
सौप्तिकपर्व — धृष्टद्युम्नसारथिवृत्तान्तः (Report of the Night Raid and Yudhiṣṭhira’s Lament)
Upa-parva: Sauptika-upākhyāna (Night-Raid Aftermath: Report to Yudhiṣṭhira)
Vaiśaṃpāyana recounts that, when night has passed, Dhṛṣṭadyumna’s charioteer informs Yudhiṣṭhira of the nocturnal devastation. The report specifies that Draupadī’s sons and the sons of Drupada were asleep in their own camp, trusting and unguarded, when the assault occurred. The perpetrators are named: Aśvatthāmā, Kṛpācārya (Gautama), and Kṛtavarmā, who cut down men, elephants, and horses with spears, lances, and axes, producing a sound likened to a great forest being felled. The messenger states he alone escaped from the forces, narrowly freed amid the chaos. Yudhiṣṭhira collapses under grief; Sātyaki, Bhīma, Arjuna, and the Mādrī twins support him. Regaining composure, Yudhiṣṭhira laments the paradox of victory: having defeated enemies, they are now “defeated,” and the fruits of conquest appear as calamity. He reflects on the moral inversion where artha resembles anartha, and jaya resembles ajaya. Extended metaphors portray the battle as an ocean with chariots, arrows, banners, and weapons as its elements, emphasizing the scale of the ordeal and the tragedy that the princes who endured it were later slain through pramāda. The chapter underscores that no ruin exceeds negligence; it displaces learning, austerity, prosperity, and fame, while inviting misfortune. Yudhiṣṭhira worries for Draupadī, imagining her collapse upon hearing of her sons’ death, and instructs Nakula to bring her (together with her maternal kin). He then proceeds, with companions and lamentation, toward the dreadful scene, where he sees bodies of sons, friends, and allies lying bloodied and mutilated, and again falls unconscious in anguish.
Chapter Arc: रात्रि के अंधकार से बच निकला एकमात्र सारथि काँपते स्वर में राजसभा को बताता है—द्रौपदी के पुत्र और पांचाल-शिविर, सब सोते हुए काट डाले गए। → वह हत्यारों के नाम गिनाता है—कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा—और बताता है कि कैसे प्रमाद (असावधानी) ने विजयी शिविर को असहाय बना दिया; युधिष्ठिर के भीतर शोक के साथ-साथ धर्म-संकट उठता है: यह विजय है या पराजय का दूसरा रूप? → युधिष्ठिर युद्धभूमि/शिविर में प्रवेश कर रक्तरंजित देहों को देखता है—पुत्र, सुहृद, सखा—कटे-फटे पड़े हैं; धर्मराज ऊँचे स्वर में विलाप करता हुआ मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ता है। → शोक से टूटे युधिष्ठिर को साथियों द्वारा संभाला जाता है; द्रौपदी को बुलाने/सूचित करने की अनिवार्यता सामने आती है—अब यह दुःख केवल राजधर्म नहीं, गृहधर्म और मातृत्व का भी है। → द्रौपदी जब इस समाचार को सुनेगी, तब उसका प्रतिशोध और धर्म-निर्णय किस दिशा में जाएगा?
Verse 1
