Adhyaya 223
Adi ParvaAdhyaya 22322 Verses

Adhyaya 223

Śārṅgaka-stuti to Agni during the Khāṇḍava Conflagration (शार्ङ्गक-स्तुतिः / अग्नि-स्तुतिः)

Upa-parva: Khāṇḍava-dāha Upākhyāna (Episode of the Khāṇḍava Forest Conflagration and the Śārṅgaka Birds)

This chapter stages a tightly structured crisis dialogue among the Śārṅgaka birds and Agni. Jarītāri opens with a maxim on foresight: the intelligent remain awake before adversity and do not succumb to distress when hardship arrives; the unmindful, surprised by crisis, becomes confused. The brothers affirm Jarītāri’s courage and wisdom, while also articulating jyeṣṭha-dharma—the eldest must protect; if the elder lacks discernment, the younger cannot compensate. As the fire approaches (depicted with vivid epithets: seven-tongued, emaciated, licking flames), Vaiśaṃpāyana frames Jarītāri’s response: he offers stuti with folded hands. The hymns identify Agni as cosmic mediator—wind’s essence, water’s womb, sun-like rays, sustainer of beings, consumer and transformer of offerings, and cyclical agent of creation and reconstitution. The birds explicitly seek refuge, claiming no protector other than Agni. Agni responds that Droṇa’s words are brahman-like and recalls Mandapāla’s prior notification to spare the young; he invites a request. Droṇa petitions that predatory cats be placed into Agni’s jaws, removing the immediate threat. Agni assents, spares the birds, and continues to burn Khāṇḍava, fulfilling the broader narrative trajectory while honoring the negotiated protection.

Chapter Arc: खाण्डववन-दाह की योजना में अग्नि अपने पूर्व-पराभव का वृत्तान्त और बाधा का संकेत देता है—इन्द्र की वर्षा से वह बार-बार रोका गया है; अब उसे ऐसे सहायक चाहिए जो देव-वर्षा को भी निष्फल कर दें। → अग्नि ब्रह्मा के पास जाकर ‘यथान्याय’ सब निवेदन करता है; ब्रह्मा विचार कर उपाय बताता है कि उचित काल-क्षण और समर्थ मानव-वीर के सहारे ही खाण्डव दहेगा। उधर अर्जुन अपनी व्यावहारिक कठिनाइयाँ रखता है—उसके बाहुबल के अनुरूप धनुष नहीं, अक्षय बाणों का भार साधारण रथ नहीं ढो सकता, और कृष्ण के पराक्रम के तुल्य आयुध भी चाहिए। → अर्जुन सीधे लक्ष्य पर आता है: ‘भगवन्, ऐसा उपाय बताइये जिससे मैं इन्द्र की वर्षा को रोक सकूँ’—यानी देव-शक्ति के प्रतिरोध का संकल्प, और साथ ही दिव्य अस्त्र-शस्त्र/रथ/अश्व की माँग, ताकि अग्नि का कार्य सिद्ध हो। → अग्नि अर्जुन-कृष्ण की शर्तों और आवश्यकताओं को स्वीकारते हुए उन्हें ‘करणानि समर्थानि’ देने की दिशा में संवाद को स्थिर करता है—पुरुषार्थ वे करेंगे, साधन वह उपलब्ध कराएगा; इस प्रकार खाण्डव-दाह की तैयारी निर्णायक रूप से आगे बढ़ती है। → दिव्य साधनों का वास्तविक दान और इन्द्र-वर्षा के विरुद्ध प्रत्यक्ष प्रतिरोध अगले प्रसंग में फूटने को है—क्या मनुष्य-वीर देव-राज की वर्षा को रोक पाएँगे?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अग्निपराभवविषयक दो सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २२२ ॥। ऑपनआक्राा बछ। अर: 2 त्रयोविशर्त्याधेकद्विशततमो< ध्याय: अर्जुनका अग्निकी प्रार्थना स्वीकार करके उनसे दिव्य धनुष एवं रथ आदि माँगना वैशम्पायन उवाच स तु नैराश्यमापन्न: सदा ग्लानिसमन्वित: । पितामहमुपागच्छत्‌ संक्रुद्धो हव्यवाहन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अपनी असफलतासे अग्निदेवको बड़ी निराशा हुई। वे सदा ग्लानिमें डूबे रहने लगे और कुपित हो पितामह ब्रह्माजीके पास गये

वैशम्पायन उवाच—स तु नैराश्यमापन्नः सदा ग्लानिसमन्वितः। पितामहमुपागच्छत् संक्रुद्धो हव्यवाहनः॥

