादेवजी “तथास्तु” कहकर भूतगणोंके नाना प्रकारके दोष देख जलमें मग्न हो गये और महान्‌ तपका आश्रय ले दीर्घकालतक तपस्या करते रहे

ครั้นได้สดับดังนั้น มหาเทวะตรัสว่า “ตถาสตุ” คือ “จงเป็นดังนั้นเถิด” แล้วทอดพระเนตรเห็นโทษนานาประการในหมู่ภูตทั้งหลาย จึงดำดิ่งลงสู่สายน้ำ และอาศัยตบะอันยิ่งใหญ่ บำเพ็ญพรตอยู่นานนัก

Verse 12

सुमहान्तं ततः काल प्रतीक्ष्यैनं पितामह: । स्रष्टारं सर्वभूतानां ससर्ज मनसा परम्‌,इधर पितामह ब्रह्माने सुदीर्घकालतक उनकी प्रतीक्षा करके अपने मानसिक संकल्पसे दूसरे सर्वभूतस्रष्टाको उत्पन्न किया

ต่อมาเมื่อพ้นกาลอันยิ่งยาวนาน ปิตามหะพรหมาได้รอคอยอยู่ แล้วด้วยเพียงมโนปณิธานก็ทรงบังเกิด “ผู้สร้างอันสูงสุด” ผู้เป็นบรรพชนแห่งสรรพสัตว์ทั้งปวง

Verse 13

हरिकेशस्तथेत्युक्त्वा भूतानां दोषदर्शिवान्‌ | दीर्घकालं तपस्तेपे मग्नो5म्भसि महातपा:,सो<ब्रवीत्‌ पितरं दृष्टवा गिरिशं सुप्तमम्भसि । यदि मे नाग्रजो<स्त्यन्यस्ततः स्रक्ष्याम्यहं प्रजा: उस विराट पुरुष या स्रष्टाने महादेवजीको जलमें सोया देख अपने पिता ब्रह्माजीसे कहा--“यदि दूसरा कोई मुझसे ज्येष्ठ न हो तो मैं प्रजाकी सृष्टि करूँगा”

ไวศัมปายนะกล่าวว่า— “หริเกศะครั้นกล่าวรับว่า ‘ตถาสตุ’ แล้ว ด้วยเป็นผู้เห็นโทษแห่งหมู่สัตว์ทั้งหลาย จึงเป็นมหาตบสวินดำดิ่งอยู่ในสายน้ำ บำเพ็ญตบะเนิ่นนาน ครั้นแลเห็นบิดาของตน และเห็นคิริศะ (ศิวะ) หลับอยู่ในน้ำ จึงกล่าวว่า ‘หากไม่มีผู้ใดเป็นผู้ใหญ่กว่าข้าแล้วไซร้ ข้าจักสร้างประชาทั้งหลาย’”

Verse 14

तमब्रवीत्‌ पिता नास्ति त्वदन्य: पुरुषो5ग्रज: । स्थाणुरेष जले मग्नो विस्रब्ध: कुरु वैकृतम्‌,यह सुनकर पिता ब्रह्माने स्रष्टासे कहा--*तुम्हारे सिवा दूसरा कोई अग्रज पुरुष नहीं है। ये स्थाणु (शिव) हैं भी तो पानीमें डूबे हुए हैं; अतः तुम निश्चिन्त होकर सृष्टिका कार्य आरम्भ करो'

บิดา (พรหมา) จึงตรัสแก่ผู้สร้างนั้นว่า “นอกจากเจ้าแล้ว ไม่มีบุรุษผู้เป็นอัครชะอีกเลย ส่วนสถาณุ (ศิวะ) นี้ก็ดำจมอยู่ในน้ำ ฉะนั้นจงวางใจเถิด จงเริ่มกิจแห่งการสร้างโลก”

Verse 15

भूतान्यन्वसृजत्‌ सप्त दक्षादींस्तु प्रजापतीन्‌ । यैरिमं व्यकरोत्‌ सर्व भूतग्रामं चतुर्विधम्‌,तब स्रष्टाने सात प्रकारके प्राणियों और दक्ष आदि प्रजापतियोंको उत्पन्न किया, जिनके द्वारा उन्होंने इस चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायका विस्तार किया

แล้วผู้สร้างจึงบังเกิดหมู่ภูตทั้งเจ็ดจำพวก และยังทรงให้กำเนิดปรชาปติทั้งหลายมีทักษะเป็นต้น โดยท่านเหล่านั้นเอง พระองค์ได้ขยายหมู่สรรพสัตว์ทั้งปวงนี้ให้แผ่ไพศาลเป็นสี่หมวด

Verse 16

ता: सृष्टमात्रा: क्षुधिता: प्रजा: सर्वा: प्रजापतिम्‌ । बिभक्षयिषवो राजन्‌ सहसा प्राद्रवंस्तदा,राजन! सृष्टि होते ही समस्त प्रजा भूखसे पीड़ित हो प्रजापतिको ही खा जानेकी इच्छासे सहसा उनके पास दौड़ी गयी

