
Chapter Arc: वनवास की सीमा पर खड़े पाण्डव—अब ‘अज्ञातवास’ का कठिन व्रत सामने है। युधिष्ठिर तपस्वियों और आचार्य धौम्य से अनुमति माँगते हुए शोक से भर उठते हैं। → आश्रमवासी विद्वान तपस्वी, जो पाण्डवों के भक्त हैं, युधिष्ठिर की आज्ञा पाकर उन्हें विदा देने को खड़े होते हैं। पाण्डव अपनी योजना रखते हैं—इस वर्ष छिपकर रहना है, क्योंकि सुयोधन, कर्ण और शकुनि जैसे दुष्टात्मा शत्रु अवसर खोज रहे हैं। युधिष्ठिर का मन कर्तव्य और भय के बीच डगमगाता है। → अज्ञातवास की अनुमति माँगते-माँगते युधिष्ठिर दुःख-शोक से विह्वल होकर मूर्छित हो जाते हैं—कण्ठ आँसुओं से भर जाता है और राजधर्म का धैर्य क्षणभर को टूटता दिखता है। → धौम्य युधिष्ठिर को समझाते हैं—आप विद्वान, दान्त, सत्यसंध, जितेन्द्रिय हैं; ऐसी आपदा में भी महापुरुष मोह नहीं करते। उदाहरण देकर वे बताते हैं कि इन्द्र ने भी शत्रुदमन हेतु निषध देश में गुप्तरूप से रहकर कार्य सिद्ध किया; अतः छिपकर रहना अधर्म नहीं, नीति है। फिर भीमसेन उत्साहवर्धन करते हैं, राजा के भीतर साहस जगाते हैं और अज्ञातवास के लिए मन स्थिर होता है। → पाण्डवों के अज्ञातवास-प्रवेश का निर्णय पक्का हो जाता है—अब प्रश्न केवल यह है कि वे कहाँ और किस रूप में छिपेंगे, और क्या शत्रु उनकी पहचान कर पाएँगे।
Verse 1
हि >> न (0) हि 7 आम पञ्चदशाधिकंत्रेशततमो< ध्याय: अज्ञातवासके लिये अनुमति लेते समय शोकाकुल हुए युधिष्ठिरको महर्षि धौम्यका समझाना, भीमसेनका उत्साह देना तथा आश्रमसे दूर जाकर पाण्डवोंका परस्पर परामर्शके लिये बैठना वैशम्पायन उवाच धर्मेण ते5भ्यनुज्ञाता: पाण्डवा: सत्यविक्रमा: । अज्ञातवासं वत्स्यन्त$छज्ना वर्ष त्रयोदशम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले--- / ५ 8 । (/) १ /€+। कर
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଧର୍ମାନୁସାରେ ଅନୁମତି ପାଇ ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ ଯେ ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷରେ ସେମାନେ ଗୁପ୍ତ ଭାବେ ଅଜ୍ଞାତବାସ କରିବେ। ସେଇ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ସେମାନେ ନିକଟରେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ପରାମର୍ଶ ପାଇଁ ବସିଲେ।
Verse 2
उपोपविष्टा विद्वांस: सहिता: संशितव्रता: । ये तद्भक्ता वसन्ति सम वनवासे तपस्विन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ବିଦ୍ୱାନମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ, ଦୃଢ଼ ବ୍ରତଧାରୀ ହୋଇ, ସମୀପରେ ବସିଲେ। ବନବାସ ସମୟରେ ସ୍ନେହବଶତଃ ଯେ ତପସ୍ବୀମାନେ ସେମାନଙ୍କ ସହ ବସୁଥିଲେ, ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।
Verse 3
तानब्रुवन् महात्मान: स्थिता: प्राजजलयस्तदा । अभ्यनुज्ञापयिष्यन्तस्तं निवासं धृतव्रता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराजकी अनुमति पाकर सत्यपराक्रमी पाण्डव तेरहवें वर्षमें छिपकर अज्ञातवास करनेकी इच्छासे एकत्र हो विचार-विमर्शके लिये आस-पास बैठे। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करनेवाले और विद्वान थे। वनवासके समय जो तपस्वी ब्राह्मण पाण्डवोंके प्रति स्नेह होनेके कारण उनके साथ रहते थे, उनसे अज्ञातवासके हेतु आज्ञा लेनेके लिये व्रतधारी महात्मा पाण्डव हाथ जोड़कर खड़े हो इस प्रकार बोले---