Verse 2

तच्च सर्व यथान्यायं ब्रह्मुणे संन्यवेदयत्‌ । उवाच चैनं भगवान्‌ मुहूर्त स विचिन्त्य तु,वहाँ उन्होंने ब्रह्माजीसे सब बातें यथोचित रीतिसे कह सुनायीं। तब भगवान्‌ ब्रह्माजी दो घड़ीतक विचार करके उनसे बोले--

तच्च सर्वं यथान्यायं ब्रह्मणे संन्यवेदयत्। उवाच चैनं भगवान् मुहूर्तं स विचिन्त्य तु॥

Verse 3

उपाय: परिदृष्टो मे यथा त्वं धक्ष्यसेडनघ । कालं च कंचित्‌ क्षमतां ततस्त्वं धक्ष्यसेडनल,“अनघ! तुम जिस प्रकार खाण्डववनको जलाओगे, वह उपाय तो मुझे सूझ गया है; किंतु उसके लिये तुम्हें कुछ समयतक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अनल! इसके बाद तुम खाण्डववनको जला सकोगे

उपायः परिदृष्टो मे यथा त्वं धक्ष्यसेऽनघ। कालं च कञ्चित् क्षमतां ततस्त्वं धक्ष्यसेऽनल॥

Verse 4

भविष्यत: सहायौ ते नरनारायणौ तदा । ताभ्यां त्वं सहितो दावं धक्ष्यसे हव्यवाहन,“हव्यवाहन! उस समय नर और नारायण तुम्हारे सहायक होंगे। उन दोनोंके साथ रहकर तुम उस वनको जला सकोगे”

भविष्यतः सहायौ ते नरनारायणौ तदा। ताभ्यां त्वं सहितो दावं धक्ष्यसे हव्यवाहन॥

Verse 5

एवमस्त्विति त॑ वल्निब्रह्याणं प्रत्यभाषत । सम्भूतौ तौ विदित्वा तु नरनारायणावृषी,तब अगनि्निने ब्रह्माजीसे कहा--'“अच्छा, ऐसा ही सही।” तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात्‌ नर-नारायण ऋषियोंके अवतीर्ण होनेकी बात जानकर अग्निदेवको ब्रह्माजीकी बातका स्मरण हुआ। राजन! तब वे पुनः ब्रह्माजीके पास गये

वैशम्पायन उवाच—एवमस्त्विति तौ ब्रह्माणं विभावसुं च प्रत्यभाषत। दीर्घकाले तु नरनारायणावृषी सम्भूतौ विदित्वा, ब्रह्मणः पूर्ववाक्यं स्मृत्वा, राजन्, स पुनरेव ब्रह्माणं जगाम।

Verse 6

कालस्य महतो राजंस्तस्य वाक्यं स्वयम्भुव: । अनुस्मृत्य जगामाथ पुनरेव पितामहम्‌,तब अगनि्निने ब्रह्माजीसे कहा--'“अच्छा, ऐसा ही सही।” तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात्‌ नर-नारायण ऋषियोंके अवतीर्ण होनेकी बात जानकर अग्निदेवको ब्रह्माजीकी बातका स्मरण हुआ। राजन! तब वे पुनः ब्रह्माजीके पास गये

वैशम्पायन उवाच—कालस्य महतो राजन्, स्वयम्भुवो वाक्यमनुस्मृत्य, स पुनरेव पितामहं जगाम।

Verse 7

अब्रवीच्च तदा ब्रह्मा यथा त्वं धक्ष्यसेडनल । खाण्डवं दावमद्यैव मिषतो5स्य शचीपते:,उस समय ब्रह्माजीने कहा--'अनल! अब जिस प्रकार तुम इन्द्रके देखते-देखते अभी खाण्डववन जला सकोगे, वह उपाय सुनो

वैशम्पायन उवाच—तदा ब्रह्मा अब्रवीत्—यथा त्वं धक्ष्यसेऽनल खाण्डवं दावमद्यैव मिषतोऽस्य शचीपतेः, तदुपायं शृणु।

Verse 8

नरनारायणोौ यौ तौ पूर्वदेवी विभावसो । सम्प्राप्ती मानुषे लोके कार्यार्थ हि दिवौकसाम्‌,“विभावसो! आदिदेव नर और नारायण मुनि इस समय देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए हैं

वैशम्पायन उवाच—नरनारायणौ यौ तौ पूर्वदेवौ विभावसो, सम्प्राप्तौ मानुषे लोके कार्यार्थं हि दिवौकसाम्।

Verse 9

अर्जुन वासुदेवं च यौ तौ लोको5भिमन्यते । तावेतौ सहितावेहि खाण्डवस्य समीपत:,“वहाँके लोग उन्हें अर्जुन और वासुदेवके नामसे जानते हैं। वे दोनों इस समय खाण्डववनके पास ही एक साथ बैठे हैं