ครั้นถูกสร้างขึ้นได้ไม่นาน เหล่าประชาทั้งปวงที่ถูกความหิวเผาผลาญ ก็พากันกรูกระโจนเข้าหาพรชาปติ โอ้พระราชา ด้วยความใคร่จะกลืนกินแม้กระทั่งผู้สร้างตนเอง

Verse 17

स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत्‌ । आशभ्यो मां भगवांस्त्रातु वृत्तिरासां विधीयताम्‌,जब प्रजा प्रजापतिको अपना आहार बनानेके लिये उद्यत हुई, तब वे आत्मरक्षाके लिये बड़े वेगसे भागकर पितामह ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए और बोले--'भगवन्‌! आप मुझे इन प्रजाओंसे बचाइये और इनके लिये कोई जीविका-वृत्ति नियत कर दीजिये” इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरकृष्णसंवादे सप्तदशो<ड्ध्याय:

เมื่อเหล่าประชาจะยึดพรชาปติเป็นอาหาร เขาผู้กำลังจะถูกกลืนกินจึงแสวงที่พึ่ง รีบพุ่งไปหาปิตามหะพรหมา แล้วทูลวิงวอนว่า “ข้าแต่พระผู้เป็นเจ้า โปรดคุ้มครองข้าจากเหล่าประชานี้ และโปรดกำหนดหนทางเลี้ยงชีพให้แก่พวกเขาเถิด”

Verse 18

ततस्ताभ्यो ददावन्नमोषधी: स्थावराणि च । जज़मानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम्‌,तब ब्रह्माजीने उन प्रजाओंको अन्न और ओषधि आदि स्थावर वस्तुएँ जीवन-निर्वाहके लिये दीं और अत्यन्त बलवान्‌ हिंसक जन्तुओंके लिये दुर्बल जंगम प्राणियोंको ही आहार निश्चित कर दिया

แล้วพรหมาจึงประทานอาหารและโอสถพืชพรรณอันเป็นสิ่งอยู่กับที่เพื่อการดำรงชีพแก่พวกเขา และสำหรับผู้มีกำลังยิ่ง ก็ทรงกำหนดให้สัตว์ผู้เคลื่อนไหวที่อ่อนแอเป็นอาหาร

Verse 19

विह्तितान्ना: प्रजास्तास्तु जग्मु: सृष्टा यथागतम्‌ | ततो ववृधिरे राजन्‌ प्रीतिमत्य: स्वयोनिषु,जिनकी सृष्टि हुई थी, उनके लिये जब भोजनकी व्यवस्था कर दी गयी, तब वे प्रजावर्गके लोग जैसे आये थे, वैसे लौट गये। राजन्‌! तदनन्तर सारी प्रजा अपनी ही योनियोंमें प्रसन्नतापूर्वक रहती हुई उत्तरोत्तर बढ़ने लगी

เมื่อได้จัดสรรอาหารให้แก่เหล่าประชาผู้ถูกสร้างแล้ว พวกเขาก็จากไป กลับไปดังที่มา ครั้นแล้ว โอ้พระราชา ประชาทั้งปวงต่างพอใจอยู่ในครรภ์และเผ่าพันธุ์ของตน จึงเจริญงอกงามทวีขึ้นโดยลำดับ

Verse 20

भूतग्रामे विवृद्धे तु तुष्टे लोकगुरावपि । उदतिष्ठज्जलाज्ज्येष्ठ: प्रजाश्लेमा ददर्श सः,जब प्राणिसमुदायकी भलीभाँति वृद्धि हो गयी और लोकगुरु ब्रह्मा भी संतुष्ट हो गये, तब वे ज्येष्ठ पुरुष शिव जलसे बाहर निकले। निकलनेपर उन्होंने इन समस्त प्रजाओंको देखा

ครั้นหมู่สรรพสัตว์เจริญเพิ่มพูนดีแล้ว และโลกคุรุพรหมาก็ทรงพอพระทัย ชายผู้เป็นใหญ่ยิ่งคือพระศิวะก็ผุดขึ้นจากสายน้ำ ครั้นออกมาแล้ว พระองค์ทอดพระเนตรเห็นเหล่าประชาทั้งปวงนั้น

Verse 21

बहुरूपा: प्रजा: सृष्टा विवृद्धाश्व स्वतेजसा | चुक्रोध भगवान्‌ रुद्रो लिड़ं स्वं चाप्यविध्यत,अनेक रूपवाली प्रजाकी सृष्टि हो गयी और वह अपने ही तेजसे भलीभाँति बढ़ भी गयी। यह देखकर भगवान्‌ रुद्र कुपित हो उठे और उन्होंने अपना लिंग काटकर फेंक दिया

เหล่าประชาสัตว์นานารูปได้บังเกิดขึ้น และด้วยรัศมีเดชโดยกำเนิดของตนเองก็เจริญไพบูลย์ยิ่งนัก ครั้นพระภควานรุทระทอดพระเนตรดังนั้นก็พิโรธ จึงตัดลึงคะของตนแล้วขว้างทิ้งไป