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ସେଇ ମହାତ୍ମାମାନେ, ବ୍ରତରେ ଅଟୁଟ, କରଯୋଡ଼ି ଦାଁଡ଼ି, ଯେ ଗୁପ୍ତ ନିବାସ—ଅଜ୍ଞାତବାସ—ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ଯାଉଥିଲେ, ତାହା ପାଇଁ ଅନୁମତି ଚାହିଁ କହିଲେ।
Verse 4
विदितं भवतां सर्व धार्तराष्ट्रैयथा वयम् । छद्मना हृृतराज्याश्लानयाश्व बहुशः कृता:,“मुनिवरो! धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जिस प्रकार छल करके हमारा राज्य हर लिया और हमपर बारंबार अत्याचार किया, वह सब आपलोगोंको विदित ही है
“ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠମାନେ! ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ରମାନେ କିପରି ଛଳରେ ଆମର ରାଜ୍ୟ ହରଣ କଲେ ଏବଂ ପୁନଃପୁନଃ ଆମ ଉପରେ ଅନ୍ୟାୟ-ଅତ୍ୟାଚାର କଲେ—ସେ ସବୁ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଜଣା।”
Verse 5
, ५ (१ ' १4. 8... -- उषिताश्च वने कृच्छे वयं द्वादश वत्सरान् । अज्ञातवाससमयं शेषं वर्ष त्रयोदशम्,“हमलोग कष्टदायक वनमें बारह वर्षोतक रह लिये। अब अन्तिम तेरहवाँ वर्ष हमारे अज्ञातवासका समय है
“କଷ୍ଟଦାୟକ ବନରେ ଆମେ ଦ୍ୱାଦଶ ବର୍ଷ ବସିଛୁ। ଏବେ ଶେଷ ତ୍ରୟୋଦଶ ବର୍ଷ ହେଉଛି ଆମ ଅଜ୍ଞାତବାସର ସମୟ।”
Verse 6
तद् वसामो वयं छजन्नास्तदनुज्ञातुमर्हथ । सुयोधनश्व दुष्टात्मा कर्णश्न सहसौबल:,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
“ଏହେତୁ ଏହି ବର୍ଷ ଆମେ ଗୁପ୍ତରେ ବସିବାକୁ ଚାହୁଁଛୁ; ଏଥିପାଇଁ ଆପଣମାନେ ଆମକୁ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତୁ। ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ), କର୍ଣ୍ଣ ଓ ସୌବଳ (ଶକୁନି) ସହିତ ଆମ ପ୍ରତି ଘୋର ବୈର ଧରିଛନ୍ତି।”
Verse 7
जानन्तो विषमं कुर्युरस्मास्वत्यन्तवैरिण: । युक्तचाराश्न युक्ताश्न पौरस्प स््वजनस्य च,“अतः इस वर्ष हम छिपकर रहना चाहते हैं। इसके लिये आपलोग हमें आज्ञा दें। दुष्टात्मा दुर्योधन, कर्ण और शकुनि हमसे अत्यन्त वैर रखते हैं। वे स्वयं तो हमारा पता लगानेको उद्यत हैं ही, उन्होंने गुप्तचर भी लगा रखे हैं। अतः यदि उन्हें हमारे रहनेका पता चल जायगा, तो वे हमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरजनों तथा स्वजनोंके साथ भी विषम (बुरा) बर्ताव कर सकते हैं
“ଆମ ଠିକଣା ଜାଣିଗଲେ ସେଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବୈରୀମାନେ ଆମ ପ୍ରତି କ୍ରୂର ବ୍ୟବହାର କରିବେ; ଏବଂ ଚର ନିଯୁକ୍ତ କରି ନଗରବାସୀ ଓ ଆମ ସ୍ୱଜନମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କ୍ଷତି ପହଞ୍ଚାଇପାରିବେ।”
Verse 8
अपि नस्तद् भवेद् भूयो यद् वयं ब्राह्मणैः सह | समस्ता: स्वेषु राष्ट्रेषु स्वराज्यस्था भवेमहि,“क्या हमारे सामने फिर कभी ऐसा अवसर आयेगा, जब कि हम सब भाई ब्राह्मणोंके साथ अपने राष्ट्रमें रहेंगे--अपने राज्यपर प्रतिष्ठित होंगे”
ଆମ ପାଇଁ ପୁଣି କେବେ ଏମିତି ସୁଯୋଗ ଆସିବ କି—ଯେ ଆମେ ସମସ୍ତ ଭାଇ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ସହିତ ନିଜ-ନିଜ ରାଷ୍ଟ୍ରରେ ବସି, ନିଜ ସ୍ୱରାଜ୍ୟରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ହେବୁ?
