Adhyaya 344
Shanti ParvaAdhyaya 344114 Verses

Adhyaya 344

Atithi-satkāra and the Consolation of Wise Counsel (अतिथिसत्कारः प्रज्ञानवचनस्य च पराश्वासनम्)

Upa-parva: Mokṣa-dharma (instructional discourse on liberation-oriented ethics; chapter context: hospitality and reassurance to an atithi)

A brāhmaṇa speaks in response to counsel he has received, describing the instruction as the removal of a heavy burden (atibhāra) and as deeply consoling (parāśvāsakara). He illustrates its effect through a sequence of analogies: rest for a traveler fatigued by the road, a seat for one tired of standing, water for the thirsty, food for the hungry, the timely arrival of desired sustenance and a guest, the coming of a son to an aged person at the right moment, and the sight of a beloved person long contemplated. The brāhmaṇa states that the advice grants him vision and discernment, as if receiving sight in open space, and he resolves to act accordingly. He then invites the visitor to stay the night; the guest accepts, and the night passes pleasantly in dharma-oriented conversation. At dawn, after being honored to the brāhmaṇa’s capacity, the guest departs. The brāhmaṇa—now firm in dharmic resolve—proceeds in due time as instructed toward “bhujagendra-saṃśraya” (a destination described as the refuge/abode associated with the lord of serpents), committed to meritorious action.

Chapter Arc: इन्द्र पर दोहरी ब्रह्महत्या का भय छा जाता है; देवराज पद त्यागकर वह मानसरोवर की शीतल कमलिनी के पास छिपने चला जाता है—और उसके हटते ही त्रिलोकी का शासन-तंत्र डगमगा उठता है। → त्रिलोकनाथ शचीपति के भय-प्रणष्ट होते ही देवों पर रज-तम का आवेश, मंत्रों की अप्रवृत्ति, ऋषियों के यज्ञ-रक्षण में बाधा और राक्षसों का प्रादुर्भाव—धर्म-व्यवस्था के टूटने का संकेत देता है। इसी पृष्ठभूमि में नारायण की महिमा और उनके विविध रूपों का स्मरण/वर्णन आगे बढ़ता है, मानो जगत के केंद्र-स्तंभ को पुनः स्थापित करने की तैयारी हो। → रुद्र-नारायण के महायुद्ध-स्मरण में निर्णायक क्षण आता है: महात्मा नारायण के हुंकार से शंकर का त्रिशूल प्रतिहत होकर शंकर के ही कर में लौट जाता है—अजेयता का उद्घोष और ‘नारायण-जय’ का शिखर। → कृष्ण (नारायण) पार्थ को बताते हैं कि देवगणों ने त्रिदिव छोड़ तप किया और अंततः ‘नारायणजयो मृथे’—युद्ध में नारायण की विजय—यह निष्कर्ष स्थापित हुआ। साथ ही वे कहते हैं कि मैं अनेक रूप धारण कर पृथ्वी, ब्रह्मलोक और सनातन गोलोक तक विचरता हूँ—सर्वव्यापकता का आश्वासन। → अर्जुन का प्रश्न—‘उस संहार-समर्थ युद्ध में रुद्र और नारायण में से किसे जय मिली?’—कथा को अगले प्रसंग की ओर धकेलता है, जहाँ निर्णायक प्रमाण/विस्तार अपेक्षित रहता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें नारययणकी महिमाविषयक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३४२ ॥। (दक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं) 3: अ--छकऋा - सूर्य और चन्द्रमा ही अग्नि एवं सोम है। वे जगत्‌को हर्ष प्रदान करनेके कारण 'हृषी” कहलाते हैं। वे ही भगवानके केश अर्थात्‌ किरणें हैं

ਸ਼ੌਨਕ ਬੋਲੇ— “ਹੇ ਸੌਤੀ! ਤੁਸੀਂ ਬਹੁਤ ਹੀ ਮਹਾਨ ਆਖਿਆਨ ਵਰਣਨ ਕੀਤਾ ਹੈ। ਇਹ ਸੁਣ ਕੇ ਸਾਰੇ ਮੁਨੀ ਪਰਮ ਵਿਸਮਯ ਵਿੱਚ ਡੁੱਬ ਗਏ ਹਨ।”

Verse 42

अब इन्द्रके पास दोहरी ब्रह्महत्या उपस्थित हुई। उसके भयसे इन्द्रने देवराजपदका परित्याग कर दिया और मानसरोवरके जलनमें उत्पन्न हुई एक शीतल कमलिनीके पास जा पहुँचे। वहाँ अणिमा आदि ऐश्वर्यके योगसे इन्द्र अणुमात्र रूप धारण करके कमलनालकी ग्रन्थिमें प्रविष्ट हो गये

ਤਦੋਂ ਇੰਦਰ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਦੋਹਰੀ ਬ੍ਰਹਮਹਤਿਆ ਦਾ ਦੋਸ਼ ਆ ਖੜ੍ਹਾ ਹੋਇਆ। ਉਸ ਦੇ ਡਰ ਨਾਲ ਇੰਦਰ ਨੇ ਦੇਵਰਾਜ ਦਾ ਪਦ ਛੱਡ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਮਾਨਸ ਸਰੋਵਰ ਦੇ ਜਲ ਵਿੱਚ ਉਪਜੀ ਠੰਢੀ ਕਮਲਿਨੀ ਕੋਲ ਜਾ ਪਹੁੰਚਿਆ। ਉੱਥੇ ਅਣਿਮਾ ਆਦਿ ਐਸ਼ਵਰਯ-ਯੋਗ ਦੇ ਬਲ ਨਾਲ ਇੰਦਰ ਅਣੂ ਜਿਹਾ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਕਮਲ-ਡੰਡੀ ਦੀ ਗੰਢ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕਰ ਗਿਆ।

Verse 43

अथ ब्रह्मवध्याभयप्रणष्टे त्रलोक्यनाथे शचीपतौ जगदनीश्वरं॑ बभूव देवान्‌ रजस्तमश्नाविवेश मन्त्रा न प्रावर्तन्त महर्षीणां रक्षांसि प्रादुरभवन्‌ ब्रह्म चोत्सादनं जगामानिन्द्राश्नाबला लोका: सुप्रधृष्या बभूवु:

ਬ੍ਰਹਮਹਤਿਆ ਦੇ ਡਰ ਨਾਲ ਤ੍ਰਿਲੋਕਨਾਥ ਸ਼ਚੀਪਤੀ ਇੰਦਰ ਜਦੋਂ ਅਦ੍ਰਿਸ਼ ਹੋ ਗਿਆ, ਤਾਂ ਜਗਤ ਬਿਨਾ ਸ਼ਾਸਕ ਦੇ ਰਹਿ ਗਿਆ। ਦੇਵਤਿਆਂ ਵਿੱਚ ਰਜੋ ਅਤੇ ਤਮੋ ਦਾ ਉਫਾਨ ਆ ਗਿਆ। ਮਹਰਿਸ਼ੀਆਂ ਦੇ ਮੰਤ੍ਰ ਹੁਣ ਪ੍ਰਭਾਵੀ ਨਾ ਰਹੇ; ਰਾਖਸ਼ ਖੁੱਲ੍ਹੇਆਮ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋ ਕੇ ਵਧਣ ਲੱਗੇ। ਵੇਦ ਅਧਿਐਨ ਅਤੇ ਧਰਮ-ਵਿਵਸਥਾ ਢਹਿ ਗਈ। ਇੰਦਰ ਦੀ ਰੱਖਿਆ ਬਿਨਾ ਤਿੰਨੇ ਲੋਕ ਕਮਜ਼ੋਰ ਹੋ ਗਏ ਅਤੇ ਸੌਖੇ ਨਾਲ ਚੜ੍ਹਾਈ ਕਰਕੇ ਜਿੱਤਣ ਯੋਗ ਬਣ ਪਏ।

Verse 44

अथ देवा ऋषयश्नायुषः: पुत्र नहुषं नाम देवराज्येडभिषिषिचुर्नहुष: पठ्चभि: शतैज्योतिषां ललाटे ज्वलद्धि: सर्वतेजोहरैस्त्रिविष्टपं पालयांबभूव

ਫਿਰ ਦੇਵਤਿਆਂ ਅਤੇ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਨੇ ਆਯੁ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਨਹੁਸ਼ ਨੂੰ ਦੇਵਰਾਜ ਦੇ ਪਦ ਉੱਤੇ ਅਭਿਸ਼ੇਕ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਨਹੁਸ਼ ਦੇ ਮੱਥੇ ਉੱਤੇ ਪੰਜ ਸੌ ਜਗਮਗਾਉਂਦੀਆਂ ਜ੍ਯੋਤੀਆਂ ਦਹਕਦੀਆਂ ਸਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਬਾਰੇ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਸੀ ਕਿ ਉਹ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦਾ ਤੇਜ ਹਰਨ ਕਰ ਲੈਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਉਸ ਅਤਿ-ਤੇਜ ਨਾਲ ਸਮਰੱਥ ਹੋ ਕੇ ਉਹ ਤ੍ਰਿਵਿਸ਼ਟਪ (ਸਵਰਗ) ਦਾ ਰਾਜ ਚਲਾਉਣ ਲੱਗਾ।

Verse 45

अथ लोका: प्रकृतिमापेदिरे स्वस्थाश्व हष्टाश्न बभूव॒ु:,ऐसा होनेपर सब लोग स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। सभी स्वस्थ एवं प्रसन्न हो गये

ਤਦ ਸਭ ਲੋਕ ਆਪਣੀ ਕੁਦਰਤੀ ਹਾਲਤ ਵਿੱਚ ਵਾਪਸ ਆ ਗਏ; ਉਹ ਤੰਦਰੁਸਤ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋ ਗਏ।

Verse 46

अथोवाच नहुषः सर्व मां शक्रोपभुक्तमुपस्थितमृते शचीमिति स एवमुकक्‍्त्वा शचीसमीपमगमदुवाचैनां सुभगे5हमिन्द्रो देवानां भजस्व मामिति तं शची प्रत्युवाच प्रकृत्या त्वं धर्मवत्सल: सोमवंशोद्धवश्व नाहसि परपत्नीधर्षणं कर्तुमिति,कुछ कालके पश्चात्‌ नहुषने देवताओंसे कहा--*इन्द्रके उपभोगमें आनेवाली अन्य सारी वस्तुएँ तो मेरी सेवामें उपस्थित हैं। केवल शची मुझे नहीं मिली हैं।! ऐसा कहकर वे शचीके पास गये और उनसे बोले--'सौभाग्यशालिनि! मैं देवताओंका राजा इन्द्र हूँ। मेरी सेवा स्वीकार करो।” शचीने उत्तर दिया--'महाराज! आप स्वभावसे ही धर्मवत्सल और चन्द्रवंशके रत्न हैं। आपको परायी स्त्रीपर बलात्कार नहीं करना चाहिये”

ਕੁਝ ਸਮੇਂ ਬਾਅਦ ਨਹੁਸ਼ ਨੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੂੰ ਕਿਹਾ—“ਇੰਦਰ ਨੇ ਜੋ ਕੁਝ ਭੋਗਿਆ ਸੀ, ਉਹ ਸਭ ਹੁਣ ਮੇਰੇ ਅਧੀਨ ਹੈ; ਕੇਵਲ ਸ਼ਚੀ ਹੀ ਮੈਨੂੰ ਨਹੀਂ ਮਿਲੀ।” ਇਹ ਕਹਿ ਕੇ ਉਹ ਸ਼ਚੀ ਕੋਲ ਗਿਆ ਅਤੇ ਬੋਲਿਆ—“ਸੁਭਾਗਣੀ! ਮੈਂ ਹੀ ਦੇਵਤਿਆਂ ਦਾ ਰਾਜਾ ਇੰਦਰ ਹਾਂ; ਮੇਰਾ ਸੰਗ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰ।” ਸ਼ਚੀ ਨੇ ਉੱਤਰ ਦਿੱਤਾ—“ਮਹਾਰਾਜ! ਤੁਸੀਂ ਸੁਭਾਵ ਤੋਂ ਧਰਮ-ਵਤਸਲ ਹੋ ਅਤੇ ਸੋਮਵੰਸ਼ ਦੇ ਰਤਨ ਹੋ; ਪਰਾਈ ਇਸਤਰੀ ਦਾ ਅਪਮਾਨ ਕਰਨਾ ਜਾਂ ਜ਼ਬਰ ਕਰਨਾ ਤੁਹਾਨੂੰ ਸ਼ੋਭਦਾ ਨਹੀਂ।”

Verse 47

तामथोवाच नहुष ऐन्द्रं पदमध्यास्थते मया-5हमिन्द्रस्थ राज्यरत्नहरो नात्राधर्म: वश्चित्‌ त्वमिन्द्रोप-भुक्तेति सा तमुवाचास्ति मम किंचिद्‌ व्रतमपर्यवसितं तस्यावभृथे त्वामुपगमिष्यामि कैश्चिदेवाहोभिरिति स शच्येवमभिहितो जगाम,तब नहुषने शचीसे कहा--'देवि! इस समय मैं इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हूँ। इन्द्रके राज्य और रत्न दोनोंका अधिकारी हो गया हूँ; अतः तुम्हारे साथ समागम करनेमें कोई अधर्म नहीं है; क्योंकि तुम इन्द्रके उपभोगमें आयी हुई वस्तु हो।। यह सुनकर शचीने कहा--“महाराज! मैंने एक व्रत ले रखा है। वह अभी समाप्त नहीं हुआ है। उसकी समाप्ति हो जानेपर कुछ ही दिनोंमें मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी।! शचीके ऐसा कहनेपर नहुष चले गये

ਤਦ ਨਹੁਸ਼ ਨੇ ਸ਼ਚੀ ਨੂੰ ਕਿਹਾ—“ਮੈਂ ਹੁਣ ਐਂਦ੍ਰ ਪਦ ਉੱਤੇ ਬੈਠਾ ਹਾਂ। ਇੰਦਰ ਦਾ ਰਾਜ ਅਤੇ ਰਤਨ ਮੇਰੇ ਅਧਿਕਾਰ ਵਿੱਚ ਆ ਗਏ ਹਨ; ਇਸ ਲਈ ਤੇਰੇ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਅਧਰਮ ਨਹੀਂ। ਤੂੰ ਤਾਂ ਇੰਦਰ ਵੱਲੋਂ ਭੋਗੀ ਹੋਈ ਹੈਂ।” ਇਹ ਸੁਣ ਕੇ ਸ਼ਚੀ ਬੋਲੀ—“ਮਹਾਰਾਜ! ਮੇਰਾ ਇੱਕ ਵਰਤ ਹਾਲੇ ਅਧੂਰਾ ਹੈ। ਉਸ ਦੇ ਅਵਭ੍ਰਥ-ਸਨਾਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, ਕੁਝ ਹੀ ਦਿਨਾਂ ਵਿੱਚ, ਮੈਂ ਤੁਹਾਡੇ ਕੋਲ ਆ ਜਾਵਾਂਗੀ।” ਸ਼ਚੀ ਦੇ ਇਹ ਕਹਿਣ ਤੇ ਨਹੁਸ਼ ਚਲਾ ਗਿਆ।

Verse 48

अथ शची दु:ःखशोकार्ता भर्तृदर्शनलालसा नहुष-भयगृहीता बृहस्पतिमुपागच्छत्‌ स च तामत्युद्धिग्नां दृष्टवैव ध्यानं प्रविश्य भर्तकार्यतत्परां ज्ञात्वा बृहस्पति- रुवाचानेनैव व्रतेन तपसा चान्विता देवीं वरदामुप-श्रुतिमाह्दय तदा सा ते इन्द्र दर्शयिष्यतीति सा&थ महानियमस्थिता देवीं वरदामुपश्रुतिं मन्त्रैराह्ययति सोपश्रुतिः शचीसमीपमगादुवाच चैनामियमस्मीति त्वया55हूतोपस्थिता किं ते प्रियं करवाणीति तां मूर्थ्ना प्रणम्योवाच शची भगवत्यहसि मे भर्तरिं दर्शयितुं त्वं सत्या ऋता चेति सैनां मानसं सरो5नयत तत्रेन्द्रे बिसग्रन्थिगतमदर्शयत्‌

Then Śacī, overwhelmed by grief and sorrow, longing to see her husband and seized by fear of Nahūṣa, went to Bṛhaspati. Seeing her extremely agitated, Bṛhaspati entered meditation and understood that she was intent on accomplishing her lord’s purpose. He said to her: “O goddess, strengthened by this very vow and by austerity, invoke the boon-giving देवी Upaśruti; then she will show you Indra.” Having received the teacher’s command, Śacī, steadfast in strict observance, invoked the boon-giving Upaśruti with mantras. Upaśruti came near Śacī and said: “I am here before you; called by you, I have come at once. What dear task shall I do for you?” Śacī bowed with her head and replied: “O Blessed One, please grant me the sight of my husband; you are Truth and Cosmic Order (satya and ṛta).” Upaśruti then led her to the lake Mānasarovara and there revealed Indra, hidden among the knots of lotus-stalk fibers.