अपन बक। ] अति्शशाड< (ऐषीकपर्व) दशमो<ध्याय: धृष्टद्युम्नके सारथिके मुखसे पुत्रों और पांचालोंके वधका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठटिरका विलाप, द्रौपदीको बुलानेके लिये नकुलको भेजना, सुहृदोंके साथ शिविरमें जाना तथा मारे हुए पुत्रादिको देखकर भाईसहित शोकातुर होना वैशम्पायन उवाच तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धृष्टद्युम्नस्य सारथि: । शशंस धर्मराजाय सौप्तिके कदनं कृतम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! वह रात व्यतीत होनेपर धृष्टद्युम्नके सारथिने रातको सोते समय जो संहार किया गया था, उसका समाचार धर्मराज युधिष्ठिरसे कह सुनाया
ไวศัมปายนะกล่าวว่า ครั้นราตรีนั้นล่วงไปแล้ว สารถีของธฤษฏทยุมน์ได้กราบทูลแด่ธรรมราชยุธิษฐิระถึงการสังหารหมู่ที่กระทำในยามผู้คนหลับใหล ณ ค่ายพัก
Verse 2
सूत उवाच द्रौपदेया हता राजन् द्रपदस्यात्मजै: सह | प्रमत्ता निशि विश्वस्ता: स्वपन्त: शिबिरे स्वके,सारथि बोला--राजन! ट्रुपदके पुत्रोंसहित द्रौपदी देवीके भी सारे पुत्र मारे गये। वे रातको अपने शिबिरमें निश्चिन्त एवं असावधान होकर सो रहे थे
สารถีกล่าวว่า ข้าแต่พระราชา บุตรทั้งหลายของเทราปทีถูกสังหารพร้อมกับบุตรของทฺรุปทะ พวกเขาหลับอยู่ในค่ายของตนยามราตรี ด้วยความวางใจ ไร้ความระแวดระวัง และเชื่อมั่นว่าปลอดภัย
Verse 3
कृतवर्मणा नृशंसेन गौतमेन कृपेण च । अश्रत्थाम्ना च पापेन हतं व: शिबिरं निशि,उसी समय क्रूर कृतवर्मा, गौतमवंशी कृपाचार्य तथा पापी अअश्वत्थामाने आक्रमण करके आपके सारे शिबिरका विनाश कर डाला
สารถีกล่าวว่า ในยามราตรี ค่ายของท่านถูกทำลายและสังหารล้มลงด้วยน้ำมือของกฤตวรมันผู้โหดเหี้ยม กฤปะแห่งวงศ์โคตมะ และอัศวัตถามันผู้บาปหนา
Verse 4
एतैर्नरगजाश्रानां प्रासशक्तिपरश्रवधथैः । सहस्राणि निकृन्तद्धिर्नि:शेषं ते बल॑ कृतम्,इन तीनोंने प्रास, शक्ति और फरसोंद्वारा सहस्रों मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको काट- काटकर आपकी सारी सेनाको समाप्त कर दिया है
สารถีกล่าวว่า “ด้วยหอก ศักติ และขวานศึกเหล่านั้น บุรุษเหล่านั้นได้ฟันสังหารนักรบ ม้า และช้างนับพัน จนกองทัพของท่านถูกทำลายสิ้นไม่เหลือแม้แต่น้อย”
Verse 5
छिद्यमानस्य महतो वनस्येव परश्चधै: । शुश्रुवे सुमहान् शब्दो बलस्य तव भारत,भारत! जैसे फरसोंसे विशाल जंगल काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उनके द्वारा छिन्न- भिन्न की जाती हुई आपकी विशाल वाहिनीका महान् आर्तनाद सुनायी पड़ता था
สารถีกล่าวว่า “โอ ภารตะ! ดุจป่ามหึมาถูกสับด้วยขวานจนเกิดเสียงกึกก้อง ฉันใด เสียงคำรามปนโหยหวนอันมหึมาของกองทัพท่านก็ได้ยินฉันนั้น เมื่อถูกพวกเขาฟันฉีกเป็นชิ้นๆ”
Verse 6
अहमेको<वशिष्ट स्तु तस्मात् सैन्यान्महामते । मुक्त: कथंचिद् धर्मात्मन् व्यग्राच्च कृतवर्मण:,महामते! धर्मात्मन्! उस विशाल सेनासे अकेला मैं ही किसी प्रकार बचकर निकल आया हूँ। कृतवर्मा दूसरोंको मारनेमें लगा हुआ था; इसीलिये मैं उस संकटसे मुक्त हो सका हूँ
สารถีกล่าวว่า “โอ ผู้มีปัญญา! โอ ผู้ตั้งมั่นในธรรม! จากกองทัพใหญ่นั้น เหลือรอดเพียงข้าคนเดียว ข้ารอดมาได้อย่างไร้คำอธิบาย เพราะกฤตวรมันกำลังวุ่นอยู่กับการสังหารผู้อื่น ข้าจึงพ้นจากภัยนั้น”