Verse 9
वैशम्पायन उवाच इत्युक्त्वा दुःखशोकार्त: शुचिर्धर्मसुतस्तदा । सम्मूर्छितो5भवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिछ्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर पवित्र अन्तःकरणवाले धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिर दु:ख और शोकसे आतुर होकर मूर्च्छित हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और कण्ठ अवरुद्ध हो गया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହି ଧର୍ମପୁତ୍ର, ପବିତ୍ର ହୃଦୟର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦୁଃଖ-ଶୋକରେ ଆକ୍ରାନ୍ତ ହୋଇ ମୂର୍ଛିତ ହେଲେ। ଅଶ୍ରୁରେ ତାଙ୍କ କଣ୍ଠ ରୁଦ୍ଧ ହେଲା; ସେ କଥା କହିପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 10
तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभि: सह | अथ धौम्योडब्रवीद् वाक्यं महार्थ नृपतिं तदा,उस समय उनके भाइयोंसहित समस्त ब्राह्मणोंने उन्हें आश्वासन दिया। तत्पश्चात् महर्षि धौम्यने राजा युधिष्ठिरसे यह गम्भीर अर्थयुक्त वचन कहा--
ତେବେ ତାଙ୍କ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ସମସ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ତାଙ୍କୁ ଆଶ୍ୱାସନ ଦେଲେ। ତାପରେ ମହର୍ଷି ଧୌମ୍ୟ ନୃପତିଙ୍କୁ ଗଭୀର ଅର୍ଥଯୁକ୍ତ ବଚନ କହିଲେ।
Verse 11
“राजन्! आप विद्वान, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। आप- जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं
ରାଜନ୍! ଆପଣ ବିଦ୍ୱାନ, ମନୋନିୟନ୍ତ୍ରକ, ସତ୍ୟପ୍ରତିଜ୍ଞ ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ। ଆପଣଙ୍କ ପରି ପୁରୁଷ ଆପଦାରେ ମଧ୍ୟ ମୋହିତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ; ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ବିବେକ ହରାନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 12
देवैरप्यापद: प्राप्ता#छन्नैश्व बहुशस्तथा । तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थ महात्मभि:,“महामना देवताओंको भी जहाँ-तहाँ शत्रुओंके निग्रहके लिये अनेक बार छिपकर रहना और विपत्तियोंको भोगना पड़ा है
ମହାତ୍ମନ୍! ଦେବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଆପଦା ଆସିଛି; ଏବଂ ସପତ୍ନମାନଙ୍କ ନିଗ୍ରହ ପାଇଁ ସେହି ମହାତ୍ମାମାନେ ଅନେକଥର ଏଠି-ସେଠି ଗୁପ୍ତ ଭାବେ ରହି ଦୁର୍ଦ୍ଦଶା ସହିଛନ୍ତି।
Verse 13
राजन विद्वान् भवान् दान्तः सत्यसंधो जितेन्द्रिय: । नैवंविधा: प्रमुहान्ते नरा: कस्याज्चिदापदि,इन्द्रेण निषधान प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा । छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां च विनिग्रहे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଆପଣ ବିଦ୍ୱାନ, ଦାନ୍ତ, ସତ୍ୟସନ୍ଧ ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ। ଏପରି ପୁରୁଷ କୌଣସି ଆପଦରେ ମୋହିତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ। ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ନିର୍ଦ୍ଦେଶରେ ନିଷଧ ଦେଶକୁ ପହଞ୍ଚି, ସେତେବେଳେ ଗିରିପ୍ରସ୍ଥ ଆଶ୍ରମରେ ଗୁପ୍ତରେ ରହି, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ନିଗ୍ରହାର୍ଥ ସେ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧନ କଲେ।