वैशम्पायन उवाच—अर्जुनं वासुदेवं च यौ तौ लोकोऽभिमन्यते, तावेतौ सहिताविहि खाण्डवस्य समीपतः।

Verse 10

तौ त्वं याचस्व साहाय्ये दाहार्थ खाण्डवस्य च । ततो थक्ष्यसि त॑ दावं रक्षितं त्रिदशैरपि,“उन दोनोंसे तुम खाण्डववन जलानेके कार्यमें सहायताकी याचना करो। तब तुम इन्द्रादि देवताओंसे रक्षित होनेपर भी उस वनको जला सकोगे

तौ त्वं याचस्व साहाय्ये दाहार्थं खाण्डवस्य च । ततो धक्ष्यसि तं दावं रक्षितं त्रिदशैरपि ॥

Verse 11

तौ तु सत्त्वानि सर्वाणि यत्नतो वारयिष्यत: । देवराजं च सहितौ तत्र मे नास्ति संशय:,“वे दोनों वीर एक साथ होनेपर यत्नपूर्वक वनके सारे जीवोंको भी रोकेंगे और देवराज इन्द्रका भी सामना करेंगे, मुझे इसमें कोई संशय नहीं है”

तौ तु सत्त्वानि सर्वाणि यत्नतो वारयिष्यतः । देवराजं च सहितौ तत्र मे नास्ति संशयः ॥

Verse 12

एतच्छुत्वा तु वचन त्वरितो हव्यवाहनः । कृष्णपार्थावुपागम्य यमर्थ त्वभ्यभाषत,नृपश्रेष्ठ॒ यह सुनकर हव्यवाहनने तुरंत श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास आकर जो कार्य निवेदन किया, वह मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ। जनमेजय! अग्निका वह कथन सुनकर अर्जुनने इन्द्रकी इच्छाके विरुद्ध खाण्डववन जलानेकी अभिलाषा रखनेवाले जातवेदा अग्निसे उस समयके अनुकूल यह बात कही

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं त्वरितो हव्यवाहनः । कृष्णपार्थावुपागम्य यमर्थं त्वभ्यभाषत ॥

Verse 13

त॑ ते कथितवानस्मि पूर्वमेव नृपोत्तम | तच्छुत्वा वचन त्वग्नेर्बीभत्सुर्जातवेदसम्‌,नृपश्रेष्ठ॒ यह सुनकर हव्यवाहनने तुरंत श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास आकर जो कार्य निवेदन किया, वह मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ। जनमेजय! अग्निका वह कथन सुनकर अर्जुनने इन्द्रकी इच्छाके विरुद्ध खाण्डववन जलानेकी अभिलाषा रखनेवाले जातवेदा अग्निसे उस समयके अनुकूल यह बात कही

तं ते कथितवानस्मि पूर्वमेव नृपोत्तम । तच्छ्रुत्वा वचनं त्वग्नेर्बीभत्सुर्जातवेदसम् ॥

Verse 14

अब्रवीन्नपशार्दूल तत्कालसदृशं वच: । दिधक्षुं खाण्डवं दावमकामस्य शतक्रतो:,नृपश्रेष्ठ॒ यह सुनकर हव्यवाहनने तुरंत श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास आकर जो कार्य निवेदन किया, वह मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ। जनमेजय! अग्निका वह कथन सुनकर अर्जुनने इन्द्रकी इच्छाके विरुद्ध खाण्डववन जलानेकी अभिलाषा रखनेवाले जातवेदा अग्निसे उस समयके अनुकूल यह बात कही

अब्रवीन्नपशार्दूलस्तत्कालसदृशं वचः । दिधक्षुं खाण्डवं दावमकामस्य शतक्रतोः ॥

Verse 15

अजुन उवाच उत्तमास्त्राणि मे सन्ति दिव्यानि च बहूनि च । यैरहं शक्नुयां योद्धुमपि वज्धरान्‌ बहून्‌,अर्जुन बोले--भगवन्‌! मेरे पास बहुत-से दिव्य एवं उत्तम अस्त्र तो हैं, जिनके द्वारा मैं एक क्या, अनेक वज्धारियोंसे युद्ध कर सकता हूँ

अर्जुन उवाच—उत्तमास्त्राणि मे सन्ति दिव्यानि च बहूनि च। यैरहं शक्नुयां योद्धुमपि वज्रधरान् बहून्॥