Verse 7
तच्छुत्वा वाक्यमशिवं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । पपात महां दुर्धर्ष: पुत्रशोकसमन्वित:,वह अमंगलमय वचन सुनकर दुर्धर्ष राजा दुन्तीपुत्र युधिष्ठिर पुत्रशोकसे संतप्त हो पृथ्वीपर गिर पड़े
ครั้นได้ยินถ้อยคำอัปมงคลนั้น ยุธิษฐิระ โอรสแห่งกุนตี ผู้ยิ่งใหญ่และยากจะปราบ ก็ทรุดล้มลงสู่พื้นดิน ด้วยความโศกเศร้าต่อบุตรทั้งหลาย
Verse 8
पतन्तं तमतिक्रम्य परिजग्राह सात्यकि: । भीमसेनोथ्डर्जुनश्वैव माद्रीपुत्री च पाण्डवौ,गिरते समय आगे बढ़कर सात्यकिने उन्हें थाम लिया। भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेवने भी उन्हें पकड़ लिया
เมื่อเขากำลังจะล้ม สาตยกีก็พุ่งเข้าไปข้างหน้า แซงขึ้นแล้วประคองไว้ จากนั้นภีมเสนและอรชุน ตลอดจนโอรสทั้งสองของมาทรีในหมู่ปาณฑพ—นกุลและสหเทว—ก็เข้าจับยึดและพยุงเขาไว้ด้วย
Verse 9
इस प्रकार श्रीमह्या भारत सौप्तिकपर्वमें दुर्योधनका प्राणत्यागविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ,लब्धचेतास्तु कौन्तेय: शोकविह्नललया गिरा । जित्वा शत्रून् जितः पश्चात् पर्यदेवयदार्तवत् फिर होशमें आनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल वाणीद्वारा आर्तकी भाँति विलाप करने लगे--'हाय! मैं शत्रुओंको पहले जीतकर पीछे पराजित हो गया
ไวศัมปายนะกล่าวว่า—เมื่อได้สติคืนมา ยุธิษฐิระโอรสแห่งกุนตี ผู้มีวาจาถูกความโศกกลั้นไว้ ก็เริ่มคร่ำครวญดุจผู้ทุกข์ระทมยิ่งว่า “อนิจจา! เราชนะศัตรูก่อนแล้ว ภายหลังกลับเป็นผู้พ่ายแพ้เสียเอง”
Verse 10
दुर्विदा गतिरर्थानामपि ये दिव्यचक्षुष: । जीयमाना जयन्त्यन्ये जयमाना वयं जिता:,“जो लोग दिव्य दृष्टिसे सम्पन्न हैं, उनके लिये भी पदार्थोकी गतिको समझना अत्यन्त दुष्कर है। हाय! दूसरे लोग तो हारकर जीतते हैं; किंतु हमलोग जीतकर हार गये हैं! उन्हें देखकर कुरुकुलशिरोमणि तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त दुःखी हो गये और उच्चस्वरसे फ़ूट-फूटकर रोने लगे। धीरे-धीरे उनकी संज्ञा लुप्त हो गयी और वे अपने साथियोंसहित पृथ्वीपर गिर पड़े ।। इति श्रीमहा भारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि युधिष्ठिरशिविरप्रवेशे दशमो<ध्याय:
สุตะกล่าวว่า—แม้ผู้มีทิพยจักษุก็ยากยิ่งที่จะหยั่งรู้ความผันแปรแห่งกิจการทั้งหลาย. อนิจจา! คนอื่นแม้พ่ายก็ยังได้ชัย; แต่เรานั้นแม้ชนะกลับเป็นผู้พ่าย!
Verse 11
हत्वा भ्रातृन् वयस्यांश्व पितृन् पुत्रान् सुहृद्गणान् । बन्धूनमात्यान् पोत्रांश्व जित्वा सर्वाञ्जिता वयम्,“हमने भाइयों, समवयस्क मित्रों, पितृतुल्य पुरुषों, पुत्रों, सुहृदगणों, बन्धुओं, मन्त्रियों तथा पौत्रोंकी हत्या करके उन सबको जीतकर विजय प्राप्त की थी; परंतु अब शत्रुओंद्वारा हम ही पराजित हो गये
สุตะกล่าวว่า—เมื่อเราฆ่าพี่น้อง สหายร่วมวัย ผู้ใหญ่ดุจบิดา บุตร เหล่าสหายผู้หวังดี ญาติพี่น้อง อมาตย์ และแม้กระทั่งหลาน แล้ว ‘พิชิต’ เขาทั้งสิ้นจึงได้ชัยมา; แต่บัดนี้ในที่สุด ศัตรูกลับเป็นผู้พิชิตเราเสียเอง
Verse 12