Verse 14
विष्णुनाश्वशिर: प्राप्प तथादित्यां निवत्स्यता | गर्भे वधार्थ दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम्,“भगवान् विष्णु भी दैत्योंका वध करनेके लिये हयग्रीवस्वरूप धारण करके अज्ञातभावसे अदितिके गर्भमें दीर्घकालतक रहे हैं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ଦୈତ୍ୟମାନଙ୍କ ବଧାର୍ଥେ ହୟଗ୍ରୀବ ରୂପ ଧାରଣ କରି ଅଦିତିଙ୍କ ଭିତରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଗର୍ଭରେ ଅଜ୍ଞାତଭାବେ ଦୀର୍ଘକାଳ ଗୁପ୍ତରେ ରହିଲେ।
Verse 15
प्राप्प वामनरूपेण प्रच्छन्न॑ ब्रह्म॒रूपिणा । बलेयथा हूतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम्
ବାମନରୂପେ ପ୍ରବେଶ କରି, ବ୍ରାହ୍ମଣବେଶରେ ନିଜ ଦିବ୍ୟତା ଗୁପ୍ତ ରଖି, ତିନି ପଦବିକ୍ରମରେ ବଲିଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ଯେପରି ହରଣ କଲେ—ସେଥି ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଶୁଣିଛ।
Verse 16
“उन्होंने ही ब्राह्मणवेषमें वामनरूप धारण करके अपने तीन पगोंद्वारा जिस प्रकार छिपे तौरपर राजा बलिका राज्य हर लिया था, वह सब तो तुमने सुना ही होगा ।। हुताशनेन यच्चाप: प्रविश्यच्छन्नमासता । विबुधानां कृतं कर्म तच्च सर्व श्रुतं त्वया,'अग्निने जलमें प्रवेश करके वहीं छिपे रहकर देवताओंका कार्य जिस प्रकार सिद्ध किया, वह सब कुछ भी तुम सुन चुके हो
ହୁତାଶନ ଅଗ୍ନି ଜଳରେ ପ୍ରବେଶ କରି ସେଠାରେ ଗୁପ୍ତରେ ରହି ଦେବମାନଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟ ଯେପରି ସାଧନ କଲେ—ସେ ସବୁ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଶୁଣିଛ।
Verse 17
प्रच्छन्न॑ चापि धर्मज्ञ हरिणारिविनिग्रहे । वज्ज प्रविश्य शक्रस्य यत् कृतं तच्च ते श्रुतम्,“धर्मज्ञ! भगवान् श्रीहरिने शत्रुओंके विनाशके लिये छिपे तौरपर इन्द्रके वज्॒में प्रवेश करके जो कार्य किया, वह भी तुम्हारे कानोंमें पड़ा होगा
ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ! ଶତ୍ରୁବିନାଶାର୍ଥେ ଶ୍ରୀହରି ଗୁପ୍ତଭାବେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ବଜ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରି ଯେ କାର୍ଯ୍ୟ କଲେ—ସେଥି ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଶୁଣିଛ।
Verse 18
और्वेण वसता छन्नमूरौ ब्रह्मर्षिणा तदा । यत् कृतं तात देवेषु कर्म तत्तेडनघ श्रुतम्,“तात! निष्पाप नरेश! ब्रह्मर्षि और्वने (माताके) ऊरुमें गुप्तरूपसे निवास करते हुए जो देवकार्य सिद्ध किया था, वह भी तुम्हारे सुननेमें आया ही होगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାତ, ନିଷ୍ପାପ ନରେଶ! ବ୍ରହ୍ମର୍ଷି ଔର୍ବ ଜଂଘାରେ ଗୁପ୍ତ ଭାବେ ବସି ଦେବମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯେ କର୍ମ ସାଧିଥିଲେ, ତାହା ତୁମେ ନିଶ୍ଚୟ ଶୁଣିଛ।