Verse 49

तामथ पत्नीं कृशां ग्लानां चेन्द्रो दृष्टया चिन्तया-म्बभूव अहो मम दुःखमिदमुपगतं नष्टे हि मामिय-मन्विष्य यत्यत्न्यभ्यगमद्‌ दुःखार्तेति तामिन्द्र उवाच कथं वर्तयसीति सा तमुवाच नहुषो मामाह्दयति पत्नीं कर्तु कालश्लास्य मया कृत इति तामिन्द्र उवाच गच्छ नहुषस्त्वया वाच्योथ<पूर्वेण मामृषियुक्तेन यानेन त्वमधिरूढ उद्वहस्वेति इन्द्रस्य महान्ति वाहनानि सन्ति मनःप्रियाण्यधिरूढानि मया त्वमन्येनोपयातुरमहसीति सैवमुक्ता हृष्टा जगामेन्द्रोडपि बिसग्रन्थिमेवाविवेश भूय:

Seeing his wife—thin and worn with grief—Indra reflected, “Alas, what sorrow has come upon me! While I remain hidden here, she, distressed, has searched for me and with great effort has come all this way.” Then Indra said to her, “How are you managing to live?” She replied, “Nahusha has taken the place of Indra and is summoning me to make me his wife. I have obtained only a short respite, and I have given my word that after the appointed time I will comply.” Indra said, “Go, and tell Nahusha this: ‘O king, mount an unprecedented conveyance yoked with sages and come to carry me away into your service.’ Indra has many great vehicles that delight the mind, but I have already ridden them all; therefore you should approach me by some other, extraordinary vehicle.” Thus instructed, Śacī departed joyfully, and Indra once again entered the knot of the lotus-stalk to remain concealed.

Verse 50

अथेन्द्राणीमभ्यागतां दृष्टयवा तामुवाच नहुषः पूर्ण. स काल इति त॑ शच्यब्रवीच्छक्रेण यथोक्तं स महर्षियुक्तं वाहनमधिरूढ: शचीसमीपमुपागच्छत्‌

When Indra’s queen Śacī arrived, Nahuṣa saw her and declared, “The time you asked for is now complete.” Śacī then repeated to him everything exactly as Indra had instructed. Thereupon Nahuṣa mounted the conveyance yoked with great sages and proceeded toward Śacī. The episode underscores how power, when mixed with impatience and entitlement, can turn into coercion, while Śacī’s careful adherence to Indra’s counsel reflects prudence and strategic fidelity to dharma under threat.

Verse 51

अथ मैत्रावरुणि: कुम्भयोनिरगस्त्य ऋषिवरो महर्षीन्‌ धिकृक्रियमाणांस्तान्‌ नहुषेणापश्यत्‌ पद्धयां च तेनास्पृश्यत ततः स नहुषमब्रवीदकार्यप्रवृत्त पाप पतस्व महीं सर्पो भव यावद्धुमिर्गिरयश्व तिष्ठेयुस्तावदिति स महर्षिवाक्यसमकालमेव तस्माद्‌ यानादवापतत्‌

Then Maitrāvaruṇi—Agastya, the great sage born from the jar—saw that Nahusha was rebuking and driving the assembled seers to move faster, and even struck Agastya’s body with his feet. Agastya then said to Nahusha: “Sinner, engaged in what ought not to be done—fall at once to the earth. Become a serpent, for as long as the earth and the mountains endure.” At the very moment the great sage spoke these words, Nahusha fell down from that conveyance.

Verse 52

अथानिन्द्र पुनस्त्र्लोक्यमभवत्‌ ततो देवा ऋषयश्न भगवन्तं विष्णुं शरणमिन्द्रार्थेइभिजग्मुरूचुश्ैन॑ भगवन्निन्द्रं ब्रह्म॒हत्याभिभूतं त्रातुमहसीति ततः स वरदस्तानब्रवीदश्नमेधं यज्ञं वैष्णवं शक्रोडभियजतां ततः स्वस्थानं प्राप्स्यतीति ततो देवा ऋषयश्रेन्द्रे नापश्यन्‌ यदा तदा शचीमूचुर्गच्छ सुभगे इन्द्रमानयस्वेति सा पुनस्तत्सर: समभ्यगच्छदिन्द्रश्न॒ तस्मात्‌ सरस: प्रत्युत्थाय बृहस्पतिमभिजगाम बृहस्पतिश्नाश्वमेधं महाक्रतुं शक्रायाहरत्‌ तत्र कृष्णसारड्ढं मेध्यमश्वमुत्सूज्य वाहनं तमेव कृत्वा इन्द्र मरुत्पतिं बृहस्पति: स्वं स्थानं प्रापपामास,नहुषका पतन हो जानेपर त्रिलोकीका राज्य पुन: बिना इन्द्रके हो गया, तब देवता और ऋषि इन्द्रके लिये भगवान्‌ विष्णुकी शरणमें गये और उनसे बोले--“भगवन! ब्रह्महत्यासे पीड़ित हुए इन्द्रकी रक्षा कीजिये” तब वरदायक भगवान्‌ विष्णुने उन देवताओंसे कहा --देवगण! इन्द्र विष्णुके उद्देश्यसे अश्वमेध यज्ञ करें। तब वे फिर अपना स्थान प्राप्त करेंगे।' यह सुनकर देवता और महर्षि इन्द्रको ढूँढ़ने लगे। जब वे कहीं उनका पता न पा सके, तब वे शचीसे बोले--'सुभगे! तुम्हीं जाओ और इन्द्रको यहाँ ले आओ।' तब शची पुनः मानसरोवरपर गयीं। शचीके कहनेसे इन्द्र उस सरोवरसे निकलकर बृहस्पतिजीके पास आये। बृहस्पतिजीने इन्द्रके लिये अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया। उस यजञ्ञमें उन्होंने कृष्णसारंग नामक यज्ञिय अश्वको छोड़ा था। उसीको वाहन बनाकर बृहस्पतिने पुनः देवराज इन्द्रको अपने पदपर प्रतिष्ठित किया

After Nahusha’s fall, the sovereignty of the three worlds again became without Indra. Then the gods and the seers sought refuge in Lord Vishnu for Indra’s sake and said, “O Blessed One, protect Indra who is overwhelmed by the sin of brahma-hatya.” The boon-giving Vishnu replied, “Let Shakra perform a Vaishnava Ashvamedha sacrifice; then he will regain his own station.” Hearing this, the gods and great seers searched for Indra; when they could not find him, they said to Shachi, “O fortunate one, go and bring Indra here.” Shachi went again to that lake. At her urging Indra rose up from the lake and went to Brihaspati. Brihaspati then arranged for Shakra the great Ashvamedha rite; releasing a consecrated sacrificial horse named Kṛṣṇasāraṅga, he made it Indra’s mount and restored Marutpati Indra to his rightful throne. Ethically, the passage frames the restoration of authority as requiring expiation and divine guidance: power is legitimate only when cleansed of grave wrongdoing and re-established through dharmic rites.

Verse 53

ततः स देवराड देवैर््रषिभि: स्तूयमानस्त्रिविष्ट-पस्थो निष्कल्मषो बभूव ह ब्रह्मवध्यां चतुर्ष स्थानेषु वनिताग्निवनस्पतिगोषु व्यभजदेवमिन्द्रो ब्रह्मतेज:- प्रभावोपबूृंहित: शत्रुवर्ध॑ कृत्वा स्वं स्थान प्रापित:

Thereafter the divine king Indra, praised by the gods and the seers, became free from taint and dwelt in Triviṣṭapa (heaven). He apportioned the burden of brahma-hatyā (the sin of slaying a brāhmaṇa) into four receptacles—women, fire, trees, and cows. Strengthened by the radiance of brahmanical power, Indra then overcame his enemies and regained his rightful station. The passage frames a moral logic of purification and restitution: wrongdoing is not denied but ritually redistributed and resolved so that cosmic order and rightful kingship may be restored.

Verse 54

(नहुषस्य शापमोक्षनिमित्तं देवैषिभिश्न याच्यमानोडगस्त्य: प्राह । यावत्‌ स्वकुलज: श्रीमान्‌ धर्मराजो युधिष्ठिर: । कथयित्वा स्वकान्‌ प्रश्नान्‌ भीम॑ तं च विमोक्ष्यते ।।

Agastya, entreated by the gods and sages to secure Nahusha’s release from his curse, declared: “When the illustrious Dharmarāja Yudhiṣṭhira—born in Nahusha’s own lineage—has posed his questions and received their answers, and then frees Bhīmasena from that bondage, at that very time he will also deliver Nahusha from the curse.” The passage frames liberation as contingent upon truthful inquiry, right understanding, and righteous action: release is not granted by mere pleading, but through dharmic discernment and the restoration of proper order.

Verse 55

भगुणा महर्षिणा शप्तोडग्नि: सर्वभक्षत्वमुपानीत:,महर्षि भूगुके शापसे अग्निदेव सर्वभक्षी हो गये

Because of the curse pronounced by the great sage Bhṛgu, Agni—the Fire-god—was condemned to become ‘all-devouring,’ compelled to consume whatever is offered or encountered. The episode underscores how even divine powers are bound by the moral force of a ṛṣi’s word, and how actions invite consequences that reshape one’s role in the cosmic order.

Verse 56

अदितिर्व देवानामन्नमपचदेतद्‌ू भुक्त्वासुरान्‌ू हनिष्यन्तीति तत्र बुधो ब्रतचर्यासमाप्तावागच्छददितिं चावोचद्‌ भिक्षां देहीति तत्र देवै: पूर्वमेतत्‌ प्राश्यं नान्येनेत्यदितिर्भिक्षां नादादथ भिक्षाप्रत्याख्यान-रुषितेन बुधेन ब्रह्मभूतेनादिति: शप्ता अदितेरुदरे भविष्यति व्यथा विवस्वतो द्वितीयजन्मन्यण्डसंज्ञितस्य अण्डं मातुरदित्या मारितं स मार्तण्डो विवस्वानभवच्छाद्धदेव:

Aditi cooked food for the gods with the intention that, after eating it, they would be able to slay the Asuras. At that very time Budha, having completed his observance, came to Aditi and asked, “Give me alms.” Aditi reflected, “This food should be eaten first by the gods, and by no one else,” and so she did not give Budha any alms. Enraged at being refused, Budha—now possessed of brahmanic potency—cursed Aditi: “In your womb there will arise pain at the time of Vivasvat’s second birth, when he is in the form of an egg.” That egg in mother Aditi’s belly was destroyed by the pain; and because he emerged from a dead egg, Vivasvat became known as Mārtaṇḍa, also called Śrāddhadeva. Ethically, the passage warns that even a seemingly reasonable prioritization (serving the gods first) can become adharma when it violates the duty of hospitality and alms to a brahmin/guest, and that the power of ascetic merit, when joined with anger, can yield grave consequences.

Verse 57

दक्षस्य या वै दुहितर: षष्टिरासंस्ताभ्य: कश्यपाय त्रयोदश प्रादाद्‌ दश धर्माय दश मनवे सप्तविंशतिमिन्दवे तासु तुल्यासु नक्षत्राख्यां गतासु सोमो रोहिण्यामभ्यधिकं प्रीतिमानभूत्‌ू ततस्ता: शिष्टा: पत्न्य ईरष्यावित्य: पितु:ः: समीपं गत्वेममर्थ शशंसुर्भगवन्नस्मासु तुल्यप्रभावासु सोमो रोहिणीं प्रत्यधिक॑ं भजतीति सोडब्रवीद्‌ यक्ष्मैनमाविश्येतेति दक्षशापात्‌ सोम॑ राजानं यक्ष्मा विवेश स यक्ष्मणा<विष्टो दक्षमगाद्‌ दक्षश्नैनमब्रवीज्न सम॑ वर्तयसीति तत्रर्षय: सोममन्रुवन्‌ क्षीयसे यक्ष्मणा पश्चिमायां दिशि समुद्रे हिरण्यसरस्तीर्थ तत्र गत्वा आत्मानमभिषेचयस्वेत्यथागच्छत्‌ सोमस्तत्र हिरण्यसरस्तीर्थ गत्वा चात्मन: सेचनमकरोत्‌ स्नात्वा चात्मानं पाप्मनो मोक्षयामास तत्र चावभासितस्तीर्थे यदा सोमस्तदा प्रभूति च तीर्थ तत्‌ प्रभासमिति नाम्ना ख्यातं बभूव,प्रजापति दक्षके साठ कन्याएँ थीं। उनमेंसे तेरहका विवाह उन्होंने कश्यपजीके साथ कर दिया। दस कन्याएँ धर्मको, दस मनुको और सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको दे डालीं। उन सत्ताईस कन्याओंकी नक्षत्र नामसे प्रसिद्धि हुई। यद्यपि वे सब-की-सब एक समान रूपवती थीं तो भी चन्द्रमा सबसे अधिक रोहिणीपर ही प्रेम करने लगे। यह देख शेष पत्नियोंके मनमें ईर्ष्या हुई और उन्होंने पिताके समीप जाकर यह बात बतायी--'भगवन्‌! हम सब बहिनोंका प्रभाव एक-सा है तो भी चन्द्रदेव रोहिणीपर ही अधिक स्नेह रखते हैं।' यह सुनकर दक्षने कहा--“इनके भीतर यक्ष्माका प्रवेश होगा।” इस प्रकार ब्राह्मण दक्षके शापसे राजा सोमके शरीरमें यक्ष्माने प्रवेश किया। यक्ष्मासे ग्रस्त होकर राजा सोम प्रजापति दक्षके पास गये। रोषका कारण पूछनेपर दक्षने उनसे कहा--'तुम अपनी सभी पत्रनियोंके प्रति समान बर्ताव नहीं करते हो, उसीका यह दण्ड है।” वहाँ दूसरे ऋषियोंने सोमसे कहा--“तुम यक्ष्मासे क्षीण होते चले जा रहे हो। अतः पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर जो हिरण्यसर नामक तीर्थ है, वहाँ जाकर अपने-आपको स्नान कराओ।” तब सोमने हिरण्यसर तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान किया। स्नान करके उन्होंने अपने-आपको पापसे छुड़ाया। उस तीर्थमें वे दिव्य प्रभासे प्रभासित हो उठे थे, इसलिये उसी समयसे वह स्थान प्रभासतीर्थके नामसे विख्यात हो गया

Dakṣa had sixty daughters. Of them he gave thirteen in marriage to Kaśyapa, ten to Dharma, ten to Manu, and twenty-seven to the Moon (Soma). Those twenty-seven became famed by the name ‘Nakṣatras’. Though all were equally endowed, Soma’s affection grew excessive toward Rohiṇī. The remaining wives, stirred by jealousy, went to their father and reported: ‘Revered one, though we are equal in worth, Soma favors Rohiṇī beyond measure.’ Hearing this, Dakṣa declared, ‘May consumption (yakṣmā) enter him.’ By Dakṣa’s curse, yakṣmā seized King Soma. Afflicted, Soma approached Dakṣa; and Dakṣa told him the cause: ‘You do not treat your wives with equality.’ Then the sages advised Soma: ‘You are wasting away from yakṣmā. Go to the western sea, to the sacred ford called Hiraṇyasaras, and bathe there, consecrating yourself.’ Soma went to that Hiraṇyasaras-tīrtha, performed the purificatory bathing, and by bathing freed himself from sin and affliction. Because Soma shone there with a divine radiance, from that time onward the tīrtha became renowned by the name Prabhāsa. Ethically, the episode frames partiality and neglect of fairness in relationships as a breach of dharma that invites suffering, while repentance and disciplined purification restore balance.