अनर्थों हुर्थसंकाशस्तथानर्थो<र्थदर्शन: । जयो5यमजयाकारो जयस्तस्मात् पराजय:,“कभी-कभी अनर्थ भी अर्थ-सा हो जाता है और अर्थके रूपमें दिखायी देनेवाली वस्तु भी अनर्थके रूपमें परिणत हो जाती है, इसी प्रकार हमारी यह विजय भी पराजयका ही रूप धारण करके आयी थी, इसलिये जय भी पराजय बन गयी
สุตะกล่าวว่า—บางคราวเคราะห์ร้ายกลับปรากฏดุจลาภ และสิ่งที่เห็นว่าเป็นลาภกลับกลายเป็นเคราะห์ร้าย. ฉันใดก็ฉันนั้น ‘ชัยชนะ’ ของเรามาครอบรูปแห่งความพ่ายแพ้; เพราะเหตุนั้น ชัยจึงกลายเป็นปราชัย
Verse 13
यज्जित्वा तप्यते पश्चादापन्न इव दुर्मति: । कथं मन्येत विजयं ततो जिततर: परै:,“दुर्बुद्धि मनुष्य यदि विजय-लाभके पश्चात् विपत्तिमें पड़े हुए पुरुषकी भाँति अनुताप करता है तो वह अपनी उस जीतको जीत कैसे मान सकता है? क्योंकि उस दशामें तो वह शत्रुओंद्वारा पूर्णतः: पराजित हो चुका है
เมื่อได้ชัยแล้ว หากคนเขลายังร้อนรุ่มภายหลังดุจผู้ตกอยู่ในหายนะ เขาจะนับสิ่งนั้นเป็นชัยได้อย่างไร? เพราะในสภาพเช่นนั้น เขาย่อมถูกศัตรูพิชิตยิ่งกว่าเดิมแล้ว
Verse 14
येषामर्थाय पापं स्थाद् विजयस्य सुहृद्वधैः । निर्जितिरप्रमत्ति्हि वेजिता जितकाशिन:,“जिन्हें विजयके लिये सुहृदोंके वधका पाप करना पड़ता है, वे एक बार विजयलक्ष्मीसे उललसित भले ही हो जायँ, अन्तमें पराजित होकर सतत सावधान रहनेवाले शत्रुओंके हाथसे उन्हें पराजित होना ही पड़ता है
ผู้ใดเพื่อชัยชนะยอมก่อบาปด้วยการสังหารมิตรผู้หวังดีของตน แม้จะได้ชื่นชมยินดีอยู่ชั่วครู่ในรัศมีแห่งชัย แต่ท้ายที่สุดชัยชนะอันมัวหมองนั้นย่อมตั้งอยู่มิได้—เขาจักต้องพ่ายแพ้ต่อศัตรูผู้เฝ้าระวังอยู่เสมอ
Verse 15
कर्णिनालीकरदंष्टस्य खड्गजिह्डस्य संयुगे । चापव्यात्तस्य रौद्रस्य ज्यातलस्वननादिन:,'क्रोधमें भरा हुआ कर्ण मनुष्योंमें सिंहंके समान था। कर्णि और नालीक नामक बाण उसकी दाँढ़ें तथा युद्धमें उठी हुई तलवार उसकी जिह्ला थी। धनुषका खींचना ही उसका मुँह फैलाना था। प्रत्यंचाकी टंकार ही उसके लिये दहाड़नेके समान थी। युद्धोंमें कभी पीठ न दिखानेवाले उस भयंकर पुरुषसिंहके हाथसे जो जीवित छूट गये, वे ही ये मेरे सगे-सम्बन्धी अपनी असावधानीके कारण मार डाले गये हैं
ในสนามรบ กรรณะผู้เดือดดาลดุจสิงห์ท่ามกลางมนุษย์ ศรกรฺณินและนาลีกะเป็นดั่งเขี้ยวของเขา ดาบที่ชูขึ้นในศึกเป็นดั่งลิ้น การดึงคันธนูประหนึ่งอ้าปากกว้าง และเสียงสายธนูดังกังวานดุจคำราม ผู้ใดเคยรอดชีวิตจากมือของนรสิงห์ผู้ไม่เคยหันหลังให้สงครามผู้นั้น—ก็คือญาติของข้าเอง—บัดนี้กลับถูกสังหารเพราะความประมาท
Verse 16
क़ुद्धस्य नरसिंहस्य संग्रामेष्वपलायिन: । ये व्यमुज्चन्त कर्णस्य प्रमादात् त इमे हता:,'क्रोधमें भरा हुआ कर्ण मनुष्योंमें सिंहंके समान था। कर्णि और नालीक नामक बाण उसकी दाँढ़ें तथा युद्धमें उठी हुई तलवार उसकी जिह्ला थी। धनुषका खींचना ही उसका मुँह फैलाना था। प्रत्यंचाकी टंकार ही उसके लिये दहाड़नेके समान थी। युद्धोंमें कभी पीठ न दिखानेवाले उस भयंकर पुरुषसिंहके हाथसे जो जीवित छूट गये, वे ही ये मेरे सगे-सम्बन्धी अपनी असावधानीके कारण मार डाले गये हैं
กรรณะนรสิงห์ผู้เดือดดาลและไม่เคยหนีจากศึก—ผู้ใดเคยรอดชีวิตจากมือของเขา—ผู้นั้นเองบัดนี้ถูกสังหาร ณ ที่นี้ เพราะความประมาทของตน
Verse 17
रथद्वदं शरवर्षोर्मिमन्तं रत्नाचितं वाहनवाजियुक्तम् | शक्त्यूष्टिमीनध्वजनागनक्रं शरासनावर्तमहेषुफेनम्,“ट्रोणाचार्य महासागरके समान थे, रथ ही पानीका कुण्ड था, बाणोंकी वर्षा ही लहरोंके समान ऊपर उठती थी, रत्नमय आभूषण ही उस द्रोणरूपी समुद्रके रत्न थे, रथके घोड़े ही समुद्री घोड़ोंके समान जान पड़ते थे, शक्ति और ऋष्टि मत्स्यके समान तथा ध्वज नाग एवं मगरके तुल्य थे, धनुष ही भँवर तथा बड़े-बड़े बाण ही फेन थे, संग्राम ही चन्द्रोदय बनकर उस समुद्रके वेगको चरम सीमातक पहुँचा देता था, प्रत्यंचा और पहियोंकी ध्वनि ही उस महासागरकी गर्जना थी; ऐसे टद्रोणरूपी सागरको जो छोटे-बड़े नाना प्रकारके शस्त्रोंकी नौका बनाकर पार गये, वे ही राजकुमार असावधानीसे मार डाले गये
โทรณะอาจารย์ประหนึ่งมหาสมุทร—รถศึกเป็นดั่งสระน้ำ ฝนศรเป็นดั่งคลื่นที่ซัดสาด เครื่องประดับอัญมณีเป็นดั่งขุมทรัพย์ ม้าและยานเป็นดั่งม้าแห่งท้องทะเล หอกและทวนเป็นดั่งฝูงปลา ธงเป็นดั่งนาคและมกร คันธนูเป็นดั่งวังวน และศรใหญ่เป็นดั่งฟองคลื่น บรรดาเจ้าชายผู้เคยข้าม “สมุทรโทรณะ” ด้วยเรือคืออาวุธนานาชนิด ทั้งเล็กและใหญ่ ภายหลังกลับถูกสังหารเพราะความประมาท
Verse 18
संग्रामचन्द्रोदयवेगवेलं द्रोणार्णवं ज्यातलनेमिघोषम् । ये तेरुरुच्चावचशस्त्रनौभि- स्ते राजपुत्रा निहता: प्रमादात्,“ट्रोणाचार्य महासागरके समान थे, रथ ही पानीका कुण्ड था, बाणोंकी वर्षा ही लहरोंके समान ऊपर उठती थी, रत्नमय आभूषण ही उस द्रोणरूपी समुद्रके रत्न थे, रथके घोड़े ही समुद्री घोड़ोंके समान जान पड़ते थे, शक्ति और ऋष्टि मत्स्यके समान तथा ध्वज नाग एवं मगरके तुल्य थे, धनुष ही भँवर तथा बड़े-बड़े बाण ही फेन थे, संग्राम ही चन्द्रोदय बनकर उस समुद्रके वेगको चरम सीमातक पहुँचा देता था, प्रत्यंचा और पहियोंकी ध्वनि ही उस महासागरकी गर्जना थी; ऐसे टद्रोणरूपी सागरको जो छोटे-बड़े नाना प्रकारके शस्त्रोंकी नौका बनाकर पार गये, वे ही राजकुमार असावधानीसे मार डाले गये
ศึกสงครามดุจจันทราอุบัติ ทำให้คลื่นเชี่ยวของ “สมุทรโทรณะ” พุ่งพล่าน—ซึ่งเสียงคำรามคือเสียงสายธนูและล้อรถศึก บรรดาเจ้าชายผู้เคยข้ามสมุทรนั้นด้วยเรือคืออาวุธนานาชนิด ทั้งสูงและต่ำ ในที่สุดกลับถูกสังหารเพราะความประมาท
Verse 19
न हि प्रमादात् परमस्ति कश्रिद् वधो नराणामिह जीवलोके । प्रमत्तमर्था हि नरं समन्तात् त्यजन्त्यनर्थाक्ष समाविशन्ति,'प्रमादसे बढ़कर इस संसारमें मनुष्योंके लिये दूसरी कोई मृत्यु नहीं। प्रमादी मनुष्यको सारे अर्थ सब ओरसे त्याग देते हैं और अनर्थ बिना बुलाये ही उसके पास चले आते हैं
ในโลกแห่งชีวิตนี้ สำหรับมนุษย์แล้ว ไม่มีผู้ทำลายใดร้ายแรงยิ่งไปกว่าความประมาท ครั้นบุรุษเผลอเลินเล่อ ความรุ่งเรืองและเป้าหมายอันชอบธรรมย่อมทอดทิ้งเขาจากทุกทิศ ส่วนเคราะห์ร้ายมิได้เชื้อเชิญกลับกรูกันเข้ามาครอบงำชีวิตของเขา
Verse 20
ध्वजोत्तमाग्रोच्छितधूमकेतु शरार्चिषं कोपमहासमीरम् । महाथनुर्ज्यातलनेमिघोषं तनुत्रनानाविधशस्त्रहोमम्,“महासमरमें भीष्मरूपी अग्नि जब पाण्डव-सेनाको जला रही थी, उस समय ऊँची ध्वजाओंके शिखरपर फहराती हुई पताका ही धूमके समान जान पड़ती थी, बाण-वर्षा ही आगकी लपछें थीं, क्रोध ही प्रचण्ड वायु बनकर उस ज्वालाको बढ़ा रहा था, विशाल धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और रथके पहियोंका शब्द ही मानो उस अग्निदाहसे उठनेवाली चट-चट ध्वनि था, कवच और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उस आगकी आहुति बन रहे थे, विशाल सेनारूपी सूखे जंगलमें दावानलके समान वह आग लगी थी, हाथमें लिये हुए अस्त्र-शस्त्र ही उस अग्निके प्रचण्ड वेग थे, ऐसे अग्निदाहके कष्टको जिन्होंने सह लिया, वे ही राजपुत्र प्रमादवश मारे गये
ในมหาสงครามนั้น เมื่อเพลิงอันมีภีษมะเป็นดุจตัวไฟเผาผลาญกองทัพปาณฑพ ธงสูงที่ยอดเสาธงดูประหนึ่งควันของมัน; ห่าลูกศรคือแลบลิ้นเพลิง; และความพิโรธกลายเป็นลมกรรโชกอันเกรี้ยวกราดคอยโหมให้ลุกแรงขึ้น เสียงสะท้านของสายธนูใหญ่ เสียงตบฝ่ามือ และเสียงครืนครั่นของล้อรถศึก คล้ายเสียงแตกปะทุของเปลวไฟนั้น ส่วนเกราะและอาวุธนานาชนิดก็เป็นดั่งเครื่องบูชา (อาหุติ) แด่เพลิงสงคราม
Verse 21
महाचमूकक्षदवाभिपन्नं महाहवे भीष्ममयाग्निदाहम् । ये सेहुरात्तायुधती&णवेगं ते राजपुत्रा निहता: प्रमादात्,“महासमरमें भीष्मरूपी अग्नि जब पाण्डव-सेनाको जला रही थी, उस समय ऊँची ध्वजाओंके शिखरपर फहराती हुई पताका ही धूमके समान जान पड़ती थी, बाण-वर्षा ही आगकी लपछें थीं, क्रोध ही प्रचण्ड वायु बनकर उस ज्वालाको बढ़ा रहा था, विशाल धनुषकी प्रत्यंचा, हथेली और रथके पहियोंका शब्द ही मानो उस अग्निदाहसे उठनेवाली चट-चट ध्वनि था, कवच और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उस आगकी आहुति बन रहे थे, विशाल सेनारूपी सूखे जंगलमें दावानलके समान वह आग लगी थी, हाथमें लिये हुए अस्त्र-शस्त्र ही उस अग्निके प्रचण्ड वेग थे, ऐसे अग्निदाहके कष्टको जिन्होंने सह लिया, वे ही राजपुत्र प्रमादवश मारे गये
ในมหาศึกนั้น เมื่อกองทัพใหญ่ถูกครอบงำด้วยเพลิงดุจไฟป่าซึ่งมีภีษมะเป็นตัวไฟ ผู้เป็นราชกุมารทั้งหลายที่ทนรับแรงพุ่งอันรุนแรงของอาวุธที่เขาชูขึ้นได้ กลับถูกสังหารในภายหลังเพราะความประมาท
Verse 22
न हि प्रमत्तेन नरेण शक््यं विद्या तप: श्रीविंपुलं यशो वा । पश्याप्रमादेन निहत्य शत्रून् सर्वान् महेन्द्र सुखमेधमानम्,'प्रमादी मनुष्य कभी विद्या, तप, वैभव अथवा महान् यश नहीं प्राप्त कर सकता। देखो, देवराज इन्द्र प्रमाद छोड़ देनेके ही कारण अपने सारे शत्रुओंका संहार करके सुखपूर्वक उन्नति कर रहे हैं
บุรุษผู้ประมาทย่อมไม่อาจบรรลุวิชา ตบะ ความรุ่งเรืองอันไพบูลย์ หรือเกียรติยศอันใหญ่หลวงได้ จงดูมหินทร (อินทรา) ผู้ละความประมาทแล้วปราบศัตรูทั้งปวง จึงเจริญก้าวหน้าด้วยความสุข
Verse 23
इन्द्रोपमान् पार्थिवपुत्रपौत्रान् पश्याविशेषेण हतान् प्रमादात् । तीर्त्वा समुद्र वणिज: समृद्धा मग्ना: कुनद्यामिव हेलमाना:
เมื่อเห็นบุตรและหลานของกษัตริย์ทั้งหลาย ผู้มีเดชดุจอินทรา ถูกสังหารเพราะความประมาทโดยไม่เลือกหน้า ก็ชวนให้นึกถึงพ่อค้าที่มั่งคั่งซึ่งข้ามมหาสมุทรมาแล้ว แต่กลับจมในลำธารเล็ก ๆ เพราะความชะล่าใจและทะนงตน
Verse 24
“देखो, प्रमादके ही कारण ये इन्द्रके समान पराक्रमी, राजाओंके पुत्र और पौत्र सामान्य रूपसे मार डाले गये, जैसे समृद्धिशाली व्यापारी समुद्रको पार करके प्रमादवश अवहेलना करनेके कारण छोटी-सी नदीमें डूब गये हों ।। अमर्षितैयें निहता: शयाना निःसंशयं ते त्रिदिवं प्रपन्ना: कृष्णां तु शोचामि कथं नु साध्वी शोकार्णवे साद्य विनड्क्षयतीति,'शत्रुओंने अमर्षके वशीभूत होकर जिन्हें सोते समय ही मार डाला है वे तो निःसंदेह स्वर्गलोकमें पहुँच गये हैं। मुझे तो उस सती साध्वी कृष्णाके लिये चिन्ता हो रही है जो आज शोकके समुद्रमें डूबकर नष्ट हो जानेकी स्थितिमें पहुँच गयी है
สุตะกล่าวว่า “จงดูเถิด เพราะความประมาทแท้ ๆ เหล่าโอรสและหลานแห่งกษัตริย์ ผู้กล้าหาญดุจพระอินทร์เหล่านี้ ถูกสังหารอย่างไม่เลือกหน้า ราวกับพ่อค้ามั่งคั่งข้ามมหาสมุทรมาได้แล้ว กลับจมน้ำในลำธารเล็ก ๆ เพราะดูแคลนด้วยความเลินเล่อ ผู้ที่ถูกศัตรูซึ่งถูกครอบงำด้วยโทสะฆ่าขณะหลับนั้น ย่อมไปถึงสวรรค์โดยไม่ต้องสงสัย แต่ความห่วงใยของข้าพเจ้ามีต่อสตรีผู้ทรงศีลคือกฤษณา (เทราปที)—วันนี้นางจะไม่พินาศได้อย่างไร เมื่อจมลงในมหาสมุทรแห่งความโศก?”
Verse 25
भातृश्न पुत्रांश्ष हतान् निशम्य पाज्चालराजं पितरं च वृद्धम् । ध्रुवं विसंज्ञा पतिता पृथिव्यां सा शोष्यते शोककृशाड्रयष्टि:,“एक तो पहलेसे ही शोकके कारण क्षीण होकर उसकी देह सूखी लकड़ीके समान हो गयी है? दूसरे फिर जब वह अपने भाइयों, पुत्रों तथा बूढ़े पिता पांचालराज ट्रुपदकी मृत्युका समाचार सुनेगी तब और भी सूख जायगी तथा अवश्य ही अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ेगी
สุตะกล่าวว่า “เมื่อได้ยินว่าพี่น้องและบุตรถูกสังหาร และบิดาชราผู้เป็นกษัตริย์แห่งปัญจาละก็ล้มลงด้วย นางย่อมทรุดลงสู่พื้นดินอย่างหมดสติเป็นแน่ แรกเริ่มก็ซูบผอมด้วยความโศกอยู่แล้ว นางจะยิ่งเหี่ยวแห้งลงไปอีก—ประหนึ่งไม้เท้าแห้งกรอบ”
Verse 26
तच्छोकजं दुःखमपारयन्ती कथं भविष्यत्युचिता सुखानाम् | पुत्रक्षय भ्रातृवधप्रणुन्ना प्रदह्ममानेन हुताशनेन,“जो सदा सुख भोगनेके ही योग्य है, वह उस शोकजनित दुःखको न सह सकनेके कारण न जाने कैसी दशाको पहुँच जायगी? पुत्रों और भाइयोंके विनाशसे व्यथित हो उसके हृदयमें जो शोककी आग जल उठेगी, उससे उसकी बड़ी शोचनीय दशा हो जायगी'
สุตะกล่าวว่า “นางผู้เคยชินแต่ความสุข จะทนทุกข์ที่เกิดจากความโศกนั้นไม่ไหว—จะตกอยู่ในสภาพเช่นไรเล่า? เมื่อถูกกระหน่ำด้วยความพินาศของบุตรและการสังหารพี่น้อง ไฟแห่งความเศร้าจะลุกโชนอยู่ภายใน และด้วยการเผาผลาญนั้น สภาพของนางจักน่าเวทนายิ่งนัก”
Verse 27
इत्येवमार्त: परिदेवयन् स राजा कुरूणां नकुलं बभाषे । गच्छानयैनामिह मन्दभाग्यां समातृपक्षामिति राजपुत्रीम्,इस प्रकार आर्तस्वरसे विलाप करते हुए कुरुराज युधिष्ठिरने नकुलसे कहा--“भाई! जाओ, मन्दभागिनी राजकुमारी द्रौपदीको उसके मातृपक्षकी स्त्रियोंक साथ यहाँ लिया लाओ'”
ครั้นคร่ำครวญด้วยความทุกข์ระทมดังนี้ กษัตริย์แห่งกุรุคือยุธิษฐิระจึงกล่าวแก่นกุลว่า “พี่น้องเอ๋ย จงไปนำราชธิดาผู้เคราะห์ร้ายคือเทราปที มาพร้อมกับสตรีฝ่ายวงศ์มารดาของนาง ณ ที่นี้”
Verse 28
माद्रीसुतस्तत् परिगृहा वाक््यं धर्मेण धर्मप्रतिमस्य राज्ञ: । ययौ रथेनालयमाशो देव्या: पाञ्चालराजस्य च यत्र दारा:,माद्रीकुमार नकुलने धर्माचरणके द्वारा साक्षात् धर्ममाजकी समानता करनेवाले राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा शिरोधार्य करके रथके द्वारा तुरंत ही महारानी द्रौपदीके उस भवनकी ओर प्रस्थान किया, जहाँ पांचालराजके घरकी भी महिलाएँ रहती थीं
นกุล โอรสแห่งมาทรี รับพระบัญชาของพระเจ้ายุธิษฐิระ—ผู้มั่นคงในธรรมและประหนึ่งธรรมเอง—ด้วยความเคารพ แล้วขึ้นรถศึกรีบมุ่งไปยังตำหนักของพระเทวีเทราปที อันเป็นที่พำนักของสตรีในราชสำนักแห่งปัญจาละด้วย
Verse 29
प्रस्थाप्य माद्रीसुतमाजमीढ: शोकार्दितस्तै: सहित: सुहृद्धिः । रोरूयमाण: प्रययौ सुताना- मायोधनं भूतगणानुकीर्णम्,माद्रीकुमारको वहाँ भेजकर अजमीढ़कुलनन्दन युधिष्ठिर शोकाकुल हो उन सभी सुहृदोंके साथ बारंबार रोते हुए पुत्रोंके उस युद्धस्थलमें गये, जो भूतगणोंसे भरा हुआ था
Having dispatched Mādrī’s son, Ajāmīḍha’s descendant (Yudhiṣṭhira), crushed by grief, set out with those loyal friends. Weeping again and again, he went to the battlefield where his sons lay—now a place thronged with bands of spirits—underscoring how war’s aftermath overwhelms even the righteous with sorrow and dread.
Verse 30
स तत् प्रविश्याशिवमुग्ररूप॑ ददर्श पुत्रान् सुहृद: सखी श्व॒ । भूमौ शयानान् रुधिराद्द्रगात्रान् विभिन्नदेहान् प्रह्तोत्तमाड्रान्,उस भयंकर एवं अमंगलमय स्थानमें प्रवेश करके उन्होंने अपने पुत्रों, सुहदों और सखाओंको देखा, जो खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़े थे। उनके शरीर छिज्न-भिन्न हो गये थे और मस्तक कट गये थे
Entering that dreadful place, ominous and fierce in aspect, he beheld his sons, his well-wishers, and his companions lying on the ground—limbs soaked in blood, bodies mangled and torn apart, their heads struck down. The scene exposes the moral collapse of nocturnal slaughter: when restraint and dharma are abandoned, victory turns into a vision of ruin and grief.
Verse 31
स तांस्तु दृष्टवा भृशमार्तरूपो युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठ: । उच्चै: प्रचुक्रोश च कौरवाग्रय: पपात चोर्व्या सगणो विसंज्ञ:
Seeing them thus, Yudhiṣṭhira—foremost among the upholders of dharma—was overwhelmed with acute anguish. The chief of the Kaurus cried out loudly and, together with his attendants, collapsed upon the earth, senseless. The verse underscores how even the most steadfastly righteous are shaken when confronted with the catastrophic moral and human cost of war.
The crisis is the collapse of moral clarity after a nominal victory: the slaughter of sleeping allies forces Yudhiṣṭhira to question whether conquest that culminates in such loss can be called ‘jaya’ at all.
The chapter presents negligence as a comprehensive destroyer—undermining security, competence, and prosperity—implying that vigilance and disciplined governance are ethical necessities, not merely tactical preferences.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-commentary functions implicitly through didactic reflection, positioning the episode as a cautionary case-study on pramāda and the moral volatility of ‘victory’.