Verse 19
एवं विवस्वता तात छतन्नेनोत्तमतेजसा । निर्दग्धा: शात्रवा: सर्वे वसता भुवि सर्वश:,“तात! इसी प्रकार महातेजस्वी भगवान् सूर्यने भी पृथ्वीपर गुप्तरूपसे निवास करके समस्त शत्रुओंको दग्ध किया है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାତ! ଏହିପରି ଅତ୍ୟୁତ୍ତମ ତେଜସ୍ବୀ ବିବସ୍ୱାନ୍ ସୂର୍ଯ୍ୟଦେବ ମଧ୍ୟ ପୃଥିବୀରେ ଗୁପ୍ତ ରୂପେ ବସି ସର୍ବଦିଗରେ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଦଗ୍ଧ କରିଦେଇଥିଲେ।
Verse 20
विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै । दशग्रीवो हतश्छन्न॑ संयुगे भीमकर्मणा,“भयंकर पराक्रमी भगवान् विष्णुने भी श्रीरामरूपसे दशरथके घरमें छिपे रहकर युद्धमें दशमुख रावणका वध किया था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଭୀମକର୍ମା ଭଗବାନ୍ ବିଷ୍ଣୁ ମଧ୍ୟ ଦଶରଥଙ୍କ ଗୃହରେ (ରାମରୂପେ) ଗୁପ୍ତ ଭାବେ ବସି ଯୁଦ୍ଧରେ ଦଶଗ୍ରୀବକୁ ବଧ କରିଥିଲେ।
Verse 21
एवमेव महात्मान: प्रच्छन्नास्तत्र तत्र ह अजयज्छात्रवान् युद्धे तथा त्वमपि जेष्यसि,“इसी प्रकार कितने ही महामना वीर पुरुषोंने यत्र-तत्र छिपे रहकर युद्धमें शत्रुओंपर विजय पायी है। इसी प्रकार तुम भी विजयी होओगे”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଏହିପରି ଅନେକ ମହାତ୍ମା ବୀର ଯତ୍ର-ତତ୍ର ଗୁପ୍ତ ରହି ଯୁଦ୍ଧରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିଛନ୍ତି; ସେହିପରି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ବିଜୟୀ ହେବ।
Verse 22
तथा धौम्येन धर्मज्ञो वाक्यै: सम्परितोषित: । शास्त्रबुद्धया स्वबुद्धया च न चचाल युधिछिर:,महर्षि धौम्यने जब इस प्रकार युक्तियुक्त वचनोंद्वारा धर्मज्ञ युधिष्ठिरको संतोष प्रदान किया, तब वे शास्त्रज्ञान और अपने बुद्धिबलके कारण (धर्मसे) विचलित नहीं हुए
ଏହିପରି ମହର୍ଷି ଧୌମ୍ୟ ଯୁକ୍ତିଯୁକ୍ତ ବଚନରେ ଧର୍ମଜ୍ଞ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସନ୍ତୋଷ ଦେଲେ; ତେବେ ଶାସ୍ତ୍ରବୁଦ୍ଧି ଓ ନିଜ ସ୍ଥିର ବୁଦ୍ଧିବଳରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଧର୍ମରୁ ବିଚଳିତ ହେଲେ ନାହିଁ।
Verse 23
अथाब्रवीन्महाबाहुर्भीमसेनो महाबल: । राजानं बलिनां श्रेष्ठो गिरा सम्परिहर्षयन्,तदनन्तर बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबली महाबाहु भीमसेनने अपनी वाणीसे राजा युधिष्ठिरका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए कहा--
ତଦନନ୍ତର ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମହାବଳୀ ମହାବାହୁ ଭୀମସେନ ନିଜ ବାଣୀଦ୍ୱାରା ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ହୃଦୟକୁ ହର୍ଷିତ କରି ତାଙ୍କର ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଓ ଉତ୍ସାହ ବଢ଼ାଇ କହିଲେ।
Verse 24