Verse 58

तच्छापादद्यापि क्षीयते सोमो<मावास्यान्तरस्थ: पौर्णमासीमात्रेडधिछितो मेघलेखाप्रतिच्छन्न॑ वपुर्दर्शयति मेघसदृशं वर्णमगमत्‌ _तदस्य शशलक्ष्म विमलमभवत्‌

ਉਸ ਸ਼ਾਪ ਦੇ ਕਾਰਨ ਸੋਮ (ਚੰਦਰਮਾ) ਅੱਜ ਵੀ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਅਮਾਵਸਿਆ ਤੱਕ ਘਟਦਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਸ਼ੁਕਲ ਪੱਖ ਵਿੱਚ ਪੂਰਨਿਮਾ ਤੱਕ ਵਧਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਦਾ ਗੋਲ ਮੰਡਲ ਮਾਨੋ ਬੱਦਲ ਵਰਗੀ ਕਾਲੀ ਲਕੀਰ ਨਾਲ ਢੱਕਿਆ ਹੋਇਆ ਦਿੱਸਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਦੇ ਸ਼ਰੀਰ ਵਿੱਚ ਖਰਗੋਸ਼ ਦਾ ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਾਫ਼ ਤੇ ਨਿਰਮਲ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਦਿੱਸਦਾ ਹੈ—ਬੱਦਲ ਸਮਾਨ ਸ਼ਿਆਮ ਵਰਣ ਵਾਲਾ।

Verse 59

स्थूलशिरा महर्षिमिरो: प्रागुत्तरे दिग्विभागे तपस्तेपे ततस्तस्य तपस्तप्यमानस्य सर्वगन्धवह: शुचिर्वायुर्वायमान: शरीरमस्पृशत्‌ू स तपसा तापित-शरीर: कृशो वायुनोपवीज्यमानो हृदये परितोषमगमत्‌ तत्र किल तस्यानिलव्यजनकृतपरितोषस्य सद्यो वनस्पतयः पुष्पशोभां निदर्शितवन्त इति स एतान्‌ शशाप न सर्वकालं पुष्पवन्तो भविष्यथेति,पूर्वकालकी बात है, मेरुपर्वतके पूर्वोत्तर भागमें स्थूलशिरा नामक महर्षि बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे। उनके तपस्या करते समय सब प्रकार सुगन्ध लिये पवित्र वायु बहने लगी। उस वायुने प्रवाहित होकर मुनिके शरीरका स्पर्श किया। तपस्यासे संतप्त शरीरवाले उन कृशकाय मुनिने उस वायुसे वीजित हो अपने हृदयमें बड़े संतोषका अनुभव किया। वायुके द्वारा व्यजन डुलानेसे संतुष्ट हुए मुनिके समक्ष वृक्षोंने तत्काल फूलकी शोभा दिखलायी। इससे रुष्ट होकर मुनिने उन्हें शाप दिया कि तुम हर समय फूलोंसे भरे-पूरे नहीं रहोगे

ਪੁਰਾਤਨ ਸਮੇਂ ਮੈਰੂ ਪਰਬਤ ਦੇ ਉੱਤਰ-ਪੂਰਬੀ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਸਥੂਲਸ਼ਿਰਾ ਨਾਮ ਦਾ ਮਹਰਿਸ਼ੀ ਘੋਰ ਤਪ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਉਸ ਦੀ ਤਪੱਸਿਆ ਤੀਬਰ ਹੋਈ ਤਾਂ ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੀ ਸੁਗੰਧ ਲਿਆਉਣ ਵਾਲੀ ਪਵਿੱਤਰ ਹਵਾ ਵਹਿਣ ਲੱਗੀ ਅਤੇ ਵਹਿੰਦੀ ਹੋਈ ਮুনি ਦੇ ਸ਼ਰੀਰ ਨੂੰ ਛੂਹ ਗਈ। ਤਪ ਦੇ ਤਾਪ ਨਾਲ ਤਪਿਆ ਹੋਇਆ, ਕ੍ਰਿਸ਼ਕਾਇ ਮুনি ਉਸ ਹਵਾ ਦੇ ਪੱਖੇ ਵਰਗੇ ਝੋਕੇ ਨਾਲ ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਡੂੰਘਾ ਸੰਤੋਖ ਪਾ ਗਿਆ। ਮুনি ਦੇ ਇਸ ਅਨਿਲ-ਵਿਜਨਜਨਿਤ ਸੰਤੋਖ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਉਥੇ ਦੇ ਰੁੱਖਾਂ ਨੇ ਤੁਰੰਤ ਫੁੱਲਾਂ ਦੀ ਸ਼ੋਭਾ ਵਿਖਾ ਦਿੱਤੀ। ਤਦ ਕ੍ਰੋਧਿਤ ਹੋ ਕੇ ਮুনি ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਸ਼ਾਪ ਦਿੱਤਾ—“ਤੁਸੀਂ ਹਰ ਵੇਲੇ ਫੁੱਲਾਂ ਨਾਲ ਭਰੇ ਨਹੀਂ ਰਹੋਗੇ।”

Verse 60

नारायणो लोकहितार्थ वडवामुखो नाम पुरा महर्षिबभूव तस्य मेरी तपस्तप्यत: समुद्र आहूतो नागतत्तेनामर्षितेनात्मगात्रोष्मणा समुद्र: स्तिमितजलः कृतः स्वेदप्रस्यन्दनसदृशश्वास्य लवणभावो जनित:

ਇੱਕ ਵਾਰ ਲੋਕ-ਹਿਤ ਲਈ ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ ਨੇ ‘ਵਡਵਾਮੁਖ’ ਨਾਮ ਦੇ ਮਹਰਿਸ਼ੀ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰਿਆ। ਉਹ ਮੈਰੂ ਪਰਬਤ ਉੱਤੇ ਤਪ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ; ਉਹਨਾਂ ਦਿਨਾਂ ਵਿੱਚ ਉਸ ਨੇ ਸਮੁੰਦਰ ਨੂੰ ਆਹਵਾਨ ਕੀਤਾ, ਪਰ ਸਮੁੰਦਰ ਨਾ ਆਇਆ। ਇਸ ਅਣਗੌਲ ਨਾਲ ਕ੍ਰੋਧਿਤ ਹੋ ਕੇ ਉਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਦੇਹ ਦੀ ਤਪਸ਼ ਨਾਲ ਸਮੁੰਦਰ ਦੇ ਜਲ ਨੂੰ ਖੁਬ੍ਹਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, ਉਸ ਨੂੰ ਭਾਰੀ ਤੇ ਠਹਿਰਿਆ ਹੋਇਆ ਬਣਾ ਦਿੱਤਾ ਅਤੇ ਪਸੀਨੇ ਦੇ ਵਹਾਅ ਵਾਂਗ ਉਸ ਵਿੱਚ ਖਾਰਾਪਣ ਪੈਦਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।

Verse 61

उक्तश्नाप्पपेयो भविष्यस्येतच्च ते तोयं वडवामुखसंज्ञितेन पेपीयमानं मधुरं भविष्यति तदेतदद्यापि वडवामुखसंज्ञितेनानुवर्तिना तोयं समुद्रात्‌ पीयते

ਫਿਰ ਉਸ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਗਿਆ—“ਹੇ ਸਮੁੰਦਰ! ਤੂੰ ਪੀਣਯੋਗ ਨਹੀਂ ਰਹੇਗਾ; ਪਰ ਤੇਰਾ ਇਹ ਜਲ ‘ਵਡਵਾਮੁਖ’ ਨਾਮ ਦੀ ਅੱਗ ਵੱਲੋਂ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਪੀਤਾ ਜਾਣ ਤੇ ਮਿੱਠਾ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ।” ਇਹ ਗੱਲ ਅੱਜ ਵੀ ਦਿੱਖਦੀ ਹੈ—ਵਡਵਾਮੁਖ-ਸੰਜ्ञਕ ਅੱਗ ਸਮੁੰਦਰ ਤੋਂ ਪਾਣੀ ਖਿੱਚ ਕੇ ਪੀਂਦੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ।

Verse 62

हिमवतो. गिरे्दुहितरमुमां कन्‍्यां रुद्रश्नकमे भूगुपि च महर्षिहिमवन्तमागत्याब्रवीत्‌ कन्यामिमां मे देहीति तमब्रवीद्धिमवानभिलक्षितो वरो रुद्र इति तमब्रवीद्‌ भुगुर्यस्मात्‌ त्वयाहं कन्यावरण-कृतभाव: प्रत्याख्यातस्तस्मान्न रत्नानां भवान्‌ भाजनं भविष्यतीति,हिमवानकी पुत्री उमाको जब वह कुमारी अवस्थामें थी तभी रुद्रने पानेकी इच्छा की। दूसरी ओरसे महर्षि भूगु भी वहाँ आकर हिमवानसे बोले--“अपनी यह कन्या मुझे दे दो।' तब हिमवानने उनसे कहा--“इस कन्याके लिये देख-सुनकर लक्षित किये हुए वर रुद्रदेव हैं।! तब भूगुने कहा--“मैं कन्‍्याका वरण करनेकी भावना लेकर यहाँ आया था, किंतु तुमने मेरी उपेक्षा कर दी है; इसलिये मैं शाप देता हूँ कि तुम रत्नोंके भण्डार नहीं होओगे'

ਜਦੋਂ ਹਿਮਵਾਨ ਦੀ ਧੀ ਉਮਾ ਕੁਆਰੀ ਅਵਸਥਾ ਵਿੱਚ ਸੀ, ਤਦ ਰੁਦ੍ਰ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਵਿਆਹਣ ਦੀ ਇੱਛਾ ਕੀਤੀ। ਉਸੇ ਵੇਲੇ ਮਹਰਿਸ਼ੀ ਭ੍ਰਿਗੂ ਵੀ ਉਥੇ ਆ ਕੇ ਹਿਮਵਾਨ ਨੂੰ ਬੋਲੇ—“ਇਹ ਕੁੜੀ ਮੈਨੂੰ ਦੇ ਦਿਓ।” ਹਿਮਵਾਨ ਨੇ ਕਿਹਾ—“ਇਸ ਕਨਿਆ ਲਈ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਤੇ ਅਭਿਲਕਸ਼ਿਤ ਵਰ ਰੁਦ੍ਰ ਹੀ ਹੈ।” ਤਦ ਭ੍ਰਿਗੂ ਨੇ ਕਿਹਾ—“ਮੈਂ ਕਨਿਆ-ਵਰਨ ਦੀ ਭਾਵਨਾ ਲੈ ਕੇ ਆਇਆ ਸੀ, ਪਰ ਤੂੰ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਠੁਕਰਾਇਆ ਤੇ ਅਣਗੌਲ ਕੀਤਾ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਸ਼ਾਪ ਦਿੰਦਾ ਹਾਂ—ਤੂੰ ਰਤਨਾਂ ਦਾ ਭੰਡਾਰ ਨਹੀਂ ਬਣੇਗਾ।”

Verse 63

अद्यप्रभृत्येतववस्थितमृषिवचनं तदेवंविध॑ माहात्म्यं ब्राह्मणानाम्‌,आज भी महर्षिका वह वचन हिमवानपर ज्यों-का-त्यों लागू हो रहा है। ऐसा ब्राह्मणोंका माहात्म्य है

ਅੱਜ ਤੋਂ ਰਿਸ਼ੀ ਦਾ ਉਹ ਬਚਨ ਜਿਵੇਂ ਉਚਾਰਿਆ ਗਿਆ ਸੀ ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਪ੍ਰਤਿਸ਼ਠਿਤ ਹੋ ਕੇ ਚੱਲ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਇਹ ਹੈ ਬ੍ਰਾਹਮਣਾਂ ਦੀ ਮਹਿਮਾ—ਸੱਚ ਅਤੇ ਤਪ ਦੇ ਬਲ ਨਾਲ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਬਚਨ ਸਮੇਂ ਤੋਂ ਪਰੇ ਵੀ ਪ੍ਰਭਾਵੀ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ।

Verse 64

क्षत्रमपि च ब्राह्मणप्रसादादेव शाश्वतीमव्ययां च पृथिवीं पत्नीमभिगम्य बुभूजे,क्षत्रिय जाति भी ब्राह्मणोंकी कृपासे ही सदा रहनेवाली इस अविनाशिनी पृथ्वीको पत्नीकी भाँति पाकर इसका उपभोग करती है

ਖੱਤਰੀ ਜਾਤ ਵੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣਾਂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਹੀ ਇਸ ਸਦਾ-ਥਿਰ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਧਰਤੀ ਨੂੰ ਪਤਨੀ ਵਾਂਗ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਉਸ ਦਾ ਭੋਗ ਕਰਦੀ ਹੈ।

Verse 65

यदेतद्‌ ब्रह्माग्नीषोमीयं तेन जगदू धार्यते,यह जो अग्नि और सोमसम्बन्धी ब्रह्म है, उसीके द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌ धारण किया जाता है

ਜੋ ਅਗਨੀ ਅਤੇ ਸੋਮ ਨਾਲ ਸੰਬੰਧਿਤ ਬ੍ਰਹਮ ਹੈ, ਉਸੀ ਦੇ ਆਸਰੇ ਇਹ ਸਾਰਾ ਜਗਤ ਟਿਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ।

Verse 66

उच्यते-- सूर्याचन्द्रमसौ चक्षु: केशाश्वैवांशव: स्मृता: । बोधयंस्तापयंश्वैव जगदुत्तिष्ठते पृथक्‌

ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ—ਸੂਰਜ ਅਤੇ ਚੰਦਰਮਾ ਮੇਰੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਹਨ, ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀਆਂ ਕਿਰਨਾਂ ਨੂੰ ਮੇਰੇ ਕੇਸ ਸਮਝਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਜਗਤ ਨੂੰ ਜਗਾਉਂਦੇ ਅਤੇ ਤਾਪ ਦਿੰਦੇ ਹੋਏ, ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਮਾਰਗਾਂ ਵਿੱਚ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਉਗਦੇ ਹਨ।

Verse 67

(नाम्नां निरुक्तं वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानस: ।) बोधनात्‌ तापनाच्चैव जगतो हर्षणं भवेत्‌ । अग्नीषोमकृतैरेभि: कर्मभि: पाण्डुनन्दन | हृषीकेशो5हमीशानो वरदो लोकभावन:

ਹੁਣ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਨਾਮਾਂ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਕਰਾਂਗਾ; ਇਕਾਗ੍ਰ ਮਨ ਨਾਲ ਸੁਣੋ। ਜਗਤ ਨੂੰ ਜਗਾਉਣ ਅਤੇ ਤਾਪ ਦੇਣ ਕਰਕੇ ਸੂਰਜ-ਚੰਦਰ ਖੁਸ਼ੀ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਹਨ। ਪਾਂਡੁਨੰਦਨ! ਅਗਨੀ ਅਤੇ ਸੋਮ ਰਾਹੀਂ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਕਰਮਾਂ ਕਰਕੇ ਮੈਂ—ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਪਾਲਣ ਵਾਲਾ, ਵਰ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਪ੍ਰਭੂ—‘ਹ੍ਰਿਸ਼ੀਕੇਸ਼’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ।

Verse 68

इलोपहूतयोगेन हरे भागं क्रतुष्वहम्‌ । वर्णश्न मे हरि: श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरहं स्मृत:

ਯੱਗਾਂ ਵਿੱਚ ‘ਇਲੋਪਹੂਤਾ…’ ਆਦਿ ਮੰਤ੍ਰ ਨਾਲ ਆਹਵਾਨ ਹੋਣ ਤੇ ਮੈਂ ਆਪਣਾ ਨਿਯਤ ਹਿੱਸਾ ਗ੍ਰਹਿਣ ਕਰਦਾ ਹਾਂ; ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਦੇਹ ਦਾ ਵਰਣ ਵੀ ਹਰਿਤ-ਸ਼ਿਆਮ ਹੈ—ਇਸ ਲਈ ਮੈਨੂੰ ‘ਹਰੀ’ ਨਾਮ ਨਾਲ ਯਾਦ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 69

धाम सारो हि भूतानाम्‌ ऋतं चैव विचारितम्‌ । ऋतधथामा ततो विप्रै: सद्यक्चाहं प्रकीर्तित:

ਭੂਤਾਂ ਦੇ ‘ਧਾਮ’ ਦਾ ਸਾਰ ਹੀ ‘਋ਤ’—ਸੱਚ ਅਤੇ ਧਰਮ-ਨਿਯਮ—ਹੈ, ਇਹ ਵਿਚਾਰ ਕਰਕੇ ਨਿਸਚਿਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ, ਹੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣੋ, ਮੈਂ ‘਋ਤਧਾਮਾ’—ਜਿਸ ਦਾ ਧਾਮ ਋ਤ ਵਿੱਚ ਹੈ—ਵਜੋਂ ਯਥਾਰਥ ਤੌਰ ਤੇ ਕੀਰਤਿਤ ਹਾਂ।

Verse 70

प्राणियोंके सारका नाम है धाम और ऋतका अर्थ है सत्य, ऐसा विद्वानोंने विचार किया है! इसीलिये ब्राह्मणोंने तत्काल मेरा नाम 'ऋतधामा” रख दिया था ।।