Verse 16

धनुर्मे नास्ति भगवन्‌ बाहुवीर्येण सम्मितम्‌ । कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद्‌ विषहेन्मम,परंतु मेरे पास मेरे बाहुबलके अनुरूप धनुष नहीं है, जो समरभूमिमें युद्धके लिये प्रयत्न करते समय मेरा वेग सह सके

धनुर्मे नास्ति भगवन् बाहुवीर्येण सम्मितम्। कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद् विषहेन्मम॥

Verse 17

शरैश्व मे<र्थों बहुभिरक्षयै: क्षिप्रमस्यत: । न हि वोढुं रथ: शक्त: शरान्‌ मम यथेप्सितान्‌,इसके सिवा शीघ्रतापूर्वक बाण चलाते रहनेके लिये मुझे इतने अधिक बाणोंकी आवश्यकता होगी, जो कभी समाप्त न हों तथा मेरी इच्छाके अनुरूप बाणोंको ढोनेके लिये शक्तिशाली रथ भी मेरे पास नहीं है

शरैश्च मेऽर्थो बहुभिरक्षयैः क्षिप्रमस्यतः। न हि वोढुं रथः शक्तः शरान् मम यथेप्सितान्॥

Verse 18

अश्वांश्व दिव्यानिच्छेयं पाण्डुरान्‌ वातरंहस: । रथं च मेघनिर्घोष॑ सूर्यप्रतिमतेजसम्‌,मैं वायुके समान वेगवान्‌ श्वेत वर्णके दिव्य अश्व तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाला एवं सूर्यके समान तेजस्वी रथ चाहता हूँ। इसी प्रकार इन भगवान्‌ श्रीकृष्णके बल-पराक्रमके अनुसार कोई आयुध इनके पास भी नहीं है, जिससे ये नागों और पिशाचोंको युद्धमें मार सकें

अश्वांश्च दिव्यानिच्छेयं पाण्डुरान् वातरंहसः। रथं च मेघनिर्घोषं सूर्यप्रतिमतेजसम्॥

Verse 19

तथा कृष्णस्य वीर्येण नायुधं विद्यते समम्‌ । येन नागान्‌ पिशाचांश्व निहन्यान्माधवो रणे,मैं वायुके समान वेगवान्‌ श्वेत वर्णके दिव्य अश्व तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाला एवं सूर्यके समान तेजस्वी रथ चाहता हूँ। इसी प्रकार इन भगवान्‌ श्रीकृष्णके बल-पराक्रमके अनुसार कोई आयुध इनके पास भी नहीं है, जिससे ये नागों और पिशाचोंको युद्धमें मार सकें

तथा कृष्णस्य वीर्येण नायुधं विद्यते समम्। येन नागान् पिशाचांश्च निहन्यान्माधवो रणे॥

Verse 20

उपायं कर्मसिद्धौ च भगवन्‌ वक्तुमहसि । निवारयेयं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने,भगवन्‌! इस कार्यकी सिद्धिके लिये जो उपाय सम्भव हो, वह मुझे बताइये, जिससे मैं इस महान्‌ वनमें जल बरसाते हुए इन्द्रको रोक सकूँ

अर्जुन उवाच— उपायं कर्मसिद्धौ च, भगवन्, वक्तुमर्हसि। निवारयेयं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने॥

Verse 21

पौरुषेण तु यत्‌ कार्य तत्‌ कर्तारौ स्व पावक । करणानि समर्थानि भगवन्‌ दातुमहसि,भगवन्‌ अग्निदेव! पुरुषार्थसे जो कार्य हो सकता है, उसे हमलोग करनेके लिये तैयार हैं; किंतु इसके लिये सुदृढ़ साधन जुटा देनेकी कृपा आपको करनी चाहिये

पौरुषेण तु यत् कार्यं तत् कर्तारौ स्वपावक। करणानि समर्थानि भगवन् दातुमर्हसि॥

Verse 223

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अर्जुनाग्निसंवादे त्रयोविंशत्यधिकद्धिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें अर्जुन-अग्निसंवादाविषयक दो सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि अर्जुनाग्निसंवादे त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to respond ethically and effectively to unavoidable crisis: whether to panic and lose discernment or to exercise foresight, assume protective responsibility (especially as the eldest), and seek refuge through appropriate, truthful, and purposeful speech.

The chapter teaches apramāda (non-negligence): preparedness and wakeful intelligence reduce suffering during adversity. It also affirms that leadership is protective service, and that calibrated speech (stuti/petition) can mediate outcomes even when facing overwhelming forces.

No explicit phalaśruti is stated. The meta-commentary is implicit in the frame: Vaiśaṃpāyana’s narration positions the episode as an instructive exemplar of dharma under pressure—how prior commitments, right praise, and clear requests shape a constrained but meaningful resolution.