अवेक्षया महाराज तव गाण्डीवधन्वचना । धर्मानुगतया बुद्धया न किज्चित् साहसं कृतम्,“महाराज! गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने आपके आदेशकी प्रतीक्षा तथा अपनी धर्मानुगामिनी बुद्धिके कारण ही अबतक कोई साहसका कार्य नहीं किया है
ମହାରାଜ! ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାର ପ୍ରତୀକ୍ଷା ଏବଂ ଧର୍ମାନୁଗତ ବୁଦ୍ଧିର କାରଣରୁ ଗାଣ୍ଡୀବଧାରୀ ଅର୍ଜୁନ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ କୌଣସି ଅବିବେକୀ ସାହସ କରିନାହାନ୍ତି।
Verse 25
सहदेवो मया नित्यं नकुलश्न निवारितौ । शक्तौ विध्वंसने तेषां शत्रूणां भीमविक्रमौ,“भयंकर पराक्रमी नकुल और सहदेव उन सब शत्रुओंका विध्वंस करनेमें समर्थ हैं। इन दोनोंको मैं ही सदा रोकता आया हूँ
ଭୟଙ୍କର ପରାକ୍ରମୀ ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ ସେଇ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଧ୍ୱଂସ କରିବାରେ ସମର୍ଥ; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ହିଁ ସଦା ସେମାନଙ୍କୁ ରୋକିଆସୁଛି।
Verse 26
न वयं तत् प्रहास्यामो यस्मिन् योक्ष्यति नो भवान् | भवान् विधत्तां तत् सर्व क्षिप्रं जेष्यामहे रिपून्,“आप हमें जिस कार्यमें लगा देंगे, उसे हमलोग पूरा किये बिना नहीं छोड़ेंगे। अतः आप युद्धकी सारी व्यवस्था कीजिये। हम शत्रुओंपर शीघ्र ही विजय पायेंगे”
ଆପଣ ଯେ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଆମକୁ ନିଯୁକ୍ତ କରିବେ, ସେ କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରିବା ବିନା ଆମେ ଛାଡ଼ିବୁ ନାହିଁ। ତେଣୁ ଆପଣ ଯୁଦ୍ଧର ସମସ୍ତ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରନ୍ତୁ; ଆମେ ଶୀଘ୍ର ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିବୁ।
Verse 27
इत्युक्ते भीमसेनेन ब्राह्मणा: परमाशिषा । उक्त्वा चापच्छय भरतान्यथास्वान्स्वान्ययुग्गृहान्,भीमसेनके ऐसा कहनेपर सब ब्राह्मण पाण्डवोंको उत्तम आशीर्वाद देकर और उन भरतवंशियोंसे अनुमति लेकर अपने-अपने घरोंको चले गये
ଭୀମସେନ ଏପରି କହିବା ପରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ପରମ ଆଶୀର୍ବାଦ ଦେଲେ; ଏବଂ ସେଇ ଭରତବଂଶୀୟ ବୀରମାନଙ୍କ ନିକଟରୁ ଅନୁମତି ନେଇ ପ୍ରତ୍ୟେକେ ନିଜ ନିଜ ଗୃହକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 28
सर्वे वेदविदो मुख्या यतयो मुनयस्तथा । आसेदुस्ते यथान्यायं पुनर्दर्शनकाड्क्षया,वेदोंके ज्ञाता समस्त प्रधान-प्रधान संन्यासी तथा मुनिलोग पाण्डवोंसे फिर मिलनेकी इच्छा रखकर न्यायानुसार अपने योग्य स्थानोंमें रहने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ବେଦର ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ ଜ୍ଞାତା, ଯତି ଓ ମୁନିମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପୁନର୍ଦର୍ଶନ ଆକାଂକ୍ଷାରେ ଧର୍ମନୀତିଅନୁସାରେ କ୍ରମେ ନିଜ ନିଜ ଯୋଗ୍ୟ ଆସନରେ ବସିଲେ।
Verse 29