ਵਿਦਵਾਨਾਂ ਨੇ ਵਿਚਾਰ ਕੀਤਾ ਕਿ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਦੇ ਸਾਰ ਦਾ ਨਾਮ ‘ਧਾਮ’ ਹੈ ਅਤੇ ‘਋ਤ’ ਦਾ ਅਰਥ ਸੱਚ ਹੈ; ਇਸ ਲਈ ਬ੍ਰਾਹਮਣਾਂ ਨੇ ਤੁਰੰਤ ਮੇਰਾ ਨਾਮ ‘਋ਤਧਾਮਾ’ ਰੱਖ ਦਿੱਤਾ। ਅਤੇ ਪੂਰਵਕਾਲ ਵਿੱਚ ਜਦੋਂ ਧਰਤੀ ਨਸ਼ਟ ਹੋ ਕੇ ਗੁਪਤ ਪਾਤਾਲ ਵਿੱਚ ਲੀਨ ਹੋ ਗਈ ਸੀ, ਮੈਂ ਵਰਾਹ-ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਉਸ ਨੂੰ ਮੁੜ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ; ਇਸ ਕਾਰਨ ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਵਾਣੀ ਨਾਲ ਮੇਰੀ ਸ্তুਤੀ ‘ਗੋਵਿੰਦ’ ਕਹਿ ਕੇ ਕੀਤੀ—ਜੋ ਧਰਤੀ ਨੂੰ ਲੱਭ ਕੇ ਮੁੜ ਸਥਾਪਿਤ ਕਰੇ, ਉਹ ਗੋਵਿੰਦ ਹੈ।

Verse 71

शिपिविष्टेति चाख्यायां हीनरोमा च यो भवेत्‌ । तेनाविष्ट तु यर्त्किंचिच्छिपिविष्टेति च स्मृत:

ਮੇਰੇ ‘ਸ਼ਿਪਿਵਿਸ਼ਟ’ ਨਾਮ ਦੀ ਵਿਆਖਿਆ ਇਹ ਹੈ—ਰੋਮ-ਰਹਿਤ ਪ੍ਰਾਣੀ ਨੂੰ ‘ਸ਼ਿਪਿ’ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ‘ਵਿਸ਼ਟ’ ਦਾ ਅਰਥ ‘ਵਿਆਪਕ’ ਹੈ। ਮੈਂ ਨਿਰਾਕਾਰ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਸਮੂਹ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਵਿਆਪਤ ਹਾਂ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਨੂੰ ‘ਸ਼ਿਪਿਵਿਸ਼ਟ’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 72

यास्को मामृषिरव्यग्रो नैकयज्ञेषु गीतवान्‌ | शिपिविष्ट इति हास्माद्‌ गुह्नामधरो हाहम्‌

ਰਿਸ਼ੀ ਯਾਸਕ ਨੇ ਅਵਿਆਗ੍ਰ ਚਿੱਤ ਨਾਲ ਅਨੇਕ ਯੱਗਾਂ ਵਿੱਚ ‘ਸ਼ਿਪਿਵਿਸ਼ਟ’ ਕਹਿ ਕੇ ਮੇਰੀ ਮਹਿਮਾ ਗਾਈ ਹੈ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ਇਹ ਗੁਹ੍ਯ ਨਾਮ ਧਾਰਨ ਕਰਦਾ ਹਾਂ—ਕਿਉਂਕਿ ਗੁਪਤ ਨਾਮਾਂ ਵਿੱਚ ਮੈਂ ਅਗ੍ਰਗਣ੍ਯ ਹਾਂ।

Verse 73

स्तुत्वा मां शिपिविष्ठेति यास्क ऋषिरुदार धी: । मत्प्रसादादधो नष्ट निरुक्तमभिजग्मिवान्‌

ਉਦਾਰ-ਚਿੱਤ ਰਿਸ਼ੀ ਯਾਸਕ ਨੇ “ਸ਼ਿਪਿਵਿਸ਼ਟ” ਉਪਨਾਮ ਨਾਲ ਮੇਰੀ ਸ্তুਤੀ ਕੀਤੀ। ਮੇਰੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਉਸ ਨੇ ਪਾਤਾਲ ਵਿੱਚ ਲੁਪਤ ਹੋਇਆ ਨਿਰੁਕਤ-ਸ਼ਾਸਤਰ ਮੁੜ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਉਸ ਪਵਿੱਤਰ ਵਿਦਿਆ ਨੂੰ ਫਿਰ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਲਿਆਇਆ।

Verse 74

न हि जातो न जायेय॑ न जनिष्ये कदाचन । क्षेत्रज्ञ: सर्वभूतानां तस्मादहमज: स्मृत:

ਮੈਂ ਨਾ ਪਿਛਲੇ ਸਮੇਂ ਜਨਮਿਆ ਹਾਂ, ਨਾ ਹੁਣ ਜਨਮ ਲੈਂਦਾ ਹਾਂ, ਨਾ ਅੱਗੇ ਕਦੇ ਜਨਮ ਲਵਾਂਗਾ। ਮੈਂ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਸਰੀਰਾਂ ਵਿੱਚ ਵੱਸਣ ਵਾਲਾ ਖੇਤਰਜ੍ਞ—ਅੰਦਰਲਾ ਜਾਣਨਹਾਰ ਆਤਮਾ—ਹਾਂ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਨੂੰ ‘ਅਜ’ (ਅਜਨਮਾ) ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 75

नोक्तपूर्व मया क्षुद्रमश्लीलं वा कदाचन । ऋता ब्रह्म॒सुता सा मे सत्या देवी सरस्वती

ਮੈਂ ਕਦੇ ਵੀ ਤੱਛ ਜਾਂ ਅਸ਼ਲੀਲ ਬਚਨ ਨਹੀਂ ਬੋਲੇ। ਸਤ੍ਯ-ਸਰੂਪਾ, ਬ੍ਰਹਮਾ ਦੀ ਪੁੱਤਰੀ ਦੇਵੀ ਸਰਸਵਤੀ ਹੀ ਮੇਰੀ ਵਾਣੀ ਹੈ।

Verse 76

सच्चासच्चैव कौन्तेय मया55वेशितमात्मनि । पौष्करे ब्रह्मसदने सत्यं मामृषयो विदु:

ਕੌਂਤੇਯ! ਸਤ ਅਤੇ ਅਸਤ—ਦੋਹਾਂ ਨੂੰ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਅੰਦਰ ਸਮਾਵੇਸ਼ ਕਰ ਰੱਖਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਨਾਭਿ-ਕਮਲ ਤੋਂ ਉਤਪੰਨ ਬ੍ਰਹਮਲੋਕ ਦੇ ਪੁਸ਼ਕਰ-ਸਮ ਬ੍ਰਹਮਸਦਨ ਵਿੱਚ ਵੱਸਣ ਵਾਲੇ ਰਿਸ਼ੀ ਮੈਨੂੰ ‘ਸਤ੍ਯ’ ਨਾਮ ਨਾਲ ਜਾਣਦੇ ਹਨ।

Verse 77

सच्त्वान्नच्युतपूर्वो5हं सत्त्वं वै विद्धि मत्कृतम्‌ । जन्मनीहा भवेत्‌ सत्त्वं पौर्विकं मे धनंजय

ਧਨੰਜਯ! ਮੈਂ ਕਦੇ ਵੀ ਸਤ੍ਤਵ ਤੋਂ ਚ੍ਯੁਤ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ। ਜਾਣ ਲੈ ਕਿ ਸਤ੍ਤਵ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਹੀ ਉਤਪੰਨ ਹੈ। ਇਸ ਜਨਮ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮੇਰਾ ਉਹ ਪ੍ਰਾਚੀਨ, ਆਦਿ ਸਤ੍ਤਵ ਵਿਦਮਾਨ ਹੈ; ਉਸੇ ਸਤ੍ਤਵ ਕਰਕੇ ਮੈਂ ਪਾਪ-ਰਹਿਤ ਰਹਿ ਕੇ ਨਿਸ਼ਕਾਮ ਕਰਮ ਵਿੱਚ ਲੱਗਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹਾਂ—ਇਸ ਲਈ ਲੋਕ ਮੈਨੂੰ ‘ਸਾਤ੍ਤਵਤ’ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ।

Verse 78

निराशी: कर्मसंयुक्त: सत्त्वतश्नाप्पकल्मष: । सात्त्वतज्ञानदृष्टोडहं सत्त्वतामिति सात्त्वत:ः

ਮੈਂ ਨਿਰਾਸ਼ ਹੋ ਕੇ ਕਰਮ ਵਿੱਚ ਲੱਗਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹਾਂ ਅਤੇ ਸੱਤ੍ਵ ਦੇ ਬਲ ਨਾਲ ਪਾਪ-ਕਲਮਸ਼ ਤੋਂ ਅਲਿਪਤ ਰਹਿੰਦਾ ਹਾਂ। ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਤ-ਗਿਆਨ ਰਾਹੀਂ ਮੇਰਾ ਸਵਰੂਪ ਜਾਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਨੂੰ “ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਤ” ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਧਨੰਜਯ! ਮੈਂ ਕਦੇ ਵੀ ਸੱਤ੍ਵ ਤੋਂ ਚ੍ਯੁਤ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ। ਜਾਣ ਲੈ, ਸੱਤ੍ਵ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਹੀ ਉਤਪੰਨ ਹੈ; ਮੇਰਾ ਉਹ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਸ਼ੁੱਧ ਸੱਤ੍ਵ ਇਸ ਅਵਤਾਰ ਵਿੱਚ ਵੀ ਵਰਤਮਾਨ ਹੈ। ਸੱਤ੍ਵ ਦੇ ਕਾਰਣ ਮੈਂ ਨਿਸ਼ਕਾਮ ਕਰਮ ਕਰਦਿਆਂ ਵੀ ਨਿਸ਼ਪਾਪ ਰਹਿੰਦਾ ਹਾਂ। ਭਗਵਤ-ਪ੍ਰਾਪਤ ਜਨ ਪਾਂਚਰਾਤ੍ਰ ਆਦਿ ਵੈਸ਼ਣਵ ਤੰਤਰ-ਰੂਪ ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਤ-ਗਿਆਨ ਨਾਲ ਮੇਰੇ ਤੱਤ ਨੂੰ ਸਮਝਦੇ ਹਨ; ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਲੋਕ ਮੈਨੂੰ “ਸਾਤ੍ਤ੍ਵਤ” ਆਖਦੇ ਹਨ।

Verse 79

कृषामि मेदिनीं पार्थ भूत्वा कार्ष्णायसो महान्‌ | कृष्णो वर्णश्व॒ मे यस्मात्‌ तस्मात्‌ कृष्णोडहमर्जुन

ਹੇ ਪਾਰਥ! ਮੈਂ ਕਾਲੇ ਲੋਹੇ ਦੇ ਮਹਾਨ ਹਲ ਦੇ ਫਾਲ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਇਸ ਧਰਤੀ ਨੂੰ ਜੋਤਦਾ ਹਾਂ। ਅਤੇ ਮੇਰਾ ਰੰਗ ਵੀ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ (ਕਾਲਾ) ਹੈ; ਇਸ ਲਈ, ਹੇ ਪૃਥਾ-ਪੁੱਤਰ ਅਰਜੁਨ, ਮੈਂ “ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ” ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ।

Verse 80

मया संश्लेषिता भूमिरद्धिव्योम च वायुना । वायुश्न तेजसा सार्ध वैकुण्ठत्वं ततो मम

ਮੈਂ ਧਰਤੀ ਨੂੰ ਜਲ ਨਾਲ, ਆਕਾਸ਼ ਨੂੰ ਵਾਯੂ ਨਾਲ ਅਤੇ ਵਾਯੂ ਨੂੰ ਤੇਜ ਨਾਲ ਜੋੜਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ—ਜਿਸ ਦੀ ਸ਼ਕਤੀ ਪੰਜ ਭੂਤਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਾਉਣ ਵਿੱਚ ਕਦੇ ਰੁਕਦੀ ਨਹੀਂ—ਮੈਨੂੰ “ਵੈਕੁੰਠ” ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 81

निर्वाणं परम॑ ब्रह्म धर्मोड्सौ पर उच्यते | तस्मान्न च्युतपूर्वोडहमच्युतस्तेन कर्मणा

ਨਿਰਵਾਣ—ਜੋ ਪਰਮ ਬ੍ਰਹਮ ਹੈ—ਉਹੀ ਪਰਮ ਧਰਮ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਮੈਂ ਕਦੇ ਉਸ ਅਵਸਥਾ ਤੋਂ ਚ੍ਯੁਤ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ; ਅਤੇ ਉਸੇ ਆਚਰਨ ਵਿੱਚ ਅਡੋਲ ਰਹਿਣ ਕਰਕੇ ਲੋਕ ਮੈਨੂੰ “ਅਚ੍ਯੁਤ” ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ।

Verse 82

पृथिवीनभसी चोभे विश्रुते विश्वतोमुखे । तयो: संधारणार्थ हि मामधोक्षजमञज्जसा

ਧਰਤੀ ਅਤੇ ਆਕਾਸ਼—ਦੋਵੇਂ ਹੀ ਸਭ ਦਿਸ਼ਾਵਾਂ ਵੱਲ ਫੈਲੇ ਹੋਏ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹਨ। ਮੈਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਕਠਿਨਾਈ ਦੇ ਧਾਰਨ ਕਰਦਾ ਹਾਂ; ਇਸ ਲਈ (ਅਧಃ=ਧਰਤੀ, ਅਕ੍ਸ਼=ਆਕਾਸ਼, ਜ=ਧਾਰਕ) ਲੋਕ ਮੈਨੂੰ ਠੀਕ ਹੀ “ਅਧੋਕ੍ਸ਼ਜ” ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ।

Verse 83

निरुक्त वेदविदुषो वेदशब्दार्थचिन्तका: । ते मां गायन्ति प्राग्वंशे अधोक्षज इति स्थिति:

ਨਿਰੁਕਤ ਵਿੱਚ ਨਿਪੁਣ, ਵੇਦ-ਵੇਤਾ ਅਤੇ ਵੇਦ ਦੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਦੇ ਅਰਥਾਂ ਉੱਤੇ ਮਨਨ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਵਿਦਵਾਨ ਪ੍ਰਾਗਵੰਸ਼ ਵਿੱਚ ਬੈਠ ਕੇ ‘ਅਧੋਖ਼ਜ’ ਨਾਮ ਨਾਲ ਮੇਰੀ ਮਹਿਮਾ ਗਾਂਦੇ ਹਨ; ਇਸ ਲਈ ਵੇਦ-ਸਤੁਤੀ ਅਤੇ ਅਰਥ-ਬੋਧ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ ਮੇਰਾ ਨਾਮ ‘ਅਧੋਖ਼ਜ’ ਹੀ ਪ੍ਰਤਿਸ਼ਠਿਤ ਹੈ।

Verse 84

(अधो न क्षीयते यस्माद्‌ वदन्त्यन्ये ह्धोक्षजम्‌ ।) जिसके अनुग्रहसे जीव अधोगतिमें पड़कर क्षीण नहीं होता, उन भगवान्‌को दूसरे लोग इसी व्युत्पत्तिके अनुसार 'अधोक्षज' कहते हैं ।।

ਜਿਸ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਜੀਵ ਅਧੋਗਤੀ ਵਿੱਚ ਪੈ ਕੇ ਵੀ ਨਾਸ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਉਸ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਕੁਝ ਲੋਕ ਇਸ ਵ੍ਯੁਤਪੱਤੀ ਅਨੁਸਾਰ ‘ਅਧੋਖ਼ਜ’ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਮਹਰਿਸ਼ੀ ਹੋਰ ਸਮਝਾਉਂਦੇ ਹਨ ਕਿ ਇਹ ਇਕੋ ਸ਼ਬਦ ਹੋ ਕੇ ਵੀ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਅੰਸ਼ਾਂ ਦਾ ਸਮਾਸ ਹੈ, ਜੋ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ, ਪਾਲਣਾ ਅਤੇ ਲਯ ਦੇ ਇਕਮਾਤ੍ਰ ਆਧਾਰ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦਾ ਹੈ; ਇਸ ਲਈ ਸਰਵਾਧਿਪਤੀ ਨਾਰਾਇਣ ਪ੍ਰਭੂ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਹੋਰ ਕੋਈ ਸੱਚਮੁੱਚ ‘ਅਧੋਖ਼ਜ’ ਨਾਮ ਦਾ ਹੱਕਦਾਰ ਨਹੀਂ।

Verse 85

घृतं ममार्चिषो लोके जन्तूनां प्राणधारणम्‌ । घृतार्चिरहमव्यग्रैवेंदज्ै: परिकीर्तित:

ਇਸ ਲੋਕ ਵਿੱਚ ਘੀ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਪ੍ਰਾਣਾਂ ਦਾ ਪੋਸ਼ਣ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹੀ ਮੇਰੀਆਂ ਜਵਾਲਾਵਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਜ੍ਵਲਿਤ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਅਵ੍ਯਗ੍ਰ, ਸ਼ਾਂਤਚਿੱਤ ਵੇਦਜ੍ਞ ਮੁਨੀਆਂ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ‘ਘ੍ਰਿਤਾਰ੍ਚਿ’—ਘੀ ਨਾਲ ਪੋਸ਼ਿਤ ਤੇਜ ਵਾਲਾ—ਕਹਿ ਕੇ ਕੀਰਤਿਤ ਕੀਤਾ ਹੈ।

Verse 86

त्रयो हि धातव: ख्याता: कर्मजा इति ते स्मृता: । पित्तं श्लेष्मा च वायुश्चव एब संघात उच्यते

ਸਰੀਰ ਵਿੱਚ ਤਿੰਨ ਧਾਤੂ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹਨ—ਵਾਯੁ (ਵਾਤ), ਪਿੱਤ ਅਤੇ ਸ਼ਲੇਸ਼ਮਾ (ਕਫ); ਅਤੇ ਇਹ ਕਰਮ-ਜਨ੍ਯ ਮੰਨੇ ਗਏ ਹਨ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸੰਯੁਕਤ ਸਮੂਹ ਨੂੰ ‘ਤ੍ਰਿਧਾਤੂ’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 87

एतैश्न धार्यते जन्तुरेतै: क्षीणैश्व क्षीयते । आयुर्वेदविदस्तस्मात्‌ त्रिधातु मां प्रचक्षते

ਇਨ੍ਹਾਂ (ਤਿੰਨ ਧਾਤੂਆਂ) ਨਾਲ ਹੀ ਜੀਵ ਟਿਕਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਜਦੋਂ ਇਹ ਘਟ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਉਹ ਵੀ ਘਟਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਆਯੁਰਵੇਦ ਦੇ ਵਿਦਵਾਨ ਮੈਨੂੰ ‘ਤ੍ਰਿਧਾਤੂ’ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ।

Verse 88

वृषो हि भगवान्‌ धर्म: ख्यातो लोकेषु भारत । नैधण्टुकपदाख्याने विद्धि मां वृषमुत्तमम्‌

ਹੇ ਭਾਰਤ! ਭਗਵਾਨ ਧਰਮ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ‘ਵ੍ਰਿਸ਼’ (ਬਲਦ) ਨਾਮ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੈ। ਨੈਘੰਟੁਕ (ਵੈਦਿਕ ਸ਼ਬਦਾਰਥ-ਕੋਸ਼) ਅਨੁਸਾਰ ‘ਵ੍ਰਿਸ਼’ ਸ਼ਬਦ ਦਾ ਅਰਥ ਧਰਮ ਹੈ; ਇਸ ਲਈ, ਹੇ ਭਰਤਨੰਦਨ, ਮੈਨੂੰ ‘ਵ੍ਰਿਸ਼’—ਧਰਮ ਦਾ ਪਰਮ ਸਰੂਪ—ਸਮਝ।

Verse 89

कपिर्वराह: श्रेष्ठश्न धर्मश्न॒ वृष उच्यते । तस्माद्‌ वृषाकपिं प्राह कश्यपो मां प्रजापति:

‘ਕਪਿ’ ਦਾ ਅਰਥ ਵਰਾਹ ਵੀ ਹੈ ਅਤੇ ‘ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ’ ਵੀ; ਜੋ ਅਗੇਵਾਨ ਅਤੇ ਧਰਮ-ਜਾਣੂ ਹੋਵੇ, ਉਹ ‘ਵ੍ਰਿਸ਼’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਪ੍ਰਜਾਪਤੀ ਕਸ਼੍ਯਪ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ‘ਵ੍ਰਿਸ਼ਾਕਪਿ’ ਆਖਿਆ।

Verse 90

कपि शब्दका अर्थ वराह एवं श्रेष्ठ है और वृष कहते हैं धर्मको। मैं धर्म और श्रेष्ठ वराहरूपधारी हूँ; इसलिये प्रजापति कश्यप मुझे “वृषाकपि' कहते हैं ।।

‘ਕਪਿ’ ਸ਼ਬਦ ਦਾ ਅਰਥ ਵਰਾਹ ਵੀ ਹੈ ਅਤੇ ‘ਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ’ ਵੀ; ਅਤੇ ‘ਵ੍ਰਿਸ਼’ ਧਰਮ ਨੂੰ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਮੈਂ ਧਰਮ ਹਾਂ ਅਤੇ ਪਰਮ ਵਰਾਹ-ਰੂਪ ਧਾਰਨ ਕਰਦਾ ਹਾਂ; ਇਸ ਲਈ ਪ੍ਰਜਾਪਤੀ ਕਸ਼੍ਯਪ ਮੈਨੂੰ ‘ਵ੍ਰਿਸ਼ਾਕਪਿ’ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਦੇਵਤੇ ਅਤੇ ਅਸੁਰ ਮੇਰਾ ਆਦਿ, ਮੱਧ ਅਤੇ ਅੰਤ ਕਦੇ ਨਹੀਂ ਜਾਣ ਸਕਦੇ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ‘ਅਨਾਦਿ’, ‘ਅਮੱਧ’ ਅਤੇ ‘ਅਨੰਤ’—ਸਰਬਵਿਆਪੀ ਪ੍ਰਭੂ, ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਸਾਕਸ਼ੀ—ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ।

Verse 91

शुचीनि श्रवणीयानि शूणोमीह धनंजय । न च पापानि गृह्नामि ततोऊहं वै शुचिश्रवा:

ਹੇ ਧਨੰਜਯ! ਮੈਂ ਇੱਥੇ ਕੇਵਲ ਪਵਿੱਤਰ ਅਤੇ ਸੁਣਨ-ਯੋਗ ਬਚਨ ਹੀ ਸੁਣਦਾ ਹਾਂ; ਪਾਪ-ਭਰੀ ਗੱਲਾਂ ਕਦੇ ਗ੍ਰਹਿਣ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ। ਇਸ ਲਈ ਮੇਰਾ ਨਾਮ ‘ਸ਼ੁਚਿਸ਼੍ਰਵਾ’—ਜਿਸ ਦੀ ਸੁਣਨ-ਸ਼ਕਤੀ ਪਵਿੱਤਰ ਹੈ—ਹੈ।

Verse 92

एकशड्गः पुरा भूत्वा वराहो नन्दिवर्धन: । इमां चोद्धृतवान्‌ भूमिमेकशूड्रस्ततो हाहम्‌

ਪੁਰਾਤਨ ਸਮੇਂ ਮੈਂ ਇਕ-ਸਿੰਗ (ਇਕ-ਦੰਤ) ਵਰਾਹ ਦਾ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਇਸ ਧਰਤੀ ਨੂੰ ਜਲਾਂ ਵਿਚੋਂ ਉੱਪਰ ਚੁੱਕਿਆ ਅਤੇ ਜਗਤ ਦਾ ਆਨੰਦ ਵਧਾਇਆ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਂ ‘ਏਕਸ਼੍ਰਿੰਗ’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ।

Verse 93

तथैवासं त्रिककुदो वाराहं रूपमास्थित: । त्रिककुत्‌ तेन विख्यात: शरीरस्य तु मापनात्‌

ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਮੈਂ ਵਰਾਹ-ਰੂਪ ਧਾਰਿਆ; ਮੇਰੇ ਗੌਰ ਸਰੀਰ ਉੱਤੇ ਤਿੰਨ ਕਕੁਦ (ਉੱਚੇ ਉਭਾਰ) ਸਨ। ਸਰੀਰ ਦੇ ਲੱਛਣਾਂ ਵਜੋਂ ਮਾਪੇ ਗਏ ਉਹਨਾਂ ਤਿੰਨਾਂ ਉਚਾਈਆਂ ਕਰਕੇ ਹੀ ਮੈਂ ‘ਤ੍ਰਿਕਕੁਤ’ ਨਾਮ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੋਇਆ।

Verse 94

विरिज्च इति यत्‌ प्रोक्ते कापिलज्ञानचिन्तकै: । स प्रजापतिरेवाहं चेतनात्‌ सर्वलोककृत्‌

ਕਪਿਲ ਦੇ ਸਾਂਖ੍ਯ-ਜ੍ਞਾਨ ਦਾ ਮਨਨ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਵਿਦਵਾਨ ਜਿਸ ਨੂੰ ‘ਵਿਰਿੰਚ’ ਆਖਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਸਭ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟਿਕਰਤਾ ਪ੍ਰਜਾਪਤੀ ਮੈਂ ਹੀ ਹਾਂ; ਕਿਉਂਕਿ ਚੇਤਨਾ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਮੈਂ ਹੀ ਹਾਂ।

Verse 95

विद्यासहायवन्तं मामादित्यस्थं सनातनम्‌ | कपिल प्राहुराचार्या: सांख्या निश्चितनिश्चया:

ਤੱਤਵ-ਨਿਰਣੇ ਵਿੱਚ ਅਡੋਲ ਸਾਂਖ੍ਯ ਆਚਾਰ੍ਯ ਮੈਨੂੰ—ਵਿਦਿਆ-ਸ਼ਕਤੀ ਦੇ ਸਾਥ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ, ਆਦਿਤ੍ਯ-ਮੰਡਲ ਵਿੱਚ ਨਿਵਾਸੀ, ਸਨਾਤਨ ਦੇਵਤਾ—‘ਕਪਿਲ’ ਆਖਦੇ ਹਨ।

Verse 96

हिरण्यगर्भो द्युतिमान्‌ य एष च्छन्दसि स्तुत: । योगै: सम्पूज्यते नित्यं स एवाहं भुवि स्मृत:

ਵੇਦ-ਮੰਤ੍ਰਾਂ ਵਿੱਚ ਜਿਸ ਦੀ ਸ্তুਤੀ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਜਗਤ ਵਿੱਚ ਯੋਗੀ ਜਨ ਜਿਸ ਦੀ ਨਿੱਤ ਪੂਜਾ ਤੇ ਸਿਮਰਨ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਉਹ ਤੇਜਸਵੀ ‘ਹਿਰਣ੍ਯਗਰਭ’ ਮੈਂ ਹੀ ਹਾਂ।

Verse 97

एकविंशतिसाहस्रं ऋग्वेदं मां प्रचक्षते । सहस्रशाखं यत्‌ साम ये वै वेदविदो जना:,वेदके विद्वान्‌ मुझे ही इक्कीस हजार ऋचाओंसे युक्त “ऋग्वेद' और एक हजार शाखाओंवाला 'सामवेद' कहते हैं

ਵੇਦਾਂ ਦੇ ਜਾਣਕਾਰ ਲੋਕ ਮੈਨੂੰ ਹੀ ਇਕੀ ਹਜ਼ਾਰ ਰਿਚਾਵਾਂ ਨਾਲ ਯੁਕਤ ‘਋ਗਵੇਦ’ ਅਤੇ ਹਜ਼ਾਰ ਸ਼ਾਖਾਵਾਂ ਵਾਲਾ ‘ਸਾਮਵੇਦ’ ਆਖਦੇ ਹਨ।

Verse 98

गायन्त्यारण्यके विप्रा मद्धक्तास्ते हि दुर्लभा: | षट्पञ्चाशतमष्टौ च सप्तत्रिंशतमित्युत

ਜੰਗਲ ਵਿੱਚ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਰਿਸ਼ੀ ਭਜਨ ਗਾਂਦੇ ਹਨ; ਮੇਰੇ ਭਗਤ ਨਿਸ਼ਚੇ ਹੀ ਦੁਲੱਭ ਹਨ। (ਉਹ) ਛੱਪਨਵਾਂ, ਅੱਠਵਾਂ ਅਤੇ ਸੈਂਤੀਵਾਂ—ਇਉਂ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 99

पडञ्चकल्पमथर्वाणं कृत्याभि: परिबृंहितम्‌

ਅਥਰਵਣ ਦਾ ਪੰਚਕਲਪ—ਕ੍ਰਿਤਿਆਵਾਂ (ਆਭਿਚਾਰਿਕ ਕਰਮਾਂ) ਨਾਲ ਪਰਿਪੁਸ਼ਟ ਤੇ ਦ੍ਰਿੜ੍ਹ ਕੀਤਾ ਹੋਇਆ—ਵਰਤਿਆ ਗਿਆ।

Verse 100

कल्पयन्ति हि मां विप्रा अथर्वाणविदस्तथा । अथर्ववेदी ब्राह्मण मुझे ही कृत्याओं आभिचारिक प्रयोगोंसे सम्पन्न पंचकल्पात्मक “अथर्ववेद' मानते हैं ।। शाखाभेदाश्न ये केचिद्‌ याश्व शाखासु गीतय:

ਅਥਰਵਵੇਦ ਦੇ ਗਿਆਨੀ ਵਿਪ੍ਰ ਮੈਨੂੰ ਹੀ—ਕ੍ਰਿਤਿਆਵਾਂ, ਆਭਿਚਾਰਿਕ ਪ੍ਰਯੋਗਾਂ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ—ਪੰਚਕਲਪਾਤਮਕ ‘ਅਥਰਵ’ ਮੰਨਦੇ ਹਨ। ਅਤੇ ਜੋ ਜੋ ਸ਼ਾਖਾ-ਭੇਦ ਹਨ, ਤੇ ਸ਼ਾਖਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਜੋ ਜੋ ਗੀਤ ਗਾਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ—(ਉਹ ਸਭ ਵੀ ਉਸੇ ਵਿੱਚ ਆਉਂਦੇ ਹਨ)।

Verse 101

यत्‌ तद्‌ हयशिर: पार्थ समुदेति वरप्रदम्‌

ਹੇ ਪਾਰਥ, ਉਹ ਵਰ-ਪ੍ਰਦ ਹਯਸ਼ਿਰ (ਅਸ਼ਵ-ਸ਼ਿਰ) ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

Verse 102

वामादेशितमार्गेण मत्प्रसादान्महात्मना

ਖੱਬੇ (ਵਾਮ) ਪਾਸੇ ਵੱਲੋਂ ਦਰਸਾਏ ਰਾਹ ਰਾਹੀਂ, ਅਤੇ ਮੇਰੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ, ਉਹ ਮਹਾਤਮਾ (ਅੱਗੇ ਵਧੇਗਾ)।

Verse 103

पाज्चालेन क्रम: प्राप्तस्तस्माद्‌ भूतात्‌ सनातनात्‌ | महात्मा पांचालने वामदेवके बताये हुए ध्यान-मार्गसे मेरी आराधना करके मुझ सनातन पुरुषके ही कृपाप्रसादसे वेदका क्रमविभाग प्राप्त किया था ।।

ਇੰਦਰ ਨੇ ਕਿਹਾ—“ਜਾ, ਇਹ ਗੱਲ ਨਹੁਸ਼ ਨੂੰ ਦੱਸ। ਜਿਵੇਂ ਪਹਿਲਾਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ, ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਤੂੰ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਨਾਲ ਜੋਤੇ ਹੋਏ ਉਸ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਵਾਹਨ ਉੱਤੇ ਚੜ੍ਹਿਆ ਹੈਂ।” ਉਹ ਅੱਗੇ ਬੋਲਿਆ—“ਉਸ ਸਨਾਤਨ, ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਤੋਂ ਹੀ ਵੇਦ-ਪਾਠ ਦੇ ਕ੍ਰਮ (ਕ੍ਰਮ-ਵਿਧੀ) ਦੀ ਸ਼ਿਸ਼ਟਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਈ। ਮਹਾਤਮਾ ਪਾਂਚਾਲ ਨੇ ਵਾਮਦੇਵ ਵੱਲੋਂ ਦੱਸੇ ਧਿਆਨ-ਮਾਰਗ ਰਾਹੀਂ ਮੇਰੀ ਆਰਾਧਨਾ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਮੇਰੀ—ਸਨਾਤਨ ਪੁਰਖ ਦੀ—ਕਿਰਪਾ-ਪ੍ਰਸਾਦ ਨਾਲ ਵੇਦ ਦਾ ਕ੍ਰਮ-ਵਿਭਾਗ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤਾ; ਬਾਭ੍ਰਵ੍ਯ ਗੋਤ੍ਰ ਵਿੱਚ ਉਹ ਪਹਿਲਾ ਕ੍ਰਮ-ਪਾਰਗ ਆਚਾਰਯ ਬਣਿਆ। ਅਤੇ ਬਾਭ੍ਰਵ੍ਯ ਗੋਤ੍ਰ ਵਿੱਚ ਜੰਮੇ ਮਹਰਿਸ਼ੀ ਗਾਲਵ ਨੇ ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ ਤੋਂ ਵਰ ਅਤੇ ਪਰਮ ਉੱਤਮ ਯੋਗ ਲੈ ਕੇ, ਵੇਦ ਦੇ ਕ੍ਰਮ-ਵਿਭਾਗ ਅਤੇ ਸ਼ਿਕਸ਼ਾ-ਸ਼ਾਸਤਰ ਦੀ ਰਚਨਾ ਕੀਤੀ; ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਹ ਕ੍ਰਮ-ਵਿਧੀ ਵਿੱਚ ਸਿੱਧ ਪਹਿਲਾ ਅਗੇਵਾਨ ਵਿਦਵਾਨ ਬਣਿਆ।”

Verse 104

नारायणाद्‌ वरं लब्ध्वा प्राप्प योगमनुत्तमम्‌ । क्रमं प्रणीय शिक्षां च प्रणयित्वा स गालव:

ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ ਤੋਂ ਵਰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਅਤੇ ਅਨੁੱਤਮ ਯੋਗ-ਅਨੁਸ਼ਾਸਨ ਨੂੰ ਪਾ ਕੇ, ਮਹਰਿਸ਼ੀ ਗਾਲਵ ਨੇ ਵੇਦ-ਪਾਠ ਦੇ ਕ੍ਰਮ (ਕ੍ਰਮ-ਵਿਭਾਗ) ਨੂੰ ਵਿਵਸਥਿਤ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ‘ਸ਼ਿਕਸ਼ਾ’—ਉਚਾਰਣ ਤੇ ਧੁਨੀ-ਵਿਗਿਆਨ—ਦਾ ਵੀ ਪ੍ਰਣਯਨ ਕੀਤਾ। ਇਸ ਕਰਕੇ ਉਹ ਵੇਦ ਦੇ ਕ੍ਰਮ-ਵਿਧਾਨ ਵਿੱਚ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸਿੱਧ ਹੋਏ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਅਗੇਵਾਨ ਬਣਿਆ—ਇਹ ਦੱਸਦਾ ਹੋਇਆ ਕਿ ਆਤਮਿਕ ਸਾਧਨਾ ਅਤੇ ਪਵਿੱਤਰ ਗਿਆਨ ਦੀ ਸਾਵਧਾਨ ਰੱਖਿਆ ਇਕੋ ਧਰਮ-ਕਰਤਵ ਦਾ ਅੰਗ ਹਨ।

Verse 105

कण्डरीको<थ राजा च ब्रह्म॒दत्त: प्रतापवान्‌ । जातीमरणजं दु:खं स्मृत्वा स्मृत्वा पुन: पुन:

ਤਦ ਰਾਜਾ ਕਣਡਰੀਕ ਅਤੇ ਪ੍ਰਤਾਪੀ ਬ੍ਰਹਮਦੱਤ ਵੀ—ਜਨਮ ਅਤੇ ਮੌਤ ਤੋਂ ਉੱਠਣ ਵਾਲੇ ਦੁੱਖ ਨੂੰ ਮੁੜ ਮੁੜ ਯਾਦ ਕਰਦੇ ਹੋਏ—ਮਨ ਨੂੰ ਵਾਰ ਵਾਰ ਉਸ ਪੀੜਾਦਾਇਕ ਮਰਤ੍ਯ-ਚੱਕਰ ਵੱਲ ਮੋੜਦੇ ਰਹੇ, ਤਾਂ ਜੋ ਸੰਯਮ ਅਤੇ ਉੱਚੀ ਸਮਝ ਦੀ ਪ੍ਰੇਰਣਾ ਬਣੀ ਰਹੇ।

Verse 106

पुराहमात्मज: पार्थ प्रथित: कारणान्तरे

ਹੇ ਪਾਰਥ, ਬਹੁਤ ਪਹਿਲਾਂ ਮੈਂ ‘ਪੁੱਤਰ’ ਵਜੋਂ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਸੀ—ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਕਾਰਣ-ਪਰਿਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ।

Verse 107

नरनारायणो पूर्व तपस्तेपतुरव्ययम्‌,पहले नर और नारायणने जब धर्ममय रथपर आरूढ़ हो गन्धमादन पर्वतपर अक्षय तप किया था, उसी समय प्रजापति दक्षका यज्ञ आरम्भ हुआ

ਪੁਰਾਤਨ ਸਮੇਂ ਨਰ ਅਤੇ ਨਾਰਾਇਣ ਨੇ ਅਖੰਡ (ਅਕਸ਼ਯ) ਤਪ ਕੀਤਾ। ਧਰਮਮਯ ਰਥ ਉੱਤੇ ਆਰੂੜ੍ਹ ਹੋ ਕੇ ਉਹ ਗੰਧਮਾਦਨ ਪਰਬਤ ਤੇ ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਤਪੱਸਿਆ ਵਿੱਚ ਲੀਨ ਸਨ; ਉਸੇ ਵੇਲੇ ਪ੍ਰਜਾਪਤੀ ਦਕਸ਼ ਦਾ ਯਜ੍ਞ ਆਰੰਭ ਹੋਇਆ। ਇਹ ਅੰਸ਼ ਦੱਸਦਾ ਹੈ ਕਿ ਤਪ (ਆਤਮ-ਸੰਯਮ) ਅਤੇ ਯਜ੍ਞ (ਧਰਮ-ਕਰਤਵ੍ਯ) ਦੋਵੇਂ ਲੋਕ-ਧਾਰਕ ਸਮਾਂਤਰ ਕਰਮ ਹਨ—ਵਿਅਕਤੀ ਦੀ ਸਾਧਨਾ ਅਤੇ ਰਿਤੀ-ਬੱਧ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਇਕੋ ਹੀ ਋ਤ-ਵਿਵਸਥਾ ਨੂੰ ਥਾਂਮਦੇ ਹਨ।

Verse 108

धर्मयानं समारूढौ पर्वते गन्धमादने । तत्कालसमये चैव दक्षयज्ञो बभूव ह,पहले नर और नारायणने जब धर्ममय रथपर आरूढ़ हो गन्धमादन पर्वतपर अक्षय तप किया था, उसी समय प्रजापति दक्षका यज्ञ आरम्भ हुआ

ਪਹਿਲਾਂ ਨਰ ਅਤੇ ਨਾਰਾਇਣ ਧਰਮਮਈ ਰਥ ਉੱਤੇ ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਗੰਧਮਾਦਨ ਪਰਬਤ ਤੇ ਅਖੰਡ ਤਪ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ; ਉਸੇ ਵੇਲੇ ਪ੍ਰਜਾਪਤੀ ਦਕਸ਼ ਦਾ ਯੱਗ ਆਰੰਭ ਹੋਇਆ।

Verse 109

न चैवाकल्पयद्‌ भागं दक्षो रुद्रस्य भारत । ततो दधीचिवचनाद्‌ दक्षयज्ञमपाहरत्‌,भारत! उस यज्ञमें दक्षने रुद्रके लिये भाग नहीं दिया था; इसलिये दधीचिके कहनेसे रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस कर डाला

ਹੇ ਭਾਰਤ! ਉਸ ਯੱਗ ਵਿੱਚ ਦਕਸ਼ ਨੇ ਰੁਦ੍ਰ ਲਈ ਕੋਈ ਭਾਗ ਨਿਰਧਾਰਤ ਨਾ ਕੀਤਾ; ਇਸ ਲਈ ਦਧੀਚੀ ਦੇ ਬਚਨ ਨਾਲ ਪ੍ਰੇਰਿਤ ਹੋ ਕੇ ਰੁਦ੍ਰਦੇਵ ਨੇ ਦਕਸ਼ ਦੇ ਯੱਗ ਨੂੰ ਛੀਨ ਕੇ ਨਸ਼ਟ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।

Verse 110

ससर्ज शूलं कोपेन प्रज्वलन्तं मुहुर्मुहुः । तच्छूलं भस्मसात्कृत्वा दक्षयज्ञं सविस्तरम्‌

ਕ੍ਰੋਧ ਵਿੱਚ ਉਸ ਨੇ ਮੁੜ ਮੁੜ ਦਹਕਦਾ ਤ੍ਰਿਸ਼ੂਲ ਚਲਾਇਆ; ਅਤੇ ਉਸੇ ਤ੍ਰਿਸ਼ੂਲ ਨਾਲ ਦਕਸ਼ ਦੇ ਯੱਗ ਨੂੰ ਉਸ ਦੇ ਸਾਰੇ ਵਿਸਤਾਰ ਸਮੇਤ ਭਸਮ ਕਰ ਦਿੱਤਾ।

Verse 111

पार्थ! उस समय नारायणकी छातीमें वह त्रिशूल बड़े वेगसे जा लगा। उससे निकलते हुए तेजकी लपेटमें आकर नारायणके केश मूँजके समान रंगवाले हो गये। इससे मेरा नाम “मुछजकेश' हो गया

ਹੇ ਪਾਰਥ! ਉਸ ਵੇਲੇ ਉਹ ਤ੍ਰਿਸ਼ੂਲ ਮਹਾਂ ਵੇਗ ਨਾਲ ਨਾਰਾਇਣ ਦੀ ਛਾਤੀ ਵਿੱਚ ਜਾ ਲੱਗਾ। ਉਸ ਵਿੱਚੋਂ ਨਿਕਲੇ ਤੇਜ ਦੇ ਘੇਰੇ ਵਿੱਚ ਨਾਰਾਇਣ ਦੇ ਕੇਸ ਮੁੰਜਾ ਘਾਹ ਵਰਗੇ ਰੰਗ ਦੇ ਹੋ ਗਏ; ਇਸੇ ਕਰਕੇ ਮੇਰਾ ਨਾਮ ‘ਮੁੰਜਕੇਸ਼’ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੋਇਆ।

Verse 112

ततस्तत्‌ तेजसा<<विष्टा: केशा नारायणस्य ह । बभूवुर्मुज्जवर्णास्तु ततो5हं मुछजकेशवान्‌

ਫਿਰ ਉਸ ਤੇਜ ਨਾਲ ਘਿਰ ਕੇ ਨਾਰਾਇਣ ਦੇ ਕੇਸ ਮੁੰਜਾ-ਰੰਗ ਦੇ ਹੋ ਗਏ; ਇਸ ਲਈ, ਹੇ ਪਾਰਥ, ਮੈਂ ‘ਮੁੰਜਕੇਸ਼’ ਕਿਹਾ ਗਿਆ।

Verse 113

तच्च शूलं विनिर्धूतं हुंकारेण महात्मना । जगाम शंकरकरं नारायणसमाहतम्‌,तब महात्मा नारायणने हुंकारध्वनिके द्वारा उस त्रिशूलको पीछे हटा दिया। नारायणके हुंकारसे प्रतिहत होकर वह शंकरजीके हाथमें चला गया

ਮਹਾਤਮਾ ਨਾਰਾਇਣ ਦੇ ਹੁੰਕਾਰ-ਨਾਦ ਨਾਲ ਉਹ ਤ੍ਰਿਸ਼ੂਲ ਝਟਕਿਆ ਗਿਆ ਤੇ ਪ੍ਰਤਿਹਤ ਹੋਇਆ; ਨਾਰਾਇਣ ਦੇ ਪ੍ਰਤਿਘਾਤ ਨਾਲ ਰੁਕ ਕੇ ਉਹ ਸ਼ੰਕਰ ਦੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਮੁੜ ਆ ਗਿਆ।

Verse 114

अथ रुद्र उपाधावत्‌ तावृषी तपसान्वितौ । तत एन॑ समुद्भूतं कण्ठे जग्राह पाणिना

ਤਦ ਰੁਦ੍ਰ ਤਪੋਬਲ ਨਾਲ ਯੁਕਤ ਉਹਨਾਂ ਦੋ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਵੱਲ ਦੌੜਿਆ; ਉਸੇ ਪਲ ਜੋ ਸੱਤਾ ਉੱਠ ਖੜੀ ਹੋਈ, ਰੁਦ੍ਰ ਨੇ ਹੱਥ ਨਾਲ ਉਸ ਦਾ ਗਲਾ ਫੜ ਲਿਆ।

Verse 115

अथ रुद्रविघातार्थमिषीकां नर उद्धरन्‌

ਤਦ ਰੁਦ੍ਰ ਦੀ ਰੋਕ ਨੂੰ ਟਾਲਣ ਲਈ ਉਸ ਮਨੁੱਖ ਨੇ ਇੱਕ ਸਰਕੰਡਾ ਉਖਾੜ ਲਿਆ।

Verse 116

क्षिप्तश्ष सहसा तेन खण्डनं प्राप्तवांस्तदा

ਉਸ ਦੇ ਅਚਾਨਕ ਵਾਰ ਨਾਲ ਉਹ ਉਸੇ ਵੇਲੇ ਟੁੱਟ-ਭੱਜ ਕੇ ਨਾਸ ਹੋ ਗਿਆ।

Verse 117

अर्जुन उवाच अस्मिन्‌ युद्धे तु वा्ष्णेय त्रैलोक्यशमने तदा

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਕਿਹਾ— ਹੇ ਵਾਰ্ষਣੇਯ! ਇਸ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ, ਜਦੋਂ ਇਹ ਤਿੰਨਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਸ਼ਮਨ ਦਾ ਕਾਰਨ ਬਣਿਆ, ਤਦੋਂ…

Verse 118

श्रीभगवानुवाच तयो: संलग्नयोर्युद्धे रुद्रनारायणात्मनो:

ਸ਼੍ਰੀਭਗਵਾਨ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਅਰਜੁਨ! ਜਦੋਂ ਰੁਦ੍ਰ ਅਤੇ ਨਾਰਾਇਣ—ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਦੀ ਦਿਵ੍ਯ ਸ਼ਕਤੀ ਨਾਲ ਯੁਕਤ—ਪਰਸਪਰ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਜੁੜ ਗਏ, ਤਦੋਂ ਸਭ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਸਾਰੇ ਪ੍ਰਾਣੀ ਅਚਾਨਕ ਘਬਰਾਹਟ ਵਿੱਚ ਆ ਗਏ। ਯਜਨਾਂ ਵਿੱਚ ਵਿਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਅਰਪਿਤ ਸ਼ੁੱਧ ਹਵਿ ਨੂੰ ਵੀ ਅਗਨੀਦੇਵ ਗ੍ਰਹਣ ਨਾ ਕਰ ਸਕੇ।

Verse 119

उद्विग्ना: सहसा कृत्स्ना: सर्वे लोकास्तदा भवन्‌ । नागृह्नात्‌ पावक: शुभ्र॑ मखेषु सुहुतं हवि:

ਉਸ ਵੇਲੇ ਸਾਰੇ ਲੋਕ ਅਚਾਨਕ ਉਦਵਿਗਨ ਹੋ ਗਏ। ਯਜਨਾਂ ਵਿੱਚ ਸੁਹੁਤ ਕੀਤਾ ਹੋਇਆ ਸ਼ੁੱਧ ਹਵਿ ਪਾਵਕ (ਅਗਨੀ) ਨੇ ਗ੍ਰਹਣ ਨਾ ਕੀਤਾ।

Verse 120

वेदा न प्रतिभान्ति सम ऋषीणां भावितात्मनाम्‌ | देवान्‌ रजस्तमश्वैव समाविविशतुस्तदा,पवित्रात्मा ऋषियोंको वेदोंका स्मरण नहीं हो पाता था। उस समय देवताओंमें रजोगुण और तमोगुणका आवेश हो गया था

ਪਵਿੱਤਰ ਆਤਮਾ ਵਾਲੇ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਦੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਵੀ ਵੇਦ ਸਪਸ਼ਟ ਨਹੀਂ ਹੋ ਰਹੇ ਸਨ। ਉਸ ਵੇਲੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਵਿੱਚ ਰਜਸ ਅਤੇ ਤਮਸ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਛਾ ਗਿਆ।

Verse 121

वसुधा संचकम्पे च नभश्न विचचाल ह । निष्प्रभाणि च तेजांसि ब्रह्मा चैवासनच्युत:

ਧਰਤੀ ਕੰਬ ਉਠੀ ਅਤੇ ਆਕਾਸ਼ ਵੀ ਡੋਲ ਗਿਆ। ਸਾਰੇ ਤੇਜ ਨਿਸ਼ਪ੍ਰਭ ਹੋ ਗਏ ਅਤੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਵੀ ਆਪਣੇ ਆਸਨ ਤੋਂ ਹਿਲ ਗਏ।

Verse 122

अगाच्छोषं समुद्रश्न हिमवांश्व व्यशीर्यत । पृथ्वी काँपने लगी

ਸਮੁੰਦਰ ਸੁੱਕਣ ਲੱਗ ਪਿਆ ਅਤੇ ਹਿਮਾਲਾ ਚਿਰਣ ਲੱਗ ਪਿਆ। ਪਾਂਡੁਨੰਦਨ! ਐਸੇ ਅਪਸ਼ਕੁਨ ਪ੍ਰਗਟ ਹੋਣ ਤੇ ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਦੇਵਤਿਆਂ ਅਤੇ ਮਹਾਰਿਸ਼ੀਆਂ ਸਮੇਤ ਤੁਰੰਤ ਉਥੇ ਆ ਪਹੁੰਚੇ ਜਿੱਥੇ ਉਹ ਯੁੱਧ ਹੋ ਰਿਹਾ ਸੀ।

Verse 123

ब्रह्मा वृतो देवगणैरऋषिभि श्ष महात्मभि: । आजगामाशु त॑ देशं यत्र युद्धमवर्तत

ਦੇਵਗਣਾਂ ਅਤੇ ਮਹਾਤਮਾ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਨਾਲ ਘਿਰਿਆ ਹੋਇਆ ਬ੍ਰਹਮਾ ਤੁਰੰਤ ਉਸ ਥਾਂ ਆ ਪਹੁੰਚਿਆ ਜਿੱਥੇ ਯੁੱਧ ਭਿਆਨਕ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਚੱਲ ਰਿਹਾ ਸੀ।

Verse 124

सो&गञ्जलिप्रग्रहो भूत्वा चतुर्वक्त्रो निरुक्तग: | उवाच वचन रुद्रं लोकानामस्तु वै शिवम्‌

ਉਸ ਨੇ ਅੰਜਲੀ ਬੰਨ੍ਹ ਕੇ ਪ੍ਰਣਾਮ ਕੀਤਾ, ਚਤੁਰਮੁਖ ਰੂਪ ਧਾਰਨ ਕਰਕੇ ਨਿਯਤ ਵਿਧੀ ਅਨੁਸਾਰ ਰੁਦ੍ਰ ਨੂੰ ਕਿਹਾ—“ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਕਲਿਆਣ ਹੋਵੇ; ਸੰਸਾਰ ਲਈ ਸ਼ਿਵ (ਮੰਗਲ) ਹੋਵੇ।”

Verse 125

न्यस्यायुधानि विश्वेश जगतो हितकाम्यया । निरुक्तगम्य भगवान्‌ चतुर्मुखने हाथ जोड़कर रुद्रदेवसे कहा--'प्रभो! समस्त लोकोंका कल्याण हो! विश्वेश्वरर आप जगत्‌के हितकी कामनासे अपने हथियार रख दीजिये ।।

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਕਿਹਾ—“ਹੇ ਵਿਸ਼ਵੇਸ਼ਵਰ! ਜਗਤ ਦੇ ਹਿਤ ਦੀ ਕਾਮਨਾ ਨਾਲ ਆਪਣੇ ਹਥਿਆਰ ਰੱਖ ਦਿਓ। ਹੇ ਭਗਵਾਨ, ਨਿਰੁਕਤ (ਵੇਦ-ਵਾਣੀ) ਰਾਹੀਂ ਜਾਣੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ, ਹੇ ਚਤੁਰਮੁਖ! ਉਹ ਅਕਸ਼ਰ, ਅਵ੍ਯਕਤ ਪਰਮੇਸ਼ਵਰ—ਜੋ ਲੋਕਾਂ ਦਾ ਈਸ਼ਵਰ ਅਤੇ ਪਾਲਣਹਾਰ ਹੈ…”

Verse 126

कूटस्थं कर्त निर्दधन्द्रमकर्तेति च यं विदु: । व्यक्तिभावगतस्यास्य एका मूर्तिरियं शुभा

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਕਿਹਾ—“ਉਸ ਨੂੰ ਕੂਟਸਥ (ਅਚਲ) ਜਾਣਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ; ਬੰਧਨਾਂ ਨੂੰ ਸਾੜ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਕਰਤਾ ਵੀ, ਅਤੇ ਅਕਰਤਾ ਵੀ। ਉਹੀ ਤੱਤ ਜਦੋਂ ਵਿਅਕਤ-ਭਾਵ ਵਿੱਚ ਆਉਂਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਇਹ ਉਸ ਦੀ ਇੱਕ ਮੰਗਲਮਈ ਮੂਰਤੀ ਹੈ।”

Verse 127

“जो सम्पूर्ण जगत्‌का उत्पादक, अविनाशी और अव्यक्त ईश्वर हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष कूटस्थ, निर्दधन्द्र, कर्ता और अकर्ता मानते हैं, व्यक्त-भावको प्राप्त हुए उन्हीं परमेश्वरकी यह एक कल्याणमयी मूर्ति है ।।

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਕਿਹਾ—“ਜੋ ਸਮੂਹ ਜਗਤ ਦਾ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟਿਕਰਤਾ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ, ਅਵ੍ਯਕਤ ਅਤੇ ਈਸ਼ਵਰ ਹੈ—ਜਿਸ ਨੂੰ ਗਿਆਨੀ ਕੂਟਸਥ, ਨਿਰਦ੍ਵੰਦ੍ਵ, ਕਰਤਾ ਅਤੇ ਅਕਰਤਾ ਮੰਨਦੇ ਹਨ—ਉਹੀ ਪਰਮੇਸ਼ਵਰ ਵਿਅਕਤ-ਭਾਵ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਕੇ ਇੱਥੇ ਇੱਕ ਮੰਗਲਮਈ ਮੂਰਤੀ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਗਟ ਹੈ। ਧਰਮਕੁਲ ਵਿੱਚ ਜਨਮੇ ਇਹ ਦੋਵੇਂ—ਨਰ ਅਤੇ ਨਾਰਾਇਣ—ਦੇਵਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ, ਮਹਾਵ੍ਰਤੀ ਅਤੇ ਮਹਾਨ ਤਪੱਸਿਆ ਨਾਲ ਯੁਕਤ ਹਨ।”

Verse 128

अहं प्रसादजस्तस्य कुतश्चित्‌ कारणान्तरे । त्वं चैव क्रोधजस्तात पूर्वसर्गे सनातन:

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਆਖਿਆ— ਕਿਸੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਨਿਮਿੱਤ ਨਾਲ ਉਸੇ ਨਾਰਾਇਣ ਦੀ ਕਿਰਪਾ-ਪ੍ਰਸਾਦ ਤੋਂ ਮੇਰਾ ਜਨਮ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਪਿਤਾ ਜੀ! ਤੁਸੀਂ ਵੀ ਪੂਰਵ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ-ਚੱਕਰ ਵਿੱਚ ਉਸੇ ਭਗਵਾਨ ਦੇ ਕ੍ਰੋਧ ਤੋਂ ਉਤਪੰਨ ਸਨਾਤਨ ਪੁਰਖ ਹੋ।

Verse 129

मया च सार्ध वरद विबुधैश्न महर्षिभि: । प्रसादयाशु लोकानां शान्तिर्भवतु मा चिरम्‌

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਆਖਿਆ— ਹੇ ਵਰਦਾਤਾ! ਦੇਵਤਿਆਂ, ਮਹਾਰਿਸ਼ੀਆਂ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ ਤੁਰੰਤ ਇਸ ਭਗਵਾਨ ਨੂੰ ਪ੍ਰਸੰਨ ਕਰੋ, ਤਾਂ ਜੋ ਸਭ ਲੋਕਾਂ ਵਿੱਚ ਬਿਨਾ ਦੇਰੀ ਸ਼ਾਂਤੀ ਸਥਾਪਿਤ ਹੋਵੇ।

Verse 130

ब्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्र: क्रोधाग्निमुत्सूजन्‌ । प्रसादयामास ततो देवं नारायण प्रभुम्‌ शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम्‌ू

ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਦੇ ਇਹ ਕਹਿਣ ਤੇ ਰੁਦ੍ਰਦੇਵ ਨੇ ਕ੍ਰੋਧ ਦੀ ਅੱਗ ਤਿਆਗ ਦਿੱਤੀ। ਫਿਰ ਉਸ ਨੇ ਆਦਿ-ਦੇਵ, ਵਰੇਣਯ, ਵਰਦਾਤਾ, ਸਰਵ-ਸਮਰਥ ਭਗਵਾਨ ਨਾਰਾਇਣ ਨੂੰ ਪ੍ਰਸੰਨ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਉਸੇ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਲਈ।

Verse 131

ततो<5थ वरदो देवो जितक्रोधो जितेन्द्रिय: । प्रीतिमानभवत््‌ तत्र रुद्रेण सह संगत:,तब क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लेनेवाले वरदायक देवता नारायण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए और रुद्रदेवसे गले मिले

ਤਦ ਕ੍ਰੋਧ ਨੂੰ ਜਿੱਤਣ ਵਾਲੇ ਅਤੇ ਇੰਦ੍ਰਿਆਂ ਨੂੰ ਵਸ਼ ਵਿੱਚ ਰੱਖਣ ਵਾਲੇ ਵਰਦਾਤਾ ਦੇਵ ਨਾਰਾਇਣ ਉੱਥੇ ਬਹੁਤ ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋਏ ਅਤੇ ਰੁਦ੍ਰ ਨਾਲ ਮਿਲ ਕੇ ਸਨੇਹ ਨਾਲ ਉਸ ਨੂੰ ਗਲੇ ਲਾਇਆ।

Verse 132

ऋषिभिर्त्रद्मणा चैव विबुधैश्व सुपूजित: । उवाच देवमीशानमीश: स जगतो हरि:

ਫਿਰ ਰਿਸ਼ੀਆਂ, ਬ੍ਰਹਮਾ ਜੀ ਅਤੇ ਦੇਵਤਿਆਂ ਵੱਲੋਂ ਬਹੁਤ ਪੂਜਿਤ ਹੋ ਕੇ ਜਗਦੀਸ਼ਵਰ ਸ਼੍ਰੀਹਰੀ ਨੇ ਰੁਦ੍ਰਦੇਵ ਨੂੰ ਕਿਹਾ— “ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਜੋ ਤੈਨੂੰ ਸੱਚੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਵੀ ਜਾਣਦਾ ਹੈ; ਜੋ ਤੇਰਾ ਅਨੁਗਾਮੀ ਹੈ, ਉਹ ਮੇਰਾ ਵੀ ਅਨੁਗਾਮੀ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਦੋਹਾਂ ਵਿੱਚ ਕੋਈ ਭੇਦ ਨਹੀਂ। ਇਸ ਦੇ ਉਲਟ ਕੋਈ ਵਿਚਾਰ ਤੇਰੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਨਾ ਉੱਠੇ।”

Verse 133

यस्त्वां वेत्ति स मां वेत्ति यस्त्वामनु स मामनु । नावयोरन्तरं किंचिन्मा ते5भूद्‌ बुद्धिरन्यथा

ਜੋ ਤੈਨੂੰ ਸੱਚੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਵੀ ਜਾਣਦਾ ਹੈ; ਜੋ ਤੇਰਾ ਅਨੁਗਾਮੀ ਹੈ, ਉਹ ਮੇਰਾ ਵੀ ਅਨੁਗਾਮੀ ਹੈ। ਸਾਡੇ ਦੋਹਾਂ ਵਿਚ ਰਤਾ ਭਰ ਵੀ ਫ਼ਰਕ ਨਹੀਂ—ਤੇਰੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਇਸ ਦੇ ਉਲਟ ਵਿਚਾਰ ਨਾ ਉੱਠੇ।

Verse 134

अद्यप्रभृति श्रीवत्स: शूलाडुको मे भवत्वयम्‌ । मम पाण्यड्कितश्नापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि

ਅੱਜ ਤੋਂ ਤੇਰੇ ਸ਼ੂਲ ਦਾ ਇਹ ਨਿਸ਼ਾਨ ਮੇਰੇ ਵਕਸ਼ਸਥਲ ਉੱਤੇ ‘ਸ਼੍ਰੀਵਤਸ’ ਨਾਮ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੋਵੇ; ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਹੱਥ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਨਾਲ ਅੰਕਿਤ ਹੋਣ ਕਰਕੇ ਤੂੰ ਵੀ ‘ਸ਼੍ਰੀਕੰਠ’ ਕਹਲਾਵੇਂਗਾ।

Verse 135

श्रीभगवानुवाच एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा । सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी

ਭਗਵਾਨ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਸ ਵੇਲੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਕ-ਦੂਜੇ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੇ ਉਹ ਨਿਸ਼ਾਨ ਆਪਣੇ-ਆਪਣੇ ਸ਼ਰੀਰਾਂ ਉੱਤੇ ਉਤਪੰਨ ਕੀਤੇ; ਅਤੇ ਰੁਦ੍ਰਦੇਵ ਸਮੇਤ ਉਹ ਦੋਵੇਂ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਨੇ ਅਤੁਲ ਸਖ਼ੀ ਕਾਇਮ ਕੀਤੀ।

Verse 136

तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकस: । एष ते कथित: पार्थ नारायणजयो मृथे

ਤ੍ਰਿਦਿਵ ਦੇ ਵਾਸੀਆਂ ਨੂੰ ਵਿਦਾ ਕਰਕੇ, ਅਵਿਚਲ ਮਨ ਨਾਲ ਉਹ ਤਪੱਸਿਆ ਕਰਨ ਲੱਗੇ। ਹੇ ਪਾਰਥ! ਇਹ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਨਾਰਾਯਣ ਦੀ ਜਿੱਤ ਦਾ ਵ੍ਰਿਤਾਂਤ ਕਿਹਾ ਹੈ।

Verse 137

नामानि चैव गुह्मानि निरुक्तानि च भारत । ऋषिभि: कथितानीह यानि संकीर्तितानि ते

ਹੇ ਭਾਰਤ! ਮੇਰੇ ਜੋ ਗੁਪਤ ਨਾਮ ਹਨ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਨਿਰੁਕਤੀ, ਉਹ ਮੈਂ ਇੱਥੇ ਦੱਸੀ ਹੈ; ਅਤੇ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਕਹੇ ਤੇ ਨਿਸ਼ਚਿਤ ਕੀਤੇ ਨਾਮ ਵੀ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ਵਰਣਨ ਕਰ ਦਿੱਤੇ ਹਨ।

Verse 138

एवं बहुविधे रूपैश्नरामीह वसुन्धराम्‌ । ब्रद्मलोक॑ च कौन्तेय गोलोक॑ च सनातनम्‌

ਕੁੰਤੀਨੰਦਨ! ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅਨੇਕਾਂ ਰੂਪ ਧਾਰ ਕੇ ਮੈਂ ਇਸ ਧਰਤੀ ਉੱਤੇ ਵਿਚਰਦਾ ਹਾਂ; ਬ੍ਰਹਮਲੋਕ ਵਿੱਚ ਵੀ ਵੱਸਦਾ ਹਾਂ ਅਤੇ ਸਨਾਤਨ ਗੋਲੋਕ ਵਿੱਚ ਵੀ ਵਿਹਾਰ ਕਰਦਾ ਹਾਂ।

Verse 139

मया वत्वं रक्षितो युद्धे महान्तं प्राप्तताउजयम्‌ । यस्तु ते सो5ग्रतो याति युद्धे सम्प्रत्युपस्थिते

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਕਿਹਾ—ਮੈਂ ਯੁੱਧ ਵਿੱਚ ਤੇਰੀ ਰੱਖਿਆ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਤੈਨੂੰ ਮਹਾਨ ਜਿੱਤ ਦਿਵਾਈ; ਪਰ ਹੁਣ ਜਦੋਂ ਲੜਾਈ ਸਾਹਮਣੇ ਖੜੀ ਹੈ, ਜੋ ਤੇਰੇ ਅੱਗੇ ਅੱਗੇ ਚਲਦਾ ਹੈ, ਇਸ ਵੇਲੇ ਉਹੀ ਸੱਚਾ ਅਗੂ ਹੈ।

Verse 140

त॑ विद्धि रुद्रं कौन्तेय देवदेवं कपर्दिनम्‌ । काल: स एव कथित: क्रोधजेति मया तव

ਕੁੰਤੀਨੰਦਨ! ਉਸ ਨੂੰ ਰੁਦ੍ਰ—ਦੇਵਾਂ ਦਾ ਦੇਵ, ਜਟਾਜੂਟਧਾਰੀ—ਜਾਣ। ਉਹੀ ‘ਕਾਲ’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ; ਅਤੇ ਉਸੇ ਨੂੰ ਮੈਂ ਤੈਨੂੰ ‘ਕ੍ਰੋਧਜ’ (ਕ੍ਰੋਧ ਤੋਂ ਉਤਪੰਨ) ਕਹਿ ਕੇ ਦੱਸਿਆ ਹੈ।

Verse 141

मुझसे सुरक्षित होकर तुमने महाभारत युद्धमें महान्‌ विजय प्राप्त की है। कुन्तीनन्दन! युद्ध उपस्थित होनेपर जो पुरुष तुम्हारे आगे-आगे चलते थे, उन्हें तुम जटाजूटधारी देवाधिदेव रुद्र समझो। उन्हींको मैंने तुमसे क्रोधद्वारा उत्पन्न बताया है। वे ही काल कहे गये हैं ।।

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵੈਰੀਆਂ ਨੂੰ ਤੂੰ ਮਾਰਿਆ ਹੈ, ਉਹ ਅਸਲ ਵਿੱਚ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਉਸ ਦੇ ਹੱਥੋਂ ਨਿਹਤ ਹੋ ਚੁੱਕੇ ਸਨ। ਅਪ੍ਰਮੇਯ ਪ੍ਰਭਾਵ ਵਾਲੇ ਦੇਵਾਂ ਦੇ ਦੇਵ, ਉਮਾ-ਪਤੀ, ਵਿਸ਼ਵੇਸ਼ਵਰ, ਅਖੰਡ ਹਰਾ ਨੂੰ ਸੰਯਤ ਚਿੱਤ ਨਾਲ ਨਮਸਕਾਰ ਕਰ।

Verse 142

तुमने जिन शत्रुओंको मारा है, वे पहले ही रुद्रदेवके हाथसे मार दिये गये थे। उनका प्रभाव अप्रमेय है। तुम उन देवाधिदेव, उमावल्लभ विश्वनाथ, पापहारी एवं अविनाशी महादेवजीको संयतचित्त होकर नमस्कार करो ।।

ਧਨੰਜਯ! ਜਿਸ ਨੂੰ ਮੈਂ ਪਹਿਲਾਂ ਮੁੜ ਮੁੜ ‘ਕ੍ਰੋਧਜ’ ਕਹਿ ਕੇ ਤੈਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਸੀ, ਅਤੇ ਤੂੰ ਪਹਿਲਾਂ ਜੋ ਕੁਝ ਸੁਣਿਆ ਸੀ—ਉਹ ਸਭ ਉਸੇ ਰੁਦ੍ਰਦੇਵ ਦੇ ਪ੍ਰਭਾਵ ਦਾ ਹੀ ਪ੍ਰਗਟਾਵਾ ਹੈ।

Verse 342

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमो<5 ध्याय:

ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਸ਼੍ਰੀ ਮਹਾਭਾਰਤ ਦੇ ਸ਼ਾਂਤਿ ਪਰਵ ਦੇ ਮੋਖ਼ਧਰਮ ਪਰਵ ਅੰਦਰ ਨਾਰਾਯਣੀਯ ਵਿੱਚ ਤਿੰਨ ਸੌ ਬਿਆਲੀਵਾਂ ਅਧਿਆਇ ਸਮਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

Verse 986

यस्मिन्‌ शाखा यजुर्वेदे सो5हमाध्वर्यवे स्मृतः । आरण्यकॉमें ब्राह्मणलोग मेरा ही गान करते हैं। वे मेरे परम भक्त दुर्लभ हैं। जिस यजुर्वेदकी छप्पन+आठ+सैंतीस-एक सौ एक शाखाएँ मौजूद हैं

ਯਜੁਰਵੇਦ ਦੀ ਜਿਸ ਸ਼ਾਖਾ ਵਿੱਚ ਮੈਂ ਅਧਵਰਯੂ ਪੁਰੋਹਿਤ ਵਜੋਂ ਯਾਦ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ, ਆਰਣ੍ਯਕਾਂ ਅਤੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਪਰੰਪਰਾ ਵਿੱਚ ਵੀ ਉਹ ਮੇਰਾ ਹੀ ਗਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਮੇਰੇ ਪਰਮ ਭਗਤ ਦੁਰਲਭ ਹਨ। ਬਹੁਤੀਆਂ ਸ਼ਾਖਾਵਾਂ ਵਾਲੇ ਯਜੁਰਵੇਦ ਵਿੱਚ ਵੀ ਮੇਰੀ ਹੀ ਸ্তুਤੀ ਗਾਈ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

Verse 1003

स्वरवर्णसमुच्चारा: सर्वास्तान्‌ विद्धि मत्कृतान्‌ वेदोंमें जो भिन्न-भिन्न शाखाएँ हैं

ਸੁਰਾਂ ਅਤੇ ਵਰਣਾਂ ਦੇ ਉਚਾਰਨ ਦੇ ਜਿਤਨੇ ਵੀ ਢੰਗ ਹਨ, ਉਹ ਸਭ ਮੇਰੇ ਹੀ ਬਣਾਏ ਹੋਏ ਜਾਣੋ। ਵੇਦ ਦੀਆਂ ਜਿਤਨੀਆਂ ਭਿੰਨ-ਭਿੰਨ ਸ਼ਾਖਾਵਾਂ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਵਿੱਚ ਜਿਤਨੇ ਵੀ ਗੀਤ ਹਨ, ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਗੀਤਾਂ ਵਿੱਚ ਸੁਰ ਤੇ ਅੱਖਰ ਉਚਾਰਨ ਦੇ ਜਿਤਨੇ ਨਿਯਮ ਹਨ—ਇਹ ਸਭ ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਹੀ ਉਤਪੰਨ ਹੋਏ ਸਮਝੋ।

Verse 1016

सो&हमेवोत्तरे भागे क्रमाक्षरविभागवित्‌ । कुन्तीनन्दन! सबको वर देनेवाले जो हयग्रीव प्रकट होते हैं

ਕੁੰਤੀਨੰਦਨ! ਉੱਤਰ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਕ੍ਰਮ ਅਤੇ ਅੱਖਰ-ਵਿਭਾਗ ਦਾ ਗਿਆਤਾ ਮੈਂ ਹੀ ਹਾਂ। ਜਦੋਂ-ਜਦੋਂ ਵਰ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਹਯਗ੍ਰੀਵ ਪ੍ਰਗਟ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਤਦੋਂ ਉਸੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਮੈਂ ਹੀ ਅਵਤਾਰ ਧਾਰਦਾ ਹਾਂ। ਉੱਤਰ ਭਾਗ ਵਿੱਚ ਵੇਦ-ਮੰਤ੍ਰਾਂ ਦੇ ਕ੍ਰਮ-ਵਿਭਾਗ ਅਤੇ ਅੱਖਰ-ਵਿਭਾਗ ਨੂੰ ਮੈਂ ਹੀ ਜਾਣਦਾ ਹਾਂ।

Verse 1053

सप्तजातिषु मुख्यत्वाद्‌ योगानां सम्पदं गत: । कण्डरीक-कुलमें उत्पन्न हुए प्रतापी राजा ब्रह्मदत्तने सात जन्मोंके जन्म-मृत्युसम्बन्धी दुःखोंका बार-बार स्मरण करके तीव्रतम वैराग्यके कारण शीघ्र ही योगजनित एऐश्वर्य प्राप्त कर लिया था

ਸੱਤ ਜਨਮਾਂ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਧਾਨਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਕੇ ਉਹ ਯੋਗ-ਜਨਿਤ ਸਮ੍ਰਿੱਧੀ ਤੱਕ ਪਹੁੰਚਿਆ। ਕਣਡਰੀਕ ਕੁਲ ਵਿੱਚ ਜਨਮੇ ਪ੍ਰਤਾਪੀ ਰਾਜਾ ਬ੍ਰਹਮਦੱਤ ਨੇ ਸੱਤ ਜਨਮਾਂ ਦੇ ਜਨਮ-ਮਰਨ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਦੁੱਖਾਂ ਨੂੰ ਵਾਰੰਵਾਰ ਯਾਦ ਕੀਤਾ; ਉਸ ਯਾਦ ਤੋਂ ਉਪਜੇ ਅਤਿ ਤੀਖੇ ਵੈਰਾਗ ਦੇ ਕਾਰਨ ਉਸ ਨੇ ਛੇਤੀ ਹੀ ਯੋਗਸਿੱਧ ਐਸ਼ਵਰਯ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲਿਆ।

Verse 1066

धर्मस्य कुरुशार्टूल ततो5हं धर्मज: स्मृत: । कुरुश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! पूर्वकालमें किसी कारणवश मैं धर्मके पुत्ररूपसे प्रसिद्ध हुआ था। इसीलिये मुझे “धर्मज” कहा गया है

ਹੇ ਕੁਰੂਆਂ ਦੇ ਸ਼ੇਰ! ਇਸੇ ਕਾਰਨ ਮੈਂ ‘ਧਰਮਜ’—ਧਰਮ ਦਾ ਪੁੱਤਰ—ਵਜੋਂ ਯਾਦ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ। ਹੇ ਕੁਰੂਸ਼੍ਰੇਸ਼ਠ, ਕੁੰਤੀਪੁੱਤਰ! ਪੂਰਵਕਾਲ ਵਿੱਚ ਕਿਸੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਕਾਰਨ ਕਰਕੇ ਮੈਂ ਧਰਮ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੋਇਆ ਸੀ; ਇਸ ਲਈ ਮੈਨੂੰ ‘ਧਰਮਜ’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

Verse 1106

आवयो: सहसागच्छद्‌ बदर्याश्रममन्तिकात्‌ । रुद्रने क्रोधपूर्वक अपने प्रज्वलित त्रिशूलका बारंबार प्रयोग किया। वह त्रिशूल दक्षके विस्तृत यज्ञको भस्म करके सहसा बदरिकाश्रममें हम दोनों (नर और नारायण) के निकट आ पहुँचा

ਉਹ ਨੇੜੇ ਤੋਂ ਹੀ ਅਚਾਨਕ ਬਦਰੀ-ਆਸ਼ਰਮ ਵੱਲ ਦੌੜ ਪਿਆ। ਕ੍ਰੋਧ ਵਿੱਚ ਰੁਦ੍ਰ ਨੇ ਆਪਣਾ ਪ੍ਰਜਵਲਿਤ ਤ੍ਰਿਸ਼ੂਲ ਵਾਰੰਵਾਰ ਸੁੱਟਿਆ। ਉਹ ਤ੍ਰਿਸ਼ੂਲ ਦਕਸ਼ ਦੇ ਵਿਸਤ੍ਰਿਤ ਯਜ੍ਞ ਨੂੰ ਭਸਮ ਕਰ ਕੇ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਬਦਰੀ-ਆਸ਼ਰਮ ਵਿੱਚ ਆਇਆ ਅਤੇ ਸਾਡੇ ਦੋਵਾਂ—ਨਰ ਅਤੇ ਨਾਰਾਇਣ—ਦੇ ਨੇੜੇ ਪਹੁੰਚ ਗਿਆ।

Verse 1146

नारायण: स विश्वात्मा तेनास्य शितिकण्ठता । यह देख रुद्र तपस्यामें लगे हुए उन ऋषियोंपर टूट पड़े। तब विश्वात्मा नारायणने अपने हाथसे उन आक्रमणकारी रुद्रदेवका गला पकड़ लिया। इसीसे उनका कण्ठ नीला हो जानेके कारण वे “नीलकण्ठ' के नामसे प्रसिद्ध हुए

ਜਦੋਂ ਰੁਦ੍ਰ ਤਪੱਸਿਆ ਵਿੱਚ ਲੀਨ ਰਿਸ਼ੀਆਂ ਉੱਤੇ ਟੁੱਟ ਪਿਆ, ਤਦੋਂ ਵਿਸ਼੍ਵਾਤਮਾ ਨਾਰਾਇਣ ਨੇ ਆਪਣੇ ਹੱਥ ਨਾਲ ਉਸ ਆਕਰਮਣਕਾਰੀ ਰੁਦ੍ਰ ਦਾ ਗਲਾ ਫੜ ਲਿਆ। ਉਸ ਫੜ ਨਾਲ ਉਸ ਦਾ ਕੰਠ ਨੀਲਾ ਹੋ ਗਿਆ; ਇਸ ਲਈ ਉਹ ‘ਨੀਲਕੰਠ’ ਨਾਮ ਨਾਲ ਪ੍ਰਸਿੱਧ ਹੋਇਆ।

Verse 1156

मन्नत्रैश्न संयुयोजाशु सो5भवत्‌ परशुर्महान्‌ । इसी समय रुद्रका विनाश करनेके लिये नरने एक सींक निकाली और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके शीघ्र ही छोड़ दिया। वह सींक एक बहुत बड़े परशुके रूपमें परिणत हो गयी

ਮੰਤ੍ਰਾਂ ਨਾਲ ਅਭਿਮੰਤ੍ਰਿਤ ਹੋਦਿਆਂ ਹੀ ਉਹ ਤੁਰੰਤ ਸਮਰਥ ਹੋ ਕੇ ਇੱਕ ਮਹਾਨ ਪਰਸ਼ੂ ਬਣ ਗਿਆ। ਉਸੇ ਵੇਲੇ ਰੁਦ੍ਰ ਦੇ ਵਿਨਾਸ਼ ਲਈ ਨਰ ਨੇ ਇੱਕ ਸੀੰਕ ਕੱਢੀ, ਉਸ ਨੂੰ ਮੰਤ੍ਰਾਂ ਨਾਲ ਅਭਿਮੰਤ੍ਰਿਤ ਕਰ ਕੇ ਝਟ ਪਟ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ; ਅਤੇ ਉਹ ਸੀੰਕ ਇੱਕ ਵਿਸ਼ਾਲ ਪਰਸ਼ੂ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਬਦਲ ਗਈ।

Verse 1173

को जय प्राप्तवांस्तत्र शंसैतन्मे जनार्दन । अर्जुनने पूछा--वृष्णिनन्दन! त्रिलोकीका संहार करनेवाले उस युद्धके उपस्थित होनेपर वहाँ रुद्र और नारायणमेंसे किसको विजय प्राप्त हुई? जनार्दन! आप यह बात मुझे बताइये

ਅਰਜੁਨ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ—ਹੇ ਵ੍ਰਿਸ਼ਣਿਨੰਦਨ! ਜਦੋਂ ਤ੍ਰਿਲੋਕ ਦਾ ਸੰਹਾਰ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਉਹ ਯੁੱਧ ਸਾਹਮਣੇ ਆ ਗਿਆ, ਤਦੋਂ ਉੱਥੇ ਰੁਦ੍ਰ ਅਤੇ ਨਾਰਾਇਣ ਵਿੱਚੋਂ ਕਿਸ ਨੂੰ ਜਿੱਤ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਈ? ਹੇ ਜਨਾਰਦਨ! ਇਹ ਗੱਲ ਮੈਨੂੰ ਦੱਸੋ।

Verse 11131

वेगेन महता पार्थ पतन्नारायणोरसि

ਹੇ ਪਾਰਥ! ਉਹ ਮਹਾਨ ਵੇਗ ਨਾਲ ਡਿੱਗਦਾ ਹੋਇਆ ਨਾਰਾਇਣ ਦੇ ਵਕਸ਼ਸਥਲ ਉੱਤੇ ਆ ਪਿਆ।

Verse 11636

ततो<5हं खण्डपरशु: स्मृत: परशुखण्डनात्‌ । नरका चलाया हुआ वह परशु सहसा रुद्रके द्वारा खण्डित कर दिया गया। मेरे परशुका खण्डन हो जानेसे मैं 'खण्डपरशु” कहलाया

ਫਿਰ ਮੇਰਾ ਪਰਸ਼ੂ ਟੁੱਟ ਜਾਣ ਕਰਕੇ ਮੈਂ ‘ਖੰਡ-ਪਰਸ਼ੂ’ ਦੇ ਨਾਮ ਨਾਲ ਯਾਦ ਕੀਤਾ ਜਾਣ ਲੱਗਾ।

Frequently Asked Questions

The chapter addresses the need to transform internal distress and uncertainty into stable, dharma-aligned action; it frames wise counsel as a remedy that restores functional clarity and moral confidence.

Instruction that reassures is portrayed as a basic human necessity—like rest, water, and food—because it removes psychological burden and enables disciplined, timely performance of duty, including hospitality and respectful conduct.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the implied valuation is pragmatic and ethical: reassurance and hospitality yield discernment, social harmony, and firm resolve toward meritorious conduct.