Verse 22

तत्‌ प्रविद्धं तथा भूमौ तथैव प्रत्यतिष्ठत । तमुवाचाव्ययो ब्रह्मा वचोभि: शमयन्निव,इस प्रकार भूमिपर डाला गया वह लिंग उसी रूपमें प्रतिष्ठित हो गया। तब अविनाशी ब्रह्माने अपने वचनोंद्वारा उन्हें शान्त करते हुए-से कहा--

ดังนั้นเมื่อลึงคะนั้นถูกขว้างลงสู่พื้น ก็ได้ตั้งมั่นอยู่ ณ ที่นั้นในรูปเดิม ครั้นแล้วพระพรหมผู้ไม่เสื่อมสลายตรัสขึ้น ประหนึ่งทรงปลอบประโลมด้วยพระวาจา—

Verse 23

कि कृतं सलिले शर्व चिरकालस्थितेन ते । किमर्थ चेदमुत्पाद्य लिड्ढ भूमौ प्रवेशितम्‌,“रुद्रदेव! आपने दीर्घकालतक जलमें स्थित रहकर कौन-सा कार्य किया है? और इस लिंगको उत्पन्न करके किसलिये पृथ्वीपर डाल दिया है?”

โอ้ ศรฺวะ (รุทระ)! ท่านสถิตอยู่ในสายน้ำเป็นเวลาช้านาน ได้กระทำกิจอันใดสำเร็จ? และเหตุไฉนจึงให้กำเนิดลึงคะนี้แล้วขว้างลงสู่แผ่นดินให้จมลงไป?

Verse 24

सो<ब्रवीज्जातसंरम्भस्तथा लोकगुरुर्गुरुम्‌ । प्रजा: सृष्टा: परेणेमा: कि करिष्याम्यनेन वै,यह प्रश्न सुनकर कुपित हुए जगदगुरु शिवने ब्रह्माजीसे कहा--'प्रजाकी सृष्टि तो दूसरेने कर डाली; फिर इस लिंगको रखकर मैं क्या करूँगा

ครั้นได้สดับดังนั้น พระศิวะผู้เป็นโลกคุรุพลันเดือดดาล ตรัสแก่พระพรหมผู้เป็นคุรุว่า—“ประชาสัตว์เหล่านี้ผู้อื่นก็ได้สร้างไว้แล้ว; แล้วเราจะเก็บลึงคะนี้ไว้ทำไมเล่า?”

Verse 25

तपसाधिगतं चाजन्न॑ प्रजार्थ मे पितामह । ओषध्य: परिवर्तेरन्‌ यथैवं सततं प्रजा:

ข้าแต่ปิตามหะ! คำบัญชานี้ข้าพเจ้าได้มาด้วยตบะเพื่อประโยชน์แห่งประชา ขอให้หมู่โอสถพฤกษาเวียนเกิดใหม่ครั้งแล้วครั้งเล่า เพื่อให้ประชาชนเจริญรุ่งเรืองสืบไปมิขาดสาย

Verse 26

'पितामह! मैंने जलमें तपस्या करके प्रजाके लिये अन्न प्राप्त किया है; वे अन्नरूप ओषधियाँ प्रजाओंके ही समान निरन्तर विभिन्न अवस्थाओंमें परिणत होती रहेंगी” ।। एवमुक्‍्त्वा स सक्रोधो जगाम विमना भव: । गिरेमुज्जवत: पादं तपस्तप्तुं महातपा:,ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए महातपस्वी महादेवजी उदास मनसे मुंजवान्‌ पर्वतकी घाटीपर तपस्या करनेके लिये चले गये

‘โอ้ปิตามหะ! เราได้บำเพ็ญตบะในสายน้ำจนได้อาหารเพื่อหมู่สัตว์โลก; สมุนไพรซึ่งเป็นรูปแห่งอาหารนั้นจักแปรเปลี่ยนเป็นสภาวะนานาประการอยู่เนืองนิตย์ ดุจเหล่าประชาสัตว์เอง.’ ครั้นกล่าวดังนี้แล้ว ภวะ (ศิวะ) ผู้โกรธเกรี้ยวและมีใจหม่นหมองก็จากไป มหาตบัสวีนั้นมุ่งสู่เชิงเขามุญชวัตเพื่อบำเพ็ญตบะต่อไป

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira confronts the ethical and causal problem of disproportionate harm: how an act executed by a limited group can extinguish many elite warriors, raising questions about justice, responsibility, and the legitimacy of means used in conflict.

The chapter teaches a layered causality model: outcomes in history may combine human intention with supra-human enabling conditions; interpreting calamity requires accounting for both agency and the metaphysical frameworks by which actors seek empowerment.

No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the meta-function is implicit—positioning the listener to read post-war events through theological and cosmological exempla rather than purely tactical narration.