सह धौम्येन विद्वांसस्तथा पञ्च च पाण्डवा: । उत्थाय प्रययुर्वीरा: कृष्णामादाय धन्विन:,धौम्यसहित विद्वान् एवं वीर पाँचों पाण्डव द्रौपदीको साथ लिये धनुष धारण किये वहाँसे उठकर चल दिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ଧୌମ୍ୟଙ୍କ ସହିତ ଜ୍ଞାନୀ ଓ ବୀର ପାଞ୍ଚ ପାଣ୍ଡବ ଧନୁ ଧାରଣ କରି, କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)ଙ୍କୁ ସଙ୍ଗେ ନେଇ ଉଠି ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 30
क्रोशमात्रमुपागम्य तस्माद् देशान्निमित्तत: । श्वोभूते मनुजव्याप्राश्छन्नवासार्थमुद्यता:,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
କିଛି କାରଣବଶତଃ ସେ ସ୍ଥାନରୁ ଏକ କ୍ରୋଶ ଦୂରକୁ ଯାଇ ସେମାନେ ସେଠାରେ ରହିଲେ। ପରଦିନଠାରୁ ଅଜ୍ଞାତବାସ ଆରମ୍ଭ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇ, ପରସ୍ପର ପରାମର୍ଶ ପାଇଁ ସେମାନେ ନିକଟେ ବସିଲେ।
Verse 31
पृथक्छास्त्रविद: सर्वे सर्वे मन्त्रविशारदा: । संधिविग्रहकालज्ञा मन्त्राय समुपाविशन्,किसी कारणवश उस स्थानसे एक कोस दूर जाकर वे नरश्रेष्ठ ठहर गये और आगामी दूसरे दिनसे अज्ञातवास आरम्भ करनेके लिये उद्यत हो परस्पर सलाह करनेके निमित्त आस-पास बैठ गये। वे सभी पृथक्-पृथक् शास्त्रोंके ज्ञाता, मन्त्रणा करनेमें कुशल तथा संधि-विग्रह आदिके अवसरको जाननेवाले थे
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ନିଜ ନିଜ ଶାସ୍ତ୍ରରେ ପାରଙ୍ଗତ; ସମସ୍ତେ ମନ୍ତ୍ରଣାରେ ନିପୁଣ; ଏବଂ ସନ୍ଧି-ବିଗ୍ରହର ଯଥାକାଳ ଜାଣୁଥିଲେ। ତେଣୁ ସେମାନେ ପରାମର୍ଶ ପାଇଁ ଏକତ୍ର ବସିଲେ।
Verse 53
“देवराज इन्द्र शत्रुओंका दमन करनेके लिये गुप्तरूपसे निषधदेशमें गये और गिरिप्रस्थाश्रममें छिपे रहकर उन्होंने अपना कार्य सिद्ध किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରିବା ପାଇଁ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ର ଗୁପ୍ତରୂପେ ନିଷଧ ଦେଶକୁ ଗଲେ। ଗିରିପ୍ରସ୍ଥ ଆଶ୍ରମରେ ଲୁଚି ରହି ସେ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ କଲେ।
Verse 314
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकल आदिके जीवित होने आदि वरोंकी प्राप्तिविषयक तीन सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଆରଣେୟପର୍ବରେ ନକୁଳ ଆଦିଙ୍କ ପୁନର୍ଜୀବନ ଇତ୍ୟାଦି ବରପ୍ରାପ୍ତିବିଷୟକ ତିନିଶେ ଚୌଦ଼ତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 315
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्रयां संहितायां वैयासिक्यां वनपर्वणि आरणेयपर्वणि अज्ञातवासमन्त्रणे पज्चदशाधिकत्रिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत--व्यासनिर्मित शतयाहसी संहिताके वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें अज्ञातवासके लिये मन्त्रणाविषयक तीन सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ବ୍ୟାସକୃତ ଶତସାହସ୍ରୀ ସଂହିତା ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଆରଣେୟପର୍ବରେ ଅଜ୍ଞାତବାସ ପାଇଁ ମନ୍ତ୍ରଣାବିଷୟକ ତିନିଶେ ପନ୍ଦରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।