Vasiṣṭhasya śokaḥ, Vipāśā–Śatadrū-nāmākaraṇam, Kalmāṣapādasya bhaya-prasaṅgaḥ (Ādi Parva 167)
याज उवाच याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम् । कथं काम न संदध्यात् सा त्वं विप्रेहि तिष्ठ वा,याजने कहा--इस हविष्यको स्वयं याजने पकाकर तैयार किया है और उपयाजने इसे अभिमन्त्रित किया है; अतः तुम आओ या वहीं खड़ी रहो, यह हविष्य यजमानकी कामनाको पूर्ण कैसे नहीं करेगा?
యాజుడు పలికెను— “ఈ హవిష్యాన్ని నేనే వండించి సిద్ధం చేసితిని; ఉపయాజుడు దీనిని మంత్రబలంతో అభిమంత్రించెను. అటువంటిది యజమానుని కోరికను ఎలా నెరవేర్చదు? నీవు రా, లేక అక్కడే నిలుచుండుము.”
याज